हिन्दी साहित्य

साहित्य में राष्ट्रीयता का उद्भव

Posted on: जनवरी 17, 2008

 

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में जब वैश्वीकरण प्रारंभ हुआ तब उसके लाभ और प्रभाव को देखकर यह शंका मन में पैदा होने लगी कि एक दिन राष्ट्र और राष्ट्रवाद अप्रासंगिक हो जाएँगे। अपने देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और हर नागरिक के जीवन स्तर में वृद्धि हो यह सबसे बडा आकर्षण का मुद्दा था। सभी इस बात की आशा और अपेक्षा करने लगे कि अन्य देशों से उनके यहाँ पैसा आए ताकि सदियों से चले आने वाला अभाव दूर हो जाए। गरीबी एक बडा अभिशाप है जिसे कल्याणकारी राष्ट्र की सरकारें जडमूल से नष्ट करना अपना प्रथम दायित्व समझती हैं। वैश्वीकरण के प्रारंभिक दिनों में ऐसा लग रहा था कि अब केवल अंग्रेजी जैसी अंतर्राष्ट्रीय भाषा को ही महत्व मिलेगा। लेकिन कुछ ही समय में यह भ्रांति दूर हो गई। एक राष्ट्र की वस्तुएँ जब दूसरे राष्ट्र में जाकर बिकने लगी तो स्थानीय बाजार पर वर्चस्व जमाने के लिए उस देश को अन्य देश की भाषा सीखनी पडी। अपनी भाषा की अनिवार्यता के देखकर कोरियन पहले से अधिक कोरियन हो गया और एक भारतीय पहले से अधिक अपनी भारतीय भाषा के महत्व को समझने लगा। क्योंकि तब उसकी भाषा उसके रोजगार और रोटी से जुड गई। इसलिये हम देखते हैं कि जो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दूसरे देशों में पहुँची उस समय लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए वहाँ की स्थानीय भाषा को सीखने लगी। यही कारण है कि हमारी हिन्दी अब ब्रिटेन और अमेरिका में पढाई जाने लगी है और हम चीनी भाषा सीखना चाहते हैं क्योंकि वह एक बडा बाजार है। लेकिन वैश्वीकरण का जादू अब उतरता दिखलाई पडने लगा है, कि हर राष्ट्र यह महसूस करने लगा है कि उसका काम उन देशों में होने लगा है जहाँ मजदूरी सस्ती है। साथ ही उसके प्राकृतिक स्रोत का प्रवाह भी सस्ते दामों पर वहाँ पहुँच रहा है। वैश्वीकरण अभी तो पासपोर्ट और वीजा प्रणाली को तोड भी न पाया था कि हर सरकार फिर से राष्ट्र और राष्ट्रवाद की बातें करने लगीं। उन्हें लगा कि इससे दूर होकर न केवल हमारा अस्तित्व खतरे में पड जाएगा बल्कि हम दुनिया में बुरी तरह से पिछड जाएँगे। इसका अर्थ यह हुआ कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता एक नैसर्गिक देन है जिससे कोई देश और समाज अलग नहीं रह सकता। राष्ट्रीयता को समझने के लिए साहित्य का मंथन आवश्यक है। साहित्य में हित शब्द जुडा हुआ है। जो इस बात का द्योतक है कि बिना हित के राष्ट्रीयता का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि साहित्य जैसी शक्तिशाली विधा राष्ट्रीयता की चर्चा करे तब इस बात की खोज आवश्यक है कि राष्ट्रीयता का साहित्य में उद्भव किस प्रकार हुआ। आज विश्व की हर गतिविधि साहित्य के माध्यम से ही नापी तौली जाती है इसलिये राष्ट्रीयता से जुडे साहित्य पर हमें एक पैनी दृष्टि डालनी होगी।
इस बहस की जब शुरुआत करते हैं तो हमारे सामने कुछ मिले-जुले शब्द आकर खडे हो जाते हैं। जिनमें राज्य, राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद प्रमुख हैं। राज्य शब्द पहले अस्तित्व में आया कि राष्ट्र ‘ राज्य के लिए धरती पहली शर्त है, फिर उसकी सीमा और अंत में वहाँ रहने वाली जनसंख्या। प्रकृति ने सर्वप्रथम धरा की ही रचना की। रचना करते समय कहीं पर्वत, कहीं नदी, कहीं रेगिस्तान और कहीं समुद्र बने। यह कुदरत का अपना बँटवारा था। लेकिन जब इंसान इस धरती पर रहने लगा तो उसने अपना क्षेत्र अपनी ताकत के अनुसार तय किया और जो सीमा उसने निश्चित की वह आज का राज्य बन गया। लेकिन राज्य अपने आप में निर्जीव है। क्योंकि उसके जन-जीवन अथवा तो उस धरा पर होने वाली गतिविधि का प्रतिबिम्ब नहीं दर्शाता। इसलिये यहाँ पर उसे सोचने पर मजबूर हो जाना पडता है कि राज्य को सजीव बनाने वाला तत्व कोई और है। संभव है उसका जन्म इन सबसे पहले हो गया हो। यह शब्द कोई और नहीं बल्कि राष्ट्र था। पहले कौन से शब्द का उद्भव हुआ इस बहस में न पडें तब भी दोनों भिन्न हैं यह तय है। एक निर्जीव तंत्र ‘मेकेनीजम‘ या अस्तित्व (एंटिटी) है। जबकि राष्ट्र सजीव जीवन मान अस्तित्व है जिसे अंग्रेजी में ‘लिविंग ओरगेनीजम‘ कहा गया है। जन सामान्य की भाषा में राज्य शरीर है लेकिन राष्ट्र आत्मा है। मुर्दा शरीर किस काम का ‘ उसकी न तो कोई पहचान है और न ही उसके जन्म का उद्देश्य ‘ इसलिये भारतीय साहित्य में प्रारंभ से ही राष्ट्र शब्द पर चर्चा हुई है। राज्य को समझ लेने के बावजूद भारतीय ऋषि मुनियों ने राष्ट्र की परिभाषा, जन्म, विकास और उसकी निर्मिति पर चर्चा की है। इसलिये हमारी बोलचाल की भाषा में स्व राष्ट्र (सौराष्ट्र) और महाराष्ट्र शब्द का उपयोग होता है। भारत के किसी भी क्षेत्र को राज्य के नाम से पुकारा गया हो यह ढूँढने पर भी नहीं मिलता। आगे चलकर अपनी सत्ता को परिभाषित करने के लिए राज्य शब्द का उपयोग हुआ दिखलाई पडता है। फिर वह मुगल राज्य हो या ब्रिटिश राज्य अथवा तो उनके अधीन कायम होने वाली रियासतें जिन्हें राज्य कहकर संबोधित किया गया। मेवाड, मारवाड, कलिंग, निजाम जैसे असंख्य राज्य। चूँकि वे किसी एक राजा के अंतर्गत थे इसलिये वास्तव में तो वे साम्राज्य थे। राष्ट्र होने की पहली शर्त उसकी स्वतंत्रता है और दूसरा वह जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा होना चाहिए। भारत में प्राचीन जनपद और यूनान के स्पार्टा इस श्रेणी में आ सकते हैं। निर्जीव वस्तुओं को अधिक महत्व न देकर उसमें जीती जागती व्यवस्था का जो नामकरण किया गया वह सही अर्थों में राष्ट्र है।
यूरोप में राष्ट्र शब्द भले ही तीन सौ वर्ष पहले जन्मा हो। लोकतंत्र की सोच ने इस शब्द और भावना को गति दी इसलिये पश्चिम में यह शुद्ध रूप से राजनीतिक शब्दावली कही जा सकती है। लेकिन भारत में राजनीतिक राष्ट्र से पहले भी सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना मौजूद थी। भारत न केवल सीमा और जनसंख्या की कसौटी पर खरा भारत में जन्मे सब जन निश्चय महान् है।
सुब्रह्मण्यिम भारती का ‘पांचाली शपदम‘ अर्थात् पांचाली की शपथ एक खंड काव्य है जिसमें उन्होंने भारत देश का मानवीकरण द्रौपदी के रूप में किया है। टी.वी. कल्याण सुंदरम् का नाम भी इसी श्रेणी में उल्लेख करने योग्य है।
कन्नड साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि राष्ट्रीयता और राष्ट्र प्रेम यहाँ के साहित्य का अविभाज्य अंग रहा है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उसके संदर्भ बदलते चले गए लेकिन राष्ट्रीयता की व्याख्या नहीं बदली। कन्नड के आदि कवि पंप का पद ‘आरंकुसमिटटोड नेनवुदेन्न मनं वनवासी देशमम्‘ उनके इस प्रदेश के प्रति और साहित्य में राष्ट्रीयता के पुट के प्रति प्रेम और जागरूकता का उज्ज्वल प्रतीक है। राधवांक ने किसी न किसी संदर्भ का उपयोग करके कर्नाटक की तुंगभद्र नदी और पंपा क्षेत्र की महिमा का गायन किया है। आंडय्या कवि ने कर्नाटक प्रदेश का शलाध्नीय वर्णन किया है। कनकदास ने मोहन तरंगिणी में विजयनगर की समृद्धि का वर्णन किया है। कर्नाटक में तो कुछ शिलालेखों पर भी वहाँ के साहित्य में राष्ट्रीयता के दर्शन होते हैं।
मलयाली साहित्य में स्पष्ट रूप से कहा गया है भौगोलिक एकता, राजनीतिक एकता और सांस्कृतिक एकता यानी तीनों के संगम का नाम राष्ट्र है। जब उसमें चेतना का अंकुर फूटता है तो वह राष्ट्रीय साहित्य में पल्लवित होने लगता है। मलयालम साहित्य का जन्म उसी समय हो चुका था जब केरल में अनेक हिन्दू गणराज्य स्थापित थे। मलयालम की उपलब्ध रचनाओं में सबसे पुराना काव्य ‘रामचरितम‘ है। महाकवि उल्लूर के कथनानुसार यह १२वीं शताब्दी में लिखी हुई रचना है। उसके रचनाकार वीर रामवर्मा हैं जो तिरूअनंतपुरम् के शासक रहे थे। १४वीं और १५वीं शताब्दी में लिखी गई कण्णंश्श कृतियाँ राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत हैं। माधव पणिक्कर, शंकर पणिक्कर और राम पणिक्कर यह तीनों एक ही परिवार के थे। भगवद्गीता, भारत माला, रामायण, भारत भागवत और शिवरात्रि महात्म्य जैसे प्रख्यात ग्रंथ के साथ-साथ माधव पणिक्कर ने गीता रहस्य को अपनी टीका में व्यक्त किया है। १६वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में एषुत्तच्छन का अविर्भाव हुआ। केरल जो छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था और जिन्हें पुर्तगीज तथा अरब लडाकर अपना स्वार्थ साध लेते थे उन्हें संगठित होने और राष्ट्रीय शक्ति को पुनर्गठित करने का कार्य इस महान् साहित्यकार ने किया है।
पंजाबी साहित्य को यदि राष्ट्रीयता की गोद से उपमा दी जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पंजाबी के लोक साहित्य और लोक कविताओं में राष्ट्रीयता बिखरी पडी है। ‘गुरुवाणी और संत वाणी‘ को कोई कैसे नजरअंदाज कर सकता है। भाई गुरुदास से शुरू करके गुरु गोविंदसिंह की चंडी दीवार से होते हुए शाह मोहम्मद तक एक दृष्टि उभरती है तो बहुत पीछे जाने पर जंगली लोक गीतों के बाद शेख फरीद आ खडे होते हैं। इन सबसे पहले गुरु नानक देव की वाणी को भला कौन नजरअंदाज कर सकता है। अपने राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों से ऊपर और आदर्श मानना पंजाबी साहित्य का महत्वपूर्ण पहलू समझा गया है। प्रभजीत कौर, विश्वनाथ तिवारी, सुखपाल वीरसिंह हसरत सs लेकर जसबीर सिंह आहलूवालिया, सोहनसिंह मीशा और भगवंत सिंह ने अपनी रचनाओं में छलका दिया है। स्वदेश के प्रति अपने प्रेम को दर्शाते हुए पंजाबी कवि नजाबत ने लिखा-
एत्थों भज्जां कंड देह जग्गा लाहनत पाए
सिर देना मंजूर है जो हिन्द न जाए।
पंजाबी साहित्य केवल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत नहीं है, बल्कि यहाँ भारतीय दर्शन और अध्यात्म की भी परंपरा रही है। आर्य समाज ने पंजाब के जीवन में समाज सुधार की लहर पैदा की और पंजाब के क्रांतिकारियों ने लाला लाजपतराय, भगवतसिंह और सुखदेव बनकर राष्ट्रीयता की लहर को परवान चढाया। कौन होगा जो पंजाबी के इस गीत को भूल जाए।
‘पगडी संभाल ओ जट्टा पंगडी संभाल ओए-
हिंद है मंदर तेरा तू इस दा पुजारी ओए‘
देश की कौनसी भाषा और कौनसा साहित्य होगा जिसमें राष्ट्रीयता के आविष्कार की गाथा नहीं कहीं गई हो। साहित्य में गद्य हो या पद्य समान रूप से राष्ट्रीयता के स्वर उनमें सुनाई पडते हैं। भारत में भजन-कीर्तन से लगाकर संस्कृति, देश प्रेम और मातृभूमि की गौरव गाथा हर युग और हर सदी में पढने को मिलती है। भारत चूँकि प्रकृति प्रेम से ओतप्रोत देश रहा है। उसकी कृषि और वन्य जीवन तथा पर्वतों की गुफाओं में साधना आराधना नित्य का क्रम रहा है इसलिये उक्त साहित्य काव्य के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। भारत की कोई भाषा और बोली इससे अछूती नहीं रही है। केवल उदाहरण मात्र ही कुछ जानकारी प्रस्तुत की गई है।
राष्ट्रीयता का सिरमौर कहा जाने वाले साहित्य बंगला है। बंगाल ने सांस्कृतिक ह्रास और राष्ट्रीयता के अपमान के जो दृश्य देखे थे उसकी पीडा उसके साहित्य में भली प्रकार झलकती है। राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जहाँ बंगाल की विरासत है, वहीं उसका साहित्य संघर्ष, देशप्रेम और क्रांति का संगम है। १८६७ में ‘जातीय‘ (राष्ट्रीय) मेले के श्री गणेश नाम से जिस आयोजन का शुभारंभ हुआ था वह वास्तव में श्री राज नारायण बसु के इस मंतव्य से ही प्रेरित प्रभावित था कि शिक्षित बंगालियों में राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए एक संगठन की स्थापना की जानी चाहिए। इस मेले में गाए गए प्रथम गीत के प्रणेता भारतीय सिविल सर्विस सर्वप्रथम भारतीय सदस्य श्री सत्येन्द्रनाथ ठाकुर थे। उस गीत में सभी भारतीयों से यह अनुरोध किया गया था कि वे मिलकर एक स्वर में भारत का गुणगान करे। महाराष्ट्र में गणपति उत्सव का श्री गणेश आगे चलकर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोकमान्य तिलक ने दिया। ब्रह्म समाज (१७७४-१८३३) अपना प्रभाव स्थापित कर चुका था जिसका मुख्य ध्येय जरजर भारत की धूल झाड कर उसे फिर से राष्ट्रीयता के प्रवाह में शामिल होने के लिए सजग करना था। बंगाल में जागरूकता के कारण १२वीं, १३वीं शताब्दी से कविता, नाटक और उपन्यास के रूप में राष्ट्रीयता का साहित्य में आविष्कार होता रहा। इसी श्ाृंखला में आगे चलकर श्री बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने ‘आनंदमठ‘ नामक अपने जग विख्यात उपन्यास में राष्ट्रवाद का भव्य चित्र प्रस्तुत करने का कीर्तिमान स्थापित किया। धर्म और राष्ट्रीयता का ऐसा सुंदर समागम किसी अन्य जगह देखने को नहीं मिलता। हिन्दू राष्ट्रवाद ने बंगला साहित्य में प्रविष्ट होकर व्यक्ति स्वातंय का पल्लवन किया। इसमें स्वामी विवेकानंद और श्री अरविंद के अध्यात्म की छाप स्पष्ट दिखलाई पडने लगी। श्री रामेंद्रसुंदर त्रिवेदी तथा श्री ब्राह्म बांधव का राष्ट्रवादी चिंतन, सुधारवाद की प्रेरणा से प्रेरित है। राष्ट्रीयता की बात कहने वालों में सर्वश्री ईश्वरचंद्र गुप्त, कालीप्रसाद सिन्हा, नलिनचंद्र सेन, हेमचंद्र बंदयोपाध्याय, रंगलाल बंदोपाध्याय आदि अग्रगण्य रहे। दीनबंधु मिश्रा ने अपने नाट्य नीलदर्पण में यूरोपियन खेतिहरों द्वारा किये जा रहे अत्याचार तथा दमन का यथार्थ चित्रण किया। रेवरेंड लोंग ने इसका अंग्रेजी रूपांतरण छापकर यूरोपियन अधिकारियों में तहलका मचा दिया। इसके नतीजे में रेवरेंड को एक मास का कारावास भुगतना पडा। इस घटना ने राष्ट्रवादी लोगों के हौसले बुलंद किये। नतीजे में बंगला राष्ट्रवाद तेजी से विकसित होने लगा। हिन्दू पेट्रियट और अमृत बाजार पत्रिका का प्रकाशन इसका नतीजा था। इस समय के राष्ट्रवादी साहित्य में ‘सोनार बंगला‘ शब्द की गूँज सुनाई पडी। दैनिक वंदे मातरम् और दैनिक युगांतर ने यूरोपियन संस्कृति के आवरण को नष्ट कर बंगालियों को भारत के विशुद्ध राष्ट्रवाद के दर्शन करवाए। जातीय मेले की तरह श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरंभ किया। १९०५ में उनकी प्रसिद्ध कविता मातृभूमि वंदना का प्रकाशन हुआ। जिसमें वे लिखते हैं….
है प्रभु,
मेरे बंगदेश की
धरती नदिया वायु फूल सब पावन हों,
है प्रभु,
मेरे बंग देश के,
हर भाई, प्रत्येक बहन के उर अंतः स्थल,
अविछन्न, अविभक्त एक हों (बंगला से हिन्दी अनुवाद)
लेकिन आर्थिक रूप से ब्रिटिशों ने जिस प्रकार राष्ट्र को शोषण किया और हमारी राष्ट्रीयता को नीलाम करने की कोशिश की उसके विरुद्ध आवाज उठाने वालों में रजनीकांत सेन, कालीप्रसन्न, सत्येन्द्रनाथ दत्त, कार्तिकचंद्र, विजयचंद्र, मजूमदार और सैयद अबू मोहम्मद आदि लेखक आगे आए। रजनीकांत सेन का आह्वान था कि अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए यदि वंदे मातरम गाते-गाते मर जाना घ्डे तब भी पीछे हटने का विचार न करें। बंग भंग आंदोलन प्रारंभ होने के ९ दिन पूर्व रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेजों से सवाल किया कि क्या सचमुच आप में इतनी शक्ति है कि आप इसे तोड सकते हैं ‘ क्या आप सचमुच यह मानते हैं कि हमारा जीवन आपकी संपत्ति है जिसे आप इच्छानुसार बना और बिगाड सकते हैं ‘ अपने उपन्यास ‘गोरा‘ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतीयों के उस वर्ग की आलोचना की है जो भारत को राष्ट्र नहीं मानते। मराठी की भाँति बंगला नाटक भारत की सदियों से चली आने वाली राष्ट्रीयता को उजागर करने में अग्रणी रहे। श्री गिरीशचंद्र घोष द्वारा लिखित ‘सिराजुद्दौला‘, ‘मीर कासिम‘ और ‘छत्रपति शिवाजी‘ इसके उत्तम नमूने हैं। श्री द्वेजेंद्रलाल राय कृत ‘प्रताप सिंह‘ दुर्गादास और मेवाड पतन तथा श्री किरोडी प्रसाद विद्याविनोद का प्रतापदित्य, ‘पद्मिनी‘, ‘पलासीर‘, ‘प्रयाश्चित‘ तथा ‘नंद कुमार‘ उन क्रांतिकारी विचारों के प्रेरणा स्रोत हैं जिन्होंने बंगला राष्ट्रवाद को प्रचारित प्रसारित करने में महत्व की भूमिका अदा की। श्री नजरूल इस्लाम और शरतचंद्र चटोपाध्याय ऐसे साहित्य बनकर जिये जिनके सामने राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के अतिरिक्त कोई विचार नहीं था।
महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जिस पर उत्तर तथा दक्षिण भारत में हुए परिवर्तनों का साथ-साथ प्रभाव पडने लगता है। महाराष्ट्र के पिछले दो हजार वर्षों के राजनीतिक इतिहास पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट होगा कि यहाँ जो राज्य स्थापित हुए थे उन में उत्तर तथा दक्षिण के शासनों का चामत्कारिक मेल था। इनमें प्रमुख है- सातवाहन, पूर्व चालुक्य, राष्ट्रकूट, उत्तर चालुक्य, यादव, मुगल, मराठा और अंग्रेज। इन आठों शासनकाल के साहित्य का अध्ययन करें तो पता लगता है कि मराठी साहित्य राष्ट्रीयता और राष्ट्र चेतना का संगम रहा है। मराठी भाषा साहित्य का स्पष्ट अस्तित्व जिसमें उपलब्ध होने लगा था वह था यादव राजाओं का शासन काल जिसकी अवधि ईस्वी सन् ११५० से १३५० तक मानी जाती है। यादव वंश के राजाओं में रामचंद्र यादव के शासन काल में मराठी साहित्य की विशेष समृद्धि हुई। इस काल में दो महान् कवियों का अविर्भाव हुआ। श्री ज्ञानेश्वर (१२७५-१२९६) तथा नामदेव (१२७० से १३५०) ज्ञानेश्वर ने उत्तर भारत की यात्रा की और नामदेव पंजाब तक पहुँचे। जातिवाद की दीवारों को तोडने में इन दोनों संतों का भारी योगदान रहा। अब तक चली आ रही मर्यादित राष्ट्रीयता को उन्होंने अपने उदात्त मानवीय जीवन मूल्यों को आधार बनाकर भारत के विशाल भाग में फैलाने का आंदोलन चलाया। जिससे उत्तर भारत में संत कबीर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। महानुभव पंथ इसी दौर में विकसित हुआ जो पंजाब से सीमा प्रांत तक फैल गया। जातिवाद को नष्ट कर उन्होंने राष्ट्रीयता की नींव को मजबूत किया। नामदेव और ज्ञानेश्वर ने जन भाषा में काव्य सर्जन करके आम आदमी को अपने आंदोलन से जोडा। राष्ट्रीय चेतना का प्रचारित प्रसारित करने का यह अनूठा कदम था। सन् १३१८ में यादव वंश समाप्त हो गया। इसके पश्चात् यहाँ बहमनी काल प्रारंभ हुआ। अलाउद्दीन खिलजी और मलिक काफूर के आक्रमणों ने महाराष्ट्र को दहला दिया। महाराष्ट्र राजनीतिक दृष्टि से अशांत और अस्थिर हो गया। मराठी के स्थान पर फारसी आ गई और मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव बढने लगा। लेकिन उस काल में भी एकनाथ तथा दासोपंत ने महाराष्ट्रीयन संस्कृति का अलख जगाया। इसके अतिरिक्त भानुदास, जनार्दन स्वामी, नरसिंह सरस्वती, गंगाधर विष्णुदास, नामा और रंगनाथ ने महत्व की भूमिका निभाई। संतों ने सत्ता को महत्व न देते हुए अपना आंदोलन जारी रखा लेकिन यह स्वीकार करना ही पडेगा कि इससे राष्ट्रोन्नति का काम शिथिल हो गया।
इस अंधकार में एक प्रकाश पुंज जन्मा जिनका नाम था छत्रपति शिवाजी। इस महान् सपूत ने राष्ट्रीयता के आधार पर खुल्लम खुल्ला हिंदवी साम्राज्य की घोषणा की। शिवाजी को सर्वाधिक प्रेरणा तत्कालीन कवि संत रामदास से हुई। रामदास ने इस तथ्य को स्वीकारा कि वैराग्य धारण करके समाज और राष्ट्र की सेवा नहीं हो सकती। उन्होंने दूर-दूर तक भ्रमण किया और हिंदवी साम्राज्य के रूप में हिंदवी राष्ट्रीयता को चहुँ ओर फैलाया। उनके इस कार्य से शिवाजी बहुत अधिक प्रभावित हुए। सच कहा जाए तो पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राष्ट्रीयता जो जमीन के भीतर चली गई थी उसे महाराष्ट्र की धरती पर पुनः प्रस्थापित करने का भगीरथी कार्य संत रामदास ने किया।
शिवाजी ने स्वराज्य की स्थापना के साथ-साथ महाराष्ट्र की जनता में स्वाभिमान, देश भक्ति, शौर्य तथा पराक्रम की जो भावना भर दी थी उससे प्रेरित होकर अनेक मराठा सरदारों ने न केवल शिवाजी के स्वराज्य की रक्षा की बल्कि उसे आगे बढाया और फैलाया। पेशवा युग में मराठा साम्राज्य वैभव के शिखर पर पहुँच गया था। राष्ट्रीय चेतना पर इसका प्रभाव कैसे न पडता ‘ इस युग में राष्ट्रीयता के वाहकों की दो धारा स्पष्ट रूप से दिखलाई पडती है। एक आध्यात्मिक संस्कृति तो दूसरी समसामयिक राजनीति परिस्थितियों से प्रभावित। प्रथम धारा के कवियों में श्रीधर, महीपती, मोरोपंत, अमृतराय, निरंजन माधव आदि। दूसरी धारा में रामजोशी, अनंतफंदी, लहरी मुकुंदा, होनाजीबाल, प्रभाकर, सगनभाऊ और परशराम। मंडाले जेल में लोकमान्य तिलक ने ‘गीता रहस्य‘ लिखकर राष्ट्रीयता को जो नया आयाम दिया उसे भारतीय साहित्य कभी नहीं भूल सकता। मराठी साहित्य की सभी विधाएँ राष्ट्रीयता के लिए समर्पित रही। किचक वध जैसे नाटक को कौन भूल सकता है’ नाटक मराठी वाङ्मय की आत्मा है। इसके बलबूते पर राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को जो प्रेरणा मिली वह हमारे गौरवशाली इतिहास का एक भाग है। वीर सावरकर ने सेल्युलर जेल में १८५७ के गदर को किस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संघर्ष में परिवर्तित किया यह अपने आप में उनका चमत्कार है। साहित्य में राष्ट्रीयता को खोजना है तो मराठी साहित्य को पढना होगा और पढाना होगा। महाराष्ट्र के कोने-कोने से आये साहित्यकार इस तथ्य से अवगत हैं कि राष्ट्रीयता की चिंगारी को महाराष्ट्र के साहित्यकारों ने ही दावानल में परिवर्तित किया है।
आओ मिल कर गाएँ…….
‘जय-जय महाराष्ट्र देशा‘
राष्ट्र भाषा हिन्दी के साहित्य में राष्ट्रीयता की खोज करने से पूर्व एक दृष्टि उर्दू साहित्य पर भी डालना अनिवार्य है। क्योंकि हिन्दी बोली को अरबी में लिपिबद्ध करके जिस साहित्य का निर्माण किया गया वह भी राष्ट्रीयता की मूल धारा से अलग नहीं था। उर्दू का जन्म १३वीं शताब्दी में हुआ। स्वदेशी भावना को विदेशियों के सम्मुख अमीर खुसरों ने जिस तरह से प्रस्तुत किया यह भाषा की दुनि;ा में एक नया आविष्कार था। राग-रागनियों के धनी अमीर खुसरो कव्वाली के भी जनक हैं। ब्रज, अवधी, मालवी, भोजपुरी और मेवाडी के शब्दों को फारसी जैसी भाषा से मिलाकर गजल और गीत लिखे। ‘खालिकवारी‘ नामक फारसी हिंदवी छंदोबद्ध शब्दकोष के संग्रह का भी श्रेय इसी महान् कवि को है। अमीर खुसरो ने भारतीयता और राष्ट्रीयता की लहर का परिचय भारत के बाहर प्रस्तुत किया और उस ईरान तक पहुँचाया जो आर्यवृत्त का कभी हिस्सा था। १७वीं शताब्दी का उर्दू साहित्य उन राज्यों की बदहाली का नमूना है जो धीरे-धीरे अंग्रेजों के प्रभाव से क्षीण होते चले गए। लेकिन १८५७ के पश्चात् का उर्दू साहित्य जो दिल्ली में अधिक केन्दि्रत था हिन्दुस्तान की आजादी का स्वर बन गया।
हिन्दी साहित्य में जब राष्ट्रीयता की खोज करते है तब इस बात का अहसास हो जाता है कि इस विशाल भू-भाग पर जो उत्तर और पश्चिम में स्थित है, वह सबसे अधिक उठापटक का केन्द्र रहा। विदेशी आक्रांताओं में मुस्लिमों ने तो सीधे-सीधे इस पर अपना आधिपत्य जमाया। लेकिन ब्रिटिशों ने १८वीं से २०वीं शताब्दी के १९४७ तक इस भू-भाग पर राज किया। आजादी की लडाई में सारे देश ने योगदान दिया लेकिन निर्णायक सफलता इसी धरती पर मिली इसलिये यह क्षेत्र राष्ट्रीयता का धडकता दिल बन गया। गंगा-यमुना की सभ्यता वाले इस प्रदेश में भारतीय संस्कृति ने इतनी गहरी छाप छोडी है कि डॉक्टर इकबाल जैसे अलगाववादी कवि को भी यह स्वीकार करना पडा कि…… ‘यूनानो मिश्रो रोमा सब मिट गए जहाँ से……. कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।‘ हिन्दी साहित्य का आदिकाल बाह्य आक्रमणों और आंतरिक कलह के कारण उथल-पुथल, अशांति और पारस्परिक वैमनस्य का युग था। सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के निधन के पश्चात् कोई व्यक्ति नहीं रहा जो देश को एकसूत्र में बाँधे रखता। लेकिन चाणक्य जैसा व्यक्ति भी इस धरती पर जन्मा जिसने न केवल आक्रांताओं से लडने के लिए लोगों को संगठित किया बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था से लगाकर राजनीति के सूक्ष्म गुर भी सिखलाए। चाणक्य ने जो चिंतन किया और जो कुछ किया वह सब भारतीयता और राष्ट्रीयता के लिए ही किया। जाति, देश और धर्म को विखंडित किए जाने वाला साहित्य राष्ट्रीय तो नहीं हो सकता लेकिन अपने नवयुवकों के सम्मुख शौर्य, पुरुषार्थ और बलिदान का मार्मिक चित्र प्रस्तुत कर अपने पूर्वजों के गौरवपूर्ण पद चिह्नों पर चलने और मातृभूमि के लिए बलिदान करके स्वयं को गौरवान्वित करने की प्रेरणा प्रदान करता रहा। पृथ्वीराज और राणा प्रताप ने विदेशियों से जो युद्ध किये उनमें भारतीय हुंकार के दर्शन होते है। चंद्रबरदाइ र्और भूषण की वाणी को आप क्या कहेंगे*’ हिन्दुत्व चूँकि राष्ट्रीयत्व से अलग नहीं है इसलिये जो संघर्ष हुआ वह राष्ट्रीयता के लिए ही था। अकबर को सफलता भले ही मिलती रही हो लेकिन उसी के दरबार में बैठे कवि इस बात से चिंतित थे कि भारत का स्वाभिमान कहीं घायल न हो जाए इसलिये अकबर के दरबार के कवि पृथ्वीराज को जब मालूम हुआ कि राणा प्रताप अकबर के सामने समर्पण करने जा रहे हैं तब उसने राणा को एक पत्र लिखा जिसने राणा प्रताप का इरादा बदल दिया। अकबरी दरबार के एक अन्य कवि दुर्साजी राणा प्रताप की प्रशंसा में ‘विरुद्ध वहतरी‘ लिखी इस में स्वतंत्रता सैनानी और आत्म बलिदानी देशभक्त के रूप में राणा प्रताप की स्तुति पर कवि ने पाठकों के हृदय में वीरता, देशभक्ति और राष्ट्रीयता के भाव संचारित करने का प्रयास किया है। केशव ने अपनी ‘रत्न बावनी‘ में राजकुमार रत्नसिंह के बलिदान का जिस ढंग से गौरव किया है वह किसी राष्ट्र नायक की याद दिलाने के लिए पर्याप्त है। भूषण ने शिवाजी और छत्रसाल को भारत की राष्ट्रीयता का प्रतीक बतलाया है। भक्तिकाल के कवियों ने ईश्वर के शत्रु के रूप में तत्कालीन सत्ता को ही अपना लक्ष्य बनाया। नानक और कबीर जिस एकता के लिए समाज को प्रेरित कर रहे थे, उनकी फूट और व्यक्ति में आए दुर्गुण को दूर करने का जो आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन चला रहे थे वह किसके लिए था*’ १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात् जो क्रांति का बिगुल बजा वह किस उद्देश्य के लिए था ‘ तो इसका एक ही उत्तर मिलता है अपनी भूली बिसरी राष्ट्रीयता को और भारतीय मूल्यों को लौटा लेने के लिए। राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक भावना है। किसी प्रदेश विशेष के निवासियों की यह भावना और विश्वास है कि वे एक हैं और अपना भविष्य उज्ज्वल करने के लिए उनका दृढ संकल्प हैं। इसका नाम ही राष्ट्रीयता है जो साहित्य रूपी सरिता से निकल कर मानवता के मैदान को सींचती हुई अनंत में विलीन हो जाती है।
महान् दार्शनिक अरविंद घोष के उन शब्दों की याद दिलाना चाहूँगा जो उन्होंने १९२० में उत्तरपारा में कहे थे। इन शब्दों से ब्रिटिश सरकार की नींव हिल गई थी। उन्हें सरकार बंदी बनाने जा रही है यह समाचार मिलते ही वे पांडीचेरी के लिए निकल पडे। पांडीचेरी उन दिनों फ्रेंच उपनिवेश का भाग थी इसलिये ब्रिटिश सरकार कुछ न कर सकी और हाथ मलती रह गई।
अरविंदो कहते हैं……
India will rise
“India of the ages is not dead nor has she spoken her last creative word; she lives and has still something to do for herself and the human peoples and that which must seek now to awake is not an anglioised oriental people, docile pupil of the west and doomed to repeat the cycle of the occident success and failure, but still the ancient immemorable shakti recovering her deepest self lifting her head higher towards the supreme source of light and strength and turning to discover the complete meaning and a vaster from of her dharma.”
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प्रत्याख्यान

यह एक अव्यवसायिक वेबपत्र है जिसका उद्देश्य केवल सिविल सेवा तथा राज्य लोकसेवा की परीक्षाओं मे हिन्दी साहित्य का विकल्प लेने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है। यदि इस वेबपत्र में प्रकाशित किसी भी सामग्री से आपत्ति हो तो इस ई-मेल पते पर सम्पर्क करें-

mitwa1980@gmail.com

आपत्तिजनक सामग्री को वेबपत्र से हटा दिया जायेगा। इस वेबपत्र की किसी भी सामग्री का प्रयोग केवल अव्यवसायिक रूप से किया जा सकता है।

संपादक- मिथिलेश वामनकर

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वेब पत्र का उद्देश्य-

मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ, बिहार, झारखण्ड तथा उत्तरांचल की पी.एस.सी परीक्षा तथा संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के हिन्दी सहित्य के परीक्षार्थियो के लिये सहायक सामग्री उपलब्ध कराना।

यह वेब पत्र सिविल सेवा परीक्षा मे हिन्दी साहित्य विषय लेने वाले परीक्षार्थियो की सहायता का एक प्रयास है। इस वेब पत्र का उद्देश्य किसी भी प्रकार का व्यवसायिक लाभ कमाना नही है। इसमे विभिन्न लेखो का संकलन किया गया है। आप हिन्दी साहित्य से संबंधित उपयोगी सामगी या आलेख यूनिकोड लिपि या कॄतिदेव लिपि में भेज सकते है। हमारा पता है-

mitwa1980@gmail.com

- संपादक

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