हिन्दी साहित्य

Archive for जनवरी 2008

 

भारत के पश्चिमीभाग मे जैन साधुओ ने अपने मत का प्रचार हिन्दी कविता के माध्यम से किया । इन्होंनेरास” को एक प्रभाव्शाली रचनाशैली का रूप दिया । जैन तीर्थंकरो के जीवन चरित तथावैष्णव अवतारों की कथायें जैन-आदर्शो के आवरण मे रासनाम से पद्यबद्ध की गयी ।अतः जैन साहित्य का सबसे प्रभावशाली रूप रासग्रंथ बन गये । वीरगाथाओं मे रास कोही रासो कहा गया किन्तु उनकी विषय भूमि जैन ग्रंथो से भिन्न हो गई । आदिकाल मे रचितप्रमुख हिन्दी जैन साहित्य का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है–

·     1. उपदेशरसायन रास- यह अपभ्रंश की रचना है एवं गुर्जर प्रदेश में लिखी गई हैं।इसके रचयिता श्री जिनदत्त सूरि हैं। कवि की एक और कृत्ति “कालस्वरुपकुलक१२०० वि.के आसपासकी रही होंगी। यह “अपभ्रंश काव्य त्रयीमेंप्रकाशित है और दूसरा डॉ.दशरथ ओझाऔर डॉ. दशरथ शर्मा के सम्पादन में रास और रासान्वयी काव्य में प्रकाशितकिया गया है।

·     2. भरतेश्वरबाहुबलि रास- शालिभद्र सूरि द्वारा लिखित इस रचना के दो संस्करणमिलते हैं। पहला प्राच्य विद्या मन्दिर बड़ौदा से प्रकाशित किया गया हैतथा दूसरारासऔर रासान्वयीकाव्यमें प्रकाशित हुआ है। कृति में रचनाकाल सं. १२३१वि.दिया हुआ है। इसकी छन्द संख्या २०३ है। इसमें जैन तीर्थकरॠषभदेव के पुत्रोंभरतेश्वर औरबाहुबलि में राजगद्दी के लिए हुए संघर्ष का वण्रनहै।

·     3. बुद्धिरासयह सं. १२४१ के आसपास की रचना है। इसके रचयित शालिभद्रसूरिहैं। कुछ छन्द संख्या ६३ है। यह उपदेश परक रचना है। यह भीरास और रासान्वयी काव्यमेंप्रकाशित है।

·     4. जीवदयारास-यह रचना जालोर पश्चिमी राजस्थान की है। “रास और रासान्वयी काव्यमें संकलित है। इसके रचयिता कवि आसगु हैं। सं. १२५७ वि. में रचित इसरचना में कुल५३ छन्दहैं।

·     5. चन्दरवाला रास-जीवदया रास के रचनाकार आसगु की यह दूसरी रचना है। यह भी १२५७वि. के आसपास की रचना है। यह श्री अगर चन्द नाहटा द्वारा सम्पादितराजस्थानभारतीमें प्रकाशितहै।

·     6. रेवंतगिरि रासयह सोरठप्रदेश की रचना है। रचनाकार श्री विजय सेन सूरि हैं।यह सं.१२८८ वि. के आसपास की रचना मानी जाती है। यह “प्राचीन गुर्जर काव्यमेंप्रकाशितहै।

·     7. नेतिजिणद रास या आबू रास- यह गुर्जर प्रदेश की रचना है। रचनाकार पाल्हण एवंरचना काल सं. १२०९ वि. है।

·     8. नेमिनाथरास- इसके रचयिता सुमति गण माने जाते हैं। कवि की एक अन्य कृति गणधरसार्ध शतक वृत्ति सं. १२९५ की है। अतः यह रचना इस तिथि के आसपास कीरहीहोगी।

·     9. गयसुकमाल रास- यह रचना दो संस्करणों में मिली है। जिनके आधर पर अनुमानतःइसकी रचना तिथि लगभग सं. १३०० वि. मानी गई है। इसके रचनाकार देल्हणिहै। श्रीअगरचन्द नाहटाद्वारा सम्पादित “राजस्थान भारतीपत्रिकामें प्रकाशित है तथादूसरा
संस्करण “रास और रासान्वयीकाव्यमें है।

·     10. सप्तक्षेत्रिसु रास- यह रचना गुर्जर प्रदेश की है। तथा इसका रचना काल सं.१३२७ वि. माना जाता है।

·     11. पेथड़रास- यह गुर्जर प्रदेश की रचना है। रचना मंडलीकहैं।

·     12. कच्छूलिरास- यह रचना भी गुर्जर प्रदेश के अन्तर्गत है। रचना की तिथि सं.१३६३ वि. मानी जाती है।

·     13. समरा रासयह अम्बदेव सूरि की रचना है। इसमें सं. १३६१ तक की घटनाओं काउल्लेख होने से इसका रचनाकाल सं. १३७१ के बाद माना गया है। यह पाटणगुजरात की रचनाहै।

·     14. पं पडवरास- शालिभद्र सूरि द्वारा रचित यह कृति सं. १४१० की रचना है। यह भीगुर्जर की रचना है। इसमें विभिन्न छन्दों की ७९५ पंक्तियाहैं।

·     15. गौतमस्वामी रास- यह सं. १४१२ की रचना है। इसके रचनाकार विनय प्रभुउपाध्यायहै।

·     16. कुमारपाल रास- यह गुर्जर प्रदेश की रचना है। रचनाकाल सं. १४३५ के लगभग काहै। इसके रचनाकार देवप्रभ हैं।

·     17. कलिकालरास- इसके रचयिता राजस्थान निवासी हीरानन्द सूरि हैं। यह सं. १४८६की रचना है।

·    १८ श्रावकाचार- देवसेन नामकप्रसिद्ध जैन आचार्य ने ९३३ ई. मे इस काव्य की रचना की । इसके २५० दोहो मे श्रावकधर्म का प्रतिपादन किया है।

 

 

 

 

बाबा नागार्जुन   nagarjun.jpg

बाबा नागार्जुन को भावबोध और कविता के मिज़ाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है. वैसे, यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है. उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ाव तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है. उनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है. मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी उनके लिए इसी उद्देश्य में सहायक रहा है. उनका गतिशील, सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन उनके काव्य में जीवंत रूप से प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है. नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं.
बाबा नागार्जुन ने जब लिखना शुरू किया था तब हिन्दी साहित्य में छायावाद उस चरमोत्कर्ष पर था, जहाँ से अचानक तेज ढलान शुरू हो जाती है, और जब उन्होंने लिखना बंद किया तब काव्य जगत में सभी प्रकार के वादों के अंत का दौर चल रहा था. बाबा अपने जीवन और सर्जन के लंबे कालखंड में चले सभी राजनीतिक एवं साहित्यिक वादों के साक्षी रहे, कुछ से संबद्ध भी हुए, पर आबद्ध वह किसी से नहीं रहे. उनके राजनीतिक ‘विचलनों’ की खूब चर्चा भी हुई. पर कहने की जरूरत नहीं कि उनके ये तथाकथित ‘विचलन’ न सिर्फ जायज थे बल्कि जरूरी भी थे. वह जनता की व्यापक राजनीतिक आकांक्षा से जुड़े कवि थे, न कि मात्र राजनीतिक पार्टियों के संकीर्ण दायरे में आबद्ध सुविधाजीवी कामरेड. कोई राजनीतिक पार्टी जब जनता की राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के मार्ग से विचलित हो जाए तो उस राजनीतिक पार्टी से ‘विचलित’ हो जाना विवेक का सूचक है, न कि ‘विपथन’ का. प्रो. मैनेजर पांडेय ने सही टिप्पणी की है कि
एक जनकवि के रूप में नागार्जुन खुद को जनता के प्रति जवाबदेह समझते हैं, किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं. इसलिए जब वे साफ ढंग से सच कहते हैं तो कई बार वामपंथी दलों के राजनीतिक और साहित्यिक नेताओं को भी नाराज करते हैं. जो लोग राजनीति और साहित्य में सुविधा के सहारे जीते हैं वे दुविधा की भाषा बोलते हैं. नागार्जुन की दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है…..यही कारण है कि खतरनाक सच साफ बोलने का वे खतरा उठाते हैं.
अपनी एक कविता “प्रतिबद्ध हूँ” में उन्होंने दो टूक लहजे में अपनी दृष्टि को स्पष्ट किया है-
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ-
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त-
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ
अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के खिलाफ
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए
अपने आप को भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की खातिर
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!
नागार्जुन का संपूर्ण काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि उनकी यह प्रतिबद्धता हमेशा स्थिर और अक्षुण्ण रही, भले ही उन्हें विचलन के आरोपों से लगातार नवाजा जाता रहा. उनके समय में छायावाद, प्रगतिवाद, हालावाद, प्रयोगवाद, नयी कविता, अकविता, जनवादी कविता और नवगीत आदि जैसे कई काव्य-आंदोलन चले और उनमें से ज्यादातर कुछ काल तक सरगर्मी दिखाने के बाद चलते बने. पर बाबा की कविता इनमें से किसी ‘चौखटे’ में अँट कर नहीं रही, बल्कि हर ‘चौखटे’ को तोड़कर आगे का रास्ता दिखाती रही. उनके काव्य के केन्द्र में कोई ‘वाद’ नहीं रहा, बजाय इसके वह हमेशा अपने काव्य-सरोकार ‘जन’ से ग्रहण करते रहे. उन्होंने किसी बँधी-बँधायी लीक का निर्वाह नहीं किया, बल्कि अपने काव्य के लिए स्वयं की लीक का निर्माण किया. इसीलिए बदलते हुए भावबोध के बदलते धरातल के साथ नागार्जुन को विगत सात दशकों की अपनी काव्य-यात्रा के दौरान अपनी कविता का बुनियादी भाव-धरातल बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई. “पछाड़ दिया मेरे आस्तिक ने” जैसी कविता में ‘बाबा का काव्यात्मक डेविएशन’ भी सामान्य जनोचित है और असल में, वही उस कविता के विशिष्ट सौंदर्य का आधार भी है. उनकी वर्ष 1939 में प्रकाशित आरंभिक दिनों की एक कविता ‘उनको प्रणाम’ में जो भाव-बोध है, वह वर्ष 1998 में प्रकाशित उनके अंतिम दिनों की कविता ‘अपने खेत में’ के भाव-बोध से बुनियादी तौर पर समान है. आज इन दोनों कविताओं को एक साथ पढ़ने पर, यदि उनके प्रकाशन का वर्ष मालूम न हो तो यह पहचानना मुश्किल होगा कि उनके रचनाकाल के बीच तकरीबन साठ वर्षों का फासला है. जरा इन दोनों कविताओं की एक-एक बानगी देखें-
जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम
जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर!
– उनको प्रणाम!
और ‘अपने खेत में’ कविता का यह अंश देखें-
अपने खेत में हल चला रहा हूँ
इन दिनों बुआई चल रही है
इर्द-गिर्द की घटनाएँ ही
मेरे लिए बीज जुटाती हैं
हाँ, बीज में घुन लगा हो तो
अंकुर कैसे निकलेंगे!
जाहिर है
बाजारू बीजों की
निर्मम छँटाई करूँगा
खाद और उर्वरक और
सिंचाई के साधनों में भी
पहले से जियादा ही
चौकसी बरतनी है
मकबूल फिदा हुसैन की
चौंकाऊ या बाजारू टेकनीक
हमारी खेती को चौपट
कर देगी!
जी, आप
अपने रूमाल में
गाँठ बाँध लो, बिल्कुल!!
बाबा की कविताएँ अपने समय के समग्र परिदृश्य की जीवंत एवं प्रामाणिक दस्तावेज हैं. उदय प्रकाश ने सही संकेत किया है कि बाबा नागार्जुन की कविताएँ प्रख्यात इतिहास चिंतक डी.डी. कोसांबी की इस प्रस्थापना का कि ‘इतिहास लेखन के लिए काव्यात्मक प्रमाणों को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए’ अपवाद सिद्ध होती हैं. वह कहते हैं कि ‘हम उनकी रचनाओं के प्रमाणों से अपने देश और समाज के पिछले कई दशकों के इतिहास का पुनर्लेखन कर सकते हैं.’ कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह का दावा बीसवीं सदी के किसी भी दूसरे हिन्दी कवि के संबंध में नहीं किया जा सकता, स्वयं निराला के संबंध में भी निश्चिंत होकर नहीं. बाबा को अपनी बात कहने के लिए कभी आड़ की जरूरत नहीं पड़ी और उन्होंने जो कुछ कहा है उसका संदर्भ सीधे-सीधे वर्तमान से लिया है. उनकी कविता कोई बात घुमाकर नहीं कहती, बल्कि सीधे-सहज ढंग से कह जाती है. उनके अलावा, आधुनिक हिन्दी साहित्य में इस तरह की विशेषता केवल गद्य-विधा के दो शीर्षस्थ लेखकों, आजादी से पूर्व के दौर में प्रेमचन्द और आजादी के बाद के दौर में हरिशंकर परसाई, में रेखांकित की जा सकती है. बाबा की कविताओं में यह खासियत इसीलिए भी आई है कि उनका काव्य-संघर्ष उनके जीवन-संघर्ष से तदाकार है और दोनों के बीच किसी ‘अबूझ-सी पहेली’ का पर्दा नहीं लटका है मुक्तिबोध की कविताओं के विचार-धरातल की तरह. उनका संघर्ष अंतर्द्वंद्व, कसमसाहट और अनिश्चितता भरा संघर्ष नहीं है, बल्कि खुले मैदान का, निर्द्वन्द्व, आर-पार का खुला संघर्ष है और इस संघर्ष के समूचे घटनाक्रम को बाबा मानो अपनी डायरी की तरह अपनी कविताओं में दर्ज करते गए हैं.
बाबा ने अपनी कविताओं का भाव-धरातल सदा सहज और प्रत्यक्ष यथार्थ रखा, वह यथार्थ जिससे समाज का आम आदमी रोज जूझता है. यह भाव-धरातल एक ऐसा धरातल है जो नाना प्रकार के काव्य-आंदोलनों से उपजते भाव-बोधों के अस्थिर धरातल की तुलना में स्थायी और अधिक महत्वपूर्ण है. हालाँकि उनकी कविताओं की ‘तात्कालिकता’ के कारण उसे अखबारी कविता कहकर खारिज करने की कोशिशें भी हुई हैं, लेकिन असल में, यदि एजरा पाउंड के शब्दों में कहें तो नागार्जुन की कविता ऐसी ख़बर (news) है जो हमेशा ताज़ा (new) ही रहती है. वह अखबारी ख़बर की तरह कभी बासी नहीं होती. उनकी कविता के इस ‘टटकेपन’ का कारण बकौल नामवर सिंह ‘व्यंग्य की विदग्धता’ है. नामवर सिंह कहते हैं-
व्यंग्य की इस विदग्धता ने ही नागार्जुन की अनेक तात्कालिक कविताओं को कालजयी बना दिया है, जिसके कारण वे कभी बासी नहीं हुईं और अब भी तात्कालिक बनी हुई हैं…..इसलिए यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिन्दी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नहीं हुआ. नागार्जुन के काव्य में व्यक्तियों के इतने व्यंग्यचित्र हैं कि उनका एक विशाल अलबम तैयार किया जा सकता है.
दरअसल, नागार्जुन की कविताओं को अख़बारी कविता कहने वाले शायद यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी तात्कालिकता में ही उनके कालजयी होने का राज छिपा हुआ है और वह राज यह है कि तात्कालिकता को ही उन कविताओं में रचनात्मकता का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है. उनकी कई प्रसिद्ध कविताएँ जैसे कि इंदुजी, इंदुजी क्या हुआ आपको‘, ‘आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी‘, ‘अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन‘ और तीन दिन, तीन रात आदि इसका बेहतरीन प्रमाण हैं. असल में, बात यह है कि नागार्जुन की कविता, जैसा कि कई अन्य महान रचनाकारों की रचनाओं के संबंध में भी कहा गया है, आम पाठकों के लिए सहज है, मगर विद्वान आलोचकों के लिए उलझन में डालने वाली हैं. ये कविताएँ जिनको संबोधित हैं उनको तो झट से समझ में आ जाती हैं, पर कविता के स्वनिर्मित प्रतिमानों से लैस पूर्वग्रही आलोचकों को वह कविता ही नहीं लगती. ऐसे आलोचक उनकी कविताओं को अपनी सुविधा के लिए तात्कालिक राजनीति संबंधी, प्रकृति संबंधी और सौंदर्य-बोध संबंधी आदि जैसे कई खाँचों में बाँट देते हैं और उनमें से कुछ को स्वीकार करके बाकी को खारिज कर देना चाहते हैं. वे उनकी सभी प्रकार की कविताओं की एक सर्वसामान्य भावभूमि की तलाश ही नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी आँखों पर स्वनिर्मित प्रतिमानों से बने पूर्वग्रह की पट्टी बँधी होती है.
बाबा के लिए कवि-कर्म कोई आभिजात्य शौक नहीं, बल्कि ‘खेत में हल चलाने’ जैसा है. वह कविता को रोटी की तरह जीवन के लिए अनिवार्य मानते हैं. उनके लिए सर्जन और अर्जन में भेद नहीं है. इसलिए उनकी कविता राजनीति, प्रकृति और संस्कृति, तीनों को समान भाव से अपना उपजीव्य बनाती है. उनकी प्रेम और प्रकृति संबंधी कविताएँ उसी तरह भारतीय जनचेतना से जुड़ती हैं जिस तरह से उनकी राजनीतिक कविताएँ. बाबा नागार्जुन, कई अर्थों में, एक साथ सरल और बीहड़, दोनों तरह के कवि हैं. यह विलक्षणता भी कुछ हद तक निराला के अलावा बीसवीं सदी के शायद ही किसी अन्य हिन्दी कवि में मिलेगी! उनकी बीहड़ कवि-दृष्टि रोजमर्रा के ही उन दृश्यों-प्रसंगों के जरिए वहाँ तक स्वाभाविक रूप से पहुँच जाती है, जहाँ दूसरे कवियों की कल्पना-दृष्टि पहुँचने से पहले ही उलझ कर रह जाए! उनकी एक कविता ‘पैने दाँतोंवाली’ की ये पंक्तियाँ देखिए-
धूप में पसरकर लेटी है
मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर…
जमना-किनारे
मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
वह भी तो मादरे हिंद की बेटी है
भरे-पूरे बारह थनोंवाली!
यों, बीहड़ता कई दूसरे कवियों में भी है, पर इतनी स्वाभाविक कहीं नहीं है. यह नागार्जुन के कवि-मानस में ही संभव है जहाँ सरलता और बीहड़ता, दोनों एक-दूसरे के इतने साथ-साथ उपस्थित हैं. इसी के साथ उनकी एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है, जिसे डॉ. रामविलास शर्मा ने सही शब्दों में रेखांकित करते हुए कहा है-
नागार्जुन ने लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के संतुलन और सामंजस्य की समस्या को जितनी सफलता से हल किया है, उतनी सफलता से बहुत कम कवि-हिन्दी से भिन्न भाषाओं में भी-हल कर पाए हैं.
बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का तो कहना ही क्या! बाबा उन विरले कवियों में से हैं जो एक साथ कवि-सम्मेलन के मंचों पर भी तालियाँ बटोरते रहे और गंभीर आलोचकों से भी समादृत होते रहे. बाबा के इस जादुई कमाल के बारे में खुद उन्हीं की जुबानी यह दिलचस्प उद्धरण सुनिए-
कवि-सम्मेलनों में बहुत जमते हैं हम. समझ गए ना? बहुत विकट काम है कवि-सम्मेलन में कविता सुनाना. बड़े-बड़ों को, तुम्हारा, क्या कहते हैं, हूट कर दिया जाता है. हम कभी हूट नहीं हुए. हर तरह का माल रहता है, हमारे पास. यह नहीं जमेगा, वह जमेगा. काका-मामा सबकी छुट्टी कर देते हैं हम….. समझ गए ना?
उनकी एक अत्यंत प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’ लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के मणिकांचन संयोग का एक उल्लेखनीय उदाहरण है.
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त.
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद.
इस तरह की बाबा की दर्जनों खूबसूरत कविताएँ हैं जो इस दृष्टि से उनके समकालीन तमाम कवियों की कविताओं से विशिष्ट कही जा सकती हैं. कलात्मक सौंदर्य की कविताएँ शमशेर ने भी खूब लिखी हैं, पर वे लोकप्रिय नहीं हैं. लोकप्रिय कविताएँ धूमिल की भी हैं पर उनमें कलात्मक सौंदर्य का वह स्तर नहीं है जो नागार्जुन की कविताओं में है. बाबा की कविताओं में आखिर यह विलक्षण विशेषता आती कहाँ से है? दरअसल, बाबा की प्राय: सभी कविताएँ संवाद की कविताएँ हैं और यह संवाद भी एकहरा और सपाट नहीं है. वह हजार-हजार तरह से संवाद करते हैं अपनी कविताओं में. आज कविता के संदर्भ में संप्रेषण की जिस समस्या पर इतनी चिंता जताई जा रही है, वैसी कोई समस्या बाबा की कविताओं को व्यापती ही नहीं. सुप्रसिद्ध समकालीन कवि केदारनाथ सिंह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं:
स्वाधीनता के बाद के कवियों में यह विशेषता केवल नागार्जुन के यहाँ दिखाई पड़ती है….यह बात दूसरे प्रगतिशील कवियों के संदर्भ में नहीं कही जा सकती.
बाबा की कविताओं की इसी विशेषता के एक अन्य कारण की चर्चा करते हुए केदारनाथ सिंह कहते हैं कि बाबा अपनी कविताओं में ‘बहुत से लोकप्रिय काव्य-रूपों को अपनाते हैं और उन्हें सीधे जनता के बीच से ले आते हैं.’ उनकी ‘मंत्र कविता’ देहातों में झाड़-फूँक करके उपचार करने वाले ओझा की शैली में है.
ओं भैरो, भैरो, भैरो, ओं बजरंगबली
ओं बंदूक का टोटा, पिस्तौल की नली
ओं डालर, ओं रूबल, ओं पाउंड
ओं साउंड, ओं साउंड, ओं साउंडओम् ओम् ओम्
ओम् धरती, धरती, धरती, व्योम् व्योम व्योम्
ओं अष्टधातुओं की ईंटों के भट्ठे
ओं महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे
ओं दुर्गा दुर्गा दुर्गा तारा तारा तारा
ओं इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा
हरि: ओं तत्सत् हरि: ओं तत्सत्
भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है। उनकी मशहूर कविता “आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी” की ये पंक्तियाँ देखिए:
यह तो नईनई दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोड़ीसी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटेपुराने जाल की!
यही हुई है राय जवाहरलाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
नागार्जुन की भाषा और उनके छंद मौके के अनुरूप बड़े कलात्मक ढंग से बदल जाया करते हैं। यदि हम अज्ञेय, शमशेर या मुक्तिबोध की कविताओं को देखें तो उनमें भाषा इस कदर बदलती नहीं है। ये कवि अपने प्रयोग प्रतीकों और बिम्बों के स्तर पर करते हैं, भाषा की जमीन के स्तर पर नहीं। उनके समकालीन कवि त्रिलोचन शास्त्री ने मुक्तिबोध और नागार्जुन की कविताओं की तुलना करते हुए एक बार कहा था-
मुक्तिबोध की कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी या यूरोप की दूसरी भाषाओं में करना ज्यादा आसान है, क्योंकि उसकी भाषा भले भारतीय है, पर उसमें मानसिकता का प्रभाव पश्चिम से आता है; लेकिन नागार्जुन की कविताओं का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद बहुत कठिन होगा। यदि ऐसी कोशिश भी हो तो तीनचार पंक्तियों के अनुवाद के बादफुटनोटसे पूरा पन्ना भरना पड़ेगा।
यही असल में बाबा की कविताओं के ठेठ भारतीय और मौलिक धरातल की पहचान है, जो उन्हें अपने समकालीन दौर के कई प्रमुख कवियों-जैसे अज्ञेय, शमशेर और मुक्तिबोध से अलग भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। इसी से जुड़ी एक बात और। ये कवि मुख्य रूप से साहित्य के आंदोलनों से, वह भी पश्चिम-प्रेरित आंदोलनों से प्रभावित होकर कविता करते रहे, जबकि नागार्जुन भारतीय जनता के आंदोलनों से प्रेरित और प्रभावित होकर, या यों कहें कि उनमें शामिल होकर कविता करते रहे हैं। बाबा भले ही वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे, परंतु उनकी यह विचारधारा भी नितांत रूप से भारतीय जनाकांक्षा से जुड़ी हुई थी। यही कारण है कि वर्ष 1962 और 1975 में जब अधिकांश भारतीय ‘कम्यूनिस्ट’ रहस्यमय चुप्पी साधकर बैठे रहे थे, तब बाबा ने उग्र जनप्रतिक्रिया को अपनी कविताओं के माध्यम से स्वर दिया था। इन्हीं मौकों पर बाबा ने ‘‘पुत्र हूँ भारत माता का”, ‘‘और कुछ नहीं, हिन्दुस्तानी हूँ महज”, ‘’क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक”, ‘’कम्युनिज्म के पंडे”, “कट्टर कामरेड उवाच” तथा “इन्दुजी, इन्दुजी क्या हुआ आपको” जैसी कविताएँ लिखी थीं।
बाबा की कविताओं की भाव-भूमि प्रयोगवादी और नई कविता की भाव-भूमि से काफी भिन्न है, क्योंकि इन प्रवृत्तियों की ज्यादातर कविताएँ समाज-निरपेक्ष और आत्मपरक हैं, जबकि बाबा की कविताएँ समाज-सापेक्ष और जनोन्मुख हैं। उनके समकालीन कवियों की रचनाओं के संदर्भ में देखने पर यह बात ज्यादा साफ तौर पर समझ में आती है कि बाबा की कविता का बदलते भाव-बोध के बदलते धरातल के साथ किस तरह का रिश्ता रहा है, अर्थात् यह उन सबसे किस हद तक जुड़ती है और किस हद तक अलग होती है।
अज्ञेय और शमशेर जैसे कवियों की रचनाएँ कलावादी (art for art’s sake) भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित हैं, जबकि नागार्जुन की कविताएँ जीवनवादी (art for life’s sake) भाव-भूमि पर। यह अंतर इन दोनों तरह की कविताओं के कथ्य, शिल्प और भाषा-तीनों स्तर पर देखा जा सकता है। निराला की उत्तरवर्ती दौर वाली कुछ कविताएँ, जैसे ‘कुकुरमुत्ता’ और ‘तोड़ती पत्थर’ भी जनवादी भाव-भूमि के करीब हैं। दोनों का मूल स्वर प्रगतिशील चेतना से सरोकार रखता है। निराला जहाँ खत्म करते हैं, बाबा वहाँ से शुरू करते हैं।
रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा की कविताओं की भाव-भूमि बुनियादी रूप से बाबा की कविताओं से भिन्न है और यह भिन्नता मूलत: प्रतिबद्धता एवं सरोकार से संबंधित है। फिर भी, इन तीनों कवियों की काव्य-चेतना के बीच एक अंतर्संबंध भी है, जिसे रेखांकित करते हुए इब्बार रब्बी कहते हैं-
वह समाज जो आदमी का शोषण कर रहा है, उसकी मानसिकता को उजागर करते हैं अप्रत्यक्ष रूप से श्रीकांत वर्मा; उसके स्रोतों की पोल खोलते हैं रघुवीर सहाय; और उससे लड़ना सिखाते हैं नागार्जुन।
इस अंतर और अंतर्संबंध को इससे भी बेहतर ढंग से समझने के लिए इन तीनों कवियों का वर्ष 1975 के ‘आपातकाल’ के प्रति नजरिया देखना महत्वपूर्ण होगा। श्रीकांत वर्मा आपातकाल के पक्ष में खड़े थे; रघुवीर सहाय ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ जैसी कविताओं के माध्यम से सांकेतिक प्रतिवाद कर रहे थे; जबकि बाबा नागार्जुन न सिर्फ तीखे तेवर वाली कविताएँ लिखकर, बल्कि स्वयं आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेकर और जेल की सज़ा भुगतकर आपातकाल का विरोध कर रहे थे। इसी तरह यदि हम मुक्तिबोध की कविता से बाबा की कविताओं की तुलना करें तो पाते हैं कि मुक्तिबोध की कविता गहन विचारशीलता और स्वातंत्र्योत्तर भारत के मध्यवर्गीय चरित्र में निहित सुविधाजीविता और आदर्शवादिता के बीच के अंतर्द्वन्द्व की कविता है, जिसमें आम आदमी का संघर्ष आत्मसंघर्ष के रूप में है। मुक्तिबोध अपने समय के संघर्षों से सैद्धांतिक स्तर पर जुड़ते हैं, दार्शनिक अंदाज में। जबकि नागार्जुन की कविता ‘अनुभवजन्य भावावेग से प्रेरित’ है और आत्म-संघर्ष की बजाय खुले संघर्ष के स्वर में है। वह अपने समय के संघर्षों से व्यावहारिक धरातल पर जुड़ते हैं, एक सक्रिय योद्धा की तरह।
बाबा की कविताएँ सौंदर्य के भाव-बोध और भाषा-शैली आदि के स्तर पर सबसे अधिक केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन शास्त्री की कविताओं की भाव-भूमि के करीब हैं। इन तीनों कवियों के बुनियादी संस्कार और सरोकार काफी हद तक एक जैसे हैं और इसी वजह से तीनों एक धारा के कवि माने जाते हैं। फिर भी, बाबा की कविताएँ बाबा की कविताएँ हैं और वे केदार एवं त्रिलोचन की कविताओं की तुलना में अपनी अलग छाप छोड़ती हैं।
मुझे उनकी एक कविता ‘बादल को घिरते देखा है’ स्कूल के दिनों से याद है। कुछ पंक्तियाँ सुनिए:
अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटेछोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहीन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्तमधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
उनका मैथिली गीत, “श्यामघटा, सित बीजुरि-रेह” भी मुझे अति प्रिय है:
श्याम घटा, सित बीजुरिरेह
अमृत टघार राहु अवलेह
फाँक इजोतक तिमिरक थार
निबिड़ विपिन अति पातर धार
दारिद उर लछमी जनु हार
लोहक चादरि चानिक तार
देखल रहि रहि तड़ितविलास
जुगुलकिशोरक उन्मद रास

 

सन्दर्भ – सृजन शिल्पी

 

आज नारी विमर्श के स्तर पर नारी चेतना से संपन्न हिंदी उपन्यास लिखे जा रहे हैं, जिसमें नारी की आत्मा, स्व और अहं ध्वनित है। वास्तव में चेतना का अर्थ विचारों, अनुभूतियों, संकल्पों की आनुषांगिक दशा, स्थिति अथवा क्षमता से है। उसका संबंध नारी की स्वयं की पहचान या किसी भी स्तर पर विषयगत अनुभवों के संगठित स्वरूप से होता है। नारी विमर्श और चेतना के विकास का ही परिणाम है कि नारी आज सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यावसायिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में पुरुष के समान ही नहीं बल्कि पुरुष से आगे बढकर अपनी निःशंक सेवाएं दे रही हैं। नारी चेतना का ही चरम है, जहाँ वह यह कहती है- ??मैं उन औरतों में नहीं हूँ, जो अपने व्यक्तित्व का बलिदान करती है, जिनकी कोई मर्यादा और शील नहीं होता है। मैं न उनमें हूँ, जिनके चरित्र पर पुरुष की हवा लगते ही खराब हो जाते हैं और न पति की गुलामी को सच्चरित्रा का प्रमाण मानती हैं। मुझमें आत्मनिर्भरता भी है और आत्मविश्वास भी। मुझे स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है तो पति और परिवार के साथ सामंजस्य बनाने की शक्ति भी। अतः जीवन के यथार्थ को स्वीकार करने में कोई झिझक भी नहीं है।
नारी के आत्म-बोध, आत्मनिर्भरता एवं आत्मविश्वास के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी के आधुनिक उपन्यासों में जो नारी चरित्र उभरकर आए हैं उन्हें तीन वर्गों में – उच्च, मध्य और निम्न – विभाजित कर देखा जा सकता है। नारी इनमें से किसी भी वर्ग चरित्र में हो, वह अपनी पहचान बनाती है। पहले वर्ग में यदि वह डॉक्टर, प्राध्यापक, अधिकारी, नेता है तो वह विद्रोह और रुढयों को चुनौती देती हुई महत्त्वाकांक्षिणी के रूप में चित्रित है। मध्यवर्गीय चरित्र के रूप में नारी दोहरे मानदंडों से जूझते हुए झूठी इज्जत के कारण अनेक कष्ट भोगने के लिए बाध्य है, यद्यपि वह शिक्षित है, परंतु समाज की झूठी रूढयों में फँसकर अपनी बौद्विकता से दूर रहकर समाज के अनुरूप खुद को ढालने के लिए विवश है। लेकिन तीसरे वर्ग का नारी चरित्र आज सर्वाधिक सशक्त है, वह विद्रोह और रूढयो को खुलकर चुनौती दे रहा है तथा समाज के बंधनों और मर्यादा की परवाह न करके अपनी आत्मा और स्वाभिमान की रक्षा करता है।
यहीं पर उच्च मध्यवर्गीय चरित्र भी उभरता है। शिक्षित नारी चरित्र समाज और स्वयं के व्यवहार के बीच कहीं खाई पाटता है तो कहीं अहम् की तीव्रता के कारण अपने पारिवारिक संदर्भों और मूल्यों को विघटित करता है। यद्यपि यह चरित्र आर्थिक स्तर पर सुदृढ स्थिति में है और रोजी-रोटी की समस्याएं इन्हें नहीं घेरती हैं। इस वर्ग के पात्रों में प्रमुख नारी चरित्र मालतीदेवी (काली आँधी), महरूख (ठीकरे की मॅगनी), शाल्मली (शाल्मली), शीला भट्टारिका (शीला भट्टारिका) आदि है। इस रूढवादी और विद्रोही नारी चरित्र की परिकल्पना नासिरा शर्मा ने शाल्मली के रूप में की है। वह विवाह के निर्णय से लेकर अंत तक समाज की मर्यादाओं का निर्वाह करती है। पढने की शौकीन शाल्मली विवाहोपरांत प्रशासनिक सेवा में चयन के बाद भी घर-परिवार की मर्यादाओं को ओढे रहती है किंतु प्रत्येक वस्तु के लिए पति के आगे हाथ पसारने के संदर्भ में खुला विरोध करती है। गिरिराज किशोर के उपन्यास तीसरी सत्ता की डॉक्टर शिक्षित होकर रूढयों की शिकार होकर अपने बद्मिजाज एवं पति की क्रूरता के कारण अपने स्वाभिमान गला घोंटकर आत्महंता बन जाती है।२ जबकि ठीकरे की मँगनी की महरुख मुसलिम परिवार की शिक्षिता युवती है। अपने मंगेतर रफत के शोधकार्य हेतु बाहर जाने और किसी अन्य से विवाह कर लेने पर उसमें परिवर्तन आ जाता है और रफत के लौटने पर निकाह के आग्रह को ठुकराकर अपने बाल्यकाल के साथी को शौहर बनाकर सारी रूढयाँ तोडकर दिल्ली चली जाती है।३ काली आँधी की नायिका मालती सामाजिक मर्यादाओं और रूढयों को तोडकर राजनेता के रूप में पद एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करती है तथा अपनी उन्नति के मार्ग में न अपने पति को आने देती है और न अपनी पुत्री लिली को।४
आधुनिक हिंदी उपन्यासों में पारंपरिक आदर्शवादी और यथार्थवादी नारी चरित्रों का अभाव नहीं है। ऐसे पात्र पारंपरिक आदर्शवादिता और यथार्थ को एक साथ जीते हैं। पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति तथा वैज्ञानिकता और शिक्षा प्रसार के कारण सामाजिक बंधनों की शिथिलता और स्वतंत्र चिंतन ने मानव व्यक्तित्व में परिवर्तन भी दर्शाया है तथा आदमी का अहम् भी व्यापक हुआ है। परिणामतः नारी की अहंता बढती दिखाई देती है इसलिए इन नारी चरित्रों में नौकरी की ललक, वैवाहिक संबंधों की शिथिलता, पारिवारिक विघटन का उल्लेख समाहित हो गया है। शाल्मली प्रशासनिक सेवा में चयन होने पर अपना वैवाहिक जीवन विघटित पाती है क्योंकि उसकी महत्त्वाकांक्षाएं उसे आगे जाने के लिए प्रेरित करती हैं। उसके अंदर का आदर्शवाद ही पारिवारिक विघटन से उसे बचा पाता है।५ तीसरी सत्ता की लेडी डॉक्टर के चरित्र की उपलब्धि पारिवारिक जीवन में घुटन और विवशता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।६ परम्पराएं न तो रूढयाँ हैं और न संस्कारों का भार होती हैं और न उन्हें ओढा जाता है। यही कारण है कि परंपरागत मुस्लिम परिवार की महरुख लीक से हटकर आधुनिक बनते बनते अपनी पहचान बना लेती है।७
समाज में आदर्श एवं यथार्थ दोनों की अपनी विशेषताएं हैं और उनके बीच ही विसंगतियों का विकास होता है। सामाजिक आदर्श की अपेक्षा यथार्थ की ओर व्यक्ति का झुकाव होता है और वह परंपरागत रूढयों एवं मान्यताओं को तोडने को कटिबद्ध होता है। आधुनिक उपन्यासों के नारी चरित्रों में एक संघर्षात्मक स्थिति का चित्रण उपन्यासकारों ने किया है। महरुख का रफत के साथ विवाह से पहले जाना मुस्लिम परंपरा के विरुद्ध है किंतु बदली हुई परिस्थितियों में शिक्षा देते जाने में परंपरा की परवाह नहीं की है। इसी प्रकार काली आँधी की मालती का घर की दीवारों से बाहर आना, नेता बनना आदि तत्कालीन यथार्थवादी परिस्थितियों की देन है। तभी यह चरित्र सफल नेता के रूप में समाज की उपलब्धि है। शाल्मली का चरित्र भी यथार्थ रूप में उभरता है। वह अपने पति को इज्जत देती है किंतु कर्त्तव्य के बीच में आने पर यथार्थ का बोध कराते हुए कह देती है- सभी औरतें यदि इस प्रकार अर्जी देने लगें तो हो चुका काम। वह पति की नहीं, सरकार की नौकरी है…..।८
आधुनिक उपन्यासों में कुछ चरित्र घरेलू, कामकाजी, अंतर्मुखी और वस्तुगत (सब्जेक्टिव) हैं। उच्चमध्यवर्गीय नारी चरित्रों के रूप में उन्हें देखा जा सकता है ये नारी चरित्र शिक्षित, योग्य एवं विकास की संभावनाएं लिए हैं तथा घर और बाहर दोनों को संभाल रखे हैं। पद पाकर भी अपने परिवार के प्रति उनमें सजगता है तो अपने केरियर के प्रति भी और कर्त्तव्य के प्रति भी। तीसरी सत्ता की लेडी डाक्टर कामकाजी होकर भी घरेलू है और अंतर्मुखी है। शाल्मली अपने सरकारी पद और पति एवं परिवार का ध्यान रखती है। वह अपने घर एवं बाहर में सामंजस्य बनाए रखती है तथा अंतर्मुखी है। काली आँधी की मालती का व्यक्त्तित्व राजनीति में बिखरता दिखाई देता है। वह घर और बाहर में सामंजस्य न रखकर बाहर की ओर वस्तुगत जीवन को स्वीकार कर लेती है। अतः उसके दाम्पत्य संबंधों में भी टकराव होता है। मिथिलेशकुमारी मिश्र के उपन्यास शीलाभट्टारिका की शीला का सोच अधिक परिपक्व है तथा नारी चेतना का प्रसार रहते हुए भी वह कामकाजी एवं घरेलू नारी चरित्र है।९
मध्यवर्ग के नारी चरित्र मूलतः शिक्षित, पारंपरिक और विद्रोही तो हैं ही, पर इनमें अशिक्षित नारी चरित्र भी हैं। यद्यपि मध्यवर्ग में वर्ग चेतना का रूप सबसे कम लक्षित होता है। इस वर्ग में व्यावसायिक मित्रता, आर्थिक स्थिति और भूमिका में भिन्नता भी द्रष्टव्य है। पर यह वर्ग-चेतना अंतर्मुखी है। आधुनिक उपन्यास के अध्ययन से यह देखा जा सकता है कि इन नारी चरित्रों के पास सीमित साधन होते हुए भी अधिक से अधिक अच्छे ढंग से जीना चाहते हैं तथा वे महत्त्वाकांक्षी भी हैं। कर्क रेखा (शशि प्रभा शास्त्री) की तनु शिक्षित है और भारतीय संस्कारों के पारंपरिक स्वरूप को समझने का प्रयास करती है। शेषयात्रा (उषा प्रियंवदा) की अनुष्का प्रणय के साथ प्रेम-बंधन में बँधती है। वह शिक्षित है और नारी चेतना का विकास उसमें परिलक्षित होता है। शेफाली (शेफाली) शिक्षित एवं भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के अस्वीकार के साथ अपने व्यक्तित्व को प्रमुखता देती है। इसमें उस नारी चरित्र का विद्रोही रूप उभरकर आता है।
?उम्र एक गलियारे की? (शशि प्रभा शास्त्री) की नायिका सुनंदा शिक्षित परंपरागत एवं विद्रोहिणी नारी है। वह भारतीय परंपराओं का निर्वाह करती है, वहीं आत्मबोध से परिपूर्ण है। शेषयात्रा (उषाप्रियवंदा) की अनुष्का, अंधेरा उजाला (विष्णु पंकज) की तारिका-दोनों ही शिक्षित, पारंपरिक एवं विद्रोहिणी हैं। उनके विद्रोह में परिस्थितियों और परिवेश ही कारण बनते हैं। विवाह भी परंपरा और विद्रोह के स्तर पर उभरता है। नारी चेतना के परिप्रेक्ष्य में इन चरित्रों में नारी चेतना के विकास के समानांतर भारतीय संस्कार एवं परंपराएं भी चरित्र निर्मात्री शक्ति बनती है।
मध्यवर्गीय नारी चरित्रों में घरेलू, कामकाजी, वैयक्तिकता, सामाजिकता आदि का अंतःसंघर्ष उभरता है। मध्यवर्गीय ये नारी चरित्र प्रायः काम-काजी हैं, जो उनके जीवन के लिए मजबूरी है। अतः घर और बाहर दोनों ही क्षेत्रों में काम संभालते-संभालते थक जाती हैं। बेघर (ममता कालिया) की नायिका मानसिक परेशानियों से बचने के लिए घर से निकलकर भागा-दौडी के कारण जीवन का सर्वस्व समाप्त कर लेती है। पतझड की आवाजें (निरूपमा सेवती) की नायिका शिक्षित होने के साथ अपनी विशिष्ट भावनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं के सूप में बॉयफ्रैण्ड की रेस्पेक्ट भी मेंटेन नहीं कर पाती।१० क्योंकि उसकी मध्यवर्गीय नैतिक चेतना चरमराने
लगती है।
वैयक्तिकता और सामाजिकता के अंतःसंघर्ष के कारण इच्छाओं और परिस्थितियों का प्रभाव व्यक्तित्व, नैतिकता, वैचारिकता पर पडता है। त्रिकोण (नरेशकुमार शर्मा) की लोरेन, बेघर (ममता कालिया) की नायिका अग्निगर्भा (अमृतलाल नागर) की सीता, एक चिथडा सुख और ?मुट्ठीभर रोशनी (दीप्ति कुलश्रेष्ठ) की नायिकाएं वैयक्तिकता ओर सामाजिकता से संघर्ष ही नहीं करती, वरन् अपने अस्तित्व का संघर्ष भी झेलती है। कोरजा (मेहरूनिस्सा परवेज), अंधेरा-उजाला, सत्तरपार के शिखर (पानू खोलिया) प्रतिध्वनियाँ (दीप्ति खंडेलवाल) आदि के नारी चरित्र सामाजिक नैतिकता से मुक्त व्यक्तिगत नैतिकता पर केंदि्रत होती दिखाई देती हैं।
नारी सम्मान और पारस्परिक संबंधों के जटिल अंतर्विरोध, प्रेम के अंतरंग स्वरूप तथा नारी-महत्त्वाकाक्षाओं ने नारी चरित्र में दोहरे व्यक्तित्व का निरूपण करने के लिए उपन्यासकार को बाध्य किया है। मध्यवर्गीय नारी चरित्र एक प्रकार से अंतर्मुखी चेतना का विकास द्रष्टव्य होता है। अतिशिक्षित एवं बौद्धिक होती नारी अपने सम्मान के प्रति अधिक सजग हो उठी है। परिणामतः समाज में पारस्परिक संबंधों में अंतर्विरोध की स्थितियाँ बढ गई है। यही नहीं, बढती हुई नारी चरित्रों की अंतर्मुखता समाज विरोधी स्थिति बनती है। समाज एवं सामाजिकता को गौण करते हुए व्यक्ति को अधिक प्रतिष्ठा चित्रित की गई है। अग्निगर्भा (अमृतलाल नागर) की नायिका अपना सम्मान बनाए रखने में पग-पग पर अंतर्विरोध से गुजरती है। वह अपनी पसंद का जीवन साथी चाहती है तथा परंपरागत मूल्यों, मान्यताओं और बंधनों को नकारती है।
वैयक्तिक रुचि, स्वतंत्र चेतना, महत्त्वाकांक्षाओं का आग्रह, शिक्षा का प्रभाव अति अहंवादिता ने आधुनिक उपन्यासों के नारी चरित्रों को अपेक्षाकृत अधिक द्वन्द्वी और विद्रोही बना दिया है। परिणामतः पारस्परिक संबंधों में अंतर्विरोध झलकता है। अर्थ-प्रधानता के कारण पति-पत्नी संबंध पिता-पुत्री संबंध सभी पर इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। अंधेरा-उजाला, कर्करेखा, बेघर, चित-कोबरा, प्रतिध्वनियाँ, शेफाली उपन्यासों में नारी चरित्र नारी-पुरुष संबंधों से कहीं कम दाम्पत्य-संबंधों के रूप में देखते हैं। इन चरित्रों में उभरता विचार मूलतः यही है कि- विवाह अपनी जगह है तथा घर के बाहर के प्रेम संबंध अपनी जगह।? इन चरित्र के निष्कर्ष पर यह निष्कर्ष देखा जा सकता है कि इनके मध्य नारी-पुरुष संबंध भावनात्मक आवेग तक सीमित न होकर शारीरिक अपेक्षाओं एवं आवश्यकताओं के रूप में ही सक्रिय हैं।
आधुनिक हिंदी उपन्यासों में नारी चेतना के परिप्रेक्ष्य में अकेलेपन की अब, स्वतंत्र अस्मिता के संघर्ष के प्रति जागरूकता, विवाह, परिवार और समाज के प्रति उनकी भूमिका तथा मानवीय चेतना की प्रतिष्ठा का चित्रण किया गया है। यह अकेलेपन की स्थिति पाश्चात्य संस्कृति की देन ही है, जो परिवेशजन्य परिस्थिति से उत्पन्न होता है क्योंकि भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम् का ही चिंतन रहा है। आज पाश्चात्य चिंतन की आयातित मानसिकता ने अकेलेपन का सूत्रपात किया है। आज अतिपरिचयजन्य कुंठाओं की अतिशयता ने पारस्परिक संबंधों को खोखला कर दिया। व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी बढा दी गई है। यहाँ हमारे अकेलेपन के मूल में औद्योगीकरण, यांंत्रकता की वृद्धि बढती हुई जनसंख्या, बेकारी, आर्थिक संकट, अराजकता और भोगवादी स्थितियों के कारण भी हैं।
मेरे संधिपत्र (सूर्यबाला), कर्करेखा (शशिप्रभाशास्त्री), अग्निगर्भा (नागर) आदि की नायिकाएं सदैव अजनबी बनी रहती हैं, अकेलेपन से परेशान रहती हैं या फिर अपने को निरर्थक मान लेती हैं। इनके लिए विवाह आपस का एडजस्टमेंट भर है। कर्क रेखा की तनु अकेलेपन में ही गुजार देती है। त्रिकोण की लोरेन पितृसमाज की मुहर बनना दासता बताती है। बेघर की नायिका बिना विवाह के ही शारीरिक संबंध स्थापित करती है। तीसरा पुरुष (प्रफुल्ल प्रभाकर) की नायिका विवाहित होकर भी ?शक? के घेरे में बँध कर रह जाती है तथा उसके लिए भावनाएं गौण हो जाती हैं। अग्निगर्भा की सीता मात्र पारिवारिक एवं आर्थिक भोग का साधन है।
आधुनिक काल में नारी के प्रति पुरुष के भाव बदल गया है और नारी ने भी अपने स्वातंय की घोषणा करते हुए समाज से दया नहीं, अपने अधिकारों की माँग की है।११ वास्तव में आज नारी बढते अजनबीपन, विवाह संबंधों में शिथिलता और परिवार एवं समाज में नारी की स्थिति एवं चेतना का किंचित विकास दिखाई देता हैं मध्यवर्गीय नारी के पास न तो अपना व्यक्तित्व है और न उसे आगे बढाने वाला समाज ही। फिर आर्थिक विषमताएं नारी में क्रोध, खीज, निराशा उत्पन्न करती हैं।
सामाजिक यथार्थ, परंपराओं का नवीनीकरण और आधुनिक-बोध निम्नवर्ग की श्रमशक्ति और उसके शोषण को ही निरुपित करते हैं। महानगरीय सभ्यता के बीच गाँव और कस्बों से आए हुए निम्नवर्ग की जिंदगी पिस जाती है। तभी अनारो (मंजुल भगत) की नायिका आधुनिकता और परंपराओं के बीच जूझती है और अपने वर्ग की समस्त विद्रूपताओं एवं संघर्षों के साथ जीवन को रेखांकित करती है। सेवित्तरी (शैलेश मटियानी) की नायिका सुंदर एवं सुशील है और यथार्थ जीवन जीती है। माटी (बचिंत कौर) की भागवंती जमाने भर की ठोकरें खाती है, पर वह किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती है। बसंती (भीष्म साहनी) की नायिका यथार्थ जीवन जीना चाहती है, किसी प्रकार का दबाव वाला नहीं। बुलाकी से विवाह तय किए जाने पर वह दीनू के साथ भाग जाती है, जिसे अपना सर्वस्व मानती है। वास्तव में जीने की अदम्य लालसा उसमें कार्य की प्रखर शक्ति पैदा करती है। निम्न वर्ग के नारी चरित्रों में जीवन मूल्यों एवं नैतिक मर्यादाओं की चिंता नहीं होती है। नैतिक मूल्यों का विघटन, परंपराओं के प्रति विद्रोह, जिजीविषा और अस्तित्व का संघर्ष आधुनिक उपन्यास के नारी चरित्रों में उकेरा गया है क्योंकि नैतिक मान्यताएं उसकी समझ से बाहर हैं। पति द्वारा प्रताडना, पहली पत्नी के होते हुए दूसरी स्त्री ले आना या कुछ रुपयों के लिए अपनी पत्नी को किसी को बेच देना या सोने के लिए बाध्य करना नारी चरित्रों के लिए विशेष परिस्थितियाँ पैदा करती हैं।
बसंती (बसंती) का घर से भागना नैतिक मूल्यों का विघटन है। माटी की भागवंती पति द्वारा प्रताडत है। पति गलत उपयोग कराता है भागवंती का। ढोलन कुंजकली (यादवेंद्र शर्मा चंद्र) की ढोलन का पति अपनी पत्नी के ?जोबन? से कमाकर खाता है और पत्नी का नाच-नंगापन बरदास्त करता है।१२ जनानी ड्योढी (चंद्र) की नायिका को ठाकुर एक बार भोगकर हमेशा के लिए भूल जाते है, पर औरत जनानी ड्योढी में बंद हो जाती है और पुरुष सामीप्य पाने के लिए बाहर से पैसा खर्च कर पुरुषों को बुलाती है।१३ टपरेवाले (कृष्णा अग्निहोत्री) निम्नवर्ग की नारी सुविधा भोगी पुरुष की वासनापूर्ति कर अपने पेट की भूख मिटाती है।१४ डेरेवाले (शैलेश मटियानी) की नारी भी नैतिक मूल्यों का विघटन दर्शाती है क्योंकि देह ही महत्त्व रखती है। डेरेवालों में बेटी सोने का अंडा होती है।१५ नाच्यो बहुत गोपाल (नागर) में निम्नवर्ग (भंगी) के साथ कुलीन लडकी के भागने के पीछे भी परंपराओं के प्रति विद्रोह और अस्तित्व का संघर्ष लिए है।
आधुनिक उपन्यासों में चित्रित नारी चरित्रों में वैयक्तिक रुचि, महत्त्वाकांक्षा स्वतंत्र चेतना, अस्त्तित्व और अस्मिता की पहचान से कहीं अधिक जीवन के दुःखों एवं संघर्षों से परिपूर्ण हैं और उसके समानांतर पीढयों का मोहभंग, टूटन, विघटन, वर्ग संघर्ष की समानांतर चेतना एवं जीवन का अर्थ-बोध उकेरा गया है। यद्यपि यह कहा जा सकता है कि निम्नवर्गीय नारियाँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक विद्रोहिणी हैं और समाज की नैतिक मान्यताओं, रुढयों एवं परंपराओं को तोडने में सजग एवं सक्रिय हैं। बसंती, अनारो इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। खुदा सही सलामत है (रवींद्र कालिया) की गुलाबदई आर्थिक रुप से टूटना नहीं चाहती। यह उसके अपने व्यक्तित्व के प्रति चेतना है, उसमें अपना स्वाभिमान है। उसमें मूक विद्रोह भी निहित है। परवर्ती अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि निम्न वर्ग के नारी पात्र अन्य वर्गों की अपेक्षा अधिक उग्र हैं तथा उनमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना की तीव्रता है जिसे नारी विमर्श के निकष पर स्वीकार किया जाता है।
   

 

महिला लेखन का शताब्दी वर्ष का १९०६-०७ से २००६-२००७
यह सच है कि स्त्री का आत्म संघर्ष रचना के संघर्ष पर विरत होता है। महिला साहित्यकार के लिए बाहरी संदर्भों में पहले उसका आंतरिक समय होता है। जहाँ वह जीती है और सांस लेती है। दूसरी ओर होती है समय की चुनौतियां। उनके जीवन व सृजन के बीच अनवरत युद्ध की स्थिति बनी रहती है। उनकी राह में व्यवधान है। विचारक विक्षेप, दुविधाऐं एवं द्वन्द्व हैं।
कितने कटघेरे हैं
है कितनी अदालतें
फिर भी अन्याय से
घिरी हैं हम !
कितने हैं ईश्वर-अल्लाह
हैं मूसा और गुरु
फिर भी कितना है
अधर्म!
देश में है पूरी आजादी
फिर भी
कितने खूंटों से
बंधी हैं हम!
(जेबा रशीद)
शिक्षित होने के साथ ही नारी ने जाना है वह नारी है और नारी होते हुए अपना समस्त स्त्रीत्व संजोकर उसे पुरुष के साथ खडे होने का अधिकार है। क्योंकि वह सक्षम है। नारी को पुरुष बनकर पुरुष के समकक्ष खडा नहीं होना है। बल्कि पूरक शक्ति के रूप में उभरना है।
महिलाओं में संवेदना का अतुलिय खजाना होता है। नारी अपनी अनुभूतियों और संवेदनाओं का कलम के माध्यम से जब पहले पहल १९०६-०७ में कागज की जमीन पर उकेरा तब उत्कृष्ट साहित्य सृजन कर सबको चकित कर दिया। पाठकों ने सराहना की तो साहित्य समीक्षक और लेखकों द्वारा नारी को साहित्यकारों की पंक्ति में बैठाना गवारा नहीं हुआ। महिला द्वारा हुई अभिव्यक्तियों को नकारने की कोशिश की गई। सामाजिक परम्पराओं को चुनौती देने की पथभ्रष्टता कहा गया किन्तु निडर महिला रचनाकारों ने अपनी साधना जारी रखी। १९०६-०७ के दौरान बंग महिला ने साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा और २००६-०७ तक सौ साल पूरे होने जा रहे है।
महिला लेखन की शुरुआत का श्रेय बंग महिला को जाता है। आज साहित्य की विभिन्न विधाओं में महिलाओं से कोई क्षेत्र अछूता नहीं रहा !
स्त्री लेखन का मुद्दा तो एक रणक्षेत्र है। पर लेखन के क्षेत्र में केवल औरत पूरी समाज व्यवस्था है। महिलाओं की संवेदनशीलता अन्तर्दृष्टि सबसे बढकर पीडा जो सदियों से उनके खाते में संचित होती आई है। रचनात्मक साहित्य सृजन में विशेष रूप से महिलाओं की भागीदारी में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
जब स्त्री लिखती है तो एक जिम्मेदारी उठा रही है। मैं सोचती हूँ कि चाहे अनुभूति कितनी ही तीव्र व संवेदना कितनी ही संघन और तरल क्यों न हो भोक्ता और दृष्टा की संवेदना में अन्तर होता ही है। पुरुष वर्चस्व के चलते साहित्य क्षेत्र में महिला लेखन पर यह व्यंग्य आरोपित हुआ कि ‘महिला लेखन इसलिए छप रहा है कि वे महिला है।’ और ऐसा सोचना…यह आक्षेप पुरुष विकृत मानसिकता एवं हीनता का शिकार होने की पराकाष्ठा है।
एक साहित्यिक अत्याचार यह भी है कि महिला लेखन नारी हित तक ही सीमित है। यह दूसरा आक्षेप है। समाज में व्याप्त जटिलताओं और संघर्ष से अलग घर की चार दीवारी में सिमटा घरेलू लेखन है। इस तरह महिला सृजन को कटघेरे में खडा करना उचित नहीं। समस्यायें तो शोषित की ही होती हैं।
किसी रचना को जन्म देते समय अपने एकान्तिक क्षणों में लेखक में वर्गीकृत करना न्याय संगत कदापि नहीं। रचनाकार केवल रचनाकार होता है। महिला सृजन नई दृष्टि से स्वयं को और समाज को पहचानने की एक ईमानदार चेतना से जुडा है।
महिला लेखन पुरुष लेखन वर्गीकरण मुझे नहीं जंचता ! लेखन अतः लेखन होता है चाहे स्त्री करे या पुरुष!
लेखन-लेखन होता है इसमें भेद क्यों’ स्त्री पुरुष के बीच की वर्जनाओं की बाड टूट चुकी है। एक दूसरे को समझने के पर्याप्त अवसर हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों में दोनों की भागीदारी है। अतः लेखन में स्त्री पुरुष भेद अप्रासंगिक हो चुका है। अब तो परिवेश की चुनौतियों को चित्रित करने वाला साहित्य ही चिर स्थायी होता है।
वैयक्तिक स्वतन्त्रता के नाम पर स्त्री को हर कहीं बेवकूफ बनाया जा रहा है। कहीं उसका मातृत्व छिना जाता है तो कहीं बालिका भ्रूण हत्या कर दी जाती है। तलाक या पुनः विवाह पर स्त्री शोषण!
इन्हीं अनुभवगत दौर पर चलती लेखनी जब प्रकाशन मार्ग ढूंढती है तो सम्पादकों द्वारा स्त्री लेखन ‘चूल्हे चौका’ का लेखन कह खेद सहित लौटा दिया जाता है।
महिला रचनाकारों ने देश धर्म की तर्ज पर रचनाऐं की तो गाज उसी पर ही गिरी। लेकिन लेखिकाओं ने हार नहीं मानी। जब से महिला ने हाथ में कलम थामी तो सामाजिक सरोकारों पर कलात्मकता और ईमानदारी के साथ निडर महिला रचनाकारों के प्रयास से परिवर्तन आया। उनके लिए अब महिला रूपक न लिंग है न आधी दुनिया। वह समाज है। एक सतत् परिवर्तनशील समाज!
लेखन एक बडा अनुशासन है। महिला लेखन को छोटे खाने में कैद नहीं किया जा सकता। महिला रचनाकारों ने साहित्य के माध्यम से जन जागरण का अलख जगाया और कामयाबी से बढ रही है।
स्वतन्त्रता के नाम पर परिवार तोडने नहीं जोडने हैं। पुरुष में केवल कारमित्री शक्ति है और महिला में कारमित्री एवं भावमित्री शक्ति का मंजुल समन्वय है। ज्ञान का भाव संवेदना और शालीनता का अधिष्ठान है। इसलिए महिलाओं को परिवेश की चुनौतियों का सामना करने में कठिनाइयां होते हुए भी सफलता पाती हैं।
हमारी शताब्दी की बुनियादी समस्याऐं जख्म और उपलब्धियां जिन्होंने समूचे विश्व के रचनाकारों को आंदोलित किया है उसमें महिला लेखन की उपलब्धियों का मूल्यांकन किया जाए। आज महिला लेखन का स्वरूप बदल गया है। हम बोलने का, कुछ करने का अधिकार मांगती हैं। जो साहित्यकार हैं वो महिला मांगती हैं पुनः परिभाषित करने का अधिकार। जो भी हमें परिभाषाऐं थमाई गई हैं उन्हें दूबारा परिभाषित करने का अधिकार चाहती हैं।
काल के शिलाखण्डों को तोडती सजग रचना धर्मिता के निरन्तरता बोध ने लेखिकाओं को सदैव सामाजिक सरोकारों से जोडे रखा है। समाज हमारी धारणाओं की रंग भूमि है। उनका सृजन संसार भी समाज को प्रतिबद्ध है। लेखिकाओं का साहित्य अंतरंग परिवेश का उद्घाटन अश्रुविगलत दीन पुकार में नहीं वरन एक वस्तु प्रयोजनवाली लोक कल्याणकारी चेतना में अलग-अलग भंगिमाओं में अभिव्यक्ति पा गई है जिसे सामाजिक सरोकारों के विभिन्न स्तरों पर केन्द्रित किया है।
शताब्दी के सभी प्रसंग, संदर्भ एवं संकट यही वे मूल मुद्दे रहे हैं जिन्होंने महिला लेखन को प्रभावित किया है। आंदोलनों और कोलाहल के युग में साहित्य की शांत मौन साधिकाऐं बिना कोई आन्दोलन मुद्रा अपनाए पीडत शोषित की व्यथा को अपने संवेदनशील तरल अभिव्यक्ति देने वाली रचनाओं में सृजनरत है।
महिला लेखन की सबसे बडी सीमा यह भी है कि वे आज भी पुरुष सत्तात्मक समाज में बेबाक अभिव्यक्ति का साहस नहीं जुटा पाती। उनका दबा स्वर रुढयों की चादर ओढे हुए है। आज शीर्षस्थ पत्रिकाओं में खुलेपन, बोल्डनेस के नाम पर कुंठित इच्छाओं का अतिरेक है। वे भाषा के नाम पर तमाम गालियां जिन्हें भले लोग सुनना या पढना नहीं चाहते। वे स्वयं भी जानते हैं कि ये साहित्य को विकृत कर रहे हैं। फिर भी पत्रिकाओं के पृष्ठों में स्थान मिलता रहे इसलिए ऐसा लिखते हैं। अश्लीनता की सीमा पार करना नाम और पैसा कमाने के लिए ऐसा कहाँ तक उचित है !
दबा स्वर यह भी उभरता रहा है कि स्थापित लेखक अपनी आत्ममुग्धा और अपनी सिद्धहस्ता के पूर्वाग्रह एवं खेमेबाजी के चलते महिलाओं के श्रेष्ठ लेखन को खारिज करा अपनी स्तरहीन रचनाओं को स्थापित करा लेते हैं।
साहित्य के इस मोड पर महिला साहित्यकारों के लिए चुनौती है वे स्वतन्त्रचेता संस्कारित हैं। उनके लेखन में कोई पहलू नहीं घूटा है किन्तु भाषा शिल्प का झीना अवगुंठन मौजूद रहता है जो रचना के सौन्दर्य की वृद्धि करता है। महत्वपूर्ण रचनाऐं आंकलन से बाहर कर दी जाती है। चंद अपवादों को छोडकर महिलाओं को दोयम दर्जे की समझने की प्रवृत्ति भी घातक है।
एक लेखिका पहले मां होती है फिर पत्नी और तीसरे स्थान पर उसका रचनाकार होता है। महिला लेखन की एक और सीमा है कि प्रायः घर और नौकरी के पश्चात शेष बचे समय की ‘पार्ट टाइम’ लेखिका होती है।
ओढी हुई जिम्मेदारियों के चलते उसे लिखने पढने के अवसर एवं समय कम मिलता है ! फिर भी ज्ञान व सोच और अनुभूति के आधार में तपकर जीवंत रचनाऐं सामने ला रही हैं। क्योंकि महिला लेखन में जीवननुभव और व्यापक दृष्टि है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
आम भारतीय नारी के विषम जीवन को कठिनतर बनाती ये चुनौतियां अन्य कार्य क्षेत्रों में सक्रिय जागरूक महिलाओं की तुलना में सृजनात्मक लेखन को समर्पित लेखिकाओं की चुनौतियां अधिक हैं!
इतने लम्बे समय बाद भी आज साहित्य की मर्यादा, अनुशासन और गरिमा के बोध के स्थान पर सतही लेखन और समझौतावादी मनोवृत्ति व अन्याय के खिलाफ कितने हाथ उठते हैं। दूसरी और श्रेष्ठ और उत्कृष्ट लेखनकर्म में लगी लेखिकाओं को कहीं निर्वासन की पीडा भी झेलनी पडी। कई लेखिकाओं का सार्थक और श्रेष्ठ लेखन प्रकाशन की दहलीज पर पडा है।
वस्तुतः १९९० के बाद सामान्तया महिला लेखन में समग्रतः जो क्रान्ति जागृति और जुझारुपन आया है जो गुणात्मक और संख्यात्मक अभिवृद्धि हुई है वह निश्चित ही सुखद संकेत है।
लोभ और हाशिये पर ठहरी हुई जिंदगी के गूंगे दर्द की गठरी लादे अन्दर की पसरी स्याही के बावजूद भी अदम्ब आस्था सुनहरी सुबह के लिए उजालों के चिन्ह की संकल्प दोहराती है!
जीवन मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों और पुरानी आस्थाओं को आत्मसात करने वाली महिला रचनाकारों का कहना है कि समकालीन लेखिकाओं ने अपने परिवेश और समस्याओं से आँख मिलाकर उनके भीतर तक झांका है। अपने सामाजिक दायित्व बोध को विस्तृत आयामों का स्पर्श कर सम सामयिकता के प्रति सजग रही है।
महिला रचनाकर्मियों ने तल में जाकर छानबीन की है उनको संघन जटिलताओं के प्रति अपने नुकीले आक्रोश को भी प्रतीकों में व्यक्त किया है।
लेखिकाओं ने रुमानी चेतना स्वकिय सम्बोधित होते हुए भी उसमें युग परिवर्तन की संकल्पना का संदेश है अपनी निष्ठा में आश्वस्त उनका रचना संसार अपनी निज की मौलिक बुनावट से अपनी जमीन स्वयं बनाई है! अपनी क्षमताओं का परिचय देती आई है। अनुभूतियों की तपिश ने उन्हें अभिव्यक्ति के क्षण दिए हैं। उनके चिन्तन को एक नया आकाश दिया है। नई सोच की जमीन दी है। अधूरे बिम्बों की कलात्मक संयोजना ने भाव और भाषा के नये क्षितिज तलाश किए है।
नारी साहित्य लेखन एक और स्वातः सुखाय है तो दूसरी ओर जन हिताय है नारी साहित्य इस परिवर्तन युग का शुभचिंतक है।
यद्यपि महिला लेखन आज स्पर्धा के युग में चुनौती है। फिर भी उसे हर स्थिति का सामना करने में उसे किसी वैसाखी की जरूरत नहीं। अपितु वह स्वयं मार्ग ढूंढ स्वयं अपने हस्ताक्षर बना रही है।
अत्यंत सयंत व शालीन बने रहकर सृजन करना भी एक चुनौती है। महिला रचनाकार ऐसा करती आ रही हैं। निर्भयतापूर्वक सोचना और लिखना होगा आज की यह जरूरत है।
हम चुनौतियों में तब ही सफल हो सकती हैं जब हम अपने सामाजिक सरोकार के हिसाब से किसी न किसी रूप में एक्टिविस्ट हो साथ में घर गृहस्थी भी सफलता से निभाएं! सृजन की शक्ति उसके पास है जो उसके लेखकीय सरोकार को नवीन अभिव्यक्ति की क्षमता देती आई है और देती रहेगी।
इतना ही कहूँगी कि नारी धीरे-धीरे आत्मबोध अनुप्राषित हुई है। फिर भी वह अपने ढंग से प्रतिष्ठित होने के लिए संघर्षशील रही है। इसलिए विरोध-अवरोध तिरस्कार-बहिष्कार को नकारते हुए उसे आगे आना होगा। तब ही समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है और अपनी सार्थकता को सिद्ध भी।
हमें ठोस चिन्तन का प्रमाण देना है व इस दंभ से बचना होगा कि चूंकि स्त्री है अतः स्त्री समस्याओं या भावनाओं को वही बेहतर समझ सकती है। वह सृजन के क्षेत्र में पैर रख रही है न कि किसी रणक्षेत्र में। नारी मुक्ति का संघर्ष लम्बा है और इसे मुख्यतः स्वयं नारी को लडना है। लेकिन यह लडाई पुरुष वर्ग के विरुद्ध न होकर व्यवस्था के अन्तर्विरोधों व पुरुष प्रधान समाज से निथरे नारी विरोधी अवमूल्यों के प्रति होनी चाहिए! समाज व अपनी संस्कृति से जुडी वर्तमान परिवेश की चुनौतियां स्वीकार करके ही महिला सृजन सफल हो रहा है और होगा!
समसामयिक काल में नारी समता की एक नई चेतना भारतीय समाज में व्याप्त हुई हैं! बहुत प्रसन्नता की बात है कि स्त्री लेखन की चर्चा अब हर जगह होने लगी है। यह निश्चय ही महिला रचनाकारों के बढते महत्त्व को रेखांकित करता है।
महिला लेखन का अर्न्तद्वन्द्व अभी जारी है…
सदियों से जिस झाड-झंखाड भरे कंटीले, उबड-खाबड रास्ते पर वह दौडती चल रही है, वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। मंजिल अभी बहुत दूर है।

साभार- जेबा रशीद

 

मैं अपनी बात दो कवितांशों से आरम्भ करना चाहती हूँ-
‘यह दीप अकेला / स्नेहभरा / है मदमाता/पर इसे पंक्ति को दे दो’
तथा-
राजा को / रथ हाथी घोडे / आम जनों को / पद यात्राएँ।
ऐसा / सुख सुविधाओं का / है बँटवारा /
उनको मीठा पानी / बाकी जल खारा /
उनको / जीने की हर गारंटी / आम जनों को हैं / हत्याएँ।
उनको इतिहासों का पन्ना-दर-पन्ना/ बाकी के लिए / सिर्फ हाशिया।
उनके सच की कोई शर्त नहीं / बाकी सबका / बयान हल्फिया।
उनकी है / निर्मल भागीरथी / आम जनों को / बस कुल्याएँ।
ये दोनों उदाहरण दो अलग-अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं। पहला उदाहरण हमारे उस चिन्तन को बल देता है, जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनो’ के भाव से ओतप्रोत है और चिरकाल से जिसे हम स्वीकार करते आए हैं। दूसरा उदाहरण उस ‘अदर’ (अन्य) की व्याख्या करता है जो आज के परिप्रेक्ष्य में ‘उपेक्षित’ का पर्याय है और जो आज का सच बयान करता है। उस सच का जिसमें सदियों से उपेक्षा के शिकार बने ‘हाशिए’ के लोग हैं और पूरे वैश्विक परिदृश्य में ‘तीसरी दुनिया’ के लोग हैं।
हालाँकि, साहित्य के परिपक्ष्य में ‘स्व’ (सैल्फ) और ‘अन्य’ (अदर) की परिकल्पना इतिहास या समाजशास्त्रीय परिकल्पना से बिल्कुल भिन्न है। साहित्य सब कुछ बाँध कर चलता है, सार्वदेशिक, सार्वभौमिक, सार्वकालिक की बात करते हुए बूँद के समुद्र में विलयन की बात लेकर चलता है जबकि आज का समय जिसे हम उत्तर आधुनिक या ‘उत्तर उत्तर आधुनिक काल’ कह रहें हैं वह ‘डीकन्सट्रक्शन’ को लेकर चलता है। वह व्यक्ति ‘अस्मिता’ को महत्त्व देता है। वहाँ भी ‘विश्वग्राम’ की परिकल्पना अवश्य की गई है। पर इस विश्वग्राम में न ग्रामों की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित है, न प्राकृतिक। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भौगोलिक दूरियों को कम कर दिया है पर दिलों की दूरियों को बढा दिया है। यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि साहित्य इतिहास नहीं है न इतिहास का पुनरावलोकन है। उसमें ‘काल’ के तीनों आयामों पर दृष्टि रहती है, इतिहास की तरह केवल अतीत से ही नहीं। इसलिए इतिहास मूलतः ‘दूसरों’ के बारे में बोला या लिखा जाता है, साहित्य ‘स्व’ और ‘पर’ दोनों के। हम कह सकते हैं-
‘कविता वक्तव्य नहीं गवाह है
कभी हमारे सामने
कभी हमसे पहले/कभी हमारे बाद
… … … … … … … …
उसे कोई हडबडी नहीं कि वह इश्तहारों की
तरह चिपटे /
जुलूस की तरह निकले।
नारों की तरह लगे /
और चुनावों की तरह जीते
… … … … … … … …
वह आदमी की भाषा में /
कहीं किसी तरह जिंदा रहे, बस।
स्पष्ट है कि साहित्य सदैव व्यापक परिप्रेक्ष्य लेकर चलता है। इस दृष्टि से हम अपने भारतीय साहित्य पर नजर डालें तो पाते हैं कि हमारा वैदिक वाङमय ‘स्व’ और ‘अन्य’ का विभेद नहीं करता, वहाँ
‘स्रं स्रं स्रवन्तु सिन्धवः, सं वाताः सं पतत्रिणः,
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां, संस्राव्येण हविषा
जुहोमि’ (अर्थवेद)। /१५/१
अर्थात्-छोटी नदी बडी नदी से मिलकर बडी बन जाती है, हल्की हवा के झोंके मिलकर तुफान बन जाते हैं, आपस में मिलकर पक्षी भी अपना झुण्ड बनाते हैं, इसी तरह लोग इस जीवन-यज्ञ, जो संयुक्त शक्ति आयोजित किया गया है, में साथ आएँ / -इस भाव को महत्त्व दिया गया है।
‘एकोऽहं बहुस्यामः’ की भावना हमारे साहित्य में निरन्तर पोषित होती रही है और कभी ‘तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न हूँ’ (कबीर) के रूप में प्रकट होती रही है और कभी
‘मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल,
रजकण पर जलकण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली’ (महादेवी वर्मा)-
के रूप में।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल उद्घोषणा करते हैं कि कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बंधों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है’ (कविता क्या है), लोंजाइनस की दृष्टि में भी कविता वह है जो ‘पाठक को उसके स्तर से ऊपर उठाए ;स्पजिपदह जीम तमंकमत वनज व ीपउेमसद्धि और हजारी प्रसाद द्विवेदी भी जीवनकी सार्थकता अपने को ‘दलित द्राक्षा की तरह निचोडकर दे देने में’ ही मानते हैं। दरअसल, साहित्य के परिप्रेक्ष्य में यह अवधारणा बहुत महत्त्वपूर्ण रही है कि साहित्य वह जो पाठक को परदुःखकातर बना दे। इसके लिए चाहे स्वयं विलीन ही क्यों न होना पडे- ‘नींव के भीतर दबकर ईंट अपना अस्तित्व इसलिए मिटा देती हैं ताकि उसके ऊपर सुन्दर भवन बन सके’। बकौल हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘अपने सर्वोत्तम से मनुष्य की सेवा करके रिक्त होने पर ही रचनाकार की सार्थकता है वैसे ही जैसे अपने को निःशेष भाव से समर्पित करने पर मेघ की-
‘आश्वास्य पर्वतकुल तपनोष्मतप्तं
दुर्दाववहृ विधुराणि च काननानि,
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा
रिक्तोऽसि यज्जलद्! सैव तवोत्तमश्रीः’
(हे मेघ! पर्वतकुल को आश्वस्त करके, दावाग्नि की ज्वाला से दहकती हुई वनभूमि को शान्त करके, नाना नद-नदियों को पूर्ण करके जो तुम रिक्त हो गए हो, यह तुम्हारी उत्तम श्री है।)
शेष सृष्टि से समरस करने की क्षमता साहित्य में है। रमेश चन्द्र शाह का कहना है -‘महान् कलाकारों में विराट् की चेतना और विराट् से जुड सकने की क्षमता भी असाधारण होगी। इसीलिए तो वह ‘अनुभव’ (रचनाकार का अनुभव) अपने सम्पूर्ण ताजेपन के साथ उनकी कृति में सुरक्षित रहता है और हममें अपनी पात्रता के अनुपात में वह हममें संक्रमित हो जाता है- अपने आप। जाहिर है कि कलाकृति में व्यक्त अनुभव सभी संवेदनशील पाठकों के अनुभव बन जाते हैं।
यह अवधारणा व्यक्ति को समाज से, समाज को राष्ट्र से और राष्ट्र को विश्व से जोडती है और इस तथ्य की बार-बार उद्घोषणा करती है कि- ‘छव वदम बंद सपअम पद प्ेवसंजपवदश् यह बात अलग है कि अस्तित्ववादी दर्शन यह मानकर चलता है कि ‘बच्चा जब पैदा होता है, उसकी कोई अइडेन्टिटी नहीं होती, धीरे-धीरे उसे एक पहचान मिलती है जो उसे परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व से जोडती है।’ यानी उसे जो पहचान मिलती है, वह ‘अन्यों’ से ही मिलती है। हम यहाँ एक कहावत उद्धृत कर सकते हैं- ‘अकेला चना भाड नहीं फोड सकता’। वस्तुतः अकेले व्यक्ति की प्रतिस्पर्धा और दुःख भरे जीवन को वर्ग की सदस्यता द्वारा ही रोका जा सकता है।
किन्तु यह साथ-साथ चलने, साथ-साथ रहने, संगठन की शक्ति को पहचानकर अपने, अपने परिवार के, अपने समाज के और अपने देश के कल्याण की कामना का भाव आज के समय के सच से परे है। यदि आज हम-
‘कह दो शंकर से आज करें
वे प्रलयनृत्य फिर एकबार
सारे भारत में गूँज उठे
हर-हर बम-बम का महोच्चार
ले अंगडाई हिल उठे धरा
फट जाए कुहा, भागे प्रमाद
यह आह्वान करते हैं तो उसका वह अपेक्षित प्रभाव नहीं पडेगा, जो राष्ट्रीय आन्दोलन के परिपक्ष्य में पडा होगा। आज तो व्यापकता की अभिलाषा लेकर चलने वाला निष्फल होकर धीरे-धीरे संकुचित होकर अपने ही दुःखों की दुनिया में खो जाता है-
‘और धीरे-धीरे एक दिन
‘ ‘ ‘ ‘ ‘
विश्व से राष्ट्र/राष्ट्र से प्रदेश/प्रदेश से नगर/
और नगर से ‘मैं’ बनकर/अपने में समा जाता हूँ।
पीठ पर से विश्व लुढक पडता है
और छाती में से राष्ट्र
यह सच आज का सच है। समय के सच को नकारा नहीं जा सकता और समय का सच यह है कि आज पूरा विश्व एक ऐसी दिशा की ओर बढ रहा है, जिसमें कुछ भी स्थिर नहीं है। चलताऊ भाषा का प्रयोग करें तो सब कुछ हौचपौच चल रहा है। नीत्शे द्वारा ईश्वर की मृत्यु, फूफूयामा द्वारा इतिहास की मृत्यु, इलियट द्वारा एक प्रकार के उपन्यास की मृत्यु, देरिदा द्वारा लिखित शब्दों की मृत्यु की घोषणा के साथ-साथ बाजारीकरण के बढते प्रभुत्व, व्यक्ति की स्वायत्तता पर उठते प्रश्नचिह्नों और ‘शब्दों की मिटती सत्ता’ के समय में साहित्य भी समय की नब्ज को टटोल रहा है। आज हमारी स्वतन्त्र सोच कहाँ है’ विज्ञापनी दुनिया द्वारा हमें जो कुछ परोस दिया जाता है, वही हम लपकते हैं। इस संस्कृति में हम वस्तु की गुणवत्ता के स्थान पर वह खोजते हैं जिसके साथ कोई ‘फ्री’ स्कीम हो। ऐसे समय में ‘स्व’ (ैमस) और ‘अन्य’ (वजीमत) विषयक सोच में परिवर्तन आना बडा स्वाभाविक है। इस परिप्रेक्ष्य में सात्र की दो पुस्तकों-‘बीइंग एण्ड नथिंगनेस’ (१९४३) और ‘क्रिटीक ऑफ डाइलेक्टिकल रीजन’ (१९६०) का ध्यान आता है, जिसमें उन्होंने ‘एलिअनेशन’ (अजनबियत) के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए ‘दूसरे’ (वजीमत) की उपस्थिति को नरक की संज्ञा दी- ‘द हेल इज अदर पीपुल’ कहा और उद्घोषणा की कि ‘दूसरों के लिए मैं और मेरे लिए दूसरे ‘वस्तु’ बन जाते हैं। दूसरों की उपस्थिति मात्र से व्यक्ति अपने से अलग हो जाता है क्योंकि उसकी चेतना दूसरों की ओर उन्मुख हो उठती है११।
साहित्य ‘समय’ के साथ चलता है इसलिए आज के समाज में परिव्याप्त होते उन अजनबीपन का प्रभाव उस पर पडना बडा स्वाभाविक है। आज के परिप्रेक्ष्य में ‘अपने और पराये’ का भाव, जो रवीन्द्रनाथ त्यागी के इन शब्दों में बडे ही प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया गया है- ‘मेरे बच्चे बच्चे, तेरे बच्चे जनसंख्या- साहित्य में कामू जैसे साहित्यकारों द्वारा काफी समय पूर्व अभिव्यक्त होने लगा था। कामू के ‘अजनबी’ का प्रसंग लेना यहाँ अप्रासंगिक नहीं है। ‘अजनबी’ का पात्र ‘द मर्डरर’ अपनी माँ की लाश के सिरहाने बैठा हुआ है और अपनी माँ के विषय में नहीं सोचता, पूरे दुनिया-जहान की बातें सोचता है। इसी सन्दर्भ में मेरे जेहन में प्रेमचन्द की ‘कफन’ कहानी बार-बार उभरती है जिसके पात्र घीसू और माधव प्रसव पीडा से कराहती अपनी पत्नी और पुत्रवधु से नितान्त असम्पृक्त होकर अलाव के सामने बैठे हुए भुने हुए आलू निकाल-निकाल कर खाते रहते हैं और दुनिया-जहान की बातें करते रहते हैं। दोनों में से एक भी उठकर अन्दर नहीं जाना चाहता क्योंकि उन्हें भय है कि यदि एक अलाव के पास से उठकर गया तो दूसरा आलू का बडा भाग साफ कर जाएगा। उनका चिन्तन है- ‘नया कफन चाहिए। यह भी कैसा रिवाज है कि जिसे जीते-जी फटा चीथडा नसीब नहीं हुआ, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए’ – और कफन के लिए माँगे गए पैसों को ताडीखाने में उडा देते हैं- निर्मम शोषण-चक्र ने उन्हें ऐसे अँधेरे में फेंक दिया है जहाँ मानवीय मूल्यों की पहचान लुप्त हो गई है।
यहाँ प्रेमचन्द के बहाने से जिस ‘आम आदमी’ या आज के सन्दर्भ में ‘अदर’ की चर्चा की शुरुआत होती है, वह ‘अदर’ भारतीय वाङ्मय के पारम्परिक स्वरुप में इससे पूर्व नजर नहीं आता। ‘अन्य’ के परिप्रेक्ष्य में अब जब औपनिवेशिक चिन्तन को नकारा जा चुका है, साहित्यिक मूल्यों, मान्यताओं के सन्दर्भ में भी प्रश्न उठने स्वाभाविक है। सवाल यहाँ यह उठता है कि हमारा साहित्य किसके द्वारा और किसके लिए रचा गया ‘ जाहिर है कि ‘हाशिए’ के लोग वहाँ किसी गिनती में नहीं आते, क्योंकि समाज में उनका स्थान ‘व्यक्ति’ के रूप में नहीं ‘वस्तु’ के रूप में किया जाता रहा। परिणामतः हमारा लगभग सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य जिन महानायकों की परिकल्पना करता रहा है और उन्हें ‘धीरोदान्त, धीर ललित, धीर प्रशान्त और धीरोद्धत’ जैसे गुणों से अलंकृत करके उन्हें ‘वज्रादपि कटु और कुसुमादपि मृदृ’ कहता रहा है, आज अपने अर्थ खो चुके हैं। संस्कृत के बाद प्राकृत, अपभ्रंश काल में भी नायकों की कमोवेश यही परिकल्पना रही। हाँ, अपभ्रंश में प्रबन्ध काव्यों के अतिरिक्त चरित्र काव्यों या कथा रूपों में ‘नायक’ की यह परम्परा थोडी परिवर्तित हुई और ‘भविसयतकथा’ जैसी रचनाओं के नायक ‘क्षत्रिय’ न होकर ‘वणिक पुत्र’ होने लगे, हाँलाकि इन रचनाओं के मूल स्वरूप वही थे, जो उनकी पूर्ववर्ती रचनाओं के थे, पर सरहपा, कण्हपा इत्यादि सन्तों की रचनाओं में ‘संदेस-रासक’ में और हेमचन्द्र के दोहों में आम आदमी का चुफ से प्रवेश तो होने ही लगा था।
यहाँ हिन्दी के रीतिकाल में लिखा गया यह दोहा याद आता है, जो जहाँगीर द्वारा नूरजहाँ की शान में कवि वाणी से निकला –
‘आध सेर शराब मुझको, एक सेर शराब हो,
सारी सल्तनत नूरजहाँ की, खून हो कि खराब हो।’
यह चरित्र साहित्य के बदलते सरोकारों की ओर इंगित करता है, जिसमें राजा प्रजा के लिए ‘सन्तति’ का भाव नहीं रखता, जिसमें ‘मूलन की ही अधोगति केशव गाइए’ कथन अपनी सार्थकता खो बैठता है और जहाँ आपसी रिश्तों के बीच एक दीवार खडी दिखाई देती है, एक ऐसी दीवार – जो सूर्य की रोशनी को सपनों तक, सच तक नहीं आने देती, और अनायास यह कविता यहाँ ध्यान में आ जाती है-
It was a long time ago
I have almost forgotten my dream
But it was there then
In front of me Bright like a sun
My Dream
And then thee wal rose
Rose slowly
Between me and my dream
Rose slowly slowly
Dimming
Hiding
The light of my dream
Rose until it touched the sky
The wall (As I grow older)
(धर्मवीर भारती द्वारा इस कविता का अनुवाद किया गया है-
बहुत दिन हो गए / मैं अपने सपने को लगभग भूल चुका / लेकिन सपना अनश्वर था/ मेरे सामने / झिलमिलाते हुए सूरज की तरह / मेरा सपना और फिर दीवाल उठी / धीरे-धीरे/मेरे और मेरे सपने के बीच/उठती गई धीरे-धीरे/मेरे सपनों की रोशनी/धुँधुला करते हुए/रोशनी का गला घोंटते हुए/यहाँ तक कि आकाश चूमने लगी/वह दीवाल), – (सपना और दीवाल)
यह वह दीवार है जो ‘अजनबियत’ को प्रश्रय देती है।
प्रेमचन्द के साहित्य से साहित्य जगत में बाकायदा प्रविष्ट ‘अन्य’ की निराशा, वेदना, पीडा, व्यथा, कुण्ठा, एकाकीपन, मृत्युबोध और ‘अजनबियत’ – जिसका प्रभाव पूरे विश्व-साहित्य पर पडा था और दोस्तोवस्की, काफ्का, कामू, सार्त्र आदि के साहित्य में दृष्टिगत हो रहा था – हिन्दी के अनेक अस्तित्ववादी उपन्यासों – त्यागपत्र (जैनेन्द्र), सूरज का सातवाँ घोडा (धर्मवीर भारती), अजय की डायरी (देवराज), खाली कुर्सी की आत्मा (लक्ष्मीकान्त वर्मा), सारा आकाश (राजेन्द्र यादव), रुकोगी नहीं राधिका (उषा प्रियवंदा), अलग-अलग वैतरणी (शिवप्रसाद सिंह), जल टूटता हुआ (रामदरश मिश्र), बेघर (ममता कालिया) आदि-आदि में अभिव्यक्त हो रहा था। अज्ञेय का उपन्यास ‘अपने-अपने अजनबी’ की दो पात्र ‘युवती योके’ तथा ‘वृद्धा सेल्मा’ आकस्मिक रूप से हुए हिमपात के कारण बर्फ में दबे काठघर में तीन-चार महिनों के लिए कैद हो जाती है और अपने-अपने दृष्टिकोण के पार्थक्य के कारण साथ रहते हुए, खाते-पीते हुए, बातें करते हुए भी एक-दूसरे के लिए अजनबी बनी रहती है। यहाँ ‘अहं की प्रामाणिकता के मूल में चूँकि मृत्यु की भयानक छाया है, आशंका और संशय का विद्रूप आवरण है, व्यथा भरी पीडा और करुणा है। मृत्यु की भयंकरता व्यक्ति में महान परिवर्तन ला देती है, प्रियजन अजनबी हो जाते हैं और अनपहचाने अजनबी आत्मीय बन जाते है – यही इस उपन्यास का मूल स्वर है।
यह ‘अजनबियत’, जिसकी चर्चा मृत्यु, काल और भीड के सन्दर्भ में की गई है उसके प्रभाव के परिणाम स्वरूप एक दूसरे को शंका से देखने, आरोप-अपराध दूसरे के सिर पर मढकर अपने आप से निगाहें चुराने तथा कथित ‘सत्ता’ के मद में दूसरे को तुच्छ समझने के भाव को पोषित करने की बात को ध्यान में रखकर ही सार्त ‘दूसरे की उपस्थिति को नरक’ कहते हैं।
इस अजनबियत के परिणामस्वरूप भारतीय साहित्य में वर्णित प्राचीन नायक का गरिमामय, आभिजात्यता से युक्त, लोकरंजक, मर्यादित रूप जो प्राचीन समय के समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप था, आधुनिक काल तक आते आते स्वातन्य चेतना के उद्घोष के साथ अपने महिमामंडित स्वरूप को त्यागकर गांधी, लोहिया, पटेल आदि के रूप में सामान्य भावभूमि तक आ पहुँचा। लेकिन, स्वतन्त्रतापूर्व तक का साहित्य ‘आमजन के दुःख को एक समान धरातल पर रख पाने की अपनी असीम शक्ति को नहीं पहचान पा रहा था, और इसी परिप्रेक्ष्य में ये सवाल निरन्तर खडे हो रहे थे कि साहित्य किसके लिए है और कैसा होना चाहिए। इन प्रश्नों के परिणामस्वरूप साहित्य में नायक से अनायक की ओर, कथा से कथाहीनता की ओर बढना बहुत ही स्वाभाविक था। ऐसे में ‘अजनबियत’ की अवधारणा का साहित्य में प्रवेश हुआ।
अब नायक पद पर प्रतिष्ठित हुआ – भूखा किसान, भिक्षुक आदि आदि।
उत्तर आधुनिक काल से पूर्व के समाज और साहित्य में ये प्रश्न उठने आरम्भ हो चुके थे कि – सत्य का स्वरूप क्या है’ वह कहाँ है’ मैं कौन हूँ’ मेरी अस्मिता क्या है’ मेरा महत्त्व क्या है (निराला की राम की शक्तिपूजा की ये पंक्तियाँ यहाँ सहज ही स्मरण हो जाती हैं – धिक जीवन को पाता ही आया विरोध / धिक साधन जिसके लिए किया सदा ही शोध) और इसीलिए आज का नचिकेता यम के द्वारा प्राप्त वरदानों के प्रतिदान स्वरूप कोई वैभव-विलास की सामग्री नहीं चाहता, अपितु वह केवल आत्मान्वेषण करना चाहता है-
ये चीजें मेरी हैं / सम्बन्धी मेरे हैं /
धरा, धाम, सभा, बन्धु, पिता, नाम, वर्तमान-
मुझमे हैं- मुझसे हैं-मेरे हैं-
अनजाने, पहचाने, माने, बेमाने
सब मेरे हैं- मैं सबका हूँ
लेकिन मैं क्या हूँ’
मैं क्या हूँ’ / मैं क्या हूँ’
स्पष्ट है कि आधुनिक युग की माँग के अनुरूप साहित्य के परम्परागत रूप में परिवर्तन हुआ परन्तु आधुनिकता में भी समाज के उपेक्षित वर्ग शामिल नहीं थे। यह वर्ग शामिल हुआ ‘अन्य की आवाज’ के रूप में उत्तरआधुनिक समय में। उत्तरआधुनिक समय-जिसे चिन्तकों ने पृथ्वी पर ‘एक नए युग की शुरूआत’ के रूप में चित्रित किया है, एक ऐसे नये युग की शुरूआत के रूप में जिसमें न पारम्परिक समाज है, न संस्कृति ओर न पर्यावरण, जिसमें सत्य और तर्क, नैतिकता, ईश्वर, इतिहास आदि से जुडी धारणाएँ निरर्थक मानी जा रही हैं, जहाँ यथार्थ को भी नकारा जा रहा है, जहाँ ‘अर्थ’ अर्थहीन है और जिसे ‘डीकन्सट्रक्शन’ द्वारा पर्त-दर-पर्त छील दिया जाता है और आफ पास कुछ नहीं बचता। हाँ, यह युग गूँगों का पैरोकार जरूर है। जगदीश्वर चतुर्वेदी का कहना है-
‘….पश्चिमी दार्शनिकों ने ‘अदरनेस’ की खोज करके उसे केन्द्र में प्रतिष्ठित किया है। कल तक जो उपेक्षित थे, वे हाशिए पर थे किन्तु आज वे सभी विचारों के केन्द्र में हैं। आज ये ही मुक्तिदूत हैं। आज सभी किस्म की सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहचानों के बीच में हाशिए के लोगों की नैतिकता केन्द्र में आ गई है। यह पहले की सभी किस्म की नैतिकताओं से मुक्ति की बात भी कर रहे हैं।
पर पूरे वैश्विक परिदृश्य में आज भी ‘अन्य’ यानी खेतिहर मजदूर, मछुआरे, शिल्पी, दलित हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं और जिनकी ‘अस्मिता’ आज भी सुरक्षित नहीं है क्योंकि उन्हे आज भी ‘चुनने’ का अधिकार नहीं है और कोई आश्चर्य नहीं है कि ‘हम’ यानी समर्थ (समरथ को नहीं दोष गुसाईं) के द्वारा वह धीरे-धीरे गोदान के ‘होरी’ की तरह ‘महतो’ से ‘असहाय मजदूर’ बनते जाएँगे और हजम कर लिए जाएँगे।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि
‘अन्य की व्याख्या, उसके शोषण की व्याख्या और उसके यथार्थ की व्याख्या से उसकी दुनिया बदलने वाली नहीं है।
केवल यह कहने मात्र से काम नहीं चलने वाला है कि –
वह महाभारत का एक योद्धा है /
एक अर्धरथी योद्धा /
जिसे रिक्शे पर बैठ अचानक पाते हैं /
वह एक हाथवाला एक रिक्शावाला है।
इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि हम केवल नारों में ही वर्गहीनता की बात न करें। ट्रेन में सीट पर कब्जा जमाते ही अन्दर घुसते दूसरे व्यक्ति को देखकर उसके प्रति कठोर होकर हम इस वर्गहीन समाज की परिकल्पना नहीं कर सकते। अगर दूसरे के प्रति हमारे हृदय में संवेदना नहीं जागती, हमारी आँखों में पानी नहीं आता और कवि यह कहने को मजबूर हो जाता है-
गेहुँए से गोरे हुए उनके चेहरों की ललाई में /
उतनी भर भी फिक्र नहीं घुलती कभी /
जितनी उनके खद्दर के झक्क कुर्ते में नील
तो हम समानता की कितनी भी दावेदारी क्यों न करें, निरर्थक है। पर हम यह बात स्पष्टतः देखते हैं कि आज हम एक वर्गहीन समाज की बात तो करते हैं और इस वर्गहीन समाज के बहुत से पैरोकार शोषक-शोषित के वर्गभेद को मिटाने की बात करते हैं, पर वह वर्गभेद मिटा नहीं, हाँ, परिवर्तित जरूर हो गया है कुछ और वर्गभेदों के रूप में। अब निराला का कुकुरमुत्ता शोषितों का प्रतीक नहीं है, मशरूमों का पर्याय-खादखोर मशरूम का पर्याय बन गया है। यानी इस समाज में कुछ ‘आम’ आदमी खास हो गए हैं और खास होते ही उनकी फितरत भी बदल गई है।
ऐसे समय में यदि वास्तव में अन्य और स्व का भेद मिटाना है तो उसके लिए सबसे जरुरी है आदमीयत को बचाना। यदि आदमीयत बची रहेगी तो अन्य की अस्मिता भी बची रहेगी अन्यथा हम यही कहते रह जाएँगे-
अब वो लालिमा कहाँ / धरती के होठों पर /
अम्बर के होठों की / पानी सारा बहा जा रहा/
नरक की ओर / कौन रोके’ जगह नहीं मिलती /
धरती को जडें जमाने की / कहाँ बसाओगे घर /
कहाँ सेज बिछेगी’
इस दुनिया को बदलने के लिए आज भी ‘दूसरों के लिए अपने को दुःखी कर लेने की, उसके दुःख को सहन करने की भावना जगाना जरूरी है और यह भावना जगाता है साहित्य। इस साहित्य के द्वारा ही अदर और स्व के बीच की खाई पाटी जा सकती है। अतः कहा जा सकता है-
‘जिस दिन मरेगी कविता / नहीं रोयेगा कोई
भी भरा हुआ पेट /
रोयेगा अभाव, रोयेगी पीडा / रोयेगा यथार्थ /
क्योंकि उस दिन के बाद / नहीं रह जाएगी /
उनके लिए लडने वाली / सबसे बडी मुट्ठी।
यहाँ मुझे अमृता प्रीतम की अन्तिम कविता ‘मैं तुम्हें फिर मिलूँगी’ की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करने का लोभ संवरण करना कठिन लग रहा है। इस कविता में अमृता का अपना अस्तित्व विराट् होकर व्यक्त होता है। इमरोज को सम्बोधित इस कविता में अमृता ‘कल्पना में चिंगारी बनकर, सूरज की लौ बनकर, चश्मा बनकर, ठंडक बनकर – धीरे-धीरे प्रकृति के कण-कण में व्याप्त हो जाने की परिकल्पना करती हैं। वे कहती हैं-
‘यह जन्म मेरे साथ चलेगा,
यह शरीर समाप्त होता है
तो सब कुछ समाप्त हो जाता है
पर यादों के धागे
सृष्टि कण के होते हैं
मैं उन कणों को चुनूँगी
धागों को लपेटूँगी
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।
और साहित्य की सार्थकता भी इस बात में है कि व्यष्टि समष्टि में परिणत हो जाय और हम यह उद्घोष कर सकें –
भाव कर्म वाणी स्वतन्त्र हो / किन्तु प्रेम ही मूल मन्त्र हो।
हों समान अवसर सब ही को / हों समान अधिकार।
जयशंकर प्रसाद भी अपनी सुप्रसिद्ध रचना आँसू का समापन इन्हीं शब्दों से करते हैं-
सबका निचोड ले कर तुम सुख सूखे जीवन में
बरसो प्रभात हिमकन सा आँसूं इस विश्व सदन में।
निस्सन्देह साहित्य में वह शक्ति है जो क्षुद्र से क्षुद्र वस्तु को विराट् बना देता है और ‘स्व’ का ‘पर’ में विलय कर देता है। कवि के शब्दों में यह आशा का स्वर सुनाते हुए अब मैं अपनी लेखनी को विराम देती हूँ-
कहना ही होगा हमें / हम प्रलय न होने देंगे /
इस सौर मंडल में/जीवन-ज्योतित पृथ्वी का
गोलक/
घूमता रहेगा अनन्तकाल / मानव की जययात्रा /
शवयात्रा में नहीं बदलेगी…

नाटक या नाट्य में प्रयुक्त भाषा को नाट्यभाषा कहते हैं। भरत के अनुसार नाट्य या नाटक वह है जो लोकस्वभाव को अंगादि के अभिनय की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है। अभिनवगुप्त के अनुसार नाट्य नटनीय नर्तन है। इससे स्पष्ट है कि भरत और अभिनवगुप्त के मतानुसार नाट्य और नृत्य में अभिनय की आवश्यकता है। दोनों की अपनी मुखोच्चरित भाषा होती है। नृत्य में गीतों की प्रमुखता रहती है तो नाटक में गद्य और पद्य की सहायता से (आधुनिक संदर्भ में) भावाभिव्यक्ति की जाती है। मूल रूप से दोनों सुंदर कला रूप हैं। नर्तक या नर्तकी नृत्य में नृत्यभाषा का इस्तेमाल करते तो नाटक में नट या नटी नाट्यभाषा से अपनी विचाराभिव्यक्ति करते हैं। इन दोनों की शारीरिक भाषा लगभग एक ही है यद्यपि नृत्य की शरीरभाषा में संकीर्णता है। यह सुव्यक्त है कि नृत्य और नाट्य का अर्थ शास्त्र द्वारा पूर्वनिर्धारित होने से अत्यधिक संकेतित है। इस प्रकार, छोटे-मोटे भेदों के होने पर भी नृत्य और नाट्य परस्पर बहुत अधिक संबंध रखते हैं।

आचार्य भरत और अभिनवगुप्त के मंतव्यों को और स्पष्ट करते हुए वेदबन्धु ताण्डवलक्षणमें नृत्य को नाट्य से अलग नहीं मानते। उन्होंने कहा कि भरत और अभिनवगुप्त के मतानुसार नृत्य, नाट्य का एक अंग है। भरत के व्याख्याताओं ने नाट्य और नृत्य को एक ही कलारूप बताया है। भरत के व्याख्याता हर्ष ने बताया कि रसों और भावों को व्यंजित आँखों, कपोलों, ओष्ठों और अन्य अंगों का पूर्ण या अपूर्ण अनुकरण ही नाट्य तथा नृत्य में होता है। इसलिए नाट्य एवं नृत्य को परस्पर कैसे अलग कर सकते हैं भट्टतौत और भट्टलोलट ने भी कहा है कि नाट्य ही नृत्य है। तात्पर्य यह है कि नृत्य एक प्रकार का नाट्य ही है।यदि आचार्यों के द्वारा नाट्य और नृत्य अलग-अलग कलारूप नहीं माने जाते तो उनकी भाषा भी अलग-अलग नहीं हो सकती। अतः नाट्यभाषा के संबंध में कहते वक्त भाषा की संरचनात्मक विशेषताओं के साथ-साथ आंगिक, सात्विक आदि अभिनय को सूचित करने के लिए रचनाकारों की ओर से स्वीकृत एवं प्रयुक्त भाषेतर पद्धतियों पर भी ध्यान देना चाहिए। नाट्य रूपों में कृतिकार के मानसिक व्यापारों, उद्देश्यों एवं विचारों को दर्शकों तथा पाठकों तक पहुँचाने का श्लाघनीय कार्य प्रमुख रूप से नाट्यभाषा के माध्यम से किया जाता है।

अन्य काव्य रूपों जैसे कविता, उपन्यास, कहानी आदि साहित्यिक विधाओं की भाषा की संरचना की तुलना में नाटक की भाषा याने नाट्यभाषा नाटकीय परिवेश के कारण अलग रहती है। नाट्यभाषा का स्वरूप, संरचना, आकार तथा उसका महत्त्व अन्य विधाओं की भाषिक संरचना पद्धति से बहुत अधिक भिन्न है। नाटक को छोडकर अन्य सभी साहित्यिक विधायें केवल पढने के लिए रची जाती हैं। अतः उनकी वाचन शैली सीधी और सरल है। लेकिन नाटक नट और नटी द्वारा मंच पर जीवन्त कार्यव्यापार के रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से संरचित वाचन शैली अभिनयोन्मुख है और उसका महत्त्व उत्तरोत्तर बढता रहा है। साधारणतया नाट्यभाषा के प्रमुख दो रूप माने जाते हैं। ये दो रूप हैं- हमारे जीवन-व्यवहार की ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा और अंगाश्रित शरीर भाषा। इनके अलावा रंग-प्रकाश, ध्वनि, चित्र, रंगमंचीय वस्तुयें आदि नाट्यभाषा रूपी विशिष्ट भाषा की इकाइयाँ हैं। इन इकाइयों को मंचीय भाषा कह सकते हैं। ये तीनों- ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा, अंगाश्रित शरीर भाषा तथा उपकरणाश्रित मंचीय भाषा-मिलकर नाट्यभाषा बनती है।

 

ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा

 

नाटक की भाषा का सहज, संप्रेषणीय होना अनिवार्य है। यह संवाद के रूप में अभिनेताओं के लिए लिखी जाती है। यह एकाधिक अभिनेताओं के बीच बातचीत या एक ही अभिनेता के आत्मालाप के रूप में हो सकती है। कभी-कभी अनेक अभिनेताओं के द्वारा कोरसके रूप में प्रस्तुत होती है। इसके द्वारा अभिनेता दर्शकों के सामने जीवन की भिन्न-भिन्न झाँकियाँ प्रस्तुत करते हैं। यह प्रस्तुति निश्चित समय के अंदर दर्शकों के सामने मंच पर होती है। यद्यपि रंगालय में उपस्थित लोगों की भूमिका दर्शकके रूप में एक है, फिर भी भावों की अभिव्यक्ति के लिए स्वीकृत ध्वन्याश्रित भाषा को आत्मसात करने की क्षमता में अंतर है। दर्शकों को शैक्षणिक स्तर, भाषा ग्रहण की शक्ति, स्वीकृत बिम्बों और प्रतीकों को समझने की क्षमता समान नहीं रहती। अतः रचनाकार को अपने नाटक में ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो सरलता, सहजता तथा स्वाभाविकता के कारण सभी स्तर के लोगों के लिए स्वीकार्य हो। नाटक की ध्वन्याश्रित शाब्दिक भाषा के लिए यह भी अभीष्ट और अनिवार्य है कि नाटक में और जीवन में प्रयुक्त होने वाली भाषा में अधिक अंतर न हो। गोविंद चातक जी ने बताया कि नाटक की भाषा यथार्थ के आग्रह के कारण एक ओर वह सामान्य बोलचाल के निकट होती है, दूसरी ओर संरचित, संस्कारित होने के कारण अपने सर्जनात्मक प्रयोग में सामान्य से विशिष्ट हो जाती है।उसमें रोचकता एवं प्रसंगानुकूलता की आवश्यकता भी है। साथ-ही-साथ भाषा को प्रवाहमयी भी होनी चाहिए। इसमें व्यंग्य, विनोदात्मकता, चुस्ती, चुटीलापन, कहावतों और मुहावरों आदि का प्रयोग अति आवश्यक एवं अनिवार्य हैं। नाटक की भावस्थिति की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के संबंध में नेमीचंद जैन जी ने कहा है कि ऐसे प्रभावपूर्ण संप्रेषण के लिए यह भी जरूरी है कि नाटक की भाषा यथासंभव पात्रानुकूल होने के साथ-साथ सुबोध और एकाग्र तो हो ही, सूक्ष्म और व्यंजनापूर्ण भी हो, जो बोली जाने पर लयों और स्वरों का अपना विशिष्ट, आकर्षक संगीत रच सके। ऐसी भाषा के बिना कोई श्रेष्ठ तथा महत्त्वपूर्ण नाटक लिखा जाना संभव नहीं और संसार की सभी भाषाओं के श्रेष्ठ और उल्लेखनीय नाटककार अपने-अपने ढंग से अपने लिए अपनी भाषा का ऐसा विशेष आविष्कार करते आये हैं।यह विशेष आविष्कार संवादों की संरचना में दर्शनीय है जो नाट्यभाषा के स्वरूप को व्यक्त करता है।

 

संवाद योजना

 

संवाद योजना को कथोपकथन या बातचीत भी कहते हैं। संवादों की सहायता से नाटक का कलेवर निर्मित होता है। इसके माध्यम से ही नाटक की कथा का विकास होता है। एक दृष्टि से कथा का कथन ही संवाद के द्वारा संपन्न है। यह नाटक के आधारभूत प्राण तत्त्व हैं और नाटक की नाटकीयता उसके संवादों से ही विकसित होती है।

संवाद, नाटककार द्वारा निर्मित काल्पनिक संसार के पात्रों की बातचीत है और कम-से-कम दो पात्रों की आवश्यकता है। पात्रों के आत्मकथन भी इसके अंतर्गत आता है। नाटक के संवादों की भाषिक इकाइयों पर विचार करें तो उसमें तीनों पुरुषों की प्रधानता रहती है। इनमें से उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष बातचीत के सिलसिले में अपनी भूमिका बदलते रहते हैं। अन्य साहित्यिक विधाओं की तुलना में, जिनमें अन्य पुरुष की प्रधानता रहती है, नाटक की भाषिक इकाइयाँ भिन्न हैं। यह नाट्यभाषा की संरचनात्मक विशेषता को प्रकट करती है। नाट्य संवाद नाटक में अनेक संदर्भ पैदा करता है। यह पात्रों का बोलना मात्र नहीं है लेकिन वह कुछ ऐसे विचारणीय भाषिक तथा नाटकीय तत्त्वों की संरचना है जो नाटक की अभिव्यक्तिपरक प्रकार्य और शब्दों के व्याकरणिक संबंधों से उत्पन्न नाट्यार्थ सूचक तत्त्व है। नाटक की प्रत्येक स्थिति कार्य को उत्पन्न करती है। कार्य संवाद निर्माण के लिए उचित भूमिका तैयार करता है। इस प्रकार निर्मित संवाद पुनः नई स्थिति विशेष को जन्म देता है। अतः ये तीनों अन्योन्याश्रित एवं एक-दूसरे को उत्पन्न करने वाले भी हैं। यह निम्न आरेख से व्यक्त हो जायेगा। 

इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थिति और कार्य के आधार पर नाट्यभाषा की संरचना की जाती है। उसका ध्वनि संयोजन, शब्दनिर्माण, रूपगठन तथा वाक्य संरचना, नाट्यस्थिति एवं कार्य पर निर्भर है। ये दोनों नाट्य कथा पर आधारित एवं विकसित हैं। संवाद की भाषा प्रत्येक पात्र की आत्मा की भाषा भी है। इसलिए पात्र का आत्मतत्त्व उसमें आना स्वाभाविक है। यह आत्मप्रकाशन का सशक्त माध्यम होने के कारण पात्रों के चरित्र को भी द्योतित करता है।

इस प्रकार निर्मित लिखित-भाषा के रूप गठन का अध्ययन-विश्लेषण तथा सोच-विचार करने के लिए पाठकों के पास अवसर है। सामान्यतः लिखित भाषा संरचना संबंधी व्याकरणिक इकाइयों से तथा वाक्य संबंधी परिकल्पनाओं से युक्त रहती है, रंगमंच पर खेले जाने के कारण, पात्रों के द्वारा उच्चरित संवाद दर्शक सुना करते हैं। लिखित संवाद के उच्चरित रूप को वाककहना समीचीन है। वाकको भाषण भी कह सकते हैं। द्विवेदी जी ने ठीक कहा है- वागिन्दि्रय द्वारा उच्चरित और श्रवणेन्दि्रय द्वारा गृहीत भाषा का रूप वाक की कोटि में आता है।वाक या भाषण-नाटक में संवाद, मात्रा, बलाघात्, सुर, संगम आदि ध्वनि गुणों से युक्त रहता है। यह केवल सुनने से ही अनुभूत होता है न कि पढने से। अतः ध्वन्यात्मक शब्दिक भाषा में मौखिक एवं लिखित भाषा रूपों की सभी विशेषतायें निहित हैं।

 

अंगाश्रित शरीर भाषा

 

इस संदर्भ में यह स्मरणीय है कि नाटक सबसे पहले नाटककार की काल्पनिक दुनिया में काल्पनिक रंगमंच पर, काल्पनिक पात्रों द्वारा असंख्य बार खेला जा चुका है। इसी कल्पना को वह ध्वन्यात्मक भाषा एवं भाषेतर माध्यमों से अभिव्यक्ति करता है। नाटक की पांडुलिपि की हर एक इकाई नाटक के क्रियांश से जुडी रहती है। एक सूक्ष्मदर्शी अपने दीक्षण से इन भाषिक इकाइयों में छिपे क्रियांशों को कुशल अभिनेताओं के इंगितों की सहायता से, जो नाट्यभाषा रूपांश शरीरभाषा है, दर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है।

नाट्याभिनय के संबंध में कहते वक्त नाट्याचार्य ने वाचिक, आंगिक और सात्विक आदि अभिनय को सामान्याभिनय कहा है। यदि किसी नाट्य में सात्विकाभिनय की प्रधानता होती है तो वह उत्कृष्ट नाट्य बताया गया। ये सात्विक एवं आंगिक अभिनय मनोभावों पर आश्रित हैं और अध्वन्यात्मक भाषा से संबंधित हैं। ये अध्वन्यात्मक भावव्यंजित अभिनय, अभिनेताओं के नयनों, कपोलों, दाँतों, ओष्ठों से तथा अन्य अवयवों के संचालन से प्रकट किया जाता है। इस अध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति में भी, भाषिक संरचना के समान एक प्रकार की स्थिरता अथवा व्यवस्था है। यह व्यवस्थित अंगसंचालन ही आंगिक भाषा यानी शरीरभाषा है। पात्रों के अंग-संचालन (आंगिक-अभिनय) व्यवस्थित एवं पूर्व निर्धारित होने से ही दूसरे अभिनेताओं के इंगितों को तथा तद्जनित भावों को समझ लेते हैं। आहार्याभिनय से भी यही कार्य संपन्न होता है। एक अभिनेता जब फटी-पुरानी धोती पहनकर रंगमंच पर प्रवेश करता है तब उसका आहार्य निशब्द भाषाकी सहायता से यह स्पष्ट बताता है कि प्रस्तुत पात्र की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति क्या होती है। यह अर्थबोध ध्वन्यात्मकभाषा (वाचिकाभिनय) के जैसे-सभी दर्शकों को समान रूप से होता है। इसका कारण यह है कि आहार्य के माध्यम से भी निशब्द-भाषाकी सहायता से भावाभिव्यक्ति की जाती है। इस प्रकार की अभिव्यक्ति शरीरभाषा से संपन्न होने से यह भी नाट्यभाषा का अंग है।

इसके साथ-साथ नाट्यार्थ की अभिव्यक्ति करने के लिए अभिनेताओं का मौन‘, जो शरीरभाषा से जुडा हुआ है, बडी सहायता करता है। इसका भी, भावाभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में उपयोग किया जाता है। जिस प्रकार नाटककार ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचाराभिव्यक्ति करता है उसी प्रकार वह मौन संकेत से पात्रों के विचारों और भावों को प्रस्तुत करता है। पात्रों की बातचीत के सिलसिले में किसी एक पात्र का अचानक मौन, संवाद के बीच सोच-समझकर आयोजित खामोशी, दर्शकों के मन को आकर्षित करने वाली नाटकीयता मात्र नहीं, उसकी खामोशी में अन्तर्निहित कारणों को ढूँढने की जिज्ञासा भी दर्शकों के मन में उत्पन्न करती है। दर्शक पात्र की खामोशी में निहित, गुंफित अर्थ को समझ भी लेता है जिसको नाटककार अभिव्यक्त करना चाहता है। नाटक में आयोजित आर्थगर्भित मौन के बारे में डॉ. शमीम अलियार जी ने यों कहा है कि- नाट्य भाषा की खामोशी में एक खास तरह की खूबसूरती है, मौन में एक मनोहारिता है। और एक नकारात्मक स्थिति नहीं। उससे पहले और बाद में प्रयुक्त शब्दों के बीच वह एक सेतु का काम ही नहीं करता वरन् उनके आधार पर एक अर्थ की सृष्टि भी करता है। शब्दों के बीच की निस्तब्धता अपने में नाटकीय तनाव को वहन करने के कारण बहुत सार्थक हो सकती है। यों नाट्यभाषा मौन, हरकत, संवाद, गतिशीलता एवं स्थिरता का समन्वय करके अपना एक स्वतंत्र ढाँचा रचती है।इस प्रकार देखें तो आहार्य और मौन आदि अंगाश्रित शरीरभाषा से जुडे रहते हैं और नाट्यभाषा के अंश हैं।

 

उपकरणाश्रित मंचीय भाषा

 

वर्तमान युग की नाट्यभाषा का प्रमुख अंग है, उपकरणाश्रित मंचीय भाषा। नाटककार अपने मन में उद्बुद्ध विचारों और भावों की अभिव्यक्ति देने में ध्वन्यात्मक एवं अंगाश्रित भाषा के साथ-साथ इस विधा का भी इस्तेमाल करता है। यद्यपि यह नाटक के मंचन से संबंधित कार्य होने से निर्देशक पर निर्भर है, फिर भी वर्तमान नाटककार नाट्यभाषा के इस अंग पर ध्यान दे रहा है। क्योंकि नाटककार को कभी-कभी अपनी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अनुभूति की अभिव्यक्ति करने में ध्वन्यात्मक भाषा असफल प्रतीत होती है तब वह रंगमंचीय भाषा तत्त्वों की सहायता लेने में विवश हो जाता है। दृष्टा की अनुभूतियाँ तथा उनको प्रस्तुत करने वाले निर्देशकों के दृष्टिकोण अलग-अलग हो तो दृष्टा की अनुभूतियों का साक्षात्कार पूर्ण नहीं होगा। नाटककार, निर्देशक की अपेक्षा दृश्यकाव्य नाटक के दृश्यतत्त्वों की संप्रेषणीयता, भावव्यंजना और आकर्षणीयता से भलीभाँति परिचित एवं अनुभूत है और इसलिए ही इन तत्त्वों का प्रयोग करता है। अतः इस अध्वन्यात्मक भाषिक रूप के बिना नाटक और नाट्यार्थ अधूरा रहेंगे।

वर्तमान नाटक में रंगसज्जा का महत्त्व है। यह रंगसज्जा नाटक में चित्रित दृश्य एवं वातावरण के अनुसार होती है। नाटक के प्रस्तुतीकरण के समय निर्देशक अपनी ओर से या नाटककार के निर्देशानुसार कई वस्तुओं का मंच पर उपयोग करता है। इन वस्तुओं का उपयोग दो कार्यों के लिए होता है। कई वस्तुएँ नाटक के वातावरण की सृष्टि के निमित्त इस्तेमाल की जाती हैं तो अन्य ऐसी होती हैं जिनका उपयोग नट या नटी अभिनय के बीच करते हैं। इन वस्तुओं का उपयोग करने के पहले नाटक के संकलनत्रयसंबंधी तत्त्वों को मन में रखना चाहिए। रंगमंचीय वस्तुओं से तैयार किये गये वातावरण के साथ कथावस्तु को दर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है। रंगसज्जा, नाटकों में यथार्थ का भ्रम उत्पन्न करती है और साथ-ही-साथ पात्रों के स्तर, जीवनादर्श आदि को व्यक्त करती है। मंच पर उपयुक्त एक-एक चीज अपनी मौन भाषासे दर्शकों से संवदन करती है।

रंगसज्जा के समान रंगदीपन दर्शकों से संवदनकरता है। यह केवल एक यांत्रिक वृत्ति नहीं कह सकते। यह विशिष्ट प्रकार की भावाभिव्यक्ति है क्योंकि इसके माध्यम से नाटककार एवं नाटक-व्याख्याता निर्देशक बहुत कुछ बातें दर्शकों को बताते हैं। रंगमंच पर तथा अभिनेताओं पर, नाट्यार्थानुसार भिन्न-भिन्न रंग के प्रकाश पडते समय अभिनेताओं, मंचीय-वस्तुओं से युक्त रंगमंच एक सुंदर चित्र जैसा बन जाता है। इसके साथ अभिनेताओं के आंतरिक द्वंद्व के अनुसार उत्पन्न हाव, भावादि प्रत्येक-प्रत्येक रंगीले-प्रकाशों के माध्यम से प्रदीप्त किये जाते हैं। अतः रंगदीपन कला ऐसी माँग थी जो कलाकार के अंतर्भावों को उभारने में सहायक सिद्ध हो और कुछ नवीन रूप प्रस्तुत कर सके।

उनके अलावा नाटक में ध्वनिका प्रयोग दर्शकों के मन में विशेष प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से किया जाता है। यह भी एक विशिष्ट मंचीय साधन है। नाटक के प्रस्तुतीकरण के संदर्भ में उत्पादित ध्वनिघटना के वातावरण की सृष्टि करती है। इसके साथ प्रत्येक घटना या नाट्यगति की ओर दर्शकों का ध्यान सामूहिक रूप से आकर्षित करके उनके मन में रसोद्रेक की सहायता भी करती है। अतः नाट्य प्रस्तुतीकरण के संदर्भ में उत्पादित ध्वनि दर्शकों से कुछ-न-कुछ अवश्य बताती है जिसको समझकर उनके मन में उसके प्रति प्रतिक्रिया होती है, उनके संवेग जागृत होते हैं तथा वे तीव्र नाटकीय अनुभूति को प्राप्त करते हैं। नाटक में भावाभिव्यक्ति एवं विचार संप्रेषण के लिए उपयुक्त साधनों को रेखाचित्र के द्वारा यों व्यक्त कर सकते हैं। उपर्युक्त रेखाचित्र से नाट्यभाषा का स्वरूप अधिक-स्पष्ट होगा कि नाटककार के द्वारा नाट्यार्थ की प्रस्तुति करने के लिए प्रयुक्त एक विशिष्ट अभिव्यक्ति के माध्यम को नाट्यभाषाकी संज्ञा से अभिषित है।

 

 

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आज भले ही हिन्दी साहित्य में छायावादी युग का अवसान हो चुका हो किन्तु यह सत्य है कि हिन्दी कविता छायावाद के एक अत्यन्त समृद्ध व सम्पन्न दौर से गुजरा है। हिन्दी में जब कभी छायावाद की चर्चा होती है, तब उसके चार सुदृढ स्तम्भों के रूप में प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा तथा सुमित्रानंदन पंत को याद किया जाता है। ये चारों उस युग के कवि हैं, जब हिन्दी कविता घुटनों के बल चलना सीख रही थी। सुमित्रानंदन ने जब लिखना शुरू किया, उस समय मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवि मौजूद होने के बावजूद हिन्दी को कविता की भाषा के रूप में मान्यता तक प्राप्त नहीं थी। प्रसाद व निराला के साथ मिलकर पंत ने हिन्दी को कविता की न केवल सौम्य, सुकुमार और सशक्त भाषा के रूप में एक सर्वथा नवीन प्रतिष्ठा दिलवाई बल्कि हिन्दी काव्य के लिए एक बिल्कुल नई शैली भी ईजाद की।
पंत जी की रचनाओं के बारे में प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि वह संसारमुखी व यथार्थवादी होने के बदले रूमानी और अति आत्मकेन्द्रित क्यों है ? वस्तुतः यह हमारी समूची सांस्कृतिक विरासत का ही मूल तत्त्व व मौलिक स्वर है। हिन्दी कविता छायावादी युग के उस दौर में अपने प्रसव-संकट के समय उस आदि साँचे की ओर लौट गई, जो सदियों से भारतीय चेतना का मूल मातृ साँचा रहा है।
प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत अल्मोडा जिले के कोसानी नामक स्थान पर २० मई १९०० को जन्मे। कवि और पीडा के शाश्वत रिश्ते की सत्यता उनके जन्म के कुछ ही घंटों के बाद माँ की मृत्यु के रूप में प्रकट हुई। माँ के अभाव ने बालक सुमित्रानंदन को अपने पिता के बहुत अधिक निकट ला दिया। पिता गंगादत्त जी कोसानी में चाय बागानों की मैनेजरी के अलावा लकडी का कारोबार भी करते थे। आर्थिक स्थिति सुदृढ थी किन्तु युवावस्था में ही पत्नी के बिछोह से वह जीवन के प्रति विरक्त हो उठे। विरक्ति के बावजूद वह बालक सुमित्रानंदन पंत से अत्यधिक स्नेह रखते थे।
पंत जी का बाल्यकाल अल्मोडा में उनके पिता द्वारा बनवाए गए शानदार व विशाल मकान में बीता। सन् १९०५ में वह विद्याध्ययन हेतु कोसानी पाठशाला में दाखिल किए गए। संस्कृत का प्रारम्भिक ज्ञान उन्हें अपने फूफा से प्राप्त हुए। नौ वर्ष की अल्पायु में बालक पंत ने मेघदूत, अमरकोश, चाणक्य आदि संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन पूर्ण कर लिया था। पंडित अम्बादत्त जोशी से पंत जी ने फारसी तथा अपने पिता से अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की।
दस वर्ष की आयु में शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से पंत जी अल्मोडा आए। यह उनके मानसिक विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण मोड था। इस दौरान वह स्वामी सत्यदेव के सम्फ में आए, जिन्होंने पंत जी के विचारों को एक साहित्यिक एवं राष्ट्रवादी स्पर्श प्रदान किया। पंत जी ने अल्मोडा में ही विधिवत हिन्दी साहित्य का अध्ययन प्रारम्भ किया। इस बीच उन्हें इलाचन्द्र जोशी, गोविन्दवल्लभ पंत और श्यामचरण पंत जैसे मित्र मिले। साहित्यिक गतिविधियों के कारण उनकी पढाई-लिखाई प्रभावित तो अवश्य हुई किन्तु फिर भी बदस्तूर चलती रही। उन्होंने अल्मोडा में नौवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।
इस दौरान उन्होंने अपना नाम गोसाई दत्त से बदल कर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। पंत जी ने कक्षा सातवीं या आठवीं में अध्ययन के दौरान ही कविकर्म को अपनाने का निश्चय कर लिया था।
एक बार सुमित्रानंदन पंत अपने पिता के साथ नैनीताल गए। वहाँ की प्राकृतिक सुषमा से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी प्रथम रचना ‘हार‘ लिखी। इस उपन्यास में नैनीताल के प्राकृतिक सौन्दर्य का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
पन्द्रह वर्ष की आयु में पंत जी ने पद्य और छंदों में अभिनव प्रयोग करते हुए अनेक रचनाएँ लिखीं। उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ समसामयिक विषयों व प्राकृतिक सौन्दर्य पर केन्द्रित थीं। ये रचनाएँ ‘सुधाकर‘, ‘मर्यादा‘ तथा अल्मोडा के स्थानीय अखबारों में छपती थीं।
अगस्त १९१८ में पंत जी ने बनारस के जयनारायण हाई स्कूल में प्रवेश लिया। इसी साल गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर वहाँ पधारे। पंत जी उनसे बहुत प्रभावित हुए। अगले वर्ष वह इंटर की परीक्षा पास करने प्रयाग के म्योर सेन्ट्रल कॉलेज आ गए, जहाँ उन्हें रामचन्द्र जी टंडन, परशुराम चतुर्वेदी, फिराक गोरखपुरी आदि हस्तियों के सम्फ में आने का अवसर मिला। सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलन के दौरान गाँधी जी के आह्वान पर पंत जी ने कॉलेज छोड दिया।
सन् १९२६-२७ में पंत जी की पहली पुस्तक ‘पल्लव‘ के नाम से प्रकाशित हुई। इस समय आर्थिक रूप से पंत जी के परिवार की स्थिति अत्यधिक नाजुक थी। सारी जमापूँजी खर्च हो चुकी थी। हजारों रुपयों के कर्ज को चुकाने में जमीन जायदाद व घर का सामान तक बिक चुका था। १९२७ में बडे भाई रघुदत्त जी की मृत्यु ने पंत जी को अन्दर तक हिला कर रख दिया। पंत जी के पिता अपने बडे पुत्र की मृत्यु के सदमे को सहन नहीं कर पाए और डेढ साल बाद ही परलोक सिधार गए। संवेदनशील व भावुक पंत के लिए यह बहुत गहरा आघात था, जिसके कारण वह लम्बे समय तक अस्त-व्यस्त रहे।
सन् १९३० में पंत अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गए। यहाँ उन्होंने फ्रायड, साम्यवाद, माक्र्सवाद आदि का गहन अध्ययन किया। वह माक्र्स के आर्थिक चिंतन से बेहद प्रभावित हुए। पूरनचन्द जोशी के सानिध्य में रहकर उनके विचारों में परिपक्वता आई। इस दौरान उन्होंने कवि के कल्पनाशील मन के लिए यथार्थ की नई जमीन तोडी। इस सम्बन्ध में पंत जी कहते हैं – ‘मेरे पाठक इस तथ्य से परिचित हैं कि काला कंकर के ग्राम जीवन के महान् सम्फ का प्रभाव मेरी समूची जीवन दृष्टि का एक अनिवार्य अंग बन चुका है। युगवाणी और ग्राम्या ही में नहीं, उसके बाद की रचनाओं में भी किसी न किसी रूप में और लोकायतन में विशेष रूप से उस दृष्टि की व्यापक छाप देखने को मिलती है।‘
पंत जी ने अपने भावों और विचारों को मूर्तरूप प्रदान करने के दृष्टिकोण से ‘लोकायतन‘ नामक संस्था की शुरुआत की किन्तु इसमें कुछ समय उन्हें खास कामयाबी नहीं मिली। पांडिचेरी के अरविन्द आश्रम में कुछ समय रहने के बाद पंत जी ने स्वयं को अरविन्द-दर्शन से अभिभूत पाया। अरविन्द विचार-श्ाृंखला का क्रमबद्ध अध्ययन करने के बाद पंत जी की जीवन दृष्टि ने और व्यापक आधारभूमि पाई। युगान्त, युगवाणी, स्वर्णकिरण आदि रचनाएँ उनके यथार्थोन्मुख रुख की ओर इंगित करती हैं।
सन् १९३८ में पंत जी ने ‘रूपाभ‘ नामक एक प्रगतिशील मासिक पत्र का संपादन भार संभाला। रघुपति सहाय, शिवदानसिंह चौहान, शमशेर जैसे लोगों के सम्फ में आने के बाद वह प्रगतिशील लेखक संघ से जुडे।
१९५५ से १९६२ तक सुमित्रानंदन पंत आकाशवाणी के मुख्य प्रोड्यूसर के पद पर बने रहे। १९६१ में उन्हें भारत सरकार के उच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘पद्मभूषण‘ से अलंकृत किया गया।
सन् १९६९ में सुमित्रानंदन पंत को उनकी काव्य कृति ‘चिदम्बरा‘ के लिए देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ‘ज्ञानपीठ‘ से सम्मानित किया गया। ‘चिदम्बरा‘ को वर्ष १९६८ की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृति घोषित करते हुए कहा गया कि कवि पंत की ये काव्य रचनाएँ युग के संघर्षों की पृष्ठभूमि में नई सौन्दर्यबोध भावना, भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक विकास की शक्तियों के समन्वय से प्रसूत नैतिकता की धारा एवं उन्नत मनुष्यत्व की चेतना को रूपायित करती है। कवि पंत हिन्दी काव्य में आधुनिक युग के प्रवर्तकों तथा अभिनव काव्य-चेतना के प्रेरकों में अग्रगण्य हैं।
आजीवन अविवाहित रहे हिन्दी साहित्य के इस महत्त्वपूर्ण लेखक ने तीन नाटक, एक कहानी संग्रह, एक उपन्यास, एक संस्मरण संकलन सहित करीब चालीस पुस्तकें लिखीं, जो उनकी निरन्तर सृजनशीलता को रेखांकित करती हैं। ‘उच्छ्वास‘, ‘गुंजन‘, ‘वीणा‘ आदि छायावादी कृतियों से शुरू हुआ यह साहित्यिक सफर अरविन्द-दर्शन और साम्यवादी युग-चेतना से प्रभावित ग्रंथों ‘युगांत‘, ‘स्वर्णकिरण‘, ‘उत्तरा‘, ‘पतझड‘, ‘शिल्पी‘ में सिमटता हुआ ‘कला और बूढा चाँद‘ जैसी यथार्थवादी रचना तक पहुँचा। इस रचना पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। ७७ वर्ष की आयु में सुमित्रानंदन पंत का निधन हो गया, जो सचमुच हिन्दी साहित्य जगत् की अपूरणीय क्षति था।

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