शब्दशिल्पी

Archive for जनवरी 2009

“साहित्य जनसमूह के हॄदय का विकास है” यह शीर्षक है उस निबन्ध का; जिसे हिन्दी गद्य साहित्य के निर्माताओं मे से एक पंडित बालकृष्ण भट्ट ने लिखा है। यह निबन्ध हमारे पाठ्यक्रम से संबन्धित है। यहां संक्षिप्त में पंडित बालकृष्ण भट्ट का जीवन परिचय दिया जा रहा हैं।

पंडित बाल कृष्ण भट्ट भारतेन्दु युग के हिन्दी के सफल पत्रकार, नाटककार और प्रतिष्ठित निबंधकार थे। भारतेंदु काल के निबंध-लेखकों में भट्ट जी का सर्वोच्च स्थान है। उन्हें आज की गद्य प्रधान कविता का जनक माना जा सकता है। हिन्दी गद्य साहित्य के निर्माताओं में भी उनका प्रमुख स्थान है।

पंडित बाल कृष्ण भट्ट का जन्म ३ जून १८४४ को प्रयाग के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. वेणी प्रसाद था। स्कूल में दसवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद भट्ट जी ने घर पर ही संस्कृत का अध्ययन किया। संस्कृत के अतिरिक्त उन्हें हिंदी अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी भाषाओं का भी अच्छा ज्ञान हो गया। भट्ट जी स्वतंत्र प्रकृति के व्यक्ति थे। उन्होंने व्यापार का कार्य किया तथा वे कुछ समय तक कायस्थ पाठशाला प्रयाग में संस्कृत के अध्यापक भी रहे किंतु उनका मन किसी में नहीं रमा। भारतेंदु जी से प्रभावित होकर उन्होंने हिंदी-साहित्य सेवा का व्रत ले लिया। भट्ट जी ने हिंदी-प्रदीप नामक मासिक पत्र निकाला। इस पत्र के वे स्वयं संपादक थे। उन्होंने इस रस पत्र के द्वारा निरंतर ३२ वर्ष तक हिंदी की सेवा की। काव्य, नाटक प्रचारिणी सभा द्वारा आयोजित हिंदी शब्द सागर के संपादन में भी उन्होंने बाबू श्याम सुंदर दास तथा शुक्ल जी के साथ कार्य किया।

भट्ट जी की माता अपने पति की अपेक्षा अधिक पढ़ी-लिखी और विदुषी थीं। उनका प्रभाव बालकृष्ण भट्ट जी पर अधिक पड़ा। भट्ट जी मिशन स्कूल में पढ़ते थे। वहाँ के प्रधानाचार्य एक ईसाई पादरी थे। उनसे वाद-विवाद हो जाने के कारण इन्होंने मिशन स्कूल जाना बंद कर दिया। इस प्रकार वह घर पर रह कर ही संस्कृत का अध्ययन करने लगे। वे अपने सिद्धान्तों एवं जीवन-मूल्यों के इतने दृढ़ प्रतिपादक थे कि कालान्तर में इन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण मिशन स्कूल तथा कायस्थ पाठशाला के संस्कृत अध्यापक के पद से त्याग-पत्र देना पड़ा था। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने कुछ समय तक व्यापार भी किया परन्तु उसमें इनकी अधिक रुचि न होने के कारण सफलता नहीं मिल सकी। आपकी अभिरुचि आरंभ से ही साहित्य सेवा में थी। अत: सेवा-वृत्ति को तिलांजलि देकर वे यावज्जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा ही करते रहे। भट्टजी का २० जुलाई १९१४ देहवसान हो गया।

 कार्यक्षेत्र
भट्ट जी एक अच्छे और सफल पत्रकार भी थे। हिन्दी प्रचार के लिए उन्होंने संवत्‌ 1933 में प्रयाग में हिन्दी वर्द्धिनी नामक सभा की स्थापना की। उसकी ओर से एक हिन्दी मासिक पत्र का प्रकाशन भी किया, जिसका नाम था “हिन्दी प्रदीप”। वह बत्तीस वर्ष तक इसके संपादक रहे और इसे नियमित रूप से भली – भाँति चलाते रहे। हिन्दी प्रदीप के अतिरिक्त बालकृष्ण भट्ट जी ने दो-तीन अन्य पत्रिकाओं का संपादन भी किया। भट्ट जी भारतेन्दु युग के प्रतिष्ठित निबंधकार थे। अपने निबंधों द्वारा हिन्दी की सेवा करने के लिए उनका नाम सदैव अग्रगण्य रहेगा। उनके निबंध अधिकतर हिन्दी प्रदीप में प्रकाशित होते थे। उनके निबंध सदा मौलिक और भावना पूर्ण होते थे। वह इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें पुस्तकें लिखने के लिए अवकाश ही नहीं मिलता था। अत्यन्त व्यस्त समय होते हुए भी उन्होंने “सौ अजान एक सुजान”, “रेल का विकट खेल”, “नूतन ब्रह्मचारी”, “बाल विवाह” तथा “भाग्य की परख” आदि छोटी-मोटी दस-बारह पुस्तकें लिखीं। वैसे आपने निबंधों के अतिरिक्त कुछ नाटक, कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे हैं।

 प्रमुख कृतियाँ
भट्ट जी ने हिंदी साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में लिखा। उन्हें मूलरूप से निबंध लेखक के रूप में जाना जाता है लेकिन उन्होंने दो उपन्यास भी लिखे।

निबंध- संग्रह साहित्य सुमन और भट्ट निबंधावली।
उपन्यास- नूतन ब्रह्मचारी तथा सौ अजान एक सुजान।
मौलिक नाटक- दमयंती, स्वयंवर, बाल-विवाह, चंद्रसेन, रेल का विकट खेल, आदि।
अनुवाद- भट्ट जी ने बंगला तथा संस्कृत के नाटकों के अनुवाद भी किए जिनमें वेणीसंहार, मृच्छकटिक, पद्मावती आदि प्रमुख हैं।

 भाषा
भाषा की दृष्टि से अपने समय के लेखकों में भट्ट जी का स्थान बहुत ऊँचा है। उन्होंने अपनी रचनाओं में यथाशक्ति शुद्ध हिंदी का प्रयोग किया। भावों के अनुकूल शब्दों का चुनाव करने में भट्ट जी बड़े कुशल थे। कहावतों और मुहावरों का प्रयोग भी उन्होंने सुंदर ढंग से किया है। भट्ट जी की भाषा में जहाँ तहाँ पूर्वीपन की झलक मिलती है। जैसे- समझा-बुझा के स्थान पर समझाय-बुझाय लिखा गया है। बालकृष्ण भट्ट की भाषा को दो कोटियों में रखा जा सकता है। प्रथम कोटि की भाषा तत्सम शब्दों से युक्त है। द्वितीय कोटि में आने वाली भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ तत्कालीन उर्दू, अरबी, फारसी तथा ऑंग्ल भाषीय शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। वह हिन्दी की परिधि का विस्तार करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने भाषा को विषय एवं प्रसंग के अनुसार प्रचलित हिन्दीतर शब्दों से भी समन्वित किया है। आपकी भाषा जीवंत तथा चित्ताकर्षक है। इसमें यत्र-तत्र पूर्वी बोली के प्रयोगों के साथ-साथ मुहावरों का प्रयोग भी किया गया है , जिससे भाषा अत्यन्त रोचक और प्रवाहमयी बन गई है।

 वर्ण्य विषय
भट्ट जी ने जहाँ आँख, कान, नाक, बातचीत जैसे साधारण विषयों पर लेख लिखे हैं, वहाँ आत्मनिर्भरता, चारु चरित्र जैसे गंभीर विषयों पर भी लेखनी चलाई है। साहित्यिक और सामाजिक विषय भी भट्ट जी से अछूते नहीं बचे। ‘चंद्रोदय’ उनके साहित्यिक निबंधों में से है। समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए उन्होंने सामाजिक निबंधों की रचना की। भट्ट जी के निबंधों में सुरुचि-संपन्नता, कल्पना, बहुवर्णन शीलता के साथ-साथ हास्य व्यंग्य के भी दर्शन होते हैं।

 शैली
भट्ट जी की लेखन – शैली को भी दो कोटियों में रखा जा सकता है। प्रथम कोटि की शैली को परिचयात्मक शैली कहा जा सकता है। इस शैली में उन्होंने कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। द्वितीय कोटि में आने वाली शैली गूढ़ और गंभीर है। इस शैली में भट्ट जी को अधिक नैपुण्य प्राप्त है। आपने “आत्म-निर्भरता” तथा “कल्पना” जैसे गम्भीर विषयों के अतिरिक्त , “आँख”, “नाक”, तथा “कान”, आदि अति सामान्य विषयों पर भी सुन्दर निबंध लिखे हैं। आपके निबंधों में विचारों की गहनता, विषय की विस्तृत विवेचना, गम्भीर चिन्तन के साथ एक अनूठापन भी है। यत्र-तत्र व्यंग्य एवं विनोद उनकी शैली को मनोरंजक बना देता है। उन्होंने हास्य आधारित लेख भी लिखे हैं, जो अत्यन्त शिक्षादायक हैं। भट्ट जी का गद्य गद्य न होकर गद्यकाव्य सा प्रतीत होता है। वस्तुत: आधुनिक कविता में पद्यात्मक शैली में गद्य लिखने की परंपरा का सूत्रपात श्री बालकृष्ण भट्ट जी ने ही किया था। उन्हें

१. वर्णनात्मक शैली- वर्णनात्मक शैली में भट्ट जी ने व्यावहारिक तथा सामाजिक विषयों पर निबंध लिखे हैं। जन साधारण के लिए भट्ट जी ने इसी शैली को अपनाया। उनके उपन्यास की शैली भी यही है, किंतु इसे उनकी प्रतिनिधि शैली नहीं कहा जा सकता।
इस शैली की भाषा सरल और मुहावरेदार है। वाक्य कहीं छोटे और कहीं बड़े हैं।

२. विचारात्मक शैली- भट्ट जी द्वारा गंभीर विषयों पर लिखे गए निबंध इसी शैली के अंतर्गत आते हैं। तर्क और विश्वास, ज्ञान और भक्ति, संभाषण आदि निबंध विचारात्मक शैली के उदाहरण हैं।
इस शैली की भाषा में संस्कृत के शब्दों की अधिकता है।

३. भावात्मक शैली- इस शैली का प्रयोग भट्ट जी ने साहित्यिक निबंधों में किया है। इसे भट्ट जी की प्रतिनिधि शैली कहा जा सकता है।
इस शैली में शुद्ध हिंदी का प्रयोग हुआ है। भाषा प्रवाहमयी, संयत और भावानुकूल है। इस शैली में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग भी हुआ है। अलंकारों के प्रयोग से भाषा में विशेष सौंदर्य आ गया है। भावों और विचार के साथ कल्पना का भी सुंदर समन्वय हुआ। इसमें गद्य काव्य जैसा आनंद होता है। चंद्रोदय निबंध का एक अंश देखिए- यह गोल-गोल प्रकाश का पिंड देख भाँति-भाँति की कल्पनाएँ मन में उदय होती है कि क्या यह निशा अभिसारिका के मुख देखने की आरसी है या उसके कान का कुंडल अथवा फूल है यह रजनी रमणी के ललाट पर दुक्के का सफ़ेद तिलक है।

४. व्यंग्यात्मक शैली- इस शैली में हास्य और व्यंग्य की प्रधानता है। विषय के अनुसार कहीं व्यंग्य अत्यंत मार्मिक और तीखा हो गया है।
इस शैली की भाषा में उर्दू शब्दों की अधिकता है और वाक्य छोटे-छोटे हैं।

साहित्य सेवा और स्थान- भारतेंदु काल के निबंध-लेखकों में भट्ट जी का सर्वोच्च स्थान है। उन्होंने पत्र, नाटक, काव्य, निबंध, लेखक, उपन्यासकार अनुवादक विभिन्न रूपों में हिंदी की सेवा की और उसे धनी बनाया।

साहित्य की दृष्टि से भट्ट जी के निबंध अत्यंत उच्चकोटि के हैं। इस दिशा में उनकी तुलना अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध निबंधकार चार्ल्स लैंब से की जा सकती है। गद्य काव्य की रचना भी सर्वप्रथम भट्ट जी ने ही प्रारंभ की। इनसे पूर्वक हिंदी में गद्य काव्य का नितांत अभाव था।

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प्रयोजनमूलक हिन्दी के संदर्र्भ में ‘प्रयोजन’ शब्द के साथ ‘मूलक’ उपसर्ग लगने से प्रयोजनमूलक पद बना है। प्रयोजन से तात्पर्य है उद्देश्य अथवा प्रयुक्ति। ‘मूलक’ से तात्पर्य है आधारित। अत: प्रयोजनमूलक भाषा से तात्पर्य हुआ किसी विशिष्ट उद्देश्य के अनुसार प्रयुक्त भाषा। इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी से तात्पर्य हिन्दी का वह प्रयुक्तिपरक विशिष्ट रूप या शैली है जो विषयगत तथा संदर्भगत प्रयोजन के लिए विशिष्ट भाषिक संरचना द्वारा प्रयुक्त की जाती है। विकास के प्रारम्भिक चरण में भाषा सामाजिक सम्पर्क का कार्य करती है। भाषा के इस रूप को संपर्क भाषा कहते हैं। संपर्क भाषा बहते नीर के समान है। प्रौढा की अवस्था में भाषा के वैचारिक संदर्भ परिपुष्ट होते हैं औैर भावात्मक अभिव्यक्ति कलात्मक हो जाती है। भाषा के इन रूपों को दो नामों से अभिहित किया जाता है। प्रयोजनमूलक और आनन्दमूलक। आनन्द विधायक भाषा साहित्यिक भाषा है। साहित्येतर मानक भाषा को ही प्रयोजनमूलक भाषा कहते हैं, जो विशेष भाषा समुदाय के समस्त जीवन-संदर्भो को निश्चित शब्दों और वाक्य संरचना के द्वारा अभिव्यक्त करने में सक्षम हो। भाषिक उपादेयता एवं विशिष्टिता का प्रतिपादन प्रयोजनमूलक भाषा से होता है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप :

हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। इसके बोलने व समझने वालों की संख्या के अनुसार विश्व में यह तीसरे क्रम की भाषा है। यानी कि हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। अत: स्वाभाविक ही है कि विश्व की चुनिंदा भाषाओं में से एक महत्वपूर्ण भाषा और भारत की अभिज्ञात राष्ट्रभाषा होने के कारण, देश के प्रशासनिक कार्यो में हिन्दी का व्यापक प्रयोग हो, राष्ट्रीयता की दृष्टि से ये आसार उपकारक ही है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी हिन्दी के भाषिक अध्ययन का ही एक और नाम है, एक और रूप है एक समय था जबकि सरकारी-अर्द्धसरकारी या सामान्यत: कार्यालयीन पत्राचार के लिए अंग्रेजी एक मात्र सक्षम भाषा समझी जाती थी। अंग्रेजी की उक्त महानता आज, सत्य से टूटी चेतना की तरह बेकार सिद्ध हो रही है चूंकि हिन्दी में अत्यन्त बढ़िया, स्तरीय तथा प्रभावक्षम पत्राचार संभव हुआ है। अत: जो लोग हिन्दी को अविकसित भाषा कहते थे, कभी खिचड़ी तो कभी क्लिष्ट भाषा कहते थे या अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी को नीचा दिखाने की मूर्खता करते थे उन्हें तक लगने लगा है कि हिन्दी वाकई संसार की एक महान भाषा है, हरेक दृष्टि से परिपूर्ण एक सम्पन्न भाषा है।
राजभाषा के अतिरिक्त अन्य नये-नये व्यवहार क्षेत्रों में हिन्दी का प्रचार तथा प्रसार होता है, जैसे रेलवे प्लेटफार्म, मंदिर, धार्मिक संस्थानों आदि में। जीवन के कई प्रतिष्ठित क्षेत्रों में भी अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। विज्ञान औैर तकनीकी शिक्षा, कानून और न्यायालय, उच्चस्तरीय वाणिज्य और व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग होता है। व्यापारियों और व्यावसायियो के लिए भी हिन्दी का प्रयोग सुविधाजनक और आवश्यक बन गया है। भारतीय व्यापारी आज हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते, उनके कर्मचारी, ग्राहक सभी हिन्दी बोलते हैं। व्यवहार के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रयोजनों से हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। बैंक मे हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है तो सरकारी कार्यालयो में हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है। हिन्दी के इस स्वरूप को ही प्रयोजनमूलक हिन्दी कहते हैं।

प्रयोजनमूलक रूप के कारण हिन्दी भाषा जीवित रही। आज तक साहित्यिक हिन्दी का ही अध्ययन किया जाता था, लेकिन साहित्यिक भाषा किसी भी भाषा को स्थित्यात्मक बनाती है और प्रयोजनमूलक भाषा उसको गत्यात्मक बनाती है। गतिमान जीवन में गत्यात्मक भाषा ही जीवित रहती है। प्रचलित रहती है। आज साहित्य तो संस्कृत में भी है, लेकिन उसका गत्यात्मक रूप-प्रयोजनमूलक रूप समाप्त हो गया है, अत: वह मृतवत हो गयी है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप अधिक शक्तिशाली तथा गत्यात्मक है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप न केवल उसके विकास में सहयोग देगा, बल्कि उसको जीवित रखने एवं लोकप्रिय बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

इस प्रकार विभिन्न प्रयोजनों के लिए गठित समाज खंडों द्वारा किसी भाषा के ये विभिन्न रूप या परिवर्तन ही उस भाषा के प्रयोजनमूलक रूप हैं। अंग्रेजी शासन में यूरोपीय संपर्क से हमारा सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक ढांचा काफी बदला, धीरे-धीरे हमारे जीवन में नई उद्भावनाएं (जैसे पत्रकारिता, इंजीनियरिंग, बैंकीय) पनपी और तदनुकूल हिन्दी के नए प्रयोजनमूलक भाषिक रूप भी उभरे। स्वतंत्रता के बाद तो हिन्दी भाषा का प्रयोग क्षेत्र बहुत बढ़ा है और तदनुरूप उसके प्रयोजनमूलक रूप भी बढे हैं औैर बढ़ते जा रहे हैं। साहित्यिक विधाओं, संगीत, कपड़ा-बाजार, सट्टाबाजारों, चिकित्सा, व्यवसाय, खेतों, खलिहानों, विभिन्न शिल्पों और कलाओं, कला व खेलों के अखाड़ों, कोर्टो कचहरियों आदि में प्रयुक्त हिन्दी पूर्णत: एक नहीं है। रूप-रचना, वाक्य रचना, मुहावरों आदि की दृष्टि से उनमें कभी थोड़ा कभी अधिक अंतर स्पष्ट है और ये सभी हिन्दी के प्रयोजनमूलक परिवर्त या उपरूप है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी की विशेषताएं :

प्रयोजनमूलक भाषा की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं –
1. वैज्ञानिकता :
प्रयोजनमूलक शब्द पारिभाषिक होते हैं। किसी वस्तु के कार्य-कारण संबंध के आधार पर उनका नामकरण होता है, जो शब्द से ही प्रतिध्वनित होता है। ये शब्द वैज्ञानिक तत्वों की भांति सार्वभौमिक होते हैं। हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
2. अनुप्रयुक्तता :
उपसर्गो, प्रत्ययों और सामासिक शब्दों की बहुलता के कारण हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली स्वत: अर्थ स्पष्ट करने में समर्थ है। इसलिए हिन्दी की शब्दावली का अनुप्रयोग सहज है।
3. वाच्यार्थ प्रधानता :
हिन्दी के पर्याय शब्दों की संख्या अधिक है। अत: ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में उसके अर्थ को स्पष्ट करने वाले भिन्न पर्याय चुनकर नए शब्दों का निर्माण संभव है। इससे वाचिक शब्द ठीक वही अर्थ प्रस्तुत कर देता है। अत: हिन्दी का वाच्यार्थ भ्रांति नहीं उत्पन्न करता।
4. सरलता और स्पष्टता :
हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली सरल औैर एकार्थक है, जो प्रयोजनमूलक भाषा का मुख्य गुण है। प्रयोजनमूलक भाषा में अनेकार्थकता दोष है। हिन्दी शब्दावली इस दोष से मुक्त है।
इस तरह प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी एक समर्र्थ भाषा है। स्वतंत्रता के पश्चात प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में स्वीकृत होने के बाद हिन्दी में न केवल तकनीकी शब्दावली का विकास हुआ है, वरन विभिन्न भाषाओं के शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुरुप ढाल लिया है। आज प्रयोजनमूलक क्षेत्र में नवीनतम उपलब्धि इंटरनेट तक की शब्दावली हिन्दी में उलब्ध है, और निरंतर नए प्रयोग हो रह हैं।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के अवरोध :

ब्रिटिश शासकों ने अपने उपनिवेशों में एक महत्वपूर्ण कार्य किया था, अंग्रेजी को प्रतिष्ठित करने का। उन्होंने जिस अंग्रेजी को आरोपित किया, उसका उद्देश्य अपने शासन के लिए योग्य कर्मचारियों को तैयार करना था। जनता से संपर्क के लिए वे हिन्दी सीखते थे और शासन के लिए भारतीय भाषाओं को हेय बताकर अंग्रेजी के एक व्यावहारिक रूप का प्रचार कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने जीवन-यापन से जुड़े क्षेत्रों में अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। राष्ट्रीयता की प्रबल भावना के कारण स्वदेश और स्वभाषा का समर्थन सभी राष्ट्र नेताओ ने किया। संविधान निर्माताओं ने बिना किसी संशय के हिन्दी को राजभाषा घोषित कर दिया। राजभाषा के साथ ही प्रयोजनमूलक भाषा का विकास प्रारंभ होता है। शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भाषा का संबंध समस्त सामाजिक प्रयोजनों से जुड़ जाता है। अत: 26 जनवरी 1950 से ही प्रयोजनमूलक हिन्दी की निर्माण प्रक्रिया प्रारंभ हुई और समस्त सरकारी और गैर सरकारी संगठनों, शिक्षालयों, संचार माध्यमों, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों का उद्देश्य अपनी भाषा के माध्यम से कार्र्य करना था।
अंग्रेजी शासकों के इन कृत्यों ने ही कालान्तर में शब्दावली का रोना रोकर 15 वर्षो तक हिन्दी के विकास को अवरूद्ध किया और अंग्रेजी को बनाए रखा। सरकारी व्याप से बने कोश जन सामान्य तक नहीं पहुंचे। उन्हें प्रतीक्षा थी राष्ट्रीयता के जोश की समाप्ति की। उसमें वे सफल रहे औैर राष्ट्रीयता की लहर का स्थान वोट-बैंक की राजनीति ने ले लिया। क्षेत्रीय भाषाओं के विरोध का नया स्वर गूंजा औैर उत्तर बनाम दक्षिण, हिन्दी बनाम अहिन्दी के नाम पर अंग्रेजी का और अंग्रेजी के बल पर देशी अंग्रेजी का शासन बना रहा।
इस प्रकार राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा का स्वप् अधूरा रहा। इसके बावजूद प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास अवरूद्ध नहीं हुआ। सरकारी तंत्र की उपेक्षा के बावजूद विश्व को उपभोक्ता बाजार मानने वाली विदेशी कंपनियों ने विज्ञान एवं सूचना के क्षेत्र में हिन्दी को महत्व दिया। भारतीय चैनलों से अधिक विदेशी कंपनियां हिन्दी प्रदेश में हिन्दी को अपनाकर आगे बढ़ रही हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि वोट बैंक पर नहीं, पूंजी बैंक पर है और इस पर नियंत्रण करने के लिए चित्रपट जगत, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और सूचनातंत्र हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते।
इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी के मार्ग में अनेक अवरोध स्वतंत्रता प्राप्ति से आ रह हैं औैर उनका सामना करते हुये भारत की यह भाषा अपना अस्तित्व अधिक प्रभावशाली बनाये जा रही है।

अंतत: और निष्कर्षत:  :-

निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि साहित्य भाषा को प्रतिष्ठा दे सकता है, लेकिन विस्तार नहीं देता। भाषा को विस्तार देता है, उसका प्रयोजनमूलक स्वरुप। प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी को वैश्विक प्रसार मिला है। हिन्दी के प्रयोजनमूलक स्वरूप के विकास के कारण ही आज संपूर्ण भारत में हिन्दी को समझने और बोलने वाले मिल जाते हैं। यह आवश्यक है कि यदि सही अर्थो में राजभाषा का क्रियान्वयन होता तो आज हिन्दी का प्रसार विदेशों में भी हो गया होता, लेकिन हिन्दी का विकास राजकीय प्रयोजनेतर माध्यमों के द्वारा हा रहा है, जिनमें चलचित्र, दूरदर्शन और उद्योग व्यापार के विदेशी प्रतिष्ठानों का योगदान अधिक है। इसलिए आज हिन्दी के प्रयोजनमूलक संदर्भो से जो क्षेत्र जुड़े हैं वे हैं -1. राजभाषा और उससे सबंद्ध क्षेत्र (कामकाजी क्षेत्र)। 2. पत्रकारिता। 3. श्रव्य माध्यम। 4. दूरदर्शन और चलचित्र। 5. अनुवाद और उसके माध्यम के विज्ञान, तकनीक और व्यापार। इन क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग का ज्ञान ही आज की उपभोक्तावादी सभ्यता में हिन्दी और हिन्दी भाषी को प्रतिष्ठित कर सकता है।

 

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गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई – दो बक्स¸ डोलची¸ बालटी ;   “यह डिब्बा कैसा है¸ गनेशी ” उन्होंने पूछा। 
गनेशी बिस्तर बांधता हुआ¸ कुछ गर्व¸ कुछ दु:ख¸कुछ लज्जासे बोला¸” घरवाली ने साथ को कुछ बेसन के लड्‌डू रख दिये हैं। 
कहा¸ बाबूजी को पसन्द थे¸ अब कहां हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएंगे।”  घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित¸ स्नेह¸ आदरमय¸ सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था।
“कभी–कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।” गनेशी बिस्तर में रस्सी बांधते हुआ बोला।
“कभी कुछ जरूरत हो तो लिखना गनेशी! इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।”
गनेशी ने अंगोछे के छोर से आंखे पोछी¸ “अब आप लोग सहारा न देंगे तो कौन देगा! आप यहां रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।”
गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे।  रेल्वे क्वार्टर का वह कमरा¸ जिसमें उन्होंने कितने वर्ष बिताए थे¸ उनका सामान हट जाने से कुरूप और नग्न लग रहा था।  आंगन में रोपे पौधे भी जान पहचान के लोग ले गए थे और जगह–जगह मिट्टी बिखरी हुई थी।  पर पत्नी¸ बाल–बच्चों के साथ रहने की कल्पना में यह बिछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठ कर विलीन हो गया।
गजाधर बाबू खुश थे¸ बहुत खुश।  पैंतीस साल की नोकरी के बाद वह रिटायर हो कर जा रहे थे।  इन वर्षों में अधिकांश समय उन्होंने अकेले रह कर काटा था।  उन अकेले क्षणों में उन्होंने इसी समय की कल्पना की थी¸ जब वह अपने परिवार के साथ रह सकेंगे।  इसी आशा के सहारे वह अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे।  संसार की दृष्टि से उनका जीवन सफल कहा जा सकता था।  उन्होंंने शहर में एक मकान बनवा लिया था¸ बड़े लड़के अमर और लडकी कान्ति की शादियां कर दी थीं¸ दो बच्चे ऊंची कक्षाओं में पढ़ रहे थे।  गजाधर बाबू नौकरी के कारण प्राय: छोटे स्टेशनों पर रहे और उनके बच्चे तथा पत्नी शहर में¸ जिससे पढ़ाई में बाधा न हो।  गजाधर बाबू स्वभाव से बहुत स्नेही व्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षी भी।  जब परिवार साथ था¸ डयूटी से लौट कर बच्चों से हंसते–खेलते¸ पत्नी से कुछ मनोविनोद करते – उन सबके चले जाने से उनके जीवन में गहन सूनापन भर उठा।  खाली क्षणों में उनसे घरमें टिका न जाता।

कवि प्रकृति के न होने पर भी उन्हें पत्नी की स्नेहपूर्ण बातें याद आती रहतीं।  दोपहर में गर्मी होने पर भी दो बजे तक आग जलाए रहती और मना करने पर भी थोड़ासा कुछ और थाली में परोस देती और बड़े प्यार से आग्रह करती।  जब वह थके–हारे बाहर से आते¸ तो उनकी आहट पा वह रसोई के द्वार पर निकल आती और उनकी सलज्ज आंखे मुस्करा उठतीं।  गजाधर बाबू को तब हर छोटी बात भी याद आती और उदास हो उठते।  अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था जब वह फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे।
टोपी उतार कर गजाधर बाबू ने चारपाई पर रख दी¸ जूते खोल कर नीचे खिसका दिए¸ अन्दर से रह–रह कर कहकहों की आवाज़ आ रही थी¸ इतवार का दिन था और उनके सब बच्चे इकठ्ठे हो कर नाश्ता कर रहे थे।  गजाधर बाबू के सूखे होठों पर स्निग्ध मुस्कान आ गई¸ उसी तरह मुस्कुराते हुए वह बिना खांसे अन्दर चले आये।  उन्होंने देखा कि नरेन्द्र कमर पर हाथ रखे शायद रात की फिल्म में देखे गए किसी नृत्य की नकल कर रहा था और बसन्ती हंस–हंस कर दुहरी हो रही थी।  अमर की बहू को अपने तन–बदन¸ आंचल या घूंघट का कोई होश न था और वह उन्मुक्त रूप से हंस रही थी।  गजाधर बाबू को देखते ही नरेंद्र धप–से बैठ गया और चाय का प्याला उठा कर मुंह से लगा लिया।  बहू को होश आया और उसने झट से माथा ढक लिया¸ केवल बसन्ती का शरीर रह–रह कर हंसी दबाने के प्रयत्न में हिलता रहा।
गजाधर बाबू ने मुस्कराते हुए उन लोगों को देखा।  फिर कहा¸ “क्यों नरेन्द्र¸ क्या नकल हो रही थी ”
“कुछ नहीं बाबूजी।” नरेन्द्रने सिर फिराकर कहा।  गजाधर बाबू ने चाहा था कि वह भी इस मनो–विनोद में भाग लेते¸ पर उनके आते ही जैसे सब कुण्ठित हो चुप हो गए¸ उसे उनके मनमें थोड़ी–सी खिन्नता उपज आई। 
बैठते हुए बोले¸ “बसन्ती¸ चाय मुझे भी देना।  तुम्हारी अम्मां की पूजा अभी चल रही है क्या”
बसन्ती ने मां की कोठरी की ओर देखा¸ ” अभी आती ही होंगी” और प्याले में उनके लिए चाय छानने लगी। 
बहू चुपचाप पहले ही चली गई थी¸ अब नरेन्द्र भी चाय का आखिरी घूंट पी कर उठ खड़ा हुआ।  केवल बसन्ती पिता के लिहाज में¸ चौके में बैठी मां की राह देखने लगी। 
गजाधर बाबू ने एक घूंट चाय पी¸ फिर कहा¸ “बिट्टी – चाय तो फीकी है।”
    “लाइए¸ चीनी और डाल दूं।” बसन्ती बोली।
    “रहने दो¸ तुम्हारी अम्मा जब आयेगी¸ तभी पी लूंगा।”
थोड़ी देर में उनकी पत्नी हाथ में अर्घ्य का लोटा लिये निकली और असुध्द स्तुति कहते हुए तुलसी कों डाल दिया।  उन्हें देखते ही बसन्ती भी उठ गई।  पत्नी ने आकर गजाधर बाबू को देखा और कहा¸ “अरे आप अकेले बैंठें हैं – ये सब कहां गये”  गजाधर बाबू के मन में फांस–सी करक उठी¸ “अपने–अपने काम में लग गए हैं – आखिर बच्चे ही हैं।”
पत्नी आकर चौके में बैठ गई; उन्होनें नाक–भौं चढ़ाकर चारों ओर जूठे बर्तनों को देखा। फिर कहा¸ “सारे में जूठे बर्तन पडे. हैं।  इस घर में धरम–करम कुछ है नहीं।  पूजा करके सीधे चौंके में घुसो।” 
फिर उन्होंने नौकर को पुकारा¸ जब उत्तर न मिला तो एक बार और उच्च स्वर में फिर पति की ओर देख कर बोलीं¸ “बहू ने भेजा होगा बाज़ार।”  और एक लम्बी सांस ले कर चुप हो रहीं।
गजाधर बाबू बैठ कर चाय और नाश्ते का इन्तजार करते रहे।  उन्हें अचानक गनेशी की याद आ गई।  रोज सुबह¸ पॅसेंजर आने से पहले यह गरम–गरम पूरियां और जलेबियां और चाय लाकर रख देता था।  चाय भी कितनी बढ़िया¸ कांच के गिलास में उपर तक भरी लबालब¸ पूरे ढ़ाई चम्मच चीनी और गाढ़ी मलाई।  पैसेंजर भले ही रानीपुर लेट पहुंचे¸ गनेशी ने चाय पहुंचाने में कभी देर नहीं की।  क्या मज़ाल कि कभी उससे कुछ कहना पड़े।
पत्नी का शिकायत भरा स्वर सुन उनके विचारों में व्याघात पहुंचा।  वह कह रही थी¸ “सारा दिन इसी खिच–खिच में निकल जाता है।  इस गृहस्थी का धन्धा पीटते–पीटते उमर बीत गई। कोई जरा हाथ भी नहीं बटाता।”
       “बहू क्या किया करती हैं” गजाधर बाबू ने पूछा।
       “पड़ी रहती है।  बसन्ती को तो¸ फिर कहो कि कॉलेज जाना होता हैं।”
गजाधर बाबू ने जोश में आकर बसन्ती को आवाज दी।  बसन्ती भाभी के कमरे से निकली तो गजाधर बाबू ने कहा¸ “बसन्ती¸ आज से शाम का खाना बनाने की जिम्मेदारी तुम पर है।
सुबह का भोजन तुम्हारी भाभी बनायेगी।” बसन्ती मुंह लटका कर बोली¸ “बाबूजी¸ पढ़ना भी तो होता है।”
गजाधर बाबू ने प्यार से समझाया¸ “तुम सुबह पढ़ लिया करो।  तुम्हारी मां बूढ़ी हुई¸ अब वह शक्ति नहीं बची हैं।  तुम हो¸ तुम्हारी भाभी हैं¸ दोनों को मिलकर काम में हाथ बंटाना चाहिए।”
बसन्ती चुप रह गई।  उसके जाने के बाद उसकी मां ने धीरे से कहा¸ “पढ़ने का तो बहाना है।  कभी जी ही नहीं लगता¸ लगे कैसे  शीला से ही फुरसत नहीं¸ बड़े बड़े लड़के है उस घर में¸हर वक्त वहां घुसा रहना मुझे नहीं सुहाता।  मना करू तो सुनती नहीं।”
नाश्ता कर गजाधर बाबू बैठक में चले गए।  घर लौटा था और एैसी व्यवस्था हो चुकी थी कि उसमें गजाधर बाबू के रहने के लिए कोई स्थान न बचा था। जैसे किसी मेहमान के लिए कुछ अस्थायी प्रबन्ध कर दिया जाता है¸ उसी प्रकार बैठक में कुरसियों को दीवार से सटाकर बीच में गजाधर बाबू के लिए पतली–सी चारपाई डाल दी गई थी।  गजाधर बाबू उस कमरे में पड़े पड़े कभी–कभी अनायास ही इस अस्थायित्व का अनुभव करने लगते।  उन्हें याद आती उन रेलगाडियों की जो आती और थोड़ी देर रूक कर किसी और लक्ष की ओर चली जाती।
घर छोटा होने के कारण बैठक में ही अब अपना प्रबन्ध किया था।  उनकी पत्नी के पास अन्दर एक छोटा कमरा अवश्य था¸ पर वह एक ओर अचारों के मर्तबान¸ दाल¸ चावल के कनस्तर और घी के डिब्बों से घिरा था; दूसरी ओर पुरानी रजाइयां¸ दरियों में लिपटी और रस्सी से बांध रखी थी; उनके पास एक बड़े से टीन के बक्स में घर–भर के गरम कपड़े थे।  बींच में एक अलगनी बंधी हुई थी¸ जिस पर प्राय: बसन्ती के कपड़े लापरवाही से पड़े रहते थे।  वह भरसक उस कमरे में नहीं जाते थे।  घर का दूसरा कमरा अमर और उसकी बहू के पास था¸ तीसरा कमरा¸ जो सामने की ओर था।  गजाधर बाबू के आने से पहले उसमें अमर के ससुराल से आया बेंत का तीन कुरसियों का सेट पड़ा था¸ कुरसियों पर नीली गद्दियां और बहू के हाथों के कढ़े कुशन थे।
जब कभी उनकी पत्नी को कोई लम्बी शिकायता करनी होती¸ तो अपनी चटाई बैढ़क में डाल पड़ जाती थीं।  वह एक दिन चटाई ले कर आ गई।  गजाधर बाबू ने घर–गृहस्धी की बातें छेड़ी;वह घर का रवय्या देख रहे थे।  बहुत हलके से उन्होंने कहा कि अब हाथ में पैसा कम रहेगा¸ कुछ खर्चा कम करना चाहिए।   
“सभी खर्च तो वाजिब–वाजिब है¸ न मन का पहना¸ न ओढ़ा।”
गजाधर बाबू ने आहत¸ विस्मित दृष्टि से पत्नी को देखा।  उनसे अपनी हैसियत छिपी न थी।  उनकी पत्नी तंगी का अनुभव कर उसका उल्लेख करतीं।  यह स्वाभाविक था¸ लेकिन उनमें सहानुभूति का पूर्ण अभाव गजाधर बाबू को बहुत खतका।  उनसे य्दि राय–बात की जाती कि प्रबन्ध कैसे हो¸ तो उनहें चिन्ता कम¸ संतोष अधिक होता लेकिन उनसे तो केवल शिकायत की जाती थी¸ जैसे परिवार की सब परेशानियों के लिए वही जिम्मेदार थे।
“तुम्हे कमी किस बात की है अमर की मां – घर में बहू है¸ लड़के–बच्चे हैं¸ सिर्फ रूपये से ही आदमी अमीर नहीं होता।”  गजाधर बाबू ने कहा और कहने के साथ ही अनुभव किया। यह उनकी आन्तरिक अभिव्यक्ति थी – ऐसी कि उनकी पत्नी नहीं समझ सकती।
“हां¸ बड़ा सुख है न बहू से।  आज रसोई करने गई है¸ देखो क्या होता हैं” कहकार पत्नी ने आंखे मूंदी और सो गई।  गजाधर बाबू बैठे हुए पत्नी को देखते रह गए।  यही थी क्या उनकी पत्नी¸ जिसके हाथों के कोमल स्पर्श¸ जिसकी मुस्कान की याद में उन्होंने सम्पूर्ण जीवन काट दिया था  उन्हें लगा कि वह लावण्यमयी युवती जीवन की राह में कहीं खो गई और उसकी जगह आज जो स्त्री है¸ वह उनके मन और प्राणों के लिए नितान्त अपरिचिता है।  गाढ़ी नींद में डूबी उनकी पत्नी का भारी शरीर बहुत बेडौल और कुरूप लग रहा था¸ श्रीहीन और रूखा था। गजाधर बाबू देर तक निस्वंग दृष्टि से पत्नी को देखते रहें और फिर लेट कर छत की ओर ताकने लगे।
अन्दर कुछ गिरा दिया शायद¸ ”  और वह अन्दर भागी।  थोड़ी देर में लौट कर आई तो उनका मूंह फूला हुआ था।  “देखा बहू को¸ चौका खुला छोड़ आई¸ बिल्ली ने दाल की पतीली गिरा दी।  सभी खाने को है¸ अब क्या खिलाऊंगी”  वह सांस लेने को रूकी और बोली¸ “एक तरकारी और चार पराठे बनाने में सारा डिब्बा घी उंडेल रख दिया। जरा सा दर्द नहीं हैं¸कमानेवाला हाड़ तोडे. और यहां चीजे. लुटें।  मुझे तो मालूम था कि यह सब काम किसी के बस का नहीं हैं।” गजाधर बाबू को लगा कि पत्नी कुछ और बोलेंगी तो उनके कान झनझना उठेंगे। ओंठ भींच करवट ले कर उन्होंने पत्नी की ओर पीठ कर ली।
रात का भोजन बसन्ती ने जान बूझ कर ऐसा बनाया था कि कौर तक निगला न जा सके।  गजाधर बाबू चुपचाप खा कर उठ गये पर नरेन्द्र थाली सरका कर उठ खड़ा हुआ और बोला¸ “मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता।”
बसन्ती तुनककर बोली¸ “तो न खाओ¸ कौन तुम्हारी खुशामद कर रहा है।”
 “तुमसे खाना बनाने को किसने कहा था”  नरेंद्र चिल्लाया।
 “बाबूजी नें”
 “बाबू जी को बैठे बैठे यही सूझता है।”
बसन्ती को उठा कर मां ने नरेंद्र को मनाया और अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाया।  गजाधर बाबू ने बाद में पत्नी से कहा¸ “इतनी बड़ी लड़की हो गई और उसे खाना बनाने तक का सहूर नहीं आया।”
“अरे आता सब कुछ है¸ करना नहीं चाहती।”  पत्नी ने उत्तर दिया।  अगली शाम मां को रसोई में देख कपड़े बदल कर बसन्ती बाहर आई तो बैठक में गजाधर बाबू ने टोंक दिया¸ ” कहां जा रही हो”
“पड़ोस में शीला के घर।”  बसन्ती ने कहा।
“कोई जरूरत नहीं हैं¸ अन्दर जा कर पढ़ो।”  गजाधर बाबू ने कड़े स्वर में कहा।  कुछ देर अनिश्चित खड़े रह कर बसन्ती अन्दर चली गई।  गजाधर बाबू शाम को रोज टहलने चले जाते थे¸
लौट कर आये तो पत्नी ने कहा¸ “क्या कह दिया बसन्ती से  शाम से मुंह लपेटे पड़ी है।  खाना भी नहीं खाया।”
गजाधर बाबू खिन्न हो आए।  पत्नी की बात का उन्होंने उत्तर नहीं दिया।  उन्होंने मन में निश्चय कर लिया कि बसन्ती की शादी जल्दी ही कर देनी है।  उस दिन के बाद बसन्ती पिता से बची–बची रहने लगी।  जाना हो तो पिछवाड़े से जाती।  गजाधर बाबू ने दो–एक बार पत्नी से पूछा तो उत्तर मिला¸ “रूठी हुई हैं।”  गजाधर बाबू को और रोष हुआ।  लड़की के इतने मिज़ाज¸ जाने को रोक दिया तो पिता से बोलेगी नहीं।  फिर उनकी पत्नी ने ही सूचना दी कि अमर अलग होने की सोच रहा हैं।
“क्यों”  गजाधर बाबू ने चकित हो कर पूछा।
पत्नी ने साफ–साफ उत्तर नहीं दिया।  अमर और उसकी बहू की शिकायतें बहुत थी।  उनका कहना था कि गजाधर बाबू हमेशा बैठक में ही पड़े रहते हैं¸ कोई आने–जानेवाला हो तो कहीं बिठाने की जगह नहीं।  अमर को अब भी वह छोटा सा समझते थे और मौके–बेमौके टोक देते थे।  बहू को काम करना पड़ता था और सास जब–तब फूहड़पन पर ताने देती रहती थीं।
“हमारे आने के पहले भी कभी ऐसी बात हुई थी”  गजाधर बाबू ने पूछा।
पत्नी ने सिर हिलाकर जताया कि नहीं¸ पहले अमर घर का मालिक बन कर रहता था¸ बहू को कोई रोक–टोक न थी¸ अमर के दोस्तों का प्राय: यहीं अड्‌डा जमा रहता था और अन्दर से चाय नाश्ता तैयार हो कर जाता था।  बसन्ती को भी वही अच्छा लगता था।
गजाधर बाबू ने बहुत धीरे से कहा¸ “अमर से कहो¸ जल्दबाज़ी की कोई जरूरत नहीं हैं।”
अगले दिन सुबह घूम कर लौटे तो उन्होंने पाया कि बैठक में उनकी चारपाई नहीं हैं।  अन्दर आकर पूछने वाले ही थे कि उनकी दृष्टि रसोई के अन्दर बैठी पत्नी पर पड़ी।  उन्होंने यह कहने को मुंह खोला कि बहू कहां है; पर कुछ याद कर चुप हो गए।  पत्नी की कोठरी में झांका तो अचार¸ रजाइयों और कनस्तरों के मध्य अपनी चारपाई लगी पाई।  गजाधर बाबू ने कोट उतारा और कहीं टांगने के लिए दीवार पर नज़र दौड़ाई।  फिर उसपर मोड़ कर अलगनी के कुछ कपड़े खिसका कर एक किनारे टांग दिया।  कुछ खाए बिना ही अपनी चारपाई पर लेट गए।  कुछ भी हो¸ तन आखिरकार बूढ़ा ही था।  सुबह शाम कुछ दूर टहलने अवश्य चले जाते¸ पर आते आते थक उठते थे।  गजाधर बाबू को अपना बड़ा सा¸ खुला हुआ क्वार्टर याद आ गया।

निश्चित जीवन – सुबह पॅसेंजर ट्रेन आने पर स्टेशन पर की चहल–पहल¸ चिर–परिचित चेहरे और पटरी पर रेल के पहियों की खट्‌–खट्‌ जो उनके लिए मधुर संगीत की तरह था।  तूफान और डाक गाडी के इंजिनों की चिंघाड उनकी अकेली रातों की साथी थी।  सेठ रामजीमल की मिल के कुछ लोग कभी कभी पास आ बैठते¸ वह उनका दायरा था¸ वही उनके साथी।  वह जीवन अब उन्हें खोई विधि–सा प्रतीत हुआ।  उन्हें लगा कि वह जिन्दगी द्वारा ठगे गए हैं।  उन्होंने जो कुछ चाहा उसमें से उन्हें एक बूंद भी न मिली।
लेटे  हुए वह घर के अन्दर से आते विविध स्वरों को सुनते रहे।  बहू और सास की छोटी–सी झड़प¸ बाल्टी पर खुले नल की आवाज¸ रसोई के बर्तनों की खटपट और उसी में गौरैयों का वार्तालाप – और अचानक ही उन्होंने निश्चय कर लिया कि अब घर की किसी बात में दखल न देंगे।  यदि गृहस्वामी के लिए पूरे घर में एक चारपाई की जगह यहीं हैं¸ तो यहीं पड़े रहेंगे।
अगर कहीं और डाल दी गई तो वहां चले जाएंगे।
यदि बच्चों के जीवन में उनके लिए कहीं स्थान नहीं¸ तो अपने ही घर में परदेसी की तरह पड़े रहेंगे।  और उस दिन के बाद सचमुच गजाधर बाबू कुछ नहीं बोले।  नरेंद्र मांगने आया तो उसे बिना कारण पूछे रूपये दे दिये बसन्ती काफी अंधेरा हो जाने के बाद भी पड़ोस में रही तो भी उन्होंने कुछ नहीं कहा – पर उन्हें सबसे बड़ा ग़म यह था कि उनकी पत्नी ने भी उनमें कुछ परिवर्तन लक्ष्य नहीं किया।  वह मन ही मन कितना भार ढो रहे हैं¸ इससे वह अनजान बनी रहीं।  बल्कि उन्हें पति के घर के मामले में हस्तक्षेप न करने के कारण शान्ति ही थी।
कभी–कभी कह भी उठती¸ “ठीक ही हैं¸ आप बीच में न पड़ा कीजिए¸ बच्चे बड़े हो गए हैं¸ हमारा जो कर्तव्य था¸ कर रहें हैं।  पढ़ा रहें हैं¸ शादी कर देंगे।”
गजाधर बाबू ने आहत दृष्टि से पत्नी को देखा।  उन्होंने अनुभव किया कि वह पत्नी व बच्चों के लिए केवल धनोपार्जन के निमित्तमात्र हैं।
जिस व्यक्ति के अस्तित्व से पत्नी मांग में सिन्दूर डालने की अधिकारी हैं¸ समाज में उसकी प्रतिष्ठा है¸ उसके सामने वह दो वक्त का भोजन की थाली रख देने से सारे कर्तव्यों से छुट्टी पा जाती हैं।  वह घी और चीनी के डब्बों में इतना रमी हुई हैं कि अब वही उनकी सम्पूर्ण दुनिया बन गई हैं।  गजाधर बाबू उनके जीवन के केंद्र नहीं हो सकते¸ उन्हें तो अब बेटी की शादी के लिए भी उत्साह बुझ गया।  किसी बात में हस्तक्षेप न करने के निश्चय के बाद भी उनका अस्तित्व उस वातावरण का एक भाग न बन सका।  उनकी उपस्थिति उस घर में ऐसी असंगत लगने लगी थी¸ जैसे सजी हुई बैठक में उनकी चारपाई थी।  उनकी सारी खुशी एक गहरी उदासीनता में डूब गई।
इतने सब निश्चयों के बावजूद भी गजाधर बाबू एक दिन बीच में दखल दे बैठे।  पत्नी स्वभावानुसार नौकर की शिकायत कर रही थी¸ “कितना कामचोर है¸ बाज़ार की हर चीज में पैसा बनाता है¸ खाना खाने बैठता है तो खाता ही चला जाता हैं।  “गजाधर बाबू को बराबर यह महसूस होता रहता था कि उनके रहन सहन और खर्च उनकी हैसियत से कहीं ज्यादा हैं।  पत्नी की बात सुन कर लगा कि नौकर का खर्च बिलकुल बेकार हैं।  छोटा–मोटा काम हैं¸ घर में तीन मर्द हैं¸ कोई–न–कोई कर ही देगा।  उन्होंने उसी दिन नौकर का हिसाब कर दिया।  अमर दफ्तर से आया तो नौकर को पुकारने लगा। 
अमर की बहू बोली¸ “बाबूजी ने नौकर छुड़ा दिया हैं।”
          “क्यों”
        “कहते हैं¸ खर्च बहुत है।”
यह वार्तालाप बहुत सीधा–सा था¸ पर जिस टोन में बहू बोली¸ गजाधर बाबू को खटक गया।  उस दिन जी भारी होने के कारण गजाधर बाबू टहलने नहीं गये थे।  आलस्य में उठ कर बत्ती भी नहीं जलाई – इस बात से बेखबर नरेंद्र मां से कहने लगा¸ “अम्मां¸ तुम बाबूजी से कहती क्यों नहीं बैठे–बिठाये कुछ नहीं तो नौकर ही छुड़ा दिया।  अगर बाबूजी यह समझें कि मैं साइकिल पर गेंहूं रख आटा पिसाने जाऊंगा तो मुझसे यह नहीं होगा।”
“हां अम्मा¸”  बसन्ती का स्वर था¸ ” मैं कॉलेज भी जाऊं और लौट कर घरमें झाड़ू भी लगाऊं¸ यह मेरे बस की बात नहीं हैं।”
“बूढ़े आदमी हैं”  अमर भुनभुनाया¸ “चुपचाप पड़े रहें।  हर चीज में दखल क्यों देते हैं”  पत्नी ने बड़े व्यंग से कहा¸ “और कुछ नहीं सूझा तो तुम्हारी बहू को ही चौके में भेज दिया।  वह गई तो पंद्रह दिन का राशन पांच दिन में बना कर रख दिया।”  बहू कुछ कहे¸ इससे पहले वह चौके में घुस गई।  कुछ देर में अपनी कोठरी में आई और बिजली जलाई तो गजाधर बाबू को लेटे देख बड़ी सिटपिटाई।  गजाधर बाबू की मुखमुद्रा से वह उनके भावों का अनुमान न लगा सकी।  वह चुप¸ आंखे बंद किये लेटे रहे।
गजाधर बाबू चिठ्ठी हाथ में लिए अन्दर आये और पत्नी को पुकारा।  वह भीगे हाथ लिये निकलीं और आंचल से पोंछती हुई पास आ खड़ी हुई।  गजाधर बाबू ने बिना किसी भूमिका के कहा¸ “मुझे सेठ रामजीमल की चीनी मिल में नौकरी मिल गई हैं।  खाली बैठे रहने से ता चार पैसे घर में आएं¸ वहीं अच्छा हैं।  उन्होंने तो पहले ही कहा था¸ मैंने मना कर दिया था।” फिर कुछ रूक कर¸ जैसी बुझी हुई आग में एक चिनगारी चमक उठे¸ उन्होंने धीमे स्वर में कहा¸ “मैंने सोचा था¸ बरसों तुम सबसे अलग रहने के बाद¸ अवकाश पा कर परिवार के साथ रहूंगा। खैर¸ परसों जाना हैं। तुम भी चलोगी” “मैं”  पत्नी ने सकपकाकर कहा¸ “मैं चलूंगी तो यहां क्या होग  इतनी बड़ी गृहस्थी¸ फिर सयानी लड़की . . . . . .”
बात  बीच में काट कर गजाधर बाबू ने हताश स्वर में कहा¸ “ठीक हैं¸ तुम यहीं रहो।  मैंने तो ऐसे ही कहा था।”  और गहरे मौन में डूब गए।
नरेंद्र ने बड़ी तत्परता से बिस्तर बांधा और रिक्शा बुला लाया।  गजाधर बाबू का टीन का बक्स और पतला सा बिस्तर उस पर रख दिया गया।  नाश्ते के लिए लड्‌डू और मठरी की डलिया हाथ में लिए गजाधर बाबू रिक्शे में बैठ गए।  एक दृष्टि उन्होंने अपने परिवार पर डाली और फिर दूसरी ओर देखने लगे और रिक्शा चल पड़ा। 
उनके जाने के बाद सब अन्दर लौट आये¸ बहू ने अमर से पूछा¸ “सिनेमा चलियेगा न?”  बसन्ती ने उछल कर कहा¸ “भैया¸ हमें भी।”
गजाधर बाबू की पत्नी सीधे चौके में चली गई। बची हुई मठरियों को कटोरदान में रखकर अपने कमरे में लाई और कनस्तरों के पास रख दिया। 
फिर बाहर आ कर कहा¸ “अरे नरेन्द्र¸बाबूजी की चारपाई कमरे से निकाल दे¸ उसमें चलने तक को जगह नहीं हैं।”

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पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने “उसने कहा था” कहानी की रचना कर न केवल हिंदी कहानी अपितु विश्व कथा-साहित्य को समॄद्ध किया हैं । वास्तविकता यह है कि उनकी प्रसिद्धि “”उसने कहा था”” के द्वारा ही हुई। “उसने कहा था” प्रेम, शौर्य और बलिदान की अद्भुत प्रेम-कथा है। प्रथम विश्व युद्ध के समय में लिखी गयी यह प्रेम कथा कई मायनों में अप्रतिम है। प्रथम-दृष्टि-प्रेम तथा साहचर्यजन्य प्रेम दोनों का ही इस प्रेमोदय में सहकार है। बालापन की यह प्रीति इतना अगाध विश्वास लिए है कि 25 वर्षो के अंतराल के पश्चात भी प्रेमिका को यह विश्वास है कि यदि वह अपने उस प्रेमी से, जिसने बचपन में कई बार अपने प्राणों को संकट में डाल कर उसकी जान बचायी है, यदि आंचल पसार कर कुछ मांगेगी तो वह मिलेगा अवश्य। और दूसरी ओर प्रेमी का “उसने कहा था” की पत रखने के लिए प्राण न्योछावर कर वचन निभाना उसके अद्भुत बलिदान और प्रेम पर सर्वस्व अर्पित करने की एक बेमिसाल कहानी है। “उसने कहा था” का कथा-नायक अंत तक किसी को नहीं बताना चाहता, स्वयं अपने अधिकारी, बॉस, सूबेदार को भी नहीं कि उसने कितनी बडी कुर्बानी सिर्फ “उसने कहा था” की वचन-रक्षा के लिए दी है, बस केवल इतना-भर कह कर इस दुनिया को छोडने के लिए तैयार है, सूबेदारनी होरां को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि जो “उसने कहा था” वह मैंने कर दिया। सूबेदार पूछते भी हैं कि उसने क्या कहा था तो भी लहना सिंह का उत्तर यही है, मैंने जो कहा वह लिख देना और कह भी देना। प्रेमिका के वचनों पर सहर्ष प्राण त्याग कर ऐसी मौन महायात्रा! ..धन्य है यह विलक्षण प्रीति!!

   क्या लहना सिंह और बालिका के प्रेम को प्रेम-रसराज श्रृंगार की सीमा का स्त्री-पुरुष के बीच जन्मा प्रेम कहा भी जा सकता है? मृत्यु के कुछ समय पहले लहना सिंह के मानस-पटल पर स्मृतियों की जो रील चल रही है उससे ज्ञात होता है कि अमृतसर की भीड-भरी सडकों पर जब बालक लहना सिंह और बालिका (सूबेदारनी) मिलते हैं तो लहना सिंह की उम्र बारह वर्ष है और बालिका की आठ वर्ष। ध्यातव्य है कि 1914-15 ई. का हमारा सामाजिक परिवेश ऐसा नहीं था जैसा आज का। आज के बालक-बालिका रेडियो, टी.वी. तथा अन्य प्रचार माध्यमों और उनके द्वारा परिवार-नियोजन के लिए चलायी जा रही मुहिम से यौन-संबंधों की जो जानकारी रखते हैं, उस समय उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह वह समय था जब अधिकतर युवाओं को स्त्री-पुरुष संबंधों का सही ज्ञान नहीं होता था। ऐसे समय में अपने मामा के यहां आया लडका एक ही महीने में केवल दूसरे-तीसरे दिन कभी सब्जी वाले या दूध वाले के यहां उस बालिका से अकस्मात मिल जाता है तो यह साहचर्यजन्य सहज प्रीति उस प्रेम की संज्ञा तो नहीं पा सकती जिसका स्थायी भाव रति है। इसे बालपन की सहज प्रीति ही कहा जा सकता है जिसका पच्चीस वर्षो के समय तक शिथिल न पडने वाला वह तार यह संवाद है तेरी कुडमाई हो गई? और उत्तर का भोला धृष्ट धत् है। किंतु एक दिन धत् न सुन कर जब बालक लहना सिंह संभावना, आशा के विपरीत यह सुनता है हां, हो गई, कब?, कल, देखते नहीं यह रेशम से कढा हुआ सालू! तो उसकी दुनिया में उथल-पुथल मच जाती है, मानो उसके भाव जगत में एक तूफान आ जाता है, आग-सी लग जाती है।

उसे प्रत्यक्ष कथित न कर कुशल कहानीकार ने लडके के कार्य-व्यापार से अभिव्यंजित किया है, रास्ते में एक लडके को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबडीवाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते को पत्थर मारा और एक गोभी वाले के ठेले में दूध उंडेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अंधे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुंचा। बालक लहना सिंह का यह व्यवहार, कार्य-व्यापार, उसके भाव-जगत में आए अंधड का तो परिचय देता ही है, इस सहज प्रीति की गहराई को भी लक्षित कराता है। पच्चीस वर्ष बीत जाने पर भी अपनी उम्र के सैंतीसवें वर्ष में प्रवेश करने पर केवल इस संवाद की पुनरावृत्ति तेरी कुडमाई हो गई? उस सारे अतीत को लहना सिंह के सामने प्रत्यक्ष तथा जीवंत कर देती है। यौवन की प्रीति पर सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले उदाहरण तो संसार की प्रेम-कथाओं में एक से एक बढकर मिल जायेंगे किंतु बालपन की साहचर्यजन्य सहज प्रीति पर प्राणों का बलिदान कर देने वाला यह उदाहरण सर्वथा विरल, केवल लहना सिंह का है। लहना सिंह इसी कारण प्रेमकथाओं का सबसे निराला नायक है, प्राणों की बाजी लगाकर अपने प्रेम को दिये गये वचन की रक्षा करने वाला।

   “उसने कहा था” का कथा-विन्यास अत्यंत विराट फलक पर किया गया है। कहानी जीवन के किसी प्रसंग विशेष, समस्या विशेष या चरित्र की किसी एक विशेषता को ही प्रकाशित करती है, उसके संक्षिप्त कलेवर में इससे अधिक की गुंजाइश नहीं होती है। किंतु यह कहानी लहना सिंह के चारित्रिक विकास में उसकी अनेक विशेषताओं को प्रकाशित करती हुई उसका संपूर्ण जीवन-वृत्त प्रस्तुत करती है, बारह वर्ष की अवस्था से लेकर प्राय: सैंतीस वर्ष, उसकी मृत्युपर्यत, तक की कथा-नायक का संपूर्ण जीवन इस रूप में चित्रित होता है कि कहानी अपनी परंपरागत रूप-पद्धति (फॉर्म) को चुनौती देकर एक महाकाव्यात्मक औदात्य लिये हुए है। वस्तुत: पांच खण्डों में कसावट से बुनी गयी यह कहानी सहज ही औपन्यासिक विस्तार से युक्त है किंतु अपनी कहन की कुशलता से कहानीकार इसे एक कहानी ही बनाये रखता है। दूसरे, तीसरे और चौखे खण्ड में विवेच्य कहानी में युद्ध-कला, सैन्य-विज्ञान (क्राफ्ट ऑफ वार) और खंदकों में सिपाहियों के रहने-सहने के ढंग का जितना प्रामाणिक, सूक्ष्म तथा जीवंत चित्रण इस कहानी में हुआ है, वैसा हिंदी कथा-साहित्य में विरल है।

   लहना सिंह जैसे सीधे-साधे सिपाही, जमादार लहना सिंह की प्रत्युपन्नमति, कार्य करने की फुर्ती, संकट के समय अपने साथियों का नेतृत्व, जर्मन लपटैन (लेफ्टिनेंट) को बातों-बातों में बुद्धू बना कर उसकी असलियत जान लेना, यदि एक ओर इस चरित्र को इस सबसे विकास मिलता है तो दूसरी ओर पाठक इस रोचक-वर्णन में खो-सा जाता है। भाई कीरत सिंह की गोद में सिर रख कर प्राण त्यागने की वांछा वजीरा सिंह को कीरत सिंह समझने में लहना सिंह एक त्रासद प्रभाव पाठक को देता है। मृत्यु से पूर्व का यह सारा दृश्यविधान अत्यंत मार्मिक बन पडा है।

   वातावरण का अत्यंत गहरे रंगों में सृजन गुलेरी जी की अपनी विशेषता है। कहानी का प्रारंभ अमृतसर की भीड-भरी सडकों और गहमागहमी से होता है, युद्ध के मोर्चे पर खाली पडे फौजी घर, खंदक का वातावरण, युद्ध के पैंतरे इन सबके चित्र अंकित करता हुआ कहानीकार इस स्वाभाविक रूप में वातावरण की सृष्टि करता है कि वह हमारी चेतना, संवेदना का अंग ही बन जाता है।

   दो शब्द कहानी की भाषा-शैली पर भी कहना आवश्यक है। ध्यातव्य है कि 1915 ई. में कहानीकार इतने परिनिष्ठित गद्य का स्वरूप उपस्थित कर सकता है जो बहुत बाद तक की कहानी में भी दुर्लभ है। यदि भाषा में कथा की बयानी के लिए सहज चापल्य तथा जीवन-धर्मी गंध है तो चांदनी रात के वर्णन में एक गांभीर्य जहां चंद्रमा को क्षयी तथा हवा को बाणभट्ट की कादम्बरी में आये दन्तवीणोपदेशाचार्य की संज्ञा से परिचित कराया गया है। रोजमर्रा की बोलचाल के शब्दों, वाक्यांशों और वाक्यों तथा लोकगीत की कडियों का प्रयोग भी कहानी को एक नयी धज दे कर आगे की कहानी भाषा और शैली का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इस प्रकार अनेक दृष्टियों से “उसने कहा था” हिंदी ही नहीं, भारतीय भाषाओं की ही नहीं अपितु विश्व कहानी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

 

 

 

भारत को गण्तंत्रता आज से 59 साल पूर्व 26 जनवरी 1950 को हासिल हुइ थी। उस दिन भारत एक गणतंत्र्राज्य बना था। तब से सारे देश में 26 जनवरी गण्तंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। गणतंत्र दिवस पर पूरे देश भर में छुट्टी मनाई जाती है। गणतंत्र दिवस पर भारत के प्रधान मंत्री दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा लहराते हैं। उसके बाद गणतंत्र दिवस की परेड होती है, जिसमें अनेक झाँकियाँ भी दिखाई जाती हैं। भारत का एक एक प्रदेश एक झाँकी प्रस्तुत करता है। इस परेड में भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता की झलक दिखती है। इसके बाद भारतीय सेना, अपनी फ़ायर पावर का प्रदर्शण करती है। इसके बाद सेएन अपने उन वीर जवानों को महावीर चक्र से पुरुस्क्रित करती है जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किये बिना देश की रक्षा में अपनी जान की आहूति दे दी। इस दिन पर भारतीय सरकार उन बच्चों को आदर देती है जो अपनी जान पर खेल कर किसी और कइ जान को बचाया है। सभी स्कूलों में भी इस दिन पर भारतीय झंडा लहराया जाता है और राष्ट्र गान भी गाया जाता है। इस दिन पर सभी लोग अपने परिवार के साथ इस दिन का लुफ़्त उठाते हैं। यह दिन सभी भरतीयों के लिये बहुत महत्त्व्पूर्ण है।

-मिथिलेश वामनकर

 

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

भारत को गण्तंत्रता आज से 59 साल पूर्व 26 जनवरी 1950 को हासिल हुइ थी। उस दिन भारत एक गणतंत्र्राज्य बना था। तब से सारे देश में 26 जनवरी गण्तंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। गणतंत्र दिवस पर पूरे देश भर में छुट्टी मनाई जाती है। गणतंत्र दिवस पर भारत के प्रधान मंत्री दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा लहराते हैं। उसके बाद गणतंत्र दिवस की परेड होती है, जिसमें अनेक झाँकियाँ भी दिखाई जाती हैं। भारत का एक एक प्रदेश एक झाँकी प्रस्तुत करता है। इस परेड में भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता की झलक दिखती है। इसके बाद भारतीय सेना, अपनी फ़ायर पावर का प्रदर्शण करती है। इसके बाद सेएन अपने उन वीर जवानों को महावीर चक्र से पुरुस्क्रित करती है जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किये बिना देश की रक्षा में अपनी जान की आहूति दे दी। इस दिन पर भारतीय सरकार उन बच्चों को आदर देती है जो अपनी जान पर खेल कर किसी और कइ जान को बचाया है। सभी स्कूलों में भी इस दिन पर भारतीय झंडा लहराया जाता है और राष्ट्र गान भी गाया जाता है। इस दिन पर सभी लोग अपने परिवार के साथ इस दिन का लुफ़्त उठाते हैं। यह दिन सभी भरतीयों के लिये बहुत महत्त्व्पूर्ण है।

-मिथिलेश वामनकर

कालिदास (375-445 ई.)
साहित्य में कालजयी रचनाएं गहन-गंभीर मानवीय अनुभवों से जन्म लेती हैं। शताब्दियों के अंतराल के बाद, नितान्त भिन्न परिस्थितियों और अवस्थाओं में भी उनमें हमें अपने अनुभवों की गूंज सुनाई देती है। श्रेष्ठ कालजयी रचनाओं में देश-काल की सीमाओं से परे गुण होते हैं। कालिदास भारत की आत्मा, सौन्दर्य और प्रतिभा के महान् प्रतिनिधि हैं। भारतीय राष्ट्रीय चेतना के मूल से उनकी कृतियों का जन्म हुआ है। कालिदास ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात किया, समृद्ध किया और फिर उन्होंने उसे सार्वभौम परिवेश और महत्त्व प्रदान किया, इसकी आध्यात्मिक दिशाओं, इसकी प्रज्ञा के आयामों, इसकी कला की अभिव्यक्तियों, इसके राजनैतिक स्वरूपों और अर्थ प्रबंधों – सभी को सद्य, सार्थक और ज्वलंत उक्तियों में अभिव्यक्ति मिली है। उनकी रचनाओं में हमें भाषा की सरलता, उक्तियों की सटीकता, शास्त्रीय अभिरूचि, सायास, औचित्य, गहन कवित्व संवेदना और भाव तथा विचारों का प्रस्फुटन दृष्टिगोचर होता है। उनके नाटकों में हमें करुणा, शक्ति, सौन्दर्य, कथा के गठन और पात्रों के चरित्र-चित्रण में अनुपम कौशल के दर्शन होते हैं। उन्हें राजदरबार तथा पर्वत-श्रृंगों, सुखी परिवारों और वन-तपोवन सभी का ज्ञान है। उनका दृष्टिकोण संतुलित है जो उन्हें उच्चवर्ग तथा निम्नवर्ग, मछुआरे, राजदरबारी, नौकर सभी का वर्णन करने में सक्षम बनाता है। ये सभी गुण उनकी रचनाओं को विश्व-साहित्य में सम्मिलित करते हैं। यद्यपि उनकी विषय-वस्तु भारतीय है तथापि उसमें संपूर्ण मानवता की संवेदना है। भारत में कालिदास संस्कृत साहित्य के महान् कवि और नाटककार माने जाते हैं। जब हम कवियों की गणना करते हैं तो कालिदास प्रथम और अन्तिम हैं क्योंकि उन जैसा दूसरा कोई आज तक पैदा नहीं हुआ। परम्परा के अनुसार कालिदास उज्जयनी के उन राजा विक्रमादित्य के समकालीन हैं जिन्होंने ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् चलाया। विक्रमोर्वशीय के नायक पुरुरवा के नाम का विक्रम में परिवर्तन से इस तर्क को बल मिलता है कि कालिदास उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य के राजदरबारी कवि थे। अग्निमित्र, जो मालविकाग्निमित्र नाटक का नायक है, कोई सुविख्यता राजा नहीं था, इसीलिए कालिदास ने उसे विशिष्टता प्रदान नहीं की। उनका काल ईसा से दो शताब्दी पूर्व का है और विदिशा उसकी राजधानी थी। कालिदास के द्वारा इस कथा के चुनाव और मेघदूत में एक प्रसिद्ध राजा की राजधानी के रूप में उसके उल्लेख से यह निष्कर्ष निकलता है कि कालिदास अग्निमित्र के समकालीन थे। यह स्पष्ट है कि कालिदास का उत्कर्ष अग्निमित्र के बाद (150 ई.पू.) और 634 ई. पूर्व तक रहा है, जो कि प्रसिद्ध ऐहोल के शिलालेख की तिथि है, जिसमें कालिदास का महान् कवि के रूप में उल्लेख है। यदि इस मान्यता को स्वीकार कर लिया जाए कि माण्डा की कविताओं या 473 ई. के शिलालेख में कालिदास के लेखन की जानकारी का उल्लेख है, तो उनका काल चौथी शताब्दी के अन्त के बाद का नहीं हो सकता। अश्वघोष के बुद्धचरित और कालिदास की कृतियों में समानताएं हैं। यदि अश्वघोष कालिदास के ऋणी हैं तो कालिदास का काल प्रथम शताब्दी ई. से पूर्व का है और यदि कालिदास अश्वघोष के ऋणी हैं तो कालिदास का काल ईसा की प्रथम शताब्दी के बाद ठहरेगा। ऐसी मान्यता है कि कालिदास गुप्त काल के थे और वे उन चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्य में थे जिन्हें विक्रमादित्य’ की पदवी प्राप्त थी, वे 345 ई. में सत्ता में आए और उन्होंने 414 ई. तक शासन किया। हम कोई भी तिथि स्वीकार करें, वह हमारा उचित अनुमान भर है और इससे अधिक कुछ नहीं। चूंकि कालिदास ने अपने बारे में बहुत कम कहा है अतः उन अनेक रचनाओं के बारे में जो उनकी मानी जाती हैं, निश्चय कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी, निम्नलिखित रचनाओं के संबंध में आम सहमति यह है कि वे कालिदास की हैं :
1.अभिज्ञान – शांकुतल : सात अंकों का नाटक जिसमें दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम और विवाह का वर्णन है।
2.विक्रमोर्वशीय : पांच अंकों का नाटक जिसमें पुरुरवा और उर्वशी के प्रेम और विवाह का वर्णन है।
3. मालविकाग्निमित्र : पांच अंकों का नाटक जिसमें मालिविका और अग्निमित्र के प्रेम का वर्णन है।
4.रघुवंश : उन्नीस सर्गों का महाकाव्य जिसमें सूर्यवंशी राजाओं के जीवन चरित्र हैं।
5.कुमारसंभव : सत्रह सर्गों का महाकाव्य जिसमें शिव और पार्वती के विवाह और कुमार के जन्म का वर्णन है जो युद्ध के देवता हैं।
6 मेघदूत : एक सौ ग्यारह छन्दों1 की कविता जिसमें यक्ष द्वारा अपनी पत्नी को मेघ द्वारा पहुंचाए गए संदेश का वर्णन है।
7.ऋतुसंहार : इसमें ऋतुओं का वर्णन है।
1.किसी-किसी पाण्डुलिपि में अधिक छन्द भी हैं। कालिदास अपनी विषय-वस्तु देश की सांस्कृतिक विरासत से लेते हैं और उसे वे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप ढाल देते हैं। उदाहरणार्थ, अभिज्ञान शाकुन्तल की कथा में शकुन्तला चतुर, सांसारिक युवा नारी है और दुष्यन्त स्वार्थी प्रेमी है। इसमें कवि तपोवन की कन्या में प्रेमभावना के प्रथम प्रस्फुटन से लेकर वियोग, कुण्ठा आदि की अवस्थाओं में से होकर उसे उसकी समग्रता तक दिखाना चाहता है। उन्हीं के शब्दों में नाटक में जीवन की विविधता होनी चाहिए और उसमें विभिन्न रुचियों के व्यक्तियों के लिए सौंदर्य और माधुर्य होना चाहिए। त्रैगुण्योद्भवम् अत्र लोक-चरितम् नानृतम् दृश्यते। नाट्यम् भिन्न-रुचेर जनस्य बहुधापि एकम् समाराधनम्।। कालिदास के जीवन के बारे में हमें विशेष जानकारी नहीं है। उनके नाम के बारे में अनेक किवदन्तियां प्रचलित हैं जिनका कोई ऐतिहासिक मूल्य नहीं है। उनकी कृतियों से यह विदित होता है कि वे ऐसे युग में रहे जिसमें वैभव और सुख-सुविधाएं थीं। संगीत तथा नृत्य और चित्र-कला से उन्हें विशेष प्रेम था। तत्कालीन ज्ञान-विज्ञान, विधि और दर्शन-तंत्र तथा संस्कारों का उन्हें विशेष ज्ञान था। उन्होंने भारत की व्यापक यात्राएं कीं और वे हिमालय से कन्याकुमारी तक देश की भौगोलिक स्थिति से पूर्णतः परिचित प्रतीत होते हैं। हिमालय के अनेक चित्रांकन जैसे विवरण और केसर की क्यारियों के चित्रण (जो कश्मीर में पैदा होती है) ऐसे हैं जैसे उनसे उनका बहुत निकट का परिचय है। जो बात यह महान कलाकार अपनी लेखिनी के स्पर्श मात्र से कह जाता है। अन्य अपने विशद वर्णन के उपरांत भी नहीं कह पाते। कम शब्दों में अधिक भाव प्रकट कर देने और कथन की स्वाभाविकता के लिए कालिदास प्रसिद्ध हैं। उनकी उक्तियों में ध्वनि और अर्थ का तादात्मय मिलता है। उनके शब्द-चित्र सौन्दर्यमय और सर्वांगीण सम्पूर्ण हैं, जैसे – एक पूर्ण गतिमान राजसी रथ1, दौड़ते हुए मृग-शावक2, उर्वशी का फूट-फूटकर आंसू बहाना3, चलायमान कल्पवृक्ष की भांति अन्तरिक्ष में नारद का प्रकट होना4, उपमा और रूपकों के प्रयोग में वे सर्वोपरि हैं। सरसिजमनुविद्धं शैवालेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति। इयमिधकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिह मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।। ‘कमल यद्यपि शिवाल में लिपटा है, फिर भी सुन्दर है। चन्द्रमा का कलंक, यद्यपि काला है, किन्तु उसकी सुन्दरता बढ़ाता है। ये जो पतली कन्या है, इसने यद्यपि वल्कल-वस्त्र धारण किए हुए हैं तथापि वह और सुन्दर दिखाई दे रही है। 1. विक्रमोर्वशीय, 1.4 2. अभिज्ञान-शाकुन्तल, 1.7 3. विक्रमोर्वशीय, छन्द 15 4. वही, छन्द 19. क्योंकि सुन्दर रूपों को क्या सुशोभित नहीं कर सकता ?’1 कालिदास की रचनाओं में सीधी उपदेशात्मक शैली नहीं है अपितु प्रीतमा पत्नी के विनम्र निवेदन सा मनुहार है। मम्मट कहते हैं : ‘कान्तासम्मिततयोपदेशायुजे।’ उच्च आदर्शों के कलात्मक प्रस्तुतीकरण से कलाकार हमें उन्हें अपनाने को विवश करता है। हमारे समक्ष जो पात्र आते हैं हम उन्हीं के अनुरूप जीवन में आचरण करने लगते हैं और इससे हमें व्यापक रूप में मानवता को समझने में सहायता मिलती है। एक महान् सांस्कृतिक विरासत पर कालिदास के समृद्ध एवं उज्जवल व्यक्तित्व की छाप है और उन्होंने अपनी रचनाओं में मोक्ष, व्यवस्था और प्रेम के आदर्शों को अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने व्यक्ति को संसार के दु:ख-दर्द और संघर्षों से अवगत कराने के लिए, प्रेम-वासना, इच्छा-आकांक्षा, आशा-स्वप्न, सफलता विफलता आदि को अभिव्यक्ति दी है। भारत ने जीवन को अपनी समग्रता में देखा है और उसमें किसी भी विखण्डन का विरोध किया है। कवि ने उन मानसिक द्वन्द्वों का वर्णन किया है जो आत्मा को विभक्त करते हैं और इस तरह उन्होंने इसे समग्रता में देखने में हमारी सहायता की है। कालिदास की रचनाओं में हमारे लिए सौंदर्य के क्षण, साहसिक घटनाएं, त्याग के दृश्य और मानव मन की नित-नित बदलती मनः स्थितियों के रूप संरक्षित हैं। उनकी कृतियां मानव प्रारब्ध के वर्णनातीत चित्रण के लिए सदैव पढ़ी जाती रहेंगी क्योंकि कोई महान् कवि ही ऐसी प्रस्तुतियां दे सकता है। उनकी अनेक पंक्तियां संस्कृत में सूक्तियां बन गई हैं। उनकी मान्यता है कि हिमालय क्षेत्र में विकसित संस्कृति विश्व की संस्कृतियों की मापदण्ड हो सकती है। यह संस्कृति मूलतः आध्यात्मिक है। हम सभी सामान्यतः समय-चक्र में कैद हैं और इसीलिए हम अपने अस्तित्व की संकीर्ण सीमाओं में घिरे हैं। अतः हमारा उद्देश्य अपने मोहजालों से मुक्त होकर चेतना के उस सत्य को पाने का होना चाहिए जो देश-काल से परे है जो अजन्मा, चरम और कालातीत है। हम इसका चिंतन नहीं कर सकते, इसे वर्गों, आकारों और शब्दों में विभाजित नहीं कर सकते। इस चरम सत्य की अनुभूति का ज्ञान ही मानव का उद्देश्य है। रघुवंश के इन शब्दों को देखिए – ‘ब्रह्माभूयम् गतिम् अजागम्।’ ज्ञानीपुरुष कालातीत परम सत्य के जीवन को प्राप्त होते हैं। वह जो चरम सत्य है सभी अज्ञान से परे है और वह आत्मा और पदार्थ के विभाजन से ऊपर है। वह सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है। वह अपने को तीन रूपों में व्यक्त करता है (त्रिमूर्ति) ब्रह्मा, विष्णु और शिव – कर्त्ता, पालक तथा संहारक। ये देव समाज पद वाले हैं आम जीवन में कालिदास शिवतंत्र के उपासक हैं। तीनों 1.अभिज्ञान शाकुन्तला, 1.17 नाटकों – अभिज्ञान शाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्र – की आरम्भिक प्रार्थनाओं से प्रकट होता है कि कालिदास शिव-उपासक थे। देखिए रघुवंश के आरम्भिक श्लोक में : जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ। यद्यपि कालिदास परमात्मा के शिव रूप के उपासक हैं तथापि उनका दृष्टिकोण किसी भी प्रकार संकीर्ण नहीं है। परम्परागत हिन्दू धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण उदार है। दूसरों के विश्वासों को उन्होंने सम्मान की दृष्टि से देखा। कालिदास की सभी धर्मों के प्रति सहानुभूति है और वे दुराग्रह और धर्मान्धता से मुक्त हैं। कोई भी व्यक्ति वह मार्ग चुन सकता है जो अच्छा लगता है क्योंकि अन्ततः ईश्वर के विभिन्न रूप एक ही ईश्वर के विभिन्न रूप हैं जो सभी रूपों में निराकार है। कालिदास पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानते हैं। यह जीवन में पूर्णता के मार्ग की एक अवस्था है। जैसे हमारा वर्तमान जीवन पूर्व कर्मों का फल है वैसे ही हम इस जन्म में प्रयासों से अपना भविष्य सुधार सकते हैं। विश्व पर सदाचार का शासन है। विजय अन्ततः अच्छाई की होगी। यदि कालिदास की रचनाएं दुखान्त नहीं हैं तो उसका कारण यह कि वे सामंजस्य और शालीनता के अन्तिम सत्य को स्वीकारते हैं। इस मान्यता के अन्तर्गत वे अधिकांश स्त्री-पुरुषों के दुःख-दर्दों के प्रति हमारी सहानुभूति को मोड़ देते हैं। कालिदास की रचनाओं से इस गलत धारणा का निराकरण हो जाता है कि हिन्दू मस्तिष्क ने ज्ञान-ध्यान पर अधिक ध्यान दिया और सांसारिक दुःख-दर्दों की उन्होंने अवहेलना की। कालिदास के अनुभव का क्षेत्र व्यापक था। उन्होंने जीवन, लोक, चित्रों और फूलों में समान आनन्द लिया। उन्होंने मानव को सृष्टि (ब्रह्माण्ड) और धर्म की शक्तियों से अलग करके नहीं देखा। उन्हें मानव के सभी प्रकार के दुःखों, आकांक्षाओं, क्षणिक खुशियों और अन्तहीन आशाओं का ज्ञान था। वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – मानव जीवन के चार पुरुषार्थों में सामंजस्य के पोषक थे। अर्थ पर, जिसमें राजनीति और कला भी सम्मिलित है धर्म का शासन रहना चाहिए। साध्य और साधन में परस्पर सह-संबंध है। जीवन वैध (मान्य) संबंधों से ही जीने योग्य रहता है। इन संबंधों को स्वच्छ और उज्जवल बनाना ही कवि का उद्देश्य था। इतिहास प्राकृतिक तथ्य न होकर नैतिक सत्य है। यह काल-क्रम का लेखा-जोखा मात्र नहीं है। इसका सार अध्यात्म में निहित है जो आगे की पीढ़ियों को ज्ञान प्रदान करता है। इतिहासकारों को अज्ञान को भेद कर उस आन्तरिक नैतिक गतिशीलता को आत्मसात करना चाहिए। इतिहास मानव की नैतिक इच्छा का फल है जिसकी अभिव्यक्तियां स्वतंत्रता और सृजन हैं। रधुवंश के राजा जन्म से ही निष्कलंक थे। धरती से लेकर समुद्र तक (आसमुद्रक्षितिसानाम्) इनका व्यापक क्षेत्र में शासन था। इन्होंने धन का संग्रह दान के लिए किया, सत्य के लिए चुने हुए शब्द कहे, विजय की आकांक्षा यश के लिए की और गृहस्थ जीवन पुत्रेष्णा के लिए रखा। बचपन में शिक्षा, युवावस्था में जीवन के सुखभोग, वृद्धावस्था में आध्यात्मिक जीवन और अन्त में योग या ध्यान द्वारा शरीर का त्याग किया। राजाओं ने राजस्व की वसूली जन-कल्याण के लिए की, ‘प्रजानाम् एवं भूत्यार्थम्’ जैसे सूर्य जल लेता है और उसे सहस्रगुणा करके लौटा देता है। राजाओं का लक्ष्य धर्म और न्याय होना चाहिए। राजा ही प्रजा का सच्चा पिता है, वह उन्हें शिक्षा देता है, उनकी रक्षा करता है और उन्हें जीविका प्रदान करता है जबकि उनके माता-पिता केवल उनके भौतिक जन्म के हेतु हैं। राजा अज के राज्य में प्रत्येक व्यक्ति यही मानता था कि राजा उनका व्यक्तिगत मित्र है। शाकुन्तलं में तपस्वी राजा से कहता है : ‘आपके शस्त्र त्रस्त और पीड़ितों की रक्षा के लिए हैं न कि निर्दोषों पर प्रहार के लिए।’ ‘आर्त त्राणाय वाह शस्त्रम् न प्रहारतुम् अनगसि।’ दुष्यन्त एवं शकुन्तला का पुत्र भरत, जिसके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है, सर्वदमन भी कहलाता है – यह केवल इसलिए नहीं कि उसने केवल भयानक वन्य पशुओं पर विजयी पायी अपितु उसमें आत्मसंयम भी था। राजा के लिए आत्मसंयम भी अनिवार्य है। रघुवंश में अग्निवर्ण दुराचारी हो जाता है। उसके अन्तःपुर में इतनी अधिक नारियां हैं कि वह उनका सही नाम तक नहीं जान पाता। उसे क्षय हो जाता है और उस अवस्था में भी भोग का आनन्द नहीं छोड़ पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है। शालीन मानव-जीवन के लिए संयम अनिवार्य है। कालिदास कहते है : ‘हे कल्याणी, खान से निकलने के उपरांत भी कोई भी रत्न स्वर्ण में नहीं जड़ा जाता, जब तक उसे तराशा नहीं जाता।’ यद्यपि कालिदास की कृतियों में तप को भव्यता प्रदान की गई है और साधु और तपस्वियों को पूजनीय रूप में प्रस्तुत किया गया है, तथापि कहीं भी भिक्षापात्र की सराहना नहीं की गई। धर्म के नियम जड़ एवं अपरिवर्तनीय नहीं हैं। परम्परा को अपनी अन्तर्दृष्टि और ज्ञान से सही अर्थ दिया जाना चाहिए। परम्परा और व्यक्तिगत अनुभव एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां हमें एक ओर अतीत विरासत में मिला है वहीं हम दूसरी ओर भविष्य के न्यासधारी (ट्रस्टी) हैं। अपने अन्तिम विश्लेषण में प्रत्येक को सही आचरण के लिए अपने अन्तःकरण में झांकना चाहिए। भगवतगीता के आरम्भिक अध्याय में जब अर्जुन क्षत्रिय होने के नाते समाज द्वारा आरोपित युद्ध करने के अपने दायित्व से मना करते हैं और जब सुकरात कहते हैं, ‘एथेंसवासियों ! मैं ईश्वर की आज्ञा का पालन करूंगा, तुम्हारी आज्ञा का नहीं।’ तो वे ऐसा अपनी अर्न्तात्मा के निर्देश पर कहते हैं न कि किसी बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन के कारण। आरम्भिक वैदिक साहित्य में जड़-चेतन की एकरूपता का निरूपण है और अनेक वैदिक देवी-देवता प्रकृति के प्रमुख पक्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आत्मज्ञान की खोज में प्रकृति की शरण में जाने, हिमश्रृंगों पर जाने या तपोवन में जाने का शिकार बहुत प्राचीन काल से हमारे यहां विद्यमान रहा है। मानव के रूप में हमारी जड़े प्रकृति में हैं और हम नाना रुपों में इसे जीवन में देखते हैं। रात और दिन, ऋतु-परिवर्तन – ये सब मानव-मन के परिवर्तन, विविधता और चंचलता के प्रतीक हैं। कालिदास के लिए प्रकृति यन्त्रवत और निर्जीव नहीं है। इसमें एक संगीत है। कालिदास के पात्र पेड़-पौधों, पर्वतों तथा नदियों के प्रति संवेदनशील हैं और पशुओं के प्रति उनमें भ्रात भावना है। हमें उनकी कृतियों में खिले हुए फूल, उड़ते पक्षी और उछलते-कूदते पशुओं के वर्मन दिखाई देते हैं। रघुवंश में हमें गाय के प्रेम का अनुपम वर्णन मिलता है। ऋतुसंहार में षट ऋतुओं का हृदयस्पर्शी विवरण है। ये विवरण केवल कालिदास के प्राकृतिक-सौन्दर्य के प्रति उनकी दृष्टि को नहीं अपितु मानव-मन के विविध रूपों और आकांक्षाओं की समझ को भी प्रकट करते हैं। कालिदास के लिए नदियों, पर्वतों, वन-वृक्षों में चेतन व्यक्तित्व है जैसा कि पशुओं और देवों में है। शाकुन्तला प्रकृति की कन्या है। जब उसे उसकी अमानुषी मां मेनका ने त्याग दिया तो आकाशगामी पक्षियों ने उसे उठाया और तब तक उसका पालन-पोषण किया जब तक कि कण्ठ ऋषि आश्रम में उसे नहीं ले गए। शकुन्तला ने पौधों को सींचा, उन्हें अपने साथ-साथ बढ़ते देखा और जब उनके ऊपर फल-फूल आए तो ऐसे अवसरों को उसने उत्सवों की भांति मनाया। शाकुन्तला के विवाह के अवसर पर वृक्षों ने उपहार दिए, वनदेवियों ने पुष्प-वर्षा की, कोयलों ने प्रसन्नता के गीत गाए। शकुंतला की विदाई के समय आश्रम दुःख से भर उठा। मृगों के मुख से चारा छूट कर गिर पड़ा, मयूरों का नृत्य रुक गया और लताओं ने अपने पत्रों के रूप में अश्रु गिराए। सीता के परित्याग के समय मयूरों ने अपना नृत्य एकदम बन्द कर दिया, वृक्षों ने अपने पुष्प झाड़ दिए और मृगियों ने आधे चबाए हुए दूर्वादलों को मुंह से गिरा दिया। कालिदास कोई विषय चुनते हैं और आँख में उसका एक सजीव चित्र उतार लेते हैं। मानस-चित्रों की रचना में वे बेजोड़ हैं। कालिदास का प्रकृति का ज्ञान यथार्थ ही नहीं था अपितु सहानुभूति भी था। उनकी दृष्टि कल्पना से संयुक्त है। कोई भी व्यक्ति तब तक पूर्णतः महिमामण्डित नहीं हो सकता जब तक कि वह मानव जीवन से इतर जीवन की महिमा और मूल्यों को नहीं जानता। हमें जीवन के समग्र रूपों के प्रति संवेदना विकसित करनी चाहिए। सृष्टि केवल मनुष्य के लिए नहीं रची गई है। पुरुष और नारी के प्रेम ने कालिदास को आकर्षित किया और प्रेम के विविध रूपों के चित्रण में उन्होंने अपनी समृद्ध कल्पना का खुलकर उपयोग किया है। इसमें उनकी कोई सीमाएं नहीं हैं। उनकी नारियों में पुरुषों की अपेक्षा अधिक आकर्षण है क्योंकि उनमें कालातीत और सार्वभौम गुण हैं जबकि पुरुष पात्र संवेदना शून्य और अस्थिर बुद्धि हैं। उनकी संवेदना सतही है जबकि नारी का दुःख-दर्द अन्तरतम का है। पुरुष में स्पर्धा की भावना और स्वाभिमान उसके कार्यालय, कारखाने या रणक्षेत्र में उपयोगी हो सकते हैं पर उनकी तुलना नारी के सुसंस्कार, सौन्दर्य और शालीनता के गुणों से नहीं हो सकती। अपने व्यवस्था और सामंजस्य के प्रेम के कारण नारी परम्परा (संस्कृति) को जीवित रखती है। जब कासिदास नारी के सौन्दर्य का वर्णन करते हैं तो वे शास्त्रीय शैली को अपनाते हैं और ऐसा करते समय वे अपने विवरणों के वासनाजन्य होने या अतिविस्तृत हो जाने का खतरा मोल लेते हैं। मेघदूत में ‘मेघ’ को ‘यक्ष’ अपनी पत्नी का विवरण (हुलिया) इस प्रकार देता है : ‘नारियों में वह ऐसी है मानो विधाता ने उसका रचना सर्वप्रथम की है, पतली और गोरी है, दांत पतले और सुन्दर हैं। नीचे के ओष्ठ पके बिम्ब फल (कुंदरू) की भांति लाल है। कमर पतली है। आँखें उसकी चकित हिरणी जैसी हैं। नाभि गहरी है तथा चाल उसकी नितम्बभार से मन्द और स्तनभार से आगे की ओर झुकी हुई है।’ कालिदास द्वारा प्रस्तुत की गई नारियों में हमें अनेक रोचक प्रकार दिखाई देते हैं। उनमें से अनेक को समाज के परम्परागत बहानों और सफाई की आवश्यकता नहीं है। उनके द्वन्द्व और तनावों को सामंजस्य की आवश्यकता थी। पुरुष संदेहमुक्त अनुभव करते थे और वे पूर्ण सुरक्षित थे। बहुविवाह उनके लिए आम बात थी, परन्तु कालिदास की नारियां कल्पनाशील और चतुर हैं अतः वे संदेह और अनिश्चय के घेरे में आ जाती हैं। वे सामान्यतः अस्थिर नहीं हैं परन्तु वे विश्वसनीय, निष्ठावान तथा प्रेममय हैं। प्रेम के लिए झेली गई कठिनाइयां और यातनाएं प्रेम को और गहन बनाती हैं। मेघदूत में अजविलाप और रतिविलाप में वियोग की करुणामय मार्मिक अभिव्यक्ति है। प्रेम का संयोग रूप विक्रमोर्वशीय में है। मालविकाग्निमित्र में रानी को धरिणी कहा गया है क्योंकि वह सब कुछ सहती है। उसमें गरिमा और सहिष्णुता है। इरावती कामुक, अविवेकी, शंकालु, अतृप्त और मनमानी करने वाली है। जब राजा ने उसे छोड़कर मालविका को अपनाया तो वह कठोर शब्दों में शिकायत करती है और कटु शब्दों में राजा को फटकारती है। मालविका के प्रति अग्निमित्र का प्रेम इन्द्रिपरक है। राजा दासी की सुन्दरता और लावण्य पर मोहित है। विक्रमोर्वशीय में पात्रों में दैवी और मानवीय गुणों का मिश्रण है। उर्वशी का चरित्र सामान्य जीवन से हटकर है। उसमें इतनी शक्ति है कि अदृश्य रूप से वह अपने प्रेमी को देख सकती है तथा उसकी बातें सुन सकती है। उसमें मातृप्रेम नहीं है क्योंकि वह अपने पति को खोने के स्थान पर अपने बच्चे का परित्याग कर देती है। उसका प्रेम स्वार्थजन्य है। पुरुरवा भावविह्वल होकर प्रेम के गीत गाता है जिसका भावार्थ यह है कि विश्व की सत्ता उतनी आनन्ददायक नहीं जितना प्रेम आनन्ददायक है। विफल प्रेमी के लिए संसार दुःख और निराशा से भरा है और सफल प्रेमी के लिए वह सुख और आनन्द से भरा है। इस नाटक में हम प्रेम को फलीभूत होते देखते हैं। इसमें भूमि और आकाश एक होते हैं। भौतिक आकर्षण पर आधारित वासना नैतिक सौन्दर्य और आध्यात्मिक ज्ञान में परिवर्तित होती है।


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