हिन्दी साहित्य

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भारत की राष्ट्रीय संचेतना

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: February 2, 2009

भारतीय वाङ्गमय में ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है। यजुर्वेद के ‘राष्ट्र में देहि’ और अथर्वेद के ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ में राष्ट्र शब्द समाज के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। मानव की सहज सामुदायिक भावना ने समूह को जन्म दिया, जो कालान्तर में राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। राष्ट्र [...]

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हिन्दी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: February 2, 2009

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को काव्य के विषय के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे वही दूसरी [...]

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साहित्यकार जैनेन्द्र

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: February 1, 2009

साहित्य की प्रचलित धाराओं के बरअक्स अपनी एक जुदा राह बनाने वाले जैनेन्द्र को गांधी दर्शन के प्रवक्ता, लेखक के रूप में याद किया जाता है। गांधीवादी चिंतक, मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य के सूत्रधार, साहित्यकार जैनेन्द्र को उनके विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक साहित्य के लिये भी जाना जाता है। हिन्दू रहस्यवाद, जैन दर्शन से प्रभावित जैनेन्द्र [...]

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पंडित बाल कृष्ण भट्ट

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 27, 2009

“साहित्य जनसमूह के हॄदय का विकास है” यह शीर्षक है उस निबन्ध का; जिसे हिन्दी गद्य साहित्य के निर्माताओं मे से एक पंडित बालकृष्ण भट्ट ने लिखा है। यह निबन्ध हमारे पाठ्यक्रम से संबन्धित है। यहां संक्षिप्त में पंडित बालकृष्ण भट्ट का जीवन परिचय दिया जा रहा हैं।
पंडित बाल कृष्ण भट्ट भारतेन्दु युग के हिन्दी [...]

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प्रयोजनमूलक हिन्दी

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 26, 2009

प्रयोजनमूलक हिन्दी के संदर्र्भ में ‘प्रयोजन’ शब्द के साथ ‘मूलक’ उपसर्ग लगने से प्रयोजनमूलक पद बना है। प्रयोजन से तात्पर्य है उद्देश्य अथवा प्रयुक्ति। ‘मूलक’ से तात्पर्य है आधारित। अत: प्रयोजनमूलक भाषा से तात्पर्य हुआ किसी विशिष्ट उद्देश्य के अनुसार प्रयुक्त भाषा। इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी से तात्पर्य हिन्दी का वह प्रयुक्तिपरक विशिष्ट रूप या [...]

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“उसने कहा था” कहानी और पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 26, 2009

पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने “उसने कहा था” कहानी की रचना कर न केवल हिंदी कहानी अपितु विश्व कथा-साहित्य को समॄद्ध किया हैं । वास्तविकता यह है कि उनकी प्रसिद्धि “”उसने कहा था”” के द्वारा ही हुई। “उसने कहा था” प्रेम, शौर्य और बलिदान की अद्भुत प्रेम-कथा है। प्रथम विश्व युद्ध के समय में लिखी [...]

The Republic Day of India 2009

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 25, 2009

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

 
 
 
भारत को गण्तंत्रता आज से 59 साल पूर्व 26 जनवरी 1950 को हासिल हुइ थी। उस दिन भारत एक गणतंत्र्राज्य बना था। तब से सारे देश में 26 जनवरी गण्तंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। गणतंत्र दिवस पर पूरे देश भर में छुट्टी मनाई जाती है। गणतंत्र दिवस पर भारत [...]

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 25, 2009

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

भारत को गण्तंत्रता आज से 59 साल पूर्व 26 जनवरी 1950 को हासिल हुइ थी। उस दिन भारत एक गणतंत्र्राज्य बना था। तब से सारे देश में 26 जनवरी गण्तंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। गणतंत्र दिवस पर पूरे देश भर में छुट्टी मनाई जाती है। गणतंत्र दिवस पर भारत [...]

कालिदास

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: January 8, 2009

कालिदास (375-445 ई.)
साहित्य में कालजयी रचनाएं गहन-गंभीर मानवीय अनुभवों से जन्म लेती हैं। शताब्दियों के अंतराल के बाद, नितान्त भिन्न परिस्थितियों और अवस्थाओं में भी उनमें हमें अपने अनुभवों की गूंज सुनाई देती है। श्रेष्ठ कालजयी रचनाओं में देश-काल की सीमाओं से परे गुण होते हैं। कालिदास भारत की आत्मा, सौन्दर्य और प्रतिभा के महान् [...]

भक्ति आंदोलन : रामचँद्र शुक्ल

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

आचार्य पं.  रामचन्द शुक्ल हिन्दी समीक्षा के प्रथम व्यवस्थित आचार्य हैं। उन्होंने अपनी समीक्षा के जितने भी प्रतिमान गढ़े हैं, वे भारतीय काव्य-शास्त्र, पाश्चात्य काव्य-शास्त्र आदि से सम्पॄक्त होने के साथ-साथ भारतीय भक्ति-शास्त्र से सबसे ज्यादा अनुप्राणित हैं । सह्रदयता का मानदंड, या लोकमंगल का मानदंड, भक्ति साहित्य से (विशेषत: मर्यादावादी राम-भक्ति से और उसके [...]


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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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