हिन्दी साहित्य

निर्गुण काव्यधारा

Posted on: अक्टूबर 6, 2008

हिन्दी साहित्य में संत कवि जिस विचारधारा को लेकर अपनी वाणी की रचना में प्रवृत्त हुये हैं उनका मूल सिद्ध तथा नाथ साहित्य में है। कई संत कवियों ने अपनी भाव-विभोर वाणी द्वारा आध्यात्मिक साधना तथा भक्ति अभ्युत्थान का कार्य किया।
संतों ने मानव जीवन पर जोर देते हुये उसको सार्थक करने हेतु सत्संग, नामस्मरण, भजन-कीर्तन, पूजन-अर्चन, गुरू महत्व, साधना महत्व, योग महिमा, सद्वचन, माया निरूपण, संसार की असारता को दर्शाया है। ये बातें उन्होंने सरल भाषा में सहज रूप में कही हैं।
मानव समुदाय में आस्था स्थापित करने और उसे अपनाने के लिए कई संतों ने निगुर्ण-सगुण साधना को अपनाया। इसमें अवतारवाद को स्वीकार कर लेने के फलस्वरूप सगुण साधना को एक साकार आलम्बन मिल जाता है, जिसके कारण उसे सामान्य अशिक्षित व्यक्ति भी सहज ही स्वीकार कर सकता है। निर्गुण साधना का आलम्बन निराकार है, फलस्वरूप वह जन साधारण के लिए ग्राह्य नहीं हो सकती। सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से सगुण साधना-निर्गुण साधना की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। किन्तु इस आधार पर निर्गुण साधना की सत्ता या महत्व के विषय में संदेह नहीं किया जा सकता। हालांकि यह सत्य है कि सगुण साधना में आस्था रखने वाले साधकों ने निर्गुण साधना को लेकर तरह-तरह की शंकाएं उठायी हैं। उनका मूल तर्क है कि निर्गुण ब्रह्मज्ञान का विषय तो हो सकता है किंतु भक्ति साधना का नहीं, क्योंकि साधना तो किसी साकार मूर्त और विशिष्ट के प्रति ही उन्मुख हो सकती है। सामान्य जनता का विश्वास और आचरण भी इसी तर्क की पुष्टि करता दिखाई देता है। साधना के व्यक्तित्व स्वरूप के संबंध में कहें तो ‘स्नेह पूर्वक ध्यान ही साधना है’ तो दूसरी ओर यदि स्नेह पूर्वक ध्यान ही साधना है तो फिर निर्गुण की साधना में स्नेह पूर्वक ध्यान क्यों नहीं किया जा सकता?
सामान्य रूप से यह माना जाता है कि निर्गुण साधना का संबंध ज्ञान मार्ग के साथ है और सगुण साधना का भक्ति के साथ। इसलिए जब कोई निर्गुण साधना की बात करता है तो जन समुदाय का ध्यान नैसर्गिक रूप से ज्ञान-मार्ग की ओर जाता है, भक्ति मार्ग की ओर नहीं, और इस प्रकार सगुण ब्रह्म का उल्लेख करते ही भक्ति मार्ग अपनी समग्र पूजा-विधि के साथ उपस्थित हो जाता है। इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि भक्ति और पूजा-अर्चना अभेद माने जाने लगे। मंदिरों में जाना, भगवान पर दीप, अर्ध्य आदि चढ़ाना, मूर्ति की सेवा करना औैर उसकी आरती आदि उतारना साधना के अभिन्न अंग माने जाने लगे।
वस्तुत: निर्गुण-सगुण साधना में उसकी अनुभूति में बुनियादी समानता पाई जाती है। यदि ब्रह्म के साकार और निराकार रूपों में गुणों की समानता है और साधना-पद्धति में इन समान गुणों की स्वीकृति भी हो जाती है, तो निर्गुण की साधना को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। जिस प्रकार सगुण साधना के लिए निर्गुण की स्वीकृति आवश्यक है, उसी प्रकार निर्गुण साधना के लिए सगुण की स्वीकृति अनिवार्य है। ब्रह्म के दो रूप विद्यमान हैं सगुण और निर्गुण। सगुण रूप की अपेक्षा निर्गुण रूप दुर्लभ है, सगुण भगवान सुगम है-
सगुण रूप सुलभ अति,
निर्गुण जानि नहीं कोई,
सुगम अगम नाना चरित,
सुनि-सुनि मन भ्रम होई।
प्राचीनतम काल से ही परमात्मा-ब्रह्म के अस्तित्व के विषय में भारतीय दर्शन में वाद-विवाद चर्चित है। ऋग्वेद में पुरूष सूक्त के अंतर्गत विराट पुरूष को सृष्टि का नियंता माना गया है। वह त्रिगुणातीत होने के कारण संसार से निर्लिप्त रहता है। अथर्ववेद में व्रत, तपस्या एवं ज्ञानमार्गी व्रात्यों का आलेखन है। व्रात्यों को महादेव की संज्ञा भी प्राप्त है। उपनिषद् युग में चिंतन की शैली में पर्याप्त विकास हुआ है, और पुरुष को सत् और असत् से परे बताया तथा सूक्ष्म ब्रह्म के लिए निर्गुण विशेषण का प्रयोग लिया गया। उसे अत्यंत सूक्ष्म और इंद्रियातीत माना गया है। छांदोग्योपनिषद में विश्व पुरुष के रूप में ब्रह्म को आत्मा में व्याप्त माना है। उसकी सूक्ष्म स्थिति का प्रयोग करने के लिए वेदों में ‘नेति-नेति’ कहा गया है। कठोपनिषद में ब्रह्म को अस्पृश्य, अरूप, अरस, नित्य, अनादि, अनंत, महान, अशब्द आदि की संज्ञा दी गयी है। कुछ उपनिषदों में ब्रह्म के पर्याय के रूप में ‘निरंजन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। ‘गीता’ में श्रीकृष्ण ने स्वयं को निर्गुण रूप, अविनाशी, सर्वव्यापी, निर्विकार और इंद्रियातीत कहा है। इससे स्पष्ट है कि जिस निर्गुण मार्ग का संतों ने आश्रय लिया वह भारतीय धर्म साहित्य-चिंतन और दर्शन के लिए कोई नूतन वस्तु नहीं है। संत मत उसकी श्रृंखला की कड़ी के रूप में विद्यमान है। वस्तुत: संत वे हैं जो विषयों के प्रति निषेध रहे, सत्कर्म करे, किसी से वैर प्रदर्शित न करें, निसंग, निष्काम, पुरुष संत हैं। कालांतर में संत शब्द गूढ़ हो गया और उसका प्रयोग विशिष्ट प्रकार के भक्तों के लिए होने लगा। 10वीं सदी तक इस्लाम धर्म सिया-सुन्नी, जैन धर्म श्वेताम्बर-दिगम्बर, सनातन हिंदू धर्म शैव-वैष्णव-शाक्त, और बौद्ध धर्म वज्रयान-हीनयान की तंत्र-मंत्र साधना में परिणित हो गया। संतों ने दुराचार को फैलाने वाले सिद्धांतों का विरोध किया और एकेश्वरवाद तथा हठयोग की स्थापना की। अध्ययनहीनता के कारण धीरे-धीरे नाथपंथ का भी पदार्पण हुआ। उसी समय स्वामी रामानंद का प्रभाव बढ़ा। उनके शिष्य सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के भक्त थे।
संत मत के अनुसार संत कबीर भी रामानंद के बारह शिष्यों में से एक प्रमुख शिष्य थे। संत मत में विशेषकर कबीर का काव्य प्रमुख विषय है। ज्ञानपूर्ण भक्ति और वह भी निर्गुण सत्ता के प्रति है, जिन्हें कबीर राम, सत्यपुरुष, अलख निरंजन, स्वामी और शून्य आदि से पुकारते हैं। आलंबन के निर्गुण-निराकार होने के कारण कबीर की भक्ति में रहस्य का पुट आ गया है। आत्मा-परमात्मा का अंश है, इस संसार में वह आत्मा के विरहिणी के रूप में वर्तमान है पर सांसारिकता ने इसे संकुचित कर दिया है।
भक्ति बिना दिखे नहिं, इत नयनन हरि रूप,
साधुन को पागट भयो, बिना भक्ति हरि रूप।
संतों में गतानुगतिकता की यात्रा बढ़ने से संतकाव्यों की विशेषताओं का नाश हो गया। अपने निहित स्वार्थ वाले मठों के समान अपने ही बनाये बंधनों में जकड़ता गया। निर्गण की उपासना, मिथ्याडंबर का विरोध, गुरु की महत्ता, जाति-पांति के भेदभाव का विरोध, वैयक्तिक साधना पर जोर, रहस्यवादी प्रवृत्ति, साधारण धर्म का प्रतिपादन, विरह की मार्मिकता, नारी के प्रति दोहरा दृष्टिकोण, भजन, नामस्मरण, संतप्त, उपेक्षित, उत्पीड़ित मानव को परिज्ञान प्रदान करना आदि संत काव्य के मुख्य प्रयोजन हैं। निर्गुण आचरण की पवित्रता का संदेश लेकर जनता के सामने उपस्थित हुआ। वैष्णव नैतिक सिद्धांत, भक्ति की भावना, औपनिषदिक निर्गुणवाद, बौद्ध साधकों एवं नाथपंथियों के पारिभाषित शब्द, सूफी साधकों की साधना का अपूर्व संमिश्रण है। सगुण का प्रयोग करने वाले रामनुजाचार्य, माधवाचार्य, विष्णुस्वामी और निम्बाकाचार्य थे, जिन्होंने क्रमश: विशिष्टादैत, द्वैताभाव, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत का स्थापन किया। सगुण भक्ति का उपलब्ध ग्रंथ ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ तथा वाल्मिकी रामायण है। इसके अनुसार भगवान आभावान, सखागत वत्सल, करूणायतन तीन प्रकार के रूप में निवास करते हैं।
संक्षेप में कहें तो निर्गुण-सगुण दोनों में गुरु को अत्यंत महत्व दिया गया है। गुरु ही साधक को ईश्वर तक पहुंचाने का साधन है। शैतान अथवा माया के व्यामघातों से गुरु की कृपा से ही बचाव होता है। गुरु ही मुक्ति प्राप्ति का समवायी कारक है।
‘गुरु बिन होई न ग्यान’ और ग्यान के बिना मुक्ति असंभव है। दोनों में ‘प्रेम’ का उच्चस्थान प्रतिपादित किया गया है। संतों के यहां प्रेम व्यक्तिगत साधना में व्यवहृत है जबकि सूफियों में लौकिक प्रेम के द्वारा अलौकिक प्रेम की अभिव्यंजना है। निर्गुण मेें प्रेम मुख्य है और सगुण में गौण। दोनों साधक है। दोनों पर प्रयोग, भारतीय अद्वैतवाद, वैष्णवी-अहिंसा का समान रूप से प्रभाव है। दोनों ही निराकार ईश्वर को मानते हैं। जाति-पांति, उंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं मानते। माया या शैतान दोनों ही के साधना पथ में बाधक हैं। सगुणों ने माया को कनक-कामिनी कहा है, महाठगिनी माना है। प्रेम की दृढ़ता के लिए निर्गुणों ने शैतान की आवश्यकता को स्वीकार किया है। दोनों अव्यक्त सत्ता की प्राप्ति का संकेत करते हैं। दोनों ही रहस्यवादी हैं। दोनों के मत में रहस्यवाद से मिलन प्रेम द्वारा संभव है। आचार्य शुक्ल के अनुसार निर्गुणवादी का रहस्यवाद शुद्ध भावात्मक कोटि में आता है, जबकि सगुणवादी का रहस्यवाद साधनात्मक कोटि में क्योंकि उसमें विविध यौगिक प्रक्रियाओं का उल्लेख है। दोनों ने विरह का उन्मुक्त गान गाया है, दोनों में एक तीव्र कसक एवं वेदना है। निर्गुण का विरह तो विश्वव्यापी है। उन्होंने संपूर्ण जगत को मिथ्या माना है। विरह-वर्णन में प्रकृति की भी उपेक्षा की है, फिर भी उनका विरह व्यक्तिगत बनकर रह गया है।

 

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2 Responses to "निर्गुण काव्यधारा"

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