Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 12, 2008
माखनलाल चतुर्वेदी
‘सुजन, ये कौन खड़े है ?’ बन्धु ! नाम ही है इनका बेनाम ।
‘कौन करते है ये काम ?’ काम ही है बस इनका काम ।
‘बहन-भाई’, हां कल ही सुना, अहिंसा आत्मिक बल का नाम,
‘पिता! सुनते है श्री विश्वेश, जननि?’ श्री प्रकॄति सुकॄति सुखधाम।
हिलोरें लेता भीषण सिन्धु पोत पर नाविक है तैयार
घूमती जाती है [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”
हम नदी के द्वीप है।
हम नही कहते कि हमको छोड कर स्रोतस्विन बह जाय।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियां, अन्तरीप, उभार, सैकत-कूल,
सब गोलाइयां उसकी गढी है !
मां है वह । है, इसी से हम बने है।
किन्तु हम है द्वीप । हम धारा नहीं है ।
स्थिर समर्पण है हमारा । हम सदा [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008
रचनाकार: सुभद्रा कुमारी चौहान
आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग
है वीर देश में किन्तु कन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008
झाँसी की रानी की समाधि पर
सुभद्रा कुमारी चौहान
इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||
यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 11, 2008
कवि: माखनलाल चतुर्वेदी
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क्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो !
क्या लाती हो?
सन्देशा किसका है?
कोकिल बोलो तो !
ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट भर खाना,
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना !
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 16, 2008
मैथिलीशरण गुप्त
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -
क्षात्र-धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
हुआ न [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 16, 2008
सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
आया मौसम खिला फ़ारस का गुलाब,
बाग पर उसका जमा था रोबोदाब
वहीं गंदे पर उगा देता हुआ बुत्ता
उठाकर सर शिखर से अकडकर बोला कुकुरमुत्ता
अबे, सुन बे गुलाब
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट;
बहुतों को तूने बनाया है गुलाम,
माली कर रक्खा, खिलाया जाडा घाम;
हाथ जिसके तू [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 16, 2008
चिंता-सर्ग
कामायनी : जयशंकर प्रसाद
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह |
नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन |
दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय समान,
नीरवता-सी शिला-चरण से टकराता [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 30, 2007
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 30, 2007
रामधारी सिंह “दिनकर”
प्रथम सर्ग
वह कौन रोता है वहाँ-इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं, कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता, शोनित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?
और तब सम्मान [...]
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