हिन्दी साहित्य

भाषा गणना के जार्ज ग्रियर्सन

Posted on: जनवरी 17, 2008

 

भाषा गणना के जार्ज ग्रियर्सन

भारत में पिछली जनगणना २००१ ई. में हुई थी। यह प्रत्येक दशक के प्रारम्भ में होती रही है। विश्व में मानवों की संख्या का सही आकलन करने की इस विश्वजनीन योजना के हम सभी चिर-ऋणी हैं। समस्त संसार की ऐसी जनांकिकी से ही हमें वह अमूल्य सांख्यिकी प्राप्त होती है जो हर तरह की जानकारी का और योजनाओंे का आधार बनती है। जनगणना की इस प्रक्रिया के बहाने अनेक ऐसी ही बहुमूल्य अन्य ज्ञान-सामग्रियाँ भी भारत को मिली हैं जो इतिहास में अमर हो गई हैं। यह शायद कम ही लोगों को मालूम होगा कि जनगणना की ऐसी दशवर्षीय प्रक्रिया भारत में शुरू नहीं होती तो भारत का वह विराट् भाषायी सर्वेक्षण जिसके आधार पर व्यापक भाषिक अनुसंधान और लेखन इस देश में होते रहे हैं, नहीं हो पाता। जार्ज ग्रियर्सन की ??लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया?? जिसकी विशाल जिल्दें भारत के कोने-कोने की एक-एक भाषा और बोली के श्रमपूर्वक संकलित नमूनों के साथ अमूल्य भाषा परिवारों की जानकारी देने वाला अक्षय स्रोत है, इसका प्रत्यक्ष साक्ष्य है। इसका छोटा-सा लेखा-जोखा इस अभूतपूर्व और नायाब चमत्कार की एक झलक आपको दे सकेगा।
भारत में कितनी भाषाएँ (और कितनी बोलियाँ) हैं इसका प्रामाणिक सर्वेक्षण सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने १९२७ ई. में उपर्युक्त विराट् संकलन ग्रन्थ के रूप में, अपनी वृहत् भूमिका और विवेचनों के साथ छपाया था। भारत की इस भाषा गणना की प्रेरणा ग्रियर्सन को जनगणना प्रक्रिया के दौरान, बल्कि जनगणना में लगने के कारण ही मिली। १८९१ की जो जनगणना हुई उसमें भाषा के आँकडे किस प्रकार शामिल किये जाएँ इस पर विचार भी चला। प्रत्येक दशवर्षीय जनगणना से जटिल भाषायी आँकडे निकल कर, उलझ कर रह जाते थे। जार्ज ग्रियर्सन (१८५१-१९४१) इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी थे। वर्षों तक वे बिहार में मिथिला के परगना अधिकारी (एस.डी.ओ.) रहे। जनगणनाओं के दौरान आई.सी.एस. अधिकारियों को ही पर्यवेक्षकीय दायित्व दिया जाता था, गिनती का काम तो पटवारी आदि का पूरा तंत्र करता था। ग्रियर्सन ने प्रस्ताव किया कि जनगणना की तरह ही, बल्कि जनगणना के साथ ही भाषा गणना क्यों न करवा ली जाए। यह प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और एक विशाल तंत्र चप्पे-चप्पे पर जाकर एक-एक बोली के नमूने, उनके अभिधान और समस्त संबद्ध जानकारी इकट्ठी करने लगा। १९२१ की जनगणना के साथ ये आँकडे मुकम्मिल हुए। ग्रियर्सन ने इनका संकलन और संपादन किया। इससे पूर्व इतने बडे पैमाने पर कोई भाषा सर्वेक्षण नहीं हुआ था इसलिए भाषाओं या बोलियों के नामकरण, वर्गीकरण आदि में उन्हें बहुत कठिनाई हुई। अनेक अभिधान और वर्ग उन्हें अपने विवेक से बनाने पडे। इन सबका विवरण ईमानदारी से उन्होंने अपने विस्तृत विवेचन में दे भी दिया है।
भाषाशास्त्री जानते हैं कि भाषिकीय, शास्त्रीय परिभाषा में भाषा और बोली में कोई विभाजक रेखा नहीं है। अलग-अलग भाषाशास्त्री इनकी अलग-अलग परिभाषा देते हैं। इस पर विवेचन की यहाँ प्रासंगिकता नहीं है, इसे फिर कभी उठाया जाएगा। यहाँ इतना ही प्रासंगिक है कि ऐसे वर्गीकरण की कठिनाई और अपने ओर से किये गये वर्गीकरण का संकोच और विनय के साथ आधार बतलाते हुए ग्रियर्सन ने अपने सर्वेक्षण के फलस्वरूप भारत में १७९ भाषाएँ और ५४४ बोलियाँ विवेचित कीं जिनके नमूने उन्हें मिल पाए थे। ये सब नमूने भी देवनागरी में इन जिल्दों में प्रकाशित हैं जो उनके अर्थात् उनके नीचे कार्यरत पटवारियों आदि की विशाल टीम के अथक श्रम के प्रमाण हैं। स्पष्ट है कि यह भाषागणना पाश्चात्य प्रशासकों द्वारा चलाई गई जनगणना प्रक्रिया की ही अमूल्य देन है। यह हम इसलिए भी लिख रहे हैं कि पहली बार प्रारम्भिक प्रयास के रूप में किये गये इस ग्रियर्सनीय सर्वेक्षण को आज तक वेदवाक्य मानकर आँख मूँद कर अन्तिम वाक्य भी माना जा रहा है और किसी भी भारतीय माई के लाल ने इस सर्वेक्षण के आगे कोई भी प्रयास या निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया नहीं अपनाई। यह तो निर्विवाद है ही कि इस प्रकार के ऐतिहासिक आंकलनों की जो परम्पराएँ ब्रिटिश सरकार के प्रशासकों ने स्थापित कीं और जो निष्पक्ष दृष्टि से भारत हितकारी भी रहीं (जैसे हर जिले का गजेटियर लिखकर सारी जानकारी चिरस्थायी बनाने का प्रयास, पुरातत्त्व-सर्वेक्षण की खुदाइयाँ आदि) उनका एहसान मानने में हमें कोताही नहीं करनी चाहिए। वह हमने की भी नहीं है। यह अवश्य है कि ऐसे प्रयत्नों को वहीं समाप्त न मानकर वह प्रक्रिया हमें चलाते रहना चाहिए क्योंकि ज्ञान और उसका आकलन सदा चलने वाली और पुनर्नवीनीकृत होते रहने वाली प्रक्रिया होती है।
ग्रियर्सन ने तत्कालीन जानकारी को आधार मानकर एक प्रस्ताव या प्रयोग के रूप में अनेक ऐसे नामकरण या वर्गीकरण किये जिन पर उतना विचार नहीं हो पाया जितना आवश्यक है। उदाहरणार्थ उसने भोजपुरी और मैथिली जैसी भाषाओं के नमूने लिए और नामकरण भी। भाषा और बोली बताने का उसका आधार था – बडे क्षेत्र, राज्य या प्रान्त में बोली जाने वाली तो हुई भाषा और उसके नीचे के छोटे-छोटे भू-भागों वाली हुई बोली। इस आधार पर भोजपुरी और मैथिली को उसने बोलियों में वर्गीकृत किया और पूरे बिहार में बोली जाने वाली किसी भाषा का ज्ञान या नाम उस समय था नहीं अतः अपनी ओर से एक भाषा वर्ग बनाया ??बिहारी??। यह अभूतपूर्व नाम न पहले था, न आज ह। फिर कहा कि मैथिली और भोजपुरी आदि ??बिहारी?? भाषा की बोलियाँ हैं। अपने नवें अध्याय में उसने यह अभिगम और ये सब नूतन प्रयोग ससंकोच वर्णित भी कर दिये हैं। उसने राजस्थान की मारवाडी, राजावाटी, हाडौती, ढूंढारी आदि बोलियों के नमूने लिए, जो जो नामकरण कहीं से सुने वे भी उल्लिखित किये और अपने विवेक और अनुमान से उनका वर्गीकरण कर दिया। तभी तो वागडी को बीकानेरी की बहन बतला दिया। भीली को एक अलग भाषा बता दी। मालवी और नीमाडी को राजस्थानी की उपबोलियाँ बता दिया, जो भीली की होनी चाहिए थीं उसके वर्गानुसार। राजस्थानी नाम भी ग्रियर्सन की बहुमूल्य देन है। उसने स्वयं स्पष्ट किया है कि इस भूभाग (राजपूताने) की बोलियों का एक वर्ग बनाकर मैं किस भाषा का नाम दूँ यह समस्या मेरे सामने थी। मेरे ही एक भाई अंग्रेज जेम्स टॉड ने अपना इतिहास ग्रन्थ (एनाल्स) १८२९ ई. में निकाला उसमें इस भू-भाग को (पहली बार) राजस्थान कहा गया था, अतः मैंने ??राजस्थानी?? नामकरण कर दिया। यह नाम मैंने गढा है यह विवरण ग्रियर्सन ने नवें अध्याय में स्पष्ट दे भी दिया है। जैसे बिहार की सारी बोलियों के समूह को बिहारी भाषा वर्ग में रहने हेतु उसने बिहारी नाम गढा था उसी प्रकार राजपूताने की बोलियों को एक भाषा वर्ग में समाहित करने हेतु राजस्थानी नाम गढ लिया। इस बात को ईमानदारी से बता देना अवश्य ही शोध दृष्टि और बौद्धिक वस्तुनिष्ठता के हित में है।
जैसा पहले संकेत किया जा चुका है, पाश्चात्य विद्वानों ने भारतीय भाषाओं के अध्ययन में जो श्रम किया है हमें उसकी कद्र करनी चाहिए और प्रसन्नता की बात है कि इसमें हम कोताही भी नहीं कर रहे। फ्राँसीसी विद्वान तोस्सितोरी ने बीकानेर और निकटवर्ती क्षेत्रों में रहकर वहाँ की बोलियों पर जो शोध किया उसकी निष्पक्ष दृष्टि से प्रशंसा राजस्थानियों ने की है। बीकानेर में कुछ वर्ष पूर्व ही स्थापित टेसीटोरी की छत्री इसका प्रमाण है। टेसीटोरी रामायण का गहन अध्येता था। उसने रामकथा पर जो कुछ लिखा उसका भी अच्छा मूल्यांकन किया है हमने। मैका लिस्टर एक पादरी था जिसने ढूँढारी (जयपुर की बोली) का गहरा अध्ययन किया, उसका व्याकरण लिखा। उसका यह कार्य सर्वथा प्रशंसनीय था यद्यपि ग्रियर्सन के महासागर की लहरों के कलकल ने इन छोटी-मोटी शोध-सरिताओं की आवाज को सदा के लिए दबा दिया। इसीलिए इन दोनों के सर्वेक्षण के निष्कर्ष और ग्रन्थ प्रसारित ही नहीं हो पाए। किन्तु उनके श्रम की गरिमा और उनके कार्य का महत्त्व निर्विवाद है ही।
ग्रियर्सन ने अपने वर्गीकरणों और नामकरणों के जो आधार दिये हैं वे स्पष्ट करते हैं कि उनका अभिगम जनगणना के एक अधिकारी की दृष्टि से उपजा है। हिन्दी की बोलियों का उसने बडी संख्या में आकलन किया है और ??इनर बैंड??, ??आउटर बैंड?? आदि वर्गों में उन्हें बाँट कर स्पष्ट किया है कि वह वर्गीकरण भूभाग-वार है, भाषिकीय नहीं। ग्रियर्सन आई.सी.एस. था, प्रशासक था, ईमानदार अध्येता था किन्तु भारतीय विद्वानों का यह औदार्य वस्तुतः प्रशंसनीय है कि उसे एक भाषाशास्त्री का दर्जा देकर उसे भारतीय मनीषा ने सम्मानित किया है। राजस्थानी और बिहारी नामक दो भाषा-नामकरणों के जनक होने के नाते इन भाषाओं के विद्वानों ने उसे क्या सम्मान दिया इसका विवरण भी दिलचस्प हो सकता है। हो सकता है मैथिली और भोजपुरी को जो अपने आपको भाषा मानते हुए हिन्दी के मुकाबले खडी होने का सबल अभियान चला रही है, उसका यह अभिमत पसन्द न आया हो कि वे बोलियाँ हैं वैसे बोलियाँ क्या होती हैं, भाषाएँ क्या, इस पर उसने अपने विवेचन में विस्तृत विमर्श किया है। मैथिली और राजस्थानी को साहित्य अकादमी ने साहित्यिक भाषा मान ही लिया है। मैथिली आठवीं अनुसूची में आ गई है और राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में लाने और राजभाषा बनाने के प्रयास हो रहे हैं जिनका विरोध भी हो रहा है। ग्रियर्सन की परोक्ष भूमिका इन भाषाओं के नामकरण में क्या रही, जनगणना-यज्ञ में लगी इस एक आहुति ??भाषागणना?? या सर्वेक्षण का इतिहास क्या है, इसका आकलन, इसी दृष्टि से, काफी दिलचस्प और ज्ञानवर्धक सिद्ध हो सकता है।

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