Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: July 31, 2008
:: चितावणी ::
कबीर नौबति आपनी, दिन दस लेहु बजाइ।
ए पुर पद्दन ए गली, बहुरि न देखहु आइ।।९९।।
कबीर कहते हैं कि हे जीवों ! चेत जाओ। जिस वैभव में तुम लिप्त हो, वह कुछ दिनों का परचम है अर्थात् क्षणिक है। तुम्हारी मृत्यु अवश्यंभावी है। फिर इस पुर, नगर और गली को न देख सकोगे।
जिनके नौबति [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: July 31, 2008
:: गुरुदेव ::
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सतगुरु सवाँ न को सगा, सोधी सईं न दाति ।
हरिजी सवाँ न को हितू, हरिजन सईं न जाति ।।१।।
सद्गुरु के समान कोई सगा नहीं है। शुद्धि के समान कोई दान नहीं है। इस शुद्धि के समान दूसरा कोई दान नहीं हो सकता। हरि के समान कोई हितकारी नहीं है, हरि सेवक के समान [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: July 31, 2008
हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है। गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व `कबीर’ के सिवा अन्य किसी का नहीं है। कबीर की उत्पत्ति के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगद्गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008
कबीर साहित्य में जहाँ दर्शन, अध्यात्म, ज्ञान, वैराग्य की गूढता मिलती है, वहीं उनके साहित्य में समाज सुधार का शंखनाद भी है। वह दार्शनिक होने के साथ-साथ, समाज सुधारक भी थे। समाज सुधार अर्थात् जन जीवन का उत्थान कबीर के जीवन की साधना थी। सुधार का समन्वित स्वरूप कि उन्होंने भक्ति के आडम्बरों पर चोट [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: November 2, 2007
सत गहे, सतगुरु को चीन्हे, सतनाम विश्वासा,
कहै कबीर साधन हितकारी, हम साधन के दासा।
वे कहते, प्रत्येक मानव को गुरु भक्ति और साधन का अभ्यास करना चाहिए। इस सत्य की प्राप्ति से सब अवरोध समाप्त हो जाते हैं।
जो सुख राम भजन में, वह सुख नहीं अमीरी में।
सुख का आधार धन- संपत्ति नहीं है। इसके अभाव में [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: November 2, 2007
पंद्रहवीं शताब्दी में संतकाल के प्रारंभ में सारा भारतीय वातावरण क्षुब्ध था। बहुत से पंडित जन इस क्षोभ का कारण खोजो में व्यस्त थे और अपने- अपने ढ़ंग पर समाज और धर्म को संभालने का प्रयत्न कर रहे थे। इस अराजकता का कारण इस्लाम जैसे एक सुसंगठित संप्रदाय का आगमन था। इसके बाद देश के [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: November 2, 2007
जिन दिनों कबीर दास का आविर्भाव हुआ था, उन दिनों हिंदूओं में पौराणिक मत ही प्रबल था। देश में नाना प्रकार की साधनाएँ प्रचलित थी। कोई वेद का दिवाना था, तो कोई उदासी और कई तो ऐसे थे, जो दीन बनाए फिर रहा था, तो कोई दान- पुण्य में लीन था। कई व्यक्ति ऐसे थे, [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: November 2, 2007
सांप्रदायिक तनाव की स्थिति आज देश में सर्वाधिक चिंतनीय है। देश में संप्रदाय के नाम पर लोगों को आपस में खूब लड़ाया जाता है। राजनैतिक दल एवं राजनेता स्वयं जातिवाद या सांप्रदायवाद के प्रतीक बन गए हैं। आज हर वर्ष देश के कुछ भागों में सांप्रदायिक दंगे का भड़क जाना और सैकड़ों बेगुनाहों का खून [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: November 2, 2007
कबीर ने अपने जीवन के निजी अनुभवों से जो कुछ सीखा था, उसके आलोक में तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, सांप्रदायिक तथा राष्ट्रीय व्यवस्था को देखकर हतप्रभ थे। वे इन स्थितियों में अमूल परिवर्तन लाना चाहते थे, लेकिन उनकी बातों को सुनने और मानने को कोई उत्सुक नहीं था। उनको सारा संसार बौराया हुआ लग रहा था।जाति [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: November 2, 2007
संत कबीर के आविभाव के साथ ही संतकाल का सुत्रपात हो गया था। कबीर दास के शिष्य चरण दास, गरीब दास, मलूक दास आदि कवियों ने अध्यात्म की धारा बहाकर हिंदू- मस्लिम संबंधी विविध प्रसंग लेकर संपूर्ण देश में अराजकता के युग के स्वर्ण युग की संज्ञा दिलाई। इन सभी संतों के काव्य का मूल [...]
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