हिन्दी साहित्य

आधुनिक काव्य-आलोचना की अवधारणा

Posted on: जनवरी 17, 2008

 

काव्य-आलोचना की अवधारणा, औचित्य, यथार्थ और प्रक्रिया तथा इसके प्रतिमानों को लेकर यहाँ प्रस्तुत विचार लेखक के अनुभवपरक निष्कर्षों तथा व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित हैं तथा जहाँ तक सम्भव हो सका है, विविध ग्रंथों तथा विद्वानों के उद्धरणों से बचने का प्रयास किया गया है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि अपने समय का अधिकृतियों के प्रति अवमानना का भाव है, बल्कि यहाँ प्रयास इस बात का किया गया है कि विषय को जटिल तथा बोझिल होने से बचाया जाये। यह भी आग्रह है कि लेख में प्रस्तुत विचारों को संकेत रूप में ग्रहण किया जाये।
जिस तरह से विभिन्न रचनाकारों के रचनात्मक आधार, प्रेरणा तथा अभिप्रेत कभी भी समान नहीं हो सकते, ठीक उसी प्रकार आलोचना की कोई एक निश्चित तथा सर्वमान्य अवधारणा भी स्थापित नहीं की जा सकती क्योंकि रचना की भाँति ही आलोचना भी लेखक की बौद्धिक-तात्त्विक चिंता और विचार-प्रक्रिया का परिणाम होती है। आलोचना रचना के प्रति उत्तरदायी सामाजिक और सांस्कृतिक कर्म है। कविता जीवन के अनुभवों को रचनाकार के संवेदनशील दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जिसमें सर्जक की यथार्थपरक कल्पना तथा कल्पनापरक यथार्थ का समावेश होता है। कविता जीवन का भाव पक्ष है, संश्लिष्ट पक्ष और संवेदनात्मक पक्ष है जिसे कवि अपने अनुभवों की आँच में तपा कर कलाकृति के तौर पर पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है। आलोचना इसका विश्लेषण करती है।
आलोचना को उसकी उपयोगिता या सार्थकता के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जाना मुनासिब लगता है क्योंकि आलोचना का महत्त्व रचना से कम नहीं हुआ करता। आलोचक को सबसे पहले तो एक गंभीर तथा धैर्यवान पाठक होना चाहिए और इस स्तर पर आलोचना के मूल्य तथा महत्त्व को सरसरी तौर पर न आँक कर तर्कसम्मत ढंग से रेखांकित करना चाहिए।
कवि के सर्जनात्मक व्यापार की सूक्ष्मता, संवेदना और व्यापकता के विश्लेषण और व्याख्या का जो महत्त्व होता है, वह सिर्फ आलोचना के जरिये ही सम्भव हो सकता है। आलोचना कवि-कर्म को जाँचने-परखने-विश्लेषित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य करती है, रचना की खामियों-खूबियों को उजागर करती है, कवि की कमियाँ बताती है, रचना का स्थान निर्धारित करती है तथा उसका मूल्यांकन करती है। तटस्थ, गंभीर तथा निरपेक्ष आलोचना सचेत करने का दायित्व भी निभाती है। इस प्रकार की आलोचना से ही रचना-परिवेश की सेहत सुधारने में सहायता मिल सकती है। आलोचना-कर्म रचना से कम जम्मेदार कर्म नहीं है। आलोचना साहित्य का अभिन्न सिद्धान्त अवश्य है लेकिन वह साहित्य की कोई उपशाखा न होकर उसकी पूरक हुआ करती है। दरअसल आलोचना का मूल भी रचना की भाँति ही सौन्दर्यशास्त्र में अवस्थित होता है। जीवन, रचना और आलोचना दोनों का ही आधार होता है। यदि कविता कवि की दृष्टि से जीवन का नवसर्जन है, तो आलोचना जीवन के उस नवसृजन का पुनर्सृजन है क्योंकि वह रचना में मौजूद अर्थ को प्रकट करती है। आलोचना पाठक और कविता को परस्पर जोडने वाले पुल का काम करती है।
आलोचना में आलोचक की निजी पसंद-नापसंद का ना तो अधिक महत्त्व होता है और ना ही होना चाहिए। यह कविता की ओर से पाठक को सम्बोधित होने वाला कर्म है। कविता में मौजूद और प्रकट होने वाला जीवन और रचनात्मक दृष्टि के प्रति गंभीर नजरिया ही वस्तुतः आलोचना-कर्म की गहराई और सार्थकता को निश्चित करता है। कुल मिलाकर आलोचना रचना के नवीन अर्थों तथा सम्भावनाओं को उद्घाटित करने वाला कर्म और किसी भी आलोचक के लिए उसका आलोचना-कर्म ही वास्तव में आलोचना का धर्म है। आलोचना किसी भी रचना का उपसंहार नहीं होती, बल्कि वह रचना के अर्थ-प्रवाह का सातत्य है। यही आलोचना-कर्म की धुरी है।
आलोचक के दायित्व के बारे में कहा जा सकता है कि कृति से गुजरते समय आलोचक महज एक आलोचक ही न होकर रचना का पाठक और प्रशंसक, विरेचक और कृति विषयक मंतव्य देने वाला सजग व्यक्ति भी होता है। इस लिहाज से, उसका दायित्व एकल न होकर बहुआयामी होता है। एक सुलझा हुआ आलोचक इस बात से भलीभाँति परिचित होता है कि मानवीय गतिविधियाँ और मानव स्वभाव ही रचना तथा आलोचना के मूल बिन्दु होते हैं। आलोचक को उस चेतना से, उस संवेदनात्मक ज्ञान और अनुभूति से सम्पृक्त होना ही चाहिए, जिसने रचनाकार की चेतना का संस्पर्श किया है। उसके लिये जीवन, मानव स्वभाव तथा संस्कृति की अनेकानेक परम्पराओं की एक समग्र-समन्वित परम्परा से परिचित होना भी आवश्यक होता है। इस रूप में वह कहीं न कहीं जीवनानुभूतियों, कार्य व्यापार तथा मनुष्य स्वभाव के इतिहासकार की भूमिका का निर्वाह भी कर रहा होता है।
किसी रचना में यथार्थ और मानव स्वभाव का तथा परम्परा का कौनसा, कितना पक्ष अभिव्यक्त हुआ है और कैसे, यह संकेत करना आलोचक का काम है। जिस वक्त आलोचक रचना के उक्त बिन्दुओं पर केन्द्रित होता है, ठीक उसी वक्त उसकी भूमिका आलोचक की न रहकर रचनाकार की हो जाती है। दरअसल, रचना में रचनाकार के भटकाव को रेखांकित करते समय आलोचक की भूमिका रचनाकार के सहयात्री की बन जाती है। एक अनुभवसम्पन्न, सिद्धहस्त आलोचक यह बता सकता है कि रचना का कथ्य भाषा तथा जीवन से किस हद तक मेल खाता है। इस रूप में आलोचक की भूमिका निःसन्देह अन्वेषक की भी हो जाती है।
कवि को रचना में जीवन के प्रभावों की, जबकि आलोचक को रचना में सन्निहित प्रभावों की पुनर्संरचना करनी होती है। आलोचक का प्रथम कार्य रचना की गुणवत्ता की पडताल करना ही होता है। वह वस्तुतः पाठक की ओर से कर्मप्रवृत्त होता है तथा अपनी रचना की ओर से कवि को जवाब देने को तैयार करता है। वह रचनात्मक जीवन मूल्यों को अपने समग्र परिवेश में विवेचित कर रचना विशेष की सार्थकता, गंभीरता के बारे में तर्कसम्मत निष्कर्ष निकालता है और यह उल्लेख भी करता है कि सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में उस रचना का क्या मूल्य है। तदनंतर रचना के शिल्पगत सौष्ठव, भाषा-कौशल, अर्थव्यापकता और समग्र रचनात्मक परिवेश में रचना-विशेष की मूल्यवत्ता के बारे में स्पष्ट, पूर्वाग्रहरहित निष्कर्ष भी देना पडता है। अतएव रचना को सम्प्रेषण, भाषा, संवेदन, अर्थ और संरचना के स्तर पर पूर्णता प्रदान करना ही आलोचक का दायित्व है। इस लिहाज से देखें तो आलोचक को भी एक ही साथ अनेकायामी भूमिका का निर्वाह करना पडता है।
आलोचना की तकनीक तथा प्रतिमानों को अलग कर नहीं देखा जा सकता। इस स्तर पर रेखांकित किया जाना चाहिये कि आलोचना के अन्तर्गत कवि की आशापरक खूबियों, उसकी शैलीपरक विशेषताओं तथा रचनाकार की अनुभूतियों, संवेदनों और अनुभवों के रचना में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया का खुलासा करने का प्रयास मौजूद होना चाहिये। आलोचना को इतना सक्षम होना चाहिये कि वह कवि के अनुभवों की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता को समीचीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित कर सके। कविता के ?पाठ? ;ज्मगजद्ध के अर्थ को उजागर करने की दृष्टि से कथ्य और शिल्प का समान महत्त्व हुआ करता है। कथ्य चूँकि कविता का प्राण तत्त्व होता है तो आलोचना उसी कथ्य को तथ्य के तौर पर उद्घाटित करती है। कथ्य और शिल्प का अभिन्न समन्वय ही किसी रचना की आकृति को निश्चित करता है।
रचना में मौजूद राजनैतिक विचारधारा का आलोचक के लिये कितना महत्त्व हो सकता है ? इसका उत्तर यों दिया जा सकता है – जितना भोजन में नमक का। विचारधारा की प्रचुरता से रचना की आँच कम पडती है और वह उसकी सीमा बन जाया करती है। किसी विचारधारा विशेष का वाद्ययंत्र बन जाना जिस तरह से रचना के लिये हानिकारक हैं, ठीक उसी तरह आलोचक के लिये भी यह श्लाघनीय नहीं माना जा सकता। असल में आलोचक की जम्मेदारी तो रचना के प्रति ही होनी चाहिये। विचारधाराओं का ज्ञान आलोचकीय दृष्टिकोण को पैना बना सकता है लेकिन आलोचक को किसी विचारधारा का बंधक नहीं बनना चाहिये। दृष्टि की व्यापकता, विचारों का खुलापन, जीवन के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण तथा परिवेश और परम्परा से जुडाव आलोचक के मंतव्य को ठोस-विश्वसनीय बनाने के लिहाज से कारगर होते हैं।
भारतीय साहित्य-आलोचना के प्रतिमानों के अन्तर्गत इस बात पर जोर दिया जाना चाहिये कि काव्य कृति की भाषा, शैली, बिम्ब, प्रतीक, देशकाल तथा रचना में विद्यमान प्राकृतिक प्रभावशीलता को भारतीय काव्य सिद्धान्त के प्रकाश में ही विश्लेषित किया जाना चाहिये। ऐसा करते समय समकालीन यथार्थ की जटिलता को रेखांकित करना भी आवश्यक बन जाता है। संस्कृत के काव्य सिद्धान्त या पाश्चात्य काव्य सिद्धांत पर निर्भर रह कर ही आधुनिक काव्य कृति का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता बल्कि इसके लिये हमारे पास केन्द्रवर्ती भारतीय परम्परा से निःसृत काव्य दृष्टि और समकालीन युग बोध का होना आवश्यक है। कविता में मौजूद लय को अलग से रेखांकित किया जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि वह कविता के प्रवाह और संरचना का अभिन्न अंग होता है। आलोचक को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि रचना का ?लोकल कलर? ही वस्तुतः उस कृति की ?यूनिवर्सल अपील? को; उसकी गहनता को; उसकी गंभीरता को; उसकी अर्थवत्ता को तथा अंततः सांस्कृतिक-परम्परा में रचना के स्थान को निर्धारित करता है। प्रतिमान-विकास के सन्दर्भ में कहना जरूरी लगता है कि भारतीय जनमानस तथा यहाँ की जडों व यहाँ के जीवन परिवेश से निःसृत सिद्धान्तों के आधार पर ही समकालीन आलोचना का स्वरूप निश्चित होना चाहिये। अमेरीकी या अंग्रेजी आलोचना सिद्धान्तों के माध्यम से भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य की आलोचना नहीं की जा सकती।
रचना की भाँति आलोचना भी अंततः एक शोधयात्रा और सतत संवाद का सिलसिला ही होती है। अपनी यात्रा के दूसरे व्यक्ति के नजरिये से किये मूल्यांकन को ही आलोचना का पर्याय माना जाना चाहिये। यह मूल्यांकन एक ऐसा व्यक्ति करता है जो रचनाकार की कृति से अपना आत्मीय रिश्ता बनाने का प्रयास करता है। इसलिये रचनाकार-कवि को भी आलोचना के समीप आत्मीय भाव से ही जाना चाहिये। आत्मीयता के आधार पर ही आलोचना रचनाकार के लिये भविष्य में सहायक सिद्ध हो सकती है।
आलोचना की विभिन्न धाराओं तथा आलोचना सिद्धान्त और प्रतिमानों की बहस में उलझे बिना इतना तो निःसन्देह कहा ही जा सकता है कि अंततः रचना का पाठ, आलोचक की जीवन दृष्टि तथा कवि की सर्जनात्मक दृष्टि का द्वंद्व तथा समन्वय एवं कृति की ओर से प्रस्तुत स्वयं को परखने के प्रतिमान ही काव्य-मूल्यांकन के लिये कारगर औजारों के निर्माण में मददगार हो सकते हैं। सर्जनात्मक आलोचना की संभावना इसी से बनती है।
आलोचना प्रत्यक्ष रूप से समय की रचनात्मक प्रवृत्तियों को रेखांकित करती है और इसके विकास को दर्शाती है। आलोचना का यह दायित्व किसी भी लिहाज से कमतर नहीं है। एल.पी. स्मिथ ने आलोचना की महत्ता को बेहतर ढंग से प्रकट करते हुए लिखा है कि – ?साहित्य के महान् तात्पर्य सादृश्य दर्शकों (शेक्सपीयर के नाटकों के संदर्भ में) के प्रति मेरे मन में इतना अधिक उपकार का भाव है कि आलोचकों की निन्दा करने के काम में मैं शायद ही शामिल हुआ करता हूँ। आलोचकों ने मुझे कान दिये हैं, आँखें दी हैं। उनसे मैंने सीखा है। दरअसल उन्होंने हमें सिखाया है कि जीवन सौन्दर्य का बेहतरीन ढंग से रसास्वादन किस तरह से किया जा सकता है, उसकी प्रशंसा कैसे की जा सकती है और उसे कहाँ-कैसे पाया जा सकता है और जब हम प्रतिष्ठित-समर्थ लेखकों की अनेक पुस्तकें पढने से चूक जाते हैं तो कितनी महत्त्वपूर्ण और सौन्दर्यपरक सम्पदा से वंचित रह जाते हैं।
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