हिन्दी साहित्य

Archive for January 2008

जैन साहित्य की रास परक रचनायें

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 26, 2008

 

भारत के पश्चिमी भाग मे जैन साधुओ ने अपने मत का प्रचार हिन्दी कविता के माध्यम से किया । इन्होंने “रास” को एक प्रभाव्शाली रचनाशैली का रूप दिया । जैन तीर्थंकरो के जीवन चरित तथा वैष्णव अवतारों की कथायें जैन-आदर्शो के आवरण मे ‘रास‘ नाम से पद्यबद्ध की गयी । अतः जैन साहित्य का सबसे [...]

बाबा नागार्जुन

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

बाबा नागार्जुन  

बाबा नागार्जुन को भावबोध और कविता के मिज़ाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है. वैसे, यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है. उनका कवि-व्यक्तित्व [...]

हिन्दी उपन्यासों में नारी

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

आज नारी विमर्श के स्तर पर नारी चेतना से संपन्न हिंदी उपन्यास लिखे जा रहे हैं, जिसमें नारी की आत्मा, स्व और अहं ध्वनित है। वास्तव में चेतना का अर्थ विचारों, अनुभूतियों, संकल्पों की आनुषांगिक दशा, स्थिति अथवा क्षमता से है। उसका संबंध नारी की स्वयं की पहचान या किसी भी स्तर पर विषयगत अनुभवों [...]

महिला लेखन

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

महिला लेखन का शताब्दी वर्ष का १९०६-०७ से २००६-२००७

यह सच है कि स्त्री का आत्म संघर्ष रचना के संघर्ष पर विरत होता है। महिला साहित्यकार के लिए बाहरी संदर्भों में पहले उसका आंतरिक समय होता है। जहाँ वह जीती है और सांस लेती है। दूसरी ओर होती है समय की चुनौतियां। उनके जीवन व सृजन [...]

हिन्दी साहित्य : ‘स्व’ तथा ‘पर’

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

मैं अपनी बात दो कवितांशों से आरम्भ करना चाहती हूँ-

‘यह दीप अकेला / स्नेहभरा / है मदमाता/पर इसे पंक्ति को दे दो’

तथा-

राजा को / रथ हाथी घोडे / आम जनों को / पद यात्राएँ।

ऐसा / सुख सुविधाओं का / है बँटवारा /

उनको मीठा पानी / बाकी जल खारा /

उनको / जीने की हर गारंटी / [...]

नाट्य-भाषा के आयाम

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

नाटक या नाट्य में प्रयुक्त भाषा को नाट्यभाषा कहते हैं। भरत के अनुसार नाट्य या नाटक वह है जो लोकस्वभाव को अंगादि के अभिनय की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है। अभिनवगुप्त के अनुसार नाट्य नटनीय नर्तन है। इससे स्पष्ट है कि भरत और अभिनवगुप्त के मतानुसार नाट्य और नृत्य में अभिनय की आवश्यकता है। [...]

प्रकृति के सुकुमार कवि: सुमित्रानंदन पंत

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

आज भले ही हिन्दी साहित्य में छायावादी युग का अवसान हो चुका हो किन्तु यह सत्य है कि हिन्दी कविता छायावाद के एक अत्यन्त समृद्ध व सम्पन्न दौर से गुजरा है। हिन्दी में जब कभी छायावाद की चर्चा होती है, तब उसके चार सुदृढ स्तम्भों के रूप में प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा तथा सुमित्रानंदन पंत [...]

कबीर साहित्य: कबीर चिंतन

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

 

 

 

कबीर साहित्य में जहाँ दर्शन, अध्यात्म, ज्ञान, वैराग्य की गूढता मिलती है, वहीं उनके साहित्य में समाज सुधार का शंखनाद भी है। वह दार्शनिक होने के साथ-साथ, समाज सुधारक भी थे। समाज सुधार अर्थात् जन जीवन का उत्थान कबीर के जीवन की साधना थी। सुधार का समन्वित स्वरूप कि उन्होंने भक्ति के आडम्बरों पर चोट [...]

हिन्दी साहित्य पर बाह्य प्रभाव

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का एक पक्ष अपनी भाषा की आजादी का भी था। पूरे भारत की राष्ट्रभाषा-सम्फ भाषा-हिन्दी या हिन्दुस्तानी हो यही मुख्य मुद्दा था। लम्बी जद्दोजेहद के बाद नागरी लिपि में लिखी हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बनी। वह कैसी हो इस सवाल पर संविधान म कहा गया है कि वह सभी प्रादेशिक भाषाओं से [...]

साहित्य में राष्ट्रीयता का उद्भव

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में जब वैश्वीकरण प्रारंभ हुआ तब उसके लाभ और प्रभाव को देखकर यह शंका मन में पैदा होने लगी कि एक दिन राष्ट्र और राष्ट्रवाद अप्रासंगिक हो जाएँगे। अपने देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और हर नागरिक के जीवन स्तर में वृद्धि हो यह सबसे बडा आकर्षण का मुद्दा था। [...]


प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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