हिन्दी साहित्य

तुलसीदास की धार्मिक विचारधारा

Posted on: अक्टूबर 6, 2008

उनके विचार से वही धर्म सर्वोपरि है जो समग्र विश्व के सारे प्राणियों के लिए शुभंकर और मंगलकारी हो और जो सर्वथा उनका पोषक, संरक्षक और संवर्द्धक हो। उनके नजदीक धर्म का अर्थ पुण्य, यज्ञ, यम, स्वभाव, आवार, व्यवहार, नीति या न्याय, आत्म-संयम, धार्मिक संस्कार तथा आत्म-साक्षात्कार है। उनकी दृष्टि में धर्म विश्व के जीवन का प्राण और तेज है।सत्यतः धर्म उन्नत जीवन की एक महत्त्वपूर्ण और शाश्वत प्रक्रिया और आचरण-संहिता है जो समष्टि-रुप समाज के व्यष्टि-रुप मानव के आचरण तथा कर्मों को सुव्यवस्थित कर रमणीय बनाता है तथा मानव जीवन में उत्तरोत्तर विकास लाता हुआ उसे मानवीय अस्तित्व के चरम लक्ष्य तक पहुंचाने योग्य बनाता है।

विश्व की प्रतिष्ठा धर्म से है तथा वह परम पुरुषार्थ है। इन तीनों धामों में उनका नैक प्राप्त करने के प्रयत्न को सनातन धर्म का त्रिविध भाव कहा गया ह। त्रिमार्गगामी इस रुप में है कि वह ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनो में से किसी एक द्वारा या इनके सामंजस्य द्वारा भगवान की प्राप्ति की कामना करता है उसकी त्रिपथगामिनी गति है।

वह त्रिकर्मरत भी है। मानव-प्रवृत्तियों में सत्य, प्रेम और शक्ति, ये तीन सर्वाधिक ऊर्ध्वगामिनी वृत्तियां हैं। धर्म है आत्मा से आत्मा को देखना, आत्मा से आत्मा को जानना और आत्मा में स्थित होना।

उन्होंने सनातन धर्म की सारी विधाओं को भगवान की अनन्य सेवा की प्राप्ति के साधन के रुप में ही स्वीकार किया है। उनके समस्त साहित्य में विशेषतः भक्त – स्वभाव वर्णन, धर्म-रथ वर्णन, संत-लक्षण वर्णन, ब्राह्मण-गुरु स्वरुप वर्णन तथा सज्जन-धर्म निरुपण, आदि प्रसंगों में ज्ञान, विज्ञान, विराग, भक्ति, धर्म, सदाचार एवं स्वयं भगवान से संबंधित आत्म-बोध तथा आत्मोत्थान के सभी प्रकार के श्रेष्ठ साधनों का सजीव चित्रण किया गया है। उनके काव्य-प्रवाह में उल्लसित धर्म-कुसुम मात्र कथ्य नहीं बल्कि, अलभ्य चारित्र्य हैं जो विभिन्न उदात्त चरित्रों के कोमल वृत्तों से जगतीतल पर आमोद बिखेरते हैं।

महाभारत में यह वर्णन है कि ब्रह्मा ने संपूर्ण जगत की रक्षा के लिए त्रिरुपात्मक धर्म का विधान किया है –

१ वेदोक्त धर्म जो सर्वोत्कृष्ट धर्म है
२ वेदानुकूल स्मृति-शास्रोक्त स्मा धर्म तथा
३ शिष्ट पुरुषों द्वारा आचरित धर्म (शिष्टाचार)

ये तीनों सनातन धर्म के नाम से विख्यात हैं। संपूर्ण कर्मों की सिद्ध क लिए श्रुति-समृतिरुप शास्र तथा श्रेष्ठ पुरुषों का आचार, ये ही दो साधन हैं। 

मनुस्मृति के अनुसार धर्म के पांच उपादान माने गए हैं –

१ अखिल वेद
२ वेदज्ञों की स्मृतियां
३ वेदज्ञों के शील
४ साधुओं के आचार तथा
५ मनस्तुष्टि।

याज्ञवल्क्य-स्मृति में भी लगभग इसी प्रकार के पांच उपादान उपलब्ध हैं –

१ श्रुति
२ समृति
३ सदाचार
४ आत्मप्रियता
५ सम्यक् संकल्पज सदिच्छा।

भक्त-दार्शनिको ने पुराणों को भी सनातन धर्म का शाश्वत प्रमाण माना है। धर्म के मूल उपादान केवल तीन ही रह जाते हैं –

१ श्रुति-स्मृति पुराण
२ सदाचार तथा
३ मनस्तुष्टि या आत्मप्रियता।

गोस्वामी जी की दृष्टि में ये ही तीन धर्म हेतु हैं और मानव समाज के धर्माधर्म, कर्त्तव्याकर्त्तव्य और औचित्यानौचित्य के मूल निर्णायक भी हैं।

धर्म के प्रमुख तीन आधार हैं –

१ नैतिक
२ भाविक तथा
३ बौद्धिक।

नीति धर्म की परिधि और परिबंध है। इसके अभाव में कोई भी धर्माचरण संभव नहीं है, क्योंकि इसके बिना समाज-विग्रह का अंतस् और बाह्य दोनों ही सार-हीन हो जाते हैं। यह सत्कर्मों का प्राणस्रोत है। अतः नीति-तत्त्व पर धर्म की सुदृढ़ स्थापना होती है। धर्म का आधार भाविक होता है। यह सच है कि सेवक अपने स्वामी के प्रति निश्छल सेवा अर्पित करे – यही नीति है, किंतु जब वह अनन्य भाव से अपने प्रभु के चरणों पर सर्व न्यौछावर कर उनके श्रप, गुण एवं शील का याचक बन जाता है तब उसके इस त्यागमय कर्त्तव्य या धर्म का आधार भाविक हो जाता है। 

धर्म का बौद्धिक धरातल मानव को कार्य-कुशलता तथा सफलता की ओर ले जाता है। वस्तुतः जो धर्म उक्त तीनों मुख्याधारों पर आधारित है वह स्वार्थ, परमार्थ तथा लोकार्थ इन तीनों का समन्वयकारी है। धर्म के ये सर्वमान्य आधार-तत्त्व हैं।

धर्म के मुख्यतः दो स्वरुप हैं –

१ अभ्युदय हेतुक तथा
२ नि:रेयस हेतुक।

जो पावन कृत्य सुख, संपत्ति, कीर्ति और दीर्घायु के लिए अथवा जागृति उन्नयन के लिए किया जाता है वह अभ्युदय हेतुक धर्म की श्रेणी में आता है। और जो कृत्य या अनुष्ठान आत्मकल्याण अथवा मोक्षादि की प्राप्ति के लिए किया जाता है वह नि:श्रेयस हेतुक धर्म की श्रेणी में आता है।

धर्म पुनः दो प्रकार का है

१ प्रवृत्ति-धर्म तथा
२ निवृत्ति-धर्म या मोक्ष धर्म

जिससे लोक-परलोक में सर्वाधिक सुख प्राप्त होता है वह प्रवृत्ति-धर्म है तथा जिससे मोक्ष या परम शांति की प्राप्ति होती है वह निवृत्ति-धर्म है।

कहीं – कहीं धर्म के तीन भेद स्वीकार किए गए हैं –

१ सामान्य धर्म
२ विशेष धर्म तथा
३ आपद्धर्म ।

भविष्यपुराण के अनुसार धर्म के पांच प्रकार हैं –

१ वर्ण – धर्म
२ आश्रम – धर्म
३ वर्णाश्रम – धर्म
४ गुण – धर्म
५ निमित्त – धर्म

अंततोगत्वा, हमारे सामने धर्म की मुख्य दो ही विशाल विधाए या शाखाएं रह जाती हैं –

१ सामान्य या साधारण धर्म तथा
२ वर्णाश्रम – धर्म।

जो सारे धर्म, देश, काल, परिवेश, जाति, अवस्था, वर्ग तथा लिंग, आदि के भेद-भाव के बिना सभी आश्रमों और वणाç के लोगों के लिए समान रुप से स्वीकार्य हैं वे सामान्य या साधारण धर्म कहे जाते हैं। समग्र मानव जाति के लिए कल्याणप्रद एवं अनुकरणीय इस सामान्य धर्म की शतशः चर्चा अनेक धर्म-ग्रंथों में विशेषतया श्रुति-ग्रन्थों में उपलब्ध है। 

महाभारत ने अपने अनेक पवाç तथा अध्यायों में जिन साधारण धर्मों का वर्णन किया है, उनके दया, क्षमा, शांति, अहिंसा, सत्य, सारल्य, अद्रोह, अक्रोध, निभिमानता, तितिक्षा, इन्द्रिय-निग्रह, यम,शुद्ध बुद्धि, शील, आदि मुख्य हैं। पद्मपुराण में सत्य, तप, यम, नियम, शौच, अहिंसा, दया, क्षमा, श्रद्धा, सेवा, प्रज्ञा तथा मैत्री आदि धर्मान्तर्गत परिगणित हैं। मार्कण्डेय पुराण ने सत्य, शौच, अहिंसा, अनसूया, क्षमा, अक्रूरता, अकृपणता तथा संतोष इन आठ गुणों को वर्णाश्रम का सामान्य धर्म स्वीकार किया है।

विश्व की प्रतिष्ठा धर्म से है तथा वह परम पुरुषार्थ है। वह त्रिविध, त्रिपथगामी तथा त्रिकमर्रत है। परमात्मा ने अपने को गदात्मा, सूक्ष्म जगत तथा स्थूल जगत के रुप में प्रकट किया है। इन तीनों धामों में उनका नैकट्य प्राप्त करने के प्रयत्न को सनातन धर्म का त्रिविध भाव कहा गया है। वह त्रिमार्गगामी इस रुप में है कि वह ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनों में से किसी एक द्वारा या इनके सामंजस्य द्वारा भगवान की प्राप्ति की कामना करता है। उसकी त्रिपथगामिनी गति है।

सामान्यतः गोस्वामीजी के वर्ण और आश्रम एक-दूसरे के साथ परस्परावलंबित और संघोषित हैं। इसलिए उन्होंने दोनों का युगपत् वर्णन किया है। यह स्पष्ट है कि भारतीय जीवन में वर्ण-व्यवस्था की प्राचीनता, व्यापकता, महत्ता और उपादेयता सर्वमान्य हैं। यह सत्य है कि हमारा विकासोन्मुख जीवन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ वणाç की सीढियों पर चढ़कर शनै:-शनै: दुर्लभ 
पुरुषार्थ-फलों का आस्वादन करता हुआ भगवत् तदाकार भाव में निमज्जित हो जाता है, पर आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम निष्ठापूर्वक अपने वर्ण-धर्म पर अपनी दृढ़ आस्था दिखलाई है और उसे सुखी और सुव्यवस्थित समाज – पुरुष का मेरु-दण्ड बतलाया है।

गोस्वामी जी सनातनी हैं और सनातन-धर्म की यह निर्भ्रान्त धारणा है कि चारों वर्ण मनुष्य के उन्नयन के चार सोपान हैं। चेतनोन्मुखी प्राणी प्रथमतः शुद्र योनि में जन्म धारण करता है जिसमें उसके अंतर्गत सेवा-वृत्ति का उद्भव और विकास होता है। यह उसकी शैशवावस्था है। तत्पश्चात् वह वैश्य योनि में जन्म धारण करता है जहां उसे सब प्रकार के भोग, सुख, वैभव और प्रेय की प्राप्ति होती है। यह उसका पूर्व-यौवन काल है।

वर्ण विभाजन का जन्मना आधार न केवल महर्षि वशिष्ठ, मनु आदि ने ही स्वीकार किया है, बल्कि स्वयं गीता में भगवान ने भी श्रीमुख से चारों वणाç की गुणकर्म-विभगशः सृष्टि का विधान किया है। वर्णाश्रम-धर्म की स्थापना जन्म, कर्म, आचरण तथा स्वभाव के अनुकूल हुई है।

जो वीरोचित कर्मों में निरत रहता है और प्रजाओं की रक्षा करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है। शौर्य, वीर्य, धृति, तेज, अजातशत्रुता, दान, दाक्षिण्य तथा परोपकार क्षत्रियों के नैसर्गिक गुण हैं। स्वयं भगवान श्रीराम क्षत्रिय कुल भूषण और उक्त गुणों के संदोह हैं। न्याय-नीति विहीन, डरपोक और युद्ध-विमुख क्षत्रिय धर्मच्युत और पामर है। विश का अर्थ जन या दल है। इसका एक अर्थ देश भी है। अतः वैश्य का संबंध जन-समूह अथवा देश के भरण-पोषण से है। 

सत्यतः वैश्य समाज के विष्णु माने जाते हैं। अतिथि-सेवा तथा विप्र-पूजा उनका धर्म है। जो वैश्य कृपण और अतिथि-सेवा से विमुख हैं वे हेय और शोचनीय हैं। कुल, शील, विद्या और ज्ञान से हीन वर्ण को शूद्र की संज्ञा मिली है। शूद्र असत्य और यज्ञहीन माने जाते थे। शनै:-शनै: वे द्विजातियों के कृपा-पात्र और समाज के अभिन्न और सबल अंग बन गए। उच्च वणाç के सम्मुख विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना, स्वामी की निष्कपट सेवा करना, पवित्रता रखना, गौ तथा विप्र की रक्षा करना आदि शूद्रों के विशेषण हैं।

गोस्वामी जी का यह विश्वास रहा है कि वर्णानुकूल धर्माचरण से स्वर्गापवर्ग की प्राप्ति होती है। और उसके उल्लंघन करने और परधर्म-प्रिय होने से घोर यातना ओर नरक की प्राप्ति होती है। दूसरे प्राणी के श्रेष्ठ धर्म की अपेक्षा अपना सामान्य धर्म ही पूज्य और उपादेय है। दूसरे के धर्म में दीक्षित होने की अपेक्षा अपने धर्म की वेदी पर प्राणापंण कर देना श्रेयस्कर है। 
यही कारण् है कि उन्होंने राम-राज्य की सारी प्रजाओं को स्व-धर्म-व्रतानुरागी और दिव्य चारित्र्य-संपन्न दिखलाया है।

गोस्वामी जी के इष्टदेव श्रीराम स्वयं उक्त राज-धर्म के आश्रय और आदर्श रामराज्य के जनक हैं। यद्यपि वे साम्राज्य-संस्थापक हैं तथापि उनके साम्राज्य की शाश्वत आधारशिला सनेह, सत्य, अहिंसा, दान, त्याग, शान्ति, सुमति, विवेक, वैराग्य, क्षमा, न्याय, औचित्य तथा विज्ञान हैं जिनकी प्रेरणा से राजा साम्राज्य के सारे विभागों का परिपालन उसी धर्म बुद्धि से करते हैं जिससे मुख शरीर के सारे अंगो का यथाचित परिपालन करता है। श्रीराम की एकतंत्रात्मक राज-व्यवस्था में राज-कार्य के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण अवसरों पर राजा, मनीषियों, मंत्रियों तथा सभ्यों से समुचित सम्मति प्राप्त करने की विनीत चेष्टा करते हैं ओर उपलब्ध सम्मति को सहर्ष कार्यान्वित करते हैं। 

राजा श्रीराम में उक्त सारे लक्षण विलक्षण रुप में वर्तमान हैं, वे भूप-गुणागार हैं। उनमें सत्य-प्रियता, साहसात्साह, गंभीरता तथा प्रजा-वत्सलता, आदि मानव-दुर्लभ गुण सहज ही सुलभ हैं। एक स्थल पर श्रीराम ने राज-धर्म के मूल स्वरुप का परिचय कराते हुए भाई भरत को यह उपदेश दिया है कि पूज्य पुरुषों, माताओं और गुरुजनों के आज्ञानुसार राज्य, प्रजा और राजधानी का न्याय और नीतिपूर्वक सम्यक् परिपालन करना ही राज-धर्म का मूलमंत्र है।

मानव-जीवन पर काल, स्वभाव और परिवेश का गहरा प्रभाव पड़ता है। यह स्पष्ट है कि काल-प्रवाह के कारण समाज के आचारों, विचारों तथा मनोभावों में ह्रास-विकास होते रहते हैं। यही कारण है कि जब सत्य की प्रधानता रहती है तब सत्य-युग, जब रजोगुण का समावेश होता है तब त्रेता, जब रजोगुण का विस्तार होता है तब द्वापर तथा जब पाप का प्राधान्य होता है तब कलियुग का आगमन होता है।

गोस्वामी जी ने नारी-धर्म की भी सफल स्थापना की है और समाज के लिए उसे अतिशय उपादेय माना है। गृहस्थ-जीवन रथ के दो चक्रों में एक चक्र स्वयं नारी है। यह जीवन-प्रगति-विधायिका है। इसी कारण हमारी संस्कृति में नारी को अद्धार्ंगिनी, धर्म-पत्नी, जीवन-संगिनी, देवी, गृह-लक्ष्मी तथा संजीवनी-शक्ति के रुप में देखा है। 

जिस प्रकार सृष्टि-लीला-विलास में पुरुष प्रकृति परस्पर संयुक्त होकर विकास-रचना करते हैं, उसी प्रकार गृह या समाज में नारी-पुरुष के प्रीतिपूर्वक सुखमय संयोग से धर्म-कर्म का पुण्यमय प्रसार होता है। सत्यतः रति, प्रीति और धर्म की पालिका स्री या पत्नी ही है। वह धन, प्रजा, काया, लोक-यात्रा, धर्म, देव और पितर आदि, इन सबकी रक्षा करती है। स्री या नारी ही पुरुष की श्रेष्ठ गति है – “दारा:परागति:’। स्री ही प्रियवादिनी, कांता, सुखद मंत्रणा देनेवाली, संगिनी, हितैषिणी और दु:ख में हाथ बंटाने वाली देवी है। अतः जीवन और समाज की सुखद प्रगति और मधुर संतुलन के लिए तथा स्वयं नारी की मुक्ति-मुक्ति के लिए नारी-धर्म के सम्यक् विधान की अपेक्षा है।

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