हिन्दी साहित्य

जगनिक का आल्हाखण्ड

Posted on: अगस्त 20, 2008

कालिंजर के राजा परमार के आश्रय मे जगनिक नाम के एक कवि थे, जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों -आल्हा और ऊदल(उदयसिंह)- के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया। जगनिक के काव्य का कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषाभाषी प्रांतों के गांव-गांव में सुनाई देते हैं। ये गीत ‘आल्हा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाये जाते हैं। गावों में जाकर देखिये तो मेघगर्जन के बीच किसी अल्हैत के ढोल के गंभीर घोष के साथ यह हुंकार सुनाई देगी-
 
बारह बरिस लै कूकर जीऐं ,औ तेरह लौ जिऐं सियार,
बरिस अठारह छत्री जिऐं ,आगे जीवन को धिक्कार।
 
इस प्रकार साहित्यिक रूप में न रहने पर भी जनता के कंठ में जगनिक के संगीत की वीरदर्पपूर्ण प्रतिध्वनि अनेक बल खाती हुई अब तक चली आ रही है। इस दीर्घ कालयात्रा में उसका बहुत कुछ कलेवर बदल गया है। देश और काल के अनुसार भाषा में ही परिवर्तन नहीं हुआ है,वस्तु में भी बहुत अधिक परिवर्तन होता आया है। बहुत से नये अस्त्रों ,(जैसे बंदूक,किरिच), देशों और जातियों (जैसे फिरंगी) के नाम सम्मिलित होते गये हैं और बराबर हो जाते हैं। यदि यह साहित्यिक प्रबंध पद्धति पर लिखा गया होता तो कहीं न कहीं राजकीय पुस्तकालयों में इसकी कोई प्रति रक्षित मिलती। पर यह गाने के लिये ही रचा गया था । इसमें पंडितों और विद्वानों के हाथ इसकी रक्षा के लिये नहीं बढ़े, जनता ही के बीच इसकी गूंज बनी रही-पर यह गूंज मात्र है मूल शब्द नहीं।
 
आल्हा का प्रचार यों तो सारे उत्तर भारत में है पर बैसवाड़ा इसका केन्द्र माना जाता है,वहाँ इसे गाने वाले बहुत अधिक मिलते हैं। बुंदेलखंड में -विशेषत: महोबा के आसपास भी इसका चलन बहुत है। आल्हा गाने वाले लोग अल्हैत कहलाते हैं।
 
इन गीतों के समुच्चय को सर्वसाधारण ‘आल्हाखंड’ कहते हैं जिससे अनुमान मिलता है कि आल्हा संबंधी ये वीरगीत जगनिक के रचे उस काव्य के एक खंड के अंतर्गत थे जो चंदेलों की वीरता के वर्णन में लिखा गया होगा। आल्हा और उदल परमार के सामंत थे और बनाफर शाखा के छत्रिय थे।इन गीतों का एक संग्रह ‘आल्हाखंड’ के नाम से छपा है। फर्रुखाबाद के तत्कालीन कलेक्टर मि.चार्ल्स इलियट ने पहले पहल इनगीतों का संग्रह करके छपवाया था।
 
आल्हाखंड में तमाम लड़ाइयों का जिक्र है। शुरूआत मांडौ़ की लड़ाई से है। माडौ़ के राजा करिंगा ने आल्हा-उदल के पिता जच्छराज-बच्छराज को मरवा के उनकी खोपड़ियां कोल्हू में पिरवा दी थीं। उदल को जब यह बात पता चली तब उन्होंने अपने पिताकी मौत का बदला लिया तब उनकी उमर मात्र १२ वर्ष थी।
 
आल्हाखंड में युद्ध में लड़ते हुये मर जाने को लगभग हर लड़ाई में महिमामंडित किया गया है:-
 
मुर्चन-मुर्चन नचै बेंदुला,उदल कहैं पुकारि-पुकारि,
भागि न जैयो कोऊ मोहरा ते यारों रखियो धर्म हमार।
खटिया परिके जौ मरि जैहौ,बुढ़िहै सात साख को नाम
रन मा मरिके जौ मरि जैहौ,होइहै जुगन-जुगन लौं नाम।
 
अपने बैरी से बदला लेना सबसे अहम बात माना गया है:-
 
‘जिनके बैरी सम्मुख बैठे उनके जीवन को धिक्कार।’
 
इसी का अनुसरण करते हुये तमाम किस्से उत्तर भारत के बीहड़ इलाकों में हुये जिनमें लोगों ने आल्हा गाते हुये नरसंहार किये या अपने दुश्मनों को मौत के घाट उतारा।
 
पुत्र का महत्व पता चला है जब कहा जाता है:-
 
जिनके लड़िका समरथ हुइगे उनका कौन पड़ी परवाह!
 
स्वामी तथा मित्र के लिये कुर्बानी दे देना सहज गुण बताये गये हैं:-
 
जहां पसीना गिरै तुम्हारा तंह दै देऊं रक्त की धार।
 
आज्ञाकारिता तथा बड़े भाई का सम्मान करना का कई जगह बखान गया है।इक बार मेले में आल्हा के पुत्र इंदल का अपहरण हो जाता है। इंदल मेले में उदल के साथ गये थे। आल्हा ने गुस्से में उदल की बहुत पिटाई की:-
 
हरे बांस आल्हा मंगवाये औ उदल को मारन लाग।
 
ऊदल चुपचाप मार खाते -बिना प्रतिरोध के। तब आल्हा की पत्नी ने आल्हा को रोकते हुये कहा:-
 
हम तुम रहिबे जौ दुनिया में इंदल फेरि मिलैंगे आय
कोख को भाई तुम मारत हौ ऐसी तुम्हहिं मुनासिब नाय।
 
यद्यपि आल्हा में वीरता तथा अन्य तमाम बातों का अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन है तथापि मौखिक परम्परा के महाकाव्य आल्हाखण्ड का वैशिष्ट्य बुन्देली का अपना है। महोवा १२वीं शती तक कला केन्द्र तो रहा है जिसकी चर्चा इस प्रबन्ध काव्य में है। इसकी प्रामाणिकता के लिए न तो अन्तःसाक्ष्य ही उपादेय और न बर्हिसाक्ष्य। इतिहास में परमार्देदेव की कथा कुछ दूसरे ही रुप में है परन्तु आल्हा खण्ड का राजा परमाल एक वैभवशाली राजा है, आल्हा और ऊदल उसके सामन्त है। यह प्रबन्ध काव्य समस्त कमजोरियों के बावजूद बुन्देलों जन सामान्य की नीति और कर्तव्य का पाठ सिखाता है। बुन्देलखण्ड के प्रत्येक गांवों में घनघोर वर्षा के दिन आल्हा जमता है।
 
भरी दुपहरी सरवन गाइये, सोरठ गाइये आधी रात।
आल्हा पवाड़ा वादिन गाइये, जा दिन झड़ी लगे दिन रात।।
 
आल्हा भले ही मौखिक परम्परा से आया है, पर बुन्देली संस्कृति और बोली का प्रथम महाकाव्य है, जगनिक इसके रचयिता है। भाषा काव्य में बुन्देली बोली का उत्तम महाकाव्य स्वीकार किया जाना चाहिए। बुन्देली बोली और उसके साहित्य का समृद्ध इतिहास है और भाषा काव्यकाल में उसकी कोई भी लिखित कृति उपलब्ध नहीं है।
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31 Responses to "जगनिक का आल्हाखण्ड"

APNE BAHUT ACCHHI TARAH SA ALHA AUR UDAL KE JIVAN KE BARE MAI
JANKARI DI HAI. ALHA HAMKO BHI BAHUT HI ADHIK PASAND HAI.

DHNYABAD

A.P. YADAV

it was very helpful for me thnx…………

aaha ke baree main jankari achhi he. main alhha sodh kar raha hoon aapke dwara alhha par sampadit pustk khaan se pirkasit batyen.

बढ़िया । आल्हा के बारे में और अधिक जानना चाहता हूँ ।

jagnik alla net par mil sakti hai .muje vataye .

apne bahut achhi jankari di lekin alha aur rudel ki jivani puri nahi batai. kyonki kuchh logo ka manana hai alha aaz bhi zinda hai, jo maiher devi ki prtidin sabse pahle pooja karte hai , kyonki vo mata ji ke bhakt aur pahklwan the, mataji ne unhe amarta ka vardan diya tha. durgesh

mai alha aur udal ke charitra ko bahut pasand karta hu.
Unke jeewan ki ghatnaye mujhe romanchit ker deti hain, Mai unke vishaya me sab kuch jankari kerna chahta hu

JO JANKARI APSE HAME PRAPT HUI HAI USKE LIYE MAI APKA TAHE DIL SE SHUKRAGUJAR HUN MAI KANNAUJ DISTRICT KA HI RAHNE BALA HUN AUR MUJHE UDAL KI KAHANI BAHUT HI PASAND HAI .

THANK YOU VERY MUCH

ALHA KE BARE ME GOAN ME KUCHH SUNA THA, APSE AUR KUCH
PADHA, ACHHA LAGA, DHANYAWAD
ALHA UDAL KI EH AUR PANKTI…
JAY MAHAMAI MAHOBA KE , AKHRA KE URU BAITAL ,
CHAUSATH JOGNI MOR PURKHA KE,
BHUJWA MA RAHO SAHAY……

ALLA KI STORY KA APNE SAHI BAKHAN KIYA HAI LEKIN YE VERY SORT PART OF ALHAKHAND

RAJESH BAGHEL

V.PO- ROHINA AWAGARH ETAH U.P

MOBI- 919818923418

mujhe abhi tak aalha or udal k baare m jayda nahi pta h m is ka ek kavya kharidna chahta hu kirpiya karke. koi bhi ek sajjan mujhe iske kavya ka naam or lekhak ka naam bta de jis se ki m inke baare m adhik jankri hasil kar saku. mujhe inke baare m padhna bahut achcha lagta h.
Plese mujhe ye jankari meri is email par de singhsahab1988@gmail.com

during continuous rains people especially villagers of north india resort to singingig and enzoying these songs of jagnic. these are well researched by now.

shabad shaktiyo ki jankari de

really alha udal was agreat ”ladaiya” punishing to accused alha udal completed his duty

i like alha.udal malkhan.lakhan.indal dehwa.etc.

may rudal ji awr aallh ji ki khani shune m
e bahut acha lgta hai

mai bahut paresan hua hindi litratur ki material dhundhne me dhanyawad

achha laga .puri jankari dene ka kasth kare

alah udal kya bari caste ke the agar the to plz cont me

veer shiromani pooran bari ji ki koi jankaro prapt ho sakti hai kya mujhe

veer shiromani roopan bari ji ki history prapt ho sakti hai kya

alha udal kavya ke sare praman hai par koi batana nahi chahta kyoki is se bade logo ki burai hoti hai isliye nahi batate hai

Ye moze help kee hai

allha aur udal ye Dono Banaphal vansh ke hai aur allha aaj bhi amar hai….jinke devi hai maa sharda…….

UDAL KA KIRDAR SABSE BADIYA HAI…
BADIYA JAANKARI DI AAPNEY…

Very latest news
thanks for aalha udal story
i am very very…………………………….very thank you!

good information please write the full poem of alha udal
pandit jagdish porasad

You can purchase these books on any city in Bundelkhand on footpath Book sellers .I used to have a complete set of Jagniks work in my childhood.But even to day I can sing it even compose it as per requirements.

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