हिन्दी साहित्य

हिन्दी का भाषा वैभव तथा महत्व

Posted on: सितम्बर 2, 2008

भाषा की क्षमता के क्या निकष (कसौटियां) होने चाहिये?
(१) भाषा सीखने की सरलता और अक्षरों का वैज्ञानिक वर्गीकरण
(२) सीखने, सिखाने की असंदिग्ध सुस्पष्ट विधि
(३) अक्षर और शब्द उच्चरण की स्पष्टता और सनातनता
यह तीन गुण हिन्दी को देवनागरी लिपि के कारण परम्परा से प्राप्त हैं।
इसके अतिरिक्त, नीचे लिखे हुए गुण, हिन्दी को, वह संस्कृतजन्य होने के कारण, जन्मजात प्राप्त हैं।
(१) शब्द सम्पत्ति और वैश्विक तथा भारतीय भाषाओं में योगदान
(२) शब्द रचना क्षमता
(३) शब्दों की संवादिता, गेयता और काव्यमयता
(४) शब्दों की अर्थवाहिता,
(५) पारिभाषिक शब्दों की रचना क्षमता
(६) परम्परा से और अपरिमित साहित्य से जुडे रहने की क्षमता
(७) शब्दों की विकास या विस्तार क्षमता
सभी जानते हैं कि हिन्दी की देवनागरी लिपि शास्त्र-शुद्ध है। उसका वर्गीकरण एक विशेष ढंग से किया गया है। किन्तु हिन्दी के संस्कृतजन्य शब्द सुसंवादित एवं अर्थवाही भी होते हैं। हिन्दी में अंग्रेजी, अरबी की भांति स्पेलींग पाठ करना नहीं पडता, उच्चरण के अनुसार उसे लिखा और पढा जाता है। और यह सारे गुण सभी शिक्षित समाज को सामान्य रूप से ज्ञात होते हैं। इसके कारण हिन्दी सीखने की सरलता प्राप्त होती है और भाषा को शीघ्रता से सीखा जाता है।
किन्तु कुछ गुणों के विषय में साधारण हिन्दी प्रेमी को स्पष्ट रूप से जानकारी ना होने के कारण इस लेख में उन गुणों को विशद करने की चेष्टा की जाती है।
एक वैश्विक “धातु” व्यापन का उदाहरण:
वैसे तो विश्व की और विशेषकर यूरोप की कई भाषाओ में संस्कृत/ हिन्दी धातुओ का स्रोत पाया जाता है। यही बिन्दु अपने आपमें एक पूरे प्रकरण में विस्तृत किया जा सकता है। इस लेख मे इस बिन्दु का व्याकरणीय संधान लगाने का प्रयास किया है।
वैसे, कौटुम्बिक संबंधों के शब्द, सर्वनाम और धातु भी पर्याप्त मात्रा में भारतीय भाषाओ से प्रभावित हैं।
एक धातु “स्था” लेते हैं। इस धातु पर आधारित अनेक शब्द जैसे कि स्थान, स्थिति, स्थापना, स्थपति, स्थल, स्तब्ध, स्तंभ इत्यादि बनते हैं। धातु से जुडे हुये अर्थ हैं- खडा रहना, होना, उपस्थित होना, सहना, रुकना, स्थिर रहना इत्यादि। और व्युत्पादित अर्थ होते हैं जैसे कि जो खडा होता है, वह स्थिर होता है, फिर दृढ होता है, कडा भी होता है।
अब अंग्रेजी में इस “स्थ” धातु का संचार देखिये:
उदाहरण: जैसे To “st’and, be st’able, to “st’op, be “st’ill, or to “st’ay , दृढ और कडा इस अर्थ में जैसे stone, steel, और जो वस्तुएं खडी रहती हैं जैसे, stick, a stake, a staff, a stalk, a station, a stamen इत्यादि।
फिर रुकने, रहने, एकत्रित होने के स्थान, इस अर्थ में, जैसे कि stall, stadium और to step, to take a stand, जुडे हुए अर्थ के शब्द हैं study या strong फिर व्युत्पदित अर्थ के शब्द जो study या strong होता है- प्राणियों में नर होने से उसको भी stallion या steer या stag कहते हैं।
फिर नकारात्मक अर्थ में व्युत्पादित अर्थ में जो बहुत समय से रुका होता है उसे stagnant या stale कहा जाता है और फिर, stiff या तो sticky होता है और फिर stink करने लगता है। फिर sterile होना stagnant होने के समान है। अब एक शब्द देखिये- stare अर्थ होता है दृष्टि स्थिर करना। stonic का अर्थ है स्थिर रहकर (सम बुद्धि) विचलित ना होने वाला।
विद्यालय में जो पढाता हूं, structure (निर्माण) और static (स्थिर वस्तुओं का विज्ञान) इसमें भी यह “st” धातु, विद्यमान है।
ऐसे और भी उदाहरण आप केवल “st” को लक्ष्य में रखते हुए अंग्रेजी का शब्दकोष ढूंढने का पुरुषार्थ करेंगे तो प्राप्त कर पायेंगे।
इसी प्रकार “ज्ञ” या “जम” या “दिव” धातुओं पर और धातुओं पर संशोधन किया जा सकता है।
ध्यान रहे कि धातु कुछ संक्रमित होकर अंग्रेजी में जाते हैं। ज्ञ का “gn” या “kn” बनता है।
“जन” सशि बनता है इत्यादि-
 
शब्द रचना क्षमता-
 
देशी भाषाओं में, (जैसे गुजराती, मराठी, बंगला, उडीया, तेलगु, तमिल…इ.) नये नये शब्द, और परिभाषित शब्द हिन्दी/संस्कृत के आधार पर गढे जाते हैं।
भारत की प्राय: सारी प्रादेशिक भाषाएं संस्कृतजन्य संज्ञाओ का उपयोग करती हैं। वैज्ञानिक, औद्योगिक, शास्त्रीय इत्यादि क्षेत्रों में पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग सरलता से हो इसलिये और अधिकाधिक शोधकर्ता इस क्षेत्र को जानकर कुछ योगदान देने में समर्थ हो, इसलिये शब्द सिद्धि की प्रक्रिया की विधि इस लेख में संक्षेप में प्रस्तुत की जाती है।
यह लेख उदाहरणसहित उपसर्गों और प्रत्ययों के द्वारा मूल धातुओपर, संस्कार करते हुये किस विधि नये शब्द रचे जाते हैं इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करेगा।
हिन्दी/ संस्कृत में २२ उपसर्ग हैं। शाला में एक श्लोक सीखा था।
प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार वत्
उपसर्गेण धात्वर्था: बलात् अन्यत्र नीयते।।
अर्थ: प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार की भांति उपसर्गों के उपयोग से धातुओके अर्थ बलपूर्वक अन्यत्र ले जाये जाते हैं।
 
उपसर्ग: प्र, परा, अप, सम, अनु, अव. नि: या निऱ्, दु:, या दुर, वि, आ. नि, अधि, अपि, अति, सु, उद. अभि, प्रति, परि और उप- इनके उपयोग से शब्द नीचे की भांति रचे जाते हैं।
कुछ उदाहरण: हृ हरति इस धातु से, प्र+हर – प्रहार, सं+हर – संहार, उप+हर – उपहार, वि+हर – विहार, आ+हर – आहार उद+हर – उद्धार, प्रति+हर – प्रतिहार इत्यादि शब्द सिद्ध होते हैं।
 
प्रत्यय: प्रत्ययों का उपयोग, कुछ उदाहरण:
(१) योग प्र+योग – प्रयोग, प्रयोग+इक – प्रायोगिक, प्रयोग+शील – प्रयोगशील, प्रयोग+वादी – प्रयोगवादी,
उप+योग – उपयोग+इता – उपयोगिता
उद+योग – उद्योग+इता – औद्योगिकता
उसी प्रकार रघु से राघव, पाण्डु – पाण्डव, मनु – मानव, कुरु – कौरव, इसी प्रकार और भी प्रत्यय हमें विदेह – वैदेहि, जनक – जानकी, द्रुपद – द्रौपदी – द्रौपदेय, गंगा – गांगेय, भगीरथ – भागीरथी, इतिहास – ऐतिहासिक, उपनिषद – औपनिषदिक, वेद – वैदिक, शाला – शालेय,
संस्कृत के पारिभाषिक शब्द, विशेषण का ही रूप है, इसलिये अर्थ को ध्यान में रखकर रचे जाते हैं। इसलिये शब्दकोष से ही उस अर्थ का शब्द प्राप्त करना पर्याप्त नहीं। हरेक संज्ञा का विशेष अर्थ होने से, परिभाषा को रचने के काम में उन्हीं व्यावसायिकों का योगदान हो, जो एक क्षेत्र के विशेषज्ञ है, साथ में पर्याप्त संस्कृत का भी ज्ञान रखते हैं।
संस्कृत भाषा में २२ उपसर्ग, ८० प्रत्यय और २००० धातु हैं। इनकी ही शब्द रचने की क्षमता २२*८०*२०००=३,५२०,००० – अर्थात ३५ लाख शब्द केवल इसी प्रक्रिया से बनाये जा सकते हैं।
इसके उपरान्त सामासिक शब्द, और सन्धि शब्द को जोडे तो शब्द संख्या अगणित होती है।
 
पारिभाषिक संज्ञाएं-
पारिभाषिक संज्ञाओकी रचना का उदाहरण:
तीन प्रकार की संज्ञाएं दिखाई देती हैं। (१) शब्दकोष में पाई जाती है। (२) दूसरी प्रादेशिक भाषा में पाई जाने वाली (३) जो monier williams और आपटे इत्यादि कोषों में पाई जाने वाली। आवश्यकता है कि चुने हुए शब्द का वैशेषणिक अर्थ अभिप्रेत संज्ञा के योग्य हो।
सबसे बडा योगदान उपसर्ग, प्रत्यय, समास और सन्धि प्रक्रिया से प्राप्त होता है।
उदाहरणार्थ- moment in mechanics is the product of
force and distance.
समास प्रक्रिया के उपयोग से “बलान्तर” संज्ञा बनती है।
व्याख्या: बलं च अन्तरस्य गुणाकार: स बलान्तर:।
Bending moment प्रत्यय के उपयोग से वक्रक बलान्तर:
Twisting moment व्यावर्तक बलान्तर:
Turning moment आवर्तक बलान्तर:
concrete – वज्र पदार्थ
steel – लोह
steel structure – लोह निर्माण, लोह पिंजर
Inertia – जडता,
Moment of Inertia – जड बलान्तर
Reinforced cement concrete – बलवर्धित वज्र इत्यादि
(इस विषय की लंबी सूची है)
सुसंवादी, गेय, अर्थवाही शब्द रचना।
हर वाग में एक स्वर होता है, जिसे संवादी स्वर कहा जाता है। उसी प्रकार किसी विशेष क्षेत्र में सुसंवादी पारिभाषिक शब्द रचना की जा सकती है। उदाहरण: मुख पेशियों के नाम (अभिनवं शारीरम्)
भ्रूसंकोचनी: Corrugator supercilli
नेत्र निमीलनी: Orbicularis Oculi
नासा संकोचनी: Compressor naris
नासा विस्फारणी: Dilator naris
नासा सेतु: Dorsum of the nose
नेत्रोन्मीलनी
नासावनमनी: Dopressor septi
एक और उदाहरण: Constitution, Law, Legistation code, Bill, Act इत्यादि शब्द अंग्रेजों के साथ ही भारत पहुंचे।
संस्कृत की क्षमता देखिये
Constitution संविधान
Law विधान
Legislation विधापन
Bill विधेयक
Illegal अवैध
Legal वैध
मूल अंग्रेजी शब्द एक दूसरे से स्वतंत्र है। Law का अर्थ जानने से Constitution, Legislation, Bill, Illegal, Legal यह सारे शब्द स्वतंत्र रूप से सिखना पडते हैं। किन्तु संस्कृत/ हिन्दी पर्याय एक “धा” धातु पर “उपसर्ग” और “प्रत्यय” लगाकर नियमबद्ध रीति से गढे गये हैं। जिसे संस्कृत शब्द सिद्धी की प्रक्रिया की जानकारी है, उसे ये शब्द आप ही आप समझ में आते हैं।
परकीय शब्दों के संस्कृत प्रतिशब्द रचने का शास्त्र जीवित और ज्वलन्त रखने का कार्य सहस्रों शोधकर्ताओं को अनुदान देकर करवाया जाता, तो हीनग्रंथि से पीडित यह पीढी जन्म ही ना लेती।
अर्थवाहिता-
एक और गुण जो संज्ञाओं को इस लोक से, परे ले जाता है, वह हिन्दी के उन शब्दों में है, जो वैसे शास्त्रों से जुडे हुए हैं। उदाहरणार्थ व्यक्ति, ब्रह्मांड, संसार, ब्रह्म, निसर्ग,
व्यक्ति: हमारे जन्म से पहले हम अव्यक्त थे, जन्मे तो अन्त तक व्यक्त रहे, और मृत्यु के अनन्तर फिर अव्यक्त में विलीन हुए। यह अर्थ व्यक्ति शब्द में निहित है। या तो यूं मानिये कि ईश्वर की परम, लौकिक सत्ता जिस निर्मित कृति में व्यक्त हो रही है, वह व्यक्ति है।
ब्रह्म: मूल शब्द बृहत् है। जिससे अंग्रेजी के Broad, Breadth इत्यादि शब्द बनते हैं। अर्थ है सदा विस्तरित होते रहना। ब्रह्मांड: उसका अंडाकार व्याप।
संसार: सम् सरति इति संसार: सम का अर्थ है “साथ” जैसे समाज, समिति (English में committee) तो संसार का अर्थ हुआ “जो साथ में सरते जाते हैं व ” इसीलिये इसे संसार कहा जाता है। पहले “अप्रकट” बीच में प्रकट होकर साथ चले फिर अप्रकट में चले गये। इसी प्रकार से अर्थवाही शब्द है- नदी, सरिता, मानव, निसर्ग।
नदी: या नादते (कल, कल कल नाद) सा नदी।
सरिता: या सरति सा सरिता। जो सरते सरते (नाद किये बिना) चलती है वह सरिता है।
मानव: मन: अस्ति स मानव:।
निसर्ग: य निसृत: स निसर्ग: इत्यादि
संस्कृतजन्य होने के कारण, हिन्दी को भी यह गुण प्राप्त है। यह गुण इसे वैश्वीकरण से भी ऊपर उठाता है।

 

साभार-   डॉ. मधुसुदन झवेरी

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14 Responses to "हिन्दी का भाषा वैभव तथा महत्व"

[...] हिन्दी का भाषा वैभव तथा महत्व [...]

sab kuch tatti tha….chutiya

HINDI KA MAHATVA CHAIYE!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

very good

but anser to question

hindi bhasha ka hamein samaan karna chaiye

Doctor saheb ko namaskar hai ..Sastang naman hai..itni klisht Hindi likhne evam hame saral bhasha mei samjhane hetu

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