हिन्दी साहित्य

Archive for the ‘लेख’ Category

हिन्दी उपन्यासों में नारी

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

आज नारी विमर्श के स्तर पर नारी चेतना से संपन्न हिंदी उपन्यास लिखे जा रहे हैं, जिसमें नारी की आत्मा, स्व और अहं ध्वनित है। वास्तव में चेतना का अर्थ विचारों, अनुभूतियों, संकल्पों की आनुषांगिक दशा, स्थिति अथवा क्षमता से है। उसका संबंध नारी की स्वयं की पहचान या किसी भी स्तर पर विषयगत अनुभवों [...]

महिला लेखन

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

महिला लेखन का शताब्दी वर्ष का १९०६-०७ से २००६-२००७

यह सच है कि स्त्री का आत्म संघर्ष रचना के संघर्ष पर विरत होता है। महिला साहित्यकार के लिए बाहरी संदर्भों में पहले उसका आंतरिक समय होता है। जहाँ वह जीती है और सांस लेती है। दूसरी ओर होती है समय की चुनौतियां। उनके जीवन व सृजन [...]

हिन्दी साहित्य : ‘स्व’ तथा ‘पर’

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

मैं अपनी बात दो कवितांशों से आरम्भ करना चाहती हूँ-

‘यह दीप अकेला / स्नेहभरा / है मदमाता/पर इसे पंक्ति को दे दो’

तथा-

राजा को / रथ हाथी घोडे / आम जनों को / पद यात्राएँ।

ऐसा / सुख सुविधाओं का / है बँटवारा /

उनको मीठा पानी / बाकी जल खारा /

उनको / जीने की हर गारंटी / [...]

हिन्दी साहित्य पर बाह्य प्रभाव

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का एक पक्ष अपनी भाषा की आजादी का भी था। पूरे भारत की राष्ट्रभाषा-सम्फ भाषा-हिन्दी या हिन्दुस्तानी हो यही मुख्य मुद्दा था। लम्बी जद्दोजेहद के बाद नागरी लिपि में लिखी हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बनी। वह कैसी हो इस सवाल पर संविधान म कहा गया है कि वह सभी प्रादेशिक भाषाओं से [...]

साहित्य में राष्ट्रीयता का उद्भव

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में जब वैश्वीकरण प्रारंभ हुआ तब उसके लाभ और प्रभाव को देखकर यह शंका मन में पैदा होने लगी कि एक दिन राष्ट्र और राष्ट्रवाद अप्रासंगिक हो जाएँगे। अपने देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और हर नागरिक के जीवन स्तर में वृद्धि हो यह सबसे बडा आकर्षण का मुद्दा था। [...]

समकालीन हिन्दी कहानिया:स्त्री जीवन

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

यह रेखांकित करने लायक बात है कि अब स्त्री अपने जीवन के असंख्य क्लेशों का इतिहास अपनी ही जुबानी बताने को तत्पर है। एक जद के साथ उसे यह घोषित करना पड रहा है कि इतनी बडी दुनिया में उसकी अनुभूतियों को कोई स्थान नहीं मिल पा रहा है। महादेवी वर्मा ने लिखा है -

विस्तृत [...]

गद्य आलोचना : अतीत और वर्तमान

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

डॉ. गुलाबराय का कथन है – ?आलोचना का मुख्य उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वाद कर पाठकों को उस प्रकार के आस्वाद में सहायता देना तथा उसकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गति निर्धारित करने में योग देना है।? इस तरह आलोचना साहित्य की व्याख्या करती है, उसके गुण-दोष बताती [...]

आधुनिक काव्य-आलोचना की अवधारणा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

काव्य-आलोचना की अवधारणा, औचित्य, यथार्थ और प्रक्रिया तथा इसके प्रतिमानों को लेकर यहाँ प्रस्तुत विचार लेखक के अनुभवपरक निष्कर्षों तथा व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित हैं तथा जहाँ तक सम्भव हो सका है, विविध ग्रंथों तथा विद्वानों के उद्धरणों से बचने का प्रयास किया गया है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि अपने समय का अधिकृतियों [...]

समकालीन कथा साहित्य

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

किसी भी समाज की इयत्ता उसकी पहिचान के उन स्वरूपों को समेटे रहती है जो वहाँ के लोगों के सोचने-विचारने और इनके अनुसार आचरण करने में सन्निहित रहती है। इसमें उसका समग्र जीवन दर्शन ही नहीं बल्कि सोचे गए तत्त्वों के आधार पर एक-एक क्षण तक को निरंतर जीते चले जाने की आचारशीलता भी सन्निहित [...]

हिन्दी साहित्य में नारी के बदलते रूप

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 17, 2008

 

हिन्दी साहित्य में नारी के बदलते रूप

“Virtuous wife, where those dust meet both pleasure more refined and sweet.

The fairest garden in her looks. And in her mind the wirest look.

“Women, in your daughter you have the music of the fountain of life”.

‘ Ravindra’

घृतकुम्भसमा नारी तप्तागारसमः पुमान। नारी घी का कुआँ है और पुरुष जलता हुआ [...]


प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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