हिन्दी साहित्य

 

महिला लेखन का शताब्दी वर्ष का १९०६-०७ से २००६-२००७
यह सच है कि स्त्री का आत्म संघर्ष रचना के संघर्ष पर विरत होता है। महिला साहित्यकार के लिए बाहरी संदर्भों में पहले उसका आंतरिक समय होता है। जहाँ वह जीती है और सांस लेती है। दूसरी ओर होती है समय की चुनौतियां। उनके जीवन व सृजन के बीच अनवरत युद्ध की स्थिति बनी रहती है। उनकी राह में व्यवधान है। विचारक विक्षेप, दुविधाऐं एवं द्वन्द्व हैं।
कितने कटघेरे हैं
है कितनी अदालतें
फिर भी अन्याय से
घिरी हैं हम !
कितने हैं ईश्वर-अल्लाह
हैं मूसा और गुरु
फिर भी कितना है
अधर्म!
देश में है पूरी आजादी
फिर भी
कितने खूंटों से
बंधी हैं हम!
(जेबा रशीद)
शिक्षित होने के साथ ही नारी ने जाना है वह नारी है और नारी होते हुए अपना समस्त स्त्रीत्व संजोकर उसे पुरुष के साथ खडे होने का अधिकार है। क्योंकि वह सक्षम है। नारी को पुरुष बनकर पुरुष के समकक्ष खडा नहीं होना है। बल्कि पूरक शक्ति के रूप में उभरना है।
महिलाओं में संवेदना का अतुलिय खजाना होता है। नारी अपनी अनुभूतियों और संवेदनाओं का कलम के माध्यम से जब पहले पहल १९०६-०७ में कागज की जमीन पर उकेरा तब उत्कृष्ट साहित्य सृजन कर सबको चकित कर दिया। पाठकों ने सराहना की तो साहित्य समीक्षक और लेखकों द्वारा नारी को साहित्यकारों की पंक्ति में बैठाना गवारा नहीं हुआ। महिला द्वारा हुई अभिव्यक्तियों को नकारने की कोशिश की गई। सामाजिक परम्पराओं को चुनौती देने की पथभ्रष्टता कहा गया किन्तु निडर महिला रचनाकारों ने अपनी साधना जारी रखी। १९०६-०७ के दौरान बंग महिला ने साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा और २००६-०७ तक सौ साल पूरे होने जा रहे है।
महिला लेखन की शुरुआत का श्रेय बंग महिला को जाता है। आज साहित्य की विभिन्न विधाओं में महिलाओं से कोई क्षेत्र अछूता नहीं रहा !
स्त्री लेखन का मुद्दा तो एक रणक्षेत्र है। पर लेखन के क्षेत्र में केवल औरत पूरी समाज व्यवस्था है। महिलाओं की संवेदनशीलता अन्तर्दृष्टि सबसे बढकर पीडा जो सदियों से उनके खाते में संचित होती आई है। रचनात्मक साहित्य सृजन में विशेष रूप से महिलाओं की भागीदारी में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
जब स्त्री लिखती है तो एक जिम्मेदारी उठा रही है। मैं सोचती हूँ कि चाहे अनुभूति कितनी ही तीव्र व संवेदना कितनी ही संघन और तरल क्यों न हो भोक्ता और दृष्टा की संवेदना में अन्तर होता ही है। पुरुष वर्चस्व के चलते साहित्य क्षेत्र में महिला लेखन पर यह व्यंग्य आरोपित हुआ कि ‘महिला लेखन इसलिए छप रहा है कि वे महिला है।’ और ऐसा सोचना…यह आक्षेप पुरुष विकृत मानसिकता एवं हीनता का शिकार होने की पराकाष्ठा है।
एक साहित्यिक अत्याचार यह भी है कि महिला लेखन नारी हित तक ही सीमित है। यह दूसरा आक्षेप है। समाज में व्याप्त जटिलताओं और संघर्ष से अलग घर की चार दीवारी में सिमटा घरेलू लेखन है। इस तरह महिला सृजन को कटघेरे में खडा करना उचित नहीं। समस्यायें तो शोषित की ही होती हैं।
किसी रचना को जन्म देते समय अपने एकान्तिक क्षणों में लेखक में वर्गीकृत करना न्याय संगत कदापि नहीं। रचनाकार केवल रचनाकार होता है। महिला सृजन नई दृष्टि से स्वयं को और समाज को पहचानने की एक ईमानदार चेतना से जुडा है।
महिला लेखन पुरुष लेखन वर्गीकरण मुझे नहीं जंचता ! लेखन अतः लेखन होता है चाहे स्त्री करे या पुरुष!
लेखन-लेखन होता है इसमें भेद क्यों’ स्त्री पुरुष के बीच की वर्जनाओं की बाड टूट चुकी है। एक दूसरे को समझने के पर्याप्त अवसर हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों में दोनों की भागीदारी है। अतः लेखन में स्त्री पुरुष भेद अप्रासंगिक हो चुका है। अब तो परिवेश की चुनौतियों को चित्रित करने वाला साहित्य ही चिर स्थायी होता है।
वैयक्तिक स्वतन्त्रता के नाम पर स्त्री को हर कहीं बेवकूफ बनाया जा रहा है। कहीं उसका मातृत्व छिना जाता है तो कहीं बालिका भ्रूण हत्या कर दी जाती है। तलाक या पुनः विवाह पर स्त्री शोषण!
इन्हीं अनुभवगत दौर पर चलती लेखनी जब प्रकाशन मार्ग ढूंढती है तो सम्पादकों द्वारा स्त्री लेखन ‘चूल्हे चौका’ का लेखन कह खेद सहित लौटा दिया जाता है।
महिला रचनाकारों ने देश धर्म की तर्ज पर रचनाऐं की तो गाज उसी पर ही गिरी। लेकिन लेखिकाओं ने हार नहीं मानी। जब से महिला ने हाथ में कलम थामी तो सामाजिक सरोकारों पर कलात्मकता और ईमानदारी के साथ निडर महिला रचनाकारों के प्रयास से परिवर्तन आया। उनके लिए अब महिला रूपक न लिंग है न आधी दुनिया। वह समाज है। एक सतत् परिवर्तनशील समाज!
लेखन एक बडा अनुशासन है। महिला लेखन को छोटे खाने में कैद नहीं किया जा सकता। महिला रचनाकारों ने साहित्य के माध्यम से जन जागरण का अलख जगाया और कामयाबी से बढ रही है।
स्वतन्त्रता के नाम पर परिवार तोडने नहीं जोडने हैं। पुरुष में केवल कारमित्री शक्ति है और महिला में कारमित्री एवं भावमित्री शक्ति का मंजुल समन्वय है। ज्ञान का भाव संवेदना और शालीनता का अधिष्ठान है। इसलिए महिलाओं को परिवेश की चुनौतियों का सामना करने में कठिनाइयां होते हुए भी सफलता पाती हैं।
हमारी शताब्दी की बुनियादी समस्याऐं जख्म और उपलब्धियां जिन्होंने समूचे विश्व के रचनाकारों को आंदोलित किया है उसमें महिला लेखन की उपलब्धियों का मूल्यांकन किया जाए। आज महिला लेखन का स्वरूप बदल गया है। हम बोलने का, कुछ करने का अधिकार मांगती हैं। जो साहित्यकार हैं वो महिला मांगती हैं पुनः परिभाषित करने का अधिकार। जो भी हमें परिभाषाऐं थमाई गई हैं उन्हें दूबारा परिभाषित करने का अधिकार चाहती हैं।
काल के शिलाखण्डों को तोडती सजग रचना धर्मिता के निरन्तरता बोध ने लेखिकाओं को सदैव सामाजिक सरोकारों से जोडे रखा है। समाज हमारी धारणाओं की रंग भूमि है। उनका सृजन संसार भी समाज को प्रतिबद्ध है। लेखिकाओं का साहित्य अंतरंग परिवेश का उद्घाटन अश्रुविगलत दीन पुकार में नहीं वरन एक वस्तु प्रयोजनवाली लोक कल्याणकारी चेतना में अलग-अलग भंगिमाओं में अभिव्यक्ति पा गई है जिसे सामाजिक सरोकारों के विभिन्न स्तरों पर केन्द्रित किया है।
शताब्दी के सभी प्रसंग, संदर्भ एवं संकट यही वे मूल मुद्दे रहे हैं जिन्होंने महिला लेखन को प्रभावित किया है। आंदोलनों और कोलाहल के युग में साहित्य की शांत मौन साधिकाऐं बिना कोई आन्दोलन मुद्रा अपनाए पीडत शोषित की व्यथा को अपने संवेदनशील तरल अभिव्यक्ति देने वाली रचनाओं में सृजनरत है।
महिला लेखन की सबसे बडी सीमा यह भी है कि वे आज भी पुरुष सत्तात्मक समाज में बेबाक अभिव्यक्ति का साहस नहीं जुटा पाती। उनका दबा स्वर रुढयों की चादर ओढे हुए है। आज शीर्षस्थ पत्रिकाओं में खुलेपन, बोल्डनेस के नाम पर कुंठित इच्छाओं का अतिरेक है। वे भाषा के नाम पर तमाम गालियां जिन्हें भले लोग सुनना या पढना नहीं चाहते। वे स्वयं भी जानते हैं कि ये साहित्य को विकृत कर रहे हैं। फिर भी पत्रिकाओं के पृष्ठों में स्थान मिलता रहे इसलिए ऐसा लिखते हैं। अश्लीनता की सीमा पार करना नाम और पैसा कमाने के लिए ऐसा कहाँ तक उचित है !
दबा स्वर यह भी उभरता रहा है कि स्थापित लेखक अपनी आत्ममुग्धा और अपनी सिद्धहस्ता के पूर्वाग्रह एवं खेमेबाजी के चलते महिलाओं के श्रेष्ठ लेखन को खारिज करा अपनी स्तरहीन रचनाओं को स्थापित करा लेते हैं।
साहित्य के इस मोड पर महिला साहित्यकारों के लिए चुनौती है वे स्वतन्त्रचेता संस्कारित हैं। उनके लेखन में कोई पहलू नहीं घूटा है किन्तु भाषा शिल्प का झीना अवगुंठन मौजूद रहता है जो रचना के सौन्दर्य की वृद्धि करता है। महत्वपूर्ण रचनाऐं आंकलन से बाहर कर दी जाती है। चंद अपवादों को छोडकर महिलाओं को दोयम दर्जे की समझने की प्रवृत्ति भी घातक है।
एक लेखिका पहले मां होती है फिर पत्नी और तीसरे स्थान पर उसका रचनाकार होता है। महिला लेखन की एक और सीमा है कि प्रायः घर और नौकरी के पश्चात शेष बचे समय की ‘पार्ट टाइम’ लेखिका होती है।
ओढी हुई जिम्मेदारियों के चलते उसे लिखने पढने के अवसर एवं समय कम मिलता है ! फिर भी ज्ञान व सोच और अनुभूति के आधार में तपकर जीवंत रचनाऐं सामने ला रही हैं। क्योंकि महिला लेखन में जीवननुभव और व्यापक दृष्टि है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
आम भारतीय नारी के विषम जीवन को कठिनतर बनाती ये चुनौतियां अन्य कार्य क्षेत्रों में सक्रिय जागरूक महिलाओं की तुलना में सृजनात्मक लेखन को समर्पित लेखिकाओं की चुनौतियां अधिक हैं!
इतने लम्बे समय बाद भी आज साहित्य की मर्यादा, अनुशासन और गरिमा के बोध के स्थान पर सतही लेखन और समझौतावादी मनोवृत्ति व अन्याय के खिलाफ कितने हाथ उठते हैं। दूसरी और श्रेष्ठ और उत्कृष्ट लेखनकर्म में लगी लेखिकाओं को कहीं निर्वासन की पीडा भी झेलनी पडी। कई लेखिकाओं का सार्थक और श्रेष्ठ लेखन प्रकाशन की दहलीज पर पडा है।
वस्तुतः १९९० के बाद सामान्तया महिला लेखन में समग्रतः जो क्रान्ति जागृति और जुझारुपन आया है जो गुणात्मक और संख्यात्मक अभिवृद्धि हुई है वह निश्चित ही सुखद संकेत है।
लोभ और हाशिये पर ठहरी हुई जिंदगी के गूंगे दर्द की गठरी लादे अन्दर की पसरी स्याही के बावजूद भी अदम्ब आस्था सुनहरी सुबह के लिए उजालों के चिन्ह की संकल्प दोहराती है!
जीवन मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों और पुरानी आस्थाओं को आत्मसात करने वाली महिला रचनाकारों का कहना है कि समकालीन लेखिकाओं ने अपने परिवेश और समस्याओं से आँख मिलाकर उनके भीतर तक झांका है। अपने सामाजिक दायित्व बोध को विस्तृत आयामों का स्पर्श कर सम सामयिकता के प्रति सजग रही है।
महिला रचनाकर्मियों ने तल में जाकर छानबीन की है उनको संघन जटिलताओं के प्रति अपने नुकीले आक्रोश को भी प्रतीकों में व्यक्त किया है।
लेखिकाओं ने रुमानी चेतना स्वकिय सम्बोधित होते हुए भी उसमें युग परिवर्तन की संकल्पना का संदेश है अपनी निष्ठा में आश्वस्त उनका रचना संसार अपनी निज की मौलिक बुनावट से अपनी जमीन स्वयं बनाई है! अपनी क्षमताओं का परिचय देती आई है। अनुभूतियों की तपिश ने उन्हें अभिव्यक्ति के क्षण दिए हैं। उनके चिन्तन को एक नया आकाश दिया है। नई सोच की जमीन दी है। अधूरे बिम्बों की कलात्मक संयोजना ने भाव और भाषा के नये क्षितिज तलाश किए है।
नारी साहित्य लेखन एक और स्वातः सुखाय है तो दूसरी ओर जन हिताय है नारी साहित्य इस परिवर्तन युग का शुभचिंतक है।
यद्यपि महिला लेखन आज स्पर्धा के युग में चुनौती है। फिर भी उसे हर स्थिति का सामना करने में उसे किसी वैसाखी की जरूरत नहीं। अपितु वह स्वयं मार्ग ढूंढ स्वयं अपने हस्ताक्षर बना रही है।
अत्यंत सयंत व शालीन बने रहकर सृजन करना भी एक चुनौती है। महिला रचनाकार ऐसा करती आ रही हैं। निर्भयतापूर्वक सोचना और लिखना होगा आज की यह जरूरत है।
हम चुनौतियों में तब ही सफल हो सकती हैं जब हम अपने सामाजिक सरोकार के हिसाब से किसी न किसी रूप में एक्टिविस्ट हो साथ में घर गृहस्थी भी सफलता से निभाएं! सृजन की शक्ति उसके पास है जो उसके लेखकीय सरोकार को नवीन अभिव्यक्ति की क्षमता देती आई है और देती रहेगी।
इतना ही कहूँगी कि नारी धीरे-धीरे आत्मबोध अनुप्राषित हुई है। फिर भी वह अपने ढंग से प्रतिष्ठित होने के लिए संघर्षशील रही है। इसलिए विरोध-अवरोध तिरस्कार-बहिष्कार को नकारते हुए उसे आगे आना होगा। तब ही समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है और अपनी सार्थकता को सिद्ध भी।
हमें ठोस चिन्तन का प्रमाण देना है व इस दंभ से बचना होगा कि चूंकि स्त्री है अतः स्त्री समस्याओं या भावनाओं को वही बेहतर समझ सकती है। वह सृजन के क्षेत्र में पैर रख रही है न कि किसी रणक्षेत्र में। नारी मुक्ति का संघर्ष लम्बा है और इसे मुख्यतः स्वयं नारी को लडना है। लेकिन यह लडाई पुरुष वर्ग के विरुद्ध न होकर व्यवस्था के अन्तर्विरोधों व पुरुष प्रधान समाज से निथरे नारी विरोधी अवमूल्यों के प्रति होनी चाहिए! समाज व अपनी संस्कृति से जुडी वर्तमान परिवेश की चुनौतियां स्वीकार करके ही महिला सृजन सफल हो रहा है और होगा!
समसामयिक काल में नारी समता की एक नई चेतना भारतीय समाज में व्याप्त हुई हैं! बहुत प्रसन्नता की बात है कि स्त्री लेखन की चर्चा अब हर जगह होने लगी है। यह निश्चय ही महिला रचनाकारों के बढते महत्त्व को रेखांकित करता है।
महिला लेखन का अर्न्तद्वन्द्व अभी जारी है…
सदियों से जिस झाड-झंखाड भरे कंटीले, उबड-खाबड रास्ते पर वह दौडती चल रही है, वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। मंजिल अभी बहुत दूर है।

साभार- जेबा रशीद

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1 Response to "महिला लेखन"

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