हिन्दी साहित्य

जायसी, सुफी मत और भारतीय वातावरण

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 30, 2007

सुफी संतों को इस्लाम प्रचारक कहा जाता है। उन्हें केवल इस्लाम का प्रचारक कहना ठीक नहीं है, जबकि वे लोग अत्यंत उदार दृष्टिकोण के संत थे। लोग उनसे प्रभावित होकर मुसलमान हो जाते थे। इन संतों में धार्मिक दृष्टिकोण बड़ा व्यापक और उदार था। वे इस्लाम को आवश्यक मानते और विचारधारा की स्वतंत्रता और धार्मिक विधि- विधानों के क्षेत्र में स्वतंत्रता के पक्षपाती थे।सूफी मतों के सुफियों ने भारत की धरती पर जन्में धर्मों से बहुत कुछ लिया है। माला जपने की क्रिया उन्होंने बौद्ध धर्म से ली है। सुफियों में शहद खाने का निषेध और अहिंसा- पालन का सिद्धांत जैन धर्म से लिया। भारतीय योगमत का भी सुफियों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा। आसन प्राणायाम आदि के लिए सूफी, योगियों के ॠणी है। सूफी अब सईद ने योगियों से ही ध्यान धारण की बातें सीखी थी।
ईश्वराशधन सुफियों का ध्येय था, प्रेम उनका मूल मंत्र था। एकेश्वरवाद में उनकी आस्था थी, उनके लिए हिंदू- मुस्लिम एक अल्लाह की ही संतान थे। उनकी भेद में जाति भेद मि था। भारतीय हिंदू में मूर्ति पूजा का प्रचार था। सूफी एवं मुसलमानों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। वे समाधि- स्थानों की यात्रा करने लगे। इन स्थानों पर दीप चढ़ाने आदि के द्वारा उन्होंने भी पीरों की पूजा शुरु की। सुफियों ने भारतीय वातावरण के अनुकूल केवल प्रचार ही नहीं किया था, वरन सुन्दर काव्य की भी रचना की। इन काव्य रचनाओं में प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रुपों में सूफी मत के सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ था। इनका उद्देश्य ईश्वरीय प्रेम के अतिरिक्त जन- समाज को प्रेम- पाश में आबद्ध करना भी था।
 
जायसी सहित सभी सूफी कवियों ने मुख और लेखनी से जो कुछ भी व्यक्त किया, वह जनता के आश्वासनार्थ सुधा- सिंधु ही सिद्ध हुआ और भारतीय साहित्य के लिए एक अनूठी निधि बन गया। इन्होंने तृषित मानव हृदय को शांति प्रदान की। अतः भारतीयों ने इन संतों में अपने परम हितैषी और शुभ चिंतक ही पाए। प्यासों को पानी देने वाला और भूखों को भोजन देने वाला सदैव सर्वमान्य होता है। इसी प्रकार ये संत भी लोगों के शीघ्र ही सम्माननीय हो गए। यही कारण था कि हिंदू- मुस्लिम दोनों पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा। हिंदूओं ने तो अपने परम हितैषी सहायक ही पा लिए।
 
जायसी, मंझन, उसमान आदि सूफी कवियों ने अपने प्रेमाख्यानों की रचना द्वारा जिस पर महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर हमारा ध्यान दिलाया है। वह मानव जीवन के सौहार्दपूर्ण विकास के साथ संबंध रखता है और जो प्रधानतः उनके एकोदृष्टि और एकान्तनिष्ठ हो जाने पर ही संभव है। इनका कहना है कि यदि हमारी दृष्टि विशुद्ध प्रेम द्वारा प्रभावित हो सके और हम उसके आधार पर अपना संबंध परमात्मा से जोड़ लें, तो हमारी संकीर्णता सदा के लिए दूर हो जा सकती है। ऐसी दशा में हम न केवल सर्वत्र एक व्यापक विश्व- बंधुत्व की स्थापना कर सकते हैं, बल्कि अपने भीतर ही अपूर्ण शांति एवं परम आनंद का अनुभव कर सकते हैं।
 
इन प्रेमाख्यानों का मुख्य संदेश मानव हृदय की विशालता प्रदान करना तथा उसे सर्वथा परिष्कृत करना एवं अपने भीतर दृढ़ता और एकांतनिष्ठा की शक्ति- भक्ति लाना है। सूफियों के इस प्रेमाघाति जीवनादर्श के मूल मे उनका यह सिद्धांत भी काम करता है कि वास्तव में ईश्वरीय प्रेम तथा लौकिक प्रेम में कोई अंतर नहीं है। इश्कमिजाजी तभी तक संदोष है, जब तक उसमें स्वार्थ परायण्ता की संकीर्णता आ जाए और आत्मत्याग की उदारता लक्षित न हो। व्यक्तिगत सुख- दुख अथवा लाभ- हानि के स्तर से ऊपर उठते ही वह एक अपूर्व रंग पकड़ लेता है और फिर क्रमशः उस रुप में आ जाता है, जिसको इश्क हकीकी के नाम से जाना जाता है। कवियों ने अपनी इन रचनाओं में ऐसा कभी कोई संकेत नहीं छोड़ा, जिससे उनका कोई सांप्रदायिक अर्थ लगाया जा सके। जायसी इस्लामी के अनुयायी थे, मगर उन पर सूफी संत होने के कारण इस्लाम और हिंदू भावना से वे ऊँचे उठे हुए थे।
 
तिन्ह संतति उपराजा, भांतिहि भांति कुलीन
हिंदू तुरुक दुबो भये, अपने- अपने दीन।।
 
मातु के रक्त पिता कै बिंदू।
अपने दुबौ तुरुक और हिंदू।।
 
जायसी ने कई स्थलों पर साधना और धर्म के पक्षों में वाह्माडम्बर का विरोध किया है–
 
का भा परगट क्या पखारें।
का भा भगति भुइ सिर मारे।।
का भा जय भभूत चढ़ाऐ।
का भा गेरु कापरि लाए।।
का भा भेस दिगंबर छांटे।
 
का भा आपू उलटि गए काँटे।।
जो मेखहि तजि लोन तू गहा।
ना बाग टहैं भगति बे चाहा।।
बर पीपर सिर जटा न थोरे।
अइस भेसं की पावसि भोरे।।
 
जब लगि विरह न होई तन, हिए न उपजइ पेम।
तब लगि हाथ न आव तप करम धरम सतनेम।।
 
यह तन अल्लाह मिंया सो लाइ।
जिदि की षाई तिहि की शाई।
बात बहुत जो कहे बनाई।
छूछ पछौर उड़ि- उड़ि जाए।।
जीवन थोर बहुत उपहाँस।
 
अधरी ठकुरी पीठ बतासे।।
तोरा अन्याउ होसि का क्रोधी।
बेल न कूदत गोने कूदी।।
पुन्य पाप ते कोउ तरा।
भूखी डाइन तामस भरा।।
 
पद्मावत में जायसी द्वारा प्रेमाख्यानों का उल्लेख –
 
बहुतन्ह ऐस जीऊ पर खेला।
तू जोगी केहि माहं अकेला।।
विक्रम धसा प्रेम के बारा।
सपनावति कहाँ गएउ पतारा।।
सुदेवच्छ मुगुधावति लागी।
 
कंकनपूरि होई गा बैरागी।।
राजकुँवर कंचनपुर गएऊ।
मिरगावति कहं जोगी भएऊ।।
साधा कुवँर मनोहर जोगू।
मधुमालति कहं कीन्ह वियोगू।।
 

 

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