हिन्दी साहित्य

Archive for the ‘Uncategorized’ Category

भक्ति:उद्‌भव एवं विकास

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

गुजरात के स्वामी माधवाचार्य (संवत्‌ 1254-1333) ने द्वैतवादी वैष्णव सम्प्रदाय (ब्राह्म सम्प्रदाय) चलाया जिसकी ओर भी लोगों का झुकाव हुआ। इसके साथ ही द्वैताद्वैतवाद (सनकादि सम्प्रदाय) के संस्थापक निम्बार्काचार्य ने विष्णु के दूसरे अवतार कृष्ण की प्रतिष्ठा विष्णु के स्थान पर की तथा लक्ष्मी के स्थान पर राधा को रख कर देश के पूर्व भाग [...]

वल्लभाचार्य

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधारस्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता श्रीवल्लभाचार्य जी का प्रादुर्भाव संवत् 1535, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मणभट्ट जी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से काशी के समीप हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार कहा गया है। वे वेदशास्त्र में पारंगत थे। श्रीरूद्र संप्रदाय के श्रीविल्वमंगलाचार्य जी [...]

मुक्तिबोध का भक्ति आंदोलन

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

सुप्रसिद्ध हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध गंभीर चिंतक भी थे। भक्ति आंदोलन पर उनका यह आलेख कई दृष्टियों से आज भी प्रासंगिक है। पहली दफा यह ‘नयी दिशा` पत्रिका में मई १९५५ में प्रकाशित हुआ था।                               -संपादक

 

मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि कबीर और निर्गुण पन्थ के अन्य कवि तथा दक्षिण [...]

राम नाम का मरम है आना

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकांड में भगवान शिव के मुख से कुछ ‘अनमोल’ वचन कहलवाए हैं। किंतु ये वचन इतने कटु और अशोभनीय हैं कि सहज विश्वास नहीं होता कि ये रामचरितमानस जैसे महान और पवित्र काव्य के ही अंश हैं। अपशब्दों का ऐसा कवित्वमय प्रयोग विरले ही संसार के किसी अन्य महान साहित्य [...]

भक्ति आन्दोलन की पुनर्व्याख्या

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

हिन्दू आध्यात्मिकता की पुनर्व्याख्या की सबसे स्पष्ट मिसाल मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विवेचन के सन्दर्भ में मिलती है। इस विवेचन में भक्ति आन्दोलन की सराहना और सख्त आलोचना दोनों ही एक साथ उपस्थित है। बालकृष्ण भट्ट के लिए भक्तिकाल की उपयोगिता अनुपयोगिता का प्रश्न मुस्लिम चुनौती का सामना करने से सीधे सीधे जुड़ गया था। [...]

सगुण का अर्थ

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

परम सत्ता जहां प्रकृति के बन्धन से मुक्त है, उसे निर्गुण और जहां बन्धनयुक्त है, उसे सगुण कहते हैं। सगुण में भी दो विभाग हैं। एक है उनका रूप और दूसरा अ-रूप। मनुष्य में जो बुद्धि, बोधि तथा मैं-पन आदि हैं, वे सब अ-रूप हैं। इन्हें देखा नहीं जा सकता। लेकिन मनुष्य को तो देखा [...]

भ्रमरगीत:गोपी-उद्धव

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

ऊधौ मन ना भये दस-बीस

एक हुतो सो गयौ स्याम संग, कौ आराधे ईस॥1॥

 

 

 

भ्रमर गीत में सूरदास ने उन पदों को समाहित किया है जिनमें मथुरा से कृष्ण द्वारा उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाता है और उद्धव जो हैं योग और ब्रह्म के ज्ञाता हैं उनका प्रेम से दूर दूर का कोई सरोकार नहीं [...]

निर्गुण काव्यधारा

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

हिन्दी साहित्य में संत कवि जिस विचारधारा को लेकर अपनी वाणी की रचना में प्रवृत्त हुये हैं उनका मूल सिद्ध तथा नाथ साहित्य में है। कई संत कवियों ने अपनी भाव-विभोर वाणी द्वारा आध्यात्मिक साधना तथा भक्ति अभ्युत्थान का कार्य किया।

संतों ने मानव जीवन पर जोर देते हुये उसको सार्थक करने हेतु सत्संग, नामस्मरण, भजन-कीर्तन, [...]

भक्ति आंदोलन

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

उत्तरी भारत में चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक फैली भक्ति की लहर समाज के वर्ण, जाति, कुल और धर्म की सीमाएं लांघ कर सारे जनमानस की चेतना में परिव्याप्त हो गई थी, जिसने एक जन-आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया था। भक्ति आंदोलन का एक पक्ष था साधन या भक्त के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति [...]

भ्रमरगीतसार परिचय

Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर on: October 6, 2008

हिन्दी काव्यधारा में सगुण भक्ति परंपरा में कृष्णभक्ति शाखा में सूरदासजी सूर्य के समान दैदिप्तमान हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदासजी की भक्ति और श्रीकृष्ण-कीर्तन की तन्मयता के बारे में उचित ही लिखा है – ‘आचार्यों की छाप लगी हुई आठ वीणाएं श्रीकृष्ण की प्रेमलीला का कीर्तन करने उठीं जिनमें सबसे उंची, सुरीली और मधुर [...]


प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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