हिन्दी साहित्य

Archive for August 11th, 2008

नदी के द्वीप

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”

 

 

हम नदी के द्वीप है।

हम नही कहते कि हमको छोड कर स्रोतस्विन बह जाय।

वह हमें आकार देती है।

हमारे कोण, गलियां, अन्तरीप, उभार, सैकत-कूल,

सब गोलाइयां उसकी गढी है !

 

मां है वह । है, इसी से हम बने है।

 

किन्तु हम है द्वीप । हम धारा नहीं है ।

स्थिर समर्पण है हमारा । हम सदा [...]

वीरों का कैसा हो बसंत

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008

 

 

रचनाकार: सुभद्रा कुमारी चौहान

 

आ रही हिमालय से पुकार

है उदधि गरजता बार बार

प्राची पश्चिम भू नभ अपार

सब पूछ रहे हैं दिग-दिगन्त-

वीरों का कैसा हो बसन्त।।

 

फूली सरसों ने दिया रंग

मधु लेकर आ पहुँचा अनंग

वधु वसुधा पुलकित अंग अंग

है वीर देश में किन्तु कन्त-

वीरों का कैसा हो बसन्त।।

 

भर रही कोकिला इधर तान

मारू बाजे पर उधर गान

है रंग और [...]

झाँसी की रानी की समाधि पर

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008

झाँसी की रानी की समाधि पर 

सुभद्रा कुमारी चौहान 

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |

जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||

यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |

अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

 

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |

उसके फूल यहाँ संचित हैं, है [...]

कैदी और कोकिला

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008

कवि: माखनलाल चतुर्वेदी
—————-
 
क्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो !
क्या लाती हो?
सन्देशा किसका है?
कोकिल बोलो तो !
 
ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट भर खाना,
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना !
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश [...]


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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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