हिन्दी साहित्य

Archive for the ‘1 आदिकाल’ Category

आदिकाल की उपलब्धियाँ

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 21, 2008

कार्य प्रगति पर है

आदिकाल की विशेषताएं

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 21, 2008

कार्य प्रगति पर है……..

दामोदर पंडित – उक्ति व्यक्ति प्रकरण

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 21, 2008

बारहवीं सदी में दामोदर पंडित ने “उक्ति व्यक्ति प्रकरण’ की रचना की। इसमें पुरानी अवधी तथा शौरसेनी – ब्रज – के अनेक शब्दों का उल्लेख प्राप्त है। बारहवीं शती के प्रारंभ में बनारस के दामोदर पंडित द्वारा रचित बोलचाल की संस्कृत भाषा सिखाने वाला ग्रंथ “उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण” से हिन्दी की प्राचीन कोशली या अवधी बोली के [...]

ढोला मारू रा दूहा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 20, 2008

ढोला मारू रा दूहा  ग्यारहवीं शताब्दी मे रचित एक लोक-भाषा काव्य है। मूलतः दोहो में रचित इस लोक काव्य को सत्रहवीं शताब्दी मे कुशलराय वाचक ने कुछ चौपाईयां जोड़कर विस्तार दिया। इसमे राजकुमार ढोला और राजकुमारी मारू की प्रेमकथा का वर्णन है।

 

ढोला-मारू का कथानक

 

इस प्रेम वार्ता का कथानक, सूत्र में इतना ही है कि पूंगल [...]

जगनिक का आल्हाखण्ड

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 20, 2008

कालिंजर के राजा परमार के आश्रय मे जगनिक नाम के एक कवि थे, जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों -आल्हा और ऊदल(उदयसिंह)- के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो [...]

सिद्ध साहित्य

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 20, 2008

सिद्ध साहित्य के इतिहास में चौरासी सिद्धों का उल्लेख मिलता है। सिद्धों ने बौद्ध धर्म के वज्रयान तत्व का प्रचार करने के लिये, जो साहित्य जनभाषा मे लिखा, वह हिन्दी के सिद्ध साहित्य की सीमा मे आता है

 

सिद्ध सरहपा (सरहपाद, सरोजवज्र, राहुल भ्रद्र) से सिद्ध सम्प्रदाय की शुरुआत मानी जाती है। यह पहले सिद्ध योगी [...]

नाथ साहित्य

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 20, 2008

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। कहा यह भी जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं।

सिद्धों [...]

आदिकाल के नामकरण की समस्या

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 20, 2008

साहित्य के इतिहास के प्रथम काल का नामकरण विद्वानों ने इस प्रकार किया है-

1. डॉ.ग्रियर्सन – चारणकाल,

2. मिश्रबंधुओं – प्रारंभिककाल,

3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल- वीरगाथा काल,

4. राहुल संकृत्यायन – सिद्ध सामंत युग,

5. महावीर प्रसाद द्विवेदी – बीजवपन काल,

6. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र – वीरकाल,

7. हजारी प्रसाद द्विवेदी – आदिकाल,

8. रामकुमार वर्मा – चारण काल

 

* आचार्य रामचंद्र शुक्ल [...]

रासो काव्य : वीरगाथायें

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: August 20, 2008

परमाल रासो – इस ग्रन्थ की मूल प्रति कहीं नहीं मिलती। इसके रचयिता के बारे में भी विवाद है। पर इसका रचयिता “”महोबा खण्ड” को सं. १९७६ वि. में डॉ. श्यामसुन्दर दास ने “”परमाल रासो” के नाम से संपादित किया था। डॉ. माता प्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सोलहवीं शती विक्रमी की हो सकती [...]

जैन साहित्य की रास परक रचनायें

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 26, 2008

 

भारत के पश्चिमी भाग मे जैन साधुओ ने अपने मत का प्रचार हिन्दी कविता के माध्यम से किया । इन्होंने “रास” को एक प्रभाव्शाली रचनाशैली का रूप दिया । जैन तीर्थंकरो के जीवन चरित तथा वैष्णव अवतारों की कथायें जैन-आदर्शो के आवरण मे ‘रास‘ नाम से पद्यबद्ध की गयी । अतः जैन साहित्य का सबसे [...]


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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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