हिन्दी साहित्य

हिन्दी साहित्य : ‘स्व’ तथा ‘पर’

Posted on: जनवरी 17, 2008

 

मैं अपनी बात दो कवितांशों से आरम्भ करना चाहती हूँ-
‘यह दीप अकेला / स्नेहभरा / है मदमाता/पर इसे पंक्ति को दे दो’
तथा-
राजा को / रथ हाथी घोडे / आम जनों को / पद यात्राएँ।
ऐसा / सुख सुविधाओं का / है बँटवारा /
उनको मीठा पानी / बाकी जल खारा /
उनको / जीने की हर गारंटी / आम जनों को हैं / हत्याएँ।
उनको इतिहासों का पन्ना-दर-पन्ना/ बाकी के लिए / सिर्फ हाशिया।
उनके सच की कोई शर्त नहीं / बाकी सबका / बयान हल्फिया।
उनकी है / निर्मल भागीरथी / आम जनों को / बस कुल्याएँ।
ये दोनों उदाहरण दो अलग-अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं। पहला उदाहरण हमारे उस चिन्तन को बल देता है, जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनो’ के भाव से ओतप्रोत है और चिरकाल से जिसे हम स्वीकार करते आए हैं। दूसरा उदाहरण उस ‘अदर’ (अन्य) की व्याख्या करता है जो आज के परिप्रेक्ष्य में ‘उपेक्षित’ का पर्याय है और जो आज का सच बयान करता है। उस सच का जिसमें सदियों से उपेक्षा के शिकार बने ‘हाशिए’ के लोग हैं और पूरे वैश्विक परिदृश्य में ‘तीसरी दुनिया’ के लोग हैं।
हालाँकि, साहित्य के परिपक्ष्य में ‘स्व’ (सैल्फ) और ‘अन्य’ (अदर) की परिकल्पना इतिहास या समाजशास्त्रीय परिकल्पना से बिल्कुल भिन्न है। साहित्य सब कुछ बाँध कर चलता है, सार्वदेशिक, सार्वभौमिक, सार्वकालिक की बात करते हुए बूँद के समुद्र में विलयन की बात लेकर चलता है जबकि आज का समय जिसे हम उत्तर आधुनिक या ‘उत्तर उत्तर आधुनिक काल’ कह रहें हैं वह ‘डीकन्सट्रक्शन’ को लेकर चलता है। वह व्यक्ति ‘अस्मिता’ को महत्त्व देता है। वहाँ भी ‘विश्वग्राम’ की परिकल्पना अवश्य की गई है। पर इस विश्वग्राम में न ग्रामों की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित है, न प्राकृतिक। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भौगोलिक दूरियों को कम कर दिया है पर दिलों की दूरियों को बढा दिया है। यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि साहित्य इतिहास नहीं है न इतिहास का पुनरावलोकन है। उसमें ‘काल’ के तीनों आयामों पर दृष्टि रहती है, इतिहास की तरह केवल अतीत से ही नहीं। इसलिए इतिहास मूलतः ‘दूसरों’ के बारे में बोला या लिखा जाता है, साहित्य ‘स्व’ और ‘पर’ दोनों के। हम कह सकते हैं-
‘कविता वक्तव्य नहीं गवाह है
कभी हमारे सामने
कभी हमसे पहले/कभी हमारे बाद
… … … … … … … …
उसे कोई हडबडी नहीं कि वह इश्तहारों की
तरह चिपटे /
जुलूस की तरह निकले।
नारों की तरह लगे /
और चुनावों की तरह जीते
… … … … … … … …
वह आदमी की भाषा में /
कहीं किसी तरह जिंदा रहे, बस।
स्पष्ट है कि साहित्य सदैव व्यापक परिप्रेक्ष्य लेकर चलता है। इस दृष्टि से हम अपने भारतीय साहित्य पर नजर डालें तो पाते हैं कि हमारा वैदिक वाङमय ‘स्व’ और ‘अन्य’ का विभेद नहीं करता, वहाँ
‘स्रं स्रं स्रवन्तु सिन्धवः, सं वाताः सं पतत्रिणः,
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां, संस्राव्येण हविषा
जुहोमि’ (अर्थवेद)। /१५/१
अर्थात्-छोटी नदी बडी नदी से मिलकर बडी बन जाती है, हल्की हवा के झोंके मिलकर तुफान बन जाते हैं, आपस में मिलकर पक्षी भी अपना झुण्ड बनाते हैं, इसी तरह लोग इस जीवन-यज्ञ, जो संयुक्त शक्ति आयोजित किया गया है, में साथ आएँ / -इस भाव को महत्त्व दिया गया है।
‘एकोऽहं बहुस्यामः’ की भावना हमारे साहित्य में निरन्तर पोषित होती रही है और कभी ‘तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न हूँ’ (कबीर) के रूप में प्रकट होती रही है और कभी
‘मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल,
रजकण पर जलकण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली’ (महादेवी वर्मा)-
के रूप में।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल उद्घोषणा करते हैं कि कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बंधों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है’ (कविता क्या है), लोंजाइनस की दृष्टि में भी कविता वह है जो ‘पाठक को उसके स्तर से ऊपर उठाए ;स्पजिपदह जीम तमंकमत वनज व ीपउेमसद्धि और हजारी प्रसाद द्विवेदी भी जीवनकी सार्थकता अपने को ‘दलित द्राक्षा की तरह निचोडकर दे देने में’ ही मानते हैं। दरअसल, साहित्य के परिप्रेक्ष्य में यह अवधारणा बहुत महत्त्वपूर्ण रही है कि साहित्य वह जो पाठक को परदुःखकातर बना दे। इसके लिए चाहे स्वयं विलीन ही क्यों न होना पडे- ‘नींव के भीतर दबकर ईंट अपना अस्तित्व इसलिए मिटा देती हैं ताकि उसके ऊपर सुन्दर भवन बन सके’। बकौल हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘अपने सर्वोत्तम से मनुष्य की सेवा करके रिक्त होने पर ही रचनाकार की सार्थकता है वैसे ही जैसे अपने को निःशेष भाव से समर्पित करने पर मेघ की-
‘आश्वास्य पर्वतकुल तपनोष्मतप्तं
दुर्दाववहृ विधुराणि च काननानि,
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा
रिक्तोऽसि यज्जलद्! सैव तवोत्तमश्रीः’
(हे मेघ! पर्वतकुल को आश्वस्त करके, दावाग्नि की ज्वाला से दहकती हुई वनभूमि को शान्त करके, नाना नद-नदियों को पूर्ण करके जो तुम रिक्त हो गए हो, यह तुम्हारी उत्तम श्री है।)
शेष सृष्टि से समरस करने की क्षमता साहित्य में है। रमेश चन्द्र शाह का कहना है -‘महान् कलाकारों में विराट् की चेतना और विराट् से जुड सकने की क्षमता भी असाधारण होगी। इसीलिए तो वह ‘अनुभव’ (रचनाकार का अनुभव) अपने सम्पूर्ण ताजेपन के साथ उनकी कृति में सुरक्षित रहता है और हममें अपनी पात्रता के अनुपात में वह हममें संक्रमित हो जाता है- अपने आप। जाहिर है कि कलाकृति में व्यक्त अनुभव सभी संवेदनशील पाठकों के अनुभव बन जाते हैं।
यह अवधारणा व्यक्ति को समाज से, समाज को राष्ट्र से और राष्ट्र को विश्व से जोडती है और इस तथ्य की बार-बार उद्घोषणा करती है कि- ‘छव वदम बंद सपअम पद प्ेवसंजपवदश् यह बात अलग है कि अस्तित्ववादी दर्शन यह मानकर चलता है कि ‘बच्चा जब पैदा होता है, उसकी कोई अइडेन्टिटी नहीं होती, धीरे-धीरे उसे एक पहचान मिलती है जो उसे परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व से जोडती है।’ यानी उसे जो पहचान मिलती है, वह ‘अन्यों’ से ही मिलती है। हम यहाँ एक कहावत उद्धृत कर सकते हैं- ‘अकेला चना भाड नहीं फोड सकता’। वस्तुतः अकेले व्यक्ति की प्रतिस्पर्धा और दुःख भरे जीवन को वर्ग की सदस्यता द्वारा ही रोका जा सकता है।
किन्तु यह साथ-साथ चलने, साथ-साथ रहने, संगठन की शक्ति को पहचानकर अपने, अपने परिवार के, अपने समाज के और अपने देश के कल्याण की कामना का भाव आज के समय के सच से परे है। यदि आज हम-
‘कह दो शंकर से आज करें
वे प्रलयनृत्य फिर एकबार
सारे भारत में गूँज उठे
हर-हर बम-बम का महोच्चार
ले अंगडाई हिल उठे धरा
फट जाए कुहा, भागे प्रमाद
यह आह्वान करते हैं तो उसका वह अपेक्षित प्रभाव नहीं पडेगा, जो राष्ट्रीय आन्दोलन के परिपक्ष्य में पडा होगा। आज तो व्यापकता की अभिलाषा लेकर चलने वाला निष्फल होकर धीरे-धीरे संकुचित होकर अपने ही दुःखों की दुनिया में खो जाता है-
‘और धीरे-धीरे एक दिन
‘ ‘ ‘ ‘ ‘
विश्व से राष्ट्र/राष्ट्र से प्रदेश/प्रदेश से नगर/
और नगर से ‘मैं’ बनकर/अपने में समा जाता हूँ।
पीठ पर से विश्व लुढक पडता है
और छाती में से राष्ट्र
यह सच आज का सच है। समय के सच को नकारा नहीं जा सकता और समय का सच यह है कि आज पूरा विश्व एक ऐसी दिशा की ओर बढ रहा है, जिसमें कुछ भी स्थिर नहीं है। चलताऊ भाषा का प्रयोग करें तो सब कुछ हौचपौच चल रहा है। नीत्शे द्वारा ईश्वर की मृत्यु, फूफूयामा द्वारा इतिहास की मृत्यु, इलियट द्वारा एक प्रकार के उपन्यास की मृत्यु, देरिदा द्वारा लिखित शब्दों की मृत्यु की घोषणा के साथ-साथ बाजारीकरण के बढते प्रभुत्व, व्यक्ति की स्वायत्तता पर उठते प्रश्नचिह्नों और ‘शब्दों की मिटती सत्ता’ के समय में साहित्य भी समय की नब्ज को टटोल रहा है। आज हमारी स्वतन्त्र सोच कहाँ है’ विज्ञापनी दुनिया द्वारा हमें जो कुछ परोस दिया जाता है, वही हम लपकते हैं। इस संस्कृति में हम वस्तु की गुणवत्ता के स्थान पर वह खोजते हैं जिसके साथ कोई ‘फ्री’ स्कीम हो। ऐसे समय में ‘स्व’ (ैमस) और ‘अन्य’ (वजीमत) विषयक सोच में परिवर्तन आना बडा स्वाभाविक है। इस परिप्रेक्ष्य में सात्र की दो पुस्तकों-‘बीइंग एण्ड नथिंगनेस’ (१९४३) और ‘क्रिटीक ऑफ डाइलेक्टिकल रीजन’ (१९६०) का ध्यान आता है, जिसमें उन्होंने ‘एलिअनेशन’ (अजनबियत) के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए ‘दूसरे’ (वजीमत) की उपस्थिति को नरक की संज्ञा दी- ‘द हेल इज अदर पीपुल’ कहा और उद्घोषणा की कि ‘दूसरों के लिए मैं और मेरे लिए दूसरे ‘वस्तु’ बन जाते हैं। दूसरों की उपस्थिति मात्र से व्यक्ति अपने से अलग हो जाता है क्योंकि उसकी चेतना दूसरों की ओर उन्मुख हो उठती है११।
साहित्य ‘समय’ के साथ चलता है इसलिए आज के समाज में परिव्याप्त होते उन अजनबीपन का प्रभाव उस पर पडना बडा स्वाभाविक है। आज के परिप्रेक्ष्य में ‘अपने और पराये’ का भाव, जो रवीन्द्रनाथ त्यागी के इन शब्दों में बडे ही प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया गया है- ‘मेरे बच्चे बच्चे, तेरे बच्चे जनसंख्या- साहित्य में कामू जैसे साहित्यकारों द्वारा काफी समय पूर्व अभिव्यक्त होने लगा था। कामू के ‘अजनबी’ का प्रसंग लेना यहाँ अप्रासंगिक नहीं है। ‘अजनबी’ का पात्र ‘द मर्डरर’ अपनी माँ की लाश के सिरहाने बैठा हुआ है और अपनी माँ के विषय में नहीं सोचता, पूरे दुनिया-जहान की बातें सोचता है। इसी सन्दर्भ में मेरे जेहन में प्रेमचन्द की ‘कफन’ कहानी बार-बार उभरती है जिसके पात्र घीसू और माधव प्रसव पीडा से कराहती अपनी पत्नी और पुत्रवधु से नितान्त असम्पृक्त होकर अलाव के सामने बैठे हुए भुने हुए आलू निकाल-निकाल कर खाते रहते हैं और दुनिया-जहान की बातें करते रहते हैं। दोनों में से एक भी उठकर अन्दर नहीं जाना चाहता क्योंकि उन्हें भय है कि यदि एक अलाव के पास से उठकर गया तो दूसरा आलू का बडा भाग साफ कर जाएगा। उनका चिन्तन है- ‘नया कफन चाहिए। यह भी कैसा रिवाज है कि जिसे जीते-जी फटा चीथडा नसीब नहीं हुआ, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए’ – और कफन के लिए माँगे गए पैसों को ताडीखाने में उडा देते हैं- निर्मम शोषण-चक्र ने उन्हें ऐसे अँधेरे में फेंक दिया है जहाँ मानवीय मूल्यों की पहचान लुप्त हो गई है।
यहाँ प्रेमचन्द के बहाने से जिस ‘आम आदमी’ या आज के सन्दर्भ में ‘अदर’ की चर्चा की शुरुआत होती है, वह ‘अदर’ भारतीय वाङ्मय के पारम्परिक स्वरुप में इससे पूर्व नजर नहीं आता। ‘अन्य’ के परिप्रेक्ष्य में अब जब औपनिवेशिक चिन्तन को नकारा जा चुका है, साहित्यिक मूल्यों, मान्यताओं के सन्दर्भ में भी प्रश्न उठने स्वाभाविक है। सवाल यहाँ यह उठता है कि हमारा साहित्य किसके द्वारा और किसके लिए रचा गया ‘ जाहिर है कि ‘हाशिए’ के लोग वहाँ किसी गिनती में नहीं आते, क्योंकि समाज में उनका स्थान ‘व्यक्ति’ के रूप में नहीं ‘वस्तु’ के रूप में किया जाता रहा। परिणामतः हमारा लगभग सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य जिन महानायकों की परिकल्पना करता रहा है और उन्हें ‘धीरोदान्त, धीर ललित, धीर प्रशान्त और धीरोद्धत’ जैसे गुणों से अलंकृत करके उन्हें ‘वज्रादपि कटु और कुसुमादपि मृदृ’ कहता रहा है, आज अपने अर्थ खो चुके हैं। संस्कृत के बाद प्राकृत, अपभ्रंश काल में भी नायकों की कमोवेश यही परिकल्पना रही। हाँ, अपभ्रंश में प्रबन्ध काव्यों के अतिरिक्त चरित्र काव्यों या कथा रूपों में ‘नायक’ की यह परम्परा थोडी परिवर्तित हुई और ‘भविसयतकथा’ जैसी रचनाओं के नायक ‘क्षत्रिय’ न होकर ‘वणिक पुत्र’ होने लगे, हाँलाकि इन रचनाओं के मूल स्वरूप वही थे, जो उनकी पूर्ववर्ती रचनाओं के थे, पर सरहपा, कण्हपा इत्यादि सन्तों की रचनाओं में ‘संदेस-रासक’ में और हेमचन्द्र के दोहों में आम आदमी का चुफ से प्रवेश तो होने ही लगा था।
यहाँ हिन्दी के रीतिकाल में लिखा गया यह दोहा याद आता है, जो जहाँगीर द्वारा नूरजहाँ की शान में कवि वाणी से निकला –
‘आध सेर शराब मुझको, एक सेर शराब हो,
सारी सल्तनत नूरजहाँ की, खून हो कि खराब हो।’
यह चरित्र साहित्य के बदलते सरोकारों की ओर इंगित करता है, जिसमें राजा प्रजा के लिए ‘सन्तति’ का भाव नहीं रखता, जिसमें ‘मूलन की ही अधोगति केशव गाइए’ कथन अपनी सार्थकता खो बैठता है और जहाँ आपसी रिश्तों के बीच एक दीवार खडी दिखाई देती है, एक ऐसी दीवार – जो सूर्य की रोशनी को सपनों तक, सच तक नहीं आने देती, और अनायास यह कविता यहाँ ध्यान में आ जाती है-
It was a long time ago
I have almost forgotten my dream
But it was there then
In front of me Bright like a sun
My Dream
And then thee wal rose
Rose slowly
Between me and my dream
Rose slowly slowly
Dimming
Hiding
The light of my dream
Rose until it touched the sky
The wall (As I grow older)
(धर्मवीर भारती द्वारा इस कविता का अनुवाद किया गया है-
बहुत दिन हो गए / मैं अपने सपने को लगभग भूल चुका / लेकिन सपना अनश्वर था/ मेरे सामने / झिलमिलाते हुए सूरज की तरह / मेरा सपना और फिर दीवाल उठी / धीरे-धीरे/मेरे और मेरे सपने के बीच/उठती गई धीरे-धीरे/मेरे सपनों की रोशनी/धुँधुला करते हुए/रोशनी का गला घोंटते हुए/यहाँ तक कि आकाश चूमने लगी/वह दीवाल), – (सपना और दीवाल)
यह वह दीवार है जो ‘अजनबियत’ को प्रश्रय देती है।
प्रेमचन्द के साहित्य से साहित्य जगत में बाकायदा प्रविष्ट ‘अन्य’ की निराशा, वेदना, पीडा, व्यथा, कुण्ठा, एकाकीपन, मृत्युबोध और ‘अजनबियत’ – जिसका प्रभाव पूरे विश्व-साहित्य पर पडा था और दोस्तोवस्की, काफ्का, कामू, सार्त्र आदि के साहित्य में दृष्टिगत हो रहा था – हिन्दी के अनेक अस्तित्ववादी उपन्यासों – त्यागपत्र (जैनेन्द्र), सूरज का सातवाँ घोडा (धर्मवीर भारती), अजय की डायरी (देवराज), खाली कुर्सी की आत्मा (लक्ष्मीकान्त वर्मा), सारा आकाश (राजेन्द्र यादव), रुकोगी नहीं राधिका (उषा प्रियवंदा), अलग-अलग वैतरणी (शिवप्रसाद सिंह), जल टूटता हुआ (रामदरश मिश्र), बेघर (ममता कालिया) आदि-आदि में अभिव्यक्त हो रहा था। अज्ञेय का उपन्यास ‘अपने-अपने अजनबी’ की दो पात्र ‘युवती योके’ तथा ‘वृद्धा सेल्मा’ आकस्मिक रूप से हुए हिमपात के कारण बर्फ में दबे काठघर में तीन-चार महिनों के लिए कैद हो जाती है और अपने-अपने दृष्टिकोण के पार्थक्य के कारण साथ रहते हुए, खाते-पीते हुए, बातें करते हुए भी एक-दूसरे के लिए अजनबी बनी रहती है। यहाँ ‘अहं की प्रामाणिकता के मूल में चूँकि मृत्यु की भयानक छाया है, आशंका और संशय का विद्रूप आवरण है, व्यथा भरी पीडा और करुणा है। मृत्यु की भयंकरता व्यक्ति में महान परिवर्तन ला देती है, प्रियजन अजनबी हो जाते हैं और अनपहचाने अजनबी आत्मीय बन जाते है – यही इस उपन्यास का मूल स्वर है।
यह ‘अजनबियत’, जिसकी चर्चा मृत्यु, काल और भीड के सन्दर्भ में की गई है उसके प्रभाव के परिणाम स्वरूप एक दूसरे को शंका से देखने, आरोप-अपराध दूसरे के सिर पर मढकर अपने आप से निगाहें चुराने तथा कथित ‘सत्ता’ के मद में दूसरे को तुच्छ समझने के भाव को पोषित करने की बात को ध्यान में रखकर ही सार्त ‘दूसरे की उपस्थिति को नरक’ कहते हैं।
इस अजनबियत के परिणामस्वरूप भारतीय साहित्य में वर्णित प्राचीन नायक का गरिमामय, आभिजात्यता से युक्त, लोकरंजक, मर्यादित रूप जो प्राचीन समय के समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप था, आधुनिक काल तक आते आते स्वातन्य चेतना के उद्घोष के साथ अपने महिमामंडित स्वरूप को त्यागकर गांधी, लोहिया, पटेल आदि के रूप में सामान्य भावभूमि तक आ पहुँचा। लेकिन, स्वतन्त्रतापूर्व तक का साहित्य ‘आमजन के दुःख को एक समान धरातल पर रख पाने की अपनी असीम शक्ति को नहीं पहचान पा रहा था, और इसी परिप्रेक्ष्य में ये सवाल निरन्तर खडे हो रहे थे कि साहित्य किसके लिए है और कैसा होना चाहिए। इन प्रश्नों के परिणामस्वरूप साहित्य में नायक से अनायक की ओर, कथा से कथाहीनता की ओर बढना बहुत ही स्वाभाविक था। ऐसे में ‘अजनबियत’ की अवधारणा का साहित्य में प्रवेश हुआ।
अब नायक पद पर प्रतिष्ठित हुआ – भूखा किसान, भिक्षुक आदि आदि।
उत्तर आधुनिक काल से पूर्व के समाज और साहित्य में ये प्रश्न उठने आरम्भ हो चुके थे कि – सत्य का स्वरूप क्या है’ वह कहाँ है’ मैं कौन हूँ’ मेरी अस्मिता क्या है’ मेरा महत्त्व क्या है (निराला की राम की शक्तिपूजा की ये पंक्तियाँ यहाँ सहज ही स्मरण हो जाती हैं – धिक जीवन को पाता ही आया विरोध / धिक साधन जिसके लिए किया सदा ही शोध) और इसीलिए आज का नचिकेता यम के द्वारा प्राप्त वरदानों के प्रतिदान स्वरूप कोई वैभव-विलास की सामग्री नहीं चाहता, अपितु वह केवल आत्मान्वेषण करना चाहता है-
ये चीजें मेरी हैं / सम्बन्धी मेरे हैं /
धरा, धाम, सभा, बन्धु, पिता, नाम, वर्तमान-
मुझमे हैं- मुझसे हैं-मेरे हैं-
अनजाने, पहचाने, माने, बेमाने
सब मेरे हैं- मैं सबका हूँ
लेकिन मैं क्या हूँ’
मैं क्या हूँ’ / मैं क्या हूँ’
स्पष्ट है कि आधुनिक युग की माँग के अनुरूप साहित्य के परम्परागत रूप में परिवर्तन हुआ परन्तु आधुनिकता में भी समाज के उपेक्षित वर्ग शामिल नहीं थे। यह वर्ग शामिल हुआ ‘अन्य की आवाज’ के रूप में उत्तरआधुनिक समय में। उत्तरआधुनिक समय-जिसे चिन्तकों ने पृथ्वी पर ‘एक नए युग की शुरूआत’ के रूप में चित्रित किया है, एक ऐसे नये युग की शुरूआत के रूप में जिसमें न पारम्परिक समाज है, न संस्कृति ओर न पर्यावरण, जिसमें सत्य और तर्क, नैतिकता, ईश्वर, इतिहास आदि से जुडी धारणाएँ निरर्थक मानी जा रही हैं, जहाँ यथार्थ को भी नकारा जा रहा है, जहाँ ‘अर्थ’ अर्थहीन है और जिसे ‘डीकन्सट्रक्शन’ द्वारा पर्त-दर-पर्त छील दिया जाता है और आफ पास कुछ नहीं बचता। हाँ, यह युग गूँगों का पैरोकार जरूर है। जगदीश्वर चतुर्वेदी का कहना है-
‘….पश्चिमी दार्शनिकों ने ‘अदरनेस’ की खोज करके उसे केन्द्र में प्रतिष्ठित किया है। कल तक जो उपेक्षित थे, वे हाशिए पर थे किन्तु आज वे सभी विचारों के केन्द्र में हैं। आज ये ही मुक्तिदूत हैं। आज सभी किस्म की सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहचानों के बीच में हाशिए के लोगों की नैतिकता केन्द्र में आ गई है। यह पहले की सभी किस्म की नैतिकताओं से मुक्ति की बात भी कर रहे हैं।
पर पूरे वैश्विक परिदृश्य में आज भी ‘अन्य’ यानी खेतिहर मजदूर, मछुआरे, शिल्पी, दलित हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं और जिनकी ‘अस्मिता’ आज भी सुरक्षित नहीं है क्योंकि उन्हे आज भी ‘चुनने’ का अधिकार नहीं है और कोई आश्चर्य नहीं है कि ‘हम’ यानी समर्थ (समरथ को नहीं दोष गुसाईं) के द्वारा वह धीरे-धीरे गोदान के ‘होरी’ की तरह ‘महतो’ से ‘असहाय मजदूर’ बनते जाएँगे और हजम कर लिए जाएँगे।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि
‘अन्य की व्याख्या, उसके शोषण की व्याख्या और उसके यथार्थ की व्याख्या से उसकी दुनिया बदलने वाली नहीं है।
केवल यह कहने मात्र से काम नहीं चलने वाला है कि –
वह महाभारत का एक योद्धा है /
एक अर्धरथी योद्धा /
जिसे रिक्शे पर बैठ अचानक पाते हैं /
वह एक हाथवाला एक रिक्शावाला है।
इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि हम केवल नारों में ही वर्गहीनता की बात न करें। ट्रेन में सीट पर कब्जा जमाते ही अन्दर घुसते दूसरे व्यक्ति को देखकर उसके प्रति कठोर होकर हम इस वर्गहीन समाज की परिकल्पना नहीं कर सकते। अगर दूसरे के प्रति हमारे हृदय में संवेदना नहीं जागती, हमारी आँखों में पानी नहीं आता और कवि यह कहने को मजबूर हो जाता है-
गेहुँए से गोरे हुए उनके चेहरों की ललाई में /
उतनी भर भी फिक्र नहीं घुलती कभी /
जितनी उनके खद्दर के झक्क कुर्ते में नील
तो हम समानता की कितनी भी दावेदारी क्यों न करें, निरर्थक है। पर हम यह बात स्पष्टतः देखते हैं कि आज हम एक वर्गहीन समाज की बात तो करते हैं और इस वर्गहीन समाज के बहुत से पैरोकार शोषक-शोषित के वर्गभेद को मिटाने की बात करते हैं, पर वह वर्गभेद मिटा नहीं, हाँ, परिवर्तित जरूर हो गया है कुछ और वर्गभेदों के रूप में। अब निराला का कुकुरमुत्ता शोषितों का प्रतीक नहीं है, मशरूमों का पर्याय-खादखोर मशरूम का पर्याय बन गया है। यानी इस समाज में कुछ ‘आम’ आदमी खास हो गए हैं और खास होते ही उनकी फितरत भी बदल गई है।
ऐसे समय में यदि वास्तव में अन्य और स्व का भेद मिटाना है तो उसके लिए सबसे जरुरी है आदमीयत को बचाना। यदि आदमीयत बची रहेगी तो अन्य की अस्मिता भी बची रहेगी अन्यथा हम यही कहते रह जाएँगे-
अब वो लालिमा कहाँ / धरती के होठों पर /
अम्बर के होठों की / पानी सारा बहा जा रहा/
नरक की ओर / कौन रोके’ जगह नहीं मिलती /
धरती को जडें जमाने की / कहाँ बसाओगे घर /
कहाँ सेज बिछेगी’
इस दुनिया को बदलने के लिए आज भी ‘दूसरों के लिए अपने को दुःखी कर लेने की, उसके दुःख को सहन करने की भावना जगाना जरूरी है और यह भावना जगाता है साहित्य। इस साहित्य के द्वारा ही अदर और स्व के बीच की खाई पाटी जा सकती है। अतः कहा जा सकता है-
‘जिस दिन मरेगी कविता / नहीं रोयेगा कोई
भी भरा हुआ पेट /
रोयेगा अभाव, रोयेगी पीडा / रोयेगा यथार्थ /
क्योंकि उस दिन के बाद / नहीं रह जाएगी /
उनके लिए लडने वाली / सबसे बडी मुट्ठी।
यहाँ मुझे अमृता प्रीतम की अन्तिम कविता ‘मैं तुम्हें फिर मिलूँगी’ की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करने का लोभ संवरण करना कठिन लग रहा है। इस कविता में अमृता का अपना अस्तित्व विराट् होकर व्यक्त होता है। इमरोज को सम्बोधित इस कविता में अमृता ‘कल्पना में चिंगारी बनकर, सूरज की लौ बनकर, चश्मा बनकर, ठंडक बनकर – धीरे-धीरे प्रकृति के कण-कण में व्याप्त हो जाने की परिकल्पना करती हैं। वे कहती हैं-
‘यह जन्म मेरे साथ चलेगा,
यह शरीर समाप्त होता है
तो सब कुछ समाप्त हो जाता है
पर यादों के धागे
सृष्टि कण के होते हैं
मैं उन कणों को चुनूँगी
धागों को लपेटूँगी
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।
और साहित्य की सार्थकता भी इस बात में है कि व्यष्टि समष्टि में परिणत हो जाय और हम यह उद्घोष कर सकें –
भाव कर्म वाणी स्वतन्त्र हो / किन्तु प्रेम ही मूल मन्त्र हो।
हों समान अवसर सब ही को / हों समान अधिकार।
जयशंकर प्रसाद भी अपनी सुप्रसिद्ध रचना आँसू का समापन इन्हीं शब्दों से करते हैं-
सबका निचोड ले कर तुम सुख सूखे जीवन में
बरसो प्रभात हिमकन सा आँसूं इस विश्व सदन में।
निस्सन्देह साहित्य में वह शक्ति है जो क्षुद्र से क्षुद्र वस्तु को विराट् बना देता है और ‘स्व’ का ‘पर’ में विलय कर देता है। कवि के शब्दों में यह आशा का स्वर सुनाते हुए अब मैं अपनी लेखनी को विराम देती हूँ-
कहना ही होगा हमें / हम प्रलय न होने देंगे /
इस सौर मंडल में/जीवन-ज्योतित पृथ्वी का
गोलक/
घूमता रहेगा अनन्तकाल / मानव की जययात्रा /
शवयात्रा में नहीं बदलेगी…
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प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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वेब पत्र का उद्देश्य-

मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ, बिहार, झारखण्ड तथा उत्तरांचल की पी.एस.सी परीक्षा तथा संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के हिन्दी सहित्य के परीक्षार्थियो के लिये सहायक सामग्री उपलब्ध कराना।

यह वेब पत्र सिविल सेवा परीक्षा मे हिन्दी साहित्य विषय लेने वाले परीक्षार्थियो की सहायता का एक प्रयास है। इस वेब पत्र का उद्देश्य किसी भी प्रकार का व्यवसायिक लाभ कमाना नही है। इसमे विभिन्न लेखो का संकलन किया गया है। आप हिन्दी साहित्य से संबंधित उपयोगी सामगी या आलेख यूनिकोड लिपि या कॄतिदेव लिपि में भेज सकते है। हमारा पता है-

mitwa1980@gmail.com

- संपादक

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