Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
जयशंकर प्रसाद
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“कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूली के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मन का उन्माद निखरता ज्यों- सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों- अधरों पर उँगली धरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिगंन का जादू पढ़ती? लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूँथ माला जिससे मधु धार ढरे? पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। कोमलता में बल खाती हूँ, मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। आँख जब खोल रहा, अनुराग समीरों पर तिरता था इतराता-सा डोल रहा। उठती उस सुख के स्वागत को, जीवन भर के बल-वैभव से सत्कृत करती दूरागत को। जिसका अवलंबन ले चढ़ती, रस के निर्झर में धँस कर मैं आनन्द-शिखर के प्रति बढ़ती। पलकें आँखों पर झुकती हैं, कलरव परिहास भरी गूजें अधरों तक सहसा रूकती हैं। चुपचाप बरजती खड़ी रही, भाषा बन भौंहों की काली-रेखा-सी भ्रम में पड़ी रही। सारी स्वतंत्रता छीन रही, स्वच्छंद सुमन जो खिले रहे जीवन-वन से हो बीन रही” उसका ही आश्रय लेती-सी, छाया प्रतिमा गुनगुना उठी श्रद्धा का उत्तर देती-सी। अपने मन का उपकार करो, मैं एक पकड़ हूँ जो कहती ठहरो कुछ सोच-विचार करो। कलरव कोलाहल साथ लिये, विद्युत की प्राणमयी धारा बहती जिसमें उन्माद लिये। निखरी हो ऊषा की लाली, भोला सुहाग इठलाता हो ऐसी हो जिसमें हरियाली। आनन्द सुमन सा विकसा हो, वासंती के वन-वैभव में जिसका पंचम स्वर पिक-सा हो, मूर्छना समान मचलता-सा, आँखों के साँचे में आकर रमणीय रूप बन ढलता-सा, जिस रस घन से छा जाती हो, वह कौंध कि जिससे अंतर की शीतलता ठंडक पाती हो, गोधूली की सी ममता हो, जागरण प्रात-सा हँसता हो जिसमें मध्याह्न निखरता हो, सहसा जो अपने प्राची के घर से, उस नवल चंद्रिका-से बिछले जो मानस की लहरों पर-से, |
फूलों की कोमल पंखुडियाँ बिखरें जिसके अभिनंदन में, मकरंद मिलाती हों अपना स्वागत के कुंकुम चंदन में, जिसका जयघोष सुनाते हों, जिसमें दुख-सुख मिलकर मन के उत्सव आनंद मनाते हों, सौंदर्य जिसे सब कहते हैं। जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। गौरव महिमा हूँ सिखलाती, ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती, निज पंचबाण से वंचित हो, बन आवर्जना-मूर्त्ति दीना अपनी अतृप्ति-सी संचित हो, अपनी अतीत असफलता-सी, लीला विलास की खेद-भरी अवसादमयी श्रम-दलिता-सी, मैं शालीनता सिखाती हूँ, मतवाली सुंदरता पग में नूपुर सी लिपट मनाती हूँ, आँखों में अंजन सी लगती, कुंचित अलकों सी घुंघराली मन की मरोर बनकर जगती, करती रहती रखवाली, मैं वह हलकी सी मसलन हूँ जो बनती कानों की लाली।” मेरे जीवन का पथ क्या है? इस निविड़ निशा में संसृति की आलोकमयी रेखा क्या है? मैं दुर्बलता में नारी हूँ, अवयव की सुंदर कोमलता लेकर मैं सबसे हारी हूँ। अपना ही होता जाता है, घनश्याम-खंड-सी आँखों में क्यों सहसा जल भर आता है? विश्वास-महा-तरू-छाया में, चुपचाप पड़ी रहने की क्यों ममता जगती है माया में? झिलमिल करने की मधु-लीला, अभिनय करती क्यों इस मन में कोमल निरीहता श्रम-शीला? इस मानस की गहराई में, चाहती नहीं जागरण कभी सपने की इस सुधराई में। विकल रंग भर देती हो, अस्फुट रेखा की सीमा में आकार कला को देती हो। पर सोच-विचार न कर सकती, पगली सी कोई अंतर में बैठी जैसे अनुदिन बकती। उपचार स्वयं तुल जाती हूँ भुजलता फँसा कर नर-तरू से झूले सी झोंके खाती हूँ। केवल उत्सर्ग छलकता है, मैं दे दूँ और न फिर कुछ लूँ, इतना ही सरल झलकता है।” संकल्प अश्रु-जल-से-अपने- तुम दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने-से सपने। विश्वास-रजत-नग पगतल में, पीयूष-स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में। हारों का होता-युद्ध रहा, संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित रह नित्य-विरूद्ध रहा। सब कुछ रखना होगा- तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा। |
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