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केशवदास का सम्बन्ध उस युग से है जिसे साहित्य और अन्य कलाओं के विकास एवं सांस्कृतिक सामंजस्य की दृष्टि से मध्यकाल के इतिहास में स्वर्णयुग कहा जाता है।केशवदास का जन्म भारद्वाज गोत्रीय सना ब्राह्मणों के वंश में हुआ। इनको ‘मिश्र’ कहा जाता है। अपनी कृति रामचन्द्रिका के आरंभ में सना जाति के विषय में उन्होंने कई पंक्तियां कही हैं।सना जाति गुना है जगसिद्ध सुद्ध सुभाऊ
प्रकट सकल सनोढियनि के प्रथम पूजे पाई

भूदेव सनाढयन के पद मांडो, तथा सना पूजा अद्य आद्यदारी आदि। इन उक्तियों से प्रकट होता है कि केशवदास जी किस जाति में पैदा हुए थे।

जन्मतिथि  केशवदास जी ने अपनी तिथि के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है। विभिन्न आधारों पर विद्वानों ने केशवदास जी की जन्म – तिथि निश्चित करने का प्रयास किया है। इस सम्बन्ध में विभिन्न मतों की सारिणी निम्नलिखित है:विद्वान उनके अनुसार जन्मतिथि
शिवसिं सेंगर संवत् १६२४ वि०
ग्रियर्सन संवत १६३६ वि०
पं० रामचन्द्र शुक्ल संवत १६१२ वि०
डा० रामकुमार वर्मा संवत १६१२ वि०
मिश्रबन्धु (क) संवत १६१२ वि०
मिश्रबन्धु (ख) संवत १६०८ वि०
गणेश प्रसाद द्विवेदी संवत १६०८ वि०
लाला भगवानदी संवत १६१८ वि०
गौरी शंकर द्विवेदी संवत १६१८ वि०
डा० किरणचन्द्र शर्मा संवत १६१८ वि०
डा० विनयपाल सिंह संवत १६१८ वि०
विभिन्न मतों के बावजूद संवत् १६१८ को केशव की जन्मतिथि माना जा सकता है। रतनबावनी केशवदास जी की प्रथम रचना और उसका रचना काल सं० १६३८ वि० के लगभग है। इस प्रकार बीस वर्ष की अवस्था में केशव ने ‘रतनबावनी’ रचना की तथा तीस वर्ष की अवस्था में रसिकप्रिया की रचना की। अतः केशवदास जी की जन्म – तिथि सं० १६१८ वि० मानना चाहिए। इस मत का पोषण श्री गौरीशंकर द्विवेदी को उनके वंशघरों से प्राप्त एक दोहे से भी होता है:
संवत् द्वादश षट् सुभग, सोदह से मधुमास।
तब कवि केसव को जनम, नगर आड़छे वास।।
सुकवि सरोज
केशव का जन्म स्थान :केशव का जन्म वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य के अंतर्गत ओरछा नगर में हुआ था। ओरछा के व्यासपुर मोहल्ले में उनके अवशेष मिलते हैं। ओरछा के महत्व और उसकी स्थिति के सम्बन्ध में केशव ने स्वयं अनेक भावनात्मक कथन कहे हैं। जिनसे उनका स्वदेश प्रेम झलकता है।केशव ने विधिवत् ग्राहस्थ जीवन का निर्वाह किया। वंश वृक्ष के अनुसार उनके पाँच पुत्र थे। अन्तः साक्ष्य के अनुसार केशव की पत्नी ‘विज्ञानगीता’ की रचना के समय तक जीवित थीं। ‘विज्ञानगीता’ में इसका उल्लेख इस प्रकार है:
वृत्ति दई पुरुखानि को, देऊ बालनि आसु।
मोहि आपनो जानि के गंगा तट देउ बास।।वृत्ति दई, पदवी दई, दूरि करो दु:ख त्रास।
जाइ करो सकलत्र श्री गंगातट बस बास।।
 
केशवदास : राजदरबार में
केशव राज्याश्रित कवि थे। उनके पूर्वज भी राजाओं से सम्मानित होते आ रहे थे। ओरछेन्द्र महाराजा रामशाह के छोटे भाई इन्द्रजीतसिंह के द्वारा केशव को आश्रय और सम्मान मिला। राजा इन्द्रजीतसिंह के द्वारा केशव को आश्रय और सम्मान मिला। राजा इन्द्रजीतसिंह साहित्य और संगीत के मर्मज्ञ थे। केशवदास को इन्होंने ही रसिक-प्रिया की रचना की प्रेरणा दी। इससे इनकी साहित्यिक अभिरुचि का अंदाजा होता है। उनके दरबार में रायप्रवीण संगीत-नृत्य कुशला वेश्याएं भी रहती थीं।केशव इन्द्रजीत सिंह के दीक्षा-गुरु थे और रायप्रवीण के काव्यगुरु हुआ करते थे। इन्द्रजीत सिंह के दरबार के कलात्मक वातावरण में केशव और रायप्रवीण कविता भी कहा करती थी। रायप्रवीण ने अपने काव्य-कौशल से अकबर को छकाकर अपनी प्रतिभा का परिचय करा ही साथ-साथ अपने गुरु केशवदास की प्रतिष में भी चार चाँद लगवा दिया था। इन्द्रजीत सिंह के बाद वीरसिंहदेव ओरछा के राजा बने। केशव वीरसिंहदेव के दरबार से जुट गए।वीरसिंहदेव की प्रेरणा पाकर केशव ने विज्ञानगीता की रचना की। बीच में मन मुटाव के बाद केशव को अपना राज्याश्रय खोना पड़ गया। फिर बाद में वीरसिंहदेव ने केशव को सम्मानित करके राज्याश्रय प्रदान करके अपनी साहित्यिक रुचि का परिचय दिया। केशवदास ने वीरसिंहदेव के बारे में अपनी कृति वीरसिंहदेव रचित में काफी विस्तार से लिखा है।केशवदास को इन्द्रजीतसिंह तथा वीरसिंहदेव के अलावा रामशाद, रतनसेन, अमरसिंह तथा चन्द्रसेन ने सम्मान देकर आश्रय प्रदान किया। इन सभी राजाओं के बारे में केशव ने अपनी कृतियों में कुछ छन्दों की रचना करके, उनको अपने लक्षण ग्रंथों में दे दिया है। रतनसेन की प्रशंसा में ही रतनबावनी की रचना की गई थी।

केशव का सम्बन्ध राणा वंश से भी मालूम पड़ता है। यदा राणा प्रताप के पुत्र राणा अमर सिंह की प्रशस्ति में केशव ने कई छन्द लिखे जो कविप्रिया में संग्रहित किया गया है।

केशव का सम्बन्ध जहांगीर और अकबर के दरबार से वीरसिंहदेव के मित्र जहांगीर की प्रशस्ति में केशव ने जहांगीरजसचन्द्रिका लिखी। यहाँ यह कहना कठिन है कि केशव के जहांगीर आश्रयदाता थे। वीरसिंहदेव के विपत्ति के दिनों में जहांगीर ने उनकी सहायता की थी, इसीलिए केशव ने अपने आश्रयदाता के मित्र को अमर बता दिया। केशव ने रहीम की प्रशंसा कई स्थानों पर की है। अकबरी दरबार के एक और प्रतिष्ठित रत्न रोडरमल का भी केशव ने एक स्थान पर उल्लेख किया है –
रोडरमल तुव मित्र, मरे, सब ही सुख सोयी।
मोरे हित बरबीर बिता टुकु दीननि शेयो।।
केशव की कृतियों में उच्च कोटि के लोगों के अलावा सामान्य लोगों का भी उल्लेख किया गया है। सामान्य लोगों में एक उनका पड़ोसी सोनार जिसका नाम पतिराम था, उनकी रचनाओं में पतिराम का उल्लेख मिलता है। केशव एक स्थान पर पतिराम के बारे में कहते हैं कि वह अत्यन्त निगरानी रहने के बावजूद सोना चोरी कर लेता था -तुला तोल कसवान बनि, कायथ लिखत अपार।
राख भरत पतिराम पे, सोनो हरति सुनार।।
 
 
केशव का निधन केशव के निधन के काल और स्थान पर विद्वानों में मतभेद पाये जाते हैं। मिश्रबन्धु, गणेशप्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी एवं रामचन्द्र शुक्ल इत्यादि विद्वान केशवदास का निधन काल १६७४ में हुआ मानते हैं। स्व० चन्द्रबली पाण्डेय ने निधन काल सं० १६७० माना है। लाला भगवानदीन और गोरीशंकर द्विवेदी के अनुसार केशव का निधन १६८० में हुआ था। केशव के प्रेत योनि में पड़ने और तुलसी द्वारा उनके उद्धार की किंवदन्ती से भी स० १६८० वाले मत की पुष्टि होती है क्योंकि तुलसी का भी देहान्त इसी वर्ष हुआ था।
केशवदास का व्यक्तित्व विश्लेषण केशवदास के व्यक्तित्व में काफी निखार हो चुका था क्योंकि हर कवि या साहित्यकार के व्यक्तित्व के निर्माण में युग का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। केशव युग की सबसे प्रमुख विशेषता आचारमूलक धर्म और जनवादी दर्शन की भावात्मक संस्कारिता मानी जा सकती है। इसी प्रक्रिया में भावात्मक धर्म और साहित्य का गठबन्धन हुआ।केशव के व्यक्तित्व में आत्माभिमान पाया जाता है। केशव का व्यक्तित्व पौराणिक और शास्रीय ज्ञान से मंडित होकर भाषा की ओर झुक गया था। ओरछा के राजवंश से तो केशव का वंश संबाद था ही इसके अलावा ब्रज के वैष्णव संप्रदायों से भी उनका सम्बन्ध होने का प्रमाण मिलता है। यह कहा जा सकता है कि केशव बल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित थे। विट्ठलनाथ जी उनके मंत्र गुरु थे उनकी प्रशस्ति में केशव ने लिखा है – 
हरि दृढ़ बाल गोबिन्द विभु पायक सीतानाथ।
लोकप बिट्ठल शंखधर गरुड़ध्वज रघुनाथ।।
केशवदास के अग्रज केशव को वंश परंपरा से बहुलता के संस्कार मिले थे। इनके एक पूर्वज भाऊ-राम ने भाव-प्रकाश की रचना की थी। केशव के पिता काशीराम ज्योतिष के विद्वान थे। इनके पिता ने शीघ्रबोध नामक एक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की थी। इनके अग्रज बालभद्र मिश्र हिन्दी के एक अच्छे विद्वान माने जाते हैं। उन्होंने नखशिख भागवत भाष्य हनुमान्नाटक टीका का प्रणयन किया था। इन बहुमुखी पांडित्य और ज्ञान दरबारों से केशव के व्यक्तित्व पर काफी असर डाले।
 
केशव बहुमुखी प्रतिभा के मालिक केशव धर्म, ज्योतिष, संगीत, भुगोल, वैद्यक, वनस्पति, पुराण, राजनीति, अश्व-परीक्षा, कामशास्र आदि शास्रों के सामान्य ज्ञाता थे। इस बहुलता ने केशव के काव्य प्रस्तुतिकरण को मजीद समृद्ध किया। काव्यशास्र, नीतिशास्र और कामशास्र के वह विशेषज्ञ प्रतीत होते हैं। एक तरफ बहुज्ञाता ने केशव की काव्य साधना को प्रभावित किया वहीं दूसरी तरफ उनको राजसम्मान भी प्राप्त कराने का काम किया। केशव की कृतियों में अनेकों स्थानों पर उनकी बहुज्ञता को दर्शाया गया है। केशव को अपने पांडित्य पर गर्व था। जानत सकल जहान, कवि सिमोर, हस तरह की उक्तियाँ अपने लिए उन्होंने लिखी है।यह कहा जा सकता है कि केशव के व्यक्तित्व का निर्माण वंश परम्परा, युग-रुचि एवं तत्कालीन परिस्थितियों के साये में हुआ। एक ओर रसिकता और भावुकता के तत्व उनके व्यक्तित्व में पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं वहीं दूसरी ओर उनकी बौद्धिक उपलब्धियाँ भी अनेक दिखाई देती हैं। इन दोनों के बीच कभी-कभी एक संघर्ष भी उनके व्यक्तित्व में पाया जाता है। इन सब में व्यावहारिकता उनका प्रधान गुण है।
 
 
केशवदास की कृतियाँ
केशव ने बहुत सी कृतियों की रचना की हैं। केशवदास की सर्वमान्य प्रामाणिक रचनाएं कालानुसार निम्नलिखित हैं -१. रतनबावनी सं० १६३८ से १६४० वि०
२. रसिकप्रिया सं० १६४८ वि०
३. रखशिख सं० १६५७ वि०
४. बारहमासा सं० १६५७ वि०
५. रामचन्द्रिका सं० १६५७ वि०
६. कविप्रिया सं० १६५८ वि०
७. छन्दमाला सं० १६५९ वि०
८. बीरसिंहदेव रचित सं० १६६४ वि०
९. विज्ञानगीता सं० १६६७ वि०
१०. जहांगीरजस चन्द्रिका सं० १६६९ वि०डा० किरणचन्द्र शर्मा बारहमास को केशव की अलग कोई कृति नहीं मानते हैं। वह कहते हैं कि यह कविप्रिया का ही एक अंश है।
केशव कृतियों में युग केशव की कृतियों में एक युग का युग प्रतिबिंबित है। समस्त रीतिकाल की काव्य-सामग्री को चार भागों में बांटां जा सकता है।१. प्रशस्तिकाव्य या वीरकाव्य
२. श्रृंगारकाव्य
३. भक्तिभैराव्य काव्य एवं
४. रीतिशास्रीय साहित्य
रतनबावनी एक वीरकाव्य है। इस काव्य में वही छप्पय छन्द और वीरकाव्योचित द्वित्व-बहुल अपभ्रंश शैली पाई जाती है। इसी शैली का प्रयोग पूर्वकालीन वीरकाव्यों में हुआ करता था। वीरसिंहदेवचरित प्रशस्तिमूलक चरित काव्य है। इस काव्य को केशवदास ने धर्म का आदर्श आवरण प्रदान किया हुआ है। जहांगीर जस चन्द्रिका भी इसी कोटि क कृति है। कविप्रिया में प्रशस्तिमूलक लक्षण – उदाहरण योजना पाई जाती है। “रामचन्द्रिका’ संस्कृत के परवर्ती महाकाव्यों की वर्णन-बहुल शैली का प्रतिनिधित्व करती है। रसिकप्रिया, कविप्रिया और छन्दमाल । आचार्यत्व से सम्बन्धित कृतियाँ हैं। रसिकप्रिया में श्रृंगार के रसराजत्व की प्रतिष्ठा है।
 
 
केशवदास की कृतियाँ
वर्गीकरण केशव की रचनाओं का विषय और रुप की दृष्टि से वर्गीकरण निम्नलिखित है –
वीरभाव रतनबावनी मुक्तकप्रबन्ध प्रबंधकाव्य
प्रशस्तिमूलक वीरसिंहदेवचरित चरितकाव्य (प्रबन्धकाल)
  जहांगीरजस चन्द्रिका    
रामभक्ति रामचन्द्रिका महाकाव्य  
श्रृंगार रसराजत्व रसिकप्रिया    
अलंकारशास्र   लक्षणग्रन्थ आचमित्व संबंधी
कविशिक्षा कविप्रिया    
छन्दशास्र छन्दमाला    
ज्ञान वैराग्य विज्ञानगीता प्रबोधचन्द्रोदयशैली  

 

विश्लेषण“रतनबावनी’ बावनी काव्यरुप में आती है। इसे छ छंद में लिखे गए हैं। इसकी मूल प्रेरणा वीर-पूजा की है। केशवदास ने राजकुमार रतनसेन की वीर-गति को जातीय राष्ट्रीयता का संदर्भ प्रदान करने का प्रयास किया है।वीरसिंहदेवचरित को धर्म-प्रतीकों के माध्यम से एक उदात्त संदर्भ प्रदान किया गया है। यह प्रतीक योजना दान, लोभ और विंध्यवासिनी देवी में परिलक्षित है।जहांगीरजस चन्द्रिका में उद्यम और भाग्य का संवाद दिया गया है। इसके आरंभ में शाही दरबार का विशद चित्र है।
 
 
प्रकृतिचित्रण काव्य में प्रकृति का वर्णन कई प्रकार से किया जाता है जैसे – आलंबन, उद्दीपन, उपमान, पृष्ठभूमि, प्रतीक, अलंकार, उपदेश, दूती, बिम्ब-प्रतिबिम्ब, मानवीकरण, रहस्य तथा मानव-भावनाओं का आरोप आदि। केशव ने भी ‘कविप्रिया’ में वर्ण्य-विषयों की तालिका इस प्रकार दी है:
देस, नगर, बन, बाग, गिरि, आश्रम, सरिता, ताल।
रवि, ससि, सागर, भूमि के भूषन, रितु सब काल।।
फिर इन वर्णनों में आने वाली वस्तुओं की सूची दी गई है। इससे प्रतीत होता है कि काव्य में केशव भी प्रकृति-वर्णन को आवश्यक मानते थे।अपनी कृतियों में केशवदास ने प्रकृति-वर्णन की सभी शैली को अपनाया है। आलम्बन-रुप में प्रकृति-चित्रण भी उन्होंने पर्याप्त मात्रा में किया है। उन्होंने कृत्रिम पर्वत और नदी का वर्णन किया है, जिनका उल्लेख संस्कृत संस्कृत काव्यों में क्रीड़ाक्षेत्र के नाम से हुआ है। केशव का आदर्श माघ, श्रीहर्ष, बाण आदि का आदर्श था। केशव के काव्य-सिद्धान्तों के अनुसार, वन, वाटिका तथा कहीं समुद्र आदि के वर्णन में कुछ विशिष्ट बातें अनिवार्य हैं। इन वस्तुओं के वर्णन में उन्हें गिनाकर काम चला लेने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए, विश्वामित्र के आश्रम के निकटस्थ वन का वर्णन प्रस्तुत है:
तरु तालीस तमाल ताल हिताल मनोहर।
मंजुल बंजुल तिलक लकुच कुल नारिकेर बर।
एला ललित लवंग संग पुंगीफल सोहैं।
सारो सुककुल कलित चित्त कोकिल अलि मोहैं। 
सुभ राजहंस कुल, नाचत मत्त मयूरगन।
अतिप्रफुलित फलित सदा रहै “केसवदास’ बिचित्र बन।।
संभवतः ‘विचित्र वन’ कहकर कवि ने इसे विश्वामित्र के तप-प्रभाव से प्रसूत माना हो, परन्तु ऐसा वर्णन करते समय कवि केवल कवि-परम्परा का पालन मात्र करता दिखाई देता है।कवि-परम्परा के अनुसार, सरोवर के वर्णन में कमलों, भ्रमरों, पक्षियों तथा जलचरों का वर्णन किया जाना चाहिए। उसी परिपाटी पर केशव ने अयोध्या के सरोवर का वर्णन यों प्रस्तुत किया है:
सुभ सर सौभै, मुनि – मन लोभै।
सरसिज फूले, अलि रसभूले।।
जलचर डोलैं, बहु खग बोलैं।
बरनि न जाहीं, उर उरझाहीं।।
सरयू, पंचवटी, पंपासर, प्रवर्षण पर्वत आदि का वर्णन भी कवि ने आवश्यक वस्तओं की सूची देकर किया है। दण्डक वन का वर्णन इस प्रकार है:
सोभत दंडक की रुचि बनी।
भांतिन भांतिन सुन्दर घनी।।
सेव बड़े नृप की जनु लसै।
श्रुल भूरि भाव जहं बसै।।वेर भयानक सी अति लगै।
अर्क समूह जहां जगमगै।।
नैननि को बहु रुपनि ग्रसै।
श्रीहरि की जनु मूरति लसै।।
उपर्युक्त छन्द का यदि हम सहृदयता से अर्थ करें तो यही होगा कि यह दण्डक वन भिन्न-भिन्न प्रकार से आकर्षक तथा घना है। यह बड़े राजा की सेवा के समान सुशोभित होता है, जैसे राजा की सेवा में श्रीफल (धन) की प्राप्ति होती है, वैसे ही इसमें भी श्रीफल (बेल) के सुन्दर फल हैं। फिर यह वन प्रलय-बेला के समान भयंकर दिखाई देता है, जैसे प्रलयबेला में सूर्य समूह प्रकाशित हो जाता है, उसी प्रकार यहां अकौए के रुखे-सूखे सफेद पुष्प प्रकाशित हो रहे हैं और इसे भयंकर बना रहे हैं। इस प्रकार यह वन नेत्रों को अनेक प्रकार से आकृष्ट कर रहा होता है – कहीं भयंकर दिखाई देता है और कहीं सुन्दर। इसकी वही दशा है जो ईश्वर के विराट् रुप की होती है जिसमें भयंकर तथा रम्य दोनों प्रकार से दृश्य दिखाई देते हैं।केशव में प्रकृति के प्रति सहृदयता थी। कई स्थानों पर कवि ने बिम्ब-ग्रहण कराने की चेष्टा की है, ऐसे स्थल इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि केशव में प्रकृति का शाब्दिक चित्र खींचने की पर्याप्त क्षमता थी। “रामचन्द्रिका’ के आरम्भ में हुए सूर्य की प्रातःकालीन अरुणिमा की शोभा का चित्रण इस प्रकार किया गया है –
अरुन गात अतिप्रात पद्मिनी-प्राननाथ मय।
मानहु “केसवदास’ कोकनद कोक प्रेममय। 
परिपूरन सिंदूर पूर कैघौं मंगलघट।
किघौं सुक्र को छत्र मढ्यो मानिकमयूख-पट।
कै श्रोनित कलित कपाल यह, किल कापालिक काल को।
यह ललित लाल कैघौं लसत दिग्भामिनि के भाल को।।
कमल और चक्रवाक का अरुण अनुराग, सिन्दूरी वर्ण का मंगल-कलश, मणि-कांति-सुशोभित इन्द्र की छत्री, सभी उपमान तेजसंचय करते हुए प्रातःकालीन सूर्य की अभिव्यंजना करे हैं। प्रत्येक पंक्ति में नवीन अप्रस्तुत की योजना होते हुए भी यहां प्रस्तुत, अर्थात् उदीयमान सूर्य का ही चित्र प्रधान है।प्रातःकाल देखते – देखते कैसे सब तारे छिप जाते हैं और सूर्य कहां से कहां पहुंच जाते हैं, इस दृश्य का वर्णन कवि ने काफी अच्छे अन्दाज से किया है –
चढ़ो गगन तरु धाई,
दिनकर बानर अरुनमुख।
कीन्हो झुकि झहराइ,
सकल तारका कुसुम बिन।।
भमरों – सहित सुगन्धित कमलों वाली गोदावरी मानो बहुनयन इन्द्र की शोभा धारण किए हुए है:
अति निकट गोदावरी पापसंहारिनी।
चल तरंगतुगावली चारु संचारिनी।
अलि कमल सौगंध लीला मनोहारिनी। 
बहुनयन देवेस-सोभा मनो धारिनी।।
कवि प्रकृति का भली भांति निरीक्षण करना चाहता है और जहां वह हृदय को साथ लेकर चला है, वहां उसने प्रकृति के अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर दृश्य प्रस्तुत किए हैं। वर्षा का अत्यन्त मनोरम चित्र कवि ने खींचा है। “रसिक-प्रिया’ में कवि ने घने बादलों द्वारा फैलाए गए अंधकार की अत्यन्त सुन्दर और मार्मिक व्यंजना की है:
राति है आई चले घर कों, दसहूं दिसि मेह महा मढि आओ।
दूसरो बोल ही तें समुझै कवि “केसव’ यों छिति में तम छायो।।
“कविप्रिया’ के आक्षेपालंकार के प्रसंग में प्रकृति के उद्दीपक रुप का अत्यन्त स्पष्ट अंकन कवि ने किया है। प्रकृति के साथ मानव-हृदय का जो तादात्म्य रुप “बारहमसे’ में कवि ने दिखाया है, वह प्रशंसनीय है। प्रत्येक मास अपनी-अपनी प्राकृतिक विशेषताओं से संयोगिनियों के सुख की अभिवृद्धि करता हुआ उनकी भावनाओं का उद्दीप्त करता है। विरह के नाम-मात्र से 
वे घबरा जाती हैं। निम्नपद में नारी-हृदय चारों ओर की प्रकृति को हर्षित और अपने-अपने प्रिया से संयुक्त होते देख आन्दोलित हो उठता है:
“केसव’ सरिता सकल मिलित सागर मन मोहैं।
ललित लता लपटात तरुन तर तरबर सोहैं।
रुचि चपला मिलि मेघ चपल चमकल चहुं ओरन।
मनभावन कहं भेंटि भूमि कूजत मिस मोरन।
इहि रीति रमन रमनी सकल, लागे रमन रमावन।
प्रिय गमन करन की को कहै, गमन सुनिय नहिं सावन।।
प्राकृतिक सौन्दर्य की झलमल भी दिखलाई पड़ती है। कवि की वर्षा – वर्णन की कुछ पंक्तियों में यही स्थिति मिलती है। 
देखि राम वरषा रितु आई।
रोम रोम बहुधा दुखदाई।
आसपास तम की छबि छाई।
राति द्यौस कछु जानि न जाई।।
मंद मंद धुनि सों घन गाजैं।
तूर तार जनु आवझ बाजैं।
ठौर ठौर चपला चमकै यों।
इंद्रलोक-तिय नाचति है ज्यौं।।
सोहैं घन स्यामल घोर घनै।
मोहैं तिनमें बकपांति मनै।
संखावलि पी बहुधा जस स्यों।
मानौ तिनकों उगिलै बलस्यों।।घन घोर घने दसहू दिसि छाये।
मघवा जनु सूरज पै चढि आए।
अपराध बिना क्षिति के तन ताए।
तिन पीड़न ह्मवै उठि धाए।।
इस प्रकार के सौन्दर्य वर्णनों में अलंकार-विधान चित्रण का पूरक अंग होकर हुआ है। प्रकृति का सौन्दर्य सघन अलंकारों में छिप नहीं जाता। इसी प्रकार शरद् का वर्ण का वर्णन भी सुन्दर बन पड़ा है:
दंतावलि कुन्द समान गनौ।
चंद्रानन कुंतल भौंर घनौ।
भौहैं धनु खंजन नैन मनौ।
राजीवनि ज्यों पद पानि भनौ।।
हारावलि नीरज हीय रमै।
लीन पयोधर अंबर मैं।
पाटीर जुन्हाइहि अंग धरै।
हंसी गति “केसव’ चित्त हरै।।
उपमान-योजना करते समय भी सभी कवियों ने प्रकृति के असीम भंडार से लाभ उठाया है और यह स्वाभाविक भी है। जो कवि साहित्यिक परम्परा में बंधे होते हैं, वे प्रकृति का अप्रस्तुत रुप में उपयोग रुढि के आधार पर ही करते हैं और रीतिकाल के कवियों में यही बात मिलती है। केशव भी इसके अपवाद नहीं हैं। सीता के नखशिख वर्णन में केशव ने प्रचलित उपमानों का प्रयोग किया है। मुख के लिए चन्द्रमा प्रसिद्ध उपमान है। केशव ने भी सीता के मुख की उपमा चन्द्रमा से दी है:
चन्द्रमा सी चन्द्रमुखी सब जग जानिए।
यहां कवि चन्द्र की सभी विशेषताओं को सीता के मुख में भी देखता है। परन्तु शीघ्र ही वह सीता के मुख के लिए बड़े तार्किक ढंग से चन्द्रमा को अनुपयुक्त ठहरा कर कमल के समान बतलाता है:
सुन्दर सुबास अरु कोमल अमल अति।
सीता जू को मुख सखि केवल कमल सों।
कहीं-कहीं कवि प्रसिद्ध उपमानों की अपेक्षा उपमेय के सौन्र्य का उत्कर्ष दिखाता है। केशव ने भी उपमेय मुख में उत्कर्ष, और उपमान कमल तथा चन्द्र में अपकर्ष दिया है:
एक कहैं अमल कमल मुख सीता जू को,
एकै कहैं चंदसम आनन्द को कंद री।
होइ जौ कमल तौ रयनि में न सकुचै री,
चंद जौ तौ बासर न होइ दुति मंद री।
बासर ही कमल रजनि ही में चंद,
मुख बासर हू रजनि बिराजै जगबंद री।।
अनेक प्राकृतिक रुपों की अप्रस्तुत रुप में परीक्षा शुद्ध सादृश्य की दृष्टि से बड़ी मनोहर और उपयुक्त बन पड़ी है। राम, लक्ष्मण आदि की बरात से जनकपुर वासियों के मिलन को दिखाने क लिए कवि ने सागर और सरिता के प्रेम-मिलन की स्वाभाविक उत्प्रेक्षा दी है
बनि चारि बरात चहूं दिसि आई।
नृप चारि चमू अगवान पठाई।
जनु सागर को सरिता पगु धारी।
तिनके मिलिबे कहंबांह पसारी।।
इसी प्रकार वन जाते हुए राम के पीछे उमड़ते हुए जन सागर के लिए भगीरथ के पीछे बहती हुई गंगा धारा की उत्प्रेक्षा अत्यन्त भावपूर्ण है।रुप और आकार के वर्णन में भी कवि ने चमत्कार की प्रेरणा से उपमानों को ग्रहण किया है। मार्ग में जाते हुए राम, सीता और लक्ष्मण ऐसे प्रतीत होते हैं मानो:
मेघ मंदाकिनी चारु सौदामिनी।
रुप रुरे लर्तृ देहधारी मनो।
भूरि भागीरथी भारती हंसजा।
अंस के हैं मनो, भाग भारे भनो।।
यद्यपि केशव के काल में प्रकृति से अधिक महत्तव मनुष्य का दिया जाने लगा था तथापि 
उन्होंने प्रकृति में मानव सुलभ भाव को खोजने का सफल प्रयत्न किया है। अलंकारों से नाक भौं सिकोड़ने वाले लोगों के हाथ कुछ न पड़े, यह बात दूसरी है। वर्षा को चण्डी के विकास-रुप में तथा शरद् को कुलीन सुन्दरी के रुप में चित्रित किया है। इतना ही नहीं, यह शरद् उन्हें उस वृद्धा दासी की तरह भी दर्शित होती है जो प्रातःकाल उठाने आती थी:
लक्ष्मन दासी वृद्ध सी आई सरद सुजाति।
मनहु जगावन कों हमहिं बीते बरषा राति।।
वर्षा में बाढ़युक्त नालियां अपने किनारों को डुबा देती हैं जैसे अभिसारिकाएं अपने धर्म के मार्ग के मिटा देती हैं:
अभिसानिनि सी समझौ परनारी ।
सतमारग – मेटन कों अधिकारी ।
एक स्थान पर कवि ने प्रकृति का अत्यन्त कमनीय तथा मनोरम वातावरण प्रस्तुत किया है। राम और सीता जब एकत्र बैठते हैं तब सीता के वीणा-वादन पर मुग्ध होकर पशु-पक्षी घिर आते हैं और राम द्वारा प्रेम-पूर्वक पहनाए गए आभूषणों को भी निश्शंक भाव से ग्रहण करते हैं:
जब जब धरि बीना प्रकट प्रवीना बहु गुनलीना सुख सीता ।
पिय जियहि रिझावै दुखनि भजावै बिबिध बजावै गुनगीता ।
तजि मति संसारी बिपिनबिहारी सुखदुखकारी घिरि आवैं ।
तब तब जगभूषन रिपुकुलदूषन सबकों भूषन पहिरावैं ।।
इतना ही नहीं, प्रकृति का उपदेशात्मक रुप भी कवि के सम्मुख आया है। प्रकृति के स्वाभाविक तथ्यों को दृष्टि में रखकर कवि उनसे जीवन-तथ्यों का संग्रह करता है:
तरनि-किरनि उदित भई,
दीपजोति मलिन गई ।
सदय हृदय बोध – उदय,
ज्यों कुबुद्धि नासै ।।
इसी प्रकार कहीं उन्होंने मानव-जीवन के सत्यों को प्रकृति में चरितार्थ होने दिया है। ब्राह्मण जब सुरापान करने में लीन होता है तो उसकी शोभा व सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। उसी प्रकार चन्द्र भी वारुणी की इच्छा करने मात्र से श्री-ही हो जाता है:
जहीं बारुनी की करी रंचक रुचि द्विजराज।
तहीं कियो भगवंत बिन संपति सोभा साज।।
प्राकृतिक उपमानों का उपयोग केशव ने पर्याप्त रुप से किया है। वे संस्कृत के अच्छे अध्येता थे और संस्कृत की अप्रस्तुत-योजना उन्होंने ग्रहण की थी। संस्कृत साहित्यशास्र की मान्यताओं के अनुसार वे अप्रस्तुत-योजना में शब्द को भी रुप, गुण, क्रिया के समान ही साम्य-वैषम्य का आधार बनाकर चलते हैं। अपनी निजी प्रतिभा से उन्होंने उपमानों की नवीनता या प्रचलित उपमानों के नवीन प्रयोग दर्शित किए हैं तथा प्रकृति रुपों का सफल प्रयोग किया है। जहाँ बिना सुन्दर साम्य-स्थापना का विवेचन किए हुए कवि ने प्राकृतिक उपमानों का प्रयोग किया है, वहां पर यह योजना आज के आलोचक की दृष्टि से उपहासास्पद हो गई है। यही कारण है कि केशव पर यह आक्षेप लगाया जाता है कि प्रकृति निरीक्षण का उन्हें अवकाश न था। परन्तु एक तो ऐसे चित्र केशव के काव्याकाश में दो-एक टिमटिमाते हुए तारों के समान ही हैं, उनके पीछे उनके कृतिकार का व्यक्तित्व एवं एक परम्परा है। केशव ने प्रकृति के मार्मिक, स्वाभाविक तथा सजीव चित्रों के लिए सफल अप्रस्तुत-योजना का भी पर्याप्त प्रयोग किया है। साथ ही, उनमें ऐसे स्थलों का भी अभाव नहीं जहां प्रस्तुत योजना का प्रयोग रुप-साम्य, भाव-साम्य तथा वातावरण-निर्माण के लिए किया गया है।उपर्युक्त विवेचन से निष्कर्ष निकलता है कि केशव ने प्रकृति – चित्रण की प्रायः सभी शैलियों का वर्णन किया है। प्रकृति का याथातथ्य और सुन्दर चित्रण करने की क्षमता उनमें थी। वे चाहते तो प्रकृति का स्वच्छन्द व स्वाभाविक चित्रण कर प्रकृति-कवि के रुप में प्रसिद्ध हो सकते थे। वैभव और विलास के वातावरण में रहने के कारण उनकी मनोवृत्ति कला-पक्ष की ओर विशेष रही। संस्कृत-साहित्य के अति संपर्क के कारण उनकी दृष्टि बहुत कुछ बद्ध रही। फलतः प्रकृति-चित्रण यत्र-तत्र दुरुह प्रतीत होते हैं। 

उनमें हृदय की अपेक्षा बुद्धि का प्राधान्य हो गया है। यदि उनमें चमत्कारप्रियता न होती तो उनके प्रकृति-चित्र भी भवभूति और कालिदास के समकक्ष हो सकते थे। उन्होंने प्रकृति को कवि की दृष्टि से नहीं, अपितु कवि-सम्प्रदाय की दृष्टि से देखा है। अतः वे अपने उद्देश्य में सर्वथा सफल हुए हैं।

 
 
भावव्यंजना: रस
प्रारंभिक अवस्था में रस का अर्थ श्रृंगार ही माना जाता था और रस के प्रवर्तक आचार्य कामशास्र के भी आचार्य माने जाते थे। विश्वनाथ जैसे विद्वान ने श्रृंगार रस को आदिरस कहा है। बाणभ ने रस शब्द का प्रयोग श्रृंगार के अर्थ में किया है। भोजदेव ने तो “श्रृंगार प्रकाश’ में स्पष्ट ही कहा है:
श्रृंगारवीरकरुणाद्भुतरौद्रहास्य
बीभत्सवत्सलभयानकशान्तनाम्नः ।
आम्नासिषुर्दशरसान् सधियो वयं तु
श्रृंगारमेव रसनाद्रसमामनामः ।।
यहां पर संस्कृत काव्यशास्र की सुदीर्घ परम्परा से उद्धरण देने की आवश्यकता नहीं है, पर इतना निश्चित रुप से कहा जा सकता है कि अधिकांश आचार्यों ने श्रृंगार को ही रसराज के रुप में स्वीकार किया है।केशव ने भी श्रृंगार को ही रसराज का स्थान प्रदान किया है: –
नबहू रस के भाव बहु,
तिनके भिन्न विचार ।
सबको “केशवदास’, 
हरि नायक है श्रृंगार ।।
श्रृंगारसंयोग श्रृंगारकेशव ने संयोग श्रृंगार का विस्तार से वर्ण किया है। केशव का जीवन सुखमय परिस्थितियों में व्यतीत हुआ। राज-दरबारों में संयोग-श्रृंगार से संबंधित सूक्ष्म तथा चमत्कारपूर्ण छन्दों का ही विशेष आदर होता था। अतः केशव ने संयोग-वर्णन में सौन्दर्य वर्णन, रुप वर्णन, हाव-भाव वर्णन, आभूषण वर्णन अष्टयाम, उपवन, जलाशय, क्रीड़ा-विलास आदि का चित्रण विस्तार से किया है। उन्होंने अपनी श्रृंगार-नायिकाओं के अत्यन्त स्वाभाविक चित्र प्रस्तुत किए हैं। किसी नायिका का पति परदेश जा रहा है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ है कि अपने प्रियतम को किन शब्दों में विदाई दे। अतः वह स्वयं प्रियतम से ही पूछ रही है:
जौ हौं कहौं “रहिजै’ तौ प्रभुता प्रगट होति,
“चलन’ कहौं तौ हित-हानि, नाहिं सहनै ।
“भावै सो करहु’ तौ उदास भाव प्राननाथ,
“साथ लै चलहु’ कैसे लोलाज बहनै ।।”कसोराइ’ की सौं तुम सुनहु छबीले लाल,
चले ही बनत जौ पै नाहीं राजि रहनै।
तैसियै सिखावौ सीख तुम ही सुजान पिय,
तुमहिं चलत मोहि कैसो कछू कहनै ।।
सीता की दासी के नख-शिख वर्णन में भी कुछ प्रभावपूर्ण चित्र मिलते हैं। सीता की दासियों की “सुभ्र साधु माधुरी’ को देखकर चंचल चित्त भी स्थिर हो जाता है:
छवान की छुई न जाति सुभ्र साधु माधुरी ।
बिलोकि भूलि भूलि जात चित्त-चालि-आतुरी ।।
सीता-राम के प्रसंगों से सम्बन्धित चित्रों में पूर्ण मर्यादा का ध्यान रखा गया है। वन-वास के समय का मर्यादापूर्ण संयोग-श्रृंगार का एक चित्र देखिए:
जब जब धरि बीना प्रकट प्रबीना बहु गनलीना सुख सीता ।
पिय जियहि रिझावै दुख्नि भजावै बिबिध बजावै गनगीता ।।
तजि मति संसारी बिपिन बिहारी सुखदुखकारी घिरि आवैं ।
तबतब जगभूषन रिपुकुलदूषन सबकों भूषन पहिरावैं ।।
रनिवास की सुन्दरियां वाटिका में भ्रमरियों के सामने ही भ्रमरों को मालती का चुम्बन करते देखती हैं। वे लज्जा से भर जाती हैं। सामान्य भाषा में केशव ने इसकी अत्यन्त सुन्दर व्यंजना की है:
अलि उड़ धरत मंजरी जाल ।
देखि लाज साजति सब बाल ।।
अलि अलिनी के देखत धाई ।
चुम्बत चतुर मालती जाई ।।
अद्भुत गति सुन्दरी बिलोकि ।
विहंसित है घूंघट पट रोकी ।।
एक दो स्थानों पर अश्लीलत्व का भी परिचय मिलता है। शत्रु-स्रियों से सम्बन्धित प्रसंगों में ऐसा हुआ है। अंगद मंदोदरी के केश पकड़कर चित्रशाला के बाहर ले आए हैं। उस समय का वर्णन देखिए: –
बिना कंचुकी स्वच्छ बक्षोज राजैं ।
किधौं सांचहूं श्रीफलै सोभ साजैं ।।
किधौं स्वर्न के कुंभ लावन्य – पूरे ।
बसीकन के चूर्न संपूर्न पूरे ।।
 
 
विप्रलंभ श्रृंगार रीतिकालीन कवियों की दृष्टि प्रधानतः जीवन के सुख-विलास पर थी, अतः उन्होंने अपने काव्य में भी विलास एवं रसिकता का ही विशद चित्रण किया है। वे परम्पराभुक्त ऊहा एवं अतिश्योक्ति के द्वारा ही विरह-चित्रण करते रहे। केशव ने भी विरह के प्रसिद्ध उद्दीपकों, परम्परित वर्णन-परिपाटियों एवं शैलियों का उपयोग किया है। सीता के वियोग में चन्द्रमा की शीतल किरणें राम के हृदय को दग्ध कर रही हैं :
हिमांसु सूर सो लगै सो बात बज्र सो बहै ।
दिसा लगै कृसानु ज्यों बिलेप अंग को दहै ।।
बिसेष कालराति सी कराल राति मानिये ।
बियोग सीय को न, काल लोकहार जानिये ।।
सीता के वियोग में पंपासर के कमल सीता के नत्रों के समान प्रतीत होते हैं:
नव नीरज नीर तहां सरर्तृ ।
सिय के सुभ लोचन से दरर्तृ ।
केशव ने विप्रलम्भ श्रृंगार के अन्तर्गत पूर्वराग, मान, करुण, प्रवास, विरह-दशाएं, पत्रदूती, बारहमासा आदि सभी का चित्रण किया गया है।
 
 
पूर्वराग किसी के गुण-श्रवण अथवा सौंदर्य-दर्शन से उत्पन्न प्रेम की इच्छा को पूर्व-राग कहा जाता है:
केसव कैसेहुं ईइनि दीठि ह्मवे दीठ परे रति-ईठ कन्हाई ।
ता दिन तें मन मेरे कों आनि भई सु भई कहि क्यों हूं न जाई ।।
होइगी हांसी जौ आवै कहूं कहि जानि हितू हित बूझन आई ।
कैसें मिलौं री मिले बिनु क्यों रहौं नैननि हेत हियें डर माई ।।
 
मान “रसिकप्रिया’ में कवि ने प्रेमियों के मान का तथा मान-मोचन-विधि का वर्णन किया है।
 
करुण जहां किसी आधिदैविक तथा अन्य विशेष कारण से संयोग की आशा समाप्त हो जाती है, वहां करुण-विप्रलम्भ होता है। “रसिकप्रिया’ में केशव ने इसका वर्णन किया है।
 
प्रवास प्रियतम के किसी कारण-विशेष से चले जाने पर हृदय में जो संतापमयी वृत्ति जागरित हो जाती है, उसे प्रवास कहते हैं। “रसिकप्रिया’ में इसका वर्णन मिलता है।
 
विरहदशाएं विरह की शास्रीय दस दिशाएं निम्नलिखित हैं : – अभिलाषा, चिन्ता, गुण-कथन, स्मृति, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता तथा मरण। “रसिकप्रिया’ में केशव ने मरण को छोड़कर, अन्य सभी विरह-दशाओं का वर्णन किया है, क्योंकि राधा कृष्ण के सम्बन्ध में – 
मरन सु केशवदास पै,
बरन्यो जाहि न मित्र ।
 
करुण रस केशव ने करुण रस के चित्रण में भाषा की सांकेतिकता की अपेक्षा गंभीरता की अभिव्यंजना के लिए व्यंजना-शक्ति का आश्रय लिया है। राम लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजते हुए दशरथ की मनःस्थिति का चित्रण कितना गंभीर है:
राम चलत नृप के जुग लोचन ।
बारि भरित भए बारिद-रोचन ।।
पाइन परि रिषि के सजि मौनहिं।
“केसव’ उठि गए भीतर भौनहिं ।।
चित्रकूट में दशरथ की कुशल के विषय में राम का प्रश्न सुनकर तीनों माताएं एक साथ रो उठी थीं :
तब पूछियो रघुराइ ।
सुख है पिता तन माइ ।
तब पुत्र को मुख जोइ ।
क्रम तें उठीं सब रोइ ।।
रावण द्वारा अपहृता सीता का करुणामय क्रन्दन इस प्रकार है :
हा राम हा रमन हा रघुनाथ धीर ।
लंकाधिनाथबस जानहु मोहि बीर ।
हा पुत्र लक्ष्मण छुडाबहु बेगि मोहि ।
मातर्ंडबंसजस की सब लाज तोहि ।।
इस छन्द में स्थायी शोक, आश्रय सीता, आलंबन “प्रिय-वियोग’, अनुभाव रोना, सिसकियां भरना, करुण क्रन्दन, संचारी-भाव विषाद है जिनके द्वारा केशवदास जी ने करुणरस का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है।लक्ष्मण-मूर्च्छा का प्रसंग रामकथन का एक अत्यन्त मार्मिक स्थल है। इस अवसर पर केशव के राम का विलाम देखिए :
बारक लक्ष्मन मोहि बिलोकौ ।
मोकहं प्रान चले तजि, रोकौ ।
हौं सुमरौं गुन केतकि तेरे ।
सोदर पुत्र सहायक मेरे ।।लोचन बाहु तुही धनु मेरौ ।
तू बल बिक्रम बारक हैरौ ।
तो बिनु हौं पल प्रान न राखौं ।
सत्य कहौं कछु झूठ न भाखौं ।।
अपनी अंगूठी के प्रति सीता का उपालंभ भी उल्लेखनीय है:
श्रीपुर में बनमध्य हौं तूं मग करी अनीति ।
कहि मुदरी अब तियन की, को करिहै परतीति ।।
 
 
वीर : रौद्र कठोर भावों की अभिव्यक्ति में अलंकार-योजना तथा ध्वन्यात्मक चमत्कार उच्च कोटि के हैं। राजसी प्रताप, राज-ऐश्वर्य, वीरता, युद्ध, सेना का अभियान, आतंक आदि के वर्णन इसलिए उत्कृष्ट प्रतीत होते हैं। केशव का इन वर्णनों का उत्साह भी बढ़ा-चढ़ा था और ऐसे वर्णनों की शास्रीय परम्परा भी समृद्ध मिलती है। केशव ने कठोर भावों के चित्रण में पर्याप्त कौशल का परिचय दिया है और उसमें उनको पर्याप्त सफलता भी मिली है। युद्ध प्रसंगों में वीर, रौद्र तथा भयानक रसों की समुचित व्यंजना केशव ने की है। कवि का इन भावों के साथ साक्षात सम्बन्ध था। यह सब एक राजकवि के लिए स्वाभाविक था।”रामचन्द्रिका’ में युद्ध-वर्णन दो अवसरों पर हुआ है : राम-रावण युद्ध के अवसर पर एवं राम की सेना के साथ लवकुश का युद्ध होने पर युद्ध वर्णन में प्रायः वीर, रौद्र तथा भयानक की त्रिवेणी रहती है। सबसे पहले हमें वीरों की वीरतापूर्ण उक्तियां गूंजती हुई मिलती हैं। मकराक्ष की गर्वोक्ति इस प्रकार है :
सु जौलौं जियौं हौं सदा दास तेरो ।
सिया को सकै दै सुनौ मन्त्र मेरो ।
हतौं राम स्यों बन्धु सुग्रीव मारौं ।
अजोध्याहि लै राजधानी सुधारौं ।।
जब इन योद्धाओं का परिचय कराया गया है तब केशव ने कुछ कठोर, महाप्राणयुक्त एवं दीर्घ पदों का प्रयोग करके दारुण रुप की जो व्यंजना की है, उससे एक रौद्र चित्रही प्रस्तुत हो जाता है। मेघनाद का परिचय चित्र इस प्रकार है:
कोदंड मंडित महारथवंत जो है ।
सिंहध्वजी समर-पंडितबृन्द मौहै ।
माहाबली प्रबल काल कराल नेता ।
सो मेघनाद सुरनायक जुद्ध-जेता ।।
जिस आजमयी वाणी में केशव ने राक्षसों की दारुणता का चित्रण किया है, उसी में राम 
का रौद्र रुप भी चित्रित किया गया है। राम की वीरतापूर्ण उक्ति इस प्रकार है :
करि आदित्य अदृष्ट नष्ट जम रौं अष्ट बसु ।
रुद्रन बोरि समुद्र करौं गंधर्ब सर्ब पसु ।
बलित अबेर कुबेर बलहि गहि देउं इंद्र अब ।
विद्याधरन अबिद्य करौं बिन सिद्धि सिद्ध सब।निजु होहि दासि दिति की अदिति, अनिल अनल मिटि जाइ जल ।
सुनि सूरज सूरज उवतहीं करौं असुर संसार बल ।।
इस छन्द में संयुक्त वणाç की योजना ने एक वातावरण प्रस्तुत कर दिया है। छप्पय छन्द भी वीरतापूर्ण उक्ति के उपयुक्त है।युद्ध का प्रत्यक्ष दर्शन लवकुश-युद्ध में होता है। योद्धाओं की परस्पर उक्तियों, उनके युद्ध-संचालन आदि का ओजपूर्ण वर्णन मिलता है। जब शत्रुघ्न ने लव पर बाण छोड़े तो उससे ऐसी उक्ति की :
रामबन्धु बान तीनि छोंड़ियों त्रिसूल से ।
भाल में बिसाल ताहि लागियो ते फूल से।
घात कीन्ह राज तात गात तें कि पूजियो ।
कौन सत्रु तैं हत्यो जु नाम सत्रुहा लियो ।।
लव ने कहा : “तुम मेरे ऊपर बाण चला रहे हो, या मेरे शरीर की पूजा कर रहे हो? तुमने कौन से शत्रु मारे हैं कि शत्रुघ्न नाम धारण किया है?” ये कटूक्तियां प्रतिवीर के हृदय को छेद देती हैं। जब विभीषण पर कटूक्तियां की जाती है तो वह तिलमिला जाता है:
आउ विभीषन तूं रनदूषन ।
एक तुंही कुल को निज भूषन ।
जूझ जुरें जो भगे भय जी के ।
सत्रुहि आनि मिले तु नीके ।।को जानै कै बार तू कही न ह्मवै है नाई ।
सोई तैं पत्नी करी सुनि पापिन के राइ ।।
अंगद पर भी एक करारी चोट की गई :
अंगद जौ तुम पै बल होती ।
तौ वह सूरज को सूत को तौ ।
देखत ही जननी जु तिहारी ।
वा संग सोवति ज्यों बर नारी ।।
इस प्रकार की उक्तियों में ओज, कटुता और व्यंग्य तीनों की झाँकियां हैं। इसके अनन्तर युद्ध की प्रत्यक्ष झाकियां मिलती हैं। लव-शत्रुघ्न युद्ध की एक झांकी इस प्रकार है :
रोष करि बान बहु भांति लव छांडियो ।
एक ध्वज, सूत जुग, तीन रथ खंडियो ।
सस्र दसरथ्थ सुत अस्र कर जो धरै ।
ताहि सियपुत्र तिल तूलसम संडरै ।।
इस प्रकार कुश के युद्ध की भी झांकियां मिलती हैं। लव का युद्ध लक्ष्मण से भी भयंकर हुआ। ऐसा युद्ध हुआ कि रक्त प्रवाहित होने लगा। केशव ने रक्त की नदी का सांगरुपक बनाया है:
ग्राह तुंग तुरंग कच्छप चारु चर्म बिसाल ।
चक्र से रथचक्र पैरत वृक्ष गृद्ध मराल ।
केकरे कर बाहु मीन, गयंद सुंड भुजंग ।
चीर चौर सुदेस केस सिवाल जानि सुरंग ।।
केवल युद्ध-क्षेत्र में ही नहीं, रौद्र रुपों की झांकी अन्यत्र भी मिलती है। परशुराम प्रसंग तथा रावण-सीता संवाद में परशुराम, राम एवं सीता के रौद्र रुप दर्शनीय हैं। सीता का रौद्र रुप पातिव्रत शक्ति से प्रोद्भासित है। एक भास्वर चित्र इस प्रकार है :
उठि उठि सठ ह्यां तें भागु तौलौं अभागे।
मम बचन बिसर्पी सपं जौलौं न लागे ।
बिकल सकुल देखौं आसु ही नास तेरो ।
निपट मृतक तोकों रोष मारै न मेरो ।।
 
भयानक भयानक रस वीररस का सहवर्ती होता है। यह वीरता या रौद्र का एक प्रकार से ज्ञापक रस है। इसके अवसर भी रामचन्द्रिका में कई आए हैं। मुख्य स्थल ये हैं : धनुभर्ंग, परशुराम का आगमन, लंका दहन आदि। धनुभर्ंग के अवसर पर समस्त जगत् आतंकित हो जाता है। भयानक रस की इससे अधिक व्याप्ति अत्यन्त उपयुक्त है :
प्रथम टंकारि झुकि झारि संसार-मद चन्डको दंड रह्यो मंडि नवखंड कों ।
चालि अचला अचल घालि दिगपालबल पालि रिषिराज के बचन परचंड कों ।
बांधि बर स्वर्ग कों साधि अपबर्ग धनु भंग को सब्द गयो भेदि ब्रह्मांड को ।।
इसी प्रकार परशुराम के आने पर सारे समाज में खलबली मच गई। मस्त हाथियों का मदचूर्ण हो गया, वे चिंघाड़ना भूल गए। वीर शस्रास्र फेंककर भाग खड़े हुए। कुछ ने कवचादि फेंक दिए और स्री-वेश धारण कर लिया। जब लंका-दहन हुआ तब राक्षस-नारियों की भयभीत अवस्था देखते ही बनती है। कोई इधर भागती है, कोई उधर। जिस ओर जाती है, आग की लपटें ही मिलती हैं। वे पानी-पानी चिल्लाने लगती हैं। इस प्रकार रौद्र की परिस्थिति में, भयानक की व्यंजना में केशव की कल्पना सफल हुई है।
 
बीभत्स युद्धक्षेत्रीय रक्त-सरि के वर्णन में कुछ बीभत्स का आभस भी मिलता है। अन्यत्र भी कुछ अवसरों पर बीभत्स की व्यंजना मिलती है। मेघनाद हनुमान को बन्दी बना लेता है। रावण मेघनाद को आज्ञा देता है कि इसको जितना ज्ञास दिया जा सके, उतना दो। यहां रौद्र का सहवर्ती होकर बीभत्स सूच्य रुप में आया है:
कोरि कोरि जातनानि फोरि फोरि मारिये ।
काटि काटि फारि बांटि बांटि मांसु डारिये ।
खाल खैंचि खैंचि हाड़ भूंजि भूंजि खाहु रे ।
पौरि टांगि रुंडमुंड लै उडाइ जाहु रे ।।
बीभत्स का युद्धक्षेत्रीय विवरण भी उल्लेखनीय है।
 
हास्य : व्यंग्य हास्य की परिस्थितियां भी रामचन्द्रिका में है। रौद्र-वीर की परिस्थिति में भयानक की व्यंजना कभी कभी हास्यास्पद हो जाती है। परशुराम के आने पर कुछ भयभीत राजाओं ने स्री वेश धारण कर लिया – “काटिकै तनत्रान एकह नारि भेषन सज्जहीं।” हास्य ओर व्यंग्य की एक मिश्रित परिस्थिति परशुराम की दर्पोक्ति में प्रकट होती है:
लक्ष्मन के पुरिषान कियो पुरुषारथ सो न कह्यो परई।
वेष बनाइ कियो बनितानि को देखत “केसव’ ह्यो हरई ।।
इसी प्रकार के कटु व्यंग्यों की सृष्टि लव-कुश संवाद में केशव ने की है।
 
शान्त “रामचन्द्रिका’ के भाव-विधान में शान्त रस का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अत्रि-पत्नी अनसूया के चित्र से ऐसा प्रकट होता है जैसे स्वयं ‘निर्वेद’ ही अवतरित हो गया हो। वृद्धा अनसूया के कांपते शरीर से ही निर्वेद के संदेश की कल्पना कवि कर लेता है:
कांपति शुभ ग्रीवा, सब अंग सींवां, देखत चित्त भुलाहीं ।
जनु अपने मन पति, यह उपदेशति, या जग में कछु नाहीं ।।
अंगद-रावण में शान्त की सोद्देश्य योजना है। अंगद रावण को कुपथ से विमुख करने के लिए एक वैराग्यपूर्ण उक्ति कहता है। अन्त में वह कहता है – “चेति रे चेति अजौं चित्त अन्तर अन्तक लोक अकेलोई जै है।” यह वैराग्य पूर्ण चेतावनी सुन्दर बन पड़ी है।उपर्यक्त विवेचन से निष्कर्ष निकलता है कि आचार्य केशव का रसों पर पूर्ण अधिकार था। उनकी कृतियों में रसों का पूर्ण परिपाक पाया जाता है। हिन्दी के कुछ गण्य-मान्य कवियों की भांति उन्होंने किसी रस-विशेष को लेकर कविता नहीं की, अपितु अपनी रचनाओं में सभी रसों का समावेश किया है। तथापि सर्वाधिक अवसर श्रृंगार को मिला है। रस-व्यंजना में उन्होंने स्वाभाविक, सजीव एवं आकर्षक चित्र अंकित किए हैं। उदाहरणों में जो सरसता और हृदयहारिता है वह कवि के हृदय की पूर्ण परिचायिका है। ऐसे कवि को कुछ उद्धरणों के आधार पर हृदयहीन कहना उस कवि के साथ अन्याय करना है।
 
संवादसौष्ठव रामचन्द्रिका के प्रमुख संवाद ये हैं:
रावण-बाणासुर संवाद
रावण-हनुमान संवाद
राम-परशुराम संवाद
रावण-अंगद संवाद
परशुराम-वामदेव संवाद
सीता-रावण संवाद
कैकेयी-भरत संवाद
लवकुश-विभीषण संवाद
इन प्रमुख संवादों के अतिरिक्त और भी कुछ संवाद चन्द्रिका में आये है : दशरथ-विश्वामित्र संवाद, सुमति-विमति संवाद, विश्वामित्र-जनक संवाद, सूपंणखा-राम संवाद आदि। इन संवादों का रामचन्द्रिका के शिल्प और चरित्र चित्रण में विशेष महत्त्व है।

 

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