हिन्दी साहित्य

हिन्दी नाट्य समीक्षा

Posted on: जनवरी 17, 2008

समीक्षा की उत्पत्ति के लिए मानुषी वृत्ति (अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहना) इसकी धरातल कही जा सकती है। यह वृत्ति समाज, राजनीति, व्यवहार, आपसी सम्बन्ध, खेलकूद और प्रदर्शन आदि सब जगह प्रदर्शित होती है। वस्तुतः इसे बुराई, भर्त्सना, आलोचना, समालोचना, कटु आलोचना समीक्षा जैसे सम्बोधन भी दिए गए। इसे आदिकाल से किसी न किसी रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा। फलतः मानव विकास के साथ इसका क्षेत्र भी बढता गया और नाट्याचार्य भरत काल में इसके क्षेत्र विशेष में एक अलग ही पहचान सामने आई जो नाट्य समीक्षाकहलायी। धीरे- धीरे तब से लेकर आज तक इसके कई रूप बनते गए अर्थात् रंग समीक्षा, व्यक्ति समीक्षा, पुस्तक समीक्षा, फिल्म समीक्षा, पत्र समीक्षा और सम्पादकीय समीक्षा आदि। इन समीक्षाओं ने जन्म दिया

समीक्षा का स्वरूप निरूपण ही हमारा विवेच्य है विशेषतः नाट्य क्षेत्र में नाट्य प्रस्तुतियों का, कृतियों का और लेखों का। समीक्षा की टिप्पणियों से सुधार सम्भव है वह भी उसकी पुनः प्रस्तुति के समय परन्तु पुस्तक और फिल्म समीक्षा में इसका कोई विकल्प नहीं है। इसलिए नाट्य समीक्षा उपयोगी भी है और आवश्यक भी। दरअसल सत्य का बोध कराना ही समीक्षा का धर्म होना चाहिए। वही समीक्षा सही होती है जो पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो। विद्वानों ने भी आलोचना का प्रमुखतम गुण उसका निष्पक्ष होना ही बताया है अन्यथा समीक्ष्य के गौरव की हानि का संशय सदैव बना रहता है।

 

समीक्षा के स्वरूप का निरूपण

 

वैदिक और पूर्व वैदिक काल की नाट्य झाँकियों का अथवा प्रहसन प्रयोगों का अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि यज्ञों के मध्य प्रहसनों की प्रस्तुति अथवा प्रयोजन मात्र मनोरंजन हेतु किया जाता था। प्रबुद्ध दर्शक समूह को याज्ञिक कर्मकाण्ड के बीच लघु नाटकीय दृश्य बतला कर बिठाए रखना संयोजक की कार्यकुशलता का प्रतीक था। वैदिक संवाद सूक्तों में यम-यमी, पुरूर्वा-उर्वशी, इन्द्र-वामदेव सोम-विक्रय प्रसंग आदि ऐसी ही प्रस्तुतियों के उदाहरण हैं। यज्ञ में सम्मिलित अतिथिगण यजमान आदि उसके दर्शक होते थे। इसलिए यह भी सम्भव है कि वे सभी प्रस्तुत किए जाने वाले रूपों की आपस में चर्चा अवश्य करते होंगे – किसी कार्यक्रम को सुन्दर, मनोरंजक तो किसी को हल्का, घटिया अथवा निम्न-स्तरीय भी कहा जाता होगा, यह अवश्यंभावी है। रंगशाला में अभिनय की सफलता और असफलता पर हर्ष और विषाद् सूचक ध्वनियों को मौखिक समीक्षा ही माना है। व्यावहारिक समीक्षा का मार्ग प्रशस्त नहीं था। गुण-दोष विवेचन के ही रूप में व्यावहारिक आलोचना दिखाई पडी थी। प्रमाणों के अभाव में यह सिद्ध करना अत्यन्त कठिन है कि उस समय नाट्य समीक्षा होती थी अथवा नहीं परन्तु यह कहना असत्य नहीं होगा कि उस समय मौखिक नाट्य समीक्षा का प्रादुर्भाव अवश्य हो चुका था परन्तु उसका रूप निश्चित नहीं हुआ था।

 

भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र काल

 

यदि नाट्य समीक्षा के लिखित आदि रूप को आधार बनाया जाय तो भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र से बढकर अन्य कोई ग्रन्थ प्रतीत नहीं होता। भारतीय रंग परम्परा भरतमुनि से भी बहुत पहले की है जिसका समृद्ध रूप हमें भरत काल में दिखाई देता है। भरत मुनि ने जैसा देखा वैसा चित्रित किया अतः वे ही नाट्य समीक्षा क्षेत्र में प्रथम नाट्य समीक्षक कहें जाएँ तो मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भरत मुनि को रंगमंच की सम्पूर्ण विधाओं का ज्ञान था। उन्होंने तात्कालिक सम्पूर्ण नाट्य रूपों का विस्तार से विवेचन किया है – विशेषतः मंचों के आकार-प्रकार, मंच सम्बन्धी शब्दों जैसे रंगशीर्ष, रंगपीठ, दर्शकों हेतु वर्णानुकूल स्थान, वाद्ययंत्र, सूत्रधार (तौरिय), अधिपति, वेषकर, मांल्यकृत, चित्रज्ञ, रजक, प्रकाशदीप दर्शक (प्रार्थिक एवं प्रार्थक) अर्थात् आमंत्रित किए जाने वाले प्रार्थित और स्वयं आने वाले प्रार्थक दर्शक कहलाते थे। भरत के अनुसार स्वाभाविकता का अधिकाधिक ध्यान केवल उपकरणों में ही नहीं, अपितु आंगिक अभिनय में भी अभीष्ट था। उसमें बहु अंग-लीला (ओवर एक्टिंग) वर्जित थी।

भरत ने ना.शा. में रंगसज्जा का विस्तार से वर्णन किया है। रंगलेपन पात्रानुकूल बतलाया है। नाट्य समीक्षक को नाटक सम्बन्धी अथाह ज्ञान होना भी आवश्यक माना जाता होगा और भरत मुनि इसमें सिद्धहस्त प्रतीत होते हैं इसलिए रंगचर्चाओं के साथ-साथ नाट्याचार्यों को भी उनके कर्त्तव्य के प्रति सजग करते हुए दिखाई देते हैं। इन सभी तथ्यों के बावजूद पूर्व भरत और भरतकाल में न तो उन नाटकों का नामांकन हुआ है और न कहीं किसी नाट्यशाला का चित्रण अथवा चर्चा मिलती है जहाँ नाटक खेले जाते थे परन्तु इस अभाव की पूर्ति हमें संस्कृतकाल में अवश्य होती दिखाई देती है।

 

संस्कृतकाल

 

ईसा से पूर्व द्वितीय शताब्दी के मध्य से संस्कृत काल में भी नाट्य प्रदर्शन मात्र मनोरंजनार्थ बतलाया गया है। संस्कृतकाल के नाट्य समीक्षकों में पतंजलि का नाम प्रमुख है जिन्होंने अपने महाकाव्य में दो प्रकार के अभिनयों का उल्लेख किया है। काले और लाल रंगों से कंस और कृष्ण के पक्ष के अभिनेताओं को मंच पर बतलाया जाता था। भाष्य के अनुसार स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही करते थे जिन्हें भूकंस कहते थे। भूकंस अर्थात् स्त्री की भूमिका में आया हुआ पुरुष। पतंजलि ने लिखा है कि समाज में अभिनेताओं को विशेष सम्मान नहीं था क्योंकि उन्हें नैतिक दृष्टि से भ्रष्ट बतलाया गया है। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि अश्वर्जित और पुनर्वसु नामक दो भिक्षुओं को कीटगिरी की रंगशाला में अभिनय देखने, नर्तकी से बात करने के दोष में विहार से बाहर निकाल दिया गया था।

उस समय प्रस्तुतियों पर राजकर लगता था। सभी ललित कलाओं को राज्य की ओर से प्रोत्साहन भी मिलता था। नाट्य प्रदर्शन और दर्शकवृंद को उस समय समाज कहा जाता था। यहाँ समीक्षात्मक विवेचन का अभाव प्रतीत होता है। कालिदास के नाटक विक्रमोर्वशीय, अभिज्ञान शाकुन्तलम्, महाराज विक्रमादित्य की सभा में अभिनीत हुए बतलाए गए हैं। श्ूाद्रक का मृच्छकटिक नाटक उज्जयिनी में अभिनीत हुआ था। इस काल में भी वेदकालीन प्रस्तुति शैली का रूप कहीं-कहीं दिखाई देता है। भवभूति का उत्तररामचरित नाटक भगवान कालप्रिय महादेव की यात्रा के भाव पर श्रेष्ठ सामाजिकों के समक्ष अभिनीत हुआ था और मुद्राराक्षस तथा सम्राट हर्ष के प्रियदर्शिका, रत्नावली तथा नागानन्द नाटकों का प्रदर्शन विश्व के प्रतिष्ठित व्यक्तियों का परिषद् के समक्ष हुआ था। इस काल में रंगमंचीय कृतियों का अभाव प्रतीत नहीं होता। विद्वानों की मान्यता है कि संस्कृत नाटकों में दृश्यात्मक विधान उतना नहीं हुआ करता था, रंगमंचीय योग कम से कम था। संभवतः इसीलिए संस्कृत नाट्य समीक्षा के सूत्र कहीं दृष्टिगत नहीं होते।

हाँ, आज के युग में ऐसे समीक्षक हैं जिन्होंने संस्कृत नाटकों का रंगमंचीय दृष्टि से मूल्यांकन किया है जैसे डॉ. वी. राघवन, डॉ. सूर्यकान्त, श्री रमाशंकर तिवाडी, डॉ. कुंवरचन्द्र प्रकाशसिंह, डॉ. रघुवंश, श्री कृष्णदास, कान्तिकिशोर भरतिया, डॉ. रामविलास शर्मा, बलवन्त गार्गी आदि। इनमें से किसी ने कथ्य की उपादेयता पर टीका-टिप्पणी की तो किसी ने प्रयोगात्मक स्वरूप का विवेचन किया जैसे संस्कृत नाटकों का प्रदर्शन सोद्देश्य होता था, उनमें जनहित समाहित था, इसी दृष्टिकोण को लेकर वे जनता के समक्ष अभिनीत किए जाते थे।

कहीं-कहीं समीक्षक अपना स्पष्ट मत भी पाठक के सामने रख देता है यथा – मंच पर दुर्योधन की मृत्यु दिखाकर भास ने परिपाटी का उल्लंघन किया है लेकिन इन्होंने नाट्य प्रस्तुतियों को देखा नहीं और केवल नाटक पढकर अपनी विचारधारा (समीक्षा) प्रस्तुत की है जो पुस्तकीय समीक्षा के सदृश्य है परन्तु यह सब उस युग से चली आ रही नाट्य समीक्षा की कडी में जोड देना एक अनायास प्रयास होगा क्योंकि संस्कृत काल में नाट्य समीक्षा नाम से जानकारी अप्राप्य है। यत्र-तत्र कुछ ऐसे संकेत भी प्राप्त नहीं होते हैं जहाँ पर तत्कालीन लेखकों ने नाट्य प्रस्तुतियों पर अथवा उनके किसी पक्ष विशेष पर कुछ कहा हो जैसा पतंजलि ने रंगमंच के कई पक्षों पर कुछ न कुछ टिप्पणी अवश्य की है परन्तु कालिदास के काल में समीक्षा का कुछ भी अंकुर दिखाई नहीं देता।

 

लोकनाटक और समीक्षा

 

लोकमंच आदि और अनंत है, सर्वव्याप्त रहता आया है। नश्वर नहीं है। समय-समय पर बदलती संस्कृति का उस पर भी प्रभाव पडता है परन्तु फिर भी उसका अपना मूल रूप होता है जिसे समय-समय पर भाषायी नाट्य समारोह अपनाते रहते हैं इसलिए लोकमंच का गहरा प्रभाव हिन्दी नाट्य प्रस्तुतियों पर देखा जाने लगा है।

हिन्दी रंगमंच ने तो लोक शैली (विशेषतः सूत्रधार) पर आधारित नाट्य-प्रस्तुतियाँ देना आरम्भ कर दिया है। इसका रूप हमें कई नाटकों में साफ दिखाई देता है। १९७० के बाद ही ऐसे एक लहर-सी चल पडी है। लोक नाटक तो मूलतः मनोरंजनार्थ प्रस्तुत होते आए हैं और उनकी निजी शैली और विशेषता होती है। अतः समीक्षा के लिए आवश्यकता नहीं होती परन्तु यदि इस युग में लोकनाट्य समारोह हो तो अवश्य उनके स्तर और प्रभाव को दर्शाने के लिए कोई समीक्षक अपनी लेखनी उठा सकता है। हाँ, आज का लेखक यदि लोकनाट्यों का ज्ञाता है तो उन प्रस्तुतियों की सही एवं तुलनात्मक समीक्षा दृष्टि रख सकता है परन्तु ऐसा बहुत कम होता है।

 

ऐसा समीक्षक तो हिन्दी, मराठी, बंगला प्रस्तुतियों में प्रयुक्त लोक शैली के प्रयोग का सही मूल्यांकन करने में भी समर्थ हो सकता है इसलिए यहाँ से सीधा भारतेन्दु काल पर दृष्टिपात करना श्रेयस्कर हो गया है जहाँ से हिन्दी रंग- आन्दोलन का बीजारोपण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया जिसे हिन्दी का पारसी रंगमंच कहा गया है।

 

भारतेन्दुकाल और नाट्य समीक्षा

 

हिन्दी समीक्षा के आरम्भ की चर्चा करते हुए डॉ. रामदरश मिश्र ने भारतेन्दुकाल से आलोचना का आरंभ स्वीकार किया है और लिखा है कि अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव से गद्य में निबन्धों तथा सम्पादकीय टिप्पणियों के रूप में आलोचना होने लगी थी। उन्होंने माना है कि इस काल की व्याख्या परक आलोचनाओं में गुण और दोष दर्शन प्रवृत्ति का प्राधान्य रहा। यहाँ तक कि स्वयं भारतेन्दु ने नाटकनामक लेख में यह दर्शाया है कि हमारे पुराने सिद्धान्त आज कितने उपयोगी हैं और कितने अनुपयोगी तथा पाश्चात्य सिद्धान्तों में किन-किन का ग्रहण श्रेयस्कर होगा। इस प्रकार नाटकलेख को प्रथम सैद्धान्तिक समीक्षात्मक कृति तथा भारतेन्दु को प्रथम समीक्षक माना गया है परन्तु यह युग नाट्य प्रस्तुतियों की दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण है। पारसी रंगकर्मियों ने सभी भाषाओं के रूपान्तरित नाटक प्रस्तुत कर अर्थप्राप्ति को अपना ध्येय बनाया था और उनमें चमत्कार के साथ कुछ निम्न स्तर (पभद्देपन) को भी महत्त्व दिया जाने लगा था। इस प्रकार दर्शकवृंद को शिक्षित करने के बजाय भारतीय संस्कृति के आदर्श रूपों को खेमटिये वालों की तरह मंच पर प्रस्तुत किया जाने लगा। पारसियों को आदर्श से कोई मतलब नहीं था। वे तो व्यापारी थे नाटक के व्यापारी। बस इसी विरोधाभास ने भारतेन्दु के हृदय में भारतीय आदर्श को ललकारा और जागृत किया तत्पश्चात् पारसी प्रस्तुतियों का घोर विरोध किया जाने लगा। बस यहीं (१९वीं शताब्दी) से सही समीक्षा का उदय हुआ।

नारायण प्रसाद बेताबने पारसियों की भाषा शैली के लिए अपनी समीक्षात्मक दृष्टि न खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दीबतलाकर रखी है। हाँ, गिरीश रस्तोगी ने चुटीले संवाद बोलते-बोलते पद्य में बोल जाना, हल्की किस्म के शेर अपनाए जानाकहकर साहित्य और शैलीगत अपने विचार रखे हैं। १९०३ में भट्ट जी ने एक लेख में लिखा था – हिन्दू जाति तथा हिन्दुस्तान को जल्द गिरा देने का सुगम से सुगम लटका यह पारसी थियेटर हैं जो दर्शकों को आशिकी, माशूकी का लुत्फ हासिल करने का बडा उम्दा जरिया है, क्या मजाल जो तमाशबीनों को कहीं से किसी बात में पुरानी हिन्दुस्तानी की झलक मन में आने पाये।श्री जयशंकर प्रसाद ने भी इनकी प्रस्तुतियों को एक असम्बन्ध फूहड भडैतीलिखकर कटु भर्त्सना की है। इस प्रकार इन समीक्षाओं से कुछ पारिसयों की बाह्य प्रस्तुतियों में सुधार भी हुआ जिनमें श्री सूर विजय, व्याकुल भारत, रासमहल नाटक मंडली आदि के नाम गणनीय हैं। सुधार का दूसरा कारण यह भी था कि भारतेन्दु नाटक मंडली के प्रसिद्ध अभिनेता डॉ. वीरेन्द्रनाथ दास, कृष्ण कौल, केशवदास टंडन आदि भी इसमें सक्रिय भाग लेने लगे थे। माधव शुक्ल ने भी पारसी रंगमंच के फूहडपन को समाप्त करने में अपना पूर्ण सहयोग दिया था। फलस्वरूप पारसी फूहडपन के साथ-साथ पारसी कम्पनियों का भी पतन हो गया और १८५७ से हिन्दी रंगमंच ने अपनी जडें जमाना आरम्भ कर दिया।

इस प्रकार इस काल में समीक्षा के नाम पर केवल एक ही तत्त्व हमारे सामने उभर कर आता है वह है हीन प्रदर्शनों का घोर विरोध।इन सुधारवादी समीक्षकों में श्री विश्वम्भर सहाय व्याकुल और जनेश्वर प्रसाद भायल का इसमें विशेष योगदान रहा। पं. बालकृष्ण भट्ट की भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इनकी प्रेरणा से पं. माधव शुक्ल, प्रताप नारायण मिश्र, महादेव भट्ट, पं. गोपालदत्त, रास बिहारी शुक्ल, देवेन्द्रनाथ बेनर्जी, मुद्रिका प्रसाद आदि के नाम गणनीय हैं। इन्होंने हिन्दी रंग आन्दोलन से हिन्दी रंगमंच को विकसित करने में अत्यधिक सहयोग दिया। इस काल में नाट्य प्रतिस्पर्द्धा के तो अनेक उद्धरण मिलते हैं परन्तु किसी भी प्रकार की सीधी समीक्षात्मक अभिव्यक्ति अप्राप्य है। इस युग की सबसे बडी विशेषता यही है कि हिन्दी रंगकर्मियों ने दर्शक रुचि को बदल दिया। चमत्कार प्रयोग और शेर ओ शायरी से प्रभावित दर्शक रुचि को परिष्कृत कर शुद्ध साहित्यिक एवं राष्ट्रीय प्रेरणायुक्त परिस्थितियों की ओर खींच लाना कोई सहज कार्य नहीं कहा जा सकता।

केवल ब्राह्मणनामक पत्र में श्री रामनारायण त्रिपाठी और प्रताप नारायण मिश्र द्वारा लिखित कुछ नाट्यालोचनाएंँ प्राप्त होती हैं तथा मौखिक समीक्षा का एक उदाहरण भी मिलता है कि एक मजिस्टट ने भारतेन्दु के नाटकों को देखकर उन्हें कवि शिरोमणि शेक्सपियर से भी उत्तम बताया और भट्ट जी ने १९०३ में अपने लेख में पारसियों की प्रस्तुतियों को हीन बतलाया और भारतेन्दु ने नाटक नामक लेख में पारसियों के कुछ कुरुचिपूर्ण प्रदर्शन का चित्रण भी किया। समाज सुधार और जनजागृति की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के उद्देश्य से भारतेन्दु ने व्यावसायिक नाटक मण्डलियों की पद्धति का भी खण्डन किया। भारतेन्दु स्वयं एक अच्छे नाटककार, अभिनेता, निदेशक और व्यवस्थापक भी थे इसलिए रंगमंच के हर अच्छे – बुरे पहलू को अच्छी तरह पहचानते थे। उनकी कलम में जो समीक्षा रूप हमें दिखाई देता है, उसी आधार पर उन्हें ही हिन्दी रंग आन्दोलन का सर्वप्रथम नाट्य-समीक्षक मानना समीचीन प्रतीत होता है।

भारतेन्दुकाल की नाट्यकृतियों से समीक्षात्मक दृष्टि का पता चलता है कि अभिनय में अतिनाटकीयता थी, उच्च स्वर, संगीतपूर्ण वाणी, सुन्दर आकर-प्रकार, अनूदित नाटकों का प्रचलन, मंगलाचरण, सूत्रधार, नेपथ्य और आकाशभाषित आदि का प्रयोग संस्कृत के अनुरूप, गीत मौन झाँकी, रामलीला-सी चित्र सज्जा, पद्यात्मक संवाद, नाट्यधर्मी मंच सज्जा, प्रत्येक नाटक का मौन झाँकियों पर समाप्त होना, लम्बे संवाद, जनोपयोगी कथोपकथन, लोकप्रिय गीत ध्वनियाँ, पात्रानुकूल भाषा, देशभक्ति और देशोद्धार पूर्ण कथानक ब्रज और खडी बोली मिश्रित संवाद मेलों, बाजारों आदि में नाटक प्रस्तुत करना आदि-आदि।

स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष ही करते थे परन्तु उनमें इतनी स्वाभाविकता थी कि दर्शक रो पडते थे, भारतेन्दु के द्वारा हरिश्चन्द्रऔर माणक जी के द्वारा शैव्या की भूमिकाएँ ऐसे ही उदाहरण हैं।

उस समय के दर्शकों को गुणग्य एवं रसिक भी बतलाया गया है। डॉ. गोविन्द चातक ने भारतेन्दुकालीन नाट्य रचना की समीक्षा की है। इन समीक्षकों के द्वारा तत्कालीन वेशभूषा, प्रकाश योजना तथा नेपथ्य संगीत की ओर ध्यान दिया गया है। डॉ. गिरीश रस्तोगी आदि ने भी भारतेन्दुकाल के रंगबोध को अपनी समीक्षात्मक दृष्टि से उभारा है।

श्रीकृष्णदास ने भारतेन्दु की नाटक रचना और गठन में कुछ ढीलापन बतलाया है साथ ही उसे सही भी कह दिया गया क्योंकि उसमें समीक्षक को लेखक के द्वारा एक नई दिशा की खोज का संकेत मिला।

डॉ. बच्चनसिंह ने भारतेन्दु के नाटकों को एक क्रांतिकारी कदमबताया। डॉ. सी.पी. सिंह ने सैद्धान्तिक समीक्षा करते हुए लिखा है कि भारतेन्दु जी का प्रधान तथा धीरोदात्त और धीर ललित पर ही विशेष अनुराग लक्षित होता है, उनके पास सभी कवि उच्च कोटि के हैं।

 

द्विवेदी एवं प्रसादयुगीन समीक्षा

 

उत्तर भारतेन्दुकाल में खेले जाने वाले नाटकों का कथ्य प्रायः पौराणिक सामाजिक विषयों से सम्बद्ध था परन्तु कई स्थानों पर राजनीतिक समस्याओं की ओर भी संकेत कर दिया जाता था जैसे सीता स्वयंवरनाटक में ब्रिटिश कूटनीति के समान कठोर शिवधनुष को टस से मस नहीं किया जा सकताकहा गया। इस प्रकार संवादों के माध्यम से ही जन-जागृति उत्पन्न करने का उपक्रम किया जाता था। ऐसे आयोजन कहीं-कहीं प्रतिबन्धित भी कर दिये जाते थे। इस प्रकार इस युग में राजनैतिक संकेत प्रतीकात्मक रूप में प्रेषित किए जाने लगे।

सार्वजनिक स्थल पर मंच-निर्माण, घरों में नाट्य प्रदर्शन, नाट्य पुनरावृत्ति, पूर्वाभ्यास, भडकीली पोशाकें, ट्रान्सफर सीन, दर्शक श्रेणियाँ, कुलीन वर्ग आदि का कला प्रेम, आमंत्रण पत्रों का चलन, चमत्कार प्रयोग आदि के संकेत मिलते हैं। द्विवेदीयुगीन अभिनय कला आदि अतिनाटकीयता से प्रेरित कही गई है परन्तु इन सबसे बडी बात तो यह है कि इस युग में रंगमंचीय समीक्षाओं का भी प्रचलन हो चुका था।

समीक्षाओं का रूप कैसा था, यह बतलाना कठिन है। १९२०-१९३० तक साहित्यिक नाटकों के साथ-साथ पारसी रंगमंचीय नाटकों की धारा चलती रही थी। सभी नाटकों में अतिनाटकीयता प्रसंगों, दैवीशक्ति, कौतुहल चमत्कार, शोखी और छेडछाड प्रेम सम्बन्धी सस्ते गाने, रोमांचकारी घटनाओं, कुरुचिपूर्ण हास्य आदि की प्रधानता थी। इन व्यावसायिक रंगमंचीय नाटकों ने जनरुचि को इतना विकृत कर दिया कि आधुनिक काल में भी नाटककारों को साहित्यिक नाटकों के अनुसार, गीत, गजल का प्रयोग अनिवार्य करना पडा। इसलिए जयशंकर प्रसाद पर भी रचनागत शिथिलता, अराजकता, बहुउद्देशीयता, घटना प्रधानता का दोषारोपण किया गया है परन्तु ऐसा लगता है कि उस युग में कुछ लेखकों ने कटु आलोचना करना ही अपना ध्येय बना लिया था। चाहे वे सही हो या गलत लेकिन आलोचक को अध्येता होने के साथ-साथ प्रस्तुति के काल, पात्र और वस्तुस्थिति से भी पूर्ण परिचित होना चाहिए अन्यथा किसी के दोषी ठहराने के पूर्वाग्रह के आक्षेप से वह स्वयं को बचा नहीं सकेगा क्योंकि समीक्षा के दौरान कभी-कभी भारी भूलें रह जाती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में यदि हम प्रसाद जी की इस उक्ति की ओर ध्यान दें – मैंने उन कम्पनियों के लिए नाटक नहीं लिखे हैं जो चार चलते अभिनेताओं को एकत्र कर कुछ पैसा जुटाकर चार पर्दे मँगनी माँग लेती हैं और दुअन्नी-अठन्नी के टिकिट पर इक्केवालो, खोमचेवालो और दुकानदारों को बटोर कर जगह-जगह प्रहसन करती फिरती हैं। उत्तर रामचरित, शकुन्तला और मुद्राराक्षस कभी न ऐसे अभिनेताओं द्वारा अभिनीत हो सकते हैं और न जन साधारण में वे रसोद्रेक का कारण बन सकते हैं ….।तो प्रसाद जी पर किया गया दोषारोपण विद्वजनों के प्रति ईर्ष्या का द्योतक लगने लगता है।

प्रसाद काल में कुछ नए रूप सामने आए वे हैं – नेपथ्य में गान, कोलाहल और रणवाद्य आदि। बहुत कम अवसर ऐसे होते हैं जब लेखक स्वयं पूर्वाभ्यास के समय कलाकारों के मध्य बैठकर अपनी लिखित भावधारा के मूर्त रूप का रसास्वादन करता है और उसमें कहीं अर्थ का अनर्थ हो रहा हो तो सुधार भी करवा देता है। काशी में प्रसाद जी पूर्वाभ्यास के समय कलाकारों के मध्य बैठा करते थे। भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग के कलाकारों द्वारा मंचित उदयपुर में १२, १३, १४ जुलाई १९८८ को मंचित मेरे एक नाटक मेरा देश मेरे सपनेके पूर्वाभ्यास के दौरान मुझे भी उन कलाकारों के मध्य बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

समीक्षाएँ नाटक क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं – वे नाट्य जगत् की अथवा साहित्य के विविध विधाओं की प्रस्तुति का बोध कराती हैं जिससे कला का और विकास होता है और युग का बोध। प्रसाद युग में समीक्षात्मक माध्यम का पूर्ण अभाव प्रतीत होता है यही कारण है कि रंगमंच की दृष्टि से इस युग को मात्र एक कडी समझा गया है, यद्यपि समीक्षाओं का अपेक्षाकृत रूप तात्कालिक जागरण‘, ‘इन्दु‘, ‘सरस्वती‘, ‘माधुरी‘, ‘प्रभा‘, ‘आजआदि पत्र-पत्रिकाओं में द्रष्टव्य बतलाया गया है पर यह सब अप्राप्य होने के कारण ही इस युग के समीक्षात्मक रूप को उभारने में असमर्थता प्रतीत होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि समीक्षा का आदिकाल कुछ बिखरे-बिखरे सूत्रों में दिखाई देता है।

 

समीक्षा युग

 

प्रसादोत्तर युग में रंगमंचीय गतिविधियों की एक जबरदस्त हलचल दिखाई देने लगी। अनेक प्रकार के प्रयोग और परीक्षण यहीं से विकसित होने लगे। इस युग में अनेक कलाकारों एवं उनकी नाट्य प्रस्तुतियों की समीक्षात्मक चर्चा मिलती है। इस युग के लोक विख्यात पृथ्वीराज कपूर के लिए लिखा गया है कि इनके प्रस्तुत नाटकों के कथा शिल्प में एक स्वाभाविक विकासक्रम है। इनमें न अतिमानवीय तत्त्व है और न कोई कृत्रिम अप्राकृतिक नाटकीय चमत्कार। पृथ्वीराज कपूर के समय से ही प्रकाश उपकरणों का प्रयोग आरम्भ हो चुका था। इनके नाटकों में देशभक्ति एवं साम्प्रदायिक एकता की कलात्मक अभिव्यक्ति द्रष्टव्य है। नाटकों के कथोपकथन स्वाभाविक एवं व्यंग्यपूर्ण होने के कारण मर्म पर सीधी चोट करते हैं। इनके नाटकों द्वारा साम्प्रदायिक एकता का शंखनाद फूँका जाना आर्यावृत्त की बहुत बडी सेवा थी। श्री पृथ्वीराज कपूर द्वारा बार-बार ड्राप गिराकर ३०-३० या ४०-४० सीन दिखाने की परम्परा भी समाप्त कर दी गई। मंच सज्जा की ओर श्री पृथ्वीराज विशेष ध्यान रखते थे। उन्होंने बडे-बडे खम्भों, छत्रधारी सिंहासनों और चित्रांकित दीवारों तक को भव्य रूप में प्रस्तुत किया। उस समय के आलोचकों ने अभिनेता, निदेशक और व्यवस्थापक पृथ्वीराज कपूर के व्यक्तिगत प्रभाव तक की ओर भी दृष्टिपात किया। दरअसल इस युग का समीक्षक नाटक देखने वाले दर्शक, अभिनेता, वेषकार, रंगलेपन, ध्वनि, संगीत तथा प्रकाश प्रयोग आदि सभी पहलुओं की ओर बडे एकाग्रचित्त से ध्यान देकर उनकी अच्छाई-बुराई को कलमबद्ध करता है। इतना ही नहीं, समीक्षक स्वयं निदेशक और व्यवस्थापकों से व्यक्तिगत भेंटवार्ता कर अपनी शंकाओं का समाधान भी कर लेता है ताकि वह प्रस्तोताओं के उस संदेश का भी मूल्यांकन कर लेता है कि प्रस्तोता अमुक प्रस्तुति के द्वारा अपना संदेश पहुँचाने में कहाँ तक सफल हुआ है।

इस युग में नाट्य कला का सरकारी, गैर सरकारी स्तर पर नाट्य प्रशिक्षण भी आरम्भ हो गया जिससे सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान के साथ-साथ अच्छे दर्शक, परिष्कृत समीक्षक और नए-नए आयाम दिखाई देने लगे। इस चहुँमुखी प्रगति से हिन्दी रंग आन्दोलन ने नाटक जगत् में अपनी अभूतपूर्व सम्पदा से विशिष्ट ख्याति प्राप्त की। नाट्य समीक्षा के लिए यथोचित व्यवस्था भी धर्मयुग‘, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान तथा कई दैनिक पत्रों में पाई जाने लगी। यहाँ तक कि नियमित स्तम्भ आने लगे। इसलिए यदि इस काल को पूर्णरूपेण समीक्षा-युग के नाम से सम्बोधित किया जाय तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

 

समीक्षा युग की देन

 

इस युग के पत्र-पत्रिकाओं को श्रेय है कि जिनके सहयोग से समीक्षा ने अपना अलग स्थान बनाया है। बडी उपलब्धि यह हुई कि नाट्य जगत् के वैविध्य को इसने उभारा जिससे हिन्दी रंगमंच के विकसित परम्परा की अनेक विधाओं को अपनाया जाने लगा। एब्सर्ड नाटकों की प्रस्तुतियों ने कई लेखकों और प्रस्तोताओं को बहुत प्रभावित किया। मोहन राकेश के बीजऔर आधे अधूरेनाटक इसी परम्परा के द्योतक हैं। लेखन में नयापन होगा तो निःसंदेह समीक्षा भी अपना रूप बदलेगी।

नाट्य अध्येताओं, समीक्षकों और लेखकों ने सम्प्रति नाटकों की कथावस्तु को केवल मूडऔर तर्कका स्वरूप माना है। डॉ. लाल की भी यही मान्यता है। बिम्बवादी और अमूर्त कथा वस्तुपूर्ण नाटक भी मंच पर प्रस्तुत हुए हैं। राजनैतिक अव्यवस्था और अत्याचारों की कटु आलोचना भी आज के नाटक की विषय वस्तु है। मनोवैज्ञानिक कथावस्तु, प्रकृति प्रकोपयुक्त लघुकथानक भी इस युग की विशेष देन है। इस प्रकार इस युग ने पुरानी शैली को छोड सर्वथा नवीन शैली को जन्म दिया है।

 

 

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प्रत्याख्यान

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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वेब पत्र का उद्देश्य-

मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ, बिहार, झारखण्ड तथा उत्तरांचल की पी.एस.सी परीक्षा तथा संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के हिन्दी सहित्य के परीक्षार्थियो के लिये सहायक सामग्री उपलब्ध कराना।

यह वेब पत्र सिविल सेवा परीक्षा मे हिन्दी साहित्य विषय लेने वाले परीक्षार्थियो की सहायता का एक प्रयास है। इस वेब पत्र का उद्देश्य किसी भी प्रकार का व्यवसायिक लाभ कमाना नही है। इसमे विभिन्न लेखो का संकलन किया गया है। आप हिन्दी साहित्य से संबंधित उपयोगी सामगी या आलेख यूनिकोड लिपि या कॄतिदेव लिपि में भेज सकते है। हमारा पता है-

mitwa1980@gmail.com

- संपादक

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