Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 30, 2007
| सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”1ऊनविंश पर जो प्रथम चरण तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण; तनये, ली कर दृक्पात तरुण जनक से जन्म की विदा अरुण! गीते मेरी, तज रूप-नाम वर लिया अमर शाश्वत विरामपूरे कर शुचितर सपर्याय जीवन के अष्टादशाध्याय, चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण कह – “पित:, पूर्ण आलोक-वरण करती हूँ मैं, यह नहीं मरण, ‘सरोज’ का ज्योति:शरण – तरण!” अशब्द अधरों का सुना भाष, कहता तेरा प्रयाण सविनय, – धन्ये, मैं पिता निरर्थक था, |
2हारता रहा मैं स्वार्थ-समर। शुचिते, पहनाकर चीनांशुक रख न सका तुझे अत: दधिमुख। क्षीण का न छीना कभी अन्न, मैं लख न सका वे दृग विपन्न, अपने आँसुओं अत: बिम्बित देखे हैं अपने ही मुख-चित। सोचा है नत हो बार बार – पार्श्व में अन्य रख कुशल हस्त अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम |
3छोडने के प्रथम जीर्ण अजिर। आँसुओं सजल दृष्टि की छलक पूरी न हुई जो रही कलक प्राणों की प्राणों में दब कर पर संपादकगण निरानंद |
| 4भाव की चढी़ पूजा उन पर। याद है दिवस की प्रथम धूप थी पडी़ हुई तुझ पर सुरूप, खेलती हुई तू परी चपल, मैं दूरस्थित प्रवास में चल दो वर्ष बाद हो कर उत्सुक देखने के लिये अपने मुख था गया हुआ, बैठा बाहर आँगन में फाटक के भीतर, मोढे़ पर, ले कुंडली हाथ अपने जीवन की दीर्घ-गाथ। पढ़ लिखे हुए शुभ दो विवाह। हँसता था, मन में बडी़ चाह खंडित करने को भाग्य-अंक, देखा भविष्य के प्रति अशंक। इससे पहिले आत्मीय स्वजन |
5हैं सुधरे हुए बडे़ सज्जन। अच्छे कवि, अच्छे विद्वज्जन। हैं बडे़ नाम उनके। शिक्षित लड़की भी रूपवती; समुचित आपको यही होगा कि कहें हर तरह उन्हें; वर सुखी रहें।’ आयेंगे कल।” दृष्टि थी शिथिल, धीरे-धीरे फिर बढा़ चरण, |
6पर बँधा देह के दिव्य बाँध; छलकता दृगों से साध साध। फूटा कैसा प्रिय कंठ-स्वर माँ की मधुरिमा व्यंजना भर हर पिता कंठ की दृप्त-धार उत्कलित रागिनी की बहार! बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि, मेरे स्वर की रागिनी वह्लि साकार हुई दृष्टि में सुघर, समझा मैं क्या संस्कार प्रखर। शिक्षा के बिना बना वह स्वर है, सुना न अब तक पृथ्वी पर! जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रान्तर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलिदल पुंज-पुंज बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश–मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन। सासु ने कहा लख एक दिवस :– |
| 7ले चला साथ मैं तुझे कनक ज्यों भिक्षुक लेकर, स्वर्ण-झनक अपने जीवन की, प्रभा विमल ले आया निज गृह-छाया-तल। सोचा मन में हत बार-बार – “ये कान्यकुब्ज-कुल कुलांगार, खाकर पत्तल में करें छेद, इनके कर कन्या, अर्थ खेद, इस विषय-बेलि में विष ही फल, यह दग्ध मरुस्थल — नहीं सुजल।” फिर सोचा — “मेरे पूर्वजगण गुजरे जिस राह, वही शोभन होगा मुझको, यह लोक-रीति कर दूं पूरी, गो नहीं भीति कुछ मुझे तोड़ते गत विचार; पर पूर्ण रूप प्राचीन भार ढोते मैं हूँ अक्षम; निश्चय आयेगी मुझमें नहीं विनय उतनी जो रेखा करे पार सौहार्द्र-बंध की निराधार।वे जो यमुना के-से कछार पद फटे बिवाई के, उधार खाये के मुख ज्यों पिये तेल चमरौधे जूते से सकेल निकले, जी लेते, घोर-गंध, उन चरणों को मैं यथा अंध, कल ध्राण-प्राण से रहित व्यक्ति हो पूजूं, ऐसी नहीं शक्ति। ऐसे शिव से गिरिजा-विवाह करने की मुझको नहीं चाह!” फिर आई याद — “मुझे सज्जन है मिला प्रथम ही विद्वज्जन नवयुवक एक, सत्साहित्यिक, कुल कान्यकुब्ज, यह नैमित्तिक होगा कोई इंगित अदृश्य, मेरे हित है हित यही स्पृश्य अभिनन्दनीय।” बँध गया भाव, |
8खुल गया हृदय का स्नेह-स्राव, खत लिखा, बुला भेजा तत्क्षण, युवक भी मिला प्रफुल्ल, चेतन। बोला मैं — “मैं हूँ रिक्त-हस्त इस समय, विवेचन में समस्त – जो कुछ है मेरा अपना धन पूर्वज से मिला, करूँ अर्पण यदि महाजनों को तो विवाह कर सकता हूँ, पर नहीं चाह मेरी ऐसी, दहेज देकर मैं मूर्ख बनूं यह नहीं सुघर, बारात बुला कर मिथ्या व्यय मैं करूँ नहीं ऐसा सुसमय। तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम मैं सामाजिक योग के प्रथम, लग्न के; पढूंगा स्वयं मंत्र यदि पंडितजी होंगे स्वतन्त्र। जो कुछ मेरे, वह कन्या का, निश्चय समझो, कुल धन्या का।”आये पंडित जी, प्रजावर्ग, आमन्त्रित साहित्यिक ससर्ग देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पडा़ कलश का जल। देखती मुझे तू हँसी मन्द, होंठो में बिजली फँसी स्पन्द उर में भर झूली छवि सुन्दर, प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर तू खुली एक उच्छवास संग, विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग, नत नयनों से आलोक उतर काँपा अधरों पर थर-थर-थर। देखा मैनें वह मूर्ति-धीति मेरे वसन्त की प्रथम गीति – श्रृंगार, रहा जो निराकार, रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग – भरता प्राणों में राग-रंग, |
9रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना मही। हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन कोई थे नहीं, न आमन्त्रण था भेजा गया, विवाह-राग भर रहा न घर निशि-दिवस जाग; प्रिय मौन एक संगीत भरा नव जीवन के स्वर पर उतरा। माँ की कुल शिक्षा मैंने दी, पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची, सोचा मन में, “वह शकुन्तला, पर पाठ अन्य यह अन्य कला।”कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद बैठी नानी की स्नेह-गोद। मामा-मामी का रहा प्यार, भर जलद धरा को ज्यों अपार; वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त, तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त; वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली, स्नेह से हिली, पली, अंत भी उसी गोद में शरण ली, मूंदे दृग वर महामरण!मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल युग वर्ष बाद जब हुई विकल, दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही! हो इसी कर्म पर वज्रपात यदि धर्म, रहे नत सदा माथ इस पथ पर, मेरे कार्य सकल हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल! कन्ये, गत कर्मों का अर्पण कर, करता मैं तेरा तर्पण! समाप्त |
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