शब्दशिल्पी

Archive for फ़रवरी 2009

धुल-धुलकर धूमिल हो जाने वाले पुराने काले लहँगे को एक विचित्र प्रकार से खोंसे, फटी मटमैली ओढ़नी को कई फेंट देकर कमर मे लपेटे और दाहिने हाथ मे एक बड़ा सा हँसिया सँभाले लछमा, नीचे पड़ी घास पत्तियों के ढेर पर कूदकर खिलखिला उठी। कुछ पहाड़ी और कुछ हिन्दी की खिचड़ी में उसने कहा- ‘ हमारे लिये क्या डरते हो! हम क्या तुम्हारे जैसे आदमी है! हम तो है जानवर! देखो हमारे हाथ पाँव देखो हमारे काम! ‘ मुक्त हँसी से भरी पहाड़ी युवती, न जाने क्यो मुझे इतनी भली लगती है।

धूप से झुलसा हुआ मुख ऐसा जान पड़ता है जैसे किसी ने कच्चे सेब को आग की आंच पर पका लिया हो। सूखी-सूखी पलकों में तरल तरल आँखें ऐसी लगती है, मानो नीचे आँसूओं के अथाह जल में तैर रही हों और ऊपर हँसी की धूप से सूख गयी हों।

शीत सहते सहते ओठों पर फ़ैली नीलिमा, सम दांतों की सफेदी से और भी स्पष्ट हो जाती है। रात दिन कठिन पत्थरों पर दौड़ते-दौड़ते पैरो मे और घास काटते-काटते और लकड़ी तोड़ते-तोड़ते हाथों में कठिनता आ गई है, उसे मिट्टी की आर्द्रता ही कुछ कोमल कर देती है।

एक ऊँचे टीले पर लछमा का पहाड़ के पड़े छाले जैसा छोटा घास-फ़ूस का घर है।

बाप की आंखें खराब है, माँ का हाथ टूट गया है, और भतीजी-भतीजे की माता परलोकवासिनी और पिता विरक्त हो चुका है। सारांश यह है कि लछमा के अतिरिक्त और कोई व्यक्ति इतना स्वस्थ नहीं, जो इन प्राणियों की जीविका की चिन्ता कर सके। और इस निर्जन में लछमा कौन सा काम करके इतने व्यक्तियों को जीवित रखे, यह समस्या कभी हल नही हो पाती। अच्छे दिनों की स्मॄति के समान एक भैंस है। लछमा उसके लिये घास और पत्तियां लाती हैं। दूध दूहती, दही जमाती और मट्ठा बिलोती है। गर्मियों मे झोपड़े के आसपास कुछ आलू भी बो लेती है; पर इससे अन्न का अभाव तो दूर नहीं होता! वस्त्र की समस्या तो नही सुलझती!

–लछमा की जीवन-गाथा उसके आँसूओं में भीग-भीगकर अब इतनी भारी हो चुकी है कि कोई अथक कथावाचक और अचल श्रोता भी उसका भार वहन करने को प्रस्तुत नहीं।

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भारतीय वाङ्गमय में ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है। यजुर्वेद के ‘राष्ट्र में देहि’ और अथर्वेद के ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ में राष्ट्र शब्द समाज के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। मानव की सहज सामुदायिक भावना ने समूह को जन्म दिया, जो कालान्तर में राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। राष्ट्र एक समुच्चय है, कुलक है और राष्ट्रीयता एक विशिष्ट-भावना है। जिस जन समुदाय में एकता की एक सहज लहर हो, उसे राष्ट्र कहते हैं। आर्यों की भूमि आर्यावर्त में एक वाह्य एकता के ही नहीं वैचारिक एकता के भी प्रमाण मिलते हैं। आर्यों की परस्पर सहयोग तथा संस्कारित सहानुभूति की भावना राष्ट्रीय संचेतना का प्रतिफल है। साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है। साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है।
आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना अथर्ववेद के सूक्तकार की देन है। वह स्वयं को धरती पुत्र मानता हुआ कहता है—‘‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’’अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। वेदों में राष्ट्रीयता की भावना मातृभूमि-स्तवन और महापुरुषों (देवताओं) के कीर्तिगान के द्वारा प्रकट होती है। उपनिष्दकाल के क्रान्तिकारी अमर संदेशों को भुलाया नहीं जा सकता है। यथा–‘उत्तिष्ठित् जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’
उठो ! जागो ! श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर (राष्ट्रप्रेम के तत्व को) भली-भाँति जानो !

भारतीय मनीषियों का चिन्तन सूक्ष्म और विचार उद्त्त थे। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ मंत्र से अंतर्राष्ट्रीयता का सूत्रपात किया था। विश्व-बंधुत्व की भावना से भारी कार्य जाति विचारों में महान थी। साथ ही शौर्य-पराक्रम और तेज से समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोकर रखने की क्षमता रखती थी।
समाज का राष्ट्र से सीधा संबंध है। किसी भी संस्कारित समाज की विशिष्ट जीवन शैली होती है। जोकि राष्ट्र के रूप में दूसरे समाज को प्रभावित करती है। रूढ़ियों एवं विकृत परम्पराओं से जर्जर समाज राष्ट्र को पतन की ओर ले जाता है। कवि मोह-निद्रा में डूबे राष्ट्र को  जागृति के गान गाकर संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। राष्ट्रीयता जैसी उदात्त प्रवृत्तियों का पोषण और उन्नयन साहित्य द्वारा होता है किन्तु हिन्दी साहित्य के उद्भव काल में केन्द्रीय सत्ता के अभाव ने राष्ट्रीयता की जड़े हिला दीं। ‘राष्ट्र’ छोटे-छोटे राज्यों की सीमाओं में बँध कर रह गया। राष्ट्र का यह संकुचित स्वरूप देश की दुर्भाग्य-निशा की संध्या-बेला थी। इस युग के सम्पूर्ण काव्य में राष्ट्रीय-भावना के स्वस्थ-स्वरूप का नितान्त अभाव है।
आक्रान्ताओं के अत्याचारों से जर्जर भारतीय संस्कृति का सूर्य अस्तप्राय हो चला था। किन्तु भक्त कवियों के अंतःकरण में बहती राष्ट्रीय-चेतना धारा ने सुप्त निराश्रित समाज को नयी दिशा दी।

महात्मा कबीर ने निराकार ब्रह्म की उपासना का उच्च आदर्श प्रस्तुत कर राष्ट्रीय-गरिमा में नव-जीवन का संचार किया। राम और रहीम को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। कबीर अपने युग के महान राष्ट्रवादी थे। राष्ट्र-भक्त तुलसी ने राम के समन्वयवादी, लोकरक्षक और लोकरंजक स्वरूप को स्थापित कर सांस्कृतिक, एकता को शक्ति प्रदान की। सूर ने कर्मयोगी कृष्ण की विविध लीलाओं के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना का संचार किया और समाज को सत्कर्म के लिए प्रेरित किया।

 रीतिकाल के कवियों की चमत्कारिक वृत्ति के कारण काव्य की आत्मालुप्त हो गयी। किन्तु भूषण के राष्ट्रवादी स्वरों ने लोक चेतना को झकझोर दिया। आधुनिक काल में भारतीय हरिश्चन्द्र ने अपनी लेखनी से भारत-दुर्दशा का चित्र खींचकर समाज को जागृति प्रदान किया। छायावादी काव्य में राष्ट्रीय आन्दोलनों की स्थूल अभिव्यक्ति नहीं मिलती है। किन्तु छायावादी कवियों की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक-संचेतना को नकारा नहीं जा सकता है। उसका राष्ट्र-प्रेम भावात्मक एवं व्यापक था। उन्होंने स्वातंत्र्य-भावना को विशिष्ट-कौशल द्वारा व्यंजित किया है। भारत का पतन मानवीय मूल्यों के ह्रास का परिणाम था। गुप्तजी ने अपने काव्य द्वारा मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल दिया। उनकी भारत-भारती ने राष्ट्रीयता की सुप्त भावना में लहरें उठा दीं। माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ रामनरेश त्रिपाठी और सोहनलाल द्विवेदी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, ‘जन’-जागरण तथा अभियान गीतों से राष्ट्र की आत्मा को नयी चेतना प्रदान की।

‘दिनकर’ की वैचारिक भाव-भूमि मानवतावादी है। तथापि समसामयिक परिस्थितियों में उठे विक्षोभ ने उन्हें राष्ट्रीयता वादी कवि के रूप में स्थापित कर दिया। ‘दिनकर’ के काव्य ने भारतीय जन-मानस को नवीन चेतना से सराबोर किया है। राष्ट्रीय-कविता का स्वरूप राष्ट्र के रूप पर ही आधारित होता है। राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है। प्रत्येक भाषा के आधुनिक काव्य में राष्ट्रीय भावना का समावेश है। राष्ट्रीय-भावना राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। सम्पूर्ण मानवता की प्रगति का स्वरूप है। राष्ट्रीय भावना की सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी है। जन-गण के मंगल का स्रोत है। किसी भी राष्ट्र-रूपी वृक्ष की क्षाया में अनेक पंथ-धर्म और भाषाएँ पल्लवति और पुष्पित हो सकते हैं। एक राष्ट्र में अनेक धर्म हो सकते हैं। भाषायें और बोलियाँ अनेक हो सकती हैं किन्तु मूल भावना और सांस्कृतिक विरासत एक ही होगी। राष्ट्रीय भावना से भरे होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम दूसरे राष्ट्रों के समाज को हेय दृष्टि से देखें या दुर्भावना रखें। किसी भी राष्ट्र के समाज की भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिस्थितियां उनकी जीवन-शैली का निर्माण करती हैं। बलात् अपनी सभ्यता-संस्कृति-थोपना हिंसा है और हिंसा वृत्ति कभी मानव का कल्याण नहीं कर सकती है।
भारतीय राष्ट्रीयता कोरी राजनीति कभी नहीं रही। उसने अध्यात्म, दर्शन और साहित्य के माध्यम से भी अपना नव-जागरण अभियान चलाया है। अंग्रेजों ने भारतीय समाज में जो विष-बेलें बोई थीं। वह आज भी पनप कर लह लहा रही हैं। स्वतंत्रता के इतने लंबें अंतराल में भी हम, उन बेलों का समूल नष्ट नहीं कर सके क्योंकि हमने अपना बहुमूल्य समय राष्ट्रीय चिन्तन के बजाय राजनैतिक चिन्तन में बिताया है और राष्ट्रीय चेतना को अंधेरे में घेरकर व्यक्तिगत हित साधन को सर्वोपरि समझा है। स्वाधीनता तो मिली किन्तु राष्ट्रीय चेतना सो गई। स्वाधीनता आकाश से नहीं उतरी वरन् राष्ट्रीय-चेतना से सराबोर शहीदों की शहादत का परिणाम है।

आज जब भारतीय वैज्ञानिक शोध को नई दिशा देने में समर्थ हैं। हमारी सामर्थ्य के अनेकों आयाम विकसित हो रहे हैं। संसाधनों की कोई कमी नहीं है। भारत-भूमि में स्वर्ग उतर सकता है किन्तु राजनीति के कुशल-दिग्भ्रान्त पहरुए राष्ट्र की जनता को वर्गों-धर्मों में बाँटकर क्षेत्रवाद की धुँध फैला रहे हैं। इसीलिए आवश्यक हो गया है कि लोक-चेतना में नया-संचार हो। प्रत्येक राष्ट्रीवादी नागरिक अस्मिता की रक्षा के लिए आगे बढ़कर आत्म-समीक्षा करे। आज राष्ट्र वाह्य और आंतरिक शत्रुओं के चक्रव्यूह में फंस कर अपना संगठित स्वरूप खोने लगा है। विघटनकारी तत्व अपना सिर उठा रहे हैं। साम्प्रदायिकता का विषैला प्रभाव राष्ट्रीय शिराओं में बहती जीव-धारा को विषाक्त कर रहा है। ऐसी विनाशक और विस्फोटक स्थिति में देश को दिशा देना साहित्य का गुरुत्वर दायित्व है। राष्ट्रीय काव्य-धारा ऐसी काव्य-प्रवृत्ति है जिसमें राष्ट्र-जन को तेजस्वी और पराक्रमी बनाने की सामर्थ्य निहित है।

वस्तुतः राष्ट्रीय संचेतना को झकझोरने वाला काव्यजन मानस को आन्दोलित कर नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का साहस भरता है। उन मूल्यों को महत्त्व देने के लिए प्रेरित करता है जिनमें हिंस, घृणा को नकारकर एक उन्मुक्त वातावरण उत्पन्न किया जा सके और जिसमें सभी धर्म निश्चिन्त होकर सांस ले सकें। यदि प्रत्येक राष्ट्र-धर्मी काव्य अपने समाज के अन्दर व्यापक उदात्त-भाव और रचनात्मक संस्कार उत्पन्न कर सकें, तो निश्चय ही ऐसा काव्य मानव के कल्याण के लिए होगा। अर्थात् राष्ट्रीय-काव्य मूलतः मानवता वादी काव्य ही है।

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भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को काव्य के विषय के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे वही दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को भी हवा दे रहे थे। कवि व साहित्यकार अपनी उर्वर प्रज्ञा भूमि के कारण युगीन समस्याओं के प्रति अधिक सावधान व संवेदनशील रहता है। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के आरम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक भिन्न-भिन्न चरणों में राष्ट्रीय भावनाओ से ओत-प्रोत कविताओं की कोख में स्वातन्त्र्य चेतना का विकास होता रहा। ‘विप्लव गान’ शीर्षक कविता में कवि की क्रान्तिकामना मूर्तिमान हो उठी है।

”कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये
एक  हिलोर  इधर  से आये,  एक  हिलोर  उधर को जाये
नाश ! नाश! हाँ महानाश! ! ! की प्रलयंकारी आंख खुल जाये।
-नवीन

भारतेन्दु युग का साहित्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हिन्दुस्तान की संगठित राष्ट्रभावना का प्रथम आह्वाहन था। यही से राष्ट्रीयता का जयनाद शुरू हुआ। जिसके फलस्वरूप द्विवेदी युग ने अपने प्रौढ़तम स्वरूप के साथ नवीन आयामों और दिशाओं की ओर प्रस्थान किया। भारतेन्दु की ‘भारत दुर्दशा’ प्रेमघन की आनन्द अरूणोदय, देश दशा, राधाकृष्ण दास की भारत बारहमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई। द्विवेदी युग में कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अर्न्तगत बलिदान गान में ‘प्राणों का बलिदान देष की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी। ‘बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लाग लगा दे’ के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतीकार मैथिलीषरण गुप्त ने स्वदेश-संगीत व सर्वश्रेष्ठ सशक्त रचना भारत-भारती में ऋषिभूमि भारतवर्ष के अतीत के गौरवगान के साथ में वर्तमान पर क्षोभ प्रकट किया है। छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुन्दर और प्रेरक देशप्रेम सम्बन्धी मधुरगीतों व कविताओं की सृष्टि की । निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी’, ‘भारती जय विजय करे’, ‘जागो फिर एकबार’, ‘शिवाजी का पत्र’, प्रसाद की ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया ‘हिमाद्रि तुंगश्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ आदि कविताओं में कवियों ने हृदय के स्तर पर अपनी प्रशस्त राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति की है।

स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित हिन्दी कवियों की श्रृखला में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, राधाकृष्ण दास, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, रामनरेश त्रिपाठी, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, सियाराम शरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, श्याम नारायण पाण्डेय, अज्ञेय इत्यादि कवियों ने परम्परागत राष्ट्रीय सांस्कृतिक भित्ति पर ओजपूर्ण स्वरों मे राष्ट्रीयता का संधान किया।

हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा के समस्त कवियों ने अपने काव्य में देशप्रेम व स्वतन्त्रता की उत्कट भावना की अभिव्यक्ति दी है। राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी की हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता, युगचरण, समर्पण आदि के काव्यकृतियों के माध्यम से उनकी राष्ट्रीय भावछाया से अवगत हुआ जा सकता है। चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतन्त्र कर जनतन्त्रात्मक पद्धति की स्थापना का आहवाहन किया। गुप्त जी के बाद स्वातन्त्र्य श्रृखला की अगली कड़ी के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी का अविस्मृत नाम न केवल राष्ट्रीय गौरव की याद दिलाता है अपितु संघर्ष की प्रबल प्रेरणा भी देता है। जेल की हथकड़ी आभूषण बन उनके जीवन को अलंकृत करती है।

‘क्या? देख न सकती जंजीरो का गहना
हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना’
(कैदी और कोकिला)

पिस्तौल, गीता, आनन्दमठ की जिन्दगी ने इनके भीतर प्रचण्ड विद्रोह को जन्म दे वैष्णवी प्रकृति विद्रोह और स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव ने इनके जीवन को एक राष्ट्रीय सांचे में ढाल दिया। 1912 में उनकी जीवन यात्रा ने बेड़ियों की दुर्गम राह पकड़ ली।

‘उनके हृदय में चाह है अपने हृदय में आह है
कुछ भी करें तो शेष बस यह बेड़ियों की राह है।’

1921 में कर्मवीर के सफल सम्पादक चतुर्वेदी जी को जब देशद्रोह के आरोप में जेल हुई तब कानपुर से निकलने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ और महात्मा गाँधी के ‘यंग इण्डिया’ ने उसका कड़ा विरोध किया। ‘मुझे तोड़ लेना वन माली देना तुम उस पथ पर फेंक मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पर जाते वीर अनेक ”पुष्प की अभिलाषा” शीर्षक कविता की यह चिरजीवी पंक्तियाँ उस भारतीय आत्मा की पहचान कराती है जिन्होनें स्वतन्त्रता के दुर्गम पथ में यातनाओं से कभी हार नही मानी।

” जो कष्टों से घबराऊँ तो मुझमें कायर में भेद कहाँ
बदले में रक्त बहाऊँ तो मुझमें डायर में भेंद कहाँ!”

अनुभूति की तीव्रता की सच्चाई, सत्य, अहिंसा जैसे प्रेरक मूल्यों के प्रति कवि की आस्था, दृढ़ संकल्प, अदम्य उत्साह और उत्कट् अभिलाषा को लेकर चलने वाला यह भारत माँ का सच्चा सपूत साहित्यशास्त्र और कर्मयंत्र से दासता की बेड़ियों को काट डालने का दृढ़व्रत धारण करके जेल के सींखचों के भीतर तीर्थराज का आनन्द उठाते है।

”हो जाने दे गर्क नशे में, मत पड़ने दे फर्क नशे में, के उत्साह व आवेश के साथ स्वतन्त्रता संग्राम श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में आबद्ध एक श्लाघ्य नाम बालकृष्ण शर्मा नवीन का है वह स्वतन्त्रता आन्दोलन के मात्र व्याख्यता ही नहीं अपितु भुक्तभोगी भी रहे। 1920 में गाँधी जी के आह्वाहन पर वह कालेज छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़े। फलत: दासता की श्रृंखलाओं के विरोध संघर्ष में इन्हे 10 बार जेल जाना पड़ा। जेल यात्राओं का इतना लम्बा सिलसिला शायद ही किसी कवि के जीवन से जुड़ा हो। उन दिनों जेल ही कवि का घर हुआ करता था।

‘हम संक्रान्ति काल के प्राणी बदा नही सुख भोग
घर उजाड़ कर जेल बसाने का हमको है रोग’
नवीन


अपनी प्रथम काव्य संग्रह ‘कुंकुम’ की जाने पर प्राणार्पण, आत्मोत्सर्ग तथा प्रलयंकर कविता संग्रह में क्रान्ति गीतों की ओजस्विता व प्रखरता है।

‘यहाँ बनी हथकड़िया राखी, साखी है संसार
यहाँ कई बहनों के भैया, बैठे है मनमार।’

राष्ट्रीय काव्यधारा को विकसित करने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान का ‘त्रिधारा’ और ‘मुकुल’ की ‘राखी’ ‘झासी की रानी’ ‘वीरों का कैसा हो बसंत’ आदि कविताओं में तीखे भावों की पूर्ण भावना मुखरित है। उन्होने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी। आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। ‘जलियावाला बाग में बसंत’ कविता में इस नृशंस हत्याकाण्ड पर कवयित्री के करूण क्रन्दन से उसकी मूक वेदना मूर्तिमान हो उठी है।

”आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना
यह है शोक स्थान, यहाँ मत शोर मचाना
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खा कर
कलियाँ उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर।”

दिनकर की हुँकार, रेणुका, विपथगा में कवि ने साम्राज्यवादी सभ्यता और ब्रिटिश राज्य के प्रति अपनी प्रखर ध्वंसात्मक दृष्टि का परिचय देते हुए क्रान्ति के स्वरों का आह्वाहन किया है। पराधीनता के प्रति प्रबल विद्रोह के साथ इसमें पौरूष अपनी भीषणता और भंयकरता के साथ गरजा है। कुरूक्षेत्र महाकाब्य पूर्णरूपेण राष्ट्रीय है।

‘उठो- उठो कुरीतियों की राह तुम रोक दो
बढो-बढो कि आग में गुलामियों को झोंक दो ‘।
दिनकर

स्वतन्त्रता की प्रथम शर्त कुर्बानी व समर्पण को काव्य का विषय बना क्रान्ति व ध्वंस के स्वर से मुखरित दिनकर की कवितायें नौंजवानों के शरीर में उत्साह भर उष्ण रक्त का संचार करती है ।

जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त, सीमापति! तूने की पुकार
पददलित उसे करना पीछे, पहले ले मेरा सीस उतार।

सोहनलाल द्विवेदी की भैरवी राणाप्रताप के प्रति, आजादी के फूलों पर जय-जय, तैयार रहो, बढ़े चलो बढ़े चलो, विप्लव गीत कवितायें, पूजा गीत संग्रह की मातृपूजा, युग की पुकार, देश के जागरण गान कवितायें तथा वासवदत्ता, कुणाल, युगधारा काब्य संग्रहों में स्वतन्त्रता के आह्वान व देशप्रेम साधना के बीच आशा और निराशा के जो स्वर फूटे है उन सबके तल में प्रेम की अविरल का स्रोत बहाता कवि वन्दनी माँ को नहीं भूल सका है ।

‘कब तक क्रूर प्रहार सहोगे ?
कब तक अत्याचार सहोगे ?
कब तक हाहाकार सहोगे ?
उठो राष्ट्र के हे अभिमानी
सावधान मेरे सेनानी।’

सियाराम शरण गुप्त की बापू कविता में गाँधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करूणा, विश्व-बधुत्व, शान्ति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है। राजस्थानी छटा लिये श्यामनारायण पाण्डेय की कविताओं में कहीं उद्बोधन और क्रान्ति का स्वर तथा कहीं सत्य, अहिंसा जैसे अचूक अस्त्रों का सफल संधान हुआ है। इनकी ‘हल्दीघाटी’ व ‘जौहर’ काव्यों में हिन्दू राष्ट्रीयता का जयघोष है । देशप्रेम के पुण्य क्षेत्र पर प्राण न्यौछावर के लिए प्रेरित करने वाले रामनरेश त्रिपाठी की कविता कौमुदी, मानसी, पथिक, स्वप्न आदि काव्य संग्रह देश के उद्धार के लिए आत्मोत्सर्ग की भावना उत्पन्न करते है । देश की स्वतन्त्रता को लक्ष्य करके श्री गया प्रसाद शुक्ल सनेही ने कर्मयोग कविता में भारतवासियों को जागृत कर साम्राज्यवादी नीति को आमूल से नष्ट करने का तीव्र आह्वाहन किया । श्रीधर पाठक ने भारतगीत में साम्राज्यवादियों के चंगुल में फंसे भारत की मुक्ति का प्रयास किया। प्रयोगवादी कवि अज्ञेय भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए कई बार जेल गये। जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द की कवितायें भी इस दिशा मे सक्रिय हैं।

इस प्रकार हम देखते है कि स्वतन्त्रता आंदोलन के उत्तरोत्तर विकास के साथ हिन्दी कविता और कवियों के राष्ट्रीय रिश्ते मजबूत हुए। राजनीतिक घटनाक्रम में कवियों के तेवर बदलते रहे और कविता की धार भी तेज होती गई। आंदोलन के प्रारम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दी काव्य संघर्षो से जूझता रहा। स्वाधीनता के पश्चात राष्ट्रीय कविता के इतिहास का एक नया युग प्रारम्भ हुआ। नये निर्माण के स्वर और भविष्य के प्रति मंगलमय कल्पना उनके काव्य का विषय बन गया। फिर भी स्वतन्त्रता यज्ञ में उनके इस अवदान और बलिदान को विस्मृत नही किया जा सकता । भारत का ऐतिहासिक क्षितिज उनकी कीर्ति किरण से सदा आलोकित रहेगा और उनकी कविताए राष्ट्रीय आस्मिता की धरोहर बनकर नयी पीढ़ी को अपने गौरव गीत के ओजस्वी स्वर सुनाती रहेगीं।

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साहित्य की प्रचलित धाराओं के बरअक्स अपनी एक जुदा राह बनाने वाले जैनेन्द्र को गांधी दर्शन के प्रवक्ता, लेखक के रूप में याद किया जाता है। गांधीवादी चिंतक, मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य के सूत्रधार, साहित्यकार जैनेन्द्र को उनके विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक साहित्य के लिये भी जाना जाता है। हिन्दू रहस्यवाद, जैन दर्शन से प्रभावित जैनेन्द्र का सम्पूर्ण साहित्य सृजन प्रक्रिया की विलक्षणता और सुनियोजित संश्लिष्टता का अनन्यतम उदाहरण है। जैनेन्द्र के बारे में अज्ञेय ने कहा था आज के हिन्दी के आख्यानकारों और विशेषतय: कहानीकारों में सबसे अधिक टेक्निकल जैनेन्द्र हैं। टेक्नीक उनकी प्रत्येक कहानी की और सभी उपन्यासों की आधारशिला है। स्त्री विमर्श के प्रबल हिमायती जैनेन्द्र ने कहानी के अंदर प्रेम को संभव किया।

1905 में अलीगढ के कौडियागंज गांव में जन्मे आनंदी लाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे आगे चलकर साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार बनेंगे। चार माह की उम्र में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। मां और मामा भगवानदीन ने उन्हें पाला पोसा। बहरहाल बचपन अभावग्रस्त, संघर्षमय बीता और युवावस्था तक आते-आते नौकरी जिंदगी का अहम् मकसद बन गयी। दोस्त के बुलावे पर नौकरी के लिए कलकत्ता पहुँचे मगर वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी।

जैनेन्द्र लेखक कैसे बने इसकी दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। गर्दिश के दिनों में अपने दोस्त के यहाँ बैठे थे। दोस्त की बीवी को लिखने का शौक था और वह यदाकदा पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती थीं। जैनेन्द्र से लिखने पर बहस हुई तो जैनेन्द्र लिखने की ठान बैठे। खेल कहानी लिखी और विशाल भारत में छपने के लिए भेज दीं। कहानी छपी और चार रुपये मनीआर्डर बतौर पारिश्रमिक जैनेन्द्र के पास आए।

कहानी अनुभव और शिल्प में जैनेन्द्र इस बाबत लिखते हैं मनीआर्डर क्या आया मेरे आगे से तिलिस्म खुल गया इन 23-24 वर्षो को दुनिया में बिताकर मैं क्या तनिक उस द्वार की टोह पा सका था कि लिखने से रुपये का आवागमन होता है। रुपया मेरे आगे फरिश्ते की मांनिद था। जिसका नाम किस लोक का है। अवश्य वह इस लोक का तो नहीं है। वह अतिथि की भांति मेरे खेल के परिणामस्वरूप मेरे घर आ पधारा तो यकायक मैं अभिभूत हो रहा। मेरी माँ को भी कम विस्मय नहीं हुआ, तो बेटे के निकम्मेपन की भी कुछ कीमत है। माँ से ज्यादा बेटा अपने निकम्मेपन को जानता था। पर विशाल भारत के मनीआर्डर से मालूम हुआ कि आदमी अपने को नहीं जान सकता।

कहानी खेल से उनके लेखन का सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो 24 साल की उम्र तक उपन्यास परख आ गया। परख को साहित्य अकादमी का पांच सौ रुपये का पुरस्कार मिला। बहरहाल इसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। जिंदगी की यही घटनाएं वजहें थीं कि जैनेन्द्र नियतिवादी, ईश्वरवादी हो गए। ईश्वर पर उनका भरोसा बढता चला गया।

असहयोग आन्दोलन के दौरान पढाई छोड आन्दोलन में हिस्सा लेने वाले जैनेन्द्र की जिंदगी और साहित्य पर महात्मा गांधी का जबर्दस्त प्रभाव था। जैनेन्द्र खुद कहते हैं गांधी जीवन मेरे समक्ष सत्य शोध का उत्तम उदाहरण रहा अध्यात्म, दर्शन, नैतिकता और अपने साहित्य द्वारा सत्य की खोज जैनेन्द्र के विपुल साहित्य के विचार बिन्दु हैं। उनका पूरा रचना संसार इन्हीं विचार बिन्दुओं के इर्द-गिर्द घूमता है। उपन्यास- सुनीता, त्यागपत्र, सुखदा, विवर्त, कल्याणी कहानियां नीलम देश की राजकन्या, जान्ह्वी, अविज्ञान, पत्नी, ध्रुवतारा आदि रचनाएं इन्हीं विचारों में रची पगी नजर आती हैं। नतीजतन उन पर कई तरह के इल्जाम भी लगे जिनमें प्रमुख हैं- जैनेन्द्र का दर्शन समाज व जीवन से पलायन का दर्शन, उनके उपन्यास प्रहेलिका मात्र हैं, वे यथार्थ से भागते हैं, जैनेन्द्र दार्शनिकता का पोज भर भरते हैं और नारी पात्रों को अनैतिकता में धकेलने के लिए हमेशा आध्यात्मिकता का सहारा लेते हैं आदि। अपने समय में साहित्यिक जगत की कटु आलोचनाओं को सहने वाले जैनेन्द्र ने कई बार तंग आ सक्रिय साहित्य से संन्यास भी लिया। उपन्यास कल्याणी के बाद तो उन्होंने 14 साल एकांतवास लिया। मगर उनकी वापसी हर बार उतने ही जोरदार तरीके से हुई। उस दौर की चर्चित पत्रिकाएं धर्मयुग तथा साप्ताहिक हिन्दुस्तान ने उनके उपन्यास- सुखदा और विवर्त को किश्तवार छापा। वहीं माया ने दस कहानियों के लिए उन्हें 2 हजार अग्रिम राशि देकर अनुबंधित किया जो उस समय लेखकों को मिलने वाली अधिकतम मानदेय 60 रुपये से कहीं ज्यादा था। जितना जैनेन्द्र से जुडा यह किस्सा जतलाता है कि वे कामयाबी के किस शिखर पर विराजमान थे।

ख्याति और विवादों का चोली-दामन का साथ है। जैनेन्द्र भी इन सबसे अछूते नहीं रहे। उपन्यास, कहानी के अलावा आपके वैचारिक निबंध, आलेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते थे जो खासे चर्चित थे। धर्मयुग में छपने वाले कॉलम इतस्तत: में वे नियमित लिखते थे। अपने कॉलम के जरिए उन्होंने सामाजिक मान्यताओं तथा रूढ परम्पराओं पर लगातार प्रहार किए। चुनांचे धर्मयुग के संपादक ने उनके कॉलम को एक बार बीच में से ही स्थगित करते हुए कहा था इतस्तत: के कुछ खण्डों में आपने इतने विद्रोही (सामाजिक मान्यताओं) भावों का प्रतिपादन कर दिया है कि मान्यताओं के प्रति श्रद्धालु व्यक्तियों के मन में धर्मयुग के लिए तीव्र घृणा जाग गई है। धर्मयुग के पाठकों में से अधिकांश व्यक्ति परम्परा प्रेमी हैं उन्हें आपकी सर्वथा मौलिक परम्पराएं अच्छी नहीं लगीं। अत: यही है कि इतस्तत: को कुछ काल के लिए स्थगित कर दें। इन कॉलमों में जो भी जाएगा हमारे पारम्परिक पाठकों की संशयात्मक दृष्टि का शिकार हो  जाएगा।

समय और हम, साहित्य का श्रेय और प्रेय, प्रश्न और प्रश्न, सोच-विचार, राष्ट्र और राज्य, काम पे्रम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी आदि निबंध जैनेन्द्र की दार्शनिकता और नितांत मौलिक पदस्थापनाओं के कारण जाने पहचाने गए। अपने अधिकांश साहित्य का लेखन डिक्टेशन से कराने वाले जैनेन्द्र के लेखन पर महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का अत्यधिक प्रभाव था। जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण उनके उपन्यास सुनीता और सुखदा हैं जो टैगोर के उपन्यास- घरे बाहरे से प्रेरित हैं। परख और सुनीता को पढ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द ने एक बार कहा था जैनेन्द्र में गोर्की और शरतचन्द्र चटर्जी दोनों एक साथ देखने को मिलते हैं। बहरहाल बांग्ला साहित्यकार शरतचन्द्र के उपन्यासों की ही तरह उनके तकरीबन सभी उपन्यासों में स्त्री चरित्र पूरी दृढता के साथ नजर आते हैं। त्याग-पत्र की मृणाल और सुनीता का केन्द्रीय चरित्र सुनीता उपन्यास में अपनी मौजूदगी का अहसास प्रखरता से कराता है। हालांकि उनके स्त्री चरित्र आत्मा की ट्रेजेडी और आत्म प्रपीढन से ग्रसित नजर आते हैं।

दरअसल जैनेन्द्र ने मानवीय दुनिया की अपेक्षा आत्मिक दुनिया पर ज्यादा लिखा वे यथार्थ की जगह विचारों की बात ज्यादा करते हैं जो उन्हें रूसी साहित्यकार दास्तोएव्सकी के नजदीक रखता है। एक दौर वह था जब उपन्यास, कहानियों में यशपाल और जैनेन्द्र द्वारा नारी के बोल्ड चित्रण से उनकी साडी-जम्पर उतारवाद का प्रवर्तक भी कहा गया तथा उन पर साहित्य में नैतिकता की गिरावट और अश्लीलता के आरोप मढे गए, अपने ऊपर लगे इन आरोपों का जवाब जैनेन्द्र ने अपने निबंधों के जरिए ही दिया। अश्लीलता यदि है तो वस्तु में नहीं व्यक्ति में है, असल में नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग वे ही हैं जो सुविधा प्राप्त हैं, वे अपने भोग और आराम को बचाये रखने के लिए नीतिवादिता से अपनी रक्षा में चारों ओर घेरा डालते हैं अंग्रेजी में एक शब्द है कंजरवेटिव नैतिकता की दुहाई ऐसे ही लोग देते हैं।

बहरहाल अश्लीलता- नैतिकता के यह सवाल आज भी उसी तरह विद्यमान हैं जिनके जवाब हमें जैनेन्द्र की नुक्ता-ए-नजर में देखने को मिलते हैं। अपनी जिंदगी में उच्च आदर्शो को ओढने वाले सादगी-करूणा की प्रतिमूर्ति जैनेन्द्र सही मायने में सत्यान्वेषी थे जिनके लिए अपनी आत्मा की आवाज सर्वोपरि थी और जिसका पालन उन्होंने मरते दम तक किया।

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