हिन्दी साहित्य

हिंदी साहित्य के इतिहास के विवादास्पद प्रसंगों में एक हिंदी साहित्य के आदिकाल का भी प्रसंग रहा है। हिंदी साहित्य के इतिहास के अनेक विद्वान लेखकों ने इस संबंध में अपने-अपने मत प्रस्तुत किए हैं। हिंदी साहित्य के विधिवत् इतिहास लेखन से पूर्व ‘भक्तमाल’ ‘चैरासी वैष्णवन की वार्ता’ ‘दो सौ वैष्णव’ की वार्ता’ आदि कतिपय कविवृत संग्रह दो लिखे गए जिनमें काल-विभाजन और नामकरण की खोज की ओर कोई दृष्टि नहीं गई। कुछ विद्वान इसे वीरगाथात्मक रचनाओं की प्रधानता के कारण इसे वीरगाथाकाल कहने के पक्ष में है,लेकिन सिद्धों और नाथों की रचनाएँ इस परिधि में नहीं आ सकती। अतः ‘वीरगाथाकाल’ न कहकर कुछ ने इसे आदिकाल कहा है, तो किसी ने बीजवपन काल।

1. वीरगाथाकालः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रारम्भिक युग के साहित्य को दो कोटियों-अपभ्रंश और देशभाषा में बाँटा है। उनके मत में सिद्धों और योगियों की रचनाओं का जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियों और दशाओं से कोई संबंध नहीं, वे साम्प्रदायिक शिक्षामात्रा हैं। अतः शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आती और जो साहित्य की कोटि में गिनी जा सकी हैं वे कुछ फुटकर रचनाएँ हैं, जिनसे कोई विशेष प्रवृत्ति स्पष्ट नहीं होती है। उनके मत में तत्कालीन साहित्यिक रचनाओं में से केवल ‘खुसरो की पहेलियाँ’, ‘विद्यापति पदावली’ तथा ‘बीसलदेवरासो’ को छोड़कर सभी रचनाएँ वीरगाथात्मक हैं। इस युग में राज्याश्रित कवि अपने आश्रयदाता राजा की वीरता का यशोगान तथा उन्हें युद्धों के लिए उकसाने का काम करते थे। इसलिए उन रचनाओं को राजकीय पुस्तकालयों में रखा जाता था। लेकिन बाद में साहित्य संबंधी जो खोज की गई उसके अनुसार शुक्ल ने जिन रचनाओं के आधार पर इस काल का नाम ‘वीरगाथाकाल’ रखा है, उनमें से अधिकतर बाद की रचनाएँ हैं और कुछ सूचनामात्रा हैं। शुक्ल ने जिन बारह रचनाओं के आधार पर विवेच्य काल का नामकरण वीरगाथाकाल किया है, वे हैं-; 1.विजयपाल रासो-नल्हसिंह, ; 2. हम्मीर रासो-शाडरगधर, ; 3. कीर्तिलता-विद्यापति, ; 4. कीर्तिपताका-विद्यापति, ; 5. खुमानरासो-दलपति विजय, ; 6. बीसलदेवरासो-नरपति नाल्ह, ; 7. पृथ्वीराज रासो-चन्दवरदाई, ; 8. जयचन्द्र प्रकाश-भट्ट केदार, ; 9. जयमंथक-जस-चन्द्रिका-मधुकर, ; 9. परमाल रासो-जगनिक, ; 10. खुसरो की पहेलियाँ और ; 11. विद्यापति की पदावली।

इन रचनाओं में से अधिकतर रचनाएँ अप्रामाणिक एवं सूचना मात्र हैं। खुमानरासो को शुक्ल ने पुराना माना था जबकि मोतीलाल नारिमा ने इसका रचना काल स0 1730 और 1760 के बीच का माना है। इसी प्रकार से ‘बीसलदेव रासो’ भी सन्देहास्पद है। शुक्ल ने भी इस ग्रंथ को कोई महत्त्व नहीं दिया। ‘पृथ्वीराज रासो’ भी प्रामाणिक रचना है। जगनिक काव्य प्रचलित गीतों के रूप में है, अतः इसे भी सूचना मात्र ही समझना चाहिए। ‘हम्मीररासो’ तथा भट्ट के द्वारा कृत ‘जयचन्द्र प्रकाश’ आदि रचनाएँ भी सूचना मात्र है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिन ग्रन्थों के आधार पर इनका नाम ‘वीरगाथाकाल’ रखा गया, वे या तो सूचना मात्र है या बाद में लिखे हुए हैं। दूसरे, शुक्ल ने धार्मिक-साहित्य को उपदेशप्रधान मानकर साहित्य की कोटि में नहीं रखा, किन्तु जिस धार्मिक साहित्य में प्रेरक शक्ति हो और जो रचनाएँ मानव-मन को आन्दोलित करने में समर्थ हो उनका साहित्यिक महत्त्व नकारा नहीं जा सकता। इस दृष्टि से अपभ्रंश की कई रचनाएँ, जो धर्म-भावना से प्रेरित होकर लिखी गई हैं, निस्सन्देह उत्तमकाव्य हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के मत में धार्मिक प्रेरणा या अध्यात्मिक उपदेश को काव्यत्व के लिए बाधक नहीं समझना चाहिए। धार्मिक होने से कोई रचना साहित्यिक कोटि से अलग नहीं की जा सकती। यदि ऐसा मानकर चला जाये तो तुलसी का ‘मानस’ और जायसी का ‘पदमावत’ भी साहित्य की सीमा में प्रविष्ट नहीं हो सकेंगे। ‘भविष्यत कहा’ धार्मिक कथा है, लेकिन इस जैसा सुन्दर काव्य उस युग में अन्यत्रा कहीं नहीं मिलता है। संक्षेप में कहा जायेगा कि सभी धार्मिक पुस्तकों को साहित्य के इतिहास में से नहीं हटाया जा सकता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने तत्कालीन उपलब्ध सामग्री के आधार पर ही नामकरण किया था। नवीनतम खोजों मे जो ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं, उनकी प्रवृत्तियों को भी नामकरण निर्धारित करते समय ध्यान में रखना होगा। मोतीलाल मेनारिया का मत रहा है कि जिन रचनाओं के आधार पर ‘वीरगाथाकाल’ नाम रखा गया है वे किसी विशेष प्रवृत्ति को स्पष्ट नहीं करते, बल्कि चारण-भाट आदि वर्ग विशेष की मनोवृत्ति को ही स्पष्ट करते हैं। यदि इनकी रचनाओं के आधार पर किसी काल का नाम ‘वीरगाथाकाल’ रखा जाए तो राजस्थान में आज भी वीरगाथाकाल ही है, क्योंकि ये लोग आज भी उत्साह से काम कर रहे हैं।

अपभ्रंश कालः चन्द्रधर शर्मा गुलेरी और धीरेन्द्र वर्मा ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल को ‘अपभ्रंश काल’ की संज्ञा दी है। आदिकाल के साहित्य में अपभ्रंश भाषा की प्रधानता स्वीकारते हुए उन्होंने इस काल को ‘अपभ्रंश काल’ कहना अधिक समीचीन समझा है। भाषा के आधार पर साहित्य के इतिहास में काल-विभाजन उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। साहित्य के किसी भी काल का नामकरण उस काल की साहित्यिक प्रवृत्तियों अथवा प्रतिपाद्य विषय के आधार पर उचित समझा जाता है। ‘अपभ्रंश काल’ यह नाम भ्रामक भी सिद्ध होता है क्योंकि इसमें श्रोता या पाठक का ध्यान हिंदी साहित्य की ओर न जाकर अपभ्रंश साहित्य की ओर आकृष्ट होता है। भाषा-शास्त्र की दृष्टि से भी अपभ्रंश और हिंदी दो अलग-अलग भाषाएं है। इसलिए पुरानी हिंदी को अपभ्रंश कहना भी उचित नहीं है।

3. संधिकाल या चारण कालः डा0 रामकुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य के इस प्रारंभिक काल को संधिकाल या ‘चारणकाल’ इन दो नामों से अभिहित किया है। उनकी सम्मति में हिंदी भाषा का विकास अपभ्रंश से हुआ है किन्तु अपभ्रंश से एक पृथक भाषा के रूप में विकसित होने से पूर्व हिंदी भाषा एक ऐसी स्थिति में भी रही होगी जिसमें वह अपभ्रंश के प्रभावों से सर्वथा मुक्त न हो सकी होगी। अपभ्रंश भाषा के अंत और हिंदी भाषा के आरम्भ की इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए डा0 वर्मा ने ‘संधिकाल’ की कल्पना की है। हिंदी साहित्य के जिस काल को आचार्य शुक्ल ने ‘वीरगाथाकाल’ कहा है, वहीं पर डा0 वर्मा उसे ‘चारण काल’ कहना उपयुक्त समझते हैं।

4. सिद्ध सामन्त कालः विषय वस्तु की दृष्टि से महापण्डित राहलु सास्कृत्यायन ने इस यगु के लिए ‘सिद्ध सामन्त यगु ’ नाम प्रेषित किया है। प्रस्तुत नामकरण बहुत दूर तक तत्कालीन साहित्यिक प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है। इस काल के साहित्य में सिद्धों द्वारा लिखा गया धार्मिक साहित्य ही प्रधान है। सामन्तकाल में ‘सामन्त’ शब्द से उस समय की राजनैतिक स्थिति का पता चलता है और अधिकांश चारण-जाति के कवियों की राजस्तुतिपरक रचनाओं के प्रेरणा स्रोत का भी पता चलता है। लेकिन इस ‘सिद्ध सामन्त युग’ में सभी धार्मिक और साम्प्रदायिक तथा लौकिक रचनाएँ नहीं आती। राहुल सांस्कृत्यायन अपभ्रंश और पुरानी हिन्दी को एक ही मानते है, साथ ही इस युग की रचनाओं को मराठी, उडि़या, बंगला आदि भाषाओं की सम्मिलित निधि स्वीकार करते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ‘सिद्ध-सामंत-युग’ नाम भी साहित्य के लिए उपयुक्त नाम नहीं है।

5. बीजवपन कालः आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने इसे बीजवपन काल कहा है। तत्कालीन साहित्य को देखकर यह नाम भी युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि उसमें पूर्ववर्ती सभी काव्य रूढि़यों तथा परम्पराओं का सफलतापूर्वक निर्वाह हुआ है और उसके साथ कुछ नवीन प्रवृत्तियों का जन्म हुआ है।

6. आदिकालः आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसका नाम ‘आदिकाल’ सुझाया है। इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है-‘वस्तुतः हिन्दी का ‘आदिकाल’ शब्द एक प्रकार की भ्रामक धारण की सृष्टि करता है और श्रोता के चित्त में यह भाव पैदा करता है कि यह काल कोई आदिम भावापन्न, परम्परा-विनिर्मुक्त, काव्यरूढि़यों से अछूते साहित्य का काल है, यह बात ठीक नहीं है। यह काल बहुत अधिक परम्परा प्रेमी, रूढि़ग्रस्त और सजग-सचेत कवियों का काल है। वस्तुतः हिंदी साहित्य के आदिकाल के नामकरण का विषय अत्यन्त उलझा हुआ है। जब तक हिंदी की पूर्ण-सीमा निर्धारण नहीं की जाती और जब तक उपलब्ध साहित्य की प्रामाणिकता-अप्रामाणिकता के प्रश्न का समाधान नहीं हो पाता; तब तक किसी निश्चय पर पहुँचना सहज नहीं है। अन्त मे कहा जा सकता है कि किसी निश्चित मत के अभाव में प्रस्तुत काल का नामकरण ‘आदिकाल’ ही अधिक संगत प्रतीत होता है। यह नाम सर्वाधिक प्रचलित हो गया है।

आदिकाल सीमांकनः प्रस्तुत काल के साहित्य की पूर्वापर सीमा को निर्धारित करने का विचार भी कुछ कम विवादास्पद नहीं है। आचार्य शुक्ल ने इस काल का आरम्भ स0 1050 और अन्त संवत् 1375 (993 से 1318 ई0) माना है। महापण्डित राहुल सांस्कृत्यायन ने 8 वीं शती की अपभ्रंशों को पुरानी हिन्दी कह कर अपने सिद्ध सामन्त युग का आरम्भ इसी काल से मान लिया और इस काल की अपर सीमा 13 वीं शती मानी। डा0 ग्रियर्सन ने आदिकाल की अन्तिम सीमा 1400 ई0 तक मानी है। मिश्रबंधुओं ने एतदर्थ 1389 ई0 का वर्ष स्वीकार किया है। डा0 रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ इसे 1343 ई0 तक ले गये हैं। अधिकांश इतिहासकार शुक्ल जी से सहमत हैं। यह ठीक है कि शुक्ल ने विद्यापति को आदिकाल के अन्तर्गत रखा है, पर विद्यापति का रचना काल 1375 ई0 से 1418 ई0 के मध्य माना जाता है और इस दृष्टि से आदिकाल की अन्तिम सीमा 1418 ई0 निर्धारित की जा सकती है, किन्तु इसमें भी नहीं की। भक्तिकाल में जिन प्रवृत्तियों का विकास हुआ, उनकी भूमिका विद्यापति के पूर्व ही पूर्ण हो चुकी थी। अतः विद्यापति को भक्तिकाल में रखकर चैदहवीं शताब्दी के मध्य को आदिकाल की अन्तिम सीमा मानना ही समीचीन होगा। दूसरे शब्दों में, शुक्ल द्वारा निर्धारित 1318 ई0 के बाद भी तीन शताब्दी तक आदिकालीन साहित्य सामग्री का प्रसार माना जा सकता है। अतः हिंदी साहित्य के इतिहास के सीमांकन को हम निम्नलिखित रूपों में बांट सकते हैं-

1. आदिकाल सन् 1000.1400 ई0

2. मध्यकाल सन् 1400.1850 ई0

१ पूर्व मध्यकाल (भक्ति साहित्य) सन् 1400.1650 ई0

२ उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) सन् 1650.1850 ई0

3. आधुनिक काल सन् 1850 से अब तक।

१ हिंदी गद्य (आरम्भ) सन् 1850.1857 ई0

२ भारतेन्दु काल (पुनर्जागरण) सन् 1857.1900 ई0

३ द्विवेदी काल-जागरण-सुधारकाल सन् 1900.1918 ई0

4. छायावाद काल सन् 1918.1936 ई0

5. छायावादोत्तर काल सन् 1936 से अब तक

१ प्रगतिवाद सन् 1936 से 1942 ई0 तक

२ प्रयोगवाद नयी कविता सन् 1942.1953 ई0

३ नवलेखन काल सन् 1953 से अब तक

धुल-धुलकर धूमिल हो जाने वाले पुराने काले लहँगे को एक विचित्र प्रकार से खोंसे, फटी मटमैली ओढ़नी को कई फेंट देकर कमर मे लपेटे और दाहिने हाथ मे एक बड़ा सा हँसिया सँभाले लछमा, नीचे पड़ी घास पत्तियों के ढेर पर कूदकर खिलखिला उठी। कुछ पहाड़ी और कुछ हिन्दी की खिचड़ी में उसने कहा- ‘ हमारे लिये क्या डरते हो! हम क्या तुम्हारे जैसे आदमी है! हम तो है जानवर! देखो हमारे हाथ पाँव देखो हमारे काम! ‘ मुक्त हँसी से भरी पहाड़ी युवती, न जाने क्यो मुझे इतनी भली लगती है।

धूप से झुलसा हुआ मुख ऐसा जान पड़ता है जैसे किसी ने कच्चे सेब को आग की आंच पर पका लिया हो। सूखी-सूखी पलकों में तरल तरल आँखें ऐसी लगती है, मानो नीचे आँसूओं के अथाह जल में तैर रही हों और ऊपर हँसी की धूप से सूख गयी हों।

शीत सहते सहते ओठों पर फ़ैली नीलिमा, सम दांतों की सफेदी से और भी स्पष्ट हो जाती है। रात दिन कठिन पत्थरों पर दौड़ते-दौड़ते पैरो मे और घास काटते-काटते और लकड़ी तोड़ते-तोड़ते हाथों में कठिनता आ गई है, उसे मिट्टी की आर्द्रता ही कुछ कोमल कर देती है।

एक ऊँचे टीले पर लछमा का पहाड़ के पड़े छाले जैसा छोटा घास-फ़ूस का घर है।

बाप की आंखें खराब है, माँ का हाथ टूट गया है, और भतीजी-भतीजे की माता परलोकवासिनी और पिता विरक्त हो चुका है। सारांश यह है कि लछमा के अतिरिक्त और कोई व्यक्ति इतना स्वस्थ नहीं, जो इन प्राणियों की जीविका की चिन्ता कर सके। और इस निर्जन में लछमा कौन सा काम करके इतने व्यक्तियों को जीवित रखे, यह समस्या कभी हल नही हो पाती। अच्छे दिनों की स्मॄति के समान एक भैंस है। लछमा उसके लिये घास और पत्तियां लाती हैं। दूध दूहती, दही जमाती और मट्ठा बिलोती है। गर्मियों मे झोपड़े के आसपास कुछ आलू भी बो लेती है; पर इससे अन्न का अभाव तो दूर नहीं होता! वस्त्र की समस्या तो नही सुलझती!

–लछमा की जीवन-गाथा उसके आँसूओं में भीग-भीगकर अब इतनी भारी हो चुकी है कि कोई अथक कथावाचक और अचल श्रोता भी उसका भार वहन करने को प्रस्तुत नहीं।

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भारतीय वाङ्गमय में ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है। यजुर्वेद के ‘राष्ट्र में देहि’ और अथर्वेद के ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ में राष्ट्र शब्द समाज के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। मानव की सहज सामुदायिक भावना ने समूह को जन्म दिया, जो कालान्तर में राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। राष्ट्र एक समुच्चय है, कुलक है और राष्ट्रीयता एक विशिष्ट-भावना है। जिस जन समुदाय में एकता की एक सहज लहर हो, उसे राष्ट्र कहते हैं। आर्यों की भूमि आर्यावर्त में एक वाह्य एकता के ही नहीं वैचारिक एकता के भी प्रमाण मिलते हैं। आर्यों की परस्पर सहयोग तथा संस्कारित सहानुभूति की भावना राष्ट्रीय संचेतना का प्रतिफल है। साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है। साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है।
आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना अथर्ववेद के सूक्तकार की देन है। वह स्वयं को धरती पुत्र मानता हुआ कहता है—‘‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’’अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। वेदों में राष्ट्रीयता की भावना मातृभूमि-स्तवन और महापुरुषों (देवताओं) के कीर्तिगान के द्वारा प्रकट होती है। उपनिष्दकाल के क्रान्तिकारी अमर संदेशों को भुलाया नहीं जा सकता है। यथा–‘उत्तिष्ठित् जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’
उठो ! जागो ! श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर (राष्ट्रप्रेम के तत्व को) भली-भाँति जानो !

भारतीय मनीषियों का चिन्तन सूक्ष्म और विचार उद्त्त थे। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ मंत्र से अंतर्राष्ट्रीयता का सूत्रपात किया था। विश्व-बंधुत्व की भावना से भारी कार्य जाति विचारों में महान थी। साथ ही शौर्य-पराक्रम और तेज से समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोकर रखने की क्षमता रखती थी।
समाज का राष्ट्र से सीधा संबंध है। किसी भी संस्कारित समाज की विशिष्ट जीवन शैली होती है। जोकि राष्ट्र के रूप में दूसरे समाज को प्रभावित करती है। रूढ़ियों एवं विकृत परम्पराओं से जर्जर समाज राष्ट्र को पतन की ओर ले जाता है। कवि मोह-निद्रा में डूबे राष्ट्र को  जागृति के गान गाकर संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। राष्ट्रीयता जैसी उदात्त प्रवृत्तियों का पोषण और उन्नयन साहित्य द्वारा होता है किन्तु हिन्दी साहित्य के उद्भव काल में केन्द्रीय सत्ता के अभाव ने राष्ट्रीयता की जड़े हिला दीं। ‘राष्ट्र’ छोटे-छोटे राज्यों की सीमाओं में बँध कर रह गया। राष्ट्र का यह संकुचित स्वरूप देश की दुर्भाग्य-निशा की संध्या-बेला थी। इस युग के सम्पूर्ण काव्य में राष्ट्रीय-भावना के स्वस्थ-स्वरूप का नितान्त अभाव है।
आक्रान्ताओं के अत्याचारों से जर्जर भारतीय संस्कृति का सूर्य अस्तप्राय हो चला था। किन्तु भक्त कवियों के अंतःकरण में बहती राष्ट्रीय-चेतना धारा ने सुप्त निराश्रित समाज को नयी दिशा दी।

महात्मा कबीर ने निराकार ब्रह्म की उपासना का उच्च आदर्श प्रस्तुत कर राष्ट्रीय-गरिमा में नव-जीवन का संचार किया। राम और रहीम को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। कबीर अपने युग के महान राष्ट्रवादी थे। राष्ट्र-भक्त तुलसी ने राम के समन्वयवादी, लोकरक्षक और लोकरंजक स्वरूप को स्थापित कर सांस्कृतिक, एकता को शक्ति प्रदान की। सूर ने कर्मयोगी कृष्ण की विविध लीलाओं के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना का संचार किया और समाज को सत्कर्म के लिए प्रेरित किया।

 रीतिकाल के कवियों की चमत्कारिक वृत्ति के कारण काव्य की आत्मालुप्त हो गयी। किन्तु भूषण के राष्ट्रवादी स्वरों ने लोक चेतना को झकझोर दिया। आधुनिक काल में भारतीय हरिश्चन्द्र ने अपनी लेखनी से भारत-दुर्दशा का चित्र खींचकर समाज को जागृति प्रदान किया। छायावादी काव्य में राष्ट्रीय आन्दोलनों की स्थूल अभिव्यक्ति नहीं मिलती है। किन्तु छायावादी कवियों की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक-संचेतना को नकारा नहीं जा सकता है। उसका राष्ट्र-प्रेम भावात्मक एवं व्यापक था। उन्होंने स्वातंत्र्य-भावना को विशिष्ट-कौशल द्वारा व्यंजित किया है। भारत का पतन मानवीय मूल्यों के ह्रास का परिणाम था। गुप्तजी ने अपने काव्य द्वारा मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल दिया। उनकी भारत-भारती ने राष्ट्रीयता की सुप्त भावना में लहरें उठा दीं। माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ रामनरेश त्रिपाठी और सोहनलाल द्विवेदी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, ‘जन’-जागरण तथा अभियान गीतों से राष्ट्र की आत्मा को नयी चेतना प्रदान की।

‘दिनकर’ की वैचारिक भाव-भूमि मानवतावादी है। तथापि समसामयिक परिस्थितियों में उठे विक्षोभ ने उन्हें राष्ट्रीयता वादी कवि के रूप में स्थापित कर दिया। ‘दिनकर’ के काव्य ने भारतीय जन-मानस को नवीन चेतना से सराबोर किया है। राष्ट्रीय-कविता का स्वरूप राष्ट्र के रूप पर ही आधारित होता है। राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है। प्रत्येक भाषा के आधुनिक काव्य में राष्ट्रीय भावना का समावेश है। राष्ट्रीय-भावना राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। सम्पूर्ण मानवता की प्रगति का स्वरूप है। राष्ट्रीय भावना की सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी है। जन-गण के मंगल का स्रोत है। किसी भी राष्ट्र-रूपी वृक्ष की क्षाया में अनेक पंथ-धर्म और भाषाएँ पल्लवति और पुष्पित हो सकते हैं। एक राष्ट्र में अनेक धर्म हो सकते हैं। भाषायें और बोलियाँ अनेक हो सकती हैं किन्तु मूल भावना और सांस्कृतिक विरासत एक ही होगी। राष्ट्रीय भावना से भरे होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम दूसरे राष्ट्रों के समाज को हेय दृष्टि से देखें या दुर्भावना रखें। किसी भी राष्ट्र के समाज की भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिस्थितियां उनकी जीवन-शैली का निर्माण करती हैं। बलात् अपनी सभ्यता-संस्कृति-थोपना हिंसा है और हिंसा वृत्ति कभी मानव का कल्याण नहीं कर सकती है।
भारतीय राष्ट्रीयता कोरी राजनीति कभी नहीं रही। उसने अध्यात्म, दर्शन और साहित्य के माध्यम से भी अपना नव-जागरण अभियान चलाया है। अंग्रेजों ने भारतीय समाज में जो विष-बेलें बोई थीं। वह आज भी पनप कर लह लहा रही हैं। स्वतंत्रता के इतने लंबें अंतराल में भी हम, उन बेलों का समूल नष्ट नहीं कर सके क्योंकि हमने अपना बहुमूल्य समय राष्ट्रीय चिन्तन के बजाय राजनैतिक चिन्तन में बिताया है और राष्ट्रीय चेतना को अंधेरे में घेरकर व्यक्तिगत हित साधन को सर्वोपरि समझा है। स्वाधीनता तो मिली किन्तु राष्ट्रीय चेतना सो गई। स्वाधीनता आकाश से नहीं उतरी वरन् राष्ट्रीय-चेतना से सराबोर शहीदों की शहादत का परिणाम है।

आज जब भारतीय वैज्ञानिक शोध को नई दिशा देने में समर्थ हैं। हमारी सामर्थ्य के अनेकों आयाम विकसित हो रहे हैं। संसाधनों की कोई कमी नहीं है। भारत-भूमि में स्वर्ग उतर सकता है किन्तु राजनीति के कुशल-दिग्भ्रान्त पहरुए राष्ट्र की जनता को वर्गों-धर्मों में बाँटकर क्षेत्रवाद की धुँध फैला रहे हैं। इसीलिए आवश्यक हो गया है कि लोक-चेतना में नया-संचार हो। प्रत्येक राष्ट्रीवादी नागरिक अस्मिता की रक्षा के लिए आगे बढ़कर आत्म-समीक्षा करे। आज राष्ट्र वाह्य और आंतरिक शत्रुओं के चक्रव्यूह में फंस कर अपना संगठित स्वरूप खोने लगा है। विघटनकारी तत्व अपना सिर उठा रहे हैं। साम्प्रदायिकता का विषैला प्रभाव राष्ट्रीय शिराओं में बहती जीव-धारा को विषाक्त कर रहा है। ऐसी विनाशक और विस्फोटक स्थिति में देश को दिशा देना साहित्य का गुरुत्वर दायित्व है। राष्ट्रीय काव्य-धारा ऐसी काव्य-प्रवृत्ति है जिसमें राष्ट्र-जन को तेजस्वी और पराक्रमी बनाने की सामर्थ्य निहित है।

वस्तुतः राष्ट्रीय संचेतना को झकझोरने वाला काव्यजन मानस को आन्दोलित कर नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का साहस भरता है। उन मूल्यों को महत्त्व देने के लिए प्रेरित करता है जिनमें हिंस, घृणा को नकारकर एक उन्मुक्त वातावरण उत्पन्न किया जा सके और जिसमें सभी धर्म निश्चिन्त होकर सांस ले सकें। यदि प्रत्येक राष्ट्र-धर्मी काव्य अपने समाज के अन्दर व्यापक उदात्त-भाव और रचनात्मक संस्कार उत्पन्न कर सकें, तो निश्चय ही ऐसा काव्य मानव के कल्याण के लिए होगा। अर्थात् राष्ट्रीय-काव्य मूलतः मानवता वादी काव्य ही है।

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भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को काव्य के विषय के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे वही दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को भी हवा दे रहे थे। कवि व साहित्यकार अपनी उर्वर प्रज्ञा भूमि के कारण युगीन समस्याओं के प्रति अधिक सावधान व संवेदनशील रहता है। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के आरम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक भिन्न-भिन्न चरणों में राष्ट्रीय भावनाओ से ओत-प्रोत कविताओं की कोख में स्वातन्त्र्य चेतना का विकास होता रहा। ‘विप्लव गान’ शीर्षक कविता में कवि की क्रान्तिकामना मूर्तिमान हो उठी है।

”कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये
एक  हिलोर  इधर  से आये,  एक  हिलोर  उधर को जाये
नाश ! नाश! हाँ महानाश! ! ! की प्रलयंकारी आंख खुल जाये।
-नवीन

भारतेन्दु युग का साहित्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हिन्दुस्तान की संगठित राष्ट्रभावना का प्रथम आह्वाहन था। यही से राष्ट्रीयता का जयनाद शुरू हुआ। जिसके फलस्वरूप द्विवेदी युग ने अपने प्रौढ़तम स्वरूप के साथ नवीन आयामों और दिशाओं की ओर प्रस्थान किया। भारतेन्दु की ‘भारत दुर्दशा’ प्रेमघन की आनन्द अरूणोदय, देश दशा, राधाकृष्ण दास की भारत बारहमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई। द्विवेदी युग में कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अर्न्तगत बलिदान गान में ‘प्राणों का बलिदान देष की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी। ‘बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लाग लगा दे’ के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतीकार मैथिलीषरण गुप्त ने स्वदेश-संगीत व सर्वश्रेष्ठ सशक्त रचना भारत-भारती में ऋषिभूमि भारतवर्ष के अतीत के गौरवगान के साथ में वर्तमान पर क्षोभ प्रकट किया है। छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुन्दर और प्रेरक देशप्रेम सम्बन्धी मधुरगीतों व कविताओं की सृष्टि की । निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी’, ‘भारती जय विजय करे’, ‘जागो फिर एकबार’, ‘शिवाजी का पत्र’, प्रसाद की ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया ‘हिमाद्रि तुंगश्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ आदि कविताओं में कवियों ने हृदय के स्तर पर अपनी प्रशस्त राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति की है।

स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित हिन्दी कवियों की श्रृखला में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, राधाकृष्ण दास, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, रामनरेश त्रिपाठी, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, सियाराम शरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, श्याम नारायण पाण्डेय, अज्ञेय इत्यादि कवियों ने परम्परागत राष्ट्रीय सांस्कृतिक भित्ति पर ओजपूर्ण स्वरों मे राष्ट्रीयता का संधान किया।

हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा के समस्त कवियों ने अपने काव्य में देशप्रेम व स्वतन्त्रता की उत्कट भावना की अभिव्यक्ति दी है। राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी की हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता, युगचरण, समर्पण आदि के काव्यकृतियों के माध्यम से उनकी राष्ट्रीय भावछाया से अवगत हुआ जा सकता है। चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतन्त्र कर जनतन्त्रात्मक पद्धति की स्थापना का आहवाहन किया। गुप्त जी के बाद स्वातन्त्र्य श्रृखला की अगली कड़ी के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी का अविस्मृत नाम न केवल राष्ट्रीय गौरव की याद दिलाता है अपितु संघर्ष की प्रबल प्रेरणा भी देता है। जेल की हथकड़ी आभूषण बन उनके जीवन को अलंकृत करती है।

‘क्या? देख न सकती जंजीरो का गहना
हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना’
(कैदी और कोकिला)

पिस्तौल, गीता, आनन्दमठ की जिन्दगी ने इनके भीतर प्रचण्ड विद्रोह को जन्म दे वैष्णवी प्रकृति विद्रोह और स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव ने इनके जीवन को एक राष्ट्रीय सांचे में ढाल दिया। 1912 में उनकी जीवन यात्रा ने बेड़ियों की दुर्गम राह पकड़ ली।

‘उनके हृदय में चाह है अपने हृदय में आह है
कुछ भी करें तो शेष बस यह बेड़ियों की राह है।’

1921 में कर्मवीर के सफल सम्पादक चतुर्वेदी जी को जब देशद्रोह के आरोप में जेल हुई तब कानपुर से निकलने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ और महात्मा गाँधी के ‘यंग इण्डिया’ ने उसका कड़ा विरोध किया। ‘मुझे तोड़ लेना वन माली देना तुम उस पथ पर फेंक मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पर जाते वीर अनेक ”पुष्प की अभिलाषा” शीर्षक कविता की यह चिरजीवी पंक्तियाँ उस भारतीय आत्मा की पहचान कराती है जिन्होनें स्वतन्त्रता के दुर्गम पथ में यातनाओं से कभी हार नही मानी।

” जो कष्टों से घबराऊँ तो मुझमें कायर में भेद कहाँ
बदले में रक्त बहाऊँ तो मुझमें डायर में भेंद कहाँ!”

अनुभूति की तीव्रता की सच्चाई, सत्य, अहिंसा जैसे प्रेरक मूल्यों के प्रति कवि की आस्था, दृढ़ संकल्प, अदम्य उत्साह और उत्कट् अभिलाषा को लेकर चलने वाला यह भारत माँ का सच्चा सपूत साहित्यशास्त्र और कर्मयंत्र से दासता की बेड़ियों को काट डालने का दृढ़व्रत धारण करके जेल के सींखचों के भीतर तीर्थराज का आनन्द उठाते है।

”हो जाने दे गर्क नशे में, मत पड़ने दे फर्क नशे में, के उत्साह व आवेश के साथ स्वतन्त्रता संग्राम श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में आबद्ध एक श्लाघ्य नाम बालकृष्ण शर्मा नवीन का है वह स्वतन्त्रता आन्दोलन के मात्र व्याख्यता ही नहीं अपितु भुक्तभोगी भी रहे। 1920 में गाँधी जी के आह्वाहन पर वह कालेज छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़े। फलत: दासता की श्रृंखलाओं के विरोध संघर्ष में इन्हे 10 बार जेल जाना पड़ा। जेल यात्राओं का इतना लम्बा सिलसिला शायद ही किसी कवि के जीवन से जुड़ा हो। उन दिनों जेल ही कवि का घर हुआ करता था।

‘हम संक्रान्ति काल के प्राणी बदा नही सुख भोग
घर उजाड़ कर जेल बसाने का हमको है रोग’
नवीन


अपनी प्रथम काव्य संग्रह ‘कुंकुम’ की जाने पर प्राणार्पण, आत्मोत्सर्ग तथा प्रलयंकर कविता संग्रह में क्रान्ति गीतों की ओजस्विता व प्रखरता है।

‘यहाँ बनी हथकड़िया राखी, साखी है संसार
यहाँ कई बहनों के भैया, बैठे है मनमार।’

राष्ट्रीय काव्यधारा को विकसित करने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान का ‘त्रिधारा’ और ‘मुकुल’ की ‘राखी’ ‘झासी की रानी’ ‘वीरों का कैसा हो बसंत’ आदि कविताओं में तीखे भावों की पूर्ण भावना मुखरित है। उन्होने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी। आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। ‘जलियावाला बाग में बसंत’ कविता में इस नृशंस हत्याकाण्ड पर कवयित्री के करूण क्रन्दन से उसकी मूक वेदना मूर्तिमान हो उठी है।

”आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना
यह है शोक स्थान, यहाँ मत शोर मचाना
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खा कर
कलियाँ उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर।”

दिनकर की हुँकार, रेणुका, विपथगा में कवि ने साम्राज्यवादी सभ्यता और ब्रिटिश राज्य के प्रति अपनी प्रखर ध्वंसात्मक दृष्टि का परिचय देते हुए क्रान्ति के स्वरों का आह्वाहन किया है। पराधीनता के प्रति प्रबल विद्रोह के साथ इसमें पौरूष अपनी भीषणता और भंयकरता के साथ गरजा है। कुरूक्षेत्र महाकाब्य पूर्णरूपेण राष्ट्रीय है।

‘उठो- उठो कुरीतियों की राह तुम रोक दो
बढो-बढो कि आग में गुलामियों को झोंक दो ‘।
दिनकर

स्वतन्त्रता की प्रथम शर्त कुर्बानी व समर्पण को काव्य का विषय बना क्रान्ति व ध्वंस के स्वर से मुखरित दिनकर की कवितायें नौंजवानों के शरीर में उत्साह भर उष्ण रक्त का संचार करती है ।

जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त, सीमापति! तूने की पुकार
पददलित उसे करना पीछे, पहले ले मेरा सीस उतार।

सोहनलाल द्विवेदी की भैरवी राणाप्रताप के प्रति, आजादी के फूलों पर जय-जय, तैयार रहो, बढ़े चलो बढ़े चलो, विप्लव गीत कवितायें, पूजा गीत संग्रह की मातृपूजा, युग की पुकार, देश के जागरण गान कवितायें तथा वासवदत्ता, कुणाल, युगधारा काब्य संग्रहों में स्वतन्त्रता के आह्वान व देशप्रेम साधना के बीच आशा और निराशा के जो स्वर फूटे है उन सबके तल में प्रेम की अविरल का स्रोत बहाता कवि वन्दनी माँ को नहीं भूल सका है ।

‘कब तक क्रूर प्रहार सहोगे ?
कब तक अत्याचार सहोगे ?
कब तक हाहाकार सहोगे ?
उठो राष्ट्र के हे अभिमानी
सावधान मेरे सेनानी।’

सियाराम शरण गुप्त की बापू कविता में गाँधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करूणा, विश्व-बधुत्व, शान्ति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है। राजस्थानी छटा लिये श्यामनारायण पाण्डेय की कविताओं में कहीं उद्बोधन और क्रान्ति का स्वर तथा कहीं सत्य, अहिंसा जैसे अचूक अस्त्रों का सफल संधान हुआ है। इनकी ‘हल्दीघाटी’ व ‘जौहर’ काव्यों में हिन्दू राष्ट्रीयता का जयघोष है । देशप्रेम के पुण्य क्षेत्र पर प्राण न्यौछावर के लिए प्रेरित करने वाले रामनरेश त्रिपाठी की कविता कौमुदी, मानसी, पथिक, स्वप्न आदि काव्य संग्रह देश के उद्धार के लिए आत्मोत्सर्ग की भावना उत्पन्न करते है । देश की स्वतन्त्रता को लक्ष्य करके श्री गया प्रसाद शुक्ल सनेही ने कर्मयोग कविता में भारतवासियों को जागृत कर साम्राज्यवादी नीति को आमूल से नष्ट करने का तीव्र आह्वाहन किया । श्रीधर पाठक ने भारतगीत में साम्राज्यवादियों के चंगुल में फंसे भारत की मुक्ति का प्रयास किया। प्रयोगवादी कवि अज्ञेय भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए कई बार जेल गये। जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द की कवितायें भी इस दिशा मे सक्रिय हैं।

इस प्रकार हम देखते है कि स्वतन्त्रता आंदोलन के उत्तरोत्तर विकास के साथ हिन्दी कविता और कवियों के राष्ट्रीय रिश्ते मजबूत हुए। राजनीतिक घटनाक्रम में कवियों के तेवर बदलते रहे और कविता की धार भी तेज होती गई। आंदोलन के प्रारम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दी काव्य संघर्षो से जूझता रहा। स्वाधीनता के पश्चात राष्ट्रीय कविता के इतिहास का एक नया युग प्रारम्भ हुआ। नये निर्माण के स्वर और भविष्य के प्रति मंगलमय कल्पना उनके काव्य का विषय बन गया। फिर भी स्वतन्त्रता यज्ञ में उनके इस अवदान और बलिदान को विस्मृत नही किया जा सकता । भारत का ऐतिहासिक क्षितिज उनकी कीर्ति किरण से सदा आलोकित रहेगा और उनकी कविताए राष्ट्रीय आस्मिता की धरोहर बनकर नयी पीढ़ी को अपने गौरव गीत के ओजस्वी स्वर सुनाती रहेगीं।

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साहित्य की प्रचलित धाराओं के बरअक्स अपनी एक जुदा राह बनाने वाले जैनेन्द्र को गांधी दर्शन के प्रवक्ता, लेखक के रूप में याद किया जाता है। गांधीवादी चिंतक, मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य के सूत्रधार, साहित्यकार जैनेन्द्र को उनके विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक साहित्य के लिये भी जाना जाता है। हिन्दू रहस्यवाद, जैन दर्शन से प्रभावित जैनेन्द्र का सम्पूर्ण साहित्य सृजन प्रक्रिया की विलक्षणता और सुनियोजित संश्लिष्टता का अनन्यतम उदाहरण है। जैनेन्द्र के बारे में अज्ञेय ने कहा था आज के हिन्दी के आख्यानकारों और विशेषतय: कहानीकारों में सबसे अधिक टेक्निकल जैनेन्द्र हैं। टेक्नीक उनकी प्रत्येक कहानी की और सभी उपन्यासों की आधारशिला है। स्त्री विमर्श के प्रबल हिमायती जैनेन्द्र ने कहानी के अंदर प्रेम को संभव किया।

1905 में अलीगढ के कौडियागंज गांव में जन्मे आनंदी लाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे आगे चलकर साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार बनेंगे। चार माह की उम्र में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। मां और मामा भगवानदीन ने उन्हें पाला पोसा। बहरहाल बचपन अभावग्रस्त, संघर्षमय बीता और युवावस्था तक आते-आते नौकरी जिंदगी का अहम् मकसद बन गयी। दोस्त के बुलावे पर नौकरी के लिए कलकत्ता पहुँचे मगर वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी।

जैनेन्द्र लेखक कैसे बने इसकी दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। गर्दिश के दिनों में अपने दोस्त के यहाँ बैठे थे। दोस्त की बीवी को लिखने का शौक था और वह यदाकदा पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती थीं। जैनेन्द्र से लिखने पर बहस हुई तो जैनेन्द्र लिखने की ठान बैठे। खेल कहानी लिखी और विशाल भारत में छपने के लिए भेज दीं। कहानी छपी और चार रुपये मनीआर्डर बतौर पारिश्रमिक जैनेन्द्र के पास आए।

कहानी अनुभव और शिल्प में जैनेन्द्र इस बाबत लिखते हैं मनीआर्डर क्या आया मेरे आगे से तिलिस्म खुल गया इन 23-24 वर्षो को दुनिया में बिताकर मैं क्या तनिक उस द्वार की टोह पा सका था कि लिखने से रुपये का आवागमन होता है। रुपया मेरे आगे फरिश्ते की मांनिद था। जिसका नाम किस लोक का है। अवश्य वह इस लोक का तो नहीं है। वह अतिथि की भांति मेरे खेल के परिणामस्वरूप मेरे घर आ पधारा तो यकायक मैं अभिभूत हो रहा। मेरी माँ को भी कम विस्मय नहीं हुआ, तो बेटे के निकम्मेपन की भी कुछ कीमत है। माँ से ज्यादा बेटा अपने निकम्मेपन को जानता था। पर विशाल भारत के मनीआर्डर से मालूम हुआ कि आदमी अपने को नहीं जान सकता।

कहानी खेल से उनके लेखन का सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो 24 साल की उम्र तक उपन्यास परख आ गया। परख को साहित्य अकादमी का पांच सौ रुपये का पुरस्कार मिला। बहरहाल इसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। जिंदगी की यही घटनाएं वजहें थीं कि जैनेन्द्र नियतिवादी, ईश्वरवादी हो गए। ईश्वर पर उनका भरोसा बढता चला गया।

असहयोग आन्दोलन के दौरान पढाई छोड आन्दोलन में हिस्सा लेने वाले जैनेन्द्र की जिंदगी और साहित्य पर महात्मा गांधी का जबर्दस्त प्रभाव था। जैनेन्द्र खुद कहते हैं गांधी जीवन मेरे समक्ष सत्य शोध का उत्तम उदाहरण रहा अध्यात्म, दर्शन, नैतिकता और अपने साहित्य द्वारा सत्य की खोज जैनेन्द्र के विपुल साहित्य के विचार बिन्दु हैं। उनका पूरा रचना संसार इन्हीं विचार बिन्दुओं के इर्द-गिर्द घूमता है। उपन्यास- सुनीता, त्यागपत्र, सुखदा, विवर्त, कल्याणी कहानियां नीलम देश की राजकन्या, जान्ह्वी, अविज्ञान, पत्नी, ध्रुवतारा आदि रचनाएं इन्हीं विचारों में रची पगी नजर आती हैं। नतीजतन उन पर कई तरह के इल्जाम भी लगे जिनमें प्रमुख हैं- जैनेन्द्र का दर्शन समाज व जीवन से पलायन का दर्शन, उनके उपन्यास प्रहेलिका मात्र हैं, वे यथार्थ से भागते हैं, जैनेन्द्र दार्शनिकता का पोज भर भरते हैं और नारी पात्रों को अनैतिकता में धकेलने के लिए हमेशा आध्यात्मिकता का सहारा लेते हैं आदि। अपने समय में साहित्यिक जगत की कटु आलोचनाओं को सहने वाले जैनेन्द्र ने कई बार तंग आ सक्रिय साहित्य से संन्यास भी लिया। उपन्यास कल्याणी के बाद तो उन्होंने 14 साल एकांतवास लिया। मगर उनकी वापसी हर बार उतने ही जोरदार तरीके से हुई। उस दौर की चर्चित पत्रिकाएं धर्मयुग तथा साप्ताहिक हिन्दुस्तान ने उनके उपन्यास- सुखदा और विवर्त को किश्तवार छापा। वहीं माया ने दस कहानियों के लिए उन्हें 2 हजार अग्रिम राशि देकर अनुबंधित किया जो उस समय लेखकों को मिलने वाली अधिकतम मानदेय 60 रुपये से कहीं ज्यादा था। जितना जैनेन्द्र से जुडा यह किस्सा जतलाता है कि वे कामयाबी के किस शिखर पर विराजमान थे।

ख्याति और विवादों का चोली-दामन का साथ है। जैनेन्द्र भी इन सबसे अछूते नहीं रहे। उपन्यास, कहानी के अलावा आपके वैचारिक निबंध, आलेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते थे जो खासे चर्चित थे। धर्मयुग में छपने वाले कॉलम इतस्तत: में वे नियमित लिखते थे। अपने कॉलम के जरिए उन्होंने सामाजिक मान्यताओं तथा रूढ परम्पराओं पर लगातार प्रहार किए। चुनांचे धर्मयुग के संपादक ने उनके कॉलम को एक बार बीच में से ही स्थगित करते हुए कहा था इतस्तत: के कुछ खण्डों में आपने इतने विद्रोही (सामाजिक मान्यताओं) भावों का प्रतिपादन कर दिया है कि मान्यताओं के प्रति श्रद्धालु व्यक्तियों के मन में धर्मयुग के लिए तीव्र घृणा जाग गई है। धर्मयुग के पाठकों में से अधिकांश व्यक्ति परम्परा प्रेमी हैं उन्हें आपकी सर्वथा मौलिक परम्पराएं अच्छी नहीं लगीं। अत: यही है कि इतस्तत: को कुछ काल के लिए स्थगित कर दें। इन कॉलमों में जो भी जाएगा हमारे पारम्परिक पाठकों की संशयात्मक दृष्टि का शिकार हो  जाएगा।

समय और हम, साहित्य का श्रेय और प्रेय, प्रश्न और प्रश्न, सोच-विचार, राष्ट्र और राज्य, काम पे्रम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी आदि निबंध जैनेन्द्र की दार्शनिकता और नितांत मौलिक पदस्थापनाओं के कारण जाने पहचाने गए। अपने अधिकांश साहित्य का लेखन डिक्टेशन से कराने वाले जैनेन्द्र के लेखन पर महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का अत्यधिक प्रभाव था। जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण उनके उपन्यास सुनीता और सुखदा हैं जो टैगोर के उपन्यास- घरे बाहरे से प्रेरित हैं। परख और सुनीता को पढ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द ने एक बार कहा था जैनेन्द्र में गोर्की और शरतचन्द्र चटर्जी दोनों एक साथ देखने को मिलते हैं। बहरहाल बांग्ला साहित्यकार शरतचन्द्र के उपन्यासों की ही तरह उनके तकरीबन सभी उपन्यासों में स्त्री चरित्र पूरी दृढता के साथ नजर आते हैं। त्याग-पत्र की मृणाल और सुनीता का केन्द्रीय चरित्र सुनीता उपन्यास में अपनी मौजूदगी का अहसास प्रखरता से कराता है। हालांकि उनके स्त्री चरित्र आत्मा की ट्रेजेडी और आत्म प्रपीढन से ग्रसित नजर आते हैं।

दरअसल जैनेन्द्र ने मानवीय दुनिया की अपेक्षा आत्मिक दुनिया पर ज्यादा लिखा वे यथार्थ की जगह विचारों की बात ज्यादा करते हैं जो उन्हें रूसी साहित्यकार दास्तोएव्सकी के नजदीक रखता है। एक दौर वह था जब उपन्यास, कहानियों में यशपाल और जैनेन्द्र द्वारा नारी के बोल्ड चित्रण से उनकी साडी-जम्पर उतारवाद का प्रवर्तक भी कहा गया तथा उन पर साहित्य में नैतिकता की गिरावट और अश्लीलता के आरोप मढे गए, अपने ऊपर लगे इन आरोपों का जवाब जैनेन्द्र ने अपने निबंधों के जरिए ही दिया। अश्लीलता यदि है तो वस्तु में नहीं व्यक्ति में है, असल में नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग वे ही हैं जो सुविधा प्राप्त हैं, वे अपने भोग और आराम को बचाये रखने के लिए नीतिवादिता से अपनी रक्षा में चारों ओर घेरा डालते हैं अंग्रेजी में एक शब्द है कंजरवेटिव नैतिकता की दुहाई ऐसे ही लोग देते हैं।

बहरहाल अश्लीलता- नैतिकता के यह सवाल आज भी उसी तरह विद्यमान हैं जिनके जवाब हमें जैनेन्द्र की नुक्ता-ए-नजर में देखने को मिलते हैं। अपनी जिंदगी में उच्च आदर्शो को ओढने वाले सादगी-करूणा की प्रतिमूर्ति जैनेन्द्र सही मायने में सत्यान्वेषी थे जिनके लिए अपनी आत्मा की आवाज सर्वोपरि थी और जिसका पालन उन्होंने मरते दम तक किया।

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“साहित्य जनसमूह के हॄदय का विकास है” यह शीर्षक है उस निबन्ध का; जिसे हिन्दी गद्य साहित्य के निर्माताओं मे से एक पंडित बालकृष्ण भट्ट ने लिखा है। यह निबन्ध हमारे पाठ्यक्रम से संबन्धित है। यहां संक्षिप्त में पंडित बालकृष्ण भट्ट का जीवन परिचय दिया जा रहा हैं।

पंडित बाल कृष्ण भट्ट भारतेन्दु युग के हिन्दी के सफल पत्रकार, नाटककार और प्रतिष्ठित निबंधकार थे। भारतेंदु काल के निबंध-लेखकों में भट्ट जी का सर्वोच्च स्थान है। उन्हें आज की गद्य प्रधान कविता का जनक माना जा सकता है। हिन्दी गद्य साहित्य के निर्माताओं में भी उनका प्रमुख स्थान है।

पंडित बाल कृष्ण भट्ट का जन्म ३ जून १८४४ को प्रयाग के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. वेणी प्रसाद था। स्कूल में दसवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद भट्ट जी ने घर पर ही संस्कृत का अध्ययन किया। संस्कृत के अतिरिक्त उन्हें हिंदी अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी भाषाओं का भी अच्छा ज्ञान हो गया। भट्ट जी स्वतंत्र प्रकृति के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार का कार्य किया तथा वे कुछ समय तक कायस्थ पाठशाला प्रयाग में संस्कृत के अध्यापक भी रहे किंतु उनका मन किसी में नहीं रमा। भारतेंदु जी से प्रभावित होकर उन्होंने हिंदी-साहित्य सेवा का व्रत ले लिया। भट्ट जी ने हिंदी-प्रदीप नामक मासिक पत्र निकाला। इस पत्र के वे स्वयं संपादक थे। उन्होंने इस रस पत्र के द्वारा निरंतर ३२ वर्ष तक हिंदी की सेवा की। काव्य, नाटक प्रचारिणी सभा द्वारा आयोजित हिंदी शब्द सागर के संपादन में भी उन्होंने बाबू श्याम सुंदर दास तथा शुक्ल जी के साथ कार्य किया।

भट्ट जी की माता अपने पति की अपेक्षा अधिक पढ़ी-लिखी और विदुषी थीं। उनका प्रभाव बालकृष्ण भट्ट जी पर अधिक पड़ा। भट्ट जी मिशन स्कूल में पढ़ते थे। वहाँ के प्रधानाचार्य एक ईसाई पादरी थे। उनसे वाद-विवाद हो जाने के कारण इन्होंने मिशन स्कूल जाना बंद कर दिया। इस प्रकार वह घर पर रह कर ही संस्कृत का अध्ययन करने लगे। वे अपने सिद्धान्तों एवं जीवन-मूल्यों के इतने दृढ़ प्रतिपादक थे कि कालान्तर में इन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण मिशन स्कूल तथा कायस्थ पाठशाला के संस्कृत अध्यापक के पद से त्याग-पत्र देना पड़ा था। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने कुछ समय तक व्यापार भी किया परन्तु उसमें इनकी अधिक रुचि न होने के कारण सफलता नहीं मिल सकी। आपकी अभिरुचि आरंभ से ही साहित्य सेवा में थी। अत: सेवा-वृत्ति को तिलांजलि देकर वे यावज्जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा ही करते रहे। भट्टजी का २० जुलाई १९१४ देहवसान हो गया।

 कार्यक्षेत्र
भट्ट जी एक अच्छे और सफल पत्रकार भी थे। हिन्दी प्रचार के लिए उन्होंने संवत्‌ 1933 में प्रयाग में हिन्दी वर्द्धिनी नामक सभा की स्थापना की। उसकी ओर से एक हिन्दी मासिक पत्र का प्रकाशन भी किया, जिसका नाम था “हिन्दी प्रदीप”। वह बत्तीस वर्ष तक इसके संपादक रहे और इसे नियमित रूप से भली – भाँति चलाते रहे। हिन्दी प्रदीप के अतिरिक्त बालकृष्ण भट्ट जी ने दो-तीन अन्य पत्रिकाओं का संपादन भी किया। भट्ट जी भारतेन्दु युग के प्रतिष्ठित निबंधकार थे। अपने निबंधों द्वारा हिन्दी की सेवा करने के लिए उनका नाम सदैव अग्रगण्य रहेगा। उनके निबंध अधिकतर हिन्दी प्रदीप में प्रकाशित होते थे। उनके निबंध सदा मौलिक और भावना पूर्ण होते थे। वह इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें पुस्तकें लिखने के लिए अवकाश ही नहीं मिलता था। अत्यन्त व्यस्त समय होते हुए भी उन्होंने “सौ अजान एक सुजान”, “रेल का विकट खेल”, “नूतन ब्रह्मचारी”, “बाल विवाह” तथा “भाग्य की परख” आदि छोटी-मोटी दस-बारह पुस्तकें लिखीं। वैसे आपने निबंधों के अतिरिक्त कुछ नाटक, कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे हैं।

 प्रमुख कृतियाँ
भट्ट जी ने हिंदी साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में लिखा। उन्हें मूलरूप से निबंध लेखक के रूप में जाना जाता है लेकिन उन्होंने दो उपन्यास भी लिखे।

निबंध- संग्रह साहित्य सुमन और भट्ट निबंधावली।
उपन्यास- नूतन ब्रह्मचारी तथा सौ अजान एक सुजान।
मौलिक नाटक- दमयंती, स्वयंवर, बाल-विवाह, चंद्रसेन, रेल का विकट खेल, आदि।
अनुवाद- भट्ट जी ने बंगला तथा संस्कृत के नाटकों के अनुवाद भी किए जिनमें वेणीसंहार, मृच्छकटिक, पद्मावती आदि प्रमुख हैं।

 भाषा
भाषा की दृष्टि से अपने समय के लेखकों में भट्ट जी का स्थान बहुत ऊँचा है। उन्होंने अपनी रचनाओं में यथाशक्ति शुद्ध हिंदी का प्रयोग किया। भावों के अनुकूल शब्दों का चुनाव करने में भट्ट जी बड़े कुशल थे। कहावतों और मुहावरों का प्रयोग भी उन्होंने सुंदर ढंग से किया है। भट्ट जी की भाषा में जहाँ तहाँ पूर्वीपन की झलक मिलती है। जैसे- समझा-बुझा के स्थान पर समझाय-बुझाय लिखा गया है। बालकृष्ण भट्ट की भाषा को दो कोटियों में रखा जा सकता है। प्रथम कोटि की भाषा तत्सम शब्दों से युक्त है। द्वितीय कोटि में आने वाली भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ तत्कालीन उर्दू, अरबी, फारसी तथा ऑंग्ल भाषीय शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। वह हिन्दी की परिधि का विस्तार करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने भाषा को विषय एवं प्रसंग के अनुसार प्रचलित हिन्दीतर शब्दों से भी समन्वित किया है। आपकी भाषा जीवंत तथा चित्ताकर्षक है। इसमें यत्र-तत्र पूर्वी बोली के प्रयोगों के साथ-साथ मुहावरों का प्रयोग भी किया गया है , जिससे भाषा अत्यन्त रोचक और प्रवाहमयी बन गई है।

 वर्ण्य विषय
भट्ट जी ने जहाँ आँख, कान, नाक, बातचीत जैसे साधारण विषयों पर लेख लिखे हैं, वहाँ आत्मनिर्भरता, चारु चरित्र जैसे गंभीर विषयों पर भी लेखनी चलाई है। साहित्यिक और सामाजिक विषय भी भट्ट जी से अछूते नहीं बचे। ‘चंद्रोदय’ उनके साहित्यिक निबंधों में से है। समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए उन्होंने सामाजिक निबंधों की रचना की। भट्ट जी के निबंधों में सुरुचि-संपन्नता, कल्पना, बहुवर्णन शीलता के साथ-साथ हास्य व्यंग्य के भी दर्शन होते हैं।

 शैली
भट्ट जी की लेखन – शैली को भी दो कोटियों में रखा जा सकता है। प्रथम कोटि की शैली को परिचयात्मक शैली कहा जा सकता है। इस शैली में उन्होंने कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। द्वितीय कोटि में आने वाली शैली गूढ़ और गंभीर है। इस शैली में भट्ट जी को अधिक नैपुण्य प्राप्त है। आपने “आत्म-निर्भरता” तथा “कल्पना” जैसे गम्भीर विषयों के अतिरिक्त , “आँख”, “नाक”, तथा “कान”, आदि अति सामान्य विषयों पर भी सुन्दर निबंध लिखे हैं। आपके निबंधों में विचारों की गहनता, विषय की विस्तृत विवेचना, गम्भीर चिन्तन के साथ एक अनूठापन भी है। यत्र-तत्र व्यंग्य एवं विनोद उनकी शैली को मनोरंजक बना देता है। उन्होंने हास्य आधारित लेख भी लिखे हैं, जो अत्यन्त शिक्षादायक हैं। भट्ट जी का गद्य गद्य न होकर गद्यकाव्य सा प्रतीत होता है। वस्तुत: आधुनिक कविता में पद्यात्मक शैली में गद्य लिखने की परंपरा का सूत्रपात श्री बालकृष्ण भट्ट जी ने ही किया था। उन्हें

१. वर्णनात्मक शैली- वर्णनात्मक शैली में भट्ट जी ने व्यावहारिक तथा सामाजिक विषयों पर निबंध लिखे हैं। जन साधारण के लिए भट्ट जी ने इसी शैली को अपनाया। उनके उपन्यास की शैली भी यही है, किंतु इसे उनकी प्रतिनिधि शैली नहीं कहा जा सकता।
इस शैली की भाषा सरल और मुहावरेदार है। वाक्य कहीं छोटे और कहीं बड़े हैं।

२. विचारात्मक शैली- भट्ट जी द्वारा गंभीर विषयों पर लिखे गए निबंध इसी शैली के अंतर्गत आते हैं। तर्क और विश्वास, ज्ञान और भक्ति, संभाषण आदि निबंध विचारात्मक शैली के उदाहरण हैं।
इस शैली की भाषा में संस्कृत के शब्दों की अधिकता है।

३. भावात्मक शैली- इस शैली का प्रयोग भट्ट जी ने साहित्यिक निबंधों में किया है। इसे भट्ट जी की प्रतिनिधि शैली कहा जा सकता है।
इस शैली में शुद्ध हिंदी का प्रयोग हुआ है। भाषा प्रवाहमयी, संयत और भावानुकूल है। इस शैली में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग भी हुआ है। अलंकारों के प्रयोग से भाषा में विशेष सौंदर्य आ गया है। भावों और विचार के साथ कल्पना का भी सुंदर समन्वय हुआ। इसमें गद्य काव्य जैसा आनंद होता है। चंद्रोदय निबंध का एक अंश देखिए- यह गोल-गोल प्रकाश का पिंड देख भाँति-भाँति की कल्पनाएँ मन में उदय होती है कि क्या यह निशा अभिसारिका के मुख देखने की आरसी है या उसके कान का कुंडल अथवा फूल है यह रजनी रमणी के ललाट पर दुक्के का सफ़ेद तिलक है।

४. व्यंग्यात्मक शैली- इस शैली में हास्य और व्यंग्य की प्रधानता है। विषय के अनुसार कहीं व्यंग्य अत्यंत मार्मिक और तीखा हो गया है।
इस शैली की भाषा में उर्दू शब्दों की अधिकता है और वाक्य छोटे-छोटे हैं।

साहित्य सेवा और स्थान- भारतेंदु काल के निबंध-लेखकों में भट्ट जी का सर्वोच्च स्थान है। उन्होंने पत्र, नाटक, काव्य, निबंध, लेखक, उपन्यासकार अनुवादक विभिन्न रूपों में हिंदी की सेवा की और उसे धनी बनाया।

साहित्य की दृष्टि से भट्ट जी के निबंध अत्यंत उच्चकोटि के हैं। इस दिशा में उनकी तुलना अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध निबंधकार चार्ल्स लैंब से की जा सकती है। गद्य काव्य की रचना भी सर्वप्रथम भट्ट जी ने ही प्रारंभ की। इनसे पूर्वक हिंदी में गद्य काव्य का नितांत अभाव था।

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प्रयोजनमूलक हिन्दी के संदर्र्भ में ‘प्रयोजन’ शब्द के साथ ‘मूलक’ उपसर्ग लगने से प्रयोजनमूलक पद बना है। प्रयोजन से तात्पर्य है उद्देश्य अथवा प्रयुक्ति। ‘मूलक’ से तात्पर्य है आधारित। अत: प्रयोजनमूलक भाषा से तात्पर्य हुआ किसी विशिष्ट उद्देश्य के अनुसार प्रयुक्त भाषा। इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी से तात्पर्य हिन्दी का वह प्रयुक्तिपरक विशिष्ट रूप या शैली है जो विषयगत तथा संदर्भगत प्रयोजन के लिए विशिष्ट भाषिक संरचना द्वारा प्रयुक्त की जाती है। विकास के प्रारम्भिक चरण में भाषा सामाजिक सम्पर्क का कार्य करती है। भाषा के इस रूप को संपर्क भाषा कहते हैं। संपर्क भाषा बहते नीर के समान है। प्रौढा की अवस्था में भाषा के वैचारिक संदर्भ परिपुष्ट होते हैं औैर भावात्मक अभिव्यक्ति कलात्मक हो जाती है। भाषा के इन रूपों को दो नामों से अभिहित किया जाता है। प्रयोजनमूलक और आनन्दमूलक। आनन्द विधायक भाषा साहित्यिक भाषा है। साहित्येतर मानक भाषा को ही प्रयोजनमूलक भाषा कहते हैं, जो विशेष भाषा समुदाय के समस्त जीवन-संदर्भो को निश्चित शब्दों और वाक्य संरचना के द्वारा अभिव्यक्त करने में सक्षम हो। भाषिक उपादेयता एवं विशिष्टिता का प्रतिपादन प्रयोजनमूलक भाषा से होता है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप :

हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। इसके बोलने व समझने वालों की संख्या के अनुसार विश्व में यह तीसरे क्रम की भाषा है। यानी कि हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। अत: स्वाभाविक ही है कि विश्व की चुनिंदा भाषाओं में से एक महत्वपूर्ण भाषा और भारत की अभिज्ञात राष्ट्रभाषा होने के कारण, देश के प्रशासनिक कार्यो में हिन्दी का व्यापक प्रयोग हो, राष्ट्रीयता की दृष्टि से ये आसार उपकारक ही है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी हिन्दी के भाषिक अध्ययन का ही एक और नाम है, एक और रूप है एक समय था जबकि सरकारी-अर्द्धसरकारी या सामान्यत: कार्यालयीन पत्राचार के लिए अंग्रेजी एक मात्र सक्षम भाषा समझी जाती थी। अंग्रेजी की उक्त महानता आज, सत्य से टूटी चेतना की तरह बेकार सिद्ध हो रही है चूंकि हिन्दी में अत्यन्त बढ़िया, स्तरीय तथा प्रभावक्षम पत्राचार संभव हुआ है। अत: जो लोग हिन्दी को अविकसित भाषा कहते थे, कभी खिचड़ी तो कभी क्लिष्ट भाषा कहते थे या अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी को नीचा दिखाने की मूर्खता करते थे उन्हें तक लगने लगा है कि हिन्दी वाकई संसार की एक महान भाषा है, हरेक दृष्टि से परिपूर्ण एक सम्पन्न भाषा है।
राजभाषा के अतिरिक्त अन्य नये-नये व्यवहार क्षेत्रों में हिन्दी का प्रचार तथा प्रसार होता है, जैसे रेलवे प्लेटफार्म, मंदिर, धार्मिक संस्थानों आदि में। जीवन के कई प्रतिष्ठित क्षेत्रों में भी अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। विज्ञान औैर तकनीकी शिक्षा, कानून और न्यायालय, उच्चस्तरीय वाणिज्य और व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग होता है। व्यापारियों और व्यावसायियो के लिए भी हिन्दी का प्रयोग सुविधाजनक और आवश्यक बन गया है। भारतीय व्यापारी आज हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते, उनके कर्मचारी, ग्राहक सभी हिन्दी बोलते हैं। व्यवहार के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रयोजनों से हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। बैंक मे हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है तो सरकारी कार्यालयो में हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है। हिन्दी के इस स्वरूप को ही प्रयोजनमूलक हिन्दी कहते हैं।

प्रयोजनमूलक रूप के कारण हिन्दी भाषा जीवित रही। आज तक साहित्यिक हिन्दी का ही अध्ययन किया जाता था, लेकिन साहित्यिक भाषा किसी भी भाषा को स्थित्यात्मक बनाती है और प्रयोजनमूलक भाषा उसको गत्यात्मक बनाती है। गतिमान जीवन में गत्यात्मक भाषा ही जीवित रहती है। प्रचलित रहती है। आज साहित्य तो संस्कृत में भी है, लेकिन उसका गत्यात्मक रूप-प्रयोजनमूलक रूप समाप्त हो गया है, अत: वह मृतवत हो गयी है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप अधिक शक्तिशाली तथा गत्यात्मक है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप न केवल उसके विकास में सहयोग देगा, बल्कि उसको जीवित रखने एवं लोकप्रिय बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

इस प्रकार विभिन्न प्रयोजनों के लिए गठित समाज खंडों द्वारा किसी भाषा के ये विभिन्न रूप या परिवर्तन ही उस भाषा के प्रयोजनमूलक रूप हैं। अंग्रेजी शासन में यूरोपीय संपर्क से हमारा सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक ढांचा काफी बदला, धीरे-धीरे हमारे जीवन में नई उद्भावनाएं (जैसे पत्रकारिता, इंजीनियरिंग, बैंकीय) पनपी और तदनुकूल हिन्दी के नए प्रयोजनमूलक भाषिक रूप भी उभरे। स्वतंत्रता के बाद तो हिन्दी भाषा का प्रयोग क्षेत्र बहुत बढ़ा है और तदनुरूप उसके प्रयोजनमूलक रूप भी बढे हैं औैर बढ़ते जा रहे हैं। साहित्यिक विधाओं, संगीत, कपड़ा-बाजार, सट्टाबाजारों, चिकित्सा, व्यवसाय, खेतों, खलिहानों, विभिन्न शिल्पों और कलाओं, कला व खेलों के अखाड़ों, कोर्टो कचहरियों आदि में प्रयुक्त हिन्दी पूर्णत: एक नहीं है। रूप-रचना, वाक्य रचना, मुहावरों आदि की दृष्टि से उनमें कभी थोड़ा कभी अधिक अंतर स्पष्ट है और ये सभी हिन्दी के प्रयोजनमूलक परिवर्त या उपरूप है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी की विशेषताएं :

प्रयोजनमूलक भाषा की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं –
1. वैज्ञानिकता :
प्रयोजनमूलक शब्द पारिभाषिक होते हैं। किसी वस्तु के कार्य-कारण संबंध के आधार पर उनका नामकरण होता है, जो शब्द से ही प्रतिध्वनित होता है। ये शब्द वैज्ञानिक तत्वों की भांति सार्वभौमिक होते हैं। हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
2. अनुप्रयुक्तता :
उपसर्गो, प्रत्ययों और सामासिक शब्दों की बहुलता के कारण हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली स्वत: अर्थ स्पष्ट करने में समर्थ है। इसलिए हिन्दी की शब्दावली का अनुप्रयोग सहज है।
3. वाच्यार्थ प्रधानता :
हिन्दी के पर्याय शब्दों की संख्या अधिक है। अत: ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में उसके अर्थ को स्पष्ट करने वाले भिन्न पर्याय चुनकर नए शब्दों का निर्माण संभव है। इससे वाचिक शब्द ठीक वही अर्थ प्रस्तुत कर देता है। अत: हिन्दी का वाच्यार्थ भ्रांति नहीं उत्पन्न करता।
4. सरलता और स्पष्टता :
हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली सरल औैर एकार्थक है, जो प्रयोजनमूलक भाषा का मुख्य गुण है। प्रयोजनमूलक भाषा में अनेकार्थकता दोष है। हिन्दी शब्दावली इस दोष से मुक्त है।
इस तरह प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी एक समर्र्थ भाषा है। स्वतंत्रता के पश्चात प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में स्वीकृत होने के बाद हिन्दी में न केवल तकनीकी शब्दावली का विकास हुआ है, वरन विभिन्न भाषाओं के शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुरुप ढाल लिया है। आज प्रयोजनमूलक क्षेत्र में नवीनतम उपलब्धि इंटरनेट तक की शब्दावली हिन्दी में उलब्ध है, और निरंतर नए प्रयोग हो रह हैं।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के अवरोध :

ब्रिटिश शासकों ने अपने उपनिवेशों में एक महत्वपूर्ण कार्य किया था, अंग्रेजी को प्रतिष्ठित करने का। उन्होंने जिस अंग्रेजी को आरोपित किया, उसका उद्देश्य अपने शासन के लिए योग्य कर्मचारियों को तैयार करना था। जनता से संपर्क के लिए वे हिन्दी सीखते थे और शासन के लिए भारतीय भाषाओं को हेय बताकर अंग्रेजी के एक व्यावहारिक रूप का प्रचार कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने जीवन-यापन से जुड़े क्षेत्रों में अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। राष्ट्रीयता की प्रबल भावना के कारण स्वदेश और स्वभाषा का समर्थन सभी राष्ट्र नेताओ ने किया। संविधान निर्माताओं ने बिना किसी संशय के हिन्दी को राजभाषा घोषित कर दिया। राजभाषा के साथ ही प्रयोजनमूलक भाषा का विकास प्रारंभ होता है। शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भाषा का संबंध समस्त सामाजिक प्रयोजनों से जुड़ जाता है। अत: 26 जनवरी 1950 से ही प्रयोजनमूलक हिन्दी की निर्माण प्रक्रिया प्रारंभ हुई और समस्त सरकारी और गैर सरकारी संगठनों, शिक्षालयों, संचार माध्यमों, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों का उद्देश्य अपनी भाषा के माध्यम से कार्र्य करना था।
अंग्रेजी शासकों के इन कृत्यों ने ही कालान्तर में शब्दावली का रोना रोकर 15 वर्षो तक हिन्दी के विकास को अवरूद्ध किया और अंग्रेजी को बनाए रखा। सरकारी व्याप से बने कोश जन सामान्य तक नहीं पहुंचे। उन्हें प्रतीक्षा थी राष्ट्रीयता के जोश की समाप्ति की। उसमें वे सफल रहे औैर राष्ट्रीयता की लहर का स्थान वोट-बैंक की राजनीति ने ले लिया। क्षेत्रीय भाषाओं के विरोध का नया स्वर गूंजा औैर उत्तर बनाम दक्षिण, हिन्दी बनाम अहिन्दी के नाम पर अंग्रेजी का और अंग्रेजी के बल पर देशी अंग्रेजी का शासन बना रहा।
इस प्रकार राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा का स्वप् अधूरा रहा। इसके बावजूद प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास अवरूद्ध नहीं हुआ। सरकारी तंत्र की उपेक्षा के बावजूद विश्व को उपभोक्ता बाजार मानने वाली विदेशी कंपनियों ने विज्ञान एवं सूचना के क्षेत्र में हिन्दी को महत्व दिया। भारतीय चैनलों से अधिक विदेशी कंपनियां हिन्दी प्रदेश में हिन्दी को अपनाकर आगे बढ़ रही हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि वोट बैंक पर नहीं, पूंजी बैंक पर है और इस पर नियंत्रण करने के लिए चित्रपट जगत, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और सूचनातंत्र हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते।
इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी के मार्ग में अनेक अवरोध स्वतंत्रता प्राप्ति से आ रह हैं औैर उनका सामना करते हुये भारत की यह भाषा अपना अस्तित्व अधिक प्रभावशाली बनाये जा रही है।

अंतत: और निष्कर्षत:  :-

निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि साहित्य भाषा को प्रतिष्ठा दे सकता है, लेकिन विस्तार नहीं देता। भाषा को विस्तार देता है, उसका प्रयोजनमूलक स्वरुप। प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी को वैश्विक प्रसार मिला है। हिन्दी के प्रयोजनमूलक स्वरूप के विकास के कारण ही आज संपूर्ण भारत में हिन्दी को समझने और बोलने वाले मिल जाते हैं। यह आवश्यक है कि यदि सही अर्थो में राजभाषा का क्रियान्वयन होता तो आज हिन्दी का प्रसार विदेशों में भी हो गया होता, लेकिन हिन्दी का विकास राजकीय प्रयोजनेतर माध्यमों के द्वारा हा रहा है, जिनमें चलचित्र, दूरदर्शन और उद्योग व्यापार के विदेशी प्रतिष्ठानों का योगदान अधिक है। इसलिए आज हिन्दी के प्रयोजनमूलक संदर्भो से जो क्षेत्र जुड़े हैं वे हैं -1. राजभाषा और उससे सबंद्ध क्षेत्र (कामकाजी क्षेत्र)। 2. पत्रकारिता। 3. श्रव्य माध्यम। 4. दूरदर्शन और चलचित्र। 5. अनुवाद और उसके माध्यम के विज्ञान, तकनीक और व्यापार। इन क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग का ज्ञान ही आज की उपभोक्तावादी सभ्यता में हिन्दी और हिन्दी भाषी को प्रतिष्ठित कर सकता है।

 

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