हिन्दी साहित्य

समकालीन कथा साहित्य

Posted on: जनवरी 17, 2008

 

किसी भी समाज की इयत्ता उसकी पहिचान के उन स्वरूपों को समेटे रहती है जो वहाँ के लोगों के सोचने-विचारने और इनके अनुसार आचरण करने में सन्निहित रहती है। इसमें उसका समग्र जीवन दर्शन ही नहीं बल्कि सोचे गए तत्त्वों के आधार पर एक-एक क्षण तक को निरंतर जीते चले जाने की आचारशीलता भी सन्निहित रहती है। उसे ठीक से समझ लेने के लिए उसकी सामाजिक संरचनाओं और उनसे निःसृत समाजशास्त्रीय चिंतन को जान लेना जरूरी है। इस बात को नितांत दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा कि भारतीयता की व्याख्या करते समय परम्परावादियों तथा उसके धुर विरोधी चिंतकों दोनों ने भारतीय समाजशास्त्रीय संरचनाओं की अनदेखी करते हुए अपनी-अपनी अवधारणाओं को अंतिम सत्य मानते हुए उन्हें प्रस्तुत किया है। भारतीयता की अवधारणा वह नहीं है जो इण्डियन सोसायटी के शाब्दिक अनुवाद से निःसृत होती है। क्योंकि भारतीय अवधारणा का समाज वह नहीं है जो संविधान में उल्लिखित ?इण्डिया देट इज भारत? से अपना अर्थ सम्प्रेषित करता है। भारतीय सामाजिक संरचना के मूल में यहाँ का समाज के प्रति प्रकट मौलिक चिंतन है। भारतीय दृष्टि से समाज वह है जिसमें जन सम्यक रूप से गतिमान हो – ?समम् अजन्ति जनाः अस्मिन् इति समाजः।? समस्त प्रकार की भारतीयता की अवधारणाएँ इसी ?सम्? के समत्व पर आधारित है। सम् का अर्थ समान होता है और समस्त भारतीय सामाजिक चिंतन इसी सर्वजन को समाहित करने वाली समानता पर आधारित हैं। वैदिक साहित्य में सभी के साथ-साथ चलने तथा आहार-विहार करने सम्बन्धी मंत्रों से समाज के इस स्वरूप का महत्त्व प्रकट होता है – ?संगच्छध्वं, सं वदध्वं, सं नो मनासि जानताम्? अथवा ?सहनाववतु सहनौ भुनक्तु? आदि वेद वाक्यों में इसी सामाजिक समानता, समरसता तथा सम्यक वाणी का समावेश हुआ है। भारतीय दृष्टि से इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त लोक शब्द है। जो कुछ दिखता है, इन्द्रिय गोचर है प्रत्यक्ष है वह ?लोक? है। इसी से इसमें एक प्रकार की समकालीनता और प्रत्यक्ष विषयता का बोध होता है। इस लोक शब्द में सृष्टि के चर-अचर सभी सम्मिलित हैं और सबके साथ साझेदारी की भावना का नाम है ?लोक दृष्टि?। सबको साथ लेकर चलना ही लोक संग्रह है और इन सबके बीच जीवन यापन ही लोक यात्रा है। यह चराचरवादी भारतीय लोक अवधारणा पाश्चात्य सिर्फ मानव पर केन्द्रित लोक दृष्टि से सर्वथा भिन्न है। भारतीय अवधारणा लोक मंगल को ही परम श्रेयस् मानती है। शुक्ल जी ने इस लोकमंगल को साधनावस्था और सिद्धावस्था दो रूपों में विभाजित करते हुए मंगलकारी विधानों की भारतीय परम्परा को स्पष्ट किया है।
भारतीय विचारधारा इस लोक को अंतिम सत्य नहीं मानती भौतिक जगत् इहलौकिक संसार भारतीय दृष्टि में सत्य तो है पर उसकी दृष्टि इसके मध्य से पारलौकिक सत्यों तक पहुँचने की रही है। यहाँ की संस्कृति स्व केन्द्रित नहीं है बल्कि स्व की राह से लेकर पर तक पहुँचने की रही है। इसमें उदारता, सहिष्णुता के साथ ?वसुधैव कुटुम्बकम्? की चिंतना समाई हुई है। यहाँ न यह लोक अंतिम सत्य है न स्व आश्रित कर्मशीलता ही। यहाँ तो ?परहित सरिस धरम नहीं भाई पर पीडा सम नहिं अधमाई? की आदर्शगत चिंताधारा व्यक्ति का चरम उद्देश्य स्वीकारी गई है। यहाँ की समस्त चिंतनाएँ समष्टि के हित के चिंतन से शुरू होती हैं और अपने ?स्व? को अर्पित करने के बाद ही यहाँ जीवन साधना शुरू होती है। उपनिषदों के ऋषि की भाषा में कहा जा सकता है – ?भूमेव सुख नाल्पे सुखमस्तिा?। भारतीयता की अवधारणा वैज्ञानिक युग की तरह विश्लेष पर नहीं संश्लेष पर आधारित है। यह हर चीज को विवेचनपूर्वक अलग-अलग देखने की अभ्यस्त नहीं है वरन् विविक्त रूप में पृथक पदार्थों को जोडने में जीवन की उपलब्धि मानती है, इसके लिए साहित्य मात्र अभिव्यक्ति नहीं वह आत्म साक्षात्कार है।
दीर्घकाल से भारतीय चिंतन नैतिकता, मूल्यवादिता तथा धर्म, अध्यात्म जनित आदर्शों को जीवन के प्रत्येक अंग में समाहित कर देखने का अभ्यस्त रहा है। संस्कारों को जितने प्रबल बंधन भारतीय जन मानस के हृदय को जितनी गहराई से बाँधे रहते हैं उतने अन्य देशों के नागरिकों को नहीं। इसे ठीक से समझ पाने के कारण ही प्रायः भारतीयता की गलत व्याख्याएँ की जाने लगती हैं। गलत ढंग से देखी जाने पर सच्चाई भी अवहेलनीय हो जाती है। भारतीय सामाजिक जीवन का चरम लक्ष्य सत्य की खोज रहा है, इस सत्य के वैविध्यपूर्ण स्वरूपों के बारे में सर्वाधिक प्रभावशाली बात यहाँ के लोक जीवन में दैनन्दिन क्रिया व्यापारों का धर्म एवं अध्यात्म से जुडाव है। यहाँ के षोड्स संस्कार, जन्मांतर में आस्था, कर्मफल में विश्वास, चार प्रकार के पुरुषार्थ, वर्णाश्रम व्यवस्था आदि सभी लोकोत्तर चिंतन पर समाश्रित हैं। यहाँ का लोकोत्तर चिंतन धर्म की राह से जीवन के प्रत्येक प्रसंग से जुडा हुआ है जो भौतिकता को कतई महत्त्व नहीं देता है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार ?यदि कोई सचमुच भारतीय साहित्य का रस अनुभव करना चाहे तो उसे भारतवर्ष के इन चिर संचित संस्कारों का अध्ययन अवश्य कर लेना चाहिये। जब हम देश और काल में इन विश्वासों को ठीक-ठीक समझ लेंगे तभी उनके आधार पर रचित साहित्य के अनाविल रस का, रूप का परिचय पा सकेंगे।?
समकालीन कथा साहित्य के मूल प्रतिपाद्य और उनमें चित्रित व्यक्ति के चरित्र के यथार्थ का आकलन करने के लिए भारतीय अवधारणाओं को आज के संदर्भ में जान लेना जरूरी है। क्या इसे ?तेहि नो दिवसा गताः? कहकर एक बारगी में ही पूरी तरह से भूल जाना चाहिए, यह विचारणीय है। यहाँ विद्यानिवास मिश्र का यह कथन पहले ध्यान में ले आना जरूरी है ?हो सकता है कि जो शुद्ध भारतीय परम्परा कही जानी चाहिए वह अनेक प्रभावों एवं दुष्प्रभावों के कारण आज बहुत संकर हो गई हो और उस संकर रूप को ही हम शुद्ध भारतीय समझने की नादानी करने लगे हों पर आज की युग संध्या हम से गहन आत्म चिंतन माँगती है। हम सोचें और अपनी परम्परा से इस दृढ भावना का व्रत लें कि ?सर्व वैधं हव्यमिन्द्रियाणि सुचः?। हम आप ही होता बने और अंतस्थ शिव की आहुति देकर उन्हें धधकाएँ।
भारतीयता अवधारणा के संदर्भ में समकालीन कथा साहित्य की चर्चा शुरू करने से पहले यहाँ मैं एक स्तंभकार फराह बारिया के स्तम्भ अंश को उद्धृत करना चाहता हूँ। स्तम्भकार ने एक स्कूल की बस में बच्चों की आपसी वार्ता को इस रूप में लेखनीबद्ध किया है –
?मैं सबसे स्मार्ट हूँ?
?नहीं, मैं सबसे स्मार्ट हूँ।?
?नहीं, मैं सबसे स्मार्ट हूँ क्योंकि मैं टोरंटो में पैदा हुआ हूँ।?
कुछ देर के लिए सब चुप हो गए क्योंकि तीसरे दावेदार ने भौगोलिक लाभ ले लिया था।
?टोरंटो कहाँ है ??
?वो विदेश में है, स्टुपिड।?
?कोई बडी बात नहीं है। मेरे पापा केन्या में पैदा हुए थे।?
?हाँ, लेकिन टोरंटो कनाडा में है, स्टुपिड।?
शाइन इण्डिया के आकर्षक नारों और २०२० तक भारत के विश्वशक्ति बन जाने की जोश भरी बातों के बीच स्कूली बच्चों की यह बातचीत भारत के वर्तमान की ताजातरीन तस्वीर है। सचमुच ही इस पीढी के लिए भारत और भारतीयता गरिमा और गौरव का विषय नहीं रहा है, क्योंकि आज के तथाकथित इण्डियन परिवारों में भारतीयता लगभग पूरी तरह से गायब हो चुकी है। इसलिए अब भारतीयता की अवधारणाओंे (जो कि एक प्रकार से साहित्य का नहीं समाजशास्त्र का विषय है) को ढंग से व्याख्यायित किया जाना जरूरी है। उसकी पुनर्व्याख्या की सिफारिश करते हुए विद्या निवास मिश्र कहते हैं, ?मैं समझता हूँ कि भारत में अपना समाजशास्त्र रचने की आवश्यकता है। पश्चिम का समाज शास्त्र मानव केन्द्रित सामाजिकता और उसकी आधारभूत समता की बात करता है, वह किंचित् अपर्याप्त है। समाजशास्त्र की मानव केन्द्रित दृष्टि का ध्यान सर्वभूत हित की ओर जाना चाहिए।? और निःसंदेह यह दृष्टि भारतीय सामाजिक चिंतन के मूल में उपस्थित रही है। आज भी भले ही वह अनेक आवरणों के नीचे ही दबी हुई दिखाई देती हो।
समकालीन कथा साहित्य के संरचनात्मक स्वरूप को तब तक स्पष्टता से नहीं समझा जा सकता है कि जब तक कि पहले इन दो उपस्करों को जान लिया जाय। पहला तो यह कि कथा संरचना का मूल प्रयोजन क्या है और दूसरा सामयिक कथाकार के जीवन दर्शन का विस्तार किस प्रकार की सोच पर आधारित है ? यहाँ संक्षेप में पहले इन्हीं पर विचार किया जा रहा है। कथा साहित्य मानव और उसके जीवन के यथार्थ का निरूपण किया जाता है, यही कारण है कि युग विशेष के उपस्थित सामाजिक सत्यों का प्रत्यक्ष प्रभाव आज के कथानकों पर भी देखा जा सकता है। यथार्थ के अपेक्षित आग्रहों के कारण कथाकार सदैव उनसे बंधा रहता है। मानव जीवन का सफल अंकन करना ही कथा लेखकों का मूलभूत प्रयास होता है। इनमें चित्रित कथा प्रसंग सत्य न होते हुए भी वास्तविक प्रतीत होते हैं। इनके पात्र वास्तविक न होते हुए भी वास्तविक प्रतीत होते हैं। कथा साहित्य के कथानक एवं उनमें चित्रित पात्र लेखक के चाहे-अनचाहे उसके विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पात्रों के व्यक्तित्व निर्माण में उनके स्वयं के अनुभव तो कार्य करते ही हैं उनके चरित्रों के बारे में लेखक की रुचियों- अभिरुचियों व विचारों का ही नहीं कभी-कभी तो पात्रों के बारे में उसकी निजी धारणाओं और आग्रहों – पूर्वाग्रहों तक का दबाव इतना प्रबल हो जाता है कि रचनाकार उन्हें अभिव्यक्त किए बिना नहीं रह पाता है। फ्लावेयर के अनुसार – ?लेखक के मस्तिष्क में एक ही विषय से सम्बद्ध जो पूर्ण खण्ड चित्र एक बार आ जाता है वही उपन्यास का सर्वोत्तम विषय कहा जा सकता है। इसे केन्द्र मानकर ही अन्य प्रासंगिक विषयों का समावेश उपन्यास की कथावस्तु में होता रहता है। अनावश्यक प्रसंगों को लाने की छूट उपन्यासकार को नहीं है।? इसी आधार पर यह समझा जा सकता है कि कथा साहित्य में ?सिंगलनेस ऑफ सब्जेक्ट? (विषय की एकता) का निर्वाह किया जाना जरूरी होता है। इसके साथ ही पाठक की रुचि को कथा की ओर आकर्षित करने के लिए ?इंटेसिटी ऑफ प्लॉट? (विषय की निबिडता) का भी विशेष महत्त्व होता है। डॉ. गणेशन के अनुसार ?अगर कथा ठोकर खाए बिना ठीक तरह से चलती है तो उसके साथ थोडी बहुत फिलॉसफी को भी सहन किया जा सकता है। ऐसी दशा में यह आवश्यक हो जाता है कि विषय के साथ इन विचारों का दूध-पानी का सा मिलन हो।?
इस दौर में कथा साहित्य की पृष्ठभूमि में लेखकों के बदले जीवन दर्शन ने भी महत्ती भूमिका निभाई है। परम्परागत भारतीय दृष्टि नैतिकता, मूल्यवादिता, धर्माश्रित आचारशीलता को व्यक्ति और समाज दोनों के लिए प्राथमिकता प्रदान करता चला आया है। निस्संदेह सामयिक कथाकार ने उनसे अपने को पूरी तरह से मुक्त कर लेना चाहा है। मन्नू भण्डारी मानती है कि ?हमारी आज की समस्त अव्यवस्था और दयनीयता का कारण हवाई समाधान और झूठे आदर्शवाद में रहना है।? आज के लेखक देहातीत प्रेम के उन आदर्शों (जो हिन्दी कथा साहित्य में ?उसने कहा था? कहानी से ही आकार लेने लगे थे) पूरी तरह से असहमत होकर कथा रचनाएँ कर रहा है। उसे ?पंच परमेश्वर? की सी नैतिक न्यायप्रियता, ?पुरस्कार? जैसी त्याग भावना, ?हार की जीत? जैसी आदर्श भावना से चिढ हो चली है। इन लेखकों की मान्यता है कि ?हमने दर्शन और चिन्तन की सूक्तियों और विवशताओं दोनों से देहातीत अमर प्रेम और जन्म-जन्मान्तर के संबंधों के कुलाबे बाँधे हैं। अब हमें व्यक्ति की हैसियत से अपने होने की वैज्ञानिक सार्थकता को खोजने टटोलने के लिए नितान्त कुछ दूसरा करना होगा जो पहले से भिन्न होगा, नया होगा। वे यह भी चाहते हैं कि हम क्यों न स्वीकार करें कि पुरानी परम्पराओं के ढहते इस ऐतिहासिक मोड पर हमदर्द की आत्मा की अमलदारी से आजाद करा उसकी स्वतंत्र सत्ता को स्वीकारें।? (कृष्णा सोबती)
नैतिकता की व्याख्या अब आस्था पर आधारित न होकर परिवर्तित बोध के आधार पर की जाने लगी है। ?नैतिक मान्यताओं की व्याख्या मैं अब दूसरे ही कोण से करने लगी हूँ। अब मेरी निगाह में वह व्यक्ति बुरा नहीं है जो पर-पुरुष या परस्त्रीगामी है, सिगार या शराब पीता है, अभक्ष्य नामधारी पदार्थों का सेवन करता है। घृणा अवमानना मेरे मन में अब उस व्यक्ति के प्रति उभरती है जो वचन देकर भी उसके निर्वाह में कोताही करता है, धार्मिकता का स्वांग रचकर भीतरी प्रकोष्ठों में रंगरेलियाँ रचाता है तो अपने दायित्व और कार्य के प्रति ईमानदार नहीं रह पाता, केवल बात करता है सिर्फ बात? (शशिप्रभा शास्त्री)। वैज्ञानिक युग में प्राचीन नैतिक मूल्यों की रूढ को स्वीकारते चले जाने की प्रवृत्ति का विरोध करते हुए मन्नू भण्डारी भी कहती हैं, ?ईश्वर और धर्म के रूढबद्ध रूप का पालन करके तो हम तिलक लगाकर जन्दगी भर माला ही जपते रह जायेंगे। जीवन के वृहत्तर मूल्यों के लिए अपनी सार्थकता के लिए विवेक, मानवीय संवेदना और सह अनुभूति की आवश्यकता होती है, ईश्वर की नहीं।? परम्परित भारतीय आदर्शों और आज के जीवन में मिसफिट उस आचारशीलता पर प्रश्नचिह्व खडे करता यह कथाकार सोचता है कि ?हिन्दू आदर्श और आज के भारतीय जीवन की दोहरी भाषा में बोलने समझने का ढोंग आप कितने दिनों तक चलाए रखना चाहते हैं ?? (मन्नू भण्डारी)। जिस आस्था और आध्यात्मिक चिंतन पर भारतीय अवधारणाएँ आश्रित थीं उसके विपरीत ये कथाकार ईश्वर की अपेक्षा जीवन के वृहत्तर मूल्यों के लिए अपनी सार्थकता के लिए विवेक, मानवीय संवेदना और सह-अनुभूति को अधिक आवश्यक मानते हैं। ये लोग इस धारणा को पाले हुए हैं कि आज का भारतवासी ईश्वर को नहीं ईश्वर की रूढ से प्यार करता है। ये कथाकार विवाह के लिए प्रेम को जरूरी नहीं मानते हैं। दाम्पत्य सम्बन्धों के बिखराव की दशा में तनावपूर्ण जीवन जीते चले जाने की अपेक्षा तलाक का समर्थन करते हैं। भ्रष्ट सामाजिक व्यवस्था के बीच से नई राह खोजने के प्रयासों की जगह वर्तमान के प्रति असंतोष का भाव इनमें अधिक है। राष्ट्रीयता के संदर्भ में बडबोलापन और दिखावटी नारों से इन्हें सख्त नफरत है। जैसे – ?विदेशों के उदाहरण मत दीजिए बहुत बेमानी लगते हैं। अपने देश की बात कीजिए। है यहाँ कोई बुद्धिजीवी, जो किसी ठोस चीज का संचालन कर रहा है ? अलबत्ता सुझाव हर मिनिट एक की रफ्तार से दे रहा है? (उसके हिस्से की धूप)। आजादी को लेकर मोहभंग का भाव प्रबल है ?तब मुझे पता नहीं था कि जिस आजादी को लेकर मैं इतना आनन्दित हूँ – वही आजादी मेरे लिए उम्र कैद का परवाना है। मेरे सुख, मेरे सपने, मेरी कामनाएँ कैद हो गई हैं। हमेशा-हमेशा के लिए। मेरे हाथ-पाँव सब बँधे हैं। असहाय-सा पडा हूँ।? प्रजातंत्र में न्यूसेंस वेल्यू को ही बढा हुआ पाते हैं। नेताओं के अवसरवादिता से इन्हें गहरी चिढ है ?मंत्री बनने का शौक फरमाने के लिए अवसरवादियों की कतार बहुत लम्बी है।? राजनीति का अर्थ मेंढकों की वह घसर-पसर है जो सिर्फ कूपमण्डकों के कुएँ में ही चलती है। परम्परा से हिन्दू समाज की इकाई व्यक्ति न होकर संयुक्त परिवार है लेकिन आज के कथाकार संयुक्त परिवारों को ज्वालामुखी के गर्भ में स्थित महसूस करते हैं। विवेकानन्द की इस मान्यता को इनके धार्मिक चिन्तन का आधार माना जा सकता है कि ?जिस धर्म की जडें प्रथा और रूढ में होती है वह ?दुकानदारी धर्म? हो जाता है। जिसमें ईश्वर साध्य नहीं साधन रह जाता है। ये लोग मानते हैं कि ?हमें धर्म की तंग दुनिया को छोडकर खुले मैदान में आना चाहिए। धर्म केवल हमारी मेज तक सीमित रहना चाहिए। सच पूछो तो उसकी भी जरूरत नहीं। नेताओं और भाषणों से इन्हें चिढ है ?इस राष्ट्र ने उन्हें दिया क्या है एक कुत्ता नौकरी, एक आधा अंधेरा घर, खटाऊ की चार छपी धोतियाँ, लोकलों के धक्के।? व्यवस्था द्रोह का भाव अत्यन्त प्रबल है समूची व्यवस्था के प्रति मोर्चाबंदी करना जरूरी समझते हैं। अपने आर्थिक दशा को लेकर गहरी खीझ है ?मेरा वेतन इतना नहीं कि मैं कभी कभार चार दोस्तों को बुलाकर उन्हें अच्छी शराब पिला सकूँ या एक नौकर रख सकूँ। जिससे कम से कम मुझे दूध के लिए खडा न होना पडे। सेक्स के सम्बन्ध में उन्मुक्तता को अधिक पसन्द करते हैं उनके लिए उन्मुक्त यौनाचार, श्लीलता- अश्लीलता की बहसें सर्वथा बेमानी हो गई हैं।
सामयिक कथाकारों की यह चिंतन दृष्टि आज के कथा साहित्य में ही रूपाकार ग्रहण करते हुए समक्ष उपस्थित हुई है। यद्यपि समय की निरन्तर प्रवाहमान गतिशीलता को खण्डों में विभाजित करने की चेष्टा करना उसकी निरवधि प्रवाहशीलता में अनावश्यक हस्तक्षेप करने जैसा प्रयास होता है फिर भी इस तरह से की जाने वाली चेष्टाओं के ख्ातरे को जानते हुए भी हमें उसे विभाजित कर देखना जरूरी हो जाता है। इस दृष्टि से समकालीनता से अभिप्राय हमारे लिए तत्कालीनता से भिन्न आज का सहवर्ती स्वीकारा जा सकता है। जो कुछ भी प्रत्यासन्न है, प्रत्यक्ष है, वर्तमान है उसकी सार्थक किन्तु जीवन्त प्रतीति करवा देने वाला समय बोध समकालीन के अन्तर्गत समेटा जा सकता है। निस्संदेह आजादी के बाद के प्रथम दशक से इसका सभारम्भ स्वीकार जा सकता है। सातवें दशक तक आते-आते उन समस्त स्थितियों का विपर्यास शुरू हो चुका था जो नवलेखन की उत्प्रेरक और रचना प्रेरणाएँ रही थीं।
सातवें दशक तक आते-आते महँगाई, बेकारी, जनसंख्या विस्फोट के साथ-साथ विपन्न सामाजिक दशाओं में समस्याक्रान्त व्यक्ति की कुण्ठाएँ कथा साहित्य में प्रबलतम रूप में प्रकट की जाने लगी। मोहभंग का भाव अधिक प्रबल हुआ और कथा रचनाओं का स्वर विद्रोह, घुटन, टूटन, उत्पीडन, असंतोष, पीढगत अन्तराल और मृत मूल्यों की निरर्थकता को चित्रित किया जाने लगा। लेखक भोगे हुए यथार्थ को प्रामाणिक और अधिकारिक अभिव्यक्ति देने के लिए समष्टिगत भावनाओं को छोडकर व्यक्ति की ओर उन्मुख हुए। यों व्यक्तिवादी मान्यताओं के परिपार्श्व में सामाजिकता का निरूपण किया गया। व्यक्ति की खिडकी से समाज को देखने की चेष्टाएँ की गईं। कहानी के रचाव की दृष्टि से १९५० के आसपास जिस सामाजिक बोध को लेकर नवलेखन के दौर में ?नयी कहानी? का जो आंदोलन हिन्दी साहित्य में उभरा था वह १९६० तक आते-आते वैयक्तिक कुण्ठा और संत्रास के इर्द-गिर्द ही घूमकर रह गया। उसमें एक खास किस्म का ?मैनरिज्म? पैदा हो गया। (डॉ. विनय) नयी कहानी में जिस नये कथ्य और शिल्प की बात नये कोण से उठाई गई थी, वही आगे चलकर झूठी पड गई तथा कथा रूढयाँ बनती गयीं। (डॉ. नरेन्द्र मोहन) इस तरह की व्यक्तिवादिता और रुग्णशीलता के विरुद्ध सचेतन कहानी आंदोलन सामने आया किन्तु जर्मनी के ?एक्टीविस्ट मूवमेंट? का यह भारतीय संस्कार भी दीर्घकाल व्यापी नहीं बना रह सका। ऐसी कथा रचनाओं में ढूँढता हुआ जीवन, मनोविश्लेषण के नाम पर सिर्फ अपने में डुबकी लगाये रहना, यौन कुण्ठाओं को कथा का रूप दे देने का विफल प्रयास ही सिद्ध हुआ।
आठवें दशक के आते-आते सामाजिक जीवन और भी अधिक संश्लिष्ट हुआ। स्थितियाँ और भी अधिक जटिलता को प्राप्त हुईं। समस्याएँ और अधिक गहराई, जीवन की असंगतियाँ, विडम्बनाएँ, निरर्थकताएँ, अन्तर्विरोध, निराशा, पराजय अब कथा साहित्य के सर्वाधिक पसंदीदा विषय बन गए। इन्हें तल्खी, उग्रता, आवेश तथा व्यंग्य के साथ कथानकों में प्रस्तुत किया जाने लगा। इन नूतन कथा विषयों के लिए अभिनव शिल्प के संधान के प्रयास भी किए गए जिसके कारण एबसर्ड प्रतीकात्मक, फैंटेसी, व्यंग्य, कथाहीन रचनाएँ आदि नवीन शिल्प संरचनात्मक पहलू समक्ष उपस्थित हुए। कथा आन्दोलनों की दृष्टि से १९७० तक आते-आते ?अकहानी?, ?सचेतन कहानियाँ? शहर की घुटन में जीते लेखक की कहानियाँ कही जा सकती हैं। नायक सिगरेट पीते हुए, हर बात पर ऊब और एक-दूसरे को या किसी लडकी को गालियाँ देते हुए युवक। समस्याएँ विरोध नहीं सिर्फ दुनिया से गुस्सा। तब कथा जगत् में ?समान्तर-१ के माध्यम से ?समान्तर कहानी? आन्दोलन सामने आया। समान्तर कहानी में ?आम आदमी? को कथानायक बनाए जाने का प्रयास किया गया। यह दूसरी बात है कि एक आकर्षक संज्ञा के अभिधान से परे यह ?आम आदमी?, न तो पूरी तरह से स्पष्ट किया जा सका न परिभाषाबद्ध ही। ये कथा रचनाएँ विषमतामूलक समाज की कहानियाँ थीं। जन्दगी को ऊँचाई या निचाई से न देखकर समान्तर देखने का प्रयास किया करती थीं।
आठवें दशक की समाप्ति तक भी स्वतंत्र भारत में आम आदमी के जीवन स्तर में कोई खास सुधार नहीं हुआ। नवें दशक के व्यक्ति ने आर्थिक, राजनीतिक दबावों के जिस चरम रूप को झेला है, सामाजिकता के जिस संश्लिष्ट स्वरूप को भोगा उसके चित्रण में इस दौर की कथा रचनाओं में सार्थक प्रयास किया गया। यह दशक मानवीय भय, आतंक का काल है जिसमें कथाकारों ने कथा रचनाओं को व्यक्ति के बिखराव, टूटन एवं जीवन की निरर्थकता को कथा रचनाओं के माध्यम से प्रकट किया है। परिस्थितियों से जकडी मानसिकताओं और टूटते भ्रमों वाले इनके पात्र युगीन व्यक्ति सत्यों को ही उजागर करते हैं। कथा आन्दोलनों के इतिहास की दृष्टि से इस समय १९७८ में पश्चिम की ?एक्टिव स्टोरी? की तर्ज पर ?सक्रिय कहानी? आन्दोलन सामने आया। इसे साफ तौर पर आदमी की चेतनात्मक ऊर्जा और जीवंतता की कहानी कहा गया। उस समझ, अहसास और बोध की कहानी बतलाया गया जो आदमी को बेबसी, वैचारिक निहत्थेपन और नपुसंकता से निजात दिलाकर तैयार करने की जम्मेदारी अपने सिर लेती है। (राकेश वत्स) लेकिन यह कहानी आन्दोलन भी अपनी अलग प्रभावशाली पहिचान नहीं बना पाया।
समकालीन कहानी का यह स्वरूप क्या पूरी तरह से परम्परागत भारतीयता की अवधारणाओं से किनारा कर चुका है, यह प्रश्न विचारणीय है। जिस तरह बहते हुए बर्फीले शैलखण्ड जितने पानी की सतह से ऊपर दिखाई देते हैं वही सच नहीं होते हैं। दरअसल उनका दो-तिहाई हिस्सा पानी की सतह के नीचे रहता जो उसे दृढता से थामे रहता है। उसी तरह भले ही भारतीयता से परहेज को चिंतन और सृजन दोनों धरातलों पर समकालीन लेखक स्वीकार करते हों पर उनमें भी वही भारतीय आत्मा विद्यमान होनी चाहिए। उषा प्रियम्वदा के कृतित्व के सम्बन्ध में एक समीक्षक की ये पंक्तियाँ सिर्फ उन पर ही नहीं समस्त सामयिक कथाकारों पर लागू होती हैं – ?उषा प्रियम्वदा की कहानियाँ देख लो। विदेशी पात्र, पूरी सेटिंग विदेशी। लेकिन उसके पीछे धडकता हुआ वही भारतीय मानस, भारतीय कुंठाएँ और अभिज्ञताएँ। क्योंकि आप अपने सम्पूर्ण अस्तित्व की इकाई को कैसे नकार सकते हैं, उनके समस्त सामाजिक संदर्भों से कैसे कट सकते हैं ? और क्या कभी कट भी सकते हैं ? जाने कहाँ-कहाँ और कब आफ संस्कार आपका पीछा करें।
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प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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