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Archive for सितम्बर 4th, 2008

जन्म-प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर समही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।

 

जीवन परिस्थितियाँ-धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।

 

शादी-आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, “उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।…….” उसके साथ – साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है “पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।” हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।

 

शिक्षा-अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने – जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।

 

साहित्यिक रुचि-गरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो – तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला। आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद “तिलस्मे – होशरुबा” पढ़ डाली।अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी – बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ – साथ रहा।
 

 

प्रेमचन्द की दूसरी शादी-सन् १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।

 

व्यक्तित्व-सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा “हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात् – पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास 
कह गए हैं, “तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।” कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं “कि जाड़े के दिनों में चालीस – चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।”प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।

 

ईश्वर के प्रति आस्था-जीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे – धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा “तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो – जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।”मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था – “जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।”

 

प्रेमचन्द की कृतियाँ-प्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् १८९४ ई० में “होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात” नामक नाटक की रचना की। सन् १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय “रुठी रानी” नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन् १९०४-०५ में “हम खुर्मा व हम सवाब” नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया। जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।”सेवा सदन”, “मिल मजदूर” तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए “महाजनी सभ्यता” नाम से एक लेख भी लिखा था।
 

 

मृत्यू-सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने “प्रगतिशील लेखक संघ” की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।
 

प्रेमचन्द का लेखन और विभिन्न विषय

प्रेमचन्द ने अपने कथा – साहित्य में ऐसे अनेक विषयों को प्रस्तुत किया है जिनका सम्बन्ध आम जनता से दिखता है। आपके लेखन में प्रगतिशील चिन्तन व्यापक रुप से पाया जाता है। कुछ विषयों का संक्षिप्त विवरण :
सामाजिकता-प्रेमचन्द ने अपने कथा – साहित्य में सामाजिकता पर विशेष जोर दिया। आपने अपनी कृतियों के द्वारा समाज के दबे कुचले लोगों की समस्याओं पर प्रकाश डाला। इस क्षेत्र में आप प्रगतिशील लेखकों के उस्ताद माने जाते हैं। वह जिन्दगी भर ऐसे बहुत से राह-भटकों को रास्ता दिखाते रहे। आपके ख्याल में समाज में आर्थिक समानता होनी चाहिए। सदा दापने पूंजीवादी व्यवस्था की घोर निन्दा करते रहे। उनका मानना यह भी था कि प्रत्येक को श्रम करना चाहिए। आपने अपनी कृतियों द्वारा वर्ण – व्यवस्था की कड़ी निन्दा की है। उन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी त्याग, तप और संयम के साथ बितायी। उन्होंने सामाजिक दायित्वों को सफलतापूर्वक निभाया।
 

 

प्रेमचन्द और मानवतावाद-प्रेमचन्द एक महान दार्शनिक भी थे। उन्होंने अपने समय के सभी धर्मों को अपनी निगाह से परखा था और अन्ततः वे इस फैसले पर पहुंचे थे कि आज धर्म के नाम पर जो कुछ लोग कर रहे हैं वह सब केवल अंधविश्वास है। वह लिखते हैं – “जिस समाज पर एक करोड़ कौतल मूसलचंदों के भरण पोषण का भार हो वह न कंगाल रहे तो दूसरा कौर रहे ………. उसने असली धर्म को छोड़कर, जिसका मूलतत्व समाज की उपयोगिता है, धर्म के ढोंग को धर्म मान लिया है। जबतक वह धर्म का असली रुप ग्रहण न करेगा उसके उद्धार की आशा नहीं” नाममात्र के धर्म को मानने वालों के व्यवहार से तंग आकर उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की परम्परा में मानवधर्म की स्थापना की। उनका मानना था कि वही धर्म सर्वमान्य है जिसमें मानवता की बात कही गयी हो। मैं उसी धर्म का दास हूं जिसमें मानवता को प्रधानता दी गयी है। वह ऐसे देवता, नबी या पैगम्बर को दूर से ही सलाम करते हैं जो मानवता के विरुद्ध कुछ कहता है। कभी इस्लाम का कायल होने वाले प्रेमचन्द बाद में इस बात रुठ गये कि इस्लाम में भी मानवता सिर्फ इस्लाम तक ही सीमित है। उनका मानना था कि इस्लाम भी अन्य धर्मों की तरह गुटबंद है। उन्होंने सभी धर्मों की कमजोरी को देखकर समझकर एक ऐसे धर्म को अपना आदर्श बनाया था जो लोक सेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान, नेकनियति, शरीर और मन की पवित्रता आदि गुणों पर टिका हो।
 

 

बाल – विवाह-प्रेमचन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त इस कुप्रथा को सामाजिक विष कहा है। इसकी निन्दा के लिए कई कहानियों की रचना की। सुभागी, लांछन (मानसरोबर-१) उन्माद (मानसरोवर – २) तथा नैराश्य लीला (मानसरोवर – ३) आदि कहानियों में बाल – विवाह के दुष्परिणामों पर उन्होंने छींटें कसे हैं। इन कहानियों में उन्होंने ऐसे कई चरित्र प्रस्तुत किये हैं जैसे सुभागी ग्यारह साल की उम्र में ही विधवा हो जाती है और नैराश्य लीला की कैलासकुमारी अभी गौना भी नहीं होता है कि वह विधवा हो जाती है। इसके बारे में उन्होंने एक जगह लिखा है कि “पाँच साल के दुल्हे तुम्हें भारत के सिवा और कहीं देखने को नहीं मिलेंगे।”
 

 

विधवाविवाह-प्रेमचन्द के ख्याल से विधवा विवाह समाज के लिए एक अच्छा कारनामा था। इससे सामाजिक बुराईयों को मिटाया जा सकता था। वह कहते थे कि विधवा विवाह समाज के लिए आदर्श है। उनके शब्दों में मैंने एक बोया हुआ खेत लिया तो क्या उसकी फसल को इसलिए छोड़ दूँगा कि उसे किसी दूसरे ने बोया था। वह मानते थे कि वह व्यक्ति जो विधवा से विवाह 
करता है और पति के दायित्वों को जिम्मेदारी समझकर निभाता है वो समाज के लिए आदर्श है।
 

 

नारी : राजनीतिक चेतना-प्रेमचन्द ने बहुत कहानियां ऐसी लिखी जिनका सम्बन्ध राजनीतिक चेतना से है। इनमें कुछ निम्नलिखित हैं : माँ, अनुभव, तावान, कुत्सा, डामुल का कैदी (मानसरोवर – २), माता का हृदय, धिक्कार, लैला (मानसरोवर – ३), सती, (मानसरोवर – ५), राजा हरदोल, रानी सारंधा, जुगनू की चमक (मानसरोवर – ६), जेल, पत्नी से पति शराब की दुकान, समरयात्रा, सुहाग की साड़ी(मानसरोवर – ७), आहुति तथा होली का उपहार (कफन), सती राजा हादौल, रानी सारंधा, विक्रमादित्य का तेगा लेला आदि कहानियों के माध्यम से इतिहास की छाया में भारत इतिहास प्रसिद्ध नारियों के चरित्र उभारकर प्रेमचन्द ने नारी – जाति में राष्ट्रीय चेतना उभारने का विशेष प्रयास किया है। ‘सती’ कहानी एक ऐसी कहानी है जिसे नारी जाति में राष्ट्रीय चेतना जगाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी माना गया है। गाँधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में नारियों के सहयोग और जवान युवक – युवतियों के मन तरंगित हो रही राजनीतिक चेतना के अनुभव को प्रेमचन्द ने अपनी कहानी में प्रस्तुत किया है।
 

 

नारी शिक्षा-नारी शिक्षा की दिशा में प्रेमचन्द की अवधारणा यह थी कि स्रियों को शिक्षित किया जाय और उनको वह सभी अधिकार दिये जायें जो पुरुषों को प्राप्त हैं। अधिकार दिये जाने के साथ – साथ उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें ऐसी कोई पाश्चात्य पद्धति में न जाने दिया जाए जिससे वह विलास बन जाए और अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए। उन्होंने विलासिता को बुरा नहीं कहा बल्कि राजनीतिक दृष्टि से पराधीन तथा आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हुए भारत के युवकों और युवतियों का अपने देश और समाज की स्थिति को भूलकर अंग्रेजी पद्धति की नकल करना प्रेमचन्द को क्षुब्ध करता था।
 

 

पुरुषनारी समानता-आपकी कहानी ‘शान्ति’, ‘झांकी’, ‘शिकार (मानसरोवर न० १), कुसुम, ‘जीवन का शाप’, ‘गृह – नीति’ (मानसरोवर न० २), लाछन (मानसरोवर – ५), तथा रहस्य कहानियाँ ऐसी हैं जहाँ वे पुरुष की भांति नारी की भी स्वतंत्रता चाहते हैं। उनका मानना था कि अगर पुरुष नारी का गुलाम नहीं है तो वह भी पुरुष की लौंडी नहीं है। और अगर पुरुष उसका गुलाम है तो नारी भी उसकी लौंडी है। दोनों बराबर है।
 

 

छुआछूत और प्रेमचन्द-छुआछूत के बारे में गाँधी जी ने कहा था, “अस्पृश्यता हिन्दू धर्म का अंग नहीं है, बल्कि उसमें घुसी हुई सड़न है, बहम है, पाप है, और उसको दूर करना एक – एक हिन्दू का धर्म है, उसका परम कर्तव्य है।गाँधी जी सभी वर्गों के समर्थन के चक्कर में छुआछूत की लड़ाई से भटक गए। लेकिन प्रेमचन्द ने गाँधीजी से प्रेरणा लेकर इस लड़ाई में कूदे थे अतः अंततः निन्दा करते रहे। गाँधीजी के खिलाफ जन्मों से नहीं बल्कि कर्मों के आधार पर जाति को माना। प्रेमचन्द इस मामले में गाँधी जी से आगे थे।

 

 
धार्मिक सहिष्णुता एवं गाँधीजी-प्रेमचन्द कहते हैं – “मैं एक इन्सान हूँ और जो इन्सानियत रखता हो, इन्सान का काम करता है, मैं वही हूँ और ऐसे ही लोगों को चाहता हूँ। प्रेमचन्द साम्प्रदायिकता को ऐसा पाप मानते हैं जिसका कोई प्रायश्चित नहीं। अतः व्यक्तिगत रुप से वे इस कम्यूनल प्रोपगंडा का गोरों का गोरों से मुकाबला करने के लिए तैयार थे। इस सम्बन्ध में प्रेमचन्द की दृष्टि पूर्ण वैज्ञानिक रही है। वे कहते हैं कि मैं उस धर्म को कभी स्वीकार नहीं करना चाहता जो मुझे यह सिखाता हो कि इन्सानियत, हमदर्दी और भाईचारा सब-कुछ अपने ही धर्म वालों के लिए है और उस दायरे के बाहर जितने लोग हैं सभी गैर हैं, और उन्हें जिन्दा रहने का कोई हक नहीं, तो मै उस धर्म से अलग होकर विधर्मी होना ज्यादा पसंद कर्रूंगा। प्रेमचन्द का मानना था कि साम्प्रदायिक झगड़ा ज्यादातर मामलों में राजनीतिक हित साधने के लिए राजनीतिक पार्टियाँ करती हैं। वह छोटे – छोटे झगड़ों को बड़ा रुप देकर बड़ा बना देंगे और अपना उल्लू सीधा करते हैं।
 

 

साम्प्रदायिकता और प्रेमचन्द-प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए अपनी अनेक कहानियों में साम्प्रदायिक झगड़े की बुराई और परिणामों का उल्लेख किया। मुक्तिधन, क्षमा, (मानसरोवर-३) स्मृतिका, पुजारी (मानसरोवर-४) मंत्र हिंसा परमो धर्म (मानसरोवर-५) जिहाद (मानसरोवर-७) ब्रह्म का स्वांग तथा खून सफेद (मानसरोवर-८) ये ऐसी कहानियां हैं जिसके माध्यम से प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक वैषम्य के स्वर को दूरदराज तक पहुंचाने की कोशिश की है। ‘मंत्र’ कहानी में उन्होंने एक ऐतिहासिक घटना को माध्यम बनाया कि जब १९२०-२२ ई० में हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित हुई तो चारों तरफ लोग खुश हो गए। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक न रह सकी क्योंकि इसको भंग करने की साजिश ब्रिटिश शासकों के द्वारा होने लगी वह भंग भी कर दिया गया। ‘मुक्तिधन’ रहमान के द्वारा गाय के प्रति प्रेम दिखाकर हिन्दू-मुस्लिम सोहार्द बनाए रखने का प्रयास किया गया है।हिंसा परोधर्मः के माध्यम से धर्म के नाम पर सारे देश में फैली ऐसी अराजकता को प्रस्तुत किया है जिसके सुनने या पढ़ने से दिल तार-तार होने लगता है। वे कहते हैं कि सत्य, अहिंसा, प्रेम तथा न्याय धर्म से गायब होने लगे थे। हर तरफ असत्य, हिंसा और द्वेष ही छा गया था। इन सब का कारण वह ब्राह्मणों और मौलवियों को मानते थे। उनके ख्याल से ऐसे लोगों ने अपने स्वार्थ को साधने के लिए धर्म का प्रयोग शुरु कर दिया है। वह मानते थे कि सभी धर्म को तिलांजली देकर मानव-धर्म को अपनाया जाए। जिसमें प्रेम, अहिंसा और एक दूसरे के दुख-दर्द को समझने और बांटने का पूरा अवसर हो। उनका कहना था कि उस मजहब या धर्म के सामने माथा झुकाने से क्या लाभ मिलेगा जिस धर्म में निष्क्रियता ने घर कर लिया हो जो धर्म केवल अपने को ही जीना सिखाता हो।

इस महान साहित्यकार ने सदा मानव धर्म को ही शीर्षस्थ स्थान प्रदान किया। उनके अनुसार इस धर्म के अंतर्गत मनुष्य का मनुष्य रहना अनिवार्य है। परोपकार के लिए कुछ त्याग भी करना पड़े तो वह आत्मा की हत्या नहीं है। प्रेमचन्द के जीवनदर्शन का मूलतत्व मानवतावाद है। वह मानवतावाद को सबसे पहले मानते थे। वही मानवता वाद जो मनुष्य की तरफदारी करने वाला हो।

 

प्रेमचन्द द्वारा रुढ़ीवाद का विरोध

जिस समय प्रेमचन्द का जन्म हुआ वह युग सामाजिक – धार्मिक रुढ़ीवाद से भरा हुआ था। इस रुढ़ीवाद से स्वयं प्रेमचन्द भी प्रभावित हुए। जब आपने कथा-साहित्य का सफर शुरु किया अनेकों प्रकार के रुढ़ीवाद से ग्रस्त समाज को यथा शक्ति कला के शस्र से मुक्त कराने का संकल्प लिया। अपनी कहानी के बालक के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि “मैं निरर्थक रुढियों और व्यर्थ के बन्धनों का दास नहीं हूँ।”
 
समाज में व्यप्त रुढियाँ-सामाजिक रुढियों के संदर्भ में प्रेमचन्द ने वैवाहिक रुढियों जैसे अनमेल विवाह, बहुविवाह, अभिभावकों द्वारा आयोजित विवाह, पुनर्विवाह, दहेज प्रथा, विधवा विवाह, पर्दाप्रथा, बाल विवाह, वृद्धविवाह, पतिव्रत धर्म तथावारंगना वृद्धि के संबंध में बड़ी संवेदना और सचेतना के साथ लिखा है।तत्कालीन समाज में यह बात घर कर गई थी कि तीन पुत्रों के बाद जन्म लेने वाली पुत्री अपशकुन होती है। उन्होंने इस रुढि का अपनी कहानी ‘तेंतर’ के माध्यम से कड़ा विरोध किया है। होली के अवसर पर पाये जाने वाली रुढि की निन्दा करते हुए वह कहते हैं कि अगर पीने – पिलाने के बावजूद होली एक पवित्र त्योहार है तो चोरी और रिश्वतखोरी को भी पवित्र मानना चाहिए। उनके अनुसार त्योहारों का मतलब है अपने भाइयों से प्रेम और सहानुभूति करना ही है। आर्थिक जटिलताओं के बावजूद आतिथ्य – सत्कार को मयार्दा एवं प्रतिष्ठा का प्रश्न मान लेने जैसे रुढि की भी उन्होंने निन्दा की है।
 

 

धार्मिक रुढियाँ-प्रेमचन्द महान साहित्यकार के साथ – साथ एक महान दार्शनिक भी थे प्रेमचन्द की दार्शनिक निगाहों ने धर्म की आड़ में लोगों का शोषण करने वालों को अच्छी तरह भाँप लिया था। वह उनके वाह्य विधि – विधानों एवं आंतरिक अशुद्धियों को पहचान चुके थे। इन सब को परख कर प्रेमचन्द से प्रण ले लिया था कि वह धार्मिक रुढिवादिता को खत्म करने का प्रयास करेंगे। वह मानते थे कि धार्मिक रुढियों का कारण ब्राह्मण और मंदिर हैं। उन्होंने यहीं से अपना अभियान शुरु किया। इसके लिए कई कहानियाँ लिखी गई। जैसे – रामलीला, निमंत्रण, हिंसा परमो धर्मः (मानसरोवर-५) मनुष्य का परम धर्म – गुरुमंत्र, बाबाजी का भोग तथा पंडित मोटेराम की डायरी। पंडित मोटेराम की डायरी का एक अंश प्रस्तुत है: -“क्या नाम है कि मैं पंडित मोटेराम …….. बात करने में मैं पक्का फिकेत हूँ। बस यही समझलो कि कोई निमन्त्रण भर दे दे, फिर मैं अपनी बातों से ऐसा ज्ञान घोलता हूँ, वेद – शास्रों की ऐसी व्याख्या करता हूँ कि क्या मजाल कोई यजमान उल्लू न हो जाय। योगासन, हस्तरेखा, सन्तान शास्र, वशीकरण आदि सभी विधाएं जिन पर सेठ महाजनों का पक्का विश्वास है, मेरी जिह्मवा पर है। अगर पूछो कि क्यों पंडित मोटेराम शास्री, आपने इन विधाओं को पढ़ा भी है? मैं डंके की चोट के साथ कहता हूँ कि मैंने कभी नहीं पढ़ा। इन विधाओं का क्या रोना हमने कभी विद्या नहीं पढ़ी है। पूरे लंठ हैं, निरक्षर महान, लेकिन फिर भी किसी बड़े से बड़े पुस्तक – चाटू, शास्रघोटूँ पंडित का सामना करा दो, चपेट न दूँ तो मेरा नाम मोटेराम नहीं। ऐसा रऐटूं कि पंडित जी को भागने का भी रास्ता न मिले। पाठक कहेंगे यह असंभव है कि एक पूर्ख आदमी महान पंडित कैसे खोदेगा। मैं कहता हूँ प्रियवर, पुस्तक चाटने से कोई विद्वान नहीं हो जाता है। जो विद्वान आज इस युग में श्राद्ध, पिण्डदान और वर्णाश्रम में विश्वास रखता है, जो आज गोबर और गोमूत्र को पवित्र समझता है, जो देवपूजा को मुक्ति का साधन समझता है, वह विद्वान कैसे हो सकता है। मैं खुद यजमानों से यह सब कृत्य करवाता हूँ। नि:संदेह जानता हूँ, हलवा और कलाकन्द किसी आत्मा के पेट में नहीं, मेरे पेट में जाता है फिर भी यजमानों को मुड़ता हूँ। क्योंकि यह मेरी जीविका है। यजमान स्वयं बेवकूफ बनते हैं पाँच पैसे का गऊदान करके भवसागर पार उतरना चाहता है। उसे मैं कैसे मना करुँ कि यह उनके लिए मि है।”

प्रस्तुत आत्मकथा से ब्राह्मणों के गादड़ चिट्ठा खुलकर सामने आ गए हों और इससे धार्मिक रुढियों को भी आघात पहुंचाया है। तत्कालीन समाज में व्याप्त रुढि मृतक भोज पर प्रेमचन्द कह गये हैं कि यह कैसी परम्परा है कि मरने के बाद परिवार के बचे हुए लोग मृतक भोज करवायें। जबकि जाने वाला अपने पीछे फूटी कौड़ी भी नहीं छोड़ कर गया है। परिवार में इतना पैसा नहीं है कि वह अपने बच्चों को पालन-पोषण के साथ-साथ पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा कर सके। 

बिरादरी के सरगने विधवा पत्नी के पास बचे आभूषण और मकान के बलबूते पर ही सही मगर वह मृतक के परिवार से हर हाल में मृतक भोज चाहते हैं क्योंकि यह उनके नाक के कट जाने जैसा है। सरगने की बात मानकर या दबाव में आकर बेचारा परिवार मृतक भोज देने के लिए तैयार हो जाता है और सालों तक कर्ज में डूबा रहता है। यह धार्मिक रुढ़ी धर्म की आड़ में ही हुआ करती है।

प्रेमचन्द जैसा महान साहित्यकार एवं दार्शनिक यह मानता है कि नेकी और बदी की सबसे बड़ी पहचान व्यक्ति का अपना दिल है। दिल जिस काम को बुरा कहता हो वह काम हर हाल में बुरा है और जिस काम को अच्छा कह दे वह काम हर हाल में अच्छा है। 

प्रेमचन्द स्वर्ग – नरक के बारे में कहते हैं कि स्वर्ग – नरक की चिंता में वह लोग रहते हैं जो अपाहिज, कर्त्तव्यहीन एवं निर्जीव होते हैं। मनुष्य का स्वर्ग – नरक सब इसी पृथ्वी पर है। उनके अनुसार पुनर्जन्म गोरखधंधा तथा धोखे में डालने वाला है।

शोषण

प्रेमचन्द और शोषण का बहुत पुराना रिश्ता माना जा सकता है। क्योंकि बचपन से ही शोषण के शिकार रहे प्रेमचन्द इससे अच्दी तरह वाकिफ हो गए थे। समाज में सदा वर्गवाद व्याप्त रहा है। समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को किसी न किसी वर्ग से जुड़ना ही होगा।प्रेमचन्द ने वर्गवाद के खिलाफ लिखने के लिए ही सरकारी पद से त्यागपत्र दे दिया। वह इससे सम्बन्धित बातों को उन्मुख होकर लिखना चाहते थे। उनके मुताबिक वर्तमान युग न तो धर्म का है और न ही मोक्ष का। अर्थ ही इसका प्राण बनता जा रहा है। आवश्यकता के अनुसार अर्थोपार्जन सबके लिए अनिवार्य होता जा रहा है। इसके बिना जिन्दा रहना सर्वथा असंभव है। वह कहते हैं कि समाज में जिन्दा रहने में जितनी कठिनाइयों का सामना लोग करेंगे उतना ही वहाँ गुनाह होगा। अगर समाज में लोग खुशहाल होंगे तो समाज में अच्छाई ज्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा। प्रेमचन्द ने शोषितवर्ग के लोगों को उठाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने आवाज लगाई “ए लोगों जब तुम्हें संसार में रहना है तो जिन्दों की तरह रहो, मुर्दों की तरह जिन्दा रहने से क्या फायदा।”प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों में शोषक – समाज के विभिन्न वर्गों की करतूतों व हथकण्डों का पर्दाफाश किया है। ये निम्नलिखित हैं: — ग्राम एवं नगर के महाजन
– सामंतवाद के प्रतिनिधि – जमींदार
– पूँजीवाद के प्रतिनिधि – उद्योगपति
– सरकारी अर्धसरकारी अफसर

प्रेमचन्द ने अपनी कहानियाँ नशा, पूस की रात (मानसरोवर-१), पछतावा (मानसरोवर-६), जेल, (मानसरोवर-७) बेटी का धन, बलिदान, विध्वंस तथा उपदेश (मानसरोवर-८) ‘नशा’ कहानी में जमींदार को हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्ष की चोटी पर फूलने वाला बुंआ कहा है और यह कहा है कि ईश्वर ने असामियों को इनका काम करने और सेवा करने के लिए ही पैदा किया है। ‘पूस की रात’ का ‘हलकू’ उस किसान का प्रतीक है जो सबको खिलाता और पहनाता है मगर स्वयं रात में जाड़े में नंगे ठिठुरने पर मजबूर है। मजदूरी करके हलकू अपनी माल गुजारी भरता है। इस प्रकार के बहुत से किसान हैं जो मजदूरी करके मालगुजारी भरा करते हैं। उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खाता है। हर कोई अपने-अपने वर्ग के लिए मरता है।

प्रेमचन्द के कहानी साहित्य में राष्ट्रीयता का स्वर सबसे ज्यादा मुखर है। उस युग के स्वतंत्रता आंदोलन ने ही प्रेमचन्द जैसे संवेदनशील कलाकारों में राष्ट्रीयता जैसा प्रबल भाव डाला था। प्रेमचन्द गाँधी जी से बहुत प्रभावित हुए थे और राष्ट्रीयता के क्षेत्र में उन्हें अपना आदर्श मानकर चले थे। माँ, अनमन, दालान (मानसरोवर-१) कुत्सा, डामुल का कैदी (मानसरोवर-२) माता का हृदय, धिक्कार, लैला (मानसरोवर-३) सती (मानसरोवर-५) जेल, पत्नी से पति, शराब की दुकान जलूस, होली का उपहार कफन, समर यात्रा सुहाग की साड़ी (मानसरोवर-७) तथा आहुति इत्यादि वे कहानियाँ हैं जिनमें राष्ट्रीयता के विष्य को प्रमुखता से डाला गया है। 

इन कहानियों ने प्रेमचन्द ने एक इतिहासकार की भांति राष्ट्रीय आंदोलन के चित्र खींचे हैं। गाँधी जी से प्रेमचन्द काफी प्रभावित थे। उन्होंने विश्वास जैसी कहानी के माध्यम से गाँधी जी के आदर्शों को लोगों के सामने प्रस्तुत किया।

प्रेमचन्द के मानस में भारतीय संस्कार अपेक्षाकृत अधिक प्रबल थे। विदेशी सभ्यता, संस्कृति आचरण एवं शिक्षा के प्रति उनकी आस्था दुर्बल थी। प्रेमचन्द को अपने देश और यहाँ की चीजों से अथाह प्रेम था।


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