Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
किसी शब्द को किस प्रकार वर्णों से अभिव्यक्त किया जाए, यह समस्या काफी समय तक हिंदी में नहीं समझी जाती थी; जबकि अंग्रेजी व उर्दू में इसका महत्त्व था। अंग्रेजी व उर्दू में अर्धशताब्दी पहले भी स्पेलिंग/हिज्जों की रटाई की जाती थी और आज भी। हिंदी भाषा का पहला और बड़ा गुण ध्वन्यात्मकता है। हिंदी [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
मानक भाषा और उसके प्रकार
‘मानक’शब्द अपने वर्तमान अर्थ में संस्कृत में नहीं आया है। हाँ, उसमें शब्द लगभग इस अर्थ में अवश्य है। ‘मान’ का संस्कृत में अर्थ ‘माप’, ‘मापदण्ड’, ‘मानदण्ड’ या पैमाना आदि है। ‘मान’ में स्वार्थे प्रत्यय ‘क’ के योग से अंग्रेजी ‘स्टैंडर्ड’ के प्रतिशब्द के रुप में ‘मानक’ शब्द बनाया गया है, [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
भाषा की क्षमता के क्या निकष (कसौटियां) होने चाहिये?
(१) भाषा सीखने की सरलता और अक्षरों का वैज्ञानिक वर्गीकरण
(२) सीखने, सिखाने की असंदिग्ध सुस्पष्ट विधि
(३) अक्षर और शब्द उच्चरण की स्पष्टता और सनातनता
यह तीन गुण हिन्दी को देवनागरी लिपि के कारण परम्परा से प्राप्त हैं।
इसके अतिरिक्त, नीचे लिखे हुए गुण, हिन्दी को, वह संस्कृतजन्य होने के [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग फारस और अरब से माना जाता है। वास्तव में संस्कृत शब्द ‘सिंधु’ से ‘हिन्दी’ शब्द उद्भूत हुआ है। यह सिंध नदी के आसपास की भूमि का नाम है। ईरानी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है, इसलिए ‘सिंधु’ का रूप ‘हिंदू’ हो गया तथा ‘हिंद’ शब्द पूरे भारत के लिए प्रयुक्त [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
इस लेख में जहाँ एक ओर काव्यभाषा का विकासात्मक और प्रतीतिपरक मूल्यात्मक विवेचन किया गया है वहां दूसरी ओर संवेदना या जनता की चित्तवृत्ति में होने वाले परिवर्तनों के कारण खड़ीबोली के काव्यभाषा के रूप में विकास का भी अत्यंत व्यवस्थित वर्णन है। इस दृष्टि से यह लेख दोहरी अर्थवत्ता रखता है। संवेदना के बदलाव [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है। ऋग्वेद से पहले भी सम्भव है कोई भाषा विद्यमान रही हो परन्तु आज तक उसका कोई लिखित रूप नहीं प्राप्त हो पाया। इससे यह अनुमान होता है कि सम्भवतः आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा ऋग्वेद की ही भाषा, वैदिक संस्कृत ही थी। विद्वानों का मत है कि ऋग्वेद [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
सम्पूर्ण देश में हिन्दी के उत्तरोत्तर विकास-विस्तार में विश्वविद्यालयों की महती भूमिका है। जिस प्रकार सम्पूर्ण उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में होता है, उसी प्रकार देश का बहुआयामी निर्माण देश की शिक्षा संस्थानों में होता है। स्वतन्त्रता के उपरांत विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभागों की स्थापना जोर-शोर से शुरू हुई। मद्रास विश्वविद्यालय में हिन्दी [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
हिन्दी, भाषाई विविधता का एक ऐसा स्वरूप जिसने वर्तमान में अपनी व्यापकता में कितनी ही बोलियों और भाषाओं को सँजोया है। जिस तरह हमारी सभ्यता ने हजारों सावन और हजारों पतझड़ देखें हैं, ठीक उसी तरह हिन्दी भी उस शिशु के समान है, जिसने अपनी माता के गर्भ में ही हर तरह के मौसम देखने [...]
Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: September 2, 2008
अपभ्रंश, आधुनिक भाषाओं के उदय से पहले उत्तर भारत में बोलचाल और साहित्य रचना की सबसे जीवंत और प्रमुख भाषा (समय लगभग छठी से १२वीं शताब्दी)। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से अपभ्रंश भारतीय आर्यभाषा के मध्यकाल की अंतिम अवस्था है जो प्राकृत और आधुनिक भाषाओं के बीच की स्थिति है।
अपभ्रंश के कवियों ने अपनी भाषा को केवल [...]
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