हिन्दी साहित्य

Archive for the ‘4 आधुनिक काल’ Category

लछमा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: February 5, 2009

धुल-धुलकर धूमिल हो जाने वाले पुराने काले लहँगे को एक विचित्र प्रकार से खोंसे, फटी मटमैली ओढ़नी को कई फेंट देकर कमर मे लपेटे और दाहिने हाथ मे एक बड़ा सा हँसिया सँभाले लछमा, नीचे पड़ी घास पत्तियों के ढेर पर कूदकर खिलखिला उठी। कुछ पहाड़ी और कुछ हिन्दी की खिचड़ी में उसने कहा- ‘ [...]

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वापसी – उषा प्रियंवदा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 26, 2009

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई – दो बक्स¸ डोलची¸ बालटी ;   ”यह डिब्बा कैसा है¸ गनेशी ” उन्होंने पूछा। 
गनेशी बिस्तर बांधता हुआ¸ कुछ गर्व¸ कुछ दु:ख¸कुछ लज्जासे बोला¸” घरवाली ने साथ को कुछ बेसन के लड्‌डू रख दिये हैं। 
कहा¸ बाबूजी को पसन्द थे¸ अब कहां हम गरीब लोग आपकी [...]

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आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007

 हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर [...]

आधुनिक काव्य-साहित्य का इतिहास

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007

हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल 1850 से आरम्भ होता है । हिंदी साहित्य के इस युग में भारतीय-राष्ट्रीयता के बीज अंकुरित होने लगे थे। इसी युग मे हिन्दी पद्य के साथ साथ गद्य का भी विकास हुआ। स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और जीता गया। छापेखाने का आविष्कार हुआ, आवागमन के साधन आम आदमी के जीवन का [...]

आधुनिक काल

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 29, 2007

 

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल तत्कालीन राजनैतिक गतिविधियों से प्रभावित हुआ। इसको हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ युग माना जा सकता है, जिसमें पद्य के साथ-साथ  समालोचना, कहानी, नाटक, उपन्यास, रेखाचित्र व पत्रकारिता आदि गद्य की विभिन्न विधाओं का भी विकास हुआ।

सं 1800 वि. के उपरांत भारत में अनेक यूरोपीय जातियां व्यापार के लिए आईं। उनके [...]


प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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