शब्दशिल्पी

Archive for अक्टूबर 2008

आचार्य पं.  रामचन्द शुक्ल हिन्दी समीक्षा के प्रथम व्यवस्थित आचार्य हैं। उन्होंने अपनी समीक्षा के जितने भी प्रतिमान गढ़े हैं, वे भारतीय काव्य-शास्त्र, पाश्चात्य काव्य-शास्त्र आदि से सम्पॄक्त होने के साथ-साथ भारतीय भक्ति-शास्त्र से सबसे ज्यादा अनुप्राणित हैं । सह्रदयता का मानदंड, या लोकमंगल का मानदंड, भक्ति साहित्य से (विशेषत: मर्यादावादी राम-भक्ति से और उसके अग्रदूत तुलसी से) नि:सॄत हैं । शुक्ल जी के बाद, उनके मध्यकालीन काव्य के विश्लेषण को लेकर बहुत समीक्षाएं लिखी गयी हैं। कहीं इतिहास का आधार लेकर,काल वर्गीकरण के औचित्य का प्रश्न उठाया गया है तो कहीं कबीर, बिहारी और घनानंद को लेकर उनके द्वारा प्रदर्शित उपेक्षा तथा किये अधूरे मूल्यांकन की शिकायतें की गयी है । आज तक की जा रही इन सारी कोशिशों के बावजूद,आज भी हिन्दी-समीक्षा शुक्ल जी द्वारा स्थापित प्रतिमानों के इर्द-गिर्द मंडरा रही हैं । इसका कारण शुक्ल जी की समीक्षा की पूर्णता है।
हिन्दी-निरगुण काव्य में कबीर से आगे जाकर, कॄष्ण-काव्य मंसूर से आगे जाकर और रामकाव्य में तुलसी से आगे जाकर, कुछ खास विशेषता प्रदर्शित करना संभव नहीं था, इसलिए नवीनता के आकांक्षियों ने बाद मे निर्गुण काव्य की भास्वरता को सगुण रीतियों से ग्रस्त कर दिया था । राधाकॄष्ण के विपिनविहारी उन्मुक्त राग को महल विहारी नायक-नायिकाओं में परिणत कर दिया था मर्यादाशील राम को सरयू के कुंजों में काम के लिमग्न चित्रित कर दिया था, उसी तरह से शुक्ल जी ने विषय पर जितना कुछ लिखा है, उससे आगे जाकर उससे ज्यादा कारगर प्रतिमानों के निर्माण में अक्षम होने के कारण, कभी किसी अनामाभिन्न परंपरा की खोज के नाम पर, कभी भारतीय चिंता धारा के स्वभाविक विकास-क्रम से शुक्ल जी के अपरिचय के नाम पर, तो कभी काव्य-शास्त्रीय कला वाद के नाम पर, बहुत कुछ खींचतान का काम हो रहा है ।
शुक्ल जी के अनुसार, “भक्ति धर्म का प्राण है। वह धर्म की रसात्मक अभी-व्यक्ति हैं ।” `भक्ति के विकास’ शीर्षक अपने निबंध में (सूरदास,पॄ.  1-46) शुक्ल जी ने भारतीय चिंताधारा के स्वाभाविक विकास का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण किया था । वैदिक बहुदेवोपासना के बीच एकत्व की प्रतिष्ठा, यज्ञों के विधान के साथ- साथ ह्रदय की रागात्मकता से युक्त तमाम औपनिषदिक और तमाम वैदिक चर्चाओं का विश्लेषण करते हुए शुक्ल जी ने भक्ति के संदर्भ मे भारतीय चिंता धारा के स्वाभाविक विकास की विस्तॄत छानबीन की है । विस्तॄत विश्लेषण के बाद उन्होंने निष्कर्ष दिया हैं, “धर्म का प्रवाह कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीन धाराओं में चलता है । भक्ति धर्म का प्राण है। वह उसकी रसात्मक अभी-व्यक्ति है । भक्ति के क्षेत्र में धर्म प्यार से पुकारने वाला पिता है । उसके सामने भक्त भोले-भाले बच्चों के समान जाता है। कभी उसके ऊपर लोटता है, कभी सिर पर चढता है और पकड़ लेता हैं ।”.
हिंन्दी-साहित्य के आदि काव्य की सामग्री के विश्लेषण में शुक्ल जी ने वीर, नीति और श्रॄंगार परक रचनाओं की सामग्री की प्राप्ति के साथ-साथ धर्म के साहित्य की प्राप्ति को भी स्वीकार किया हैं। लेकिन भक्ति-काव्य की उत्पत्ति जन्य परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा, “देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिंदू जनता के ह्रदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश नही रह गया । इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के पीछे हिंदू जन समुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी छायी रही । अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?”.
आचार्य शुक्ल की इस स्थापना का अत्यंत तीक्ष्ण खंडन, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया था । द्विवेदी जी के अनुसार, “इस्लाम जैसे सुगठित, धार्मिक और सामाजिक मतवाद से इस देश का पाला नहीं पड़ा था, इसीलिए नवगत समाज की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक गतिविधि,इस देश के ऐतिहासिक का सारा ध्यान खींच लेती हैं । यह बात स्वाभाविक तौर पर उचित नहीं है। दुर्भाग्यवश हिंदी साहित्य के अध्ययन और लोक चक्षुगोचर करने का भार जिन विद्वानों ने अपने ऊपर लिया है, वे भी हिंन्दी साहित्य का संबंध, हिंदू जाति के साथ ही अधिक बतलाते हैं और इस प्रकार अनजान आदमी को दो ढंग से सोचने का मौका देते हैं । एक यह कि हिंदी साहित्य,एक हतदर्प पराजित जाति की संपत्ति हैं । वह एक निरंतर पतन-शील जाति की चिंताओं का मूल प्रतीक हैं । मैं इस्लाम के महत्त्व को भूल नहीं पा रह हूँ लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूं कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बाहर आना वैसा ही होता जैसा आज हैं । यह बात अत्यंत उप हासास्पद है कि जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मंदिर तोड़ रहे थे तो उसी समय अपेक्षाकॄत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की ।मुसलमानों के अत्याचार के कारण यदि भक्ति की भावधारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिंध में फिर उत्तर-भारत में प्रकट होना चाहिए था, पर वह प्रकट हुई दक्षिण में ।”.
आदि काल की साहित्यिक सामग्री के विश्लेषण में, धार्मिक साहित्य की प्राप्ति के बावजुद, भक्ति काव्य के विश्लेषण में यदि शुक्लजी इस्लाम के आगमन को एक महत्त्वपूर्ण उपादान मानते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे इस्लाम के आक्रमण को “भक्ति की भावधारा के उमड़ने का” मूल कारण मानते हैं । वस्तुत: शुक्ल जी भारतीय जन-जीवन की विश्रंखलता देख रहे थे । योगियों ने, तांत्रिकों ने, उसे नाना भांती नचाया  और फंसाया था । तीर्थ, व्रत, ग्रंथ, उपवास आदि का खंडन करके किसी ने उसे पिंड में ही ब्राह्मांड और ब्रह्म को खोजने की सलाह दी थी तो किसी ने मंत्रों के चमत्कार का गान किया था । जनता ने सबको सुना था, सबकापालन किया था, लेकिन उसने देखा कि पुरा -का- पुरा समाज जंजीरों में जकड़ता चला गया, मंदिर टूट रहे हैं, मठ ढहाये जा रहे हैं, योगी खदेड़े जा रहे हैं और सारे साधन काम नहीं आ रहे हैं, समूचे समाज को संचालित करने वाला कोई मूल तत्त्व नहीं रह गया हैं, जब उसका ध्यान भक्ति की ओर केन्द्रित होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस हताश में और इस निराशा में कोई नीलोत्पन श्याम होना चाहिए, जिस पर हमारी कामना की गोपियां न्योछावर हो सकें । कोई रणरंगधीर, वनवास का वरण करने वाला राम होना चाहिए जो अत्याचार, अनाचार,पापाचार के विरुद्ध खड़ा होकर घोषणा कर सके-`निशिचर हीन करौ मही’-जो गीध को, शबरी को, केवट को, शिलाबनी अहल्या को, समाज के हर पीड़ित, दलित और उपेक्षित वर्ग को अपनी करुणा से सराबोर कर सके, जो ऋषियों को अपने धनुष की छाया दे सके और आश्वस्त करते हुए कहे, “निर्भय यज्ञ करहु तुम्हरे साईं” तत्कालीन समाज की अपेक्षा का दबाव ही वह मूल कारण है जिससे प्रेरित होकर शुक्लजी भक्ति की सामाजिक भूमिका को विशेष आदर देते हैं।
भक्ति की दो धारणाएं हैं एक धारणा के अनुसार वह ईश्वर से परम अनुरिक्त है । इस धारणा के बलवान होने पर, भक्ति एकान्तिक राग अधिष्ठान बन जाती है । दूसरी धारणा के अनुसार भक्ति का अर्थ है ईश्वर के कार्यो में हिस्सा लेना (टू पार्टीसिपेट इन द वर्क आफ गाड-आनंद कुमार स्वामी)। इसी धारणा के अनुसार विभक्ति शब्द में भक्ति कार्य करती है । काव्य-शास्त्रीय ग्रंथों में `हिस्सा लेने’ के गुण के कारण ही `लक्षणा’ को भक्ति कहा गया है । आचार्य शुक्ल ने इसी द्वितीय धारणा को भक्ति का वास्तविक क्षेत्र घोषित किया है । उन्होंने भक्तों के समक्ष, एक मूर्ति विशेष को स्थान देने के साथ-साथ, ईश्वर के परम विराट (लेकिन परम यथार्थ)रुप की प्रतिष्ठा की है । तुलसी, शुक्ल जी को अकारण ही प्रिय नही है । दशरथनंदन श्रीराम को व्रह्म मानने का अतिशय आग्रह करने वाले तुलसीदास का वक्तव्य है कि भगवान का अनन्य सेवक वह है, जो यह मानता है कि यह चराचर, जड़चेतनमय जगत, ईश्वर का रुप है और मैं इस ईश्वर-रुपी जगत का सेवक हूँ :
सो अनन्य जाके असि मति न टरिअ हनुमंत ।
मैं सेवक सचराचर रुप स्वामि भगवंत ।।
इतना सब होने के बाबजूद (भारतीय चिंताधारा के स्वाभाविक विकास से पूर्णत: परिचित होने के बावजूद) शुक्ल जी जब इस्लाम के आगमन को महत्त्वपूर्ण मानते हैं तो इसका कुछ अर्थ होना चाहिए । मेरी समझ से इसका अर्थ यह है कि शुक्ल जी इस्लाम के आगमन को, भक्ति के प्रवाह के उजड़ने का `त्वराकारककरण’ मानते हैं । भारतीय चिंताधारा का शास्त्रीय एवं लोकोन्मुखी प्रवाह जिधर जा रहा था, उसकी स्वाभाविक परिणति भक्ति में ही थी, लेकिन इस्लाम जैसे सुसंगठित धार्मिक मतवाद के आक्रमण ने उसमे उसी त्वरा का काम था,जिस त्वरा का काम द्वितीय विश्व-युद्ध ने भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति में किया था । धार्मिक साहित्य आदिकाव्य में था हीं । इस्लाम ने जब परिस्थितियों को बदल दिया तो फिर वीर-काव्य से प्रवॄत्ति हट गयी । मन धार्मिक साहित्य पर जाकर टिक गया ।
आदिकाव्य में धार्मिक साहित्य की धारा प्रमुख नहीं थी, इधर उसी की प्रमुखता हो गयी । वीर-गाथाओं के सॄजन के मूल में, इस्लाम द्वारा उत्पन्न नवीन परिस्थिति ही थी। युद्धरत राजाओं के दरबारी कवि उनकी वीरता का बढ़ा-चढ़ा कर गान कर रहे थे । जब परिस्थिति पराजय में परिणत हो गयी तो वीरगाथाएं कम होते-होते लुप्त हो गयी और आदिकाव्य की धार्मिक काव्य धारा, भक्ति काव्य के रुप में फूट पड़ी । शुक्ल जी का यही कहना है कि ईश्वर के अलावा और कहीं आश्रय-प्राप्ति की संभावना नहीं थी । शुक्ल जी एक ब्रह्म त्वराकारककरण’ के रुप में इस्लाम को पहचान रहे हैं । उनका वक्तव्य न तो उपहासास्पद है और न भारतीय चिंताधारा के स्वाभाविक विकास से अपरिचित होने के कारण ही है ।
शुक्ल जी ने भक्ति काव्य की समस्त काव्यधाराओं का पूर्ण आकलन एवं मूल्यांकन किया है । निर्गुण काव्यधारा ने जातिहीन, वर्गहीन,कर्मकांडहीन, आडंबर-हीन भक्ति-पद्धति का प्रचार करके, समाज के पिछड़े वर्ग के एक बहुत बड़े हिस्से को संभाल लिया था, शुक्ल जी ने इसके लिए कबीर की बड़ी सराहना की है । कॄष्ण-भक्ति काव्य के उच्छल राग की गहराई (श्रॄंगार और वात्सल्य के कुरुक्षेत्र में विशेष रुप से) का उन्होंने पूर्णरुपेण महत्त्वांकन किया है । सूफी काव्य-धाराके अवदान को उन्होंने पूर्णरूपेण स्वीकारा । हाँ शुक्ल जी, राम-भक्ति की मर्यादावादी धारा के प्रति विशेष अभिरूचि रखने के कारण, राम-भक्ति में प्रवाहित रसिक संप्रदाय को स्वीकार नहीं कर सके । इस पर उन्होनें अपना आक्रोश व्यक्त किया है । इसे वे कॄष्ण भक्ति का अनुकरण मानते थे । रसिक संप्रदाय द्वारा उल्लिखित प्राचीन ग्रंथो को वे जाली मानते थे ।
अयोध्या के कुछ खास लोगों द्वारा अचानक किसी प्राचीन पांडु-लिपि की अन्वेषण को वे संदेह की दॄष्टि से देखते थे । शुक्ल जी को इसके लिए यदि कोई दोषी कहना चाहे तो कह सकता है । लेकिन शुक्ल जी के आदर्श रामराज्य के निर्माता श्रीराम की बांकी अदा, तिरछी चितवन, उनके द्वारा सीता की नीबी खोलने की बरजोरी, उनकी रस लंपटता, झाऊ के झुरमुट में उनके द्वारा स्वच्छंद परकीया-विहार आदि का चित्रण उनके मर्यादाशील मानस को भला नहीं लगता था । इन बातों को वे लीला पुरूषोत्तम के साथ स्वीकार करते थे लेकिन मर्यादा पुरूषोत्तम के साथ नहीं । कुछ लोगों की मान्यता हैं कि भक्ति के लिए तन्मयता आवश्यक है । इस तन्मयता काम, क्रोध, वैर, भय आदि भावों के द्वारा भी प्राप्त की जा सकती हैं। भागवत् में एक स्थान पर स्वीकार किया गया है—काम, क्रोध, भय आदि के द्वारा ईश्वर से जितनी तन्मयता प्राप्त की जा सकती है, उतनी भक्ति द्वारा भी नहीं । काम से गोपियों ने, क्रोध से कंस ने और वैर से शिशुपाल ने तन्मयता क्या तदरूपता प्राप्त की थी ।.इस आधार पर राम-भक्ति में भी गोपी भाव का प्रवेश की दॄष्टि से उचित हीं है । यह मात्र व्यक्तिक साधन की विधि हो सकती है । इसमें समुचे समाज की मुक्ति-कामना नहीं है । शुक्ल जी का मर्यादावादी मन ऐसी भक्ति-पद्धति और काव्य-पद्धति का पोषक है, जिसमें “सुरसरि सम कर हित” की कामना भरी हुई हो । शुक्लजी पूरे समाज की मुक्ति चाहते थे । शुक्ल जी का समय भारतीय जनता की मुक्ति-कामना का समय था । गांधी पूरे भारतीय जीवन की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई कर रहे थे । गांधी को भी आदर्श राज्य-व्यवस्था के रुप में रामराज्य ही दिखायी पड़ रहा था । शुक्ल जी ने अपना इतिहास प्रस्तुत करते हुए कहा था कि इसमें जो भी अशु-द्धियाँ हुई हो, उनके लिए क्षमा और जो कमियां रह गयी हों उनकी पूर्ति-कामना के साथ ही मैं अपना श्रम सार्थक समझ सकता हूँ । शुक्ल जी के चिंतन की कमियों (?) को दूर करने के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता है । चालू मूहावरों से यह काम पूरा नहीं होगा । चालू मूहावरों में चिंतन का परिणाम है कि लोगों को भक्ति-धारा में भी उच्च वर्ग और निम्न वर्ग का संघर्ष दिखायी पड़ता हैं ।
“मुक्ति बोध की मुख्य स्थापना यह है कि निचली जातियों के बीच से पैदा होने वाले संतो के द्वारा निर्गुण भक्ति के रुप में भक्ति आंदोलन एक क्रांतिकारी आंदोलन के रुप में पैदा हुआ किंतु आगे चलकर ऊंची-जाति वालों ने इसकी शक्ति को पहचान कर इसे अपनाया और उसे विचारों के अनुरुप ढालकर कॄष्ण और राम की सगुण भक्ति का रुप दे डाला जिससे उसके क्रांतिकारी दांत उखाड़ लिए गये । इस प्रक्रिया में कॄष्ण-भक्ति में तो कुछ क्रांतिकारी तत्त्व बचे रह गये लेकिन रामभक्ति में जाकर तो रहे-सहे तत्त्व भी गायब हो गये । इस विश्लेषण में यह नहीं दिया गया कि निर्गुण भक्ति धारा, सगुण धारासे पूर्ववर्ती नहीं है । दक्षिण के आलवार भक्त सगुण आराधक थे, निर्गुण नहीं । उत्तर भारत में (हिन्दी में) निर्गुण भक्ति काव्य का प्रवाह नामदेव से प्रारंभ हुआ था । नाम-देव पहले सगुणोपासक थे, बिठोवा के भक्त । उन्हें यत्नपूर्वक निर्गुण साधनों की ओर मोड़ा गया था । आलवार भक्त अधिकतर निम्न वर्ग के और सगुणोपासक हैं । नामदेव भी निम्नवर्ग के हैं (दरजी हैं) लेकिन प्रारंभ में वे बिठोवा के भक्त थे उस भक्ति से उन्हें विमुख करने के लिए उनके गुरु को लंबा नाटक करना पड़ा था। अत: निम्न वर्ग के लोगों द्वारा क्रांतिकारी निर्गुण भक्ति के प्रवाह की बात ऐतिहासिक और तात्त्विक दोनों दॄष्टियों से अशुद्ध और अपूर्ण हैं ।
शुक्ल जी मर्यादावादी रामभक्ति के समर्थक हैं इसलिए नहीं कि वह उच्च-वर्णीय तुलसीदास द्वारा प्रचारित हैं बल्कि इसलिए कि उस भक्ति-पद्धति में समस्त समाज के मुक्ति की कामना है । समाज के प्रत्येक वर्ग का कल्याण भरा हुआ है । शुक्ल जी के समस्त प्रतिमान इसी से संपॄक्त हैं।

गुजरात के स्वामी माधवाचार्य (संवत्‌ 1254-1333) ने द्वैतवादी वैष्णव सम्प्रदाय (ब्राह्म सम्प्रदाय) चलाया जिसकी ओर भी लोगों का झुकाव हुआ। इसके साथ ही द्वैताद्वैतवाद (सनकादि सम्प्रदाय) के संस्थापक निम्बार्काचार्य ने विष्णु के दूसरे अवतार कृष्ण की प्रतिष्ठा विष्णु के स्थान पर की तथा लक्ष्मी के स्थान पर राधा को रख कर देश के पूर्व भाग में प्रचलित कृष्ण-राधा (जयदेव, विद्यापती) की प्रेम कथाओं को नवीन रूप एवं उत्साह प्रदान किया। वल्लभाचार्य जी ने भी कृष्ण भक्ति के प्रसार का कार्य किया। जगत्‌प्रसिद्ध सूरदास भी इस सम्प्रदाय की प्रसिद्धि के मुख्य कारण कहे जा सकते हैं। सूरदास ने वल्लभाचार्य जी से दीक्षा लेकर कृष्ण की प्रेमलीलाओं एवं बाल क्रीड़ाओं को भक्ति के रंग में रंग कर प्रस्तुत किया। माधुर्यभाव की इन लीलाओं ने जनता को बहुत रसमग्न किया। इस तरह दो मुख्य सम्प्रदाय सगुण भक्ति के अन्तर्गत अपने पूरे उत्कर्ष पर इस काल में विद्यमान थे – रामभक्ति शाखा; कृष्णभक्ति शाखा।
 
इसके अतिरिक्त भी दो शाखाएँ प्रचलित हुईं – प्रेममार्ग (सूफ़ी) तथा निर्गुणमार्ग शाखा।
 
सगुण धारा के इस विकास क्रम के समानांतर ही बाहर से आए हुए मुसलमान सूफ़ी संत भी अपने विचारों को सामान्य जनता में फैला रहे थे। मुसलमानों के इस लम्बे प्रवास के कारण भारतीय तथा मुस्लिम संस्कृति का आदान-प्रदान होना स्वाभाविक था। फिर इन सूफ़ी संतों ने भी अपने विचारों को जनसाधारण में व्याप्त करने की, अपने मतों को भारतीय आख्यानों में, भारतीय परिवेश में, यहीं की भाषा-शैली लेकर प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया। इनके मतों में कट्टरता का कहीं भी आभास नहीं था। इनका मुख्य सिद्धान्त प्रेम तत्त्व था। यद्यपि प्रेम के माध्यम से ईश्वर को पाने के लिए किए जाने वाले प्रयास – (विधि) में कुछ अन्तर अवश्य था तथापि इनके प्रेम तत्त्व के प्रतिपादन एवं प्रसार शैली ने लोगों को आकर्षित किया। इन्होंने एकेश्वरवाद का प्रतिपादन भी किया जिसे कुछ लोगों ने अद्वैतवाद ही मान लिया, जो कि उचित नहीं है। हज़रत निज़ामुद्दीन चिश्ती, सलीम चिश्ती आदि अनेक संतों ने हिन्दू-मुसलमान सबका आदर प्राप्त किया। इस सूफ़ी मत में भी चार धाराएँ मुख्यत: चलीं-
 
1. चिश्ती सम्प्रदाय 2. कादरी सम्प्रदाय 3. सुहरावर्दी सम्प्रदाय 4. नक्शबंदिया सम्प्रदाय।
 
जायसी, कुतुबन, मंझन आदि प्रसिद्ध (साहित्यकार) कवियों ने हिन्दी साहित्य को अमूल्य साहित्य रत्न भेंट किए। निर्गुणज्ञानाश्रयी शाखा पर भी इनका प्रभाव पड़ा तथा हिन्दू-मुसलमानों के भेद को मिटाने की बातें कही जाने लगीं। आचार्य शुक्ल ने भी इन्हें ‘हिन्दू और मुसलमान हृदय को आमने सामने करके अजनबीपन मिटाने वाला कहा।
 
रामानन्द जी उत्तर भारत में रामभक्ति को लेकर आए थे। उनके सिद्धान्तों में इस भक्ति का स्वरूप दो प्रकार का था – राम का निर्गुण रूप; राम का अवतारी रूप। ये दोनों मत एक साथ ही थे। निर्गुण रूप में राम का नाम तो होता पर उसे ‘दशरथ-सुत’ की कथा से सम्बद्ध नहीं किया जाता। रामानन्द ने देखा कि भगवान की शरण में आने के उपरान्त छूआ-छूत, जाँत-पाँत आदि का कोई बन्धन नहीं रह जाता अत: संस्कृत के पण्डित और उच्च ब्राह्मण कुलोद्‌भूत होने के पश्चात भी उन्होंने देश-भाषा में कविता लिखी और सबको (ब्राह्मण से लेकर निम्नजाति वालों तक को) राम-नाम का उपदेश दिया। कबीर इन्हीं के शिष्य थे। कबीर, रैदास, धन्ना, सेना, पीपा आदि इनके शिष्यों ने इस मत को प्रसिद्ध किया। रामनाम के मंत्र को लेकर चलने वाले अक्खड़-फक्कड़ संतों ने भेद-भाव भुला कर सबको प्रेमपूर्वक गले लगाने की बात कही। वैदिक कर्मकाण्ड के द्वारा फैले हुए आडंबरों एवं बाह्य विधि-विधानों के त्याग पर बल देते हुए राम नाम का प्रेम, श्रद्धा से स्मरण करने की सरल पद्धति और सहज समाधि का प्रसार किया। कबीर में तीन प्रमुख धाराएँ समाहित दिखाई देती हैं –
 
1. उत्तरपूर्व के नाथ-पंथ और सहजयान का मिश्रित रूप 2. पश्चिम का सूफ़ी मतवाद और 3. दक्षिण का वेदान्तभावित वैष्णवधर्म
 
हठयोग का कुछ प्रभाव इन पर अवश्य है परन्तु मुख्यत: प्रेम तत्त्व पर ही बल दिया गया है। सामाजिक सुधार के क्षेत्र में इन संतों का महत्त्वपूर्ण योग रहा है। इन संतों के साहित्य में हमें तत्कालीन युग की सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक समस्त स्थितियों के दर्शन हो जाते हैं। धार्मिक दृष्टि से भी इनका योग बहुत है। सहज प्रेम की भाषा पर बल देने के कारण लोगों का इन पर भी बहुत झुकाव रहा। कबीर कीमृत्यु के कुछ समय बाद इसमें भी सम्प्रदाय की स्थापना हो गई। अन्य शाखाओं के समान इसका महत्व भी भक्तिकाल को पूर्ण बनाने में है।
 
ये चारों शाखाएँ भक्तिकाल या मध्यकाल के पूर्व भाग में अपने उत्कर्ष में थीं। इन चारों ही शाखाओं ने हिन्दी साहित्य को बड़े-बड़े व्यक्तित्व प्रदान किए जैसे – सूर, तुलसी, कबीर आदि । अपने भक्तिभाव की चरम उत्कृष्टता के लिए भी ये जनता के मन-मानस पर आधिपत्य कर सके। आज भी ये श्रद्धा एवं आदर से देखे जाते हैं। यद्यपि कालान्तर में इन सम्प्रदायों में भी अनैतिकता के तत्त्वों के प्रवेश के कारण शुद्धता नहीं रह गई थी तथा इनका पतन भी धीरे-धीरे हो गया था तथापि जो अद्‌भुत मणियाँ इस काल में प्राप्त हुईं, वे किसी भी अन्य काल में प्राप्त नहीं हो सकीं, यह निस्संदेह कहा जा सकता है। भक्तिकाल में हर प्रकार से कला समृद्धि हुई, नवीन वातावरण का जन्म हुआ, जन-जन में भक्ति, प्रेम और श्रद्धा के स्रोत फूट पड़े, ऐसा काल वस्तुत: साहित्येतिहास का “स्वर्णकाल” कहलाने योग्य है।
 
सम्प्रदायों से मुक्त रूप में भी भक्ति का प्रचार था। मीरा, रसखान, रहीम का नाम उतनी ही श्रद्धा से लिया जाता है जितना कि किसी सम्प्रदायबद्ध संत कवि का। इस तरह कहा जा सकता है कि जनता में सम्प्रदाय से भी अधिक शुद्ध भक्ति-भाव की महत्ता थी। ऐकान्तिक भक्ति ने समष्टिगत रूप धारण किया और जन-जन के हृदय को आप्लावित कर दिया।
 
तुलसी की मृत्य (1680 ई.) के कुछ समय बाद ही रीतिकाल के आगमन के चिह्न दिखाई देने लगे थे। राम के मर्यादावादी रूप का सामान्यीकरण करके उसमें भी लौकिक लीलाओं का समावेश कर दिया गया। कृष्ण की प्रेम भक्ति (मूलक) जागृत करने वाी लीलाओं में से कृष्ण की श्रृंगारिक लीलाओं को ग्रहण करके उसका अश्लील चित्रण होने लगा था। यह स्थिति रीतिकाल में अपने घोरतम रूप में पहुँच गई थी। इसीलिए कहा गया था “राधिका कन्हाई सुमरिन को बहानो है।” रामभक्ति का जो रूप तुलसी ने अंकित किया था, यद्यपि वह धूमिल नहीं हुआ तथापि राजाओं के आश्रय में रहने वाले कवियों ने श्रृंगारिकता के वातावरण में उसे विस्मृत कर दिया था। इस तरह धीरे-धीरे ई.1680-90 के आसपास भक्तिकाल समाप्त हो गया।
 
कालांतर में यद्यपि जनता में भक्तिभाव विद्यमान रहे तथापि न तो इस (तुलसी आदि के समान) को महान विभूति पैदा हो सकी और न कोई बहुत अधिक लोकप्रिय ग्रंथ ही लिखा जा सका।
 
भक्ति युग का यह आन्दोलन बहुत बड़ा आन्दोलन था एवं ऐसा आन्दोलन भारत ने इससे पहले कभी नहीं देखा था। इस साहित्य ने जनता के हृदय में श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, जिजीविषा जागृत की, साहस, उल्लास, प्रेम भाव प्रदान किया, अपनी मातृभूमि, इसकी संस्कृति का विराट एवं उत्साहवर्धक चित्र प्रस्तुत किया, लोगों के हृदय में देशप्रेम भी प्रकारंतर से इसी कारण जागृत हुआ।
 
भक्तियुग में इस तरह मुख्यत: भक्तिपरक साहित्य की रचना हुई परन्तु यह भी पूर्णतया नहीं कहा जा सकता कि किसी अन्य प्रकार का साहित्य उस काल में था ही नहीं। यह अकबर का शासन काल था तथा उसके दरबार में अनेक कवि थे। अब्दुर्रहीम खानखाना आदि की राजप्रसस्तिपरक कुछ कविताएँ मिलती हैं। अकबर ने साहित्य की पारम्परिक धारा को भी प्रोत्साहन दिया था अत: काव्य का वह रूप भी कृपाराम की “हिततरंगिणी” बीरबल के फुटकर दोहों आदि में उपलब्ध होता है। इसके अतिरिक्त नीति परक दोहे आदि लिखे गये।
 
एक और महान कवि आचार्य केशव को शुक्ल जी ने भक्तिकाल के फुटकर कवियों में रखा है। यह कार्य उन्होंने केशव के रचनाकाल के आधार पर किया है। केशव की अलंकार, छंद, रस के लक्षणों – उदाहरणों को प्रस्तुत करने वाली तीन महत्त्वपूर्ण रचनाओं – कवि प्रिया, रसिक प्रिया तथा रामचन्द्रिका को भक्ति से भिन्न मान कर भी उन्हें इस युग के फुटकर कवियों में शुक्ल जी ने रखा है परन्तु यह उचित नहीं है। केशव का आचार्यत्त्व पूरे रीतिकाल को गौरव प्रदान करता है। रीति – लक्षण -उदाहरण के निर्धारण की परम्परा भी सर्वप्रथम उन्हीं में दिखाई देती है चाहें रीतिकाल में इस निर्धारण के लिए केशव को रीतिकाल से पृथक करना अनुचित है अत: उन्हें भक्तियुग में रखना उचित नहीं है।
 
भक्तिकाल में ललित कलाओं का उत्कर्ष दिखाई देता है। श्रीकृष्ण-राधा की विभिन्न लीलाओं के चित्र इस काल में मिलते हैं, कोमल एवं सरस भावों को अभिव्यक्त करने वाली अनेक मूर्त्तियाँ इस काल में मिलती है। मूर्तिकला का बहुत विकास इस युग में बहुत अधिक हुआ था। वास्तुकला, चित्रकला में मुस्लिम (ईरानी) शैली का समन्वय भारतीय शैली में हुआ फलत: मेहराबें, गुम्बद आदि का प्रयोग अधिक दिखाई देने लगा। मध्यकाल में राजस्थानी शैली अधिक लोकप्रिय थी। मानवीय चित्रों के अतिरिक्त प्राकृतिक दृश्यों का अंकन, दरबारी जीवन के विविध प्रसंग भी भित्ति चित्र इस युग में प्राप्त होते हैं। ‘कुतुबमीनार’, ‘अढ़ाई दिन का झौंपड़ा’ आदि ऐतिहासिक वास्तुकला के अप्रतिम नमूने हैं।
 
इस तरह साहित्य के साथ ललित कलाओं का विकास भी बहुत अधिक हुआ था। संगीत के क्षेत्र में बहुत प्रगति हुई। कृष्णलीलाओं का गायन, साखी, रमैनी, पद को राग निबद्ध करने की जैसी योजना इस काल में है वैसी अन्यत्र प्राप्य नहीं है। सूर और तुलसी साहित्य में अनेक राग-रागनियों का वर्णन आता है।
 
निष्कर्षत: कह सकते हैं कि भक्ति के उद्‌भव एवं विकास के समय जो कुछ भी भारतीय साहित्य, भारतीय संस्कृति तथा इतिहास को प्राप्त हुआ, वह स्वयं में अद्‌भुत, अनुपम एवं दुर्लभ है। अंतत: हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में कह सकते है – “समूचे भारतीय इतिहास में यह अपने ‘ग का अकेला साहित्य है। इसी का नाम भक्ति साहित्य है। यह एक नई दुनिया है। भक्ति का यह नया इतिहास मनुष्य जीवन के एक निश्चित लक्ष्य और आदर्श को लेकर चला। यह लक्ष्य है भगवद्‌भक्ति, आदर्श है शुद्ध सात्विक जीवन और साधन है भगवान के निर्मल चरित्र और सरस लीलाओं का गान।”

 

भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधारस्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता श्रीवल्लभाचार्य जी का प्रादुर्भाव संवत् 1535, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मणभट्ट जी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से काशी के समीप हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार कहा गया है। वे वेदशास्त्र में पारंगत थे। श्रीरूद्र संप्रदाय के श्रीविल्वमंगलाचार्य जी द्वारा इन्हे अष्टादशाक्षर ‘गोपालमन्त्र’ की दीक्षा दी गई। त्रिदण्ड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेन्द्र तीर्थ से प्राप्त हुई। विवाह पण्डित श्रीदेवभट्टजी की कन्या- महालक्ष्मी से हुआ, और यथासमय दो पुत्र हुए- श्री गोपीनाथ व श्रीविट्ठलनाथ। भगवत्प्रेरणावश व्रज में गोकुल पहुंचे, और तदनन्तर व्रजक्षेत्र स्थित गोव‌र्द्धन पर्वत पर अपनी गद्दी स्थापित कर शिष्य पूरनमल खत्री के सहयोग से संवत् 1576 में श्रीनाथ जी के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। वहां विशिष्ट सेवा-पद्धति के साथ लीला-गान के अंतर्गत श्रीराधाकृष्ण की मधुरातिमधुर लीलाओं से संबंधित रसमय पदों की स्वर-लहरी का अवगाहन कर भक्तजन निहाल हो जाते।
 
श्रीवल्लभाचार्यजी के मतानुसार तीन स्वीकार्य त8व है-ब्रह्म, जगत् और जीव। ब्रह्म के तीन स्वरूप वर्णित है-आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अन्तर्यामी रूप। अनन्त दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को ही परब्रह्म स्वीकारते हुए उनके मधुर रूप एवं लीलाओं को ही जीव में आनन्द के आविर्भाव का स्त्रोत माना गया है। जगत् ब्रह्म की लीला का विलास है। संपूर्ण सृष्टि लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्मकृति है। जीवों के तीन प्रकार है- ‘पुष्टि जीव’ , ‘मर्यादा जीव’ (जो वेदोक्त विधियों का अनुसरण करते हुए भिन्न-भिन्न लोक प्राप्त करते है) और ‘प्रवाह जीव’ (जो जगत्-प्रपंच में ही निमग्न रहते हुए सांसारिक सुखों की प्राप्ति हेतु सतत् चेष्टारत रहते हैं)।
 
भगवान् श्रीकृष्ण भक्तों के निमित्त ‘व्यापी वैकुण्ठ’ में (जो विष्णु के वैकुण्ठ से ऊपर स्थित है) नित्य क्रीड़ाएं करते हैं। इसी व्यापी वैकुण्ठ का एक खण्ड है- ‘गोलोक’, जिसमें यमुना, वृन्दावन, निकुंज व गोपियां सभी नित्य विद्यमान है। भगवद्सेवा के माध्यम से वहां भगवान की नित्य लीला-सृष्टि में प्रवेश ही जीव की सर्वोत्तम गति है। प्रेमलक्षणा भक्ति उक्त मनोरथ की पूर्ति का मार्ग है, जिस ओर जीव की प्रवृत्ति मात्र भगवद्नुग्रह द्वारा ही संभव है। श्री मन्महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के ‘पुष्टिमार्ग’ (अनुग्रह मार्ग) का यही आधारभूत सिद्धान्त है। पुष्टि-भक्ति की तीन उत्तरोत्तर अवस्थाएं है-प्रेम,आसक्ति और व्यसन। मर्यादा-भक्ति में भगवद्प्राप्ति शमदमादि साधनों से होती है, किन्तु पुष्टि-भक्ति में भक्त को किसी साधन की आवश्यकता न होकर मात्र भगवद्कृपा का आश्रय होता है। मर्यादा-भक्ति स्वीकार्य करते हुए भी पुष्टि-भक्ति ही श्रेष्ठ मानी गई है। पुष्टिमार्गीय जीव की सृष्टि भगवत्सेवार्थ ही है- ‘भगवद्रूपसेवार्थ तत्सृष्टिर्नान्यथा भवेत्’। प्रेमपूर्वक भगवत्सेवा भक्ति का यथार्थ स्वरूप है-‘भक्तिश्च प्रेमपूर्विका सेवा’। भागवतीय आधार (‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयं’) पर भगवान कृष्ण ही सदा सर्वदा सेव्य, स्मरणीय तथा कीर्तनीय है- ‘सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो ब्रजाधिप:।’.. ‘तस्मात्सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्ण: शरणं मम’।
 
ब्रह्म के साथ जीव-जगत् का संबंध निरूपण करते हुए उनका मत था कि जीव ब्रह्म का सदंश(सद् अंश) है, जगत् भी ब्रह्म का सदंश है। अंश एवं अंशी में भेद न होने के कारण जीव-जगत् और ब्रह्म में परस्पर अभेद है। अंतर मात्र इतना है कि जीव में ब्रह्म का आनन्दांश आवृत्त रहता है, जबकि जड़ जगत में इसके आनन्दांश व चैतन्यांश दोनों ही आवृत्त रहते है। श्रीशंकराचार्य के अद्वैतवाद केवलाद्वैत के विपरीत श्रीवल्लभाचार्य के अद्वैतवाद में माया का संबन्ध अस्वीकार करते हुए ब्रह्म को कारण और जीव-जगत को उसके कार्य रूप में वर्णित कर तीनों शुद्ध तत्वों का ऐक्य प्रतिपादित किए जाने के कारण ही उक्त मत ‘शुद्धाद्वैतवाद’ कहलाया (जिसके मूल प्रवर्तकाचार्य श्री विष्णुस्वामीजी है)। वल्लभाचार्य जी के चौरासी शिष्यों में अष्टछाप कविगण- भक्त सूरदास, कृष्णदास, कुम्भनदास व परमानन्द दास प्रमुख थे। श्री अवधूतदास नामक परमहंस शिष्य भी थे। सूरदासजी की सच्ची भक्ति एवं पद-रचना की निपुणता देख अति विनयी सूरदास जी को भागवत् कथा श्रवण कराकर भगवल्लीलागान की ओर उन्मुख किया तथा उन्हे श्रीनाथजी के मन्दिर की की‌र्त्तन-सेवा सौंपी। तत्व ज्ञान एवं लीला भेद भी बतलाया- ‘श्रीवल्लभगुरू त8व सुनायो लीला-भेद बतायो’ (सूरसारावली)। सूर की गुरु के प्रति निष्ठा दृष्टव्य है-‘भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो। श्रीवल्लभ-नख-चन्द-छटा बिनु सब जग मांझ अधेरो॥’ श्रीवल्लभ के प्रताप से प्रमत्त कुम्भनदास जी तो सम्राट अकबर तक का मान-मर्दन करने में नहीं झिझके-परमानन्ददासजी के भावपूर्ण पद का श्रवण कर महाप्रभु कई दिनों तक बेसुध पड़े रहे। मान्यता है कि उपास्य श्रीनाथजी ने कलि-मल-ग्रसित जीवों का उद्धार हेतु श्रीवल्लभाचार्यजी को दुर्लभ ‘आत्म-निवेदन -मन्त्र’ प्रदान किया और गोकुल के ठकुरानी घाट पर यमुना महारानी ने दर्शन देकर कृतार्थ किया। उनका शुद्धाद्वैत का प्रतिपादक प्रधान दार्शनिक ग्रन्थ है-‘अणुभाष्य’ (‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ अथवा उत्तरमीमांसा’)। अन्य प्रमुख ग्रन्थ है- ‘पूर्वमीमांसाभाष्य’, भागवत के दशम स्कन्ध पर ‘सुबोधिनी’ टीका, ‘त8वदीप निबन्ध’ एवं ‘पुष्टि -प्रवाह-मर्यादा’। संवत् 1587, आषाढ़ शुक्ल तृतीया को उन्होंने अलौकिक रीति से इहलीला संवरण कर सदेह प्रयाण किया।

 

सुप्रसिद्ध हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध गंभीर चिंतक भी थे। भक्ति आंदोलन पर उनका यह आलेख कई दृष्टियों से आज भी प्रासंगिक है। पहली दफा यह ‘नयी दिशा` पत्रिका में मई १९५५ में प्रकाशित हुआ था।                               -संपादक
 
मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि कबीर और निर्गुण पन्थ के अन्य कवि तथा दक्षिण के कुछ महाराष्ट्रीय सन्त तुलसीदास जी की अपेक्षा अधिक आधुनिक क्यों लगते हैं? क्या कारण है कि हिन्दी-क्षेत्र में जो सबसे अधिक धार्मिक रूप से कट्टर वर्ग है, उनमें भी तुलसीदासजी इतने लोकप्रिय हैं कि उनकी भावनाओं और वैचारिक अस्‍त्रों द्वारा, वह वर्ग आज भी आधुनिक दृष्टि और भावनाओं से संघर्ष करता रहता है? समाज के पारिवारिक क्षेत्र में इस कट्टरपन को अब नये पंख भी फूटने लगे हैं। खैर, लेकिन यह इतिहास दूसरा है। मूल प्रश्न जो मैंने उठाया है उसका कुछ-न-कुछ मूल उत्तर तो है ही।
 
मैं यह समझता हूं कि किसी भी साहित्य का ठीक-ठीक विश्लेषण तब तक नहीं हो सकता जब तक हम उस युग की मूल गतिमान सामाजिक शक्तियों से बनने वाले सांस्कृतिक इतिहास को ठीक-ठीक न जान लें। कबीर हमें आपेक्षिक रूप से आधुनिक क्यों लगते हैं, इस मूल प्रश्न का मूल उत्तर भी उसी सांस्कृतिक इतिहास में कहीं छिपा हुआ है। जहां तक महाराष्ट्र की सन्त-परम्परा का प्रश्न है, यह निर्विवाद है कि मराठी सन्त-कवि, प्रमुखत:, दो वर्गों से आये हैं, एक ब्राह्मण और दूसरे ब्राह्मणेतर। इन दो प्रकार के सन्त-कवियों के मानव-धर्म में बहुत कुछ समानता होते हुए भी, दृष्टि और रुझान का भेद भी था। ब्राह्मणेतर सन्त-कवि की काव्य-भावना अधिक जनतन्त्रात्मक, सर्वांगीण आर मानवीय थी। निचली जातियों की आत्म-प्रस्थापना के उस युग में, कट्टर पुराणपन्थियों ने जो-जो तकलीफें़ इन सन्तों को दी हैं उनसे ज्ञानेश्वर-जैसे प्रचण्ड प्रतिभावन सन्त का जीवन अत्यन्त करुण कष्टमय और भयंकर दृढ़ हो गया। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ ज्ञानेवश्वरी तीन सौ वर्षों तक छिपा रहा। उक्त ग्रन्थ की कीर्ति का इतिहास तो तब से शुरू होता है जब वह पुन: प्राप्त हुआ। यह स्पष्ट ही है कि समाज के कट्टरपन्थियों ने इन सन्तों को अत्यन्त कष्ट दिया। इन कष्टों का क्या कारण था? और ऐसी क्या बात हुई कि जिस कारण निम्न जातियां अपने सन्तों को लेकर राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में कूद पड़ीं?
 
मुश्किल यह है कि भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के सुसम्बद्ध इतिहास के लिए आवश्यक सामग्री का बड़ा अभाव है। हिन्दू इतिहास लिखते नहीं थे, मुस्लिम लेखक घटनाओं का ही वर्णन करते थे। इतिहास-लेखन पर्याप्त आधुनिक है। शान्तिनिकेतन के तथा अन्य पण्डितों ने भारत के सांस्कृतिक इतिहास के क्षेत्र में बहुत अन्वेषण किये हैं। किन्तु सामाजिक-आर्थिक विकास के इतिहास के क्षेत्र में अभी तक कोई महत्वपूर्ण काम नहीं हुआ है।
ऐसी स्थिति में हम कुछ सर्वसम्मत तथ्यों को ही आपके सामने प्रस्तुत करेंगे।
 
(१) भक्ति-आन्दोलन दक्षिण भारत से आया। समाज की धर्मशाव़ादी वेद-उपनिषद्वादी शक्तियों ने उसे प्रस्तुत नहीं किया, वरन् आलवार सन्तों ने और उनके प्रभाव में रहनेवाले जनसाधारण ने उसका प्रसार किया।
 
(२) ग्यारहवीं सदी से महाराष्ट्र की गरीब जनता में भक्ति आन्दोलन का प्रभाव अत्यधिक हुआ। राजनैतिक दृष्टि से, यह जनता हिन्दू-मुस्लिम दोनों प्रकार के सामन्ती उच्चवर्गीयों से पीड़ित रही। सन्तों की व्यापक मानवतावादी वाणी ने उन्हें बल दिया। कीर्तन-गायन ने उनके जीवन में रस-संचार किया। ज्ञानेश्वर, तुकाराम आदि सन्तों ने गरीब किसान और अन्य जनता का मार्ग प्रशस्त किया। इस सांस्कृतिक आत्म-प्रस्थापना के उपरान्त सिर्फ एक और कदम की आवश्यकता थी।
 
वह समय भी शीघ्र ही आया। गरीब उद्धत किसान तथा अन्य जनता को अपना एक और सन्त, रामदास, मिला और एक नेता प्राप्त हुआ, शिवाजी। इस युग में राजनैतिक रूप से महाराष्ट्र का जन्म और विकास हुआ। शिवाजी के समस्त छापेमार युद्धों के सेनापति और सैनिक, समाज के शोषित तबकों से आये। आगे का इतिहास आपको मालूम ही है-किस प्रकार सामन्तवाद टूटा नहीं, किसानों की पीड़ाएं वैसी ही रहीं, शिवाजी के उपरान्त राजसत्ता उच्च वंशोत्पन्न ब्राह्मणों के हाथ पहुंची, पेशवाओं (जिन्हें मराठे भी जाना जाता रहा) ने किस प्रकार के युद्ध किये और वे अंगेजों के विरूद्ध क्यों असफल रहे, इत्यादि।
 
(३) उच्चवर्गीयों और निम्नवर्गीयों का संघर्ष बहुत पुराना है। यह संघर्ष नि:सन्देह धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्र में अनेकों रूपों में प्रकट हुआ। सिद्धों और नाथ-सम्प्रदाय के लोगों ने जनसाधारण में अपना पर्याप्त प्रभाव रखा, किन्तु भक्ति-आन्दोलन का जनसाधारण पर जितना व्यापक प्रभाव हुआ उतना किसी अन्य आन्दोलन का नहीं। पहली बार शूद्रों ने अपने सन्त पैदा किये, अपना साहित्य और अपने गीत सृजित किए। कबीर, रैदास, नाभा सिंपी, सेना नाई, आदि-आदि महापुरुषों ने ईश्वर के नाम पर जातिवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की। समाज के न्यस्त स्वार्थवादी वर्ग के विरुद्ध नया विचारवाद अवश्यंभावी था। वह हुआ, तकलीफें हुई। लेकिन एक बात हो गयी।
शिवाजी स्वयं मराठा क्षत्रिय था, किन्तु भक्ति-आंदोलन से, जाग्रत जनता के कष्टों से, खूब परिचित था, और स्वयं एक कुशल संगठक और वीर सेनाध्यक्ष था। सन्त रामदास, जिसका उसे आशीर्वाद प्राप्त था, स्वयं सनातनी ब्राह्मणवादी था, किन्तु नवीन जाग्रत जनता की शक्ति से खूब परिचित भी था। सन्त से अधिक वह स्वयं एक सामन्ती राष्ट्रवादी नेता था। तब तक कट्टरपंथी शोषक तत्वों में यह भावना पैदा हो गयी थी कि निम्नजातीय सन्तों से भेदभाव अच्छा नहीं है। अब ब्राह्मण-शक्तियां स्वयं उन्हीं सन्तों का कीर्तन-गायन करने लगीं। किन्तु इस कीर्तन-गायन के द्वारा वे उस समाज की रचना को, जो जातिवाद पर आधारित थी, मजबूत करती जा रही थीं। एक प्रकार से उन्होंने अपनी परिस्थिति से समझौता कर लिया था। दूसरे, भक्ति आन्दोलन के प्रधान सन्देश से प्रेरणा प्राप्त करनेवाले लोग ब्राह्मणों में भी होने लगे थे। रामदास, एक प्रकार से, ब्राह्मणों में से आये हुए अन्तिम सन्त हैं, इसके पहले एकनाथ हो चुके थे। कहने का सारांश यह कि नवीन परिस्थिति में यद्यपि युद्ध-सत्ता (राजसत्ता) शोषित और गरीब तबकों से आये सेनाध्यक्षों के पास थी, किन्तु सामाजिक क्षेत्र में पुराने सामन्तवादियों और नये सामन्तवादियों में समझौता हो गया था। नये सामन्तवादी कुनवियों, धनगरों, मराठों और अन्य गरीब जातियों से आये हुए सेनाध्यक्ष थे। इस समझौते का फल यह हुआ कि पेशवा ब्राह्मण हुए, किन्तु युद्ध-सत्ता नवीन सामन्तवादियों के हाथ में रही।
 
उधर सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में निम्नवर्गीय भक्तिर्माग के जनवादी संदेश के दांत उखाड़ लिये गये। उन सन्तों को सर्ववर्गीय मान्यता प्राप्त हुई, किन्तु उनके सन्देश के मूल स्वरूप पर कुठारघात किया गया, और जातिवादी पुराणधर्म पुन: नि:शंक भाव से प्रतिष्ठित हुआ।
 
(४) उत्तर भारत में निर्गुणवादी भक्ति-आन्दोलन में शोषित जनता का सबसे बड़ा हाथ था। कबीर, रैदास, आदि सन्तों की बानियों का सन्देश, तत्कालीन मानों के अनुसार, बहुत अधिक क्रांन्तिकारी था। यह आकस्मिकता न थी कि चण्डीदास कह उठता है :
 
 
शुनह मानुष भाई
शबार ऊपरे मानुष शतो
ताहार उपरे नाई।
 
 
इस मनुष्य-सत्य की घोषणा के क्रांतिकारी अभिप्राय कबीर में प्रकट हुए। कुरीतियों, धार्मिक अन्धविश्वासों और जातिवाद के विरुद्ध कबीर ने आवाज उठायी। वह फैली। निम्न जातियों में आत्मविश्वास पैदा हुआ। उनमें आत्म-गौरव का भाव हुआ। समाज की शासक-सत्ता को यह कब अच्छा लगता? निर्गुण मत के विरुद्ध सगुण मत का प्रारम्भिक प्रसार और विकास उच्चवंशियों में हुआ। निर्गुण मत के विरुद्ध सगुणमत का संघर्ष निम्न वर्गों के विरुद्ध उच्चवंशी संस्कारशील अभिरूचिवालों का संघर्ष था। सगुण मत विजयी हुआ। उसका प्रारम्भिक विकास कृष्णभक्ति के रूप में हुआ। यह कृष्णभक्ति कई अर्थों में निम्नवर्गीय भक्ति-आन्दोलन से प्रभावित थी। उच्चवर्गीयों का एक भावुक तबका भक्ति-आन्दोलन से हमेशा प्रभावित होता रहा, चाहे वह दक्षिण भारत में हो या उत्तर भारत में। इस कृष्णभक्ति में जातिवाद के विरुद्ध कई बातें थीं। वह एक प्रकार से भावावेशी व्यक्तिवाद था। इसी कारण, महाराष्ट्र में, निर्गुण मत के बजाय निम्न-वर्ग में, सगुण मत ही अधिक फैला। सन्त तुकाराम का बिठोबा एक सार्वजनिक कृष्ण था। कृष्णभक्तिवाली मीरा ‘लोकलाज` छोड़ चुकी थी। सूर कृष्ण-प्रेम में विभोर थे। निम्नवर्गीयों में कृष्णभक्ति के प्रचार के लिए पर्याप्त अवकाश था, जैसा महाराष्ट्र की सन्त परम्परा का इतिहास बतलाता है। उत्तर भारत में कृष्णभक्ति-शाखा का निर्गुण मत के विरुद्ध जैसा संघर्ष हुआ वैसा महाराष्ट्र में नहीं रहा। महाराष्ट्र में कृष्ण की श्रृंगार-भक्ति नहीं थी, न भ्रमरगीतों का जोर था। कृष्ण एक तारणकर्ता देवता था, जो अपने भक्तों का उद्धार करता था, चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो। महाराष्ट्रीय सगुण कृष्णभक्ति में श्रृंगारभावना, और निर्गुण भक्ति, इन दो के बीच कोई संघर्ष नहीं था। उधर उत्तर भारत में, नन्ददास वगैरह कृष्णभक्तिवादी सन्तों की निर्गुण मत-विरोधी भावना स्पष्ट ही है। और ये सब लोग उच्चकुलोद्भव थे। यद्यपि उत्तर भारतीय कृष्णभक्ति वाले कवि उच्चवंशीय थे, और निर्गुण मत से उनका सीधा संघर्ष भी था, किन्तु हिन्दू समाज के मूलाधार यानी वर्णाश्रम-धर्म के विरोधियों ने जातिवाद-विरोधी विचारों पर सीधी चोट नहीं की थी। किन्तु उत्तर भारतीय भक्ति आन्दोलन पर उनका प्रभाव निर्णायक रहा।
 
एक बार भक्ति-आन्दोलन में ब्राह्मणों का प्रभाव जम जाने पर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा में कोई देर नहीं थी। ये घोषणा तुलसीदासजी ने की थी। निर्गुण मत में निम्नजातीय धार्मिक जनवाद का पूरा जोर था, उसका क्रान्तिकारी सन्देश था। कृष्णभक्ति में वह बिल्कुल कम हो गया किन्तु फिर भी निम्नजातीय प्रभाव अभी भी पर्याप्त था। तुलसीदास ने भी निम्नजातीय भक्ति स्वीकार की, किन्तु उसको अपना सामाजिक दायरा बतला दिया। निर्गुण मतवाद के जनोन्मुख रूप और उसकी क्रान्तिकारी जातिवाद-विरोधी भूमिका के विरुद्ध तुलसीदासजी ने पुराण-मतवादी स्वरूप प्रस्तुत किया। निर्गुण-मतवादियों का ईश्वर एक था, किन्तु अब तुलसीदासजी ने मनोजगत् में परब्रह्म के निर्गुण-स्वरूप के बावजूद सगुण ईश्वर ने सारा समाज और उसकी व्यवस्था-जो जातिवाद, वर्णाश्रम धर्म पर आधारित थी-उत्पन्न की। राम निषाद और गुह का आलिंगन कर सकते थे, किन्तु निषाद और गुह ब्राह्मण का अपमान कैसे कर सकते थे। दार्शनिक क्षेत्र का निर्गुण मत जब व्यावहारिक रूप से ज्ञानमार्गी भक्तिमार्ग बना, तो उसमें पुराण-मतवाद को स्थान नहीं था। कृष्णभक्ति के द्वारा पौराणिक कथाएं घुसीं, पुराणों ने रामभक्ति के रूप में आगे चलकर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा की।
 
साधारण जनों के लिए कबीर का सदाचारवाद तुलसी के सन्देश से अधिक क्रान्तिकारी था। तुलसी को भक्ति का यह मूल तत्व तो स्वीकार करना ही पड़ा कि राम के सामने सब बराबर हैं, किन्तु चूंकि राम ही ने सारा समाज उत्पन्न किया है, इसलिए वर्णाश्रम धर्म और जातिवाद को तो मानना ही होगा। पं. रामचन्द्र शुक्ल जो निर्गुण मत को कोसते हैं, वह यों ही नहीं। इसके पीछे उनकी सारी पुराण-मतवादी चेतना बोलती है।
 
क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि रामभक्ति-शाखा के अन्तर्गत, एक भी प्रभावशाली और महत्पूर्ण कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया? क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि कृष्णभक्ति-शाखा के अन्तर्गत रसखान और रहीम-जैसे हृदयवान मुसलमान कवि बराबर रहे आये, किन्तु रामभक्ति-शाखा के अन्तर्गत एक भी मुसलमान और शूद्र कवि प्रभावशाली और महत्वपूर्ण रूप से अपनी काव्यात्मक प्रतिभा विशद नहीं कर सका? जब कि यह एक स्वत: सिद्ध बात है कि निर्गुण-शाखा के अन्तर्गत ऐसे लोगों को अच्छा स्थान प्राप्त था।
निष्कर्ष यह कि जो भक्ति-आंदोलन जनसाधारण से शुरू हुआ और जिसमें सामाजिक कट्टरपन के विरुद्ध जनसाधारण की सांस्कृतिक आशा-आकांक्षाएं बोलती थीं, उसका ‘मनुष्य-सत्य` बोलता था, उसी भक्ति-आन्दोलन को उच्चवर्गीयों ने आगे चलकर अपनी तरह बना लिया, और उससे समझौता करके, फिर उस पर अपना प्रभाव कायम करके, और अनन्तर जनता के अपने तत्वों को उनमें से निकालकर, उन्होंने उस
पर अपना पूरा प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
 
और इस प्रकार, उच्चवंशी उच्चजातीय वर्गों का-समाज के संचालक शासक वर्गों का-धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में पूर्ण प्रभुत्व स्थापित हो जाने पर, साहित्यिक क्षेत्र में उन वर्गों के प्रधान भाव-श्रृंगार-विलास-का प्रभावशाली विकास हुआ, और भक्ति-काव्य की प्रधानता जाती रही। क्या कारण है कि तुलसीदास भक्ति-आन्दोलन के प्रधान (हिन्दी क्षेत्र में) अन्तिम कवि थे? सांस्कृतिक-साहित्यिक क्षेत्र में यह परिवर्तन भक्ति-आन्देालन की शिथिलता को द्योतित करता है। किन्तु यह आन्दोलन इस क्षेत्र में शिथिल क्यों हुआ?
 
ईसाई मत का भी यही हाल हुआ। ईसा का मत जनसाधारण में फैला तो यहूदी धनिक वर्गों ने उसका विरोध किया, रोमन शासकों ने उसका विरोध किया। किन्तु जब वह जनता का अपना धर्म बनने लगा, तो धनिक यहूदी और रोमन लोग भी उसको स्वीकार करने लगे। रोम शासक ईसाई हुए और सेंट पॉल ने उसी भावुक प्रेममूलक धर्म को कानूनी शिकंजों में जकड़ लिया, पोप जनता से फीस लेकर पापों और अपराधों के लिए क्षमापत्र वितरित करने लगा।
 
यदि हम धर्मों के इतिहास को देखें, तो यह जरूर पायेंगे कि तत्कालीन जनता की दुरवस्था के विरुद्ध उसने घोषणा की, जनता को एकता और समानता के सूत्र में बांधने की कोशिश की। किन्तु ज्यों-ज्यों उस धर्म में पुराने शासकों की प्रवृत्ति वाले लोग घुसते गये और उनका प्रभाव जमता गया, उतना-उतना गरीब जनता का पक्ष न केवल कमजोर होता गया, वरन् उसको अन्त में उच्चवर्गों की दासता-धार्मिक दासता-भी फिर से ग्रहण करनी पड़ी।
क्या कारण है कि निर्गुण-भक्तिमार्गी जातिवाद-विरोधी आन्दोलन सफल नहीं हो सका? उसका मूल कारण यह है कि भारत में पुरानी समाज-रचना को समाप्त करनेवाली पूंजीवादी क्रांतिकारी शक्तियां उन दिनों विकसित नहीं हुई थीं। भारतीय स्वदेशी पूंजीवाद की प्रधान भौतिक-वास्तविक भूमिका विदेशी पूंजीवादी साम्राज्यवाद ने बनायी। स्वदेशी पूंजीवाद के विकास के साथ ही भारतीय राष्ट्रवाद का अभ्युदय और सुधारवाद का जन्म हुआ, और उसने सामन्ती समाज-रचना के मूल आर्थिक आधार, यानी पेशेवर जातियों द्वारा सामाजिक उत्पादन की प्रणाली समाप्त कर दी। गांवों की पंचायती व्यवस्था टूट गयी। ग्रामों की आर्थिक आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी।
 
भक्ति-काल की मूल भावना साधारण जनता के कष्ट और पीड़ा से उत्पन्न है। यद्यपि पण्डित हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कहना ठीक है कि भक्ति की धारा बहुत पहले से उद्गत होती रही, और उसकी पूर्वभूमिका बहुत पूर्व से तैयार होती रही। किन्तु उनके द्वारा निकाला गया यह तर्क ठीक नहीं मालूम होता है कि भक्ति-आन्दोलन का एक मूल कारण जनता का कष्ट है। किन्तु पण्डित शुक्ल ने इन कष्टों के मुस्लिम-विरोध और हिन्दू-राज सत्ता के पक्षपाती जो अभिप्राय निकाले हैं, वे उचित नहीं मालूम होते। असल बात यह है कि मुसलमान सन्त-मत भी उसी तरह कट्टरपन्थियों के विरुद्ध था, जितना कि भक्ति-मार्ग। दोनों एक-दूसरे से प्रभावित भी थे। किन्तु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भक्ति-भावना की तीव्र आर्द्रता और सारे दु:खों और कष्टों के परिहार के लिए ईश्वर की पुकार के पीछे जनता की भयानक दु:स्थिति छिपी हुई थी। यहां यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि यह बात साधारण जनता और उसमें से निकले हुए सन्तों की है, चाहे वे ब्राह्मण वर्ग से निकले हों या ब्राह्मणेतर वर्ग से। साथ ही, यह भी स्मरण रखना होगा कि श्रृंगार-भक्ति का रूप उसी वर्ग में सर्वाधिक प्रचलित हुआ जहां ऐसी श्रृंगार-भावना के परिपोष के लिए पर्याप्त अवकाश और समय था, फुर्सत का समय। भक्ति-आन्दोलन का आविर्भाव, एक ऐतिहासिक-सामाजिक शक्ति के रूप में, जनता के दु:खों और कष्टों से हुआ, यह निर्विवाद है।
किसी भी साहित्य को हमें तीन दृष्टियों से देखना चाहिए। एक तो यह कि वह किन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक शक्तियों से उत्पन्न है, अर्थात् वह किन शक्तियों के कार्यों का परिणाम है, किन सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रियायों का अंग है? दूसरे यह कि उसका अन्त:स्वरूप क्या है, किन प्रेरणाओं और भावनाओं ने उसके आन्तरिक तत्व रूपायित किये हैं? तीसरे, उसके प्रभाव क्या हैं, किन सामाजिक शक्तियों ने उसका उपयोग या दुरूपयोग किया है और क्यों? साधारण जन के किन मानसिक तत्वों को उसने विकसित या नष्ट किया है?
 
तुलसीदासजी ने सम्बन्ध में इस प्रकार के प्रश्न अत्यन्त आवश्यक भी हैं। रामचरितमानसकार एक सच्चे सन्त थे, इसमें किसी को भी कोई सन्देह नहीं हो सकता। रामचरितमानस साधारण जनता में भी उतना ही प्रिय रहा जितना कि उच्चवर्गीय लोगों में। कट्टरपन्थियों ने अपने उद्देश्यों के अनुसार तुलसीदासजी का उपयोग किया, जिस प्रकार आज जनसंघ और हिन्दू महासभा ने शिवाजी और रामदास का उपयोग किया। सुधारवादियों की तथा आज की भी एक पीढ़ी को तुलसीदासजी के वैचारिक प्रभाव से संघर्ष करना पड़ा, यह भी एक बड़ा सत्य है।
 
किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि साधारण जनता ने राम को अपना त्राणकर्ता भी पाया, गुह और निषाद को अपनी छाती से लगानेवाला भी पाया। एक तरह से जनसाधारण की भक्ति-भावना के भीतर समाये हुए समान प्रेम का आग्रह भी पूरा हुआ, किन्तु वह सामाजिक ऊंच-नीच को स्वीकार करके ही। राम के चरित्र द्वारा और तुलसीदासजी के आदेशों द्वारा सदाचार का रास्ता भी मिला। किन्तु वह मार्ग कबीर के और अन्य निर्गुणवादियों के सदाचार का जनवादी रास्ता नहीं था। सच्चाई और ईमानदारी, प्रेम और सहानुभूति से ज्यादा बड़ा तकाजा था सामाजिक रीतियों का पालन। (देखिए रामायण में अनुसूया द्वारा सीता को उपदेश)। उन रीतियों और आदेशों का पालन करते हुए, और उसकी सीमा में रहकर ही, मनुष्य के उद्धार का रास्ता था। यद्यपि यह कहना कठिन है कि किस हद तक तुलसीदासजी इन आदेशों का पालन करवाना चाहते थे और किस हद तक नहीं। यह तो स्पष्ट ही है कि उनका सुझाव किस ओर था। तुलसीदासजी द्वारा इस वर्णाश्रम धर्म की पुन:र्स्थापना के अनन्तर हिन्दी साहित्य में फिर से कोई महान भक्त-कवि नहीं हुआ तो इसमें आश्चर्य नहीं।
 
आश्चर्य की बात यह है कि आजकल प्रगतिवादी क्षेत्रों में तुलसीदासजी के सम्बंध में जो कुछ लिखा गया है, उसमें जिस सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के तुलसीदासजी अंग थे, उसको जान-बूझकर भुलाया गया है। पण्डित रामचन्द्र शुक्ल की वर्णाश्रमधर्मी जातिवादग्रस्त सामाजिकता और सच्चे जनवाद को एक दूसरे से ऐसे मिला दिया गया है मानो शुक्लजी (जिनके प्रति हमारे मन में अत्यन्त आदर है) सच्ची जनवादी सामाजिकता के पक्षपाती हों। तुलसीदासजी को पुरातनवादी कहा जायेगा कबीर की तुलना में, जिनके विरुद्ध शुक्लजी ने चोटें की हैं।
 
दूसरे, जो लोग शोषित निम्नवर्गीय जातियों के साहित्यिक और सांस्कृतिक संदेश में दिलचस्पी रखते हैं, और उस सन्देश के प्रगतिशील तत्वों के प्रति आदर रखते हैं, वे लोग तो यह जरूर देखेंगे कि जनता की सामाजिक मुक्ति को किस हद तक किसने सहारा दिया और तुलसीदासजी का उसमें कितना योग रहा। चाहे श्री रामविलास शर्मा-जैसे ‘मार्क्सवादी` आलोचक हमें ‘वल्गर मार्क्सवादी` या बूर्ज्वा कहें, यह बात निस्सन्देह है कि समाजशाी़य दृष्टि से मध्ययुगीन भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक शक्तियों के विश्लेषण के बिना, तुलसीदासजी के साहित्य के अन्त:स्वरूप क साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। जहां तक रामचरितमानस की काव्यगत सफलताओं का प्रश्न है, हम उनके सम्मुख केवल इसलिए नतमस्तक नहीं हैं कि उसमें श्रेष्ठ कला के दर्शन होते हैं, बल्कि इसलिए कि उसमें उक्त मानव-चरित्र के, भव्य और मनोहर व्यक्तित्व-सत्ता के, भी दर्शन होते हैं।
तुलसीदासजी की रामायण पढ़ते हुए, हम एक अत्यन्त महान् व्यक्तित्व की छाया में रहकर अपने मन और हृदय का आप-ही-आप विस्तार करने लगते हैं और जब हम कबीर आदि महान् जनोन्मुख कवियों का सन्देश देखते हैं, तो हम उनके रहस्यवाद से भी मुंह मोड़ना चाहते हें। हम उस रहस्यवाद के समाजशाी़य अध्ययन में दिलचस्पी रखते हैं, और यह कहना चाहते हैं कि निर्गुण मत की सीमाएं तत्कालीन विचारधारा की सीमाएं थीं, जनता का पक्ष लेकर जहां तक जाया जा सकता था, वहां तक जाना हुआ। निम्नजातीय वर्गों के इस सांस्कृतिक योग की अपनी सीमाएं थीं। ये सीमाएं उन वर्गों की राजनैतिक चेतना की सीमाएं थीं। आधुनिक अर्थों में, वे वर्ग कभी जागरूक सामाजिक-राजनैतिक-संघर्ष-पथ पर अग्रसर नहीं हुए। इसका कारण क्या है, यह विषय यहां अप्रस्तुत है। केवल इतना ही कहना उपयुक्त होगा कि संघर्षहीनता के अभाव का मूल कारण भारत की सामन्तयुगीन सामाजिक-आर्थिक रचना में है। दूसरे, जहां ये संघर्ष करते-से दिखायी दिये, वहां उन्होंने एक नये सामान्ती शासक वर्ग को ही दृढ़ किया, जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ है।
 
प्रस्तुत विचारों के प्रधान निष्कर्ष ये हैं :
 
(१) निम्नवर्गीय भक्ति-भावना एक सामाजिक परिस्थिति में उत्पन्न हुई और दूसरी सामाजिक स्थिति में परिणत हुई। महाराष्ट्र में उसने एक राष्ट्रीय जाति खड़ी कर दी, सिख एक नवीन जाति बन गये। इन जातियों ने तत्कालीन सर्वोत्तम शासक वर्गों से मोर्चा लिया। भक्तिकालीन सन्तों के बिना महाराष्ट्रीय भावना की कल्पना नहीं की जा सकती, न सिख गुरुओं के बिना सिख जाति की। सारांश यह कि भक्ति भावना के राजनैतिक गर्भितार्थ थे। ये राजनैतिक गर्भितार्थ तत्कालीन सामंती शोषक वर्गों और उनकी विचारधारा के समर्थकों के विरुद्ध थे।
 
(२) इस भक्ति-आन्दोलन के प्रारम्भिक चरण में निम्नवर्गीय तत्व सर्वाधिक सक्षम और प्रभावशाली थे। दक्षिण भारत के कट्टरपंथी तत्व, जो कि तत्कालीन हिन्दू सामन्ती वर्गों के समर्थक थे, इस निम्नवर्गीय सांस्कृतिक जनचेतना के एकदम विरुद्ध थे। वे उन पर तरह-तरह के उत्याचार भी करते रहे। मुस्लिम तत्वों से मार खाकर भी, हिन्दू सामन्ती वर्ग उनसे समझौता करने की विवश्ता स्वीकार कर, उनसे एक प्रकार से मिले हुए थे। उत्तर भारत में हिन्दुओं के कई वर्गों का पेशा ही मुस्लिम वर्गों की सेवा करना था। अकबर ही पहला शासक था, जिसने तत्कालीन तथ्यों के आधार पर खुलकर हिन्दू सामन्तों का स्वागत किया।
 
उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में हिन्दू सामन्ती तत्व मुसलमान सामन्ती तत्वों से छिटककर नहीं रह सके। लूट-पाट, नोच-खसोट के उस युग में जनता की आर्थिक-सामााजिक दु:स्थिति गंभीर थी। निम्नवर्गीय जातियों के सन्तों की निर्गुण-वाणी का, तत्कालीन मानों के अनुसार, क्रांन्तिकारी सुधारवादी स्वर, अपनी सामाजिक स्थिति के विरुद्ध क्षोभ और अपने लिए अधिक मानवोचित परिस्थिति की आवश्यकता बतलाता था। भक्तिकाल की निम्नवर्गीय चेतना के सांस्कृतिक स्तर अपने-अपने सन्त पैदा करने लगे। हिन्दू-मुस्लिम सामन्ती तत्वों के शोषण-शासन और कट्टरपंथी दृढ़ता से प्रेरित हिन्दू-मुस्लिम जनता भक्ति-मार्ग पर चल पड़ी थी, चाहे वह किसी भी नाम से क्यों न हो। निम्नवर्गीय भक्ति-मार्ग निर्गुण-भक्ति के रूप में प्रस्फुटित हुआ। इस निर्गुण-भक्ति में तत्कालीन सामन्तवाद-विरोधी तत्व सर्वाधिक थे। किन्तु तत्कालीन समाज-रचना के कट्टर पक्षपाती तत्वों में से बहुतेरे भक्ति-आंदोलन के प्रभाव में आ गये थे। इनमें से बहुत-से भद्र सामन्ती परिवारों में से थे निर्गुण भक्ति की उदारवादी और सुधारवादी सांस्कृतिक विचारधारा का उन पर भारी प्रभाव हुआ। उन पर भी प्रभाव तो हुआ, किन्तु आगे चलकर उन्होंने भी भक्ति-आन्दोलन को प्रभावित किया। अपने कट्टरपन्थी पुराणमतवादी संस्कारों से प्रेरित होकर, उत्तर भारत की कृष्णभक्ति, भावावेशवादी आत्मवाद को लिये हुए, निर्गुण मत के विरुद्ध संघर्ष करने लगी। इन सगुण मत में उच्चवर्गीय तत्वों का पर्याप्त से अधिक समावेश था। किन्तु फिर भी इस सगुण श्रृंगारप्रधान भक्ति की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह जाति-विरोधी सुधारवादी वाणी के विरूद्ध प्रत्यक्ष और प्रकट रूप से वर्णाश्रम धर्म के सार्वभौम औचित्य की घोषणा करे। कृष्णभक्तिवादी सूर आदि सन्त-कवि इन्हीं वर्गों से आये थे। इन कवियों ने भ्रमरगीतों द्वारा निर्गुण मत से संघर्ष किया और सगुणवाद की प्रस्थापना की। वर्णाश्रम धर्म की पुन:र्स्थापना के लिए सिर्फ एक ही कदम आगे बढ़ना जरूरी था। तुलसीदासजी के अदम्य व्यक्तित्व ने इस कार्य को पूरा कर दिया। इस प्रकार भक्ति-आन्दोलन, जिस पर प्रारंभ में निम्नजातियों का सर्वाधिक जोर था, उस पर अब ब्राह्मणवाद पूरी तरह छा गया और सुधारवाद के विरुद्ध पुराण मतवाद की विजय हुई। इसमें दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र तथा उत्तरप्रदेश के हिन्दू-मुस्लिम सामन्ती तत्व एक थे। यद्यपि हिन्दू मुसलमानों के अधीन थे, किन्तु दु:ख और खेद से ही क्यों न सही, यह विवशता उन्होंने स्वीकार कर ली थी। इन हिन्दू सामन्त तत्वों की सांस्कृतिक क्षेत्र में अब पूरी विजय हो गयी थी।
 
(३) महाराष्ट्र में इस प्रक्रिया ने कुछ और रूप लिया। जन-सन्तों ने अप्रत्यक्ष रूप से महाराष्ट्र को जाग्रत और सचेत किया, रामदास और शिवाजी ने प्रत्यक्ष रूप से नवीन राष्ट्रीय जाति को जन्म दिया। किन्तु तब तक ब्राह्मणवादियों और जनता के वर्ग से आये हुए प्रभावशाली सेनाध्यक्षों और सन्तों में एक-दूसरे के लिए काफी उदारता बतलायी जाने लगी। शिवाजी के उपरान्त, जनता के गरीब वर्गों से आये हुए सेनाध्यक्षों और नेताओं ने नये सामन्ती घराने स्थापित किय। नतीजा यह हुआ कि पेशवाओं के काल में ब्राह्मणवाद फिर जोरदार हो गया। कहने का सारांश यह कि महाराष्ट्र में वही हाल हुआ जो उत्तरप्रदेश में। अन्तर यह था कि निम्नजातीय सांस्कृतिक चेतना जिसे पल-पल पर कट्टरपंथ से मुकाबला करना पड़ा था, वह उत्तर भारत से अधिक दीर्घकाल तक रही। पेशवाओं के काल में दोनों की स्थिति बराबर-बराबर रही। किन्तु आगे चलकर, अंग्रेजी राजनीति के जमाने में, पुराने संघर्षों की यादें दुहरायी गयीं, और ‘ब्राह्मण-ब्राह्मणेतरवाद` का पुनर्जन्म और विकास हुआ। और इस समय भी लगभग वही स्थिति है। फर्क इतना ही है कि निम्नजातियों के पिछड़े हुए लोग शिड्यूलकास्ट फेडरेशन में है, और अग्रगामी लोग कांग्रेस, पेजेंन्ट्स ऐण्ड वर्कर्स पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी तथा अन्य वामपक्षी दलों में शामिल हो गये हैं। आखिर जब इन्हीं जातियों में से पुराने जमाने में सन्त आ सकते थे, आगे चलकर सेनाध्यक्ष निकल सकते थे, तो अब राजनैतिक विचारक और नेता क्यों नहीं निकल सकते?
 
(४) सामन्तवादी काल में इन जातियों को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती थी, जब तक कि पूंजीवादी समाज-रचना सामन्ती समाज-रचना को समाप्त न कर देती। किन्तु सच्ची आर्थिक-सामाजिक समानता तब तक प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक कि समाज आर्थिक-सामाजिक आधार पर वर्गहीन न हो जाये।
 
(५) किसी भी साहित्य का वास्तविक विश्लेषण हम तब तक नहीं कर सकते, जब तक कि हम उन गतिमान सामाजिक शक्तियों को नहीं समझते, जिन्होंने मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक धरातल पर आत्मप्रकटीकरण किया है। कबीर, तुलसीदास आदि संतों के अध्ययन के लिए यह सर्वाधिक आवश्यक है। मैं इस ओर प्रगतिवादी क्षेत्र का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

 

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकांड में भगवान शिव के मुख से कुछ ‘अनमोल’ वचन कहलवाए हैं। किंतु ये वचन इतने कटु और अशोभनीय हैं कि सहज विश्वास नहीं होता कि ये रामचरितमानस जैसे महान और पवित्र काव्य के ही अंश हैं। अपशब्दों का ऐसा कवित्वमय प्रयोग विरले ही संसार के किसी अन्य महान साहित्य में देखने को मिलेगा। जरा आप भी एक बार फिर से इन अनमोल वचनों पर गौर फरमाएँ:
 
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।। 114 ।।
 
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई विषय मुकर मन लागी।।
लंपट कपटी कुटिल विसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी।।
कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानि।।
मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। रामरूप देखहिं किमि दीना।।
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
हरिमाया बस जगत भुमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।
बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन कर कहा करिअ नहिं काना।।
 
कबीर के कई अध्येताओं का मानना है कि तुलसीदासजी द्वारा रामचरितमानस में व्यक्त किए गए उपर्युक्त विचार राम के संबंध में कबीर की अवधारणा की भर्त्सना करने के उद्देश्य से ही शिव-पार्वती संवाद के रूप में प्रस्थापित किए गए हैं। यहाँ तक कि पूरे उत्तरकांड की रचना के पीछे एकमात्र यही उद्देश्य माना जाता है। प्रश्न उठता है कि आखिर इन दो महान राम भक्त कवियों के बीच दृष्टिकोण का ऐसा घोर अतंराल कहाँ है कि तुलसीदासजी को इतने कटुतम शब्दों में कबीर की ‘बानी’ पर प्रहार करने के लिए उद्यत होना पड़ा। इतना ही नहीं, हिन्दी साहित्य के महानतम आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की राम के प्रति भक्ति को महज शुष्क ज्ञानमार्गी साधना बतलाकर उनकी रचनाओं को श्रेष्ठ साहित्य का दर्जा देने से इन्कार कर दिया। यदि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की कविता के महत्व को पहचानने और उसे साहित्य में प्रतिष्ठित करने के लिए उत्कट प्रयास नहीं किए होते तो आज हम कबीर की रचनाओं के आस्वादान से वंचित रह गए होते। प्रस्तुत लेख में हम तुलसी के राम और कबीर के राम के बीच बुनियादी अंतर की पड़ताल करने और उसके कारणों की तह में जाने का प्रयास करेंगे।
 
कबीर के राम पुराण-प्रतिपादित अवतारी राम नहीं हैं। अवतारी राम कबीर को पसंद नहीं आते। अवतारवाद और कबीर के विचारों में कोई सामंजस्य नहीं है। कबीर के राम बुनियादी रूप से तुलसी के राम से भिन्न हैं। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं :
 
नां दशरथ धरि औतरि आवा। नां लंका का रावं सतावा।
 
कहै कबीर विचार करि, ये ऊले व्यवहार।
 
याहीथें जे अगम है, सो वरति रह्या संसार।’
 
कबीर के राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं। वह कहते हैं:
 
व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी।
 
रावण-राव कवनसूं कवन वेद को रोगी।
 
कबीर राम की किसी खास रूपाकृति की कल्पना नहीं करते, क्योंकि रूपाकृति की कल्पना करते ही राम किसी खास ढाँचे (फ्रेम) में बँध जाते, जो कबीर को किसी भी हालत में मंजूर नहीं। कबीर राम की अवधारणा को एक भिन्न और व्यापक स्वरूप देना चाहते थे। इसके कुछ विशेष कारण थे, जिनकी चर्चा हम इस लेख में आगे करेंगे। किन्तु इसके बावजूद कबीर राम के साथ एक व्यक्तिगत पारिवारिक किस्म का संबंध जरूर स्थापित करते हैं। राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।
 
कबीर नाम में विश्वास रखते हैं, रूप में नहीं। हालाँकि भक्ति-संवेदना के सिद्धांतों में यह बात सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है कि ‘नाम रूप से बढ़कर है’, लेकिन कबीर ने इस सामान्य सिद्धांत का क्रांतिधर्मी उपयोग किया। कबीर ने राम-नाम के साथ लोकमानस में शताब्दियों से रचे-बसे संश्लिष्ट भावों को उदात्त एवं व्यापक स्वरूप देकर उसे पुराण-प्रतिपादित ब्राह्मणवादी विचारधारा के खाँचे में बाँधे जाने से रोकने की कोशिश की। इस बात को बाद में कबीर के ही टक्कर के, परंतु ब्राह्मणवादी विचारधारा के पोषक भक्त-संत तुलसीदास पचा नहीं सके और उन्होंने एक तरह से राम-नाम के साथ कबीर द्वारा संबद्ध की गई क्रांतिधर्मिता को निस्तेज करने के लिए ‘रामचरितमानस’ की रचना की। कबीर के राम-नाम की अवधारणा को अपने आस्थापरक विवेक से काफी कुछ महात्मा गाँधी ने भी समझा और आत्मसात किया था। यह अवधारणा लाख षड्यंत्रों और कुचेष्टाओं के बावजूद लोकमानस में अब भी जीवित है और आगे बनी रहने वाली है।
 
कबीर के लिए राम का वेद-पुराण सम्मत होना जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि तुलसीदासजी और उनके बाद से लेकर अब तक के बहुत से विद्वानों ने कबीर के राम को वेद-पुराण प्रतिपादित अवधारणा के दायरे में समेट लेने की बेहद कोशिश की है। लेकिन हैरानी और सुखद आश्चर्य की बात है कि वे लोग भी जो वेदों और पुराणों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखते, कबीर के ‘रमता राम’ की अवधारणा से न सिर्फ सहमत होते हैं, बल्कि उसे चित्त-संस्कारवश आत्मसात भी करते हैं।
 
कबीर में अपनी राम-विषयक अवधारणा को लेकर कोई मतांधता नहीं दिखाई देती। वे इस संबंध में कोई अड़ियल रुख नहीं अपनाते। वे तुलसीदासजी की तरह कृष्ण की मूर्ति के सामने भी यह हठ नहीं करते कि धनुष-बाण लेकर आओ, तब ही मैं तुम्हारे सामने शीश नवाऊंगा। ऐसी आग्रही भक्ति का भाव न तो कबीर में दिखाई देता है और न ही किसी अन्य निर्गुण भक्त संत में। बल्कि कबीर की दृष्टि तो ठीक इसके विपरीत है। अवतारवाद से संबद्ध कुछ सामाजिक अवधारणाओं के चलते उसका विरोध करने के बावजूद कबीर अवतारों के उन लीला-प्रसंगों को मुग्ध-भाव से स्वीकार करते हैं जिनमें प्रेम और ईश्वर की सर्वव्यापकता के मार्मिक चित्रण हुए हैं। कबीर राम के पर्यायवाची के रूप में ईश्वर के उन बहुत से नामों का प्रयोग भी करते हैं जो पुराण-परंपरा और विभिन्न संप्रदाय-मज़हबों में ईश्वर के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। वे अपने राम को हरि, गोविन्द, केशव, माधव, नरसिंह, अल्लाह, खुदा, साहब, करीम, रहीम, रब, गोरख, विष्णु, महादेव, सिद्ध, नाथ आदि कुछ भी कह लेते थे, कहने की रौ में जो नाम सहज रूप से आ जाए। लेकिन ईश्वर के लिए वह चाहे जिस किसी नाम का प्रयोग करते हों, ऐसा करते समय ईश्वर के प्रति उनकी धारणा में कोई अंतर नहीं आता। इस मामले में सगुण भक्त कवि कुछ विशेष सजगता बरतते हैं, वे अपने आराध्य को ब्रह्म का अवतार मानते हुए भी न सिर्फ उनके किसी खास रूप के प्रति निष्ठा रखते हैं, बल्कि उनके नाम के पर्यायवाचियों का प्रयोग करते हुए भी सावधानी बरतते हैं। वे अपने आराध्य को दूसरे नाम-रूपों से भिन्न बताने की सतर्क कोशिश करते हैं। इन सबके बावजूद यह एक गंभीर अध्ययन का विषय है कि कबीर जैसे निर्गुण भक्त कवि ‘राम’ नाम पर ही विशेष बल क्यों देते हैं।
 
कबीर के राम निर्गुण-सगुण के भेद से परे हैं। दरअसल उन्होंने अपने राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया-‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ इस ‘निर्गुण’ शब्द को लेकर भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। कबीर का आशय इस शब्द से सिर्फ इतना है कि ईश्वर को किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। जो सारी सीमाओं से परे हैं और फिर भी सर्वत्र हैं, वही कबीर के निर्गुण राम हैं। इसे उन्होंने ‘रमता राम’ नाम दिया है। अपने राम को निर्गुण विशेषण देने के बावजूद कबीर उनके साथ मानवीय प्रेम संबंधों की तरह के रिश्ते की बात करते हैं। कभी वह राम को माधुर्य भाव से अपना प्रेमी या पति मान लेते हैं तो कभी दास्य भाव से स्वामी। कभी-कभी वह राम को वात्सल्य मूर्ति के रूप में माँ मान लेते हैं और खुद को उनका पुत्र। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के साथ भी इस तरह का सरस, सहज, मानवीय प्रेम कबीर की भक्ति की विलक्षणता है। यह दुविधा और समस्या दूसरों को भले हो सकती है कि जिस राम के साथ कबीर इतने अनन्य, मानवीय संबंधपरक प्रेम करते हों, वह भला निर्गुण कैसे हो सकते हैं, पर खुद कबीर के लिए यह समस्या नहीं है। वह कहते भी हैं:
 
“संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिसे!”
 
लेकिन बाद में तुलसीदासजी ने जब ‘रामचरितमानस’ में ‘अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा’ कहकर कबीर के ‘रमता राम’ और अपने ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ अवतारी राम को ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के आधिपत्यवादी उद्देश्यों के तहत एक में मिलाने की कोशिश की, तब से गड़बड़ियाँ शुरू हो गईं और यह गड़बड़ी आज तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पीड़ादायी सामाजिक-राजनीतिक दंश के रूप में हमारे सामने है।
 
कबीर को सीधे-सीधे अवतारी राम से विशेष परेशानी नहीं है। कबीर को परेशानी है अवतारी राम के साथ जुड़ी उस पुराण-प्रतिपादित अवधारणा से, जिसके मुताबिक राम वर्णाश्रम व्यवस्था रूपी धर्म की रक्षा करने और उस व्यवस्था की ‘मर्यादा’ को न मानने वालों को दंडित करने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं। धर्म की पुराण-प्रतिपादित अवधारणा वर्णाश्रम-व्यवस्था का ही पर्यायवाची है। जबकि कबीर इस वर्णाश्रम-व्यवस्था के घोरतम विरोधी हैं। वह वर्णाश्रम व्यवस्था कबीर को कतई मान्य नहीं है, जिसमें किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए अछूत और पशु से भी हीन मान लिया जाता हो, जिसमें सिर्फ इसलिए उसे ज्ञान और भक्ति के अयोग्य ठहरा दिया जाता हो, क्योंकि वह किसी खास जाति में पैदा हुआ है। कबीर का उस वर्ण-व्यवस्था के प्रति गहरा विरोध है जिसमें बहुजन समाज के व्यक्तियों को शताब्दियों से पीढ़ी दर पीढ़ी दंडित किया जा रहा है और उन्हें इस दंड के कारण का पता तक नहीं है।
 
“कबीर के नस-नस में इस अकारण दंड के प्रति विद्रोह का भाव भरा था”- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की यह पंक्ति वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति कबीर के तीव्र विरोध को सटीकता से रेखांकित करती है। वर्णाश्रम-व्यवस्था के हितचिंतकों द्वारा अपने उद्देश्यों के अनुकूल राम कथा को इस सूक्ष्मता से बुना गया है कि लोकमानस में वे पूरी तरह से रच-बस गई हैं। यह परिघटना कोई थोड़े समय में घटित नहीं हुई है। निश्चय ही यह क्रम कबीर के बहुत पहले से ही, पुराणों के शुरुआती रचना-काल से ही शुरु हो गया होगा। कबीर को भी लोकपरंपरा से अवतारी राम के जीवन की वे घटनाएँ जानने-सुनने को मिली होंगी और उनपर सहज विश्वास कर लेने के कारण वह उन सबको सच भी मानते होंगे। वे घटनाएँ कबीर की मानवीय संवेदना के ठीक विपरीत थीं। कबीर कैसे स्वीकार कर सकते थे कि उन्हीं के समान एक दलित, शंबूक को सिर्फ इस अपराध के लिए कि वह शूद्र होते हुए भी आत्म-साक्षात्कार पाने की अनधिकारिक चेष्टा कर रहा था, जिस राम ने मृत्युदंड दे दिया था, वह ईश्वर के अवतार हैं, खुद परब्रह्म हैं!
 
कबीर की संवेदना में जिस ईश्वर की कल्पना और अनुभूति व्याप्त है, वह ईश्वर तो न सिर्फ सबको एक समान मानता है, बल्कि सबमें एक समान भाव से व्याप्त है। उनकी संवेदना में बसे राम तो ‘बाहर-भीतर सकल निरंतर’ हैं। ब्राह्मणवादी वर्चस्वशील व्यवस्था के स्वार्थों और हितों के अनुरूप ढाले गए, पुराण-प्रतिपादित अवतारी राम भला कबीर की विराट मानवीय संवेदना के धरातल पर कैसे प्रतिष्ठित हो सकते थे! ‘रमता राम’ एक मौलिक अवधारणा है। हालाँकि कबीर के पहले भी यह अवधारणा विद्यमान थी, लेकिन जनसामान्य में इस अवधारणा को पहली बार कबीर ने ही प्रतिष्ठित किया। ‘राम’ नाम की कुछ व्याख्याएँ पहले से प्रचलित थीं। एक व्याख्या यह थी कि निरंतर ब्रह्म के ध्यान में लीन रहने वाले योगियों के हृदय में जो रमण करते हैं, वह राम हैं। एक दूसरी व्याख्या इससे भी अधिक व्यापक थी कि जो सृष्टि के कण-कण में रमण करते हैं, वही राम हैं। भक्त प्रह्लाद ने भी इसी भाव का साक्षात कर दिखाया था। कबीर की संवेदना इसी व्याख्या के अनुकूल थी। यह ईश्वर की सबसे सहज और सरल व्याख्या थी। कबीर ने कण-कण में रमने वाले इसी ‘रमता राम’ को अपना आराध्य बनाया। राम-नाम का मंत्र तो उन्हें सदगुरु से ही मिल गया था। गुरु रामानंद की राम-नाम की अवधारणा भी व्यापक थी, वह राम को महज अवतार नहीं मानते थे, बल्कि स्वयं परात्पर ब्रह्म मानते थे। यदि यह सच है कि गुरु रामानंद से ही कबीर को भक्ति और राम-नाम की दीक्षा मिली थी, तब यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि कबीर के रमता राम की अवधारणा में भी रामानंद का विशेष प्रभाव है। लेकिन कबीर के ‘रमता राम’ में जो धार है, जो तेजस्विता है, वह कबीर की अपनी है। उन्होंने अपने ‘रमता राम’ को वर्णाश्रम-व्यवस्था के प्रतीक ‘अवतारी राम’ के मुकाबले खड़ा कर दिया और यह एक अचूक अस्त्र साबित हुआ।
 
लोकमानस की सतत संवर्धनशील परिकल्पना भी राम को सिर्फ कथानकों और आख्यानों से कहीं बहुत व्यापक मानती आई है। आख्यानों के बाहर के राम को कबीर ने अपनी विलक्षण भक्ति के माध्यम से परिपुष्ट कर दिया। ‘रमता राम’ की, आख्यानों के बाहर के राम की, निर्गुण राम की, समस्त मूर्तियों से भी अधिक व्यापक मूर्ति की भक्ति भी संभव है, यह बात कबीर ने भली-भाँति सिद्ध कर दी। कबीर के राम को हर कोई अपनी भावना, अपनी कल्पना के अनुसार अपना सकता है। हर कोई अपना खुद का ‘राम’ गढ़ सकता है। हर कोई सहज भक्ति कर सकता है। ‘जहँ-जहँ डोलों सोई परिक्रमा, जो कछु करों सो सेवा। जब सोवों तब करों दंडवत, पूजों और न देवा।’ इस तरह कबीर ने बिना किसी से मंदिर में जाने का अधिकार माँगे सबको राम सुलभ करा दिया। अब चमार, जुलाहे और अछूत भी राम को पूज सकते हैं, पा सकते हैं। कबीर ने राम का लोकतंत्रीकरण कर दिया। दरअसल, ईश्वर का यही लोकतंत्रीकरण हिन्दी साहित्य का भक्ति आंदोलन था, जिसकी स्वतंत्रतामूलक एवं समतामूलक प्रवृत्तियों को तमाम कोशिशों के बावजूद दोबारा कभी अवरुद्ध नहीं किया जा सका। कबीर के ‘रमता राम’ की आज के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में यही उपादेयता और प्रासंगिकता है।
 
यदि काव्य कला, सौंदर्य और संवेदना के धरातल पर भी देखें तो कबीर की रचनाओं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे महान आलोचकों द्वारा शुष्क, ज्ञानमार्गी, अटपटी, रहस्यवादी, ज्ञान की प्रकृत परंपरा और प्रक्रिया का निषेध करने वाली, लोकविरोधी आदि विशेषण दिया जाना अत्याचार ही लगता है। जिस लोकधर्म और लोकमंगल की भावना को काव्य का केन्द्रीय सरोकार बताया जाता है, उसी कसौटी पर कबीर की काव्य-संवेदना किसी भी अन्य कवि से उन्नीस नहीं ठहराई जा सकती। व्यापक मानवता के प्रति उन्मुख कबीर के काव्यगत सरोकार सिर्फ इसलिए लोकविरुद्ध नहीं हो जाते कि वह ईश्वर को किसी खास देश-काल-रूप-कथानक की सीमा में मानने की बजाय उसे सृष्टि के कण-कण में व्याप्त मानते हैं। कबीर सिर्फ इसलिए रहस्यवादी और ज्ञान की प्रकृत परंपरा का निषेध करने वाले नहीं हो जाते क्योंकि वह संस्कृत के आदिम ग्रंथों में लिखी हुई बातों को बिना कोई तर्क-विवेक किए ज्यों-का-त्यों स्वीकार करने से इन्कार कर देते हैं और अपनी ‘आँखन देखी’ सच पर डटे रहते हैं। कबीर की भाषा सिर्फ इसलिए शुष्क और अटपटी नहीं हो जाती कि वह काव्य-परंपरा से अनभिज्ञ हैं और वह उसकी परवाह भी नहीं करते। कबीर की भाषा कितनी सरस और काव्योनुकूल है इसका पता तो सिर्फ इसी से लग जाता है कि एक निरक्षर संत की वाणी होकर भी वह सैकड़ों वर्षों से लोककंठों में सुरक्षित है और आगे भी सुरक्षित रहने वाली है। और यह तो सचमुच आश्चर्य की बात है कि कबीर जैसे प्रेम के अद्भुत दीवाने को आचार्य शुक्ल जैसे उद्भट विद्वान ने ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियों के पाले में बैठाकर उनकी रचनाओं को मानक साहित्य मानने से इन्कार कर दिया।
 
अंत में एक बात और, क्या कबीर सचमुच राम-नाम के द्वंद्व से भी ऊपर उठे हुए नहीं थे? कबीर का वह मशहूर पद ‘अलह राम की गम नहीं, तहां कबीर रहा ल्यौ लगाय’ क्या हमें नामातीत की तरफ नहीं ले जाता? ‘हमरे राम रहीम करीमा, कैसो अलह राम सति सोई। बिसमिल मटि बिसंभर एकै, और न दूजा कोई।।’-यह पद क्या हमें नामों के द्वंद्व से भी मुक्त होने की प्रेरणा नहीं देता? जिस प्रश्न पर बुद्ध कभी मौन रह जाया करते थे, उसका उत्तर देने की व्यर्थता क्या कबीर ने भी अपनी संपूर्ण मुखरता के बावजूद इस तरह के पदों के माध्यम से नहीं सिद्ध कर दी? इस धरातल पर यदि हम कबीर को देखें तो वह उतने ही ऊँचे, विराट और असाधारण नजर आते हैं जितना हमारी मानस-कल्पना में बसा कोई भी महाकवि अधिक से अधिक हो सकता है।
हिन्दू आध्यात्मिकता की पुनर्व्याख्या की सबसे स्पष्ट मिसाल मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विवेचन के सन्दर्भ में मिलती है। इस विवेचन में भक्ति आन्दोलन की सराहना और सख्त आलोचना दोनों ही एक साथ उपस्थित है। बालकृष्ण भट्ट के लिए भक्तिकाल की उपयोगिता अनुपयोगिता का प्रश्न मुस्लिम चुनौती का सामना करने से सीधे सीधे जुड़ गया था। इस दृष्टिकोण के कारण भट्ट जी ने मध्यकाल के भक्त कवियों का काफी कठोरता से विरोध किया और उन्हें हिन्दुओं को कमजोर करने का जिम्मेदार भी ठहराया। भक्त कवियों की कविताओं के आधार पर उनके मूल्यांकन के बजाय उनके राजनीतिक सन्दर्भों के आधार पर मूल्यांकन का तरीका अपनाया गया। भट्ट जी ने मीराबाई व सूरदास जैसे महान कवियों पर हिन्दू जाति के पौरुष पराक्रम को कमजोर करने का आरोप मढ़ दिया। उनके मुताबिक समूचा भक्तिकाल मुस्लिम चुनौती के समक्ष हिन्दुओं में  मुल्की जोश’ जगाने में नाकाम रहा। भक्त कवियों के गाये भजनों ने हिन्दुओं के पौरुष और बल को खत्म कर दिया। उन्होंने भक्त कवियों की इसी कमजोरी और नाकामी के विषय में लिखा :
 
 मीराबाई, सूरदास, कुम्भनदास, सनातन गोस्वामी आदि कितने महापुरुष जिनके बनाये भजन और पदों का कैसा असर है जिसे सुन कर चित्त आर्द्र हो जाता है। मुल्की जोश की कोई बात तो इन लोगों में भी न थी उसकी जड़ तो न जानिये कब से हिन्दू जाति के बीच से उखड़ गयी।”
 
भक्तिकाल सम्बन्धी अपने विवेचन में बालकृष्ण भट्ट जी ने मुस्लिम शासन के राजनीतिक सन्दर्भों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया और वल्लभाचार्य व चैतन्य महाप्रभु के भक्ति स्वरूप की व्याख्या करने के स्थान पर तत्कालीन परिस्थितियों पर अधिक जोर देते हुए लिखा : ये लोग ऐसे समय में हुए जब देश का देश म्लेच्छाक्रान्त हो रहा था और मुसलमानों के अत्याचारों से नाकों में प्राण आ लगे थे। इससे आध्यात्मिकता पर इन्होंने बिलकुल जोर न दिया।
 
भक्तिकालीन सन्तों पर इल्जाम लगाना कि उन्होंने आध्यात्मिकता पर जोर नहीं दिया , अजीबोगरीब बात थी। जाहिर है कि भट्ट जी के मस्तिष्क में आध्यामिकता ईश्वरीय भक्ति व चिन्तन के बजाय लौकिक शक्ति व सम्पन्नता का पर्याय बन चुकी थी। मूल्यांकन की कसौटियां अगर काल्पनिक धारणाओं से निर्मित की जाती हैं तब वस्तुगत यथार्थ की व्याख्या भी वैज्ञानिक और वस्तुगत नहीं रह पाती। इतिहास के एक विशिष्ट चरण के आधार पर इतिहास की समूची प्रक्रिया के विषय में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। भव्य और श्रेष्ठ की तुलना में पतन तथा विकार से भरे ऐतिहासिक युग, चरण तथा घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। बालकृष्ण भट्ट ने भी इतिहास की व्याख्या ऐसे नजरिये से की जो यह जानने और बताने के लिए अधिक उत्सुक था कि हिन्दुओं की शक्ति और आत्मगौरव में कब उन्नति हुई और कब गिरावट आयी। मध्यकाल में उन्होंने भक्ति भावना के विकास के साथ ही यह भी शिकायत की कि हमारी आध्यात्मिक उन्नति के सुधार पर किसी की दृष्टि न गयी। इसके अतिरिक्त आध्यात्मिकता पर बिल्कुल जोर न देने के कारण भक्त कवियों व आचार्यो की निन्दा करते हुए लिखा कि ऋषि प्रणीत प्रणाली को हाल के इन आचार्यों ने सब भांति तहस नहस कर डाला।
 
जाहिर है कि बालकृष्ण भट्ट ने भक्ति और अध्यात्म के मध्य अपनी मर्जी से एक विभाजन खड़ा कर दिया था। उनके अनुसार भक्ति का सम्बन्ध रसीली और हृदयग्रहिणी प्रवृत्तियों , विमलचित्त अकुटिल भाव और सेवक सेव्य भाव से है जबकि अध्यात्म का सम्बन्ध ज्ञान, कुशाग्र बुद्धि और अन्ततः जातीयता ( नेशनैलिटी) से होता है। इसी आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “भक्ति ऐसी रसीली और हृदयग्रहिणी हुई कि इसका सहारा पाय लोग रूखे ज्ञान को अवज्ञा और अनादर की दृष्टि से देखने लगे और साथ ही जातीयता नेशनैलिटी को भी विदाई देने लगे जिसके रफूचक्कर हो जाने से भारतीय प्रजा में इतनी कमजोरी आ गयी कि पश्चिमी देशों से यवन तथा तुरुक और मुसलमानों के यहां आने का साहस हुआ।”
 
भक्तिकाल की यह पूर्वग्रहपूर्ण आलोचना आज शायद ही किसी को स्वीकार हो। लेकिन कमाल की बात है कि रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद दिवेदी तक के भक्तिकाल सम्बन्धी मतों का बारीक विवेचन करने वाली हिन्दी आलोचना बालकृष्ण भट्ट की भक्तिकाल से जुड़ी धारणाओं पर ध्यान नहीं दे सकी। हकीकत यह है कि अध्यात्म और जातीयता का यह सम्बन्ध धर्म और राजनीति के सम्बन्धों की वकालत करता था। हिन्दी का समूचा नवजागरणकालीन चिन्तन कुरीतियों और आडम्बरों को समाप्त करने की दृष्टि से हिन्दू धर्म की आन्तरिक संरचना में सुधार की बात तो कहता था , लेकिन हिन्दुओं की सांस्कृतिक धार्मिक अस्मिता का उपयोग किये बगैर हिन्दुओं के राजनीतिक पुनरुत्थान को असम्भव मानता था। भक्ति आन्दोलन में चूंकि राजनीतिक ढांचे को धार्मिक संस्थाओं व विचारों से नियन्त्रित करने का स्पष्ट सरोकार नहीं मिलता, इसलिए भट्ट जी जैसे लेखकों ने उसकी आलोचना की। यह आलोचना इस कल्पना से प्रेरित थी कि प्राचीनकाल में धर्म और अध्यात्म राजनीति से विलग नहीं हुए थे इसलिए हिन्दू जाति के शौर्य, मानसिक शक्ति और वीर्य जैसे गुण भी बने रहे और जातीयता का भावबोध भी।
 

बालकृष्ण भट्ट

 

परम सत्ता जहां प्रकृति के बन्धन से मुक्त है, उसे निर्गुण और जहां बन्धनयुक्त है, उसे सगुण कहते हैं। सगुण में भी दो विभाग हैं। एक है उनका रूप और दूसरा अ-रूप। मनुष्य में जो बुद्धि, बोधि तथा मैं-पन आदि हैं, वे सब अ-रूप हैं। इन्हें देखा नहीं जा सकता। लेकिन मनुष्य को तो देखा जा सकता है। उसी तरह सगुण ब्रह्मा की भी बुद्धि, बोधि तथा ‘मैं-पन’ अ-रूप हैं। इसी कारण हम उसे देख नहीं सकते हैं।

दूसरा है रूपयुक्त। जैसे व्यक्ति अपने मन या चित्त को नहीं देख सकता है। परन्तु जैसे, हाथी के बारे में सोचते समय उसके चित्त में हाथी का रूप साकार हो उठता है -इतना स्पष्ट कि मन उसे देख लेता है। इसलिए चित्त भी कभी अ-रूप है और कभी रूपयुक्त। वैसे ही परमात्मा का चित्त भी रूपयुक्त है -यह दृश्यमान जगत जिसे हम विश्व कहते हैं, उनके चित्त में उभरने वाली आकृति है। यह विश्व ही रूप का समुद्र है और जब यह विषय होगा तब मन सगुण ब्रह्मा हो जाएगा।

जहां सीमा का बन्धन है, वहीं रूप है। जहां सीमा नहीं है, असीम है, वही अ-रूप है। यहां गुण रह भी सकता है और नहीं भी। जहां गुण है उसे सगुण और जहां गुण नहीं है, उसे निर्गुण कहते हैं।

परमात्मा का चित्त है विश्व। यह उनकी चैत्तिक सृष्टि है। यह रूपवान है, इसलिए इसमें सीमा है।
सगुण रूप में ईश्वर के साकार स्वरूप का नाम ही अवतार है । र्निगुण निराकार का ध्यान तो सम्भव नहीं है, पर सगुण रूप में आकर वह इस संसार के कार्यों में फिर क्रम और व्यवस्था उत्पन्न करते हैं । हमारा प्रत्येक अवतार सर्व व्यापक चेततना सत्ता का मूर्त रूप है । श्री सुदर्शनसिंह ने लिखा है-
”अवतार शरीर प्रभु का नित्य-विग्रह है । वह न मायिक है और न पाँच भौतिक । उसमें स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों का भेद भी नहीं होता । जैसे दीपक की ज्योति में विशुद्ध अग्नि है, दीपक की बत्ती की मोटाई केवल उस अग्नि क आकार का तटस्थ उपादान कारण है, ऐसे ही भगवान का श्री विग्रह शुद्ध सचिदानंदघन हैं । भक्त का भाव, भाव स्तर से उद्भूत है और भाव-बिस्तर नित्य धाम से । भगवान का नित्य-विग्रह कर्मजन्य नहीं है । जीवन की भाँति किसी कर्म का परिणाम नहीं है । वह स्वेच्छामय है, इसी प्रकार भगवानवतार कर्म भी आसक्ति की कामना या वासना के अवतार प्रेरित नहीं है, दिव्य लीला के रुप है । भगवान के अवतार के समय उनके शरीर का बाल्य-कौमारादि रूपों में परिवर्तन दीखता है, वह रूपों के आविर्भाव तथा तिरोभाव के कारण ।”
जिस परमात्मा की वेदों में कविरूप में प्रशंसा की गई है अथवा जिसे क्रान्तदर्शी कहा गया है, विद्वान् लोग जिसके सम्बन्ध में यह कहते हैं कि वह परमात्मा दो रूपोंवाला है-सगुण और निर्गुण है-दयालु आदि गुणों के कारण वह सगुण है और निराकार, अकाय आदि गुणों के कारण निर्गुण है-ऐसे परमेश्वर को मनुष्यों में विद्वान् लोग अपने जीवन में धारण करते हैं-प्रकट करते हैं।

मनुष्य अपने चित्त में इस विश्व के जितने व्यापक रूप को धारण करेगा, उसका चैत्तिक विषय जितना बड़ा होगा, उसी के अनुसार उसकी श्रेष्ठता निर्धारित होगी। अत: साधना है मन के विषय को बड़ा बनाना।

समाज में मनुष्य यदि एक विशेष जिला, प्रान्त, देश आदि को लेकर व्यस्त रहे तो उनका चैत्तिक विषय छोटा ही रह जाएगा। उनमें ब्रह्मा साधना कभी भी नहीं हो सकती। इसके लिए उसे पूरे विश्व को अपने चित्त में धारण करना होगा। परमात्मा के लिए हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई आदि कुछ नहीं है। साधक का देश है विश्व-ब्रह्माण्ड और जाति है जीव मात्र।

धामिर्क साधना के लिए संपूर्ण जगत को अपना आलम्बन (विषय) बनाना चाहिए। जो विश्व-एकतावाद का प्रचार करते हैं, परन्तु मन में जिलावाद, जातिवाद तथा देशवाद आदि को प्रश्रय देते हैं, वे कपटी हैं। साधक को यह समझना चाहिए कि यह संपूर्ण विश्व मेरा है और हम इस पूरे विश्व के हैं।

समाज है मनुष्य की सामूहिक संस्था। इसमें एक सामूहिक संगति रहती है। जब तक मनुष्य इस विश्व-एकतावाद को नहीं अपनाएगा, तब तक समाज एक नहीं बन सकता है। आदर्श की भिन्नता के अनुसार सबका भिन्न-भिन्न समाज बनता रहेगा।

विश्व शान्ति के लिए इसी सिद्धांत को लेकर चलना होगा। इसी से धर्म की प्रतिष्ठा होगी। संप्रदायवाद और पंथवाद के द्वारा यह कभी संभव नहीं है। मजहब (रिलिजन) से जीवों की मुक्ति होने वाली नहीं है। सर्व-धर्म समन्वय भी एक कपटाचरण है। विश्व समभाव के लिए निर्गुण ब्रह्मा को ही मानना ही पड़ेगा तथा पूरे विश्व को अपने चित्त में रखना होगा। इस विश्व-एकतावाद को छोड़कर और बाकी जितने भी मार्ग हैं, वे हैं मृत्यु के मार्ग। मनुष्य को जीवन की साधना करनी चाहिए, न कि मौत की।

जगत में शान्ति की प्रतिष्ठा के लिए विश्व-एकतावाद को मानना पड़ेगा, किन्तु शान्ति भी आपेक्षिक सत्य है। पापी जब साधुओं के डर से सिर झुकाकर चलता है, तब उसे सात्विक शान्ति कहते हैं और जब सिर उठाकर चलता है, तब तामसिक शान्ति कहते हैं। विश्व-एकतावाद जिनका ध्येय है, वे अवश्य ही सात्विक प्रकृति के व्यक्ति होंगे। आत्मविभाजनी शक्ति को जड़ से नष्ट करना होगा। इसके लिए अपनी मानसिक तथा आध्यात्मिक साधना के द्वारा निरंतर अपना चैत्तिक विकास करते रहना होगा।

भगवान का अवतार नीति और धर्म की स्थापना के लिए होता रहा है । जब समाज में पापों, मिथ्याचारों, दूषितवृत्तियों, अन्याय का बाहुल्य को जाता है, तब किसी न किसी रूप में पाप-निवृत्ति के लिए भगवान का स्वरूप प्रकट होता है । वह एक असामान्य प्रतिभाली व्यक्ति के रूप में होता है । उसमें हर प्रकार की शक्ति भरी रहती थी । वह स्वार्थ, लिप्सा के मद को, पाप के पुञ्ज को अपने आत्म-बल से दूर कर देता है । दुराचार, छल कपट, धोखा, भय, अन्याय के वातावरण को दूर कर मनुष्य के हृदय में विराजमान देवत्व की स्थापना करता है ।
 


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