हिन्दी साहित्य

हिन्दी साहित्य पर बाह्य प्रभाव

Posted on: जनवरी 17, 2008

 

भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का एक पक्ष अपनी भाषा की आजादी का भी था। पूरे भारत की राष्ट्रभाषा-सम्फ भाषा-हिन्दी या हिन्दुस्तानी हो यही मुख्य मुद्दा था। लम्बी जद्दोजेहद के बाद नागरी लिपि में लिखी हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बनी। वह कैसी हो इस सवाल पर संविधान म कहा गया है कि वह सभी प्रादेशिक भाषाओं से शब्द, रूप और शैली ग्रहण करके बनेगी। सभी प्रदेशों के लिए हिन्दी का संस्कृत रूप ही ग्राह्य है, जिसके शब्द सभी भाषाओं में बहुतायत से हैं। व्यक्ति के नाम – सुब्रह्मण्यम भारती, विश्वनाथन, बंकिमचन्द्र, नरसी मेहता, कुसुमाग्रज आदि या स्थान के नाम तिरूअनंतपुरम्, अर्णवकुलम्, कन्याकुमारी, श्रीरंगम्, मुदरई आदि या पानी, नीर, जल जैसे अनेक संस्कृत शब्द उनमें हैं। अतः ग्राह्यता और सुविधा में वही रूप राष्ट्रभाषा को स्वीकार है। पर हिन्दी का हृदय-देश जिस भाषा का प्रयोग आज कर रहा है वह उसका उर्दू-फारसी वाला रूप है, जिसको आमजन की भाषा कहकर धडल्ले से साहित्य में प्रविष्ट किया जा रहा है। यह भाषा-विकृति का एक रूप है जो राजनीति के प्रभाव या दबाव का फल है।

भाषा-विकृति का एकरूप आज के समाचार-पत्रों में तेजी से फैल रहा है। उर्दू प्रभावी हिन्दी तो फैशन और राजनीतिक दबाव में चल रही है। अब उदारीकरण का प्रभाव बडी तेजी से बढा है। बडी आसानी से हिन्दी समाचार-पत्र के एक पृष्ठ पर सैकडों अंग्रेजी के शब्द अपने खाँटी प्रयोग के साथ आ रहे हैं। जैसे ‘सेक्स स्कैण्डल‘, ‘सेक्स राकेट‘, ‘इण्टरव्यू‘, ‘एडमिशन‘, ‘गैंगरेप‘, वगैरह। ये प्रयोग देश के सांस्कृतिक पराभव के सूचक हैं। उधर नयी तकनीक के साथ नए शब्द भी धडल्ले से आ रहे हैं। कम्प्यूटर, ई-मेल, एस.एम.एस., इण्टरनेट, सेन्सेक्स, ई.पी.एफ.। नए नाम अंग्रेजी विद्यालयों के ‘इस्ट टू क्राउन स्कूल‘, ‘लिटिल फ्लावर‘, टिनीटाट, जैसे चल रहे हैं। दिल्ली स्कूल के बडे दिग्गज इसे ‘हिंगलिश‘ कहते हैं। इसका एक नमूना ‘हिन्दुस्तान‘ दैनिक की निम्नांकित भाषा है ः- ”एयर होस्टेस के प्रशिक्षण के लिए फ्लाईंग फैट्स ने नयी दिल्ली स्थित साउथ एक्सटेंशन पार्ट-२ में एयर होस्टेस ट्रेनिंग स्कूल खोला है।‘‘ (१२ जुलाई, २००६) यह भाषायी प्रदूषण है जो देश के आत्मसम्मानशून्य, अस्मिताविहीन, औपनिवेशिक मानसिकता के बडे नेताओं और साहित्यकारों के नाते आ रहा है।

जो भाषा अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं करती वह जीवित नहीं रहती। भाषा राष्ट्र की वाणी होती। भारत माता १४ भाषाओं में बोलती है पर १४ भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने वाली राष्ट्रभाषा हिन्दी है।

सुब्रह्मण्यम् भारती ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानते हुए सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा कहा है। मराठी के शिखर कवि कुसुमाग्रज ने वर्षों पूर्व विश्व मराठी सम्मेलन में कहा था, ”बिना एक राष्ट्रभाषा के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती।‘‘ उन्होंने केन्द्र से माँग की कि महाराष्ट्र से अंग्रेजी को सरकारी तौर पर हटा लिया जाये। महाराष्ट्र के सारे राज-काज मराठी में होंगे और केन्द्र से सम्फ की भाषा हिन्दी होगी, क्योंकि हिन्दी ही निर्विवाद स्तर पर देश की राष्ट्रभाषा है। आज भी संसद के भाषणों में, केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों में, दिल्ली की आम जन्दगी से लेकर खास गोष्ठियों में और साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में अंग्रेजी की प्रेत छाया व्यापक रूप से पसरी हुई है। बिना इससे मुक्त हुए हिन्दी अपने स्वरूप को नहीं प्राप्त कर सकेगी। इसके लिए हमें अपना मन बदलना होगा। हमें राष्ट्रीय सोच अपनानी होगी और आत्महीनता से छुटकारा पाना होगा।

अब हम अपने साहित्य का विचार करें। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिन्दी का साहित्यिक इतिहास भाषा की दृष्टि से भले ही अलग-अलग है, पर भाव और विचार, दर्शन और सोच, पुरुषार्थ और जीवनबोध की दृष्टि यह एक प्रवहमान सतत परम्परा है। यह दो हजार वर्ष से अधिक की परम्परा है। वह क्या उत्तरोत्तर अपने एकहरे रूप में अनूदित होती हुई चली है अथवा कालक्षेप से उसमें परिवर्तन-संशोधन हुए हैं ‘ नयी रचना एक विद्रोही तेवर लेकर आती है। वह किसी पुरानी लकीर को तोडकर नयी रेखा बनाती है। वह रूढयों और विसंगतियों को छोडकर या तोडकर जब आगे बढती है तभी वह कुछ नया दे पाती है। नयापन मनुष्य और समाज दोनों का स्वभाव है। पर एकदम नया कुछ भी नहीं होता। अतः पुराने को तोडकर नए मूल्य स्थापित करना एक जोखिम है और जो रचनाकार इस जोखिम को उठाता है, वही नया रच पाता है और वह कालजयी कृतिकार बन जाता है। जो यथास्थिति में जीता है, पुराने को निबाहता चलता है, वह अपने ही जीवन में विस्मृत हो जाता है। जो उठता है, लडता है, लडकर-मरकर रचता है वह अमर हो जाता है। इस नएपन की एक शर्त है कि वह प्राचीन और परम्परा के जीवन्त और स्वस्थ सामग्रियों का ग्रहण और मृत और अस्वस्थ का त्याग करे तात्पर्य यह कि साहित्य का हर नया अपनी संस्कृति का ही वाहक होता है, उसकी विकृति का नहीं। अपने समय में परम्परा से आगे का नयापन, कालिदास और तुलसी में भी था, कबीर और जायसी में भी और आधुनिक युग में रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द, प्रसाद, निराला आदि में भी है। ये सभी हमारी संस्कृति के पुण्य-प्रवाह के कूल हैं और इनकी समग्रता ही भारतीयता या भारतीय संस्कृति है।

विश्व का कोई भी साहित्य ऐसा नहीं है जो अपने देश की संस्कृति का स्वर नहीं झंकृत करता है। अज्ञेय ने लिखा है, ”जो साहित्य किसी एक संस्कृति का प्रतिबिम्बन करता है, उसका अपना व्यक्तित्व, अपनी अस्मिता होती है और वह व्यक्तित्व उसके क्षेत्र से बाहर पहचाना जाता है। तभी दूसरे संस्कृति-समाजों में उसे महत्त्व मिलता है। अर्थात् तभी वह विश्व साहित्य में स्थान पाता है। जिस साहित्य में संस्कृति का स्वर नहीं बोलता, उसका विश्व-साहित्य में स्थान पाने का सवाल ही नहीं उठता।‘‘ ….जाहिर है कि टालस्टाय को अपने देश के किसानों और आमजन की दशा के चित्रण पर विश्व साहित्य में स्थान मिलता है, तो टैगोर और प्रेमचन्द को अपनी धरती के चित्रण पर।‘‘

भारतेन्दु और महावीर प्रसाद द्विवेदी तो नवजागरण के पुरोधा ही थे। भारतेन्दु ने रचनाकर्म में समाज-देश को स्थान दिया और हिन्दी भाषा की लडाई की सार्थक भूमिका निभाई। ‘सरस्वती‘ का जन्म ही राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के क्रोड से हुआ। उस जमाने के कई कवि ५-६ वर्षों तक जेलों में रहे और कलम से राष्ट्रीयता और जागृति का संदेश देते रहे पर रचना धर्म में ये सभी पुरोगामी रहे। तुलसी के राम मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत‘ में नए रूप में आए। वे स्वर्ग का संदेश देने नहीं, धरती को स्वर्ग बनाने वाले मनुष्य हैं। हरऔध के कृष्ण गोपी-वल्लभ और करिश्माई श्रीकृष्ण नहीं हैं। अपितु लोकसंग्रही और अत्याचार के विरुद्ध संघर्षशील लोकनायक हैं। ये परिवर्तन भी युग की वैज्ञानिक सोच और आधुनिकता के प्रभाव थे। इसी प्रवृत्ति ने आगे चलकर निराला, नरेश मेहता और दिनकर के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

छायावाद के आन्दोलन ने योरोप के स्वच्छन्दतावाद का अनुसरण किया और अनुसरण-अनुकरण की यह परम्परा प्रारम्भ हो गयी। छायावाद ने शैली तो योरोप से ग्रहण की पर अभिव्यक्ति को वेदान्त और प्रकृति-संवेदना से जोड कर उसे आत्मसात् कर लिया। परिणामतः प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी जैसे कालजयी रचनाकार पैदा हुए। छायावाद की भारतीयता पर महादेवी ने दीपशिखा की भूमिका में प्रकाश डाला है। रूसी वोलशेविक क्रान्ति की सफलता ने माक्र्सवाद का आकर्षण बढाया तो हिन्दी में भी प्रगतिशील लेखन का प्रारम्भ हुआ। इस आन्दोलन की जडंे रूस में थीं, यद्यपि यह आया इंग्लैण्ड के मार्फत। इसके प्रतीक कम्युनिस्ट पार्टी और रूसी क्रान्ति के थे। इसने जो अच्छा काम किया, वह यह कि इसने सामन्तवाद, साम्राज्यवाद, पूँजीवाद का विरोध किया और साहित्य को जनता की चीज बनाया। पर बुरा यह हुआ कि यह धर्मनिरपेक्ष, संस्कृति-परम्परा निरपेक्ष होते हुए राष्ट्र-निरपेक्ष हो गया। द्वितीय महायुद्ध में राहुल सांकृत्यायन जैसे लेखक ने आजाद हिन्द फौज की लडाई को जर्मनी की लडाई और मित्रराष्ट्रों के (अंग्रेज के भी) पक्ष को अपना पक्ष बताते हुए भोजपुरी में कई नाटक लिखे। प्रगतिशील लेखन, जनवादी लेखन, समकालीन लेखन के अलग-अलग चेहरों पर इसने योरोप से आयातित लेखन का यह मॉडल ग्रहण किया।

इसीलिए १९६२ के चीनी आक्रमण पर इनका लेखन मौन था और वाणी उसे ‘मुक्ति आन्दोलन‘ बोल रही थी। १९६५ के पाक-आक्रमण के समय दिल्ली के ‘संज्ञा‘ नामक संस्था ने एक साहित्यकार गोष्ठी आयोजित की। प्रश्न था – युद्ध से साहित्यकार का संबंध होता है या नहीं ‘ एक पक्ष उभर कर सामने आया कि सच्चा साहित्यकार इस तरह के कामों में दिलचस्पी नहीं लेता है।

यह साहित्यकारों के ऊपर एक विचारधारा से प्रतिबद्धता का परिणाम था। यह प्रभाव और दबाव राष्ट्रभाव को कम करके देश के मनोबल को गिराने वाला था। देश की सीमा पर सैनिक और देश के अन्दर कलम के सिपाही कदम से कदम मिलाकर लडते हैं तो देश का मस्तक गौरव से उठता है। इस हकीकत को इस आन्दोलन ने नजरअन्दाज किया और देश के मनोबल को गिराया। रूसी लेखक शोलोखोव को नाजी आक्रमण के विरुद्ध लड रही जनता की थीम पर लिखे उपन्यास को नोबल पुरस्कार मिलता है और आजाद भारत में आजादी की रक्षा की लडाई में रचनाकार चुप्पी साध लेता है, यह चिन्तनीय है।

प्रगतिवाद से मोहभंग और आधुनिकता से उत्पन्न परिस्थितियों ने प्रयोगवाद, नयी कविता और नवलेखन को जन्म दिया। प्रगतिवाद की भाँति इन विचारों का दाम भी हमें पश्चिम से मिला। फ्रांस से इसका प्रारम्भ हुआ और स्वतंत्रता इसका मूलमंत्र था। इसमें इन्द्रियबोध की प्रधानता, मध्यवर्ग की घुटन, हताशा और अस्तित्व संकट की ध्वनियाँ थी। इस धारा ने पुराने मूल्यों को तोडा पर कोई नया मूल्य स्थापित न कर सका और मूल्यहीनता का शिकार हो गया। अस्तित्ववादी दर्शन का प्रभाव भी इन पर पर्याप्त पडा। अंग्रेजी उपनिवेश के कारण हमारे सोचने का तरीका पश्चिम के अनुकरण का हो गया। इस अनुकरण की प्रवृत्ति ने हमारे मौलिक चिन्तन को समाप्त कर दिया। हमने इलिएट, पाउण्ड, सार्त्र, लुकाच, ग्राम्सी को अपना मार्गदर्शक मान लिया और उन्हीं के मापदण्डों से अपनी रचनाओं को परखने लगे। यह विचार पीछे छूट गया कि साहित्य अपने देश की दशा और परिस्थिति में सृजित होता है तो वही स्थायी महत्व का होता है। नकल तो नकल होती है।

आज का बडा लेखक और आलोचक आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता और विखण्डनवाद के सहारे अपनी महत्ता और इयत्ता को प्रभावित करता है। पर भारत अभी उन परिस्थितियों से नहीं गुजरा है, जिनसे योरोप के देश गुजर चुके हैं। औद्योगीकरण की चरम परिस्थिति, दो-दो महायुद्धों के दंश और विघटित समाज-व्यवस्था को योरोप ने झेला है। अतः उस प्रकार के साहित्य का यहाँ सहज निर्माण नहीं हुआ। यही कारण है कि नई कविता के आन्दोलन पर नवगीत का आन्दोलन हावी हो गया। नवगीत ने अपनी जमीन की ओर, अपने गाँव की ओर, अपनी संस्कृति की ओर लौटने का नारा दिया। भाषा के नए मुहावरे और उसके आधुनिकततम प्रतीकों-मिथकों को अपनाते हुए भी नवगीत इसी जमीन की जड से जुड गया। अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकार आधुनिकता की सारी दौड लगाकर अन्ततः अपनी जमीन और संस्कृति से जुडने की बात कहने लगे।

नए योरोपीय-अमरीकी लेखन से जो चीजें हमारे यहाँ आयीं, उनमें नग्न देहवाद, मूल्य भ्रंशता, अनिस्थिता, अजनबीपन खास हैं। इनसे हमारे रचनाकर्म को कुछ लाभ नहीं मिला। हमारी संस्कृति में वर्जनाएँ तो नहीं रही हैं। कालिदास का ‘कुमार संभव‘ इसका उदाहरण है। पर हमारी सीमाएँ रही हैं। उनके अतिक्रमण से हमारी निजता समाप्त हो जाती है। हमने एक और प्रत्यय पश्चिम से आयातित किया है, वह है ‘सेकुरलरिज्म‘। यह आया तो राजनीति में पर इसका व्यापक प्रभाव हमारे साहित्य पर पडा। भारत- विभाजन की त्रासदी जितनी बडी थी, उतना बडा रचनाकर्म इसके सही संदर्भ को लेकर नहीं आया। राही मासूम रजा ने ‘आधागाँव‘ में जिन्ना के मिशन को लेकर गाँव-गाँव जाने वाले अलीगढ के काली शेरवानी और टोपी वाले लडकों के कारनामों का जो जिक्र किया है, उससे ज्यादातर लेखक परहेज करते हैं। पाकिस्तान के लेखक शौकत सिद्दिकी अपने उपन्यास ‘खुदा की बस्ती‘ का अन्त करते हैं -”समाज नोशा, राजा, शम्मी और अनू जैसों को जन्म देता है। इनमें से कोई कत्ल करके जेल जाता है, कोई कोढी बनकर एडयाँ रगड-रगड कर मौत की प्रतीक्षा करता है, कोई खून थूकता है और रिक्शा चलाता है और कोई हीजडों के साथ कूल्हे मटकाता है – नारा-ए-तकबीर – अल्ला हो अकबर।‘‘ इस्लामी व मजहबी राज की दशा पर यह करारा व्यंग्य है। हमारे देश का कोई बडा लेखक इन सवालों से टकराने की हिम्मत नहीं करता है। इसके पीछे सेक्युलरिज्म का दबाव रहता है। गोधरा से उपजे गुजरात के दंगे हों या बाबरी ढांचा का ध्वंस, यह तो हमें मर्माहत करता है पर दशाब्दियों से आतंक, नरसंहार और विस्थापन का दंश झेलता कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत के ईसाई व इस्लामीकरण से उत्पन्न अलगाव की प्रवृत्ति या अक्षरधाम, अयोध्या से लेकर बम्बई तक के विस्फोटों पर कलम चलाने में हमारे सेक्युलरिज्म के कल्पित मिशन की नींव ढहने का डर लगता है। यह साहित्य और राष्ट्र के लिए तो खतरनाक है ही, विश्व के लिए भी बडा खतरा है।

आखरी बात मुझे उदारीकरण के परिणामी बाजारवाद के दबाव के बारे में करनी है। आज लेखन के बाजार की बात की जाती है। आज दूरदर्शन के विज्ञापनों ने बाजार के प्रभाव को खूब अभिव्यक्त किया हैं। एक विज्ञापन में एक लडका एक अधनंगी युवती को गोद में लेकर पर्दे पर आता है। उसे चूमते ही वह लडकी एक साइकिल में बदल जाती है और लडका साइकिल को उसी चाव से चूमता है जैसे लडकी को। बाजार तो इसी स्तर के साहित्य से बनेगा। एक प्रकाशक ने बताया कि उपन्यास लेखक गुलशन नंदा को एक लाख तक रायल्टी वार्षिक हमने दी है। बाजार धन से जुडा रहता है, मन से नहीं।

इधर बाजारवाद और धन-लोलुपता से आदमी किस कदर मशीन बन गया है, कितना स्वार्थी और मतलबी हो गया है, इसकी प्रतिध्वनियाँ हमारे वर्तमान साहित्य में तेजी से प्रकट हो रही है। उपन्यासकारों में यौन चित्रों का यथातथ्य वर्णन प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों में भी मिलते हैं। जैसे कविता में आयातित भदेस को नवगीत ने नकारकर अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान को तलाशने की कोशिश की है, उसी प्रकार कथा साहित्य में हिन्दी के कहानीकारों ने बाजार और उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। उदय-प्रकाश की कहानी ‘पालगोमरा का स्कूटर‘ ने उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। यह उपभोक्तावाद और उत्तर आधुनिक समय के मनुष्य की अमानुषिक दुर्दशा का एक दस्तावेज है। उन्हीं की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँड‘ बाजारवाद का प्रतिरोध कर भारतीय जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है। संजीव की कहानियाँ ‘ब्लेक होल‘ और ‘नस्ल‘ इसी ढंग की कहानियाँ हैं। अखिलेश की ‘हाकिम कथा‘, स्वयं प्रकाश, दूधनाथ सिंह, शेखर जोशी आदि की कहानियाँ इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।

जाहिर है कि हमारे साहित्य में अंधानुकरण के प्रतिरोधी स्वर भी उठते रहे हैं। आज के विश्वगाँव के नारे और बाजारवाद के मोह ने हमारी जड को हिला दिया है पर साहित्य में इसका प्रबल प्रतिरोध भी है, जो भविष्य के लिए शुभ का लक्षण है।

 

हिन्दी भाषा और साहित्य ः बाह्य प्रभावों का हस्तक्षेप
भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का एक पक्ष अपनी भाषा की आजादी का भी था। पूरे भारत की राष्ट्रभाषा-सम्फ भाषा-हिन्दी या हिन्दुस्तानी हो यही मुख्य मुद्दा था। लम्बी जद्दोजेहद के बाद नागरी लिपि में लिखी हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बनी। वह कैसी हो इस सवाल पर संविधान म कहा गया है कि वह सभी प्रादेशिक भाषाओं से शब्द, रूप और शैली ग्रहण करके बनेगी। सभी प्रदेशों के लिए हिन्दी का संस्कृत रूप ही ग्राह्य है, जिसके शब्द सभी भाषाओं में बहुतायत से हैं। व्यक्ति के नाम – सुब्रह्मण्यम भारती, विश्वनाथन, बंकिमचन्द्र, नरसी मेहता, कुसुमाग्रज आदि या स्थान के नाम तिरूअनंतपुरम्, अर्णवकुलम्, कन्याकुमारी, श्रीरंगम्, मुदरई आदि या पानी, नीर, जल जैसे अनेक संस्कृत शब्द उनमें हैं। अतः ग्राह्यता और सुविधा में वही रूप राष्ट्रभाषा को स्वीकार है। पर हिन्दी का हृदय-देश जिस भाषा का प्रयोग आज कर रहा है वह उसका उर्दू-फारसी वाला रूप है, जिसको आमजन की भाषा कहकर धडल्ले से साहित्य में प्रविष्ट किया जा रहा है। यह भाषा-विकृति का एक रूप है जो राजनीति के प्रभाव या दबाव का फल है।
भाषा-विकृति का एकरूप आज के समाचार-पत्रों में तेजी से फैल रहा है। उर्दू प्रभावी हिन्दी तो फैशन और राजनीतिक दबाव में चल रही है। अब उदारीकरण का प्रभाव बडी तेजी से बढा है। बडी आसानी से हिन्दी समाचार-पत्र के एक पृष्ठ पर सैकडों अंग्रेजी के शब्द अपने खाँटी प्रयोग के साथ आ रहे हैं। जैसे ‘सेक्स स्कैण्डल‘, ‘सेक्स राकेट‘, ‘इण्टरव्यू‘, ‘एडमिशन‘, ‘गैंगरेप‘, वगैरह। ये प्रयोग देश के सांस्कृतिक पराभव के सूचक हैं। उधर नयी तकनीक के साथ नए शब्द भी धडल्ले से आ रहे हैं। कम्प्यूटर, ई-मेल, एस.एम.एस., इण्टरनेट, सेन्सेक्स, ई.पी.एफ.। नए नाम अंग्रेजी विद्यालयों के ‘इस्ट टू क्राउन स्कूल‘, ‘लिटिल फ्लावर‘, टिनीटाट, जैसे चल रहे हैं। दिल्ली स्कूल के बडे दिग्गज इसे ‘हिंगलिश‘ कहते हैं। इसका एक नमूना ‘हिन्दुस्तान‘ दैनिक की निम्नांकित भाषा है ः- ”एयर होस्टेस के प्रशिक्षण के लिए फ्लाईंग फैट्स ने नयी दिल्ली स्थित साउथ एक्सटेंशन पार्ट-२ में एयर होस्टेस ट्रेनिंग स्कूल खोला है।‘‘ (१२ जुलाई, २००६) यह भाषायी प्रदूषण है जो देश के आत्मसम्मानशून्य, अस्मिताविहीन, औपनिवेशिक मानसिकता के बडे नेताओं और साहित्यकारों के नाते आ रहा है।
जो भाषा अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं करती वह जीवित नहीं रहती। भाषा राष्ट्र की वाणी होती। भारत माता १४ भाषाओं में बोलती है पर १४ भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने वाली राष्ट्रभाषा हिन्दी है।
सुब्रह्मण्यम् भारती ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानते हुए सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा कहा है। मराठी के शिखर कवि कुसुमाग्रज ने वर्षों पूर्व विश्व मराठी सम्मेलन में कहा था, ”बिना एक राष्ट्रभाषा के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती।‘‘ उन्होंने केन्द्र से माँग की कि महाराष्ट्र से अंग्रेजी को सरकारी तौर पर हटा लिया जाये। महाराष्ट्र के सारे राज-काज मराठी में होंगे और केन्द्र से सम्फ की भाषा हिन्दी होगी, क्योंकि हिन्दी ही निर्विवाद स्तर पर देश की राष्ट्रभाषा है। आज भी संसद के भाषणों में, केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों में, दिल्ली की आम जन्दगी से लेकर खास गोष्ठियों में और साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में अंग्रेजी की प्रेत छाया व्यापक रूप से पसरी हुई है। बिना इससे मुक्त हुए हिन्दी अपने स्वरूप को नहीं प्राप्त कर सकेगी। इसके लिए हमें अपना मन बदलना होगा। हमें राष्ट्रीय सोच अपनानी होगी और आत्महीनता से छुटकारा पाना होगा।
अब हम अपने साहित्य का विचार करें। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिन्दी का साहित्यिक इतिहास भाषा की दृष्टि से भले ही अलग-अलग है, पर भाव और विचार, दर्शन और सोच, पुरुषार्थ और जीवनबोध की दृष्टि यह एक प्रवहमान सतत परम्परा है। यह दो हजार वर्ष से अधिक की परम्परा है। वह क्या उत्तरोत्तर अपने एकहरे रूप में अनूदित होती हुई चली है अथवा कालक्षेप से उसमें परिवर्तन-संशोधन हुए हैं ‘ नयी रचना एक विद्रोही तेवर लेकर आती है। वह किसी पुरानी लकीर को तोडकर नयी रेखा बनाती है। वह रूढयों और विसंगतियों को छोडकर या तोडकर जब आगे बढती है तभी वह कुछ नया दे पाती है। नयापन मनुष्य और समाज दोनों का स्वभाव है। पर एकदम नया कुछ भी नहीं होता। अतः पुराने को तोडकर नए मूल्य स्थापित करना एक जोखिम है और जो रचनाकार इस जोखिम को उठाता है, वही नया रच पाता है और वह कालजयी कृतिकार बन जाता है। जो यथास्थिति में जीता है, पुराने को निबाहता चलता है, वह अपने ही जीवन में विस्मृत हो जाता है। जो उठता है, लडता है, लडकर-मरकर रचता है वह अमर हो जाता है। इस नएपन की एक शर्त है कि वह प्राचीन और परम्परा के जीवन्त और स्वस्थ सामग्रियों का ग्रहण और मृत और अस्वस्थ का त्याग करे तात्पर्य यह कि साहित्य का हर नया अपनी संस्कृति का ही वाहक होता है, उसकी विकृति का नहीं। अपने समय में परम्परा से आगे का नयापन, कालिदास और तुलसी में भी था, कबीर और जायसी में भी और आधुनिक युग में रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द, प्रसाद, निराला आदि में भी है। ये सभी हमारी संस्कृति के पुण्य-प्रवाह के कूल हैं और इनकी समग्रता ही भारतीयता या भारतीय संस्कृति है।
विश्व का कोई भी साहित्य ऐसा नहीं है जो अपने देश की संस्कृति का स्वर नहीं झंकृत करता है। अज्ञेय ने लिखा है, ”जो साहित्य किसी एक संस्कृति का प्रतिबिम्बन करता है, उसका अपना व्यक्तित्व, अपनी अस्मिता होती है और वह व्यक्तित्व उसके क्षेत्र से बाहर पहचाना जाता है। तभी दूसरे संस्कृति-समाजों में उसे महत्त्व मिलता है। अर्थात् तभी वह विश्व साहित्य में स्थान पाता है। जिस साहित्य में संस्कृति का स्वर नहीं बोलता, उसका विश्व-साहित्य में स्थान पाने का सवाल ही नहीं उठता।‘‘ ….जाहिर है कि टालस्टाय को अपने देश के किसानों और आमजन की दशा के चित्रण पर विश्व साहित्य में स्थान मिलता है, तो टैगोर और प्रेमचन्द को अपनी धरती के चित्रण पर।‘‘
भारतेन्दु और महावीर प्रसाद द्विवेदी तो नवजागरण के पुरोधा ही थे। भारतेन्दु ने रचनाकर्म में समाज-देश को स्थान दिया और हिन्दी भाषा की लडाई की सार्थक भूमिका निभाई। ‘सरस्वती‘ का जन्म ही राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के क्रोड से हुआ। उस जमाने के कई कवि ५-६ वर्षों तक जेलों में रहे और कलम से राष्ट्रीयता और जागृति का संदेश देते रहे पर रचना धर्म में ये सभी पुरोगामी रहे। तुलसी के राम मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत‘ में नए रूप में आए। वे स्वर्ग का संदेश देने नहीं, धरती को स्वर्ग बनाने वाले मनुष्य हैं। हरऔध के कृष्ण गोपी-वल्लभ और करिश्माई श्रीकृष्ण नहीं हैं। अपितु लोकसंग्रही और अत्याचार के विरुद्ध संघर्षशील लोकनायक हैं। ये परिवर्तन भी युग की वैज्ञानिक सोच और आधुनिकता के प्रभाव थे। इसी प्रवृत्ति ने आगे चलकर निराला, नरेश मेहता और दिनकर के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
छायावाद के आन्दोलन ने योरोप के स्वच्छन्दतावाद का अनुसरण किया और अनुसरण-अनुकरण की यह परम्परा प्रारम्भ हो गयी। छायावाद ने शैली तो योरोप से ग्रहण की पर अभिव्यक्ति को वेदान्त और प्रकृति-संवेदना से जोड कर उसे आत्मसात् कर लिया। परिणामतः प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी जैसे कालजयी रचनाकार पैदा हुए। छायावाद की भारतीयता पर महादेवी ने दीपशिखा की भूमिका में प्रकाश डाला है। रूसी वोलशेविक क्रान्ति की सफलता ने माक्र्सवाद का आकर्षण बढाया तो हिन्दी में भी प्रगतिशील लेखन का प्रारम्भ हुआ। इस आन्दोलन की जडंे रूस में थीं, यद्यपि यह आया इंग्लैण्ड के मार्फत। इसके प्रतीक कम्युनिस्ट पार्टी और रूसी क्रान्ति के थे। इसने जो अच्छा काम किया, वह यह कि इसने सामन्तवाद, साम्राज्यवाद, पूँजीवाद का विरोध किया और साहित्य को जनता की चीज बनाया। पर बुरा यह हुआ कि यह धर्मनिरपेक्ष, संस्कृति-परम्परा निरपेक्ष होते हुए राष्ट्र-निरपेक्ष हो गया। द्वितीय महायुद्ध में राहुल सांकृत्यायन जैसे लेखक ने आजाद हिन्द फौज की लडाई को जर्मनी की लडाई और मित्रराष्ट्रों के (अंग्रेज के भी) पक्ष को अपना पक्ष बताते हुए भोजपुरी में कई नाटक लिखे। प्रगतिशील लेखन, जनवादी लेखन, समकालीन लेखन के अलग-अलग चेहरों पर इसने योरोप से आयातित लेखन का यह मॉडल ग्रहण किया।
इसीलिए १९६२ के चीनी आक्रमण पर इनका लेखन मौन था और वाणी उसे ‘मुक्ति आन्दोलन‘ बोल रही थी। १९६५ के पाक-आक्रमण के समय दिल्ली के ‘संज्ञा‘ नामक संस्था ने एक साहित्यकार गोष्ठी आयोजित की। प्रश्न था – युद्ध से साहित्यकार का संबंध होता है या नहीं ‘ एक पक्ष उभर कर सामने आया कि सच्चा साहित्यकार इस तरह के कामों में दिलचस्पी नहीं लेता है।
यह साहित्यकारों के ऊपर एक विचारधारा से प्रतिबद्धता का परिणाम था। यह प्रभाव और दबाव राष्ट्रभाव को कम करके देश के मनोबल को गिराने वाला था। देश की सीमा पर सैनिक और देश के अन्दर कलम के सिपाही कदम से कदम मिलाकर लडते हैं तो देश का मस्तक गौरव से उठता है। इस हकीकत को इस आन्दोलन ने नजरअन्दाज किया और देश के मनोबल को गिराया। रूसी लेखक शोलोखोव को नाजी आक्रमण के विरुद्ध लड रही जनता की थीम पर लिखे उपन्यास को नोबल पुरस्कार मिलता है और आजाद भारत में आजादी की रक्षा की लडाई में रचनाकार चुप्पी साध लेता है, यह चिन्तनीय है।
प्रगतिवाद से मोहभंग और आधुनिकता से उत्पन्न परिस्थितियों ने प्रयोगवाद, नयी कविता और नवलेखन को जन्म दिया। प्रगतिवाद की भाँति इन विचारों का दाम भी हमें पश्चिम से मिला। फ्रांस से इसका प्रारम्भ हुआ और स्वतंत्रता इसका मूलमंत्र था। इसमें इन्द्रियबोध की प्रधानता, मध्यवर्ग की घुटन, हताशा और अस्तित्व संकट की ध्वनियाँ थी। इस धारा ने पुराने मूल्यों को तोडा पर कोई नया मूल्य स्थापित न कर सका और मूल्यहीनता का शिकार हो गया। अस्तित्ववादी दर्शन का प्रभाव भी इन पर पर्याप्त पडा। अंग्रेजी उपनिवेश के कारण हमारे सोचने का तरीका पश्चिम के अनुकरण का हो गया। इस अनुकरण की प्रवृत्ति ने हमारे मौलिक चिन्तन को समाप्त कर दिया। हमने इलिएट, पाउण्ड, सार्त्र, लुकाच, ग्राम्सी को अपना मार्गदर्शक मान लिया और उन्हीं के मापदण्डों से अपनी रचनाओं को परखने लगे। यह विचार पीछे छूट गया कि साहित्य अपने देश की दशा और परिस्थिति में सृजित होता है तो वही स्थायी महत्व का होता है। नकल तो नकल होती है।
आज का बडा लेखक और आलोचक आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता और विखण्डनवाद के सहारे अपनी महत्ता और इयत्ता को प्रभावित करता है। पर भारत अभी उन परिस्थितियों से नहीं गुजरा है, जिनसे योरोप के देश गुजर चुके हैं। औद्योगीकरण की चरम परिस्थिति, दो-दो महायुद्धों के दंश और विघटित समाज-व्यवस्था को योरोप ने झेला है। अतः उस प्रकार के साहित्य का यहाँ सहज निर्माण नहीं हुआ। यही कारण है कि नई कविता के आन्दोलन पर नवगीत का आन्दोलन हावी हो गया। नवगीत ने अपनी जमीन की ओर, अपने गाँव की ओर, अपनी संस्कृति की ओर लौटने का नारा दिया। भाषा के नए मुहावरे और उसके आधुनिकततम प्रतीकों-मिथकों को अपनाते हुए भी नवगीत इसी जमीन की जड से जुड गया। अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकार आधुनिकता की सारी दौड लगाकर अन्ततः अपनी जमीन और संस्कृति से जुडने की बात कहने लगे।
नए योरोपीय-अमरीकी लेखन से जो चीजें हमारे यहाँ आयीं, उनमें नग्न देहवाद, मूल्य भ्रंशता, अनिस्थिता, अजनबीपन खास हैं। इनसे हमारे रचनाकर्म को कुछ लाभ नहीं मिला। हमारी संस्कृति में वर्जनाएँ तो नहीं रही हैं। कालिदास का ‘कुमार संभव‘ इसका उदाहरण है। पर हमारी सीमाएँ रही हैं। उनके अतिक्रमण से हमारी निजता समाप्त हो जाती है। हमने एक और प्रत्यय पश्चिम से आयातित किया है, वह है ‘सेकुरलरिज्म‘। यह आया तो राजनीति में पर इसका व्यापक प्रभाव हमारे साहित्य पर पडा। भारत- विभाजन की त्रासदी जितनी बडी थी, उतना बडा रचनाकर्म इसके सही संदर्भ को लेकर नहीं आया। राही मासूम रजा ने ‘आधागाँव‘ में जिन्ना के मिशन को लेकर गाँव-गाँव जाने वाले अलीगढ के काली शेरवानी और टोपी वाले लडकों के कारनामों का जो जिक्र किया है, उससे ज्यादातर लेखक परहेज करते हैं। पाकिस्तान के लेखक शौकत सिद्दिकी अपने उपन्यास ‘खुदा की बस्ती‘ का अन्त करते हैं -”समाज नोशा, राजा, शम्मी और अनू जैसों को जन्म देता है। इनमें से कोई कत्ल करके जेल जाता है, कोई कोढी बनकर एडयाँ रगड-रगड कर मौत की प्रतीक्षा करता है, कोई खून थूकता है और रिक्शा चलाता है और कोई हीजडों के साथ कूल्हे मटकाता है – नारा-ए-तकबीर – अल्ला हो अकबर।‘‘ इस्लामी व मजहबी राज की दशा पर यह करारा व्यंग्य है। हमारे देश का कोई बडा लेखक इन सवालों से टकराने की हिम्मत नहीं करता है। इसके पीछे सेक्युलरिज्म का दबाव रहता है। गोधरा से उपजे गुजरात के दंगे हों या बाबरी ढांचा का ध्वंस, यह तो हमें मर्माहत करता है पर दशाब्दियों से आतंक, नरसंहार और विस्थापन का दंश झेलता कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत के ईसाई व इस्लामीकरण से उत्पन्न अलगाव की प्रवृत्ति या अक्षरधाम, अयोध्या से लेकर बम्बई तक के विस्फोटों पर कलम चलाने में हमारे सेक्युलरिज्म के कल्पित मिशन की नींव ढहने का डर लगता है। यह साहित्य और राष्ट्र के लिए तो खतरनाक है ही, विश्व के लिए भी बडा खतरा है।
आखरी बात मुझे उदारीकरण के परिणामी बाजारवाद के दबाव के बारे में करनी है। आज लेखन के बाजार की बात की जाती है। आज दूरदर्शन के विज्ञापनों ने बाजार के प्रभाव को खूब अभिव्यक्त किया हैं। एक विज्ञापन में एक लडका एक अधनंगी युवती को गोद में लेकर पर्दे पर आता है। उसे चूमते ही वह लडकी एक साइकिल में बदल जाती है और लडका साइकिल को उसी चाव से चूमता है जैसे लडकी को। बाजार तो इसी स्तर के साहित्य से बनेगा। एक प्रकाशक ने बताया कि उपन्यास लेखक गुलशन नंदा को एक लाख तक रायल्टी वार्षिक हमने दी है। बाजार धन से जुडा रहता है, मन से नहीं।
इधर बाजारवाद और धन-लोलुपता से आदमी किस कदर मशीन बन गया है, कितना स्वार्थी और मतलबी हो गया है, इसकी प्रतिध्वनियाँ हमारे वर्तमान साहित्य में तेजी से प्रकट हो रही है। उपन्यासकारों में यौन चित्रों का यथातथ्य वर्णन प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों में भी मिलते हैं। जैसे कविता में आयातित भदेस को नवगीत ने नकारकर अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान को तलाशने की कोशिश की है, उसी प्रकार कथा साहित्य में हिन्दी के कहानीकारों ने बाजार और उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। उदय-प्रकाश की कहानी ‘पालगोमरा का स्कूटर‘ ने उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। यह उपभोक्तावाद और उत्तर आधुनिक समय के मनुष्य की अमानुषिक दुर्दशा का एक दस्तावेज है। उन्हीं की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँड‘ बाजारवाद का प्रतिरोध कर भारतीय जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है। संजीव की कहानियाँ ‘ब्लेक होल‘ और ‘नस्ल‘ इसी ढंग की कहानियाँ हैं। अखिलेश की ‘हाकिम कथा‘, स्वयं प्रकाश, दूधनाथ सिंह, शेखर जोशी आदि की कहानियाँ इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।
जाहिर है कि हमारे साहित्य में अंधानुकरण के प्रतिरोधी स्वर भी उठते रहे हैं। आज के विश्वगाँव के नारे और बाजारवाद के मोह ने हमारी जड को हिला दिया है पर साहित्य में इसका प्रबल प्रतिरोध भी है, जो भविष्य के लिए शुभ का लक्षण है।
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