हिन्दी साहित्य

साहित्यकार जैनेन्द्र

Posted on: फ़रवरी 1, 2009

साहित्य की प्रचलित धाराओं के बरअक्स अपनी एक जुदा राह बनाने वाले जैनेन्द्र को गांधी दर्शन के प्रवक्ता, लेखक के रूप में याद किया जाता है। गांधीवादी चिंतक, मनोवैज्ञानिक कथा साहित्य के सूत्रधार, साहित्यकार जैनेन्द्र को उनके विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक साहित्य के लिये भी जाना जाता है। हिन्दू रहस्यवाद, जैन दर्शन से प्रभावित जैनेन्द्र का सम्पूर्ण साहित्य सृजन प्रक्रिया की विलक्षणता और सुनियोजित संश्लिष्टता का अनन्यतम उदाहरण है। जैनेन्द्र के बारे में अज्ञेय ने कहा था आज के हिन्दी के आख्यानकारों और विशेषतय: कहानीकारों में सबसे अधिक टेक्निकल जैनेन्द्र हैं। टेक्नीक उनकी प्रत्येक कहानी की और सभी उपन्यासों की आधारशिला है। स्त्री विमर्श के प्रबल हिमायती जैनेन्द्र ने कहानी के अंदर प्रेम को संभव किया।

1905 में अलीगढ के कौडियागंज गांव में जन्मे आनंदी लाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे आगे चलकर साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार बनेंगे। चार माह की उम्र में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। मां और मामा भगवानदीन ने उन्हें पाला पोसा। बहरहाल बचपन अभावग्रस्त, संघर्षमय बीता और युवावस्था तक आते-आते नौकरी जिंदगी का अहम् मकसद बन गयी। दोस्त के बुलावे पर नौकरी के लिए कलकत्ता पहुँचे मगर वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी।

जैनेन्द्र लेखक कैसे बने इसकी दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। गर्दिश के दिनों में अपने दोस्त के यहाँ बैठे थे। दोस्त की बीवी को लिखने का शौक था और वह यदाकदा पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती थीं। जैनेन्द्र से लिखने पर बहस हुई तो जैनेन्द्र लिखने की ठान बैठे। खेल कहानी लिखी और विशाल भारत में छपने के लिए भेज दीं। कहानी छपी और चार रुपये मनीआर्डर बतौर पारिश्रमिक जैनेन्द्र के पास आए।

कहानी अनुभव और शिल्प में जैनेन्द्र इस बाबत लिखते हैं मनीआर्डर क्या आया मेरे आगे से तिलिस्म खुल गया इन 23-24 वर्षो को दुनिया में बिताकर मैं क्या तनिक उस द्वार की टोह पा सका था कि लिखने से रुपये का आवागमन होता है। रुपया मेरे आगे फरिश्ते की मांनिद था। जिसका नाम किस लोक का है। अवश्य वह इस लोक का तो नहीं है। वह अतिथि की भांति मेरे खेल के परिणामस्वरूप मेरे घर आ पधारा तो यकायक मैं अभिभूत हो रहा। मेरी माँ को भी कम विस्मय नहीं हुआ, तो बेटे के निकम्मेपन की भी कुछ कीमत है। माँ से ज्यादा बेटा अपने निकम्मेपन को जानता था। पर विशाल भारत के मनीआर्डर से मालूम हुआ कि आदमी अपने को नहीं जान सकता।

कहानी खेल से उनके लेखन का सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो 24 साल की उम्र तक उपन्यास परख आ गया। परख को साहित्य अकादमी का पांच सौ रुपये का पुरस्कार मिला। बहरहाल इसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। जिंदगी की यही घटनाएं वजहें थीं कि जैनेन्द्र नियतिवादी, ईश्वरवादी हो गए। ईश्वर पर उनका भरोसा बढता चला गया।

असहयोग आन्दोलन के दौरान पढाई छोड आन्दोलन में हिस्सा लेने वाले जैनेन्द्र की जिंदगी और साहित्य पर महात्मा गांधी का जबर्दस्त प्रभाव था। जैनेन्द्र खुद कहते हैं गांधी जीवन मेरे समक्ष सत्य शोध का उत्तम उदाहरण रहा अध्यात्म, दर्शन, नैतिकता और अपने साहित्य द्वारा सत्य की खोज जैनेन्द्र के विपुल साहित्य के विचार बिन्दु हैं। उनका पूरा रचना संसार इन्हीं विचार बिन्दुओं के इर्द-गिर्द घूमता है। उपन्यास- सुनीता, त्यागपत्र, सुखदा, विवर्त, कल्याणी कहानियां नीलम देश की राजकन्या, जान्ह्वी, अविज्ञान, पत्नी, ध्रुवतारा आदि रचनाएं इन्हीं विचारों में रची पगी नजर आती हैं। नतीजतन उन पर कई तरह के इल्जाम भी लगे जिनमें प्रमुख हैं- जैनेन्द्र का दर्शन समाज व जीवन से पलायन का दर्शन, उनके उपन्यास प्रहेलिका मात्र हैं, वे यथार्थ से भागते हैं, जैनेन्द्र दार्शनिकता का पोज भर भरते हैं और नारी पात्रों को अनैतिकता में धकेलने के लिए हमेशा आध्यात्मिकता का सहारा लेते हैं आदि। अपने समय में साहित्यिक जगत की कटु आलोचनाओं को सहने वाले जैनेन्द्र ने कई बार तंग आ सक्रिय साहित्य से संन्यास भी लिया। उपन्यास कल्याणी के बाद तो उन्होंने 14 साल एकांतवास लिया। मगर उनकी वापसी हर बार उतने ही जोरदार तरीके से हुई। उस दौर की चर्चित पत्रिकाएं धर्मयुग तथा साप्ताहिक हिन्दुस्तान ने उनके उपन्यास- सुखदा और विवर्त को किश्तवार छापा। वहीं माया ने दस कहानियों के लिए उन्हें 2 हजार अग्रिम राशि देकर अनुबंधित किया जो उस समय लेखकों को मिलने वाली अधिकतम मानदेय 60 रुपये से कहीं ज्यादा था। जितना जैनेन्द्र से जुडा यह किस्सा जतलाता है कि वे कामयाबी के किस शिखर पर विराजमान थे।

ख्याति और विवादों का चोली-दामन का साथ है। जैनेन्द्र भी इन सबसे अछूते नहीं रहे। उपन्यास, कहानी के अलावा आपके वैचारिक निबंध, आलेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते थे जो खासे चर्चित थे। धर्मयुग में छपने वाले कॉलम इतस्तत: में वे नियमित लिखते थे। अपने कॉलम के जरिए उन्होंने सामाजिक मान्यताओं तथा रूढ परम्पराओं पर लगातार प्रहार किए। चुनांचे धर्मयुग के संपादक ने उनके कॉलम को एक बार बीच में से ही स्थगित करते हुए कहा था इतस्तत: के कुछ खण्डों में आपने इतने विद्रोही (सामाजिक मान्यताओं) भावों का प्रतिपादन कर दिया है कि मान्यताओं के प्रति श्रद्धालु व्यक्तियों के मन में धर्मयुग के लिए तीव्र घृणा जाग गई है। धर्मयुग के पाठकों में से अधिकांश व्यक्ति परम्परा प्रेमी हैं उन्हें आपकी सर्वथा मौलिक परम्पराएं अच्छी नहीं लगीं। अत: यही है कि इतस्तत: को कुछ काल के लिए स्थगित कर दें। इन कॉलमों में जो भी जाएगा हमारे पारम्परिक पाठकों की संशयात्मक दृष्टि का शिकार हो  जाएगा।

समय और हम, साहित्य का श्रेय और प्रेय, प्रश्न और प्रश्न, सोच-विचार, राष्ट्र और राज्य, काम पे्रम और परिवार, अकाल पुरुष गांधी आदि निबंध जैनेन्द्र की दार्शनिकता और नितांत मौलिक पदस्थापनाओं के कारण जाने पहचाने गए। अपने अधिकांश साहित्य का लेखन डिक्टेशन से कराने वाले जैनेन्द्र के लेखन पर महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का अत्यधिक प्रभाव था। जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण उनके उपन्यास सुनीता और सुखदा हैं जो टैगोर के उपन्यास- घरे बाहरे से प्रेरित हैं। परख और सुनीता को पढ उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द ने एक बार कहा था जैनेन्द्र में गोर्की और शरतचन्द्र चटर्जी दोनों एक साथ देखने को मिलते हैं। बहरहाल बांग्ला साहित्यकार शरतचन्द्र के उपन्यासों की ही तरह उनके तकरीबन सभी उपन्यासों में स्त्री चरित्र पूरी दृढता के साथ नजर आते हैं। त्याग-पत्र की मृणाल और सुनीता का केन्द्रीय चरित्र सुनीता उपन्यास में अपनी मौजूदगी का अहसास प्रखरता से कराता है। हालांकि उनके स्त्री चरित्र आत्मा की ट्रेजेडी और आत्म प्रपीढन से ग्रसित नजर आते हैं।

दरअसल जैनेन्द्र ने मानवीय दुनिया की अपेक्षा आत्मिक दुनिया पर ज्यादा लिखा वे यथार्थ की जगह विचारों की बात ज्यादा करते हैं जो उन्हें रूसी साहित्यकार दास्तोएव्सकी के नजदीक रखता है। एक दौर वह था जब उपन्यास, कहानियों में यशपाल और जैनेन्द्र द्वारा नारी के बोल्ड चित्रण से उनकी साडी-जम्पर उतारवाद का प्रवर्तक भी कहा गया तथा उन पर साहित्य में नैतिकता की गिरावट और अश्लीलता के आरोप मढे गए, अपने ऊपर लगे इन आरोपों का जवाब जैनेन्द्र ने अपने निबंधों के जरिए ही दिया। अश्लीलता यदि है तो वस्तु में नहीं व्यक्ति में है, असल में नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग वे ही हैं जो सुविधा प्राप्त हैं, वे अपने भोग और आराम को बचाये रखने के लिए नीतिवादिता से अपनी रक्षा में चारों ओर घेरा डालते हैं अंग्रेजी में एक शब्द है कंजरवेटिव नैतिकता की दुहाई ऐसे ही लोग देते हैं।

बहरहाल अश्लीलता- नैतिकता के यह सवाल आज भी उसी तरह विद्यमान हैं जिनके जवाब हमें जैनेन्द्र की नुक्ता-ए-नजर में देखने को मिलते हैं। अपनी जिंदगी में उच्च आदर्शो को ओढने वाले सादगी-करूणा की प्रतिमूर्ति जैनेन्द्र सही मायने में सत्यान्वेषी थे जिनके लिए अपनी आत्मा की आवाज सर्वोपरि थी और जिसका पालन उन्होंने मरते दम तक किया।

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3 Responses to "साहित्यकार जैनेन्द्र"

सुन्दर आलेख और उपयोगी भी. धन्यवाद

jeewan ki vigat paristhitiyon me sahity nirman swatah hi bahut gahari visesta hai. Jise jinendra ne sidh kiya h

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