हिन्दी साहित्य

कबीर :- एक आध्यात्मिक विश्लेषण

Posted on: नवम्बर 2, 2007

 

 
संत कबीर के आविभाव के साथ ही संतकाल का सुत्रपात हो गया था। कबीर दास के शिष्य चरण दास, गरीब दास, मलूक दास आदि कवियों ने अध्यात्म की धारा बहाकर हिंदू- मस्लिम संबंधी विविध प्रसंग लेकर संपूर्ण देश में अराजकता के युग के स्वर्ण युग की संज्ञा दिलाई। इन सभी संतों के काव्य का मूल स्वर अध्यात्म है। सभी संतों ने एक स्वर में घोषणा की कि देश में व्याप्त संकट अराजकता और अन्याय से मुक्ति दिलाने में अध्यात्म ही मदद कर सकता है। इसी के बल पर चलकर देश की प्रगति में सहायक बना जा सकता है।

जिनके सदा अहार अंतर में, केवल संत विचारा।
कहे कबीर सुनो हो गोरख, तारो सहित परिवारा।।

कबीर के अनुसार सत्य विचार ही मूल चीज है , जिसने इस तत्व को स्वीकार किया और उस पर अमल किया, निश्चय ही वह परिवार सहित कल्याण का भागी होगा।

क्या गायें क्या लिखि बतलाये, क्या भ्रमे संसार।
क्या संध्या तपंन के कीन्हें जो नहि तत्व विचारा।।

झूठ बनाने और अनर्थ गर्व करने से कुछ नहीं होने वाला है। इससे सिर्फ भ्रम पैदा होता है। संध्या तपंन से भी कोई लाभ नहीं होता, अगर मन में सत्य विचार नहीं ।

संत मलूक दास ने भी इसी आशय के भाव व्यक्त किये :-

दीन बंधु दीनानाथ, अनाथ की सुधि लीजिए,
कहत है मलूक दास, छोड़ि दे परायी आस
रामधन पाई के अब करके शरण जाइए,
दीनबंधु, दीनानाथ, मेरी सुध लीजिए।

शुद्ध भावना रखकर भगवान की भक्ति करना, उन पर अटल विश्वास रखना और उनकी शरण में अपने को समर्पित कर देना ही, मानव का सच्चा धर्म है। इसी से सत्य की अर्थात परमात्मा की प्राप्ति संभव है।

ज्यू जल और मलिन महा अंत,
रागमिल्या दुई, जाति हि गंगा,
सुंदर, शुद्ध करे तत्काल जु हे,
जग माहि बड़ी सत्संग।।

अर्थात “” मन चंचल है। उसे शांत रखने के लिए साधुओं की संगति अनिवार्य है। अशुद्ध जल भी गंगा में मिलकर, पवित्र बन जाता है। इसी तरह सत्संग के प्रभाव से बुद्धि का परिष्कार होता है तथा दुष्ट प्रकृति का मनुष्य भी गुणवान बन जाता है।

नरहरि चंचल हे मति मेरी,
कैसे भगति कर्रूँ मैं तेरी,
सब घट अंतर रमे निरंतर,
मैं देखन नहीं गाना।

अर्थात्

“”बुद्धि चंचल है, इसलिए भक्ति करने में कठिनाई होती है। अतः आवश्यकता है, इस चंचल मति को शांत करने की, ताकि ध्यान में मन लग सके। इसी घट अर्थात् सबके हृदय के भीतर निरंतर राम का निवास है, लेकिन उन्हें देखने की कला में हम अनभिज्ञ है। अतः ध्यान द्वारा इसे देखने का प्रयास करना चाहिए। सांसारिक संकटों से छूटकारा पाने का यह एक अमोघ अपाय है।

संतनाम संतोष हरिधरि, प्रेम मंगल गावही।
मिसिहि सतगुरु शब्द पाव हि, फिर न भवजल अवाही।

सत्य शब्द को संतोषपूर्वक ग्रहण करके प्रेमपूर्वक मंगलकारी भजन करना चाहिए। इसके लिए सतगुरु की शरण में जाना आवश्यक है।

सतनाम निजु सार हे, सतहि करो विचार,
जो दरिया गुअं गहि रहे, तो मिले शब्द सार।

ज्ञान की प्राप्ति हेतु मार्गदर्शक अर्थात गुरु का होना अत्यावश्यक है। सत्य नाम ही मुख्य चीज है, इसी का चिंतन बराबर होना चाहिए।

कबीर की तरह गुरुनानक ने भी आपसी सद्भाव एवं भाई चारे को बढावा देने पर जोर दिया :-

हरि बिना तेरो कौन सहाई,
तन छूटे कछु संग न जाई,
जहां की तहां रही जाई,
दयाल सदा दुख भंजन,
तासे वेद लगाई। 

 

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