हिन्दी साहित्य

भारत की राष्ट्रीय संचेतना

Posted on: फ़रवरी 2, 2009

भारतीय वाङ्गमय में ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है। यजुर्वेद के ‘राष्ट्र में देहि’ और अथर्वेद के ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ में राष्ट्र शब्द समाज के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। मानव की सहज सामुदायिक भावना ने समूह को जन्म दिया, जो कालान्तर में राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। राष्ट्र एक समुच्चय है, कुलक है और राष्ट्रीयता एक विशिष्ट-भावना है। जिस जन समुदाय में एकता की एक सहज लहर हो, उसे राष्ट्र कहते हैं। आर्यों की भूमि आर्यावर्त में एक वाह्य एकता के ही नहीं वैचारिक एकता के भी प्रमाण मिलते हैं। आर्यों की परस्पर सहयोग तथा संस्कारित सहानुभूति की भावना राष्ट्रीय संचेतना का प्रतिफल है। साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है। साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है।
आधुनिक युग में भारत माता की कल्पना अथर्ववेद के सूक्तकार की देन है। वह स्वयं को धरती पुत्र मानता हुआ कहता है—‘‘माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः’’अथर्ववेद के पृथ्वी-सूक्त का प्रत्येक मंत्र राष्ट्र-भक्ति का पाठ पढ़ाता है। वेदों में राष्ट्रीयता की भावना मातृभूमि-स्तवन और महापुरुषों (देवताओं) के कीर्तिगान के द्वारा प्रकट होती है। उपनिष्दकाल के क्रान्तिकारी अमर संदेशों को भुलाया नहीं जा सकता है। यथा–‘उत्तिष्ठित् जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’
उठो ! जागो ! श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर (राष्ट्रप्रेम के तत्व को) भली-भाँति जानो !

भारतीय मनीषियों का चिन्तन सूक्ष्म और विचार उद्त्त थे। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ मंत्र से अंतर्राष्ट्रीयता का सूत्रपात किया था। विश्व-बंधुत्व की भावना से भारी कार्य जाति विचारों में महान थी। साथ ही शौर्य-पराक्रम और तेज से समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोकर रखने की क्षमता रखती थी।
समाज का राष्ट्र से सीधा संबंध है। किसी भी संस्कारित समाज की विशिष्ट जीवन शैली होती है। जोकि राष्ट्र के रूप में दूसरे समाज को प्रभावित करती है। रूढ़ियों एवं विकृत परम्पराओं से जर्जर समाज राष्ट्र को पतन की ओर ले जाता है। कवि मोह-निद्रा में डूबे राष्ट्र को  जागृति के गान गाकर संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। राष्ट्रीयता जैसी उदात्त प्रवृत्तियों का पोषण और उन्नयन साहित्य द्वारा होता है किन्तु हिन्दी साहित्य के उद्भव काल में केन्द्रीय सत्ता के अभाव ने राष्ट्रीयता की जड़े हिला दीं। ‘राष्ट्र’ छोटे-छोटे राज्यों की सीमाओं में बँध कर रह गया। राष्ट्र का यह संकुचित स्वरूप देश की दुर्भाग्य-निशा की संध्या-बेला थी। इस युग के सम्पूर्ण काव्य में राष्ट्रीय-भावना के स्वस्थ-स्वरूप का नितान्त अभाव है।
आक्रान्ताओं के अत्याचारों से जर्जर भारतीय संस्कृति का सूर्य अस्तप्राय हो चला था। किन्तु भक्त कवियों के अंतःकरण में बहती राष्ट्रीय-चेतना धारा ने सुप्त निराश्रित समाज को नयी दिशा दी।

महात्मा कबीर ने निराकार ब्रह्म की उपासना का उच्च आदर्श प्रस्तुत कर राष्ट्रीय-गरिमा में नव-जीवन का संचार किया। राम और रहीम को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। कबीर अपने युग के महान राष्ट्रवादी थे। राष्ट्र-भक्त तुलसी ने राम के समन्वयवादी, लोकरक्षक और लोकरंजक स्वरूप को स्थापित कर सांस्कृतिक, एकता को शक्ति प्रदान की। सूर ने कर्मयोगी कृष्ण की विविध लीलाओं के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना का संचार किया और समाज को सत्कर्म के लिए प्रेरित किया।

 रीतिकाल के कवियों की चमत्कारिक वृत्ति के कारण काव्य की आत्मालुप्त हो गयी। किन्तु भूषण के राष्ट्रवादी स्वरों ने लोक चेतना को झकझोर दिया। आधुनिक काल में भारतीय हरिश्चन्द्र ने अपनी लेखनी से भारत-दुर्दशा का चित्र खींचकर समाज को जागृति प्रदान किया। छायावादी काव्य में राष्ट्रीय आन्दोलनों की स्थूल अभिव्यक्ति नहीं मिलती है। किन्तु छायावादी कवियों की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक-संचेतना को नकारा नहीं जा सकता है। उसका राष्ट्र-प्रेम भावात्मक एवं व्यापक था। उन्होंने स्वातंत्र्य-भावना को विशिष्ट-कौशल द्वारा व्यंजित किया है। भारत का पतन मानवीय मूल्यों के ह्रास का परिणाम था। गुप्तजी ने अपने काव्य द्वारा मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल दिया। उनकी भारत-भारती ने राष्ट्रीयता की सुप्त भावना में लहरें उठा दीं। माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ रामनरेश त्रिपाठी और सोहनलाल द्विवेदी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, ‘जन’-जागरण तथा अभियान गीतों से राष्ट्र की आत्मा को नयी चेतना प्रदान की।

‘दिनकर’ की वैचारिक भाव-भूमि मानवतावादी है। तथापि समसामयिक परिस्थितियों में उठे विक्षोभ ने उन्हें राष्ट्रीयता वादी कवि के रूप में स्थापित कर दिया। ‘दिनकर’ के काव्य ने भारतीय जन-मानस को नवीन चेतना से सराबोर किया है। राष्ट्रीय-कविता का स्वरूप राष्ट्र के रूप पर ही आधारित होता है। राष्ट्रीय काव्य में समग्र राष्ट्र की चेतना प्रस्फुटित होती है। प्रत्येक भाषा के आधुनिक काव्य में राष्ट्रीय भावना का समावेश है। राष्ट्रीय-भावना राष्ट्र की प्रगति का मंत्र है। सम्पूर्ण मानवता की प्रगति का स्वरूप है। राष्ट्रीय भावना की सृजनात्मक पक्ष मानवता वादी है। जन-गण के मंगल का स्रोत है। किसी भी राष्ट्र-रूपी वृक्ष की क्षाया में अनेक पंथ-धर्म और भाषाएँ पल्लवति और पुष्पित हो सकते हैं। एक राष्ट्र में अनेक धर्म हो सकते हैं। भाषायें और बोलियाँ अनेक हो सकती हैं किन्तु मूल भावना और सांस्कृतिक विरासत एक ही होगी। राष्ट्रीय भावना से भरे होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम दूसरे राष्ट्रों के समाज को हेय दृष्टि से देखें या दुर्भावना रखें। किसी भी राष्ट्र के समाज की भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिस्थितियां उनकी जीवन-शैली का निर्माण करती हैं। बलात् अपनी सभ्यता-संस्कृति-थोपना हिंसा है और हिंसा वृत्ति कभी मानव का कल्याण नहीं कर सकती है।
भारतीय राष्ट्रीयता कोरी राजनीति कभी नहीं रही। उसने अध्यात्म, दर्शन और साहित्य के माध्यम से भी अपना नव-जागरण अभियान चलाया है। अंग्रेजों ने भारतीय समाज में जो विष-बेलें बोई थीं। वह आज भी पनप कर लह लहा रही हैं। स्वतंत्रता के इतने लंबें अंतराल में भी हम, उन बेलों का समूल नष्ट नहीं कर सके क्योंकि हमने अपना बहुमूल्य समय राष्ट्रीय चिन्तन के बजाय राजनैतिक चिन्तन में बिताया है और राष्ट्रीय चेतना को अंधेरे में घेरकर व्यक्तिगत हित साधन को सर्वोपरि समझा है। स्वाधीनता तो मिली किन्तु राष्ट्रीय चेतना सो गई। स्वाधीनता आकाश से नहीं उतरी वरन् राष्ट्रीय-चेतना से सराबोर शहीदों की शहादत का परिणाम है।

आज जब भारतीय वैज्ञानिक शोध को नई दिशा देने में समर्थ हैं। हमारी सामर्थ्य के अनेकों आयाम विकसित हो रहे हैं। संसाधनों की कोई कमी नहीं है। भारत-भूमि में स्वर्ग उतर सकता है किन्तु राजनीति के कुशल-दिग्भ्रान्त पहरुए राष्ट्र की जनता को वर्गों-धर्मों में बाँटकर क्षेत्रवाद की धुँध फैला रहे हैं। इसीलिए आवश्यक हो गया है कि लोक-चेतना में नया-संचार हो। प्रत्येक राष्ट्रीवादी नागरिक अस्मिता की रक्षा के लिए आगे बढ़कर आत्म-समीक्षा करे। आज राष्ट्र वाह्य और आंतरिक शत्रुओं के चक्रव्यूह में फंस कर अपना संगठित स्वरूप खोने लगा है। विघटनकारी तत्व अपना सिर उठा रहे हैं। साम्प्रदायिकता का विषैला प्रभाव राष्ट्रीय शिराओं में बहती जीव-धारा को विषाक्त कर रहा है। ऐसी विनाशक और विस्फोटक स्थिति में देश को दिशा देना साहित्य का गुरुत्वर दायित्व है। राष्ट्रीय काव्य-धारा ऐसी काव्य-प्रवृत्ति है जिसमें राष्ट्र-जन को तेजस्वी और पराक्रमी बनाने की सामर्थ्य निहित है।

वस्तुतः राष्ट्रीय संचेतना को झकझोरने वाला काव्यजन मानस को आन्दोलित कर नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का साहस भरता है। उन मूल्यों को महत्त्व देने के लिए प्रेरित करता है जिनमें हिंस, घृणा को नकारकर एक उन्मुक्त वातावरण उत्पन्न किया जा सके और जिसमें सभी धर्म निश्चिन्त होकर सांस ले सकें। यदि प्रत्येक राष्ट्र-धर्मी काव्य अपने समाज के अन्दर व्यापक उदात्त-भाव और रचनात्मक संस्कार उत्पन्न कर सकें, तो निश्चय ही ऐसा काव्य मानव के कल्याण के लिए होगा। अर्थात् राष्ट्रीय-काव्य मूलतः मानवता वादी काव्य ही है।

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