हिन्दी साहित्य

:: चितावणी ::
कबीर नौबति आपनी, दिन दस लेहु बजाइ।
ए पुर पद्दन ए गली, बहुरि न देखहु आइ।।९९।।
कबीर कहते हैं कि हे जीवों ! चेत जाओ। जिस वैभव में तुम लिप्त हो, वह कुछ दिनों का परचम है अर्थात् क्षणिक है। तुम्हारी मृत्यु अवश्यंभावी है। फिर इस पुर, नगर और गली को न देख सकोगे।
 
जिनके नौबति बाजती, मैंगल बँधते बारि ।
एकै हरि के नाँव बिन, गए जनम सब हारि ।।१००।।
 
जिनके द्वार पर वैभव-सूचक नगाड़े बजते थे और मतवाले हाथी झूमते थे, उनका जीवन भी प्रभु के नाम-स्मरण के अभाव में सर्वथा व्यर्थ ही हो गया।
 
ढोल दमामा डुगडुगी, सहनाई औ भेरि ।
औसर चले बजाइ करि, है कोइ लावै फेरि।।१०१।।
 
इस जीवन में वैभव प्रदर्शन हेतु बाजे जैसे ढोल, धौंसा, डुगडुगी, शहनाई और भेरी विशेष अवसरों पर बजाए जाते हैं। परन्तु जीवन इतना क्षण-भंगूर है कि जो अवसर बीत गया, उसे पुन: वापस नहीं लाया जा सकता है।
 
सातौ सबद जु बाजते, घरि घरि होते राग ।
ते मंदिर खाली पड़े, बैठन लागे काग ।।१०२।।
 
जिन मंदिरों और प्रासादों में सातों स्वर के बाजे बजते थे और विभिन्न प्रकार के राग गाए जाते थे, वे आज खाली पड़े हुए हैं और उन पर कौए बैठते हैं। सांसारिक वैभव की यही क्षणभंगुरता है।
 
कबीर थोड़ा जीवना, माड़ै बहुत मँडान ।
सबही ऊभा मेल्हि गया, राव रंक सुलतान ।।१०३।।
 
कबीर कहते हैं कि क्षणिक जीवन के लिए मनुष्य बड़े-बड़े आयोजन करता है, किन्तु चाहे वह बहुत बड़ा राजा या सुलतान हो या साधारण, दरिद्र मनुष्य, सभी की बड़े उत्साह से निर्मित योजनाएँ ध्वस्त हो जाती है। अर्थात् राजा-रंक भी जाते हैं और उनकी योनजाएँ भी ध्वस्त हो जाती हैं।
 
इक दिन ऐसा होइगा, सब सौ परै बिछोह ।
राजा राना छत्रपति, सावधान किन होइ ।।१०४।।
 
कबीर चेतावनी देते हैं कि चाहे कोई राजा, राणा या छत्रपति हो, सबके लिए एक ऐसा दिन आएगा, जब उसे संसार से सब कुछ त्यागकर इस लोक से जाना होगा। इसलिए हे मनुष्यों ! समय रहते ही सावधान क्यों नहीं हो जाते ?
 
कबीर पट्टन कारिवाँ, पंच चोर दस द्वार ।
जम राना गढ़ भेलिसी, सुमिरि लेहु करतार।।१०५।।
 
कबीर कहते हैं कि जीव (सौदागर) इस शरीर रूपी नगर को एक सुरक्षित स्थान समझकर सारा सांसारिक व्यवहार अर्थात् व्यापार टिका हुआ है। किन्तु उसे यह ज्ञात नहीं कि इस शरीर रूपी नगर में पाँच चोर (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह) विद्यामन हैं और इसमें दस द्वार भी हैं। यह वैसा सुरक्षित और अभेद्य दुर्ग नहीं है, जैसा कि अज्ञानी जीवों ने समझ रखा है। इस दुर्ग पर यमराज का आक्रमण भी होगा और वह क्षणभर में इस गढ़ कोध्वस्त कर देगा। इसलिए हे जीवों ! स्रष्टा का स्मरणकर लो।
 
कबीर कहा गरबियो, इस जोवन की आस ।
केसू फूले दिवस दोइ, खंखर भये पलास ।।१०६।।
 
कबीर कहते हैं कि यौवन पर गर्व करना व्यर्थ है। यह क्षणभंगुर है। पलाश के फूल के समान इसकी बहार थोड़े दिनों के लिए है। जैसे यह फूल थोड़े ही दिनों में मुर्झा कर गिर जाता है, वैसे ही जवानी की प्रफुल्लता भी अल्प दिनों की होती है। कुछ दिनों के पश्चात जैसे पलाश पत्र-पुष्प-विहीन होकर ठूँठमात्र रह जाता है, वैसे ही यह शरीर भी यौवन-विहीन होकर कंकालमात्र रह जाता है।
 
कबीर कहा गरबियो, देही देखि सुरंग ।
बीछड़ियाँ मिलिबो नहीं, ज्यों काँचली भुवंग ।।१०७।।
 
कबीर कहते हैं कि इस सुन्दर शरीर को देखकर क्यों गर्व करते हो? मृत्यु होने पर यह शरीर जीव को वैसे ही फिर नहीं मिल सकता, जैसे सर्प केंचुल को त्याग देने पर पुन: उसे धारण नहीं कर सकता।
 
कबीर कहा गरबियो, ऊँचे देखि अवास ।
काल्हि परौ भुई लोटना, ऊपरि जमिहै घास ।।१०८।।
 
कबीरदास कहते हैं कि ऊँचे-ऊँचे महलों को देखकर क्यों गर्व करते हो? शीघ्र ही निधन होने पर जमीन के अन्दर लेटना होगा अर्थात् दफना दिए जाओगे और ऊपर घास जम जाएगी।
 
कबीर कहा गरबियो, चाँम पलेटे हाड़ ।
हैबर ऊपरि छत्र सिरि, ते भी देबा गाड़ ।।१०९।।
 
कबीरदास कहते हैं कि चमड़े से लपेटी हुई हड्डियों पर क्यों गर्व करते हो ? जो लोग श्रेष्ठ घोड़ों पर चढ़ते हैं और जिनके सिरों पर छत्र लगते हैं, वे भी एक दिन मिट्टी में दफना दिए जाते हैं।
 
कबीर कहा गरबियो, काल कर केस ।
नाँ जानौं कहँ मारिहै, कै घर कै परदेस ।।११०।।
 
कबीरदास कहते हैं कि काल ने अपने हाथों से तुम्हारे केश को पकड़ रखा है। इसलिए तुम व्यर्थ में क्यों गर्व करते हो? घर हो या परदेश, वह तुम्हें कहाँ मार डालेगा यह तु भी नहीं जानते हो।
 
 
 
ऐसा यहु संसार है, जैसा सैंबल फूल ।
दिन दस के व्यौहार में, झूठै रंगि न भूल ।।१११।।
 
यह संसार सेमर के फूल के समान है, जो ऊपर से देखने में सुन्दर और मोहक प्रतीत होता है, किन्तु उसके भीतर कोई तत्त्व नहीं होता। अल्पकाल के जीवन और उसकी विरंगात्मक भुलावे में नहीं आना चाहिए।
 
जीवन मरन बिचारि करि, कूरे काँम निवारि ।
जिहिं पंथा तोहि चालनां, सोई पंथ सँवारि ।।११२।।
 
कबीरदास कहते हैं कि जीवन-मरण का विचार कर अर्थात् यह समझ ले कि जीवन थोड़े दिन का है, अन्तत: मरना है। इसलिए अक्षम्य कर्मों का परित्याग कर और जिस भक्ति मार्ग पर तुझे चलना है, उसे अभी से सुधार ले।
 
राखनहारे बाहिरा, चिड़ियौं खाया खेत ।
आधा परधा ऊबरै, चेति सकै तौ चेति ।।११३।।
 
तेरे आध्यात्मिक जीवन-क्षेत्र का रक्षक बाहर ही बाहर है अर्थात् तुझे कोई सद्गुरु नहीं मिला और ऊपर से विषय-वासना रूपी पक्षी तेरे खेत को खाए जा रहे हैं। तू अब भी चेत जा और थोड़ा-बहुत जो बचा सके, उसे बचा ले अर्थात् अब भी आध्यात्मिक जीवन को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित कर ले।
 
हाड़ जरै ज्यौं लाकड़ी, केस जरैं ज्यों घास ।
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास ।।११४।।
 
मृत्यु के उपरान्त हड्डियाँ लकड़ी के समान जलती हैं और केश घास के समान। सारे शरीर को जलता देखकर कबीर को संसार से विराग हो गया।
 
कबीर मंदिर ढहि पड़ी, इंर्ट भई सैवार ।
कोई चेजारा चिनि गया, मिला न दूजी बार ।।११५।।
 
कबीर कहते हैं कि अद्भुत स्रष्टा ने इस सुन्दर शरीर (मंदिर) को बनाया है, किन्तु एक दिन वह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है और उसकी हड्डियों पर, जहाँ वह दफनाया जाता है,घास-फूस जम जाती है। उसका निर्माता उसी शरीर (मंदिर) को फिर बनाने के लिए नहीं मिलता।
 
 
कबीर देवल ढहि पड़ा, इंर्ट भई संवार ।
करि चिजारा सौं प्रीतिड़ी, ज्यँ ढहै न दूजी बार ।।११६।।
 
कबीर कहते हैं कि यह शरीर रूपी देवालय ध्वस्त हो गया और इसकी इंर्टों पर घास-फूस जम गई अर्थात् शरीर का मांस और हड्डियाँ जो दफनाई गई थीं, उन पर अब घास-फूस दिखलाई देती है। हे जीव! तू इसके निर्माता प्रभु से प्रेम कर, जिससे दूसरी बार इस देवालय के ढहने का अवसर ही न आए।
 
कबीर मंदिर लाख का, जड़िया हीरै लालि ।
दिवस चारि पा पेखनाँ, बिनसि जाइगा काल्हि ।।११७।।
 
कबीर कहते हैं कि यह शरीर लाक्षागृह के समान है, जो हीरे-लाल से जड़ा गया है अर्थात् बहुमूल्य बनाया गया है। किन्तु यह चार दिन का दिखावा है और अल्पकाल में ही विनष्ट हो जायगा।
 
कबीर धूलि सकेलि करि, पुड़ी ज बाँधी एह ।
दिवस चारि का पेखनाँ, अंति खेह की खेह ।।११८।।
 
कबीर कहते हैं कि यह शरीर ऐसा है जैसे किसी ने धूल एकत्र कर कोई पिंड या पुड़िया बाँधकर रख दिया हो। यह तो अल्पकाल का दिखावा है। जिस मिट्टी से यह बना है, अन्तत: उसी मिट्टी में मिल जाता है।
 
कबीर जे धंधै तो धूलि, बिन धंधै धूलै नहीं ।
ते नर बिनठे मूलि, जिनि धंधै मैं ध्याया नहीं ।।११९।।
 
 
कबीर कहते हैं कि कर्मों से भागने से काम नहीं चलेगा। यदि कर्म को करते रहोगे तो तुम्हारा अन्त:करण धुल जाएगा। तुम स्वच्छ हो जाओगे। बिना कर्म किये स्वच्छता नहीं आती। कर्म से कोई नष्ट नहीं होता। वही व्यक्ति मूलत: नष्ट हो जाते हैं जो कर्म में ईश्वर का ध्यान नहीं रखते।
 
कबीर सुपनै रैनि कै, ऊघड़ि आए नैन ।
जीव परा बहु लूट में, जागै लेन न देन ।।१२०।।
 
कबीर कहते हैं कि जीवन अज्ञान रूपी रात्रि का स्वप्न है। उसमें जीव नाना प्रकार के सुख-दु:ख, लाभ-हानि का अनुभव करता है। परन्तु वे सब अनुभव स्वप्न के समान हैं। ज्ञान-चक्षु खुल जाने पर जीव को यह विश्वास हो जाता है कि अज्ञान रूपी निद्रा में पड़े हुए लाभ-हानि का जीवन स्वप्नवत् व्यर्थ है।
 
 
कबीर सुपनैं रैनि कै, पारस जीय मैं छेक ।
जे सोऊँ तौ दोइ जनाँ, जे जागूँ तौ एक ।।१२१।।
 
कबीर कहते हैं कि अज्ञान की रात्रि में जब जीव स्वप्न देखता है तो ब्रह्म और जीव में सर्वाथा पृथक प्रतीत होता है। वह जब तक इस अज्ञान-निद्रा में रहता है, तब तक आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग जान पड़ते हैं। जब वह अज्ञान-निद्रा से जगता है, तब उसे दोनों एक ही प्रतीत होते हैं।
 
कबीर इस संसार में, घने मनुष मतिहीन ।
राम नाम जानै नहीं, आये टापा दीन ।।१२२।।
 
कबीर कहते हैं कि इस संसार में अधिकतर मनुष्य सर्वथा बद्धिमान होते हुए भी वे अपनी आँखों पर अज्ञान की पट्टी बाँधे रहते हैं। इसीलिए वे राम नाम के मर्म को नहीं जानते।
 
कहा कियो हम आइ करि, कहा कहैंगे जाइ ।
इतके भये न उत के, चाले मूल गँवाइ ।।१२३।।
 
जीव को स्वयं पर पछतावा हो रहा है कि इस संसार में आकर हमने क्या किया, इस विषय में यहाँ से जाने के बाद प्रभु के सामने हम क्या कहेंगे ? हम न तो इस लोक के हुए, न परलोक के। हमने अपना नैसर्गिंक सरलता भी गँवा दिया।
 
आया अनआया भया, जे बहु राता संसार ।
पड़ा भुलावा गाफिलाँ, गये कुबुद्धी हारि ।।१२४।।
 
जीव संसार के विषयों में इतना अनुरक्त हो जाता है कि उसका संसार में आना न आने के बराबर है अर्थात् संसार में जन्म लेकर उसे जो सीखना था, उसे वह न सीख सका। इसलिए उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। भुलावे में पड़कर वह गाफिल हो गया। सांसारिक विषयों के मायाजाल में वह अपनी नैसर्गिक आत्मीय चेतना खो बैठता है और अपनी कुबुद्धि के कारण जीवन की बाजी हार जाता है।
 
कबीर हरि की भगति बिन, ध्रिग जीवन संसार ।
धूँवाँ केरा धौलहर, जातन लागै बार ।।१२५।।
 
कबीर कहते हैं कि ऐसे जीवन को धिक्कार है जो मानव जीवन पाकर भी प्रभु की भक्ति नहीं करता। जैसे धुएँ का महल देखने में तो बहुत प्रिय लगता है, किन्तु वह सर्वथा निस्सार होता है, वैसे ही मानव-जीवन चाहे और सब बातों में कितना सुन्दर क्यों न हो, किन्तु प्रभु-भक्ति के बिना सर्वथा सारहीन हैं।
 
 
जिहि हरि की चोरी करी, गये राम गुन भूमि ।
ते बिधना बागुल रचे, रहे अरध मुखि झूलि ।।१२६।।
 
जो प्रभु के भजन से जी चुराते हैं और राम के गुणों को भूल जाते हैं, उन्हें ब्रह्मा ने बगुले के रूप में बनाया है जो कि मछली की खोज में नीचे सिर लटकाये रहते हैं।
 
माटी मलनि कुँभार की, घनी सहै सिरि लात ।
इहि औसरि चेत्या नहीं, चूका अबकी घात ।।१२७।।
 
जिस प्रकार मिट्टी को आकार ग्रहण में कुम्हार द्वारा रौंदने की क्रिया में अनेक लातें सहनी पड़ती हैं, उसी प्रकार जीव को संसार में रूप ग्रहण करने में काल और कर्मों की अनेक यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। मानव-जीवन ही एक ऐसा अवसर है जब वह अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। यदि वह इस अवसर में नहीं चेतता तो अपना दाँव हमेशा के लिए चूक जाता है और मुक्ति की प्राप्ति कठिन हो जाती है।
 
इहि औसरि चेत्या नहीं, पसु ज्यों पाली देह ।
राम नाम जाना नहीं, अंत परी मुख खेह ।।१२८।।
 
इस मानव-जीवन रूपी सुन्दर अवसर को पाकर भी यदि तूने परमार्थ के विषय में नहीं सोचा और पशुआें के समान केवल देह को पालने में लगा रहा और राम-नाम के महत्व को नहीं पहचाना तो अन्त में तुझे नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाना होगा।
 
राम नाम जाना नहीं, लागी मोटी खोरि ।
काया हांडी काठ की, ना ऊँ चढ़ै बहोरि ।।१२९।।
 
मानव शरीर पाकर यदि राम-नाम के महत्त्व को नहीं समझा तो यह जीवन ही दोषपूर्ण हो जायेगा। यह शरीर काठ की हाँड़ी के समान है जो कि आग पर सिर्फ एक बार ही चढ़ सकती है। अर्थात् एक बार प्राण निकल जाने पर पुन: जीवन का संचार नहीं हो सकता। साधना के लिए फिर शरीर न मिलेगा, इसलिए हे जीव ! इसी जीवन में शरीर रहते ही साधना में प्रवृत्त हो जा।
 
राम नाम जाना नहीं, बात बिनंठी मूलि ।
हरत इहाँ ही हारिया, परति पड़ी मुखि धूलि ।।१३०।।
 
हे जीव! तूने राम नाम के यश को नहीं जाना तो फिर प्रारम्भ में ही बात बिगड़ गयी। तू इस संसार में धन, यश, कामिनी, कंचन, कादम्बिनी आदि का हरण करता रहा। परन्तु इस हरण करने में तू अपने को ही खो बैठा। तेरा मानव जीवन ही व्यर्थ हो गया और अन्तत: तेरे मुख में धूल की पर्तें जमा हो गइंर् अर्थात् तू मिट्टी में मिल गया।
 
राम नाम जाना नहीं, पाल्यो कटक कुटुम्ब ।
धंधा ही में मरि गया, बाहर हुई न बंब ।।१३१।।
 
हे जीव! तूने राम नाम के महत्व को नहीं जाना और अपना सारा जीवन एक सेना के समान बड़े कुटुम्ब के पालने में ही व्यतीत कर दिया। सांसारिक कृत्यों में ही विनष्ट हो गया और तेरा यशोगान, तेरी कीर्ति प्रकाशित न हो सकी।
 
मानुष जनम दुलभ है, होइ न बारंबार ।
पाका फल जो गिरि परा, बहुरि न लागै डार ।।१३२।।
 
यह मानव जन्म अति दुर्लभ है। मानव शरीर बार-बार नहीं मिलता। एक बार जब फल वृक्ष से गिर पड़ता है, तब वह फल शाखा से पुन: नहीं जुड़ सकता, वैसे ही एक बार मानव शरीर के क्षीण हो जाने पर वह पुन: नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिए इस अवसर को न चूक। इस शरीर के रहते हुए प्रभु-साधना में लग जा।
 
कबीर हरि की भगति करि, तजि बिषिया रस चौज ।
बार बार नहिं पाइए, मनिषा जन्म की मौज ।।१३३।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! मानव जन्म का उल्लासपूर्ण शुभ अवसर बार-बार नहीं मिलता। इसलिए इस जन्म को पाकर विषय-रस के चमत्कार और आस्वाद को छोड़कर तू प्रभू की भक्ति करता रह।
 
कबीर यहु तन जात है, सकै तो ठौर लगाय ।
कै सेवा करि साधु की, कै गोविंद गुन गाय ।।१३४।।
 
कबीर कहते हैं कि यह मानव शरीर नश्वर है। इसलिए हे जीव! इसके रहते हुए तू इसका सदुपयोग कर ले। तू या तो सन्तों की सेवा कर अथवा गोविन्द के गुणगान से अपने जीवन को सार्थक बना।
 
कबीर यहु तन जात है, सकै तो लेहु बहोरि ।
नांगे हाथौं ते गए, जिनके लाख करोरि ।।१३५।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! यह तेरा मानव शरीर व्यर्थ में नष्ट हो रहा है। यह आकर्षक विषयों, सम्पत्ति के संग्रह आदि में विनष्ट हो रहा है। हो सके तो इसको इन क्षणिक सुखों और प्रलोभनों से बचा ले, क्योंकि सम्पत्ति-संग्रह से कोई लाभ न होगा। जिन्होंने लाखों-करोडों कमाया, वे भी इस संसार से खाली हाथ चले गये।
 
यह तन काचा कुंभ है, चोट चहूँ दिसि खाइ ।
एक राम के नाँव बिन, जिद तदि परलै जाइ ।।१३६।।
 
यह शरीर कच्चे घड़े के समान है। जिस प्रकार कच्चे घड़े को कुम्भकार के अनेक थपेड़े सहन करना पड़ता है, उसी प्रकार मनुष्य को जीवन में अनेक यातनाआें को सहन करना पड़ता है। उसे किसी ओर भी शान्ति के लिए सहारा नहीं मिलता। इसलिए हे जीव! तू राम नाम में अपना ध्यान लगा, क्योंकि तेरे जीवन का कोई ठिकाना नहीं है, वह चाहे जब विनष्ट हो सकता है।
 
यह तन काचा कुंभ है, लियाँ फिरै था साथि ।
ठपका लागा फुटि गया, कछू न आया हाथि ।।१३७।।
 
यह शरीर, जिसे तू बड़े गर्व के साथ लिये घूम रहा है, कच्चे घड़े के समान है, जो जरा-सा धक्का लगने से फूट जाता है और फिर कुछ भी हाथ नहीं आता। तेरा शरीर भी वैसा ही नश्वर है। इसका कोई ठिकाना नहीं।
 
काँची कारी जिनि करै, दिन दिन बधै बियाधि ।
राम कबीरै रुचि भई, याही ओषदि साधि ।।१३८।।
 
हे जीव ! तू टालमटोल की प्रवृत्ति का परित्याग कर। तेरी भव-व्याधि दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कबीर को राम के प्रति अनुराग हो गया है, जिससे यह उसे तंग नहीं कर पाती। हे जीव! तू भी इसी औषधि का अपने बचाव के लिए प्रयोग कर।
 
कबीर अपने जीव तैं, ए दोइ बातैं धोइ ।
लोभ बड़ाई कारनैं, अछता मूल न खोइ ।।१३९।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! अपने मन से तुम दो बातों को निकाल फेंको-एक तो लोग, दूसरे आत्म-प्रशंसा की तृष्णा। इन दोनों दोषों के कारण अपने पास विद्यमान आत्मा रूपी पूँजी को मत खोओ।
 
खंभा एक गयंद दोइ, क्यों करि बंधसि बारि ।
मानि करै तौ पिउ नहीं, पीव तौ मानि निवारि ।।१४०।।
 
हे जीव! खम्भा रूपी शरीर एक ही है और अहंभाव और प्रेम रूपी हाथी दो हैं। दोनों को तुम एक साथ कैसे बाँध सकेगा? यह कैसे सम्भव है? यदि तू अहंभाव में रहता है तो उसके साथ प्रिय नहीं रह सकते। यदि तू प्रिय अर्थात् प्रभु को रखना चाहता है तो मान को निकालना पड़ेगा।
 
दीन गँवाया दुनी सौं, दुनी न चाली साथि ।
पाइ कुहाड़ा मारिया, गाफिल अपनैं हाथि ।।१४१।।
 
हे जीव! तुमने सांसारिक मोह में अपना धर्म खो दिया, परन्तु वह संसार जिसके लिए तुमने अपना धर्म खो दिया, तेरे साथ न गयी। तू इतना अचेतन है कि अपने ही हाथों अपने पैर में तूने कुल्हाड़ी मार लिया है अर्थात् अपने मोह से तूने स्वयं अपना जीवन नष्ट कर लिया है।
 
यह तन तो सब बन भया, करम जु भए कुहारि ।
आप आपकौं काटिहैं, कहैं कबीर बिचारि ।।१४२।।
 
यह शरीर वन के समान है और कर्म कुल्हारी। कबीर विचार कर कहते हैं कि हे जीव! तू अपने ही कर्म रूपी कुल्हाड़ी से अपने जीवन रूपी वन को काट रहा है अर्थात् नष्ट कर रहा है।
 
कुल खोये कुल ऊबरै, कुल राखे कुल जाइ ।
राम निकुल कुल भेंटि, सब कुल रहा समाइ ।।१४३।।
 
जो केवल ससीम, कुटुम्ब, वंश आदि के मोह में पड़ा रहता है, वह वास्तविक कुल अर्थात् पूर्ण, ब्रह्म या भूमा को खो देता है। कुटुम्ब आदि ससीम के मोह में पड़े रहने से पूर्ण या सर्वस्व की प्राप्ति नहीं हो पाती है। राम निकुल हैं उसी में तू वंश आदि ससीम का समर्पण कर दे। उसी में ससीम समाया हुआ है अर्थात् वह सब में व्याप्त है।
 
दुनियाँ के धौखे मुवा, चलै जु कुल की कांनि ।
तब कुल किसका लाजसी, जब ले धरहिं मसांनि ।।१४४।।
 
हे जीव! तू कुल की गौरव-वृद्धि में पड़ा रहता है। इसी कारण संसारिक भुलावे में मारा जाता है। जब तुझे लोग श्मशान में लिटा देंगे, तब किसका कुल लज्जित होगा ? अर्थात् जिस कुल की मर्यादा-वृद्धि में तू पड़ा रहता है, उससे तेरा सम्बन्ध ही छूट जायगा फिर किसके कुल की प्रतिष्ठा का प्रश्न रह जायगा ?
 
दुनियाँ भाँड़ा दुख का, भरी मुहाँमुह भूष ।
अदया अल्लह राम की, कुरलै कौनी कूष ।।१४५।।
 
यत: संसार तृष्णा से लबालब भरे हुए पात्र स्वरूप है। अत: यह दु:ख का भण्डार है। इसमें पूर्ण तृप्ति के लिए प्रयास करना व्यर्थ है। अल्लाह या राम की दया के बिना यह तृष्णा समाप्त नहीं हो सकती। हे जीव! जब सारा संसार एक अतृप्त वासना का भण्डार है तो ऐसे संसार में किस खजाने के लिए चीखता रहता है?
 
जिहि जेवरी जग बंधिया, तू जिनि बंधै कबीर ।
ह्वैसी आटा लोन ज्यौं, सोना सवां सरीर ।।१४६।।
 
कबीर कहते हैं कि जिस माया की रज्जु से जगत् बँधा हुआ है, तू उसमें मत फँस। यदि तू उसमें फँसता है तो तेरा यह सोने के समान बहुमूल्य शरीर अर्थात् मानव जीवन का व्यक्तित्व वैसे ही हो जायेगा जैसे आटा में नमक मिलाने पर इस प्रकार घुल-मिल जाता है कि उससे पृथक् नहीं किया जा सकता।
 
कहत सुनत जग जात है, विषय न सूझै काल ।
कबीर प्यालै प्रेम के, भरि भरि पिबै रसाल ।।१४७।।
 
उपदेशों को कहते और सुनते हुए संसार के लोगों का जीवन समाप्त होता जाता है। विषय में पड़े हुए उन्हें काल की सुधि नहीं रहती। किन्तु कबीर जैसे सन्त विषय के प्याले को मुख से नहीं लगाते। वे मधुर, प्रेम से परिपूर्ण प्याले को छक-छककर पीते हैं।
 
कबीर हद के जीव सौं, हित करि मुखाँ न बोलि ।
जे राचे बेहद सौं, तिन सौं अंतर खोलि ।।१४८।।
 
कबीर कहते हैं कि ससीम में फँसे हुए लोगों की संगत में मत पड़ों। उनसे अधिक प्रेम की वाणी न बोलो, अन्यथा तुम भी उनकी बातों में फँस जाओगे। जो साधक असीम में अनुरक्त हैं, उन्हीं से तुम अपने हृदय की बात कहो। उन्हीं का संगत करो और उन्हीं की बातों पर चलो।
 
कबीर केवल राम की, तूँ जिनि छाड़ै ओट ।
घन अहरन बिच लोह ज्यौं, घनो सहै सिरि चोट ।।१४९।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! तू केवल प्रभु का स्मरण कर, केवल उसी को अपना अवलम्ब बना। वही तुझको सब दु:खों मुक्त कर सकता है, अन्यथा जैसे निहाई पर रखा हुआ लोहा हथौड़े की चोट से पीटा जाता है, वैसे ही तुझे सिर पर सांसारिक दु:खों की चोट सहनी पड़ेगी।
 
कबीर केवल राम कह, सुद्र गरीबी झालि ।
कूर बड़ाई बूड़सी, भारी पड़सी कालि ।।१५०।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! तू अपनी गरीबी को झेलते हुए केवल प्रभु का स्मरण कर। व्यर्थ का बड़प्पन नष्ट हो जायेगा और भविष्य में यह तुझे बहुत मँहगा पड़ेगा। तू उसके बोघ से दब जायेगा।
 
काया मंजन क्या करै, कपड़ा धोइम धोइ ।
ऊजर भए न छूटिए, सुख नींदरी न सोइ ।।१५१।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! तूने स्वच्छता के वास्तविक मर्म को नहीं समझा है। तू शरीर और कपड़ों को धोकर स्वच्छता का व्यर्थ आडम्बर करता है। वास्तविक स्वच्छता मन की है। काया और वस्त्र के स्वच्छ होने से नहीं वरन् केवल मन की स्वच्छता से ही मुक्त होगा। इसलिए बाह्य स्वच्छता को वास्तविक स्वच्छता समझकर निश्चिन्त मत रह। सर्वदा आन्तरिक परिष्कार का प्रयास करता रह।
 
ऊजल कपड़ा पहिरि करि, पान सुपारी खाँहि ।
एकै हरि का नाँव बिन, बाँधे जमपुरि जाँहि ।।१५२।।
 
कबीर कहते हैं कि लोग प्राय: श्वेत वस्त्र धारण करते हैं और अपने मुख को सुशोभित करने के लिए पान-सुपारी का सेवन करते हैं। किन्तु प्रभु के भजन के बिना इस बाह्य सजावट से काम नहीं चलेगा। केवल हरि-स्मरण से ही मुक्ति होगी।
 
तेरा संगी कोइ नहीं, सब स्वारथ बँधी लोइ ।
मन परतीति न ऊपजै, जीव बेसास न होइ ।।१५३।।
 
हे जीव! तेरा कोई परम मित्र नहीं है, सब लोग अपने-अपने स्वार्थ में बँधे हुए हैं। परन्तु तू ऐसा अज्ञानी है कि इस कटू सत्य के प्रति तेरे मन में प्रतीति नहीं होती और न तेरे हृदय में विश्वास जमता है। कोई भी तेरे साथ न जाएगा।
 
माँइ बिड़ाँणी बाप बिड़, हम भी मंझि बिड़ाँह ।
दरिया केरी नाँव ज्यों, सँजोगे मिलि जाँहि ।।१५४।।
 
जगत् में सारे सम्बन्ध क्षणिक और संयोगजनक हैं। माँ भी पराई है, पित भी पराया है और हम सब भी पराए लोगों के बीच में हैं। इनमें से कोई अपना निजी व्यक्ति नहीं है। संसार में हम लोग उसी प्रकार संयोगवश मिल जाते हैं जैसे भिन्न-भिन्न स्थानों से आई हुई नौकाएँ समुद्र या नदी में अकस्मात् मिल जाती है।
 
इत पर घर उत घर, बनिजन आए हाट ।
करम किरानाँ बेंचि करि, उठि कर चाले बाट १५५।।
 
यह संसार जीव का नैसर्गिक धाम नहीं है। वास्तविक धाम तो केशवधाम है, जहाँ से हम आए हैं। संसार एक बाजार के समान है, जहाँ पर लोग वाणिज्य के लिए आते हैं और अपना कर्म रूपी सौदा बेंचकर अपने-अपने मार्ग पर चले जाते हैं। इसलिए हे जीव! संसार तेरा वास्तविक धाम नहीं है वरन् प्रभु ही तेरा वास्तविक शाश्वत धाम है।
 
नाँन्हाँ काती चित्त दे, मँहगे मोलि बिकाइ ।
गाहक राजा राम हैं, और न नेड़ा आइ ।।१५६।।
 
हे जीव! तू मन लगाकर बारीक कताई कर, क्योंकि बारीक सूत मँहगे दामों पर बिकता है अर्थात् तू अच्छे कर्म कर। उसका ही बड़ा मूल्य होगा और उसके ग्राहक कोई सांसारिक राजा नहीं, स्वयं प्रभु होंगे। कोई दूसरा तेरे निकट नहीं आएगा। इस माल को कोई दूसरा न खरीद सकेगा।
 
डागल ऊपरि दौरनां, सुख नींदड़ी न सोइ ।
पुन्नैं पाए द्यौहड़े, ओछी ठौर न खोइ ।।१५७।।
 
हे जीव! यह मानव जीवन पुष्पों की शय्या नहीं अपितु ऊबड़-खाबड़ कंटकाकीर्ण मार्ग पर दौड़ने के समान है। लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कठिन साधना करनी पड़ेगी। क्षुद्र सांसारिक सुखों में लिप्त होकर सुख की नींद न सो। अपने शुभ कर्मों और पुण्य के प्रताप से तुझे देवालय के समान यह पवित्र मानव शरीर प्राप्त हुआ है। इसे तुच्छ कार्यों में लगाकर तू नष्ट न कर।
 
मैं मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसो भागि ।
कब लग राखौं हे सखी, रुई पलेटी आगि ।।१५८।।
 
अहं बुद्धि, आपा बहुत बड़ा रोग है। इसलिए तू उससे मुक्त होने का प्रयत्न कर। क्योंकि ‘मैं मैं’ से लिप्त बुद्धि आग से लिपटी हुई रूई के समान है, जो तेरे सारे जीवन को नष्ट कर देगी।
 
मैं मैं मेरी जिनि करै, मेरी मूल बिनास ।
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की पास ।।१५९।।
 
हे जीव! अहंभाव और ममत्व पैरों की बेड़ी और गले की फाँसी के समान है। अत: अहंभाव और मेरेपन से दूर रह। अन्यथा यह तेरे जीवन के मूल को ही नष्ट कर डालेगा।
 
कबीर नाव जरजरी, कूड़े खेवनहार ।
हलके हलके तिरि गए, बूड़े जिन सिर भार ।।१६०।।
 
कबीर कहते हैं कि भव-सागर से पार जाने के लिए यह प्राण, मनयुक्त मानव तन एक नाव के समान है। यह ऐसी नाव है जो कि एक तो जर्जर हो चुकी है अर्थात् इसमें मोह, मद, राग, द्वेष आदि के छिद्र हो गए हैं, दूसरे इसका नाविक वासना और अहंभावयुक्त अज्ञानी मन है जो कि सर्वथा निकम्मा है। ऐसी नाव से जीवन-यात्रा कैसे पूरी हो सकती है। जिन लोगों ने भक्ति और साधना से अपनी वासना और अहंभाव को त्याग कर अपने को हल्का कर लिया है, वे ही इस भव-सागर को पार कर सकते हैं।
 
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 :: मधि ::
कबीर मधि अंग जे को रहै, तो तिरत न लागै बार ।
दुइ-दुइ अंग सूँ लाग करि, डूबत है संसार ।।१६१।।
 
कबीर कहते हैं कि जो मध्य मार्ग का अनुसरण करता है, उसे संसार रूपी भवसागर पार करते देर नहीं लगती। जो द्वन्द्व अर्थात सुख-दु:ख, प्रवृत्ति-निवृत्ति आदि में लिप्त रहता है, वही संसार में डूबता है।
 
कबीर दुविधा दूरि करि, एक अंग ह्वै लागि ।
यहु सीतल वहु तपपि है, दोऊ कहिए आगि ।।१६२।।
 
कबीर कहते हैं कि संशय को छोड़कर, अतिवादी दृष्टियों को त्यागकर मध्यम वर्ग में लग जाना चाहिए। अत्यधिक शीतलता और अत्यधिक ताप दोनों अग्नि के समान विनाशक होते हैं। इसलिए मध्यम मार्ग ही श्रेष्ठ है।
 
अनल आकासाँ घर किया, मद्धि निरन्तर बास ।
वसुधा व्योम बिरकत रहै, बिना ठौर बिस्वास ।।१६३।।
 
एक पक्षी अन्तरिक्ष में अपना नीड़ बनाता है और आकाश तथा पृथ्वी भूर्लोक और स्वर्लोक के बीच में ही निरन्तर वास करता है। यद्यपि अन्तरिक्ष में कोई प्रत्यक्ष आश्रय नहीं है, तथापि अपने दृढ़ विश्वास से वह वहाँ स्थित रहता है। ठीक इसी प्रकार साधक को द्वन्द्वों से अलग रहकर ‘सहज-समरस’ अवस्था में स्थित रहना चाहिए।
 
बासुरि गमि नारैनि गमि, नाँ सुपिनंतर गंम ।
कबीर तहाँ विलंबिया, जहाँ छाँह नहिं धंम ।।१६४।।
 
कबीर कहते हैं कि मैं उस द्वन्द्वातीत अवस्था में स्थित हूँ जहाँ न दिन की पहुँच है, न रात की, जो स्वप्नों में भी नहीं जाना जा सकता और न जहाँ छाया है, न धूप।
 
जिहि पैंडै पंडित गए, दुनियाँ परी बहीर ।
औघट घाटी गुर कही, तिहिं चढ़ि रहा कबीर ।।१६५।।
 
जिस मार्ग से शास्त्रज्ञानी पंडित और संसार की भीड़ चलती रहती है, कबीर उस मार्ग पर नहीं चले। परमतत्व का मार्ग अत्यन्त दुर्गम है। वह दुर्गम, कठिन और सँकरा मार्ग गुरु ने बतलाया और कबीर ने उसी मार्ग का अनुशरण कर परमतत्व तक आरोहण किया।
 
सुरग नरक मैं रहा, सतगुर के परसादि ।
चरन कँवल की मौंज मैं, रहौं अंति अरु आदि ।।१६६।।
 
सत्गुरु की कृपा से मैं स्वर्ग-नरक दोनों से विरत हूँ। ये दोनों भोग के स्थल हैं। इनमें जन्म-मरण का चक्कर लगा रहता है। मैं तो निरन्तर प्रभु के चरण-कमल के आनन्द में मग्न रहता हूँ।
 
हिन्दू मूये राँम कहि, मूसलमान खुदाइ ।
कहै कबीर सो जीवता, दुइ मैं कदे न जाइ ।।१६७।।
 
हिन्दू लोग परमतत्व के लिए ‘राम-राम’ रटते हुए और मुसलमान ‘खुदा’ में सीमित करके विनष्ट हो गये। कबीर कहते हैं कि वास्तव में वही जीवित हैं जो राम और खुदा में भेद नहीं करता और दोनों में व्याप्त अद्वैत-तत्त्व को ही देखता है। जीवन की सार्थकता इस भेद-बुद्धि से ऊपर उठना है।
 
दुखिया मूवा दुख कौं, सुखिया सुख कौं झूरि ।
सदा अनंदी राँम के, जिनि सुख-दुख मेल्हे दूरि ।।१६८।।
 
दु:खी व्यक्ति दु:ख के कारण पीड़ित रहता है और सुखी अधिक सुख की खोज में चिन्तित रहता है। कबीर कहते हैं कि राम के भक्त, जिन्होंने दु:ख-सुख के द्वन्द्व का त्याग दिया है; सदा आनन्द में रहते हैं।
 
 
कबीर हरदी पीयरी, चूना ऊजल भाइ ।
राँम सनेही यूँ मिलै, दोनउं बरन गँवाइ ।।१६९।।
 
कबीर कहते हैं कि हल्दी पीली होती है और चूना श्वेत रंग का होता है। परन्तु जब दोनों एक में मिलते हैं, तब एक नया लाल रंग बन जाता है। इसी प्रकार जब राम और उनके भक्त मिलते हैं, तब न तो भक्त का अहंभाव रह जाता है और न ब्रह्म का निर्गुणत्व। वह भागवत पुरुष हो जाता है।
 
काबा फिर कासी भया, राँमहि भया रहीम ।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ।।१७०।।
 
सम्प्रदाय के आग्रहों को छोड़कर मध्यम मार्ग को अपनाने पर काबा काशी हो जाता है और राम रहीम बन जाते हैं। सम्प्रदायों की रूढ़ियाँ समाप्त हो जाती हैं। भेदों का मोटा आटा अभेद का मैदा बन जाता है। हे कबीर! तू इस अभेद रूपी मैदे का भोजन कर, स्थूल भेदों के द्वन्द्व में न पड़।
 
धरती उरु असमान बिचि, दोइ तूँबड़ा अबध ।
षट दरसन संसै पड़ा, अरु चौरासी सिध ।।१७१।।
 
पृथ्वी और आकाश के बीच में द्वैत-दृष्टि का तुंबा अविनाश्य है। उसका सरलता से विनाश नहीं किया जा सकता। उसी द्वैत के कारण छहों दर्शन और चौरासी सिद्ध संशय में पड़े रहते हैं तथा सत्य का अनुशरण नहीं कर पाते।
 
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:: बेसास ::
जिनि नर हरि जठराहँ, उदिक थैं पिडं प्रकट कीयौं ।
सिरे श्रवण कर चरन, जीव जीभ मुख तास दीयौ ।।
उरध पाव अरध सीस, बीस पषां इम रखियौ ।
अंन पान जहाँ जरै, तहाँ तैं अनल न चखियौ ।।
इहि भाँति भयानक उद्र में उद्र न कबहूँ छंछरै ।
कृसन कृपाल कबीर कहि, हम प्रतिपाल न क्यों करै ।।१७२।।
 
जिस प्रभु ने गर्भ में रज-वीर्य से मानव शरीर का निर्माण किया, जिसने उसको कान, हाथ, पैर, जिह्वा, मुख आदि दिया, गर्भ में ऊपर पैर और नीचे सिर की दशा में दस मास तक सुरक्षित रखा। जिस जठराग्नि में भुक्त अन्न, जल आदि जीर्ण हो जाते हैं, वहाँ भी तू उस जठराग्नि से बचा रहा। इस प्रकार माँ के भयानक पेट में भी तेरा उदर कभी खाली नहीं रहा, तेरा पोषण मिलता रहा। जब उदर में इस परिस्थिति में उदार प्रभु तेरा पोषण करता रहा, कबीर कहते हैं तो वह कृपालु प्रभु अब तेरा प्रतिपालन क्यों र करेगा? अर्थात् हे मनुष्य! तू प्रभु की उदारता पर विश्वास रख। वह तेरी रक्षा करेगा।
 
भूखा भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग ।
भाँड़ा गढ़ि जिन मुख दिया, सोई पुरवन लोग ।।१७३।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! तू ‘भूखा-भूखा’ की रट क्यों लगाता है? अपनी भूख की कहानी लोगों को क्यों सुनाता है ? जिस कृपालु प्रभु ने तेरे शरीर रूपी घड़े को गढ़कर मुख दिया है, वही उदर-पूर्ति भी करेगा।
 
रचनाहार कौं चीन्हि लै, खाबे कौं क्या रोइ ।
दिल मन्दिर मैं पैसि करि, तांनि पछेवरा सोइ ।।१७४।।
 
हे जीव! तू अपने स्रष्टा को पहचान। खाने के लिए क्यों रोता है? अपने हृदय रूपी मन्दिर में प्रविष्ट होकर तू प्रत्यग्राम्य को पहचान और विश्वास रूपी चादर ओढ़कर सुख की नींद सो अर्थात् निश्चिन्त हो जा।
 
राँम नाँम करि बोंहड़ा, बोहौ बीज अघाइ ।
खंड ब्रह्माण्ड सूखा परै, तऊ न निष्फल जाइ ।।१७५।।
 
रामनाम का बीज धारण करो और जी-भरकर अपने जीवन-क्षेत्र में बोओ। चाहे चारों ओर सूखा पड़ जाय, कहीं भी वर्षा न हो अर्थात् चाहे जैसी विकट परिस्थिति क्यों न हो, यह रामनाम का बीज अवश्य उगेगा। वह कभी निष्फल नहीं जा सकता है। रामनाम से संसिद्धि अवश्य प्राप्त होगी।
 
चिंतामनि चित मैं बसै, सोई चित मैं आंनि ।
बिन चिंता चिंता करै, इहै प्रभु की बांनि ।।१७६।।
 
तेरे अर्न्तमन में सभी वाञ्छित पदार्थों को देनेवाला समर्थ ईश्वरूपी चितामणि विद्यमान है। तू उसी में चित्त को लगा। प्रभु का यही स्वभाव है कि वह सबका ध्यान रखते हैं, कोई उनका चिंतन करे या न करे।
 
कबीर का तूँ चिंतवै, का तेरे चिंते होइ ।
अनचिन्ता हरि जी करै, जो तोहि चिंति न होइ ।।१७७।।
 
कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! तू व्यर्थ की चिंता क्यों करता है? तेरे चिंता करने से होता भी क्या है? तेरे लिए जो आवश्यक है प्रभु बिना तेरे सोचे पूर्ण कर देते हैं, जिससे तुझे चिंता न करनी पड़े। इसलिए प्रभु में पूर्ण आस्था रख।
 
करम करीमाँ लिखि रहा अब कुछ लिखा न जाइ ।
मासा घटै न लि बढ़ै, जौ कोटिक करै उपाय ।।१७८।।
 
कृपालु प्रभु ने तेरे कर्मों के अनुसार फल का लेखा-जोखा तैयार कर रखा है। अब उसके आगे कुछ भी नहीं लिखा जा सकता। इसमें कुछ भी घट-बढ़ नहीं हो सकती, व्यक्ति चाहे जितना कोशिश क्यों न करे।
 
जाकौ जेता निरमया, ताकौं तेता होइ ।
रत्ती घटै न तिल बढ़ै, जौ सिर कूटै कोई ।।१७९।।
 
प्रभु ने जीव के लिए जितना भोग रच दिया है उतनी ही उसे मिलता है। इसके अतिरिक्त उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता, कोई चाहे कितना ही सिर क्यों न पिट ले।
 
चिंता छांड़ि अचिंत रहु, साँई है समरत्थ ।
पसु पंखेरू जंतु जिव, तिनकी गाँठी किसा गरत्थ ।।१८०।।
 
हे जीव ! तू चिंता छोड़कर निश्ंचित रह। प्रभु सामर्थ्यवान है। पशु, पक्षी और अन्य जीव-जन्तुओं को भी उनकी आवश्यकता के अनुसार प्रभु ने सम्पदा एकत्र कर रखी है। जिसने उनके लिए सभी आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति की है, वही तेरे लिए करेगा।
 
इसंत न बाँधे गाठरी, पेट समाता होइ ।
आगैं पाछैं हरि खड़ा, जो माँगै सो देइ ।।१८१।।
 
संत में संचय की प्रवृत्ति नहीं होती। वह केवल आवश्यकता-भर पदार्थों को ग्रहण करता है अर्थात् उसमें अपरिग्रह की अपवृत्ति नहीं होती है। प्रभु सर्वव्यापी है। भक्त को जिस वस्तु की आवश्यकता होती है वह उसकी पूर्ति कर देता है।
 
राँम नाँम सौं दिल मिला, जम सों परा दुराइ ।
मोहि भरोसा इष्ट का, बंदा नरक न जाइ ।१८२।।
 
मेरा हृदय रामनाम से युक्त है। अब यमराज मेरा कुछ नहीं कर सकता। उसके अधिकार से मैं अलग हो गया हूँ। मुझे अपने इष्टदेव का पूरा भरोसा है। उनका भक्त कभी नरक में नहीं जा सकता।
 
 
कबीर तूँ काहै डरै, सिर परि हरि का हाथ ।
हस्ती चढ़ि नहिं डोलिए, कूकुर भुसैं जु लाख ।।१८३।।
 
कबीर कहते हैं कि हे जीव! प्रभु का संरक्षण हाथ तेरे ऊपर है, फिर तू क्यों विचलित होता है? जब तू हाथी पर सवार हो गया, तब क्यों भयभीत होता है? अब तो तू सुरक्षित है। तेरे पीछे चाहे लाख कुत्ते भूँकें, तुझे उनका भय नहीं करना चाहिए।
 
 
मीठा खाँड़ मधूकरी, भाँति भाँति कौ नाज ।
दावा किसही का नहीं, बिना बिलायत राज ।।१८४।।
 
भिक्षा से प्राप्त भोजन में भाँति-भाँति का अन्न रहता है। वह खाँड़ के समान मीठा होता है। उसमें किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं रहता। भिक्षान्न से सन्तुष्ट ऐसा साधु बिना राज्य के ही राजा है।
 
माँनि महातम प्रेम रस, गरवातन गुण नेह ।
ए सबही अहला गया, जबहिं कहा कछु देह ।।१८५।।
 
किसी व्यक्ति से किसी वस्तु की याचना करते ही सम्मान, महातम्य, प्रेमभाव, गौरव, गुण और स्नेह आदि सभी का नाश हो जाता हैं।
 
माँगन मरन समान है, बिरला बंचै कोइ ।
कहै कबीरा राम सौं, मति रे मँगावै मोहि ।।१८६।।
 
माँगना मृत्यु के समान दु:खदायी है। ऐसी वृत्ति से शायद ही कोई बच पाता है। प्रत्येक को कुछ-न-कुछ आवश्यकता पड़ती रहती है और उसे माँगना पड़ता है तथापि कबीर राम से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मैं ऐसी स्थिति में कभी न आऊँ कि मुझे कभी किसी से कुछ माँगना पड़े।
 
पांडर पिंजर मन भँवर, अरथ अनूपम बास ।
राँम नाँम सींचा अँमी, फल लागा विस्वास ।।१८७।।
 
शरीर कुंद की झाड़ समान है, उसके पुष्प में मनोरथ की अनुपम संगुध है। उस पर मनरूपी भ्रमर मँडराता रहता है। उस झाड़ को साधक रामनाम जपरूपी अमर प्राणदायियी शक्ति से सींचता रहता है। तब उसमें विश्वास के फल प्रफुल्लित होते हैं। यही भक्ति की सार्थकता है।
 
 
मेरि मिटी मुकता भया, पाया ब्रह्म बिसास ।
अब मेरे जूजा कोइ नहीं, एक तुम्हारी आस ।।१८८।।
 
अहं और मेरापन का भाव समाप्त हो गया। अब मैं इस सीमा से विरत् हो गया और मेरी ब्रह्म में पूर्ण आस्था हो गयी। हे प्रभु अब मेरे लिए कोई दूसरा नहीं है, केवल तुम्हारा भरोसा है।
 
जाके हिरदै हरि बसै, सो नर कलपै काँइ ।
एकै लहरि समुंद की, दुख दालिद सब जाइ ।।१८९।।
 
जिसके हृदय मे प्रभु का निवास है, वह और किसके लिए कल्पित है ? भगवान के अनुग्रहरूपी समुद्र की एक लहर मात्र से उसके सभी दु:ख और दारिद्र्य नष्ट हो जाते हैं।
 
पद गावै लौंलीन ह्वै, कटी न संसै पास ।
सबै पछाड़े थोथरे, एक दिना बिस्वास ।।१९०।।
 
यदि संशय का बंधन नहीं कटा तो सर्वथा प्रभु में लीन होकर पद गाने से कुछ भी लाभ नहीं हो सकता। विश्वास-रहित सारी साधना वैसे ही व्यर्थ है जैसे बिना अन्नकण के थोथे तुष (खाली सूप) को पछोरना।
 
गावन ही मैं रोवना, रोवन ही मैं राग ।
इक बैरागी ग्रिह करै, एक ग्रिही बैराग ।।१९१।।
 
एक दिखावे में गाता है, किन्तु भीतर से रोता है। दूसरा ऊपर से तो रोता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु भीतर से गाता है। ठीक इसी प्रकार एक वैरागी होते हुए भी भीतर से आसक्त रहने के कारण गृहस्थी से बँधा है और दूसरा ऊपर से घर-गृहस्थी तो बनाये हुए है, किन्तु भीतर से वह अनासक्त है अर्थात् उसमें सांसारिक विषयों के प्रति वास्तविक वैराग्य है।
 
गाया तिन पाया नहीं, अनगायाँ तै दूरि ।
जिनि गाया विस्वास सौं, तिन राम रहा भरपूरि ।।१९२।।
 
जिन्होंने बिना विश्वास के प्रभु का गुणगान किया, भक्ति का ढिंढोरा पीटा, वे प्रभु को प्राप्त करने में असमर्थ हैं, जो प्रभु का नाम लेते ही नहीं, उनसे तो वह दूर ही है। जो श्रद्धा और विश्वास के साथ राम-नाम का गुणगान करते हैं, उनके रोम-रोम में प्रभु व्याप्त रहते हैं।
 
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 :: सम्रथाई ::
ना कछु किया न करि सका, नाँ करने जोग सरीर ।
जो कछु किया सो हरि किया (ताथै) भया कबीरकबीर ।।१९३।।
 
मैंने स्वयं से कुछ भी नहीं किया और न कर सकने की सामर्थ्य है। यह स्थूल शरीर किसी कार्य के योग्य नहीं है। मेरे जीवन में जो कुछ भी संभव हुआ है, वह सब प्रभु ने किया है। उन्हीं के साधना से एक साधारण व्यक्ति श्रेष्ठ कबीर हो गया।
 
कबीर किया कछु होत नहिं, अनकीया सब होइ ।
जौ कीएं ही होत है, तौ करता औरै कोइ ।।१९४।।
 
कबीर कहते हैं कि मनुष्य ईश्वर के अनुग्रह के बिना कुछ नहीं प्राप्त कर सकता। यदि भगवदनुग्रह प्राप्त हो जाता है तो बिना साधना किये ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है। यदि साधना, तपस्या आदि से कुछ होता भी है तो उसका वास्तविक कर्त्ता कोई और नहीं प्रभु ही है।
 
जिसहि न कोइ तिसहि तूँ तिस सब कोइ ।
दरगह तेरी साँइयाँ, नाँमहरूँम न होइ ।।१९५।।
 
जसका कोई नहीं है, उसका भी आश्रय तू ही है। जिसे तेरा आश्रय प्राप्त है, उसको सभी के आश्रय स्वत: प्राप्त हो जाते हैं। हे प्रभु ! तेरे दरबार में कोई वञ्चित नहीं रहता अर्थात् तेरी कृपा सब को प्राप्त होती है।
 
एक खड़े ही ना लहैं, और खड़े बिललाइ ।
साँई मेर, सुलषनां, सूतां देह जगाइ ।।१९६।।
 
कुछ दरबार ऐसे होते हैं जहाँ कुछ लोग खड़े रहते हुए भी कुछ पाने से वञ्चित रहते हैं और वहीं खड़े-खड़े बिलखते रहते हैं। परन्तु मेरा प्रभु ऐसा कृपालु है कि वह सोये हुए को भी जगाकर देता है।
 
सात समुंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ ।
धरनी सब कागद करौं, (तऊ) हरि गुन लिखा न जाइ ।।१९७।।
 
यदि सातों समुद्रों की स्याही बना डालूँ, सारे बनराजि की लेखनी और सारी पृथ्वी को कागज के रूप में ग्रहण करूँ तो भी प्रभु के गुणों का वर्णन सम्भव नहीं।
 
अबरन कौं क्या बरनिये, मोपै बरनि न जाइ ।
अबरन बरने बाहिरा, करि करि थका उपाइ ।।१९८।।
 
जो अवर्णनीय है उसका वर्णन कैसे हो सकता है? मेरे लिए उसका वर्णन सम्भव नहीं है। वह वर्णन से परे है। लोग अनेक कोशिश करके थक गए किन्तु उसका वर्णन करने में असफल ही रहे।
 
झल बाँवे झल दाँहिनैं, झलहि मांहि व्यौंहार ।
आगै पीछै झलमई, राखै सिरजनहार ।।१९९।।
 
संसार में जीव दाहिने-बाएँ, आगे-पीछे चारों ओर ज्वाला अर्थात त्रिताप (आधिभौतिक-आध्यात्मिक और आधिदैविक) से घिरा हुआ है और उसका सारा व्यवहार इसी ज्वाला के भीतर ही सम्पन्न होते हैं। ऐसी परिस्थिति में प्रभु ही उसकी रक्षा कर सकते हैं। उसमें स्वयं बचने की सामर्थ्य नहीं है।
 
साँई मेरा बानियाँ, सहजि करै व्यौपार ।
बिन डाँड़ी बिन पालरै, तौले सब संसार ।।२००।।
 
मेरा प्रभु अद्भुत व्यापारी है। वह सहज रूप में व्यापार करता है अर्थात् संसार के प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्म के अनुसार फल देता है। उसके न्याय का तराजू ऐसा है जिसमें डाँड़ी और पलड़े के बिना व्यक्ति के भाग का निर्धारण उसके कर्म के अनुसार करता है।
 
कबीर वार्या नाँव पर, कीया राई लौनं ।
जिसहि चलावै पंथ तूँ, तिसहि भुलावै कौंन ।।२०१।।
 
कबीर कहते हैं कि मैंने प्रभु के नाम पर अपने को पूर्णरूपेण समर्पित कर दिया है। जिसे भगवान सन्मार्ग पर लगा देता है, उसे भ्रमित कौन कर सकता है ?
 
 
कबीर करनी क्या करै, जे राँम न करै सहाइ ।
जिहि जिहि डाली पग धरै, सोई नइ नइ जाइ ।।२०२।।
 
कबीर कहते हैं कि यदि मनुष्य को भगवान की सहायता न मिले तो वह अपने उपाय से क्या कर सकता है? प्रभु की सहायता के बिना साधक जिस डाल का आश्रय लेकर ऊपर चढ़ना चाहता है अर्थात् साधना में जिस मार्ग का अवलम्ब लेकर आगे बढ़ना चाहता है, वही डाल नीचे झुक जाती है और साधक के नीचे गिर जाने की आशंका उत्पन्न हो जाती है।
 
जदि का माइ जनमियाँ, काहू न पाया सुख ।
डाली डाली मैं फिरौं, पातौं पातौं दु:ख ।।२०३।।
 
मुझे जब से माता ने जन्म दिया, मैंने कहीं सुख नहीं पाया। यदि मैं डाल-डाल पर रहता हूँ तो दु:ख आगे पात-पात पर रहता है अर्थात् मैं जितना ही दु:ख से बचने का उपाय करता हूँ, उतना ही दु:ख प्रत्यक्ष दिखायी देती है। केवल प्रभु की शरण में ही सुख है।
 
साँई सौं सब होत है, बंदे ते कछु नाँहि ।
राई ते परबत करै, परबत राई माँहि ।।२०४।।
 
जीवन में जो भी कार्य हैं वह प्रभु की कृपा से ही पूर्ण होता है, सेवक के प्रयत्न से नहीं हो सकता। प्रभु ऐसी शक्ति है कि वह राई को पर्वत और पर्वत को राई में बदल सकता है अर्थात् क्षुद्र को महान् और महान् को क्षुद्र बना सकता है।
 
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:: कुसबद ::
अनी सुहेली सेल की, पड़तां लेइ उसास ।
चोट सहारै सबद की, तास गुरू में दास ।।२०५।।
 
भाले की नोंक की चोट ता सहा जा सकता है। भाला लगने पर मनुष्य एक बार व्यथा की श्वास तो निकाल भी सकता है, किन्तु दुर्वचन की चोट असह्य होती है। उसे सहन करने की क्षमता जिसमें होती है, कबीर उसे अपना गुरु मानने को तैयार हैं। अर्थात कटु वचन सहनेवाले व्यक्ति संसार में विरले ही मिलते हैं।
 
 
 
खोद खाद धरती सहै, काट कूट बनराइ ।
कुटिल बचन साधू सहै, दूजै सहा न जाइ ।।२०६।।
 
सहन करने की क्षमता केवल महान् लोगों में होती है। विशाल धरती में ही यह क्षमता होती है कि वह खोदाई के कष्ट को झेले, सुविस्तृत वनराजि में ही यह क्षमता है कि वह काट-कूट को सहन कर सके। इसी प्रकार विशाल हृदयमयी प्रभु-भक्त में ही यह क्षमता व्याप्त होती है कि वह लोगों के दुर्वचन वचन सहता है। अन्य लोगों में यह सहन शक्ति नहीं होती।
 
 
 
सीतलता तब जानिए, समता रहै समाइ ।
पख छाड़ै निरपख रहै, सबद न दूखा जाइ ।।२०७।।
 
मनुष्य में वास्तविक शीतलता का गुण तब समझना चाहिए, जब उसमें समत्व का भाव आ जाय, मान-अपमान की भावना से विवर्जित हो जाय और जब वह पक्ष छोड़कर सर्वथा निष्पक्ष हो जाय। तब दुर्वचन उसे दु:खित नहीं कर सकते।
 
 
 
कबीर सीतलता भई, पाया ब्रह्य गियान ।
जिहि बैसंदर जग जलै, सो मेरे उदक समान ।।२०८।।
 
जब मेरे भीतर ब्रह्म-ज्ञान जगा तो समत्वजनित शीतलता व्याप्त हो गयी। जिस दुर्वचनरूपी अग्नि से सारा संसार जल रहा है, वह मेरे लिए जल के समान शीतल हो गया।
 
 
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:: सबद ::
कबीर सबद सरीर मैं, बिन गुन बाजै तांति ।
बाहर भीतर रमि रहा, तातैं छूटि भरांति ।।२०९।।
 
कबीर कहते हैं कि मेरे भीतर अनाहत नाद बिना तारों के वाद्ययन्त्र की ध्वनि के समान गूँजे रहा है। वह भीतर-बाहर चारों ओर रम रहा है। फलस्वरूप मेरा चित्त शब्द-ब्रह्म में लीन हो गया है और इससे मेरी सारी भ्रान्तियाँ जाती रही हैं।
 
सती संतोषी सावधान, सबदभेद सुबिचार ।
सतगुर के परसाद तैं, सहज शील मत सार ।।२१०।।
 
जो साधक सत्यनिष्ठ है, सहनशील है और अवधानपूर्वक सभी ध्वनियों के रहस्य पर भली-भाँति विचार करता है, वह सत्गुरु के कृपा से उस सहज अवस्था को प्राप्त करता है जो सब मतों का सार है।
 
सतगुर ऐसा चाहिए, जस सिकलीगर होइ ।
सबद मसकला फेरि करि, देह दर्पन, करै सोइ ।।२११।।
 
सत्गुरु को सिकलीगर अर्थात् सान धरानेवाले के समान होना चाहिए, जो शब्द के मसकले द्वारा शिष्य को दर्पण के सदृश निर्मल कर देता है। अर्थात् गुरु ऐसा हो जो सुरति-शब्द-योग की साधना द्वारा शिष्य के सब दूषित संस्कारों को अपसारित कर उसका अन्त:करण बिल्कुल निर्मल कर दे।
 
हरि रस जे जन बेधिया, सर गुण सींगणि नाँहि ।
लागी चोट सरीर मैं, करक कलेजे माँहि ।।२१२।।                         
 
सत्गुरु अपने शब्द को बड़े ही आश्चर्य ढंग से संचालित करता है। वह न तो शर अर्थात् बाण का प्रयोग करता है और गुण अर्थात् प्रत्यंचा तथा सींगणि अर्थात् धनुष का। फिर भी उसके द्वारा प्रवाहित भक्ति-रस से जो बिद्ध होते हैं, उन पर अद्भुत प्रभाव पड़ता है। उस शब्द की चोट तो लगती है शरीर में, किन्तु वह उसका टीस हृदय तक प्रवेश कर जाती है।
 
ज्यों ज्यों हरि गुन साँभलूँ, त्यों त्यों लागै तीर ।
साँठी साँठी झड़ि पड़ी, भलका रहा सरीर ।।२१३।।
 
मैं ज्यों-ज्यों प्रभु के गुणों का स्मरण करता हूँ, त्यों-त्यों वियोग का वाण मेरे अन्तस्तम में प्रविष्ट होता जाता है और वह बाण ऐसे भयंकर रूप में लगता है कि उसका सरकंडा तो टूटकर अलग हो जाता है, किन्तु उसका फलक भीतर ही बिंधा रह जाता है। इसलिए उसको निकालना असंभव हो जाता है।
 
ज्यौं ज्यौं हरि गुण साँभलौं, त्यौं त्यौं लागै तीर ।
लागे ते भागै नहीं, साहनहार कबीर ।।२१४।।
 
मैं जितना ही प्रभु के गुण का स्मरण करता हूँ, उतना ही मिलन की उत्कण्ठा तीव्र होती जाती है और विरह की वेदना तीर के समान चोट करती है। किन्तु कबीर उस वेदना से भागनेवाला नहीं है। वह धैर्य से उसको सहन करता है।
 
 
सारा बहुत पुकारिया, पीर पुकारै और ।
लागी चोट जु सबद की, रहा कबीरा ठौर ।।२१५।।
 
प्राय: सारे लोग जोर-जोर से पुकारते हैं, किन्तु उनकी पुकार बनावटी होती है। वास्तविक वेदना की पुकार कुछ और ही होती है। गुरु के शब्द की चोट लगने पर कबीर जहाँ-का-तहाँ रह गया। उसमें पुकारने की भी शक्ति शेष न रह गयी।
 
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