Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खँडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठण्डे अँधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की…
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में…
समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।बावड़ी को घेर
डालें खूब उलझी हैं,
खड़े हैं मौन औदुम्बर।
व शाखों पर
लटकते घुग्घुओं के घोंसले परित्यक्त भूरे गोल।
विद्युत शत पुण्यों का आभास
जंगली [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
जयशंकर प्रसाद
“कोमल किसलय के अंचल में
नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी,
गोधूली के धूमिल पट में
दीपक के स्वर में दिपती-सी।
मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में
मन का उन्माद निखरता ज्यों-
सुरभित लहरों की छाया में
बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों-
वैसी ही माया में लिपटी
अधरों पर उँगली धरे हुए,
माधव के सरस कुतूहल का
आँखों में पानी भरे हुए।
नीरव निशीथ में लतिका-सी
तुम कौन आ [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
जयशंकर प्रसाद
कौन हो तुम? संसृति-जलनिधितीर-तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक?
मधुर विश्रांत और एकांत-जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन और चंचल मन का आलस्य”
सुना यह मनु ने मधु गुंजार मधुकरी का-सा जब सानंद,
किये मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद,
एक झटका-सा लगा सहर्ष, [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
रवि हुआ अस्त
ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,
शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,
प्रतिपल-परिवर्तित-व्यूह-भेद कौशल समूह
राक्षस – विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध-कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि-राजीवनयन- हतलक्ष्य-बाण,
लोहितलोचन – रावण मदमोचन – महीयान,
राघव-लाघव- रावण-वारण – गत- युग्म-प्रहर,
उद्धत-लंकापति मर्दित-कपि-दल-बल- विस्तर,
अनिमेष-राम-विश्वजिद्दिव्य-शर-भंग-भाव,
विद्धांग-बद्ध- कोदण्डमुष्टि खर-रुधिर-स्राव,
रावण-प्रहार-दुर्वार-विकल वानर- दल-बल,
मुर्छित-सुग्रीवांगद-भीषण-गवाक्ष-गय-नल,
वारित-सौमित्र – भल्लपति-अगणित-मल्ल-रोध,
गर्ज्जित-प्रलयाब्धि-क्षुब्ध हनुमत्-केवल प्रबोध,
उद्गीरित-वह्नि-भीम-पर्वत-कपि चतुःप्रहर,
जानकी-भीरू-उर – आशा भर-रावण सम्वर।
लौटे युग-दल-राक्षस [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाहिन्दी कविता के छायावादी युग के प्रमुख कवियों में से थे।
जन्म: २१ फरवरी १८९६ को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक देशी राज्य में.
मूल निवास: उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का गढ़कोला नामक गाँव.
शिक्षा: हाई स्कूल तक हिन्दी संस्कृत और बांग्ला का स्वतंत्र अध्यन।
कार्यक्षेत्र: 1918 से 1922 तक महिषादल राज्य की [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
रीति काल सन 1650 से 1850 तक
इस युग को रीतिकाल इसलिए कहते हैं, क्योंकि इसमें काव्य-रीति पर अधिक विचार हुआ है। इस काल में कई कवि ऐसे हुए हैं जो आचार्य भी थे और जिन्होंने विविध काव्यांगों के लक्षण देने वाले ग्रंथ भी लिखे। इस युग में श्रृंगार की प्रधानता रही। यह युग मुक्तक-रचना का [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007
अमीर खुसरो जन्म: 1253 निधन: 1325
कुछ प्रमुख कृतियाँ- ‘तुहफ़ा-तुस-सिगर’, ‘बाक़िया नाक़िया’, ‘तुग़लकनामा’, ‘नुह-सिफ़िर’ ‘मुकरिया’
जे हाले मिसकी मकुल तगाफुल दुराये नैना बनाय बतियां ॥
कि ताबे गिजां न दारम, ऐजां न लेहू काहे लगाए छतियां ॥
शबाने हिजां दाज यूं व रोजे वसतल चू इम्र कोतह ।
सखी, पिया तो जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अन्धेरी रतियां [...]
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