हिन्दी साहित्य

Archive for अक्टूबर 2007

सुफी संतों को इस्लाम प्रचारक कहा जाता है। उन्हें केवल इस्लाम का प्रचारक कहना ठीक नहीं है, जबकि वे लोग अत्यंत उदार दृष्टिकोण के संत थे। लोग उनसे प्रभावित होकर मुसलमान हो जाते थे। इन संतों में धार्मिक दृष्टिकोण बड़ा व्यापक और उदार था। वे इस्लाम को आवश्यक मानते और विचारधारा की स्वतंत्रता और धार्मिक विधि- विधानों के क्षेत्र में स्वतंत्रता के पक्षपाती थे।सूफी मतों के सुफियों ने भारत की धरती पर जन्में धर्मों से बहुत कुछ लिया है। माला जपने की क्रिया उन्होंने बौद्ध धर्म से ली है। सुफियों में शहद खाने का निषेध और अहिंसा- पालन का सिद्धांत जैन धर्म से लिया। भारतीय योगमत का भी सुफियों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा। आसन प्राणायाम आदि के लिए सूफी, योगियों के ॠणी है। सूफी अब सईद ने योगियों से ही ध्यान धारण की बातें सीखी थी।
ईश्वराशधन सुफियों का ध्येय था, प्रेम उनका मूल मंत्र था। एकेश्वरवाद में उनकी आस्था थी, उनके लिए हिंदू- मुस्लिम एक अल्लाह की ही संतान थे। उनकी भेद में जाति भेद मि था। भारतीय हिंदू में मूर्ति पूजा का प्रचार था। सूफी एवं मुसलमानों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। वे समाधि- स्थानों की यात्रा करने लगे। इन स्थानों पर दीप चढ़ाने आदि के द्वारा उन्होंने भी पीरों की पूजा शुरु की। सुफियों ने भारतीय वातावरण के अनुकूल केवल प्रचार ही नहीं किया था, वरन सुन्दर काव्य की भी रचना की। इन काव्य रचनाओं में प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रुपों में सूफी मत के सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ था। इनका उद्देश्य ईश्वरीय प्रेम के अतिरिक्त जन- समाज को प्रेम- पाश में आबद्ध करना भी था।
 
जायसी सहित सभी सूफी कवियों ने मुख और लेखनी से जो कुछ भी व्यक्त किया, वह जनता के आश्वासनार्थ सुधा- सिंधु ही सिद्ध हुआ और भारतीय साहित्य के लिए एक अनूठी निधि बन गया। इन्होंने तृषित मानव हृदय को शांति प्रदान की। अतः भारतीयों ने इन संतों में अपने परम हितैषी और शुभ चिंतक ही पाए। प्यासों को पानी देने वाला और भूखों को भोजन देने वाला सदैव सर्वमान्य होता है। इसी प्रकार ये संत भी लोगों के शीघ्र ही सम्माननीय हो गए। यही कारण था कि हिंदू- मुस्लिम दोनों पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा। हिंदूओं ने तो अपने परम हितैषी सहायक ही पा लिए।
 
जायसी, मंझन, उसमान आदि सूफी कवियों ने अपने प्रेमाख्यानों की रचना द्वारा जिस पर महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर हमारा ध्यान दिलाया है। वह मानव जीवन के सौहार्दपूर्ण विकास के साथ संबंध रखता है और जो प्रधानतः उनके एकोदृष्टि और एकान्तनिष्ठ हो जाने पर ही संभव है। इनका कहना है कि यदि हमारी दृष्टि विशुद्ध प्रेम द्वारा प्रभावित हो सके और हम उसके आधार पर अपना संबंध परमात्मा से जोड़ लें, तो हमारी संकीर्णता सदा के लिए दूर हो जा सकती है। ऐसी दशा में हम न केवल सर्वत्र एक व्यापक विश्व- बंधुत्व की स्थापना कर सकते हैं, बल्कि अपने भीतर ही अपूर्ण शांति एवं परम आनंद का अनुभव कर सकते हैं।
 
इन प्रेमाख्यानों का मुख्य संदेश मानव हृदय की विशालता प्रदान करना तथा उसे सर्वथा परिष्कृत करना एवं अपने भीतर दृढ़ता और एकांतनिष्ठा की शक्ति- भक्ति लाना है। सूफियों के इस प्रेमाघाति जीवनादर्श के मूल मे उनका यह सिद्धांत भी काम करता है कि वास्तव में ईश्वरीय प्रेम तथा लौकिक प्रेम में कोई अंतर नहीं है। इश्कमिजाजी तभी तक संदोष है, जब तक उसमें स्वार्थ परायण्ता की संकीर्णता आ जाए और आत्मत्याग की उदारता लक्षित न हो। व्यक्तिगत सुख- दुख अथवा लाभ- हानि के स्तर से ऊपर उठते ही वह एक अपूर्व रंग पकड़ लेता है और फिर क्रमशः उस रुप में आ जाता है, जिसको इश्क हकीकी के नाम से जाना जाता है। कवियों ने अपनी इन रचनाओं में ऐसा कभी कोई संकेत नहीं छोड़ा, जिससे उनका कोई सांप्रदायिक अर्थ लगाया जा सके। जायसी इस्लामी के अनुयायी थे, मगर उन पर सूफी संत होने के कारण इस्लाम और हिंदू भावना से वे ऊँचे उठे हुए थे।
 
तिन्ह संतति उपराजा, भांतिहि भांति कुलीन
हिंदू तुरुक दुबो भये, अपने- अपने दीन।।
 
मातु के रक्त पिता कै बिंदू।
अपने दुबौ तुरुक और हिंदू।।
 
जायसी ने कई स्थलों पर साधना और धर्म के पक्षों में वाह्माडम्बर का विरोध किया है–
 
का भा परगट क्या पखारें।
का भा भगति भुइ सिर मारे।।
का भा जय भभूत चढ़ाऐ।
का भा गेरु कापरि लाए।।
का भा भेस दिगंबर छांटे।
 
का भा आपू उलटि गए काँटे।।
जो मेखहि तजि लोन तू गहा।
ना बाग टहैं भगति बे चाहा।।
बर पीपर सिर जटा न थोरे।
अइस भेसं की पावसि भोरे।।
 
जब लगि विरह न होई तन, हिए न उपजइ पेम।
तब लगि हाथ न आव तप करम धरम सतनेम।।
 
यह तन अल्लाह मिंया सो लाइ।
जिदि की षाई तिहि की शाई।
बात बहुत जो कहे बनाई।
छूछ पछौर उड़ि- उड़ि जाए।।
जीवन थोर बहुत उपहाँस।
 
अधरी ठकुरी पीठ बतासे।।
तोरा अन्याउ होसि का क्रोधी।
बेल न कूदत गोने कूदी।।
पुन्य पाप ते कोउ तरा।
भूखी डाइन तामस भरा।।
 
पद्मावत में जायसी द्वारा प्रेमाख्यानों का उल्लेख —
 
बहुतन्ह ऐस जीऊ पर खेला।
तू जोगी केहि माहं अकेला।।
विक्रम धसा प्रेम के बारा।
सपनावति कहाँ गएउ पतारा।।
सुदेवच्छ मुगुधावति लागी।
 
कंकनपूरि होई गा बैरागी।।
राजकुँवर कंचनपुर गएऊ।
मिरगावति कहं जोगी भएऊ।।
साधा कुवँर मनोहर जोगू।
मधुमालति कहं कीन्ह वियोगू।।
 

 

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जायसी के प्रेम साधना में कुंडली योग की परिभाषाओं को अंगिकार कर लेने से पद्मावत पर भारतीयता का गहरा रंग चढ़ गया दिखाई देता है। इसमें कवि ने अपनी भावना के अनुरुप ही सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए अध्यात्मिक पथों का सहारा लिया है। इसलिए उन्होंने कई ऐसे प्रतीक का प्रयोग किया है, जो न सिर्फ आपसी सौहार्द के लिए आवश्यक है, बल्कि भारतीय संस्कृति का भी प्रतीक है —- घड़ियाल —
घरी- घरी घरियाल पुकारा।
पुजी बरा सो आपनि मारा।।
नौ पोरी पर दसवं दुबारा।
तेहि पर बाज राज घरियारा।।
 
— नोपौरी —
 
नौ पौरी पर दसवं दुवारा।
तेहि पर बाज राज घरियारा।।
नव पंवरी बांकी नव खड़ो।
नवहु जो चढ़े जाइ बरहमांड।।
 
— दसमद्वार —
 
दसवँ दुवारा गुपुत एक नांकी।
अगम चढ़ाव बाह सुठि बांकी।।
भेदी कोई जाई आहि घाटी।
जौ लै भेद चढ़ै होइ चांटी।।
दसवँ दुवारा तारुका लेखा।
उलटि दिस्टि जो लख सो देखा।।
 
नौ पौरी शरीर के नौ द्वार हैं, जिनका उल्लेख अथर्वेद के अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां वरयोध्यां इस वर्णन से ही मिलने लगता है। जायसी की विशेषता यह है कि इन नौ द्वारों की कल्पना को शरीरस्थ चक्रों के साथ मिला दिया है और उन्हें नव खण्डों के साथ संबंधित करके एक- एक खण्ड का एक- एक द्वार कहा है। इन नव के ऊपर दसवां द्वार है। मध्ययुगीन साधना में इसका बड़ा महत्व रहा है। जायसी ने भारतीय परिभाषाओं के साथ ही अत्यंत कुशलता के साथ बड़ी सरलता में सुफी साधना के चरिबसेरे का भी उल्लेख किया है —
 
नवौं खण्ड पोढि औ तहं वज्र के वार।
चारि बसेरे सौ चढ़ै सात सो उतरे पार।।
 
जायसी ने पद्मावती के माध्यम से ईश्वरी ज्योति को प्रकट करने का प्रयत्न किया है। इसके नायक रत्नसेन आत्मा का प्रतीक है। सिंहल यात्रा- आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है —
 
पैगासाइँसन एक विनाती।
मारग कठिन जाब केहि भांती।।
सात समुद्र असुझ अपारा।
मारहिं मगर मच्छ घरियारा।।
 
उठैं लहरें नहिं जाहि संभारी।
भरविहि कोइ निबहे बेपारी।।
खार, खीर, दधि, जल, उदधि सुर फिलकिला अकूत।
को चढि नाँधे समुद्र ए हे काकार असबुत।।
 
जायसी को शरीअत पर आस्था थी, वे इसे सावधानास्था का प्रथम सोपान कहते थे —
 
साँची रोह “सरीअत’ जहि विसवास न होई।
पांव रखे तेहि सीढ़ी, निभरम पहूँचे सोई।।
 

 

 
 
साधनात्मक रहस्यवाद को जायसी की एक बहुत बड़ी देन है कि उन्होंने इस शुष्क और योगमूलक साधनात्मक रहस्य को अत्यंत सरस और मधुर बनाया है।क. पारस जोति लिलाटदि ओति।
दिष्टि जो करे होइ तेहि जोती।।
ख. होतहि दास परष भा लेना।
धरती सरग भएउ सब सोना।।
 
भा निरमल तिन्ह पायन परसे।
पावर रुप रुप के दरसे।।
 
नयन नो देखा कँवल भा, निरमल नीर सरीर।
पावा रुप रुप के दरसे।।
 
बेनी छोरि झार जौं बारा।
सरग पतार होइ अधियारा।।
 
जायसी का विराट उपास्य शुद्ध सौंदर्य रुपरुपी है। जायसी प्रेम और सौंदर्य के विशिष्ट रहस्यवादी कवि है। सूफी साधना में अध्यात्मिक विरह का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यदि विरह नहीं है तो तप, जप, धर्म, नेम आदि व्यर्थ है —
 
जब लगि बिरह न होइ तन हिए न उपजउ पेम
तब लगि हाथ न आव तप, कएम, धरम सतनेम।।
 
समस्त सृष्टि प्रियतम के विरह से जल रही है —
 
बिरह कै आगि सूर जरि कापा।
राति देवस जारहि उहि तापा।।
औ सब नखत तराई इं।
टूटे लूक धरति महँ परहूँ।।
 
एक स्थान पर श्लेष अलंकार के माध्यम से रहस्य भावना को अभिव्यक्ति मिली है —
 
कहाँ सो खोएहु बिखा लोना।
जेहि ते अधिक रुप ओ सोना।।
का हरतार पार परवा।
गंधक काहे कुरकुटा खाना।।
 
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि जायसी ने अद्वेैती साधनात्मक प्रवृति की अभिव्यक्ति के लिए हठयोगियों में प्रचलित पद्धति को स्वीकार किया है। भावनात्मक रहस्यवाद का तो उनके पद्मावत में अत्यंत सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। सब कुछ मिलाकर निष्कर्ष रुप में कहा जा सकता है कि सचमुच हिंदी के कवियों में यदि कहीं रमणीय सुंदर अद्वेैतीवाद रहस्यवाद है, तो जायसी को सबसे आगे बयान किया जा सकता है।

 

रहस्यवादी भक्त परमात्मा को अपने परम साध्य एवं प्रियतम के रुप में देखता है। वह उस परम सत्ता के साक्षात्कार और मिलन के लिए वैकल्प का अनुभव करता है, जैसे मेघ और सागर के जल में मूलतः कोई भेद नहीं है, फिर भी मेघ का पानी नदी रुप में सागर से मिलने को व्याकुल रहता है। ठीक उसी प्रकार की अभेद- जन्म व्याकुलता एवं मिलन जन्य विह्मवलता भक्त की भी होती है। जायसी की रहस्योन्मुखता भी इसी शैली की है। जायसी रहस्यमयी सत्ता का आभास देने के लिए बहुत ही रमणीय तथा मर्मस्थली दृश्य- संकेत उपस्थित करने में समर्थ हुए हैं। पद्मावती की पारस रुप का प्रभाव –जेहि दिन दसन जोति निरमई।
बहुते जोति जोति ओहि भई।।
रवि ससि नखत दिपहिं ओहि जोती।
रतन पदारथ मानिक मोती।।
जहूँ जहूँ विहँसिं सुभावहि हसिं।
तहँ तहँ छिटकि जोति और को दूजी।।
दामिनि दमकि न सरवरि पूजी।
पुनि ओरि जोति परगसी।।
 
नयन जो देखा कंवल भा निरमल नीर सरीर।
हँसत जो देखा हँस भा, दसन जोति नगर हीर।।
 
जायसी ने प्रकृति मूलतः रहस्य वाद को अपनाया है। जायसी को प्रकृति की शक्तियों में किसी अनंद सत्ता का भान होता है। उसे ऐसा लगता है कि प्रकृति के समस्त तत्व उसी अनंत सत्ता के अनुकूल हैं। प्रकृति के समस्त तत्व उसी अनंत सत्ता द्वारा चलित अनुशासित और आकर्षित है। उस नदी, चाँद, सूर्य, तारे, वन, समुद्र, पर्वत इत्यादि की भी सर्जना की है —
 
सरग साजि के धरती साजी।
बरन- बरन सृष्टि उपराजी।।
सागे चाँद, सूरज और तारा।
साजै वन कहू समुद पहारा।।
 
इस समस्त सृष्टि का परिचालन उसी में इंगित पर हो रहा है —
 
साजह सब जग साज चलावा।
औ अस पाछ्ैं ताजन लावा।।
तिन्ह ताजन डर जाइन बोला।
सरग फिरई ओठ धरती डोला।।
 
चाँद सूरुज कहाँ गगन गरासा।
और मेघन कहँ बीजू तरासा।।
नाथे डारे कारु जस नाचा।
खेल खेलाई केरि जहि खाँचा।।
 
जायसी ने प्रायः प्रकृति के माध्यम से परेश सत्ता की ओर संकेत दिया है — सिंहलद्वीप की अमराई की अनिवर्चनीय सुखदायी छाया का वर्णन करते हुए कवि ने उस छाया का अध्यात्मिक
संकेत भी दिया है —
 
धन अमराउ लाग चहुँ पासा।
उठा भूमि हुत लागि अकासा।।
तखिर रुबै मलय गिरि लाई।
भइ जग छाह रेनि होइ आई।।
 
मलय समीर सोहावन छाया।
जेठ जाड़ लागे तेहि माहां।।
ओहि छाँह रेन होइ आबै।
हरिहा सबै अकास देखावे।।
 
पथिक जो पहुँचे सहिकै धामू।
दुख बिसरै सुख होइ बिसराम।।
जेहि वह पाइ छाँह अनुपा।
फिरि नहिं आइ सहं यह धूप।।
 
जायसी कहते हैं — संपूर्ण सृष्टि उस प्रियतम के अमर धाम तक पहुँचने के लिए प्रगतिमान है, किंतु वहाँ पहुँचने के लिए साधना की पूर्णता अत्यंत आवश्यकता है, अपूर्णता की स्थिति में वहाँ पहुँच पाना अत्यंत कठिन है —
 
धाइ जो बाजा के सा साधा।
मारा चक्र भएउ दुइ आधा।।
चाँद सुरुज और नखत तराई।
तेहिं डर अंतरिख फिरहिं सबाई।।
 
पवन जाइ तहँ पहुँचे चाहा।
मारा तेस लोहि भुहं रहा।।
अगिनि उठी उठि जरी नयाना।
धुवाँ उठा उठि बीच बिलाना।।
 
परनि उठा उठि जाइ न छूवा।
बहुरा रोई आइ भुइं छुआ।।
 

 

अखरावट
 
अखरावट जायसी कृत एक सिद्धांत प्रधान ग्रंथ है। इस काव्य में कुल ५४ दोहे ५४ सोरठे और ३१७ अर्द्धलिया हैं। इसमें दोहा, चौपाई और सोरठा छंदों का प्रयोग हुआ है। एक दोहा पुनः एक सोरठा और पुनः ७ अर्द्धलियों के क्रम का निर्वाह अंत तक किया गया है। अखरावट में मूलतः चेला गुरु संवाद को स्थान दिया गया है। 
 
अखरावट का रचनाकाल :-
अखरावट के विषय में जायसी ने इसके काल का वर्णन कहीं नहीं किया है। सैय्यद कल्ब मुस्तफा के अनुसार यह जायसी की अंतिम रचना है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अखरावट पद्मावत के बाद लिखी गई होगी, क्योंकि जायसी के अंतिम दिनों में उनकी भाषा ज्यादा सुदृढ़ एवं सुव्यवस्थित हो गई थी, इस रचना की भाषा ज्यादा व्यवस्थित है। इसी में जायसी ने अपनी वैयक्तिक भावनाओं का स्पष्टीकरण किया है। इससे भी यही साबित होता है, क्योंकि कवि प्रायः अपनी व्यक्तित्व भावनाओं स्पष्टीकरण अंतिम में ही करता है।
मनेर शरीफ से प्राप्त पद्मावत के साथ अखरखट की कई हस्तलिखित प्रतियों में इसका रचना काल दिया है। “अखरावट’ की हस्तलिखित प्रति पुष्पिका में जुम्मा ८ जुल्काद ९११ हिजरी का उल्लेख मिलता है। इससे अखरावट का रचनाकाल ९११ हिजरी या उसके आस पास प्रमाणित होता है।
अखरावट का कथावस्तु :-
१. सृष्टि :
अखरावट के आरंभ में जायसी ने इस्लामिक धर्मग्रंथों और विश्वासों के आधार पर आधारित सृष्टि के उद्भव तथा विकास की कथा लिखी है। उनके इस कथा के अनुसार सृष्टि के आदि में महाशुन्य था, उसी शुन्य से ईश्वर ने सृष्टि की रचना की गई हे। उस समय गगन, धरती, सूर्य, चंद्र जैसी कोई भी चीज मौजूद नहीं थी। ऐसे शुन्य अंधकार में सबसे पहले पैगम्बर मुहम्मद की ज्योति उत्पन्न की –
गगन हुता नहिं महि दुती, हुते चंद्र नहिं सूर
ऐसइ अंधकूप महं स्पत मुहम्मद नूर।।
कुरान शरीफ एवं इस्लामी रवायतों में यह कहा जाता है कि जब कुछ नहीं था, तो केवल अल्लाह था। प्रत्येक जगह घोर अंधकार था। भारतीय साहित्य में भी इस संसार की कल्पना “अश्वत्थ’ रुप में की गई है।
सातवां सोम कपार महं कहा जो दसवं दुवार।
जो वह पवंकिंर उधारै, सो बड़ सिद्ध अपार।।
इस पंक्तियों में जायसी ने मनुष्य शरीर के परे, गुद्येन्द्रिय, नाभि, स्तन, कंठ, भौंहों के बीच के स्थान और कपाल प्रदेशों में क्रमशः शनि, वृहस्पिति, मंगल, आदित्य, शुक्र, बुध और सोम की स्थिति का निरोपण किया है। ब्रह्म अपने व्यापक रुप में मानव देह में भी समाया हुआ है –
माथ सरग घर धरती भयऊ।
मिलि तिन्ह जग दूसर होई गयऊ।।
माटी मांसु रकत या नीरु।
नसे नदी, हिय समुद्र गंभीरु।।
इस्लामी धर्म के तीर्थ आदि का भी कवि ने शरीर में ही प्रदर्शित किया है –
सातौं दीप, नवौ खंड आठो दिशा जो आहिं।
जो ब्राह्मड सो पिंड है हेरत अंत न जाहिं।।
अगि, बाड, धुरि, चारि मरइ भांड़ा गठा।
आपु रहा भरि पूरि, मुहमद आपुहिं आपु महं।।
कवि के अनुसार शरीर को ही जग मानना चाहिए। धरती और आकाश इसी में उपस्थित है। मस्तक, मक्का तथा हृदय मदीना है, जिसमें नवी या पैगम्बर का नाम सदा रहता है। इसी प्रकार अन्य वस्तुओं को भी इसी प्रकार निर्देशित किया गया –
नाकि कंवल तर नारद लिए पांच कोतवार।
नवो दुवारि फिरै निति दसई कारखवार।।
अर्थात्, नाभि कमल के पास कोतवाल के रुप में शैतान का पहरा है।
जीव ब्रह्मा :
मलिक मुहम्मद जायसी के कथनानुसार ब्रह्मा से ही यह समस्त सृष्टि आपूर्ति की गयी है। उन्होंने आगे फरमाया कि जीव बीज रुप में ब्रह्मा में ही था, इसी से अठारह सहस्र जीवयोगियों की उत्पत्ति हुई है –
वै सब किछु करता किछु नाहीं।
जैसे चलै मेघ परिछाही।।
परगट गुपुत विचारि सो बूझा।
सो तजि दूसर और न सूफा।।
जीव पहले ईश्वर में अभिन्न था। बाद में उसका बिछोह हो गया। ईश्वर का कुछ अंश घट- घट में समाया है –
सोई अंस छटे घट मेला।
जो सोइ बरन- बरन होइ खेला।।
जायसी बड़ी तत्परता से कहते हैं कि संपूर्ण जगत ईश्वर की ही प्रभुता का विकास है। कवि कहता है कि मनुष्य पिंड के भीतर ही ब्रह्मा और समस्त ब्रह्माण्ड है, जब अपने भीतर ही ढूँढ़ा तो वह उसी अनंत सत्ता में विलीन हो गया –
बुंदहिं समुद्र समान, यह अचरज कासों कहों।
जो हेरा सो हेरान, मुहमद आपुहि आप महं।।
इससे आगे कवि कहता है कि “जैसे दूध में घी और समुद्र में पोती की स्थिति है, वही 
स्थिति वह परम ज्योति की है, जो जगत भीतर- भीतर भासित हो रही है। कवि कहता है कि वस्तुतः एक ही ब्रह्म के चित अचित् दो पक्ष हुए, दोनों पक्षों के भीतर तेरी अलग सत्ता कहाँ से आई। आज के सामाजिक परिदृश्य में उनका यह प्रश्न अधिक उचित है –
एक हि ते हुए होइ, दुइ सौ राज न चलि सके।
बीचतें आपुहि खोइ, मुहम्मद एकै होइ रहु।। 
साधना :
“प्रेम- प्रभु’ की साधना ही सूफी साधना है। इसके अन्तर्गत साधक अपने भीतर बिछुड़े हुए प्रियतम के प्रति प्रेम की पीर को जगाता है। पहले जीव- ब्रह्मा एक थे। वह पुनः अपने बिछुड़े हुए प्रियतम से मिलकर अभेदता का आनंद पाना चाहता है।
हुआ तो एक ही संग, हम तुम काहे बिछुड़े।
अब जिउ उठै तरंग, महमद कहा न जाईन किछु।।
कबीर की तरह जायसी भी प्रेम को अत्यंत ही महत्वपूर्ण बताते हुए कहते हैं –
परै प्रेम के झेल, पिउ सहुँ धनि मुख सो करे। 
जो सिर संती खेल, मुहम्मद खेल हो प्रेम रस।।
जायसी के कथनानुसार किसी सिद्धांत विशेष का यह कहना कि ईश्वर ऐसा ही है, भ्रम है –
सुनि हस्ती का नाव अंधरन रोवा धाइ के।
जेइ रोवा जेइ ठांव मुहम्मद सो तेसे कहे।।
इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रत्येक मत में सत्य का कुछ- न- कुछ अंश रहता है।
जायसी भी मुहम्मद के मार्ग को श्रेष्ठ मानते हुए भी विधना के अनेक मार्गों को स्वीकार करते हैं। वह अपने लेखन में या साधना में एक सिद्धांत में बंधना नहीं चाहते हैं। जायसी अपनी उदास और सारग्रहिणी बुद्धि के फलस्वरुप योग, उपनिषद्, अद्वेतवाद, भक्ति, इस्लामी, एकेश्वरवाद आदि से बहुत कुछ सीखते हैं। वे कहते हैं कि वह सभी तत्व जो ग्राम्ह है, प्रेम की पीर जगाने में समर्थ है। ब्रह्मावाद, योग और इस्लामी- सूफी सिद्धांतों का समन्वय जायसी की अपनी विशेषता है। अखरावट में वह कहते हैं –
मा- मन मथन करै तन खीरु।
हुहे सोइ जो आपु अहिरु।।
पाँचों भुत आनमहि मारैं।
गरग दरब करसी के जारे।।
मन माठा- सम अस के धोवै।
तन खेला तेहि माहं बिलोबे।।
जपहु बुद्धि के दुइ सन फरेहु।
दही चूर अस हिंया अभेरहु।।
पछवां कदुई केसन्ह फेरहु।
ओहि जोति महं जोति अभेरहु।।
जस अन्तपट साढ़ी फूटे।
निरमल होइ मयां सब टूटे।।
मखनमूल उठे लेइ जोति।
समुद माहं जस उलटे कोती।।
जस घिड़ होइ मराइ के, तस जिऊ निरमल होइ।
महै महेरा दूरि करि, भोग कर सुख सोइ।।
अद्वेैतवाद के आधार पर ही जायसी मूल्यतः अपने अध्यात्म जगत का निर्माण किया है –
अस वह निरमल धरति अकासा।
जैसे मिली फूल महं बरसा।।
सबै ठांव ओस सब परकारा।
ना वह मिला, न रहै निनारा।।
ओहि जोति परछाहीं, नवो खण्ड उजियार।
सुरुज चाँद कै जोती, उदित अहै संसार।।
अखरावट में जायसी ने उदारतापूर्वक इस्लामी भावनाओं के साथ भारतीय हिंदू भावनाओं के सामंजस्य का प्रयत्न किया है। जायसी इस्लाम पर पूर्ण आस्था रखते थे, किंतु उनकी यह इस्लाम भावना सुफी मत की नवीन व्यवस्थाओं से संबंधित है। उनका इस्लाम योगमत योगाचार- विधानों से मण्डित है और हिंदू- मुस्लिम दोनों एक ब्रह्मा की संतान हैं, की भावना से अलंकृत है। ब्रह्मा विष्णु और महेश के उल्लेख “प्रसंग वश’ “अल्लिफ एक अल्लाह बड़ मोइ’ केवल एक स्थान पर अल्लाह का नामोल्लेख, कुरान के लिए कुरान और पुराण के नामोल्लेख, स्वर्ग या बिहिश्त के लिए सर्वत्र कैलाश या कविलास के प्रयोग अहं ब्राह्मास्मि या अनलहक के लिए सांह का प्रयोग, इब्लीस या शैतान के स्थान पर “नारद’ का उल्लेख योग साधना के विविध वर्णन प्रभृति बातें इस बात की ओर इंगित करती है कि जायसी हिंदू- मुस्लिम भावनाओं में एकत्व को दृष्टि में रखते हुए समन्वय एवं सामंजस्य का प्रयत्न करते हैं। मलिक मुहम्मद जायसी ने हिंदू- मुस्लिम की एकता के विषय में अत्यंत नम्रंतापूर्वक कहा –
तिन्ह संतति उपराजा भांतिन्ह भांति कुलीन।
हिंदू तुरुक दुवौ भए, अपने अपने दीन।।
मातु कै रक्त पिता के बिंदू।
उपने दुवौ तुरुक और हिंदू।।
जायसी की यह सामंजस्य भावना उनके उदार मानवतावादी दृष्टिकोण की परिचायक है।
पद्मावत :
जायसी हिंदी भाषा के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। उनकी रचना का महानकाव्य पद्मावत हिंदी भाषा के प्रबंध काव्यों में शब्द अर्थ और अलंकृत तीनों दृष्टियों से अनूठा काव्य है। इस कृति में श्रेष्टतम प्रबंध काव्यों के सभी गुण प्राप्त हैं। धार्मिक स्थलों की बहुलता, उदात्त लौकिक और ऐतिहासिक कथा वस्तु- भाषा की अत्यंत विलक्षण शक्ति, जीवन के गंभीर सर्वागिंण अनुभव, सशक्त दार्शनिक चिंतन आदि इसकी अनेक विशेषताएँ हैं। सचमुच पद्मावत हिंदी साहित्य का एक जगमगाता हुआ हीरा है। अवधी भाषा के इस उत्तम काव्य में मानव- जीवन के चिरंतन सत्य प्रेम- तत्व की उत्कृष्ट कल्पना है। कवि से शब्दों में इस प्रेम कथा का मर्म है। गाढ़ी प्रीति नैन जल भेई। रत्नसेन और पद्मावती दोनों के जीवन का अंतर्यामी सूत्र है। प्रेम- तत्व की दृष्टि से पद्मावत का जितना भी अध्ययन किया जाए, कम है। संसार के उत्कृष्ट महाकाव्यों में इसकी गिनती होने योग्य है। पद्मावत में सूफी और भारतीय सिद्धांतों का समन्वय का सहारा लेकर प्रेम पीर की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की गई है।
पद्मावत का रचनाकाल :-
मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत के रचनाकाल का उल्लेख करते हुए लिखा है :-
सन नौ से सैतांलिस अहे।
कथा आरंभ बेन कवि कहै।।
इस काल में दिल्ली की गद्दी पर शेरशाह बैठ चुका था। जायसी ने शाह तत्वत के रुप में दिल्ली के सुल्तान शेरशाह के वैभव को अत्यंत वैभववंत उल्लेख किया है :-
सेरसादि दिल्ली सुल्तानू।
चरिऊ खण्ड तपइ जसभानू।।
कुलश्रेष्ट जी ने ९२७ हिजरी को इस महानकाल का रचनाकाल माना है। उनका कहना था, इस समय जायसी का पद्मावत अधुरा पड़ा था, उन्होंने इसी समय पूरा किया और इसे ९३६ तक पूरा कर लिया था।
पद्मावत की लिपि :-
कुछ विद्वान इसे निश्चित रुप में फारसी लिपि में लिखी मानते हैं। कुछ भागराक्षरों में और कुछ विद्वान केथी अक्षरों में लिखा मानते हैं।
डा. ग्रियसन ने लिखा है कि मूलतः पद्मावत फारसी अक्षरों में लिखा गया और इसका कारण जायसी का धर्म था। हिंदी लिपि में उन्हें पीछे से लोगों ने उतारा हे।
एक विद्वान ने बताया है कि जासयी की पद्मावत नागरी अक्षरों में लिखी गई थी। इनका मत यह है कि जायसी के समय में उर्दू का नाम नहीं था और हिंदी भाषा को लिखने के लिए फारसी अक्षरों में आवश्यक विचार भी नहीं हुए थे। अतः जासयी ने अपनी रचना के लिए उर्दू लिपि का चयन कदापि नहीं किया था। इसका कारण यह है कि उस काल में ऐसे अक्षर वर्तमान नहीं थे।
एक मत यह भी है कि जायसी का उद्देश्य हिंदू जनता में सूफी मत का प्रचार करना था, इसलिए उन्होंने स्वभवतः नागरी लिपि में लिखा होगा।
उपर्युक्त विवरण से यह माना जा सकता है कि पद्मावत की रचना नागरी लिपि में हुई थी। इसी लिपि में जायसी, जनता व साधारण जनता के सामने मकबूल थे। इसलिए उन्होंने इस लिपि को अपने सूफी मत के प्रचार के लिए चुना होगा।
पद्मावत की भाषा पूरब की हिंदी है।
पद्मावत की कथा :-
जायसी ने कल्पना के साथ- साथ इतिहास की सहायता से अपने पद्मावत की कथा का निर्माण किया है।
भारतवर्ष के सूफी कवियों ने लोकजीवन तथा साहित्य में प्रचलित निजंधरी कथाओं के माध्यम से अपने अध्यात्मिक संदेशों को जनता तक पहुँचाने के प्रयत्न किए हैं। पद्मावती की कहानी जायसी की अपनी निजी कल्पना न होकर पहले से प्रचलित कथा के अर्थ को उन्होंने नये सिरे से स्पष्ट किया है –
सन् नरे सौ र्तृतालिस अहा।
कथा आरंभ बैन कवि कहा।।
सिंहलद्वीप पद्मिनी रानी।
रतनसेन चितउर गढ़ आनी।।
अलाउद्दीन देहली सुल्तानू।
राघव चेतन कीन्ह बखानू।।
सुना साहि गढ़ छेंकन आई।
हिंदू तुरकन्ह भई लराई।।
आदि अंत जस गाथा अहै।
लिखि भासा चौपाई कहै।।
इस पंक्तियों में जायसी स्वयं बताते हैं कि आदि से अंत तक जैसी गाथा है, उसे ही वे माखा चौपाई में निबंद्ध करके प्रस्तुत कर रहे हैं। जायसी का दावा है कि पद्मावती की कथा रसपूर्ण तथा अत्यंत प्राचीन थी –
कवि वियास कंवला रसपूरी।
दूरि सो निया नियर सो दूरी।।
नियरे दूर फूल जस कांटा।
दूरि सो नियारे जस गुरु चांटा।।
भंवर आई बन खण्ड सन लई कंवल के बास।
दादूर बास न पावई भलहि जो आछै पास।।
आखिरी कलाम :
जायसी रचित महान ग्रंथ का सर्वप्रथम प्रकाशन फारसी लिपि में हुआ था। इस काव्य में जायसी ने मसनवी- शैली के अनुसार ईश्वर- स्तुति की है। अपने अवतार ग्रहण करने तथा भुकंप एवं सूर्य- ग्रहण का भी उल्लेख किया है। इस के अलावा उन्होंने मुहम्मद स्तुति, शाहतरत- बादशाह की प्रशस्ति और सैय्यद अशरफ की वंदना, जायस नगर का परिचय बड़ी सुंदरता से उल्लेख किया है। जैसा कि जायसी ने अपने काव्य अखरखट में संसार की सृष्टि के विषय में लिखा था। इस आखरी काव्य में जायसी ने आखरी कलाम नाम के अनुसार संसार के खत्म होने एवं पुनः सारे मानवों को जगाकर उसे अपना दर्शन कराने एवं जन्नत की भोग विलास के सूपुर्द करने का उल्लेख किया है।
चित्ररेखा :
जायसी ने पद्मावत की ही भांति “चित्ररेखा’ की शुरुआत भी संसार के सृजनकर्ता की वंदना के साथ किया है। इसमें जायसी ने सृष्टि की उद्भाव की कहानी कहते हुए करतार की प्रशंसा में बहुत कुछ लिखा है। इसके अलावा इसमें उन्होंने पैगम्बर मुहम्मद साहब और उनके चार मित्रों का वर्णन सुंदरता के साथ किया है। इस प्रशंसा के बाद जायसी ने इस काव्य की असल कथा आरंभ किया है।
इसकी कथा चंद्रपुर नामक एक अत्यंत सुंदर नगर के राजा, जिनका नाम चंद्रभानु था, की कथा प्रारंभ किया है। इसमें राजा चंद्र भानु की चाँद के समान अवतरित हुई पुत्री चित्ररेखा की सुंदरता एवं उसकी शादी को इस प्रकार बयान किया है –
चंद्रपुर की राजमंदिरों में ७०० रानियाँ थी। उनमें रुपरेखा अधिक लावण्यमयी थी। उसके गर्भ से बालिका का जन्म हुआ। ज्योतिष और गणक ने उसका नाम चित्ररेखा रखा तथा कहा कि इसका जन्म चंद्रपुर में हुआ है, किंतु यह कन्नौज की रानी बनेगी। धीरे- धीरे वह चाँद की कली के समान बढ़ती ही गयी। जब वह स्यानी हो गयी, तो राजा चंद्रभानु ने वर खोजने के लिए अपने दूत भेजे। वे ढ़ूंढ़ते- ढ़ूंढ़ते सिंहद देश के राजा सिंघनदेव के यहाँ पहुँचे और उसके कुबड़े बेटे से संबंध तय कर दिया।
कन्नौज के राजा कल्याणसिंह के पास अपार दौलत, जन व पदाति, हस्ति आदि सेनाएँ थी। तमाम संपन्नता के बावजूद उसके पास एक पुत्र नहीं था। घोर तपस्या एवं तप के पश्चात उनकी एक राजकुमार पैदा हुआ, जिसका नाम प्रितम कुँवर रखा गया। ज्योतिषियों ने कहा कि यह भाग्यवान अल्पायु है। इसकी आयू केवल बीस वर्ष की है। जब उसे पता चला कि उसकी उम्र सिर्फ ढ़ाई दिन ही रह गई है, तो उन्होंने पुरा राजपाट छोड़ दिया और काशी में अंत गति लेने के लिए चल पड़ा।
रास्ते में राजकुमार को राजा सिंघलदेव से भेंट हो गयी। राजा सिंघलदेव ने राजकुमार प्रीतम कुँवर के पैर पकड़ लिए। उसकी पुरी और नाम पूछा तथा विनती की, कि हम इस नगर में ब्याहने आए हैं। हमारा वर कुबड़ा है, तुम आज रात ब्याह कराकर चले जाना और इस प्रकार चित्ररेखा का ब्याह, प्रीतम सिंह से हो जाता है। प्रीतम सिंह को व्यास के कहने से नया जीवन मिलता है।
चित्ररेखा में प्रेम की सर्वोच्चयता :
जायसी प्रेम पंथ के महान साधक- संत थे। प्रेम पंथ में उन्होंने प्रेम पीर की महत्ता का प्रतिपादन किया है। व्यर्थ की तपस्या काम- क्लेश एवं बाह्माडम्बर को वह महत्वहीन मानते थे :-
का भा पागट क्या पखारे।
का भा भगति भुइं सिर मारें।।
का भा जटा भभूत चढ़ाए।
का भा गेरु कापरि जाए।।
का भा भेस दिगम्बर छांटे।
का भा आयु उलटि गए कांटे।।
जो भेखहि तजि तु गहा।
ना बग रहें भगत व चहा।।
पानिहिं रहइं मंछि औदादुर।
टागे नितहिं रहहिं फुनि गादुर।।
पसु पंछी नांगे सब खरे।
भसम कुम्हार रहइं नित भरे।।
बर पीपर सिर जटा न थोरे।
अइस भेस की पावसि भोऐ।।
जब लगि विरह न होइ तन हिये न उपजइ प्रेम।
तब लगि हाथ न आव पत- काम- धरम- सत नेम।।
जायसी अपने समय के कृच्छ- काय- क्लेश और नाना विध बाह्माडम्बर को साक्ष्य करते हुए कहते हैं कि प्रकट भाव से काया प्रक्षालन से कोई फायदा नहीं हो सकता है। धरती पर सिंर पटकने वाली साधना व्यर्थ है। जटा और भभुत बढ़ाने चढ़ाने का कोइ मूल्य नहीं है। गैरिक वसन धारण करने से कुछ नहीं होता है। दिगम्बर योगियों का सा रहना भी बेकार हे। काँटे पर उत्तान सोना और साधक होने का स्वांग भरना निष्प्रयोजन है। देश त्याग का मौन व्रती होना भी व्यर्थ है। इस प्रकार के योगी की तुलना वर बगुला और चमगादड़ से करते हैं। वे कहते हैं केश- वेश से ईश्वर कदापि नहीं मिलता है। जब वह विरह नहीं होता, हृदय में प्रेम की निष्पति नहीं हो सकती है। बिना प्रेम के तप, कर्म, धर्म और सतनेम की सच्चे अर्थों में प्राप्ति नहीं हो सकती है। जायसी सहजप्रेम विरह की साधना को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
कहरानामा :-
कहरानामा का रचना काल ९४७ हिजरी बताया गया है। यह काव्य ग्रंथ कहरवा या कहार गीत उत्तर प्रदेश की एक लोक- गीत पर आधारित में कवि ने कहरानाम के द्वारा संसार से डोली जाने की बात की है।
या भिनुसारा चलै कहारा होतहि पाछिल पहारे।
सबद सुनावा सखियन्ह माना, हंस के बोला मारा रे।।
जायसी ने हिंदी में कहारा लोक धुनि के आधार पर इस ग्रंथ की रचना करके स्वयं को गाँव के लोक जीवन एवं सामाजिक सौहार्द बनाने का प्रयत्न किया है। कहरानामा में कहरा का अर्थ कहर, कष्ट, दुख या कहा और गीत विशेष है। हमारे देश भारत ब्रह्मा का गुणगान करना, आत्मा और परमात्मा के प्रेम परक गीत गाना की अत्यंत प्राचीन लोक परंपरा है।
कहरानामा की कथा :-
“कहरानामा’ तीस पदों की एक प्रेम कथा है। इस कथानुमा काव्य में लेखक जायसी के कथानुसार संसार एक सागर के समान है। इसमें धर्म की नौका पड़ी हुई है। इस नौका का केवट एक ही है। वे कहते हैं कि कोई पंथ को तलवार की धार कहता है, तो कोई सूत कहता है। कई लोग इस सागर में तैरते हुए हार गया है और बीच में खड़ा है, कोई मध्य सागर में डूबता है और सीप ले आता है, कोई टकटोर करके छूंछे ही लौटता है, कोई हाथ- छोड़ कर पछताता है। जायसी बड़े ही अच्छे अंदाज में दुनिया की बेवफाई और संसार के लोगों की बेरुखी को जगजाहिर करते हैं-
जो नाव पर चढ़ता है, वह पार उतरता है और नख चले जाने पर, जो बांह उठाकर पुकारता है और केवट लौटता नहीं, तो वह पछताता है, ऐसे लोगों को “मुखे अनाड़ी’ कहते हैं। बहुत दूर जाना है, रोने पर कौन सुनता है। जो गाँट पूरे हैं, जो दानी हैं, उनसे हाथ पकड़ कर केवट नाव पर चढ़ा लेता है, वहाँ कोई भाई, बंधु और सुंघाती नहीं। जायसी कहते हैं कि साधक को इस संसार में परे संभाल कर रखना चाहिए अन्यथा पदभ्रश होने का भय है। जायसी ने योग युक्ति, मन की चंचलता को दूर करने भोगों से दूर रहने और प्रेम प्रभु में मन रमाने की बातें कहीं हैं। इससे आगे वे कहते हैं, ईश्वर जिसे अपना सेवक समझता है, उसे वह भिखारी बना देता है।
जो सेवक आपून के जानी 
तेहि धरि भीख मंगावे रे।
कबिता पंडित दूक्ख- दाद महं,
मुरुख के राज करावै रे।।
चनदन गहां नाग हैं तहवां।
जदां फूल तहां कंटा रे।।
मधू जहवां है माखी तहवा,
गुर जहवा तहं चांटा रे।।
केहरानामा में कहारों के जीवन और वैवाहिक वातावरण के माध्यम से कवि ने अपने अध्यात्मिक विचारों को अभिव्यक्त किया है –
या भिनुसारा चलै कंहारा, होता हि पाछिल पहरारे
सखी जी गवहि हुडुक बाजाहिं हंसि के बोला मंहा रे।।
हुडुक तबर को झांझ मंजीरा, बांसुरि महुआ बाज रे।
सेबद सुनावा सखिन्ह गावा, घर- घर महरीं साजै रे।
पुजा पानि दुलहिन आनी, चुलह भा असबारा रे।।
बागन बाजे केवट साजै
या बसंत संसारा रे।
मंगल चारा होइझंकारा
औ संग सेन सेहली रे।
जनु फुलवारी फुलीवारी
जिनकर नहिं रस केली रे।। 
सेंदूर ले- ले मारहिं धै- धै
राति मांति सुभ डोली रे।
भा सुभ मेंसु फुला टेसू,
जनहु फाग होइ होरी रे।।
कहै मुहम्मद जे दिन अनंदा,
सो दिन आगे आवे रे।
है आगे नग रेनि सबहि जग,
दिनहि सोहाग को पखे रे।
“” मसला :”
यह जायसी एक काव्य रचना है। इसके आरंभ में जायसी ने अल्लाह से मन लगाने की बात कही है –
यह तन अल्लाह मियां सो लाई।
जिहि की षाई तिहि की गाई।।
बुधि विद्या के कटक मो हों मन का विस्तार।
जेहि घर सासु तरुणि हे, बहुअन कौन सिंगार।।
जायसी कहते हैं, अगर जीवन को निष्प्रेम भाव से जीवन- निर्वाह किया जाए, तो वह व्यर्थ है, जिस हृदय में प्रेम नहीं, वहाँ ईश्वर का वास नहीं हो सकता है। भला सुने गांव में कोई आता है-
बिना प्रेम जो जीवन निबाहा।
सुने गाऊँ में आवै काहा।।

 

मलिक मुहम्मद जायसी, मलिक वंश के थे। मिस्त्र में मलिक सेनापति और प्रधानमंत्री को कहते थे। खिलजी राज्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चचा को मारने के लिए बहुत से मलिकों को नियुक्त किया था। इस कारण यह नाम इस काल में काफी प्रचलित हो गया। इरान में मलिक जमींदार को कहते हैं। मलिक जी के पूर्वज निगलाम देश इरान से आये थे और वहीं से उनके पूर्वजों की पदवी मलिक थी। मलिक मुहम्मद जायसी के वंशज अशरफी खानदान के चेले थे और मलिक कहलाते थे। तारीख फीरोजशाही में है कि बारह हजार रिसालदार को मलिक कहा जाता था।मलिक मूलतः अरबी भाषा का शब्द है। अरबी में इसके अर्थ स्वामी, राजा, सरदार आदि होते हैं। मलिक का फारसी में अर्थ होता है – “अमीर और बड़ा व्यापारी’। जायसी का पूरा नाम मलिक मुहम्मद जायसी था। मलिक इनका पूर्वजों से चला आया “सरनामा’ है। मलिक सरनामा से स्पष्ट होता है कि उनके पूर्वज अरब थे। मलिक के माता- पिता जापान के कचाने मुहल्ले में रहते थे। इनके पिता का नाम मलिक शेख ममरेज था, जिनको लोग मलिक राजे अशरफ भी कहा करते थे। इनकी माँ मनिकपुर के शेख अलहदाद की पुत्री थी।
 
मलिक का जन्म :-
 
मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म ९०० हिजरी ( सन् १४९२ के लगभग ) हुआ माना जाता है। जैसा कि उन्होंने खुद ही कहा है :-
 
या अवतार मोर नव सदी।
तीस बरस उपर कवि बदी।।
 
कवि की दूसरी पंक्ति का अर्थ यह है कि वे जन्म से तीस वर्ष पीछे अच्छी कविता कहने लगे। जायसी अपने प्रमुख एवं प्रसिद्ध ग्रंथ पद्मावत के निर्माण- काल के संबंध में कहा है :-
 
सन नव सै सत्ताइस अहा।
कथा आरंभ बैन कवि कहा।।
 
इसका अर्थ यह है कि “पदमावत’ की कथा के प्रारंभिक वचन कवि ने सन ९२७ हिजरी ( सन् १५२० ई. के लगभग ) में कहा था। ग्रंथ प्रारंभ में कवि ने “”शाहे वक्त” शेरशाह की प्रशंसा की है, जिसके शासनकाल का आरंभ ९४७ हिजरी अर्थात सन् १५४० ई. से हुआ था। उपर्युक्त बात से यही पता चलता है कि कवि ने कुछ थोड़े से पद्य १५४० ई. में बनाए थे, परंतु इस ग्रंथ को शेरशाह के १९ या २० वर्ष पीछे समय में पूरा किया होगा।
 
 जायसी का जन्म स्थान :-
 
जायसी ने पद्मावत की रचना जायस में की –
 
जाएस नगर धरम् अस्थान।
तहवां यह कबि कीन्ह बखानू।।
 
जायसी के जन्म स्थान के विषय में मतभेद है कि जायस ही उनका जन्म स्थान था या वह कहीं और से आकर जायस में बस गए थे। जायसी ने स्वयं ही कहा है :-
 
जायस नगर मोर अस्थानू।
नगर का नवां आदि उदयानू।।
तहां देवस दस पहुँचे आएउं।ं।।
या बेराग बहुत सुख पाय
 
जायस वालों और स्वयं जायसी के कथानुसार वह जायस के ही रहने वाले थे। पं. सूर्यकांत शास्री ने लिखा है कि उनका जन्म जायस शहर के “कंचाना मुहल्लां’ में हुआ था। कई विद्वानों ने कहा है कि जायसी गाजीपुर में पैदा हुए थे। मानिकपुर में अपने ननिहाल में जाकर रुके थे।
 
डा. वासदेव अग्रवाल के कथन व शोध के अनुसार :-
 
जायसी ने लिखा है कि जायस नगर में मेरा जन्म स्थान है। मैं वहाँ दस दिनों के लिए पाहुने के रुप में पहुँचा था, पर वहीं मुझे वैराग्य हो गया और सुख मिला।
 
इस प्रकार स्पष्ट है कि जायसी का जन्म जायस में नहीं हुआ था, बल्कि वह उनका धर्म-स्थान था और वह वहीं कहीं से आकर रहने लगे थे।

 

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।

 

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।

 


प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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