हिन्दी साहित्य

Archive for the ‘आधुनिक काल-कविताएं’ Category

सरोज-स्मृति

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 30, 2007

 

सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”1ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;
तनये, ली कर दृक्पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!
गीते मेरी, तज रूप-नाम
वर लिया अमर शाश्वत विरामपूरे कर शुचितर सपर्याय
जीवन के अष्टादशाध्याय,
चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण
कह – “पित:, पूर्ण आलोक-वरण
करती हूँ मैं, यह नहीं मरण,
‘सरोज’ का ज्योति:शरण – तरण!”
अशब्द अधरों का सुना भाष,
मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश
मैंने [...]

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असाध्य वीणा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 30, 2007

 

अज्ञेय

आ गये प्रियंवद ! केशकम्बली ! गुफा-गेह !
राजा ने आसन दिया। कहा :
“कृतकृत्य हुआ मैं तात ! पधारे आप।
भरोसा है अब मुझ को
साध आज मेरे जीवन की पूरी होगी !”

लघु संकेत समझ राजा का
गण दौड़े ! लाये असाध्य वीणा,
साधक के आगे रख उसको, हट गये।
सभा की उत्सुक आँखें
एक बार वीणा को लख, टिक गयीं
प्रियंवद के चेहरे पर।

“यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रान्तर से
–घने [...]

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ब्रह्मराक्षस

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007

 गजानन माधव मुक्तिबोध

शहर के उस ओर खँडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठण्डे अँधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की…
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में…
समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।बावड़ी को घेर
डालें खूब उलझी हैं,
खड़े हैं मौन औदुम्बर।
व शाखों पर
लटकते घुग्घुओं के घोंसले परित्यक्त भूरे गोल।
विद्युत शत पुण्यों का आभास
जंगली [...]

लज्जा-कामायनी

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007

  जयशंकर प्रसाद

“कोमल किसलय के अंचल में
नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी,
गोधूली के धूमिल पट में
दीपक के स्वर में दिपती-सी।
मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में
मन का उन्माद निखरता ज्यों-
सुरभित लहरों की छाया में
बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों-
वैसी ही माया में लिपटी
अधरों पर उँगली धरे हुए,
माधव के सरस कुतूहल का
आँखों में पानी भरे हुए।
नीरव निशीथ में लतिका-सी
तुम कौन आ [...]

श्रद्धा – कामायनी

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007

जयशंकर प्रसाद
कौन हो तुम? संसृति-जलनिधितीर-तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक?
मधुर विश्रांत और एकांत-जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन और चंचल मन का आलस्य”
सुना यह मनु ने मधु गुंजार मधुकरी का-सा जब सानंद,
किये मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद,
एक झटका-सा लगा सहर्ष, [...]

राम की शक्ति पूजा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007

सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

रवि हुआ अस्त
ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,
शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,
प्रतिपल-परिवर्तित-व्यूह-भेद कौशल समूह
राक्षस – विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध-कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि-राजीवनयन- हतलक्ष्य-बाण,
लोहितलोचन – रावण मदमोचन – महीयान,
राघव-लाघव- रावण-वारण – गत- युग्म-प्रहर,
उद्धत-लंकापति मर्दित-कपि-दल-बल- विस्तर,
अनिमेष-राम-विश्वजिद्दिव्य-शर-भंग-भाव,
विद्धांग-बद्ध- कोदण्डमुष्टि खर-रुधिर-स्राव,
रावण-प्रहार-दुर्वार-विकल वानर- दल-बल,
मुर्छित-सुग्रीवांगद-भीषण-गवाक्ष-गय-नल,
वारित-सौमित्र – भल्लपति-अगणित-मल्ल-रोध,
गर्ज्जित-प्रलयाब्धि-क्षुब्ध हनुमत्-केवल प्रबोध,
उद्गीरित-वह्नि-भीम-पर्वत-कपि चतुःप्रहर,
जानकी-भीरू-उर – आशा भर-रावण सम्वर।
लौटे युग-दल-राक्षस [...]


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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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