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Archive for the ‘प्रेमचंद’ Category

जन्म-प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर समही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।

 

जीवन परिस्थितियाँ-धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।

 

शादी-आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, “उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।…….” उसके साथ – साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है “पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।” हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।

 

शिक्षा-अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने – जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।

 

साहित्यिक रुचि-गरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो – तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला। आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद “तिलस्मे – होशरुबा” पढ़ डाली।अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी – बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ – साथ रहा।
 

 

प्रेमचन्द की दूसरी शादी-सन् १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।

 

व्यक्तित्व-सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा “हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात् – पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास 
कह गए हैं, “तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।” कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं “कि जाड़े के दिनों में चालीस – चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।”प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।

 

ईश्वर के प्रति आस्था-जीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे – धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा “तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो – जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।”मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था – “जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।”

 

प्रेमचन्द की कृतियाँ-प्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् १८९४ ई० में “होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात” नामक नाटक की रचना की। सन् १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय “रुठी रानी” नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन् १९०४-०५ में “हम खुर्मा व हम सवाब” नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया। जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।”सेवा सदन”, “मिल मजदूर” तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए “महाजनी सभ्यता” नाम से एक लेख भी लिखा था।
 

 

मृत्यू-सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने “प्रगतिशील लेखक संघ” की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।
 

प्रेमचन्द का लेखन और विभिन्न विषय

प्रेमचन्द ने अपने कथा – साहित्य में ऐसे अनेक विषयों को प्रस्तुत किया है जिनका सम्बन्ध आम जनता से दिखता है। आपके लेखन में प्रगतिशील चिन्तन व्यापक रुप से पाया जाता है। कुछ विषयों का संक्षिप्त विवरण :
सामाजिकता-प्रेमचन्द ने अपने कथा – साहित्य में सामाजिकता पर विशेष जोर दिया। आपने अपनी कृतियों के द्वारा समाज के दबे कुचले लोगों की समस्याओं पर प्रकाश डाला। इस क्षेत्र में आप प्रगतिशील लेखकों के उस्ताद माने जाते हैं। वह जिन्दगी भर ऐसे बहुत से राह-भटकों को रास्ता दिखाते रहे। आपके ख्याल में समाज में आर्थिक समानता होनी चाहिए। सदा दापने पूंजीवादी व्यवस्था की घोर निन्दा करते रहे। उनका मानना यह भी था कि प्रत्येक को श्रम करना चाहिए। आपने अपनी कृतियों द्वारा वर्ण – व्यवस्था की कड़ी निन्दा की है। उन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी त्याग, तप और संयम के साथ बितायी। उन्होंने सामाजिक दायित्वों को सफलतापूर्वक निभाया।
 

 

प्रेमचन्द और मानवतावाद-प्रेमचन्द एक महान दार्शनिक भी थे। उन्होंने अपने समय के सभी धर्मों को अपनी निगाह से परखा था और अन्ततः वे इस फैसले पर पहुंचे थे कि आज धर्म के नाम पर जो कुछ लोग कर रहे हैं वह सब केवल अंधविश्वास है। वह लिखते हैं – “जिस समाज पर एक करोड़ कौतल मूसलचंदों के भरण पोषण का भार हो वह न कंगाल रहे तो दूसरा कौर रहे ………. उसने असली धर्म को छोड़कर, जिसका मूलतत्व समाज की उपयोगिता है, धर्म के ढोंग को धर्म मान लिया है। जबतक वह धर्म का असली रुप ग्रहण न करेगा उसके उद्धार की आशा नहीं” नाममात्र के धर्म को मानने वालों के व्यवहार से तंग आकर उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की परम्परा में मानवधर्म की स्थापना की। उनका मानना था कि वही धर्म सर्वमान्य है जिसमें मानवता की बात कही गयी हो। मैं उसी धर्म का दास हूं जिसमें मानवता को प्रधानता दी गयी है। वह ऐसे देवता, नबी या पैगम्बर को दूर से ही सलाम करते हैं जो मानवता के विरुद्ध कुछ कहता है। कभी इस्लाम का कायल होने वाले प्रेमचन्द बाद में इस बात रुठ गये कि इस्लाम में भी मानवता सिर्फ इस्लाम तक ही सीमित है। उनका मानना था कि इस्लाम भी अन्य धर्मों की तरह गुटबंद है। उन्होंने सभी धर्मों की कमजोरी को देखकर समझकर एक ऐसे धर्म को अपना आदर्श बनाया था जो लोक सेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान, नेकनियति, शरीर और मन की पवित्रता आदि गुणों पर टिका हो।
 

 

बाल – विवाह-प्रेमचन्द ने तत्कालीन समाज में व्याप्त इस कुप्रथा को सामाजिक विष कहा है। इसकी निन्दा के लिए कई कहानियों की रचना की। सुभागी, लांछन (मानसरोबर-१) उन्माद (मानसरोवर – २) तथा नैराश्य लीला (मानसरोवर – ३) आदि कहानियों में बाल – विवाह के दुष्परिणामों पर उन्होंने छींटें कसे हैं। इन कहानियों में उन्होंने ऐसे कई चरित्र प्रस्तुत किये हैं जैसे सुभागी ग्यारह साल की उम्र में ही विधवा हो जाती है और नैराश्य लीला की कैलासकुमारी अभी गौना भी नहीं होता है कि वह विधवा हो जाती है। इसके बारे में उन्होंने एक जगह लिखा है कि “पाँच साल के दुल्हे तुम्हें भारत के सिवा और कहीं देखने को नहीं मिलेंगे।”
 

 

विधवाविवाह-प्रेमचन्द के ख्याल से विधवा विवाह समाज के लिए एक अच्छा कारनामा था। इससे सामाजिक बुराईयों को मिटाया जा सकता था। वह कहते थे कि विधवा विवाह समाज के लिए आदर्श है। उनके शब्दों में मैंने एक बोया हुआ खेत लिया तो क्या उसकी फसल को इसलिए छोड़ दूँगा कि उसे किसी दूसरे ने बोया था। वह मानते थे कि वह व्यक्ति जो विधवा से विवाह 
करता है और पति के दायित्वों को जिम्मेदारी समझकर निभाता है वो समाज के लिए आदर्श है।
 

 

नारी : राजनीतिक चेतना-प्रेमचन्द ने बहुत कहानियां ऐसी लिखी जिनका सम्बन्ध राजनीतिक चेतना से है। इनमें कुछ निम्नलिखित हैं : माँ, अनुभव, तावान, कुत्सा, डामुल का कैदी (मानसरोवर – २), माता का हृदय, धिक्कार, लैला (मानसरोवर – ३), सती, (मानसरोवर – ५), राजा हरदोल, रानी सारंधा, जुगनू की चमक (मानसरोवर – ६), जेल, पत्नी से पति शराब की दुकान, समरयात्रा, सुहाग की साड़ी(मानसरोवर – ७), आहुति तथा होली का उपहार (कफन), सती राजा हादौल, रानी सारंधा, विक्रमादित्य का तेगा लेला आदि कहानियों के माध्यम से इतिहास की छाया में भारत इतिहास प्रसिद्ध नारियों के चरित्र उभारकर प्रेमचन्द ने नारी – जाति में राष्ट्रीय चेतना उभारने का विशेष प्रयास किया है। ‘सती’ कहानी एक ऐसी कहानी है जिसे नारी जाति में राष्ट्रीय चेतना जगाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी माना गया है। गाँधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में नारियों के सहयोग और जवान युवक – युवतियों के मन तरंगित हो रही राजनीतिक चेतना के अनुभव को प्रेमचन्द ने अपनी कहानी में प्रस्तुत किया है।
 

 

नारी शिक्षा-नारी शिक्षा की दिशा में प्रेमचन्द की अवधारणा यह थी कि स्रियों को शिक्षित किया जाय और उनको वह सभी अधिकार दिये जायें जो पुरुषों को प्राप्त हैं। अधिकार दिये जाने के साथ – साथ उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें ऐसी कोई पाश्चात्य पद्धति में न जाने दिया जाए जिससे वह विलास बन जाए और अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए। उन्होंने विलासिता को बुरा नहीं कहा बल्कि राजनीतिक दृष्टि से पराधीन तथा आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हुए भारत के युवकों और युवतियों का अपने देश और समाज की स्थिति को भूलकर अंग्रेजी पद्धति की नकल करना प्रेमचन्द को क्षुब्ध करता था।
 

 

पुरुषनारी समानता-आपकी कहानी ‘शान्ति’, ‘झांकी’, ‘शिकार (मानसरोवर न० १), कुसुम, ‘जीवन का शाप’, ‘गृह – नीति’ (मानसरोवर न० २), लाछन (मानसरोवर – ५), तथा रहस्य कहानियाँ ऐसी हैं जहाँ वे पुरुष की भांति नारी की भी स्वतंत्रता चाहते हैं। उनका मानना था कि अगर पुरुष नारी का गुलाम नहीं है तो वह भी पुरुष की लौंडी नहीं है। और अगर पुरुष उसका गुलाम है तो नारी भी उसकी लौंडी है। दोनों बराबर है।
 

 

छुआछूत और प्रेमचन्द-छुआछूत के बारे में गाँधी जी ने कहा था, “अस्पृश्यता हिन्दू धर्म का अंग नहीं है, बल्कि उसमें घुसी हुई सड़न है, बहम है, पाप है, और उसको दूर करना एक – एक हिन्दू का धर्म है, उसका परम कर्तव्य है।गाँधी जी सभी वर्गों के समर्थन के चक्कर में छुआछूत की लड़ाई से भटक गए। लेकिन प्रेमचन्द ने गाँधीजी से प्रेरणा लेकर इस लड़ाई में कूदे थे अतः अंततः निन्दा करते रहे। गाँधीजी के खिलाफ जन्मों से नहीं बल्कि कर्मों के आधार पर जाति को माना। प्रेमचन्द इस मामले में गाँधी जी से आगे थे।

 

 
धार्मिक सहिष्णुता एवं गाँधीजी-प्रेमचन्द कहते हैं – “मैं एक इन्सान हूँ और जो इन्सानियत रखता हो, इन्सान का काम करता है, मैं वही हूँ और ऐसे ही लोगों को चाहता हूँ। प्रेमचन्द साम्प्रदायिकता को ऐसा पाप मानते हैं जिसका कोई प्रायश्चित नहीं। अतः व्यक्तिगत रुप से वे इस कम्यूनल प्रोपगंडा का गोरों का गोरों से मुकाबला करने के लिए तैयार थे। इस सम्बन्ध में प्रेमचन्द की दृष्टि पूर्ण वैज्ञानिक रही है। वे कहते हैं कि मैं उस धर्म को कभी स्वीकार नहीं करना चाहता जो मुझे यह सिखाता हो कि इन्सानियत, हमदर्दी और भाईचारा सब-कुछ अपने ही धर्म वालों के लिए है और उस दायरे के बाहर जितने लोग हैं सभी गैर हैं, और उन्हें जिन्दा रहने का कोई हक नहीं, तो मै उस धर्म से अलग होकर विधर्मी होना ज्यादा पसंद कर्रूंगा। प्रेमचन्द का मानना था कि साम्प्रदायिक झगड़ा ज्यादातर मामलों में राजनीतिक हित साधने के लिए राजनीतिक पार्टियाँ करती हैं। वह छोटे – छोटे झगड़ों को बड़ा रुप देकर बड़ा बना देंगे और अपना उल्लू सीधा करते हैं।
 

 

साम्प्रदायिकता और प्रेमचन्द-प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए अपनी अनेक कहानियों में साम्प्रदायिक झगड़े की बुराई और परिणामों का उल्लेख किया। मुक्तिधन, क्षमा, (मानसरोवर-३) स्मृतिका, पुजारी (मानसरोवर-४) मंत्र हिंसा परमो धर्म (मानसरोवर-५) जिहाद (मानसरोवर-७) ब्रह्म का स्वांग तथा खून सफेद (मानसरोवर-८) ये ऐसी कहानियां हैं जिसके माध्यम से प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक वैषम्य के स्वर को दूरदराज तक पहुंचाने की कोशिश की है। ‘मंत्र’ कहानी में उन्होंने एक ऐतिहासिक घटना को माध्यम बनाया कि जब १९२०-२२ ई० में हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित हुई तो चारों तरफ लोग खुश हो गए। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक न रह सकी क्योंकि इसको भंग करने की साजिश ब्रिटिश शासकों के द्वारा होने लगी वह भंग भी कर दिया गया। ‘मुक्तिधन’ रहमान के द्वारा गाय के प्रति प्रेम दिखाकर हिन्दू-मुस्लिम सोहार्द बनाए रखने का प्रयास किया गया है।हिंसा परोधर्मः के माध्यम से धर्म के नाम पर सारे देश में फैली ऐसी अराजकता को प्रस्तुत किया है जिसके सुनने या पढ़ने से दिल तार-तार होने लगता है। वे कहते हैं कि सत्य, अहिंसा, प्रेम तथा न्याय धर्म से गायब होने लगे थे। हर तरफ असत्य, हिंसा और द्वेष ही छा गया था। इन सब का कारण वह ब्राह्मणों और मौलवियों को मानते थे। उनके ख्याल से ऐसे लोगों ने अपने स्वार्थ को साधने के लिए धर्म का प्रयोग शुरु कर दिया है। वह मानते थे कि सभी धर्म को तिलांजली देकर मानव-धर्म को अपनाया जाए। जिसमें प्रेम, अहिंसा और एक दूसरे के दुख-दर्द को समझने और बांटने का पूरा अवसर हो। उनका कहना था कि उस मजहब या धर्म के सामने माथा झुकाने से क्या लाभ मिलेगा जिस धर्म में निष्क्रियता ने घर कर लिया हो जो धर्म केवल अपने को ही जीना सिखाता हो।

इस महान साहित्यकार ने सदा मानव धर्म को ही शीर्षस्थ स्थान प्रदान किया। उनके अनुसार इस धर्म के अंतर्गत मनुष्य का मनुष्य रहना अनिवार्य है। परोपकार के लिए कुछ त्याग भी करना पड़े तो वह आत्मा की हत्या नहीं है। प्रेमचन्द के जीवनदर्शन का मूलतत्व मानवतावाद है। वह मानवतावाद को सबसे पहले मानते थे। वही मानवता वाद जो मनुष्य की तरफदारी करने वाला हो।

 

प्रेमचन्द द्वारा रुढ़ीवाद का विरोध

जिस समय प्रेमचन्द का जन्म हुआ वह युग सामाजिक – धार्मिक रुढ़ीवाद से भरा हुआ था। इस रुढ़ीवाद से स्वयं प्रेमचन्द भी प्रभावित हुए। जब आपने कथा-साहित्य का सफर शुरु किया अनेकों प्रकार के रुढ़ीवाद से ग्रस्त समाज को यथा शक्ति कला के शस्र से मुक्त कराने का संकल्प लिया। अपनी कहानी के बालक के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि “मैं निरर्थक रुढियों और व्यर्थ के बन्धनों का दास नहीं हूँ।”
 
समाज में व्यप्त रुढियाँ-सामाजिक रुढियों के संदर्भ में प्रेमचन्द ने वैवाहिक रुढियों जैसे अनमेल विवाह, बहुविवाह, अभिभावकों द्वारा आयोजित विवाह, पुनर्विवाह, दहेज प्रथा, विधवा विवाह, पर्दाप्रथा, बाल विवाह, वृद्धविवाह, पतिव्रत धर्म तथावारंगना वृद्धि के संबंध में बड़ी संवेदना और सचेतना के साथ लिखा है।तत्कालीन समाज में यह बात घर कर गई थी कि तीन पुत्रों के बाद जन्म लेने वाली पुत्री अपशकुन होती है। उन्होंने इस रुढि का अपनी कहानी ‘तेंतर’ के माध्यम से कड़ा विरोध किया है। होली के अवसर पर पाये जाने वाली रुढि की निन्दा करते हुए वह कहते हैं कि अगर पीने – पिलाने के बावजूद होली एक पवित्र त्योहार है तो चोरी और रिश्वतखोरी को भी पवित्र मानना चाहिए। उनके अनुसार त्योहारों का मतलब है अपने भाइयों से प्रेम और सहानुभूति करना ही है। आर्थिक जटिलताओं के बावजूद आतिथ्य – सत्कार को मयार्दा एवं प्रतिष्ठा का प्रश्न मान लेने जैसे रुढि की भी उन्होंने निन्दा की है।
 

 

धार्मिक रुढियाँ-प्रेमचन्द महान साहित्यकार के साथ – साथ एक महान दार्शनिक भी थे प्रेमचन्द की दार्शनिक निगाहों ने धर्म की आड़ में लोगों का शोषण करने वालों को अच्छी तरह भाँप लिया था। वह उनके वाह्य विधि – विधानों एवं आंतरिक अशुद्धियों को पहचान चुके थे। इन सब को परख कर प्रेमचन्द से प्रण ले लिया था कि वह धार्मिक रुढिवादिता को खत्म करने का प्रयास करेंगे। वह मानते थे कि धार्मिक रुढियों का कारण ब्राह्मण और मंदिर हैं। उन्होंने यहीं से अपना अभियान शुरु किया। इसके लिए कई कहानियाँ लिखी गई। जैसे – रामलीला, निमंत्रण, हिंसा परमो धर्मः (मानसरोवर-५) मनुष्य का परम धर्म – गुरुमंत्र, बाबाजी का भोग तथा पंडित मोटेराम की डायरी। पंडित मोटेराम की डायरी का एक अंश प्रस्तुत है: -“क्या नाम है कि मैं पंडित मोटेराम …….. बात करने में मैं पक्का फिकेत हूँ। बस यही समझलो कि कोई निमन्त्रण भर दे दे, फिर मैं अपनी बातों से ऐसा ज्ञान घोलता हूँ, वेद – शास्रों की ऐसी व्याख्या करता हूँ कि क्या मजाल कोई यजमान उल्लू न हो जाय। योगासन, हस्तरेखा, सन्तान शास्र, वशीकरण आदि सभी विधाएं जिन पर सेठ महाजनों का पक्का विश्वास है, मेरी जिह्मवा पर है। अगर पूछो कि क्यों पंडित मोटेराम शास्री, आपने इन विधाओं को पढ़ा भी है? मैं डंके की चोट के साथ कहता हूँ कि मैंने कभी नहीं पढ़ा। इन विधाओं का क्या रोना हमने कभी विद्या नहीं पढ़ी है। पूरे लंठ हैं, निरक्षर महान, लेकिन फिर भी किसी बड़े से बड़े पुस्तक – चाटू, शास्रघोटूँ पंडित का सामना करा दो, चपेट न दूँ तो मेरा नाम मोटेराम नहीं। ऐसा रऐटूं कि पंडित जी को भागने का भी रास्ता न मिले। पाठक कहेंगे यह असंभव है कि एक पूर्ख आदमी महान पंडित कैसे खोदेगा। मैं कहता हूँ प्रियवर, पुस्तक चाटने से कोई विद्वान नहीं हो जाता है। जो विद्वान आज इस युग में श्राद्ध, पिण्डदान और वर्णाश्रम में विश्वास रखता है, जो आज गोबर और गोमूत्र को पवित्र समझता है, जो देवपूजा को मुक्ति का साधन समझता है, वह विद्वान कैसे हो सकता है। मैं खुद यजमानों से यह सब कृत्य करवाता हूँ। नि:संदेह जानता हूँ, हलवा और कलाकन्द किसी आत्मा के पेट में नहीं, मेरे पेट में जाता है फिर भी यजमानों को मुड़ता हूँ। क्योंकि यह मेरी जीविका है। यजमान स्वयं बेवकूफ बनते हैं पाँच पैसे का गऊदान करके भवसागर पार उतरना चाहता है। उसे मैं कैसे मना करुँ कि यह उनके लिए मि है।”

प्रस्तुत आत्मकथा से ब्राह्मणों के गादड़ चिट्ठा खुलकर सामने आ गए हों और इससे धार्मिक रुढियों को भी आघात पहुंचाया है। तत्कालीन समाज में व्याप्त रुढि मृतक भोज पर प्रेमचन्द कह गये हैं कि यह कैसी परम्परा है कि मरने के बाद परिवार के बचे हुए लोग मृतक भोज करवायें। जबकि जाने वाला अपने पीछे फूटी कौड़ी भी नहीं छोड़ कर गया है। परिवार में इतना पैसा नहीं है कि वह अपने बच्चों को पालन-पोषण के साथ-साथ पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा कर सके। 

बिरादरी के सरगने विधवा पत्नी के पास बचे आभूषण और मकान के बलबूते पर ही सही मगर वह मृतक के परिवार से हर हाल में मृतक भोज चाहते हैं क्योंकि यह उनके नाक के कट जाने जैसा है। सरगने की बात मानकर या दबाव में आकर बेचारा परिवार मृतक भोज देने के लिए तैयार हो जाता है और सालों तक कर्ज में डूबा रहता है। यह धार्मिक रुढ़ी धर्म की आड़ में ही हुआ करती है।

प्रेमचन्द जैसा महान साहित्यकार एवं दार्शनिक यह मानता है कि नेकी और बदी की सबसे बड़ी पहचान व्यक्ति का अपना दिल है। दिल जिस काम को बुरा कहता हो वह काम हर हाल में बुरा है और जिस काम को अच्छा कह दे वह काम हर हाल में अच्छा है। 

प्रेमचन्द स्वर्ग – नरक के बारे में कहते हैं कि स्वर्ग – नरक की चिंता में वह लोग रहते हैं जो अपाहिज, कर्त्तव्यहीन एवं निर्जीव होते हैं। मनुष्य का स्वर्ग – नरक सब इसी पृथ्वी पर है। उनके अनुसार पुनर्जन्म गोरखधंधा तथा धोखे में डालने वाला है।

शोषण

प्रेमचन्द और शोषण का बहुत पुराना रिश्ता माना जा सकता है। क्योंकि बचपन से ही शोषण के शिकार रहे प्रेमचन्द इससे अच्दी तरह वाकिफ हो गए थे। समाज में सदा वर्गवाद व्याप्त रहा है। समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को किसी न किसी वर्ग से जुड़ना ही होगा।प्रेमचन्द ने वर्गवाद के खिलाफ लिखने के लिए ही सरकारी पद से त्यागपत्र दे दिया। वह इससे सम्बन्धित बातों को उन्मुख होकर लिखना चाहते थे। उनके मुताबिक वर्तमान युग न तो धर्म का है और न ही मोक्ष का। अर्थ ही इसका प्राण बनता जा रहा है। आवश्यकता के अनुसार अर्थोपार्जन सबके लिए अनिवार्य होता जा रहा है। इसके बिना जिन्दा रहना सर्वथा असंभव है। वह कहते हैं कि समाज में जिन्दा रहने में जितनी कठिनाइयों का सामना लोग करेंगे उतना ही वहाँ गुनाह होगा। अगर समाज में लोग खुशहाल होंगे तो समाज में अच्छाई ज्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा। प्रेमचन्द ने शोषितवर्ग के लोगों को उठाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने आवाज लगाई “ए लोगों जब तुम्हें संसार में रहना है तो जिन्दों की तरह रहो, मुर्दों की तरह जिन्दा रहने से क्या फायदा।”प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों में शोषक – समाज के विभिन्न वर्गों की करतूतों व हथकण्डों का पर्दाफाश किया है। ये निम्नलिखित हैं: — ग्राम एवं नगर के महाजन
– सामंतवाद के प्रतिनिधि – जमींदार
– पूँजीवाद के प्रतिनिधि – उद्योगपति
– सरकारी अर्धसरकारी अफसर

प्रेमचन्द ने अपनी कहानियाँ नशा, पूस की रात (मानसरोवर-१), पछतावा (मानसरोवर-६), जेल, (मानसरोवर-७) बेटी का धन, बलिदान, विध्वंस तथा उपदेश (मानसरोवर-८) ‘नशा’ कहानी में जमींदार को हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्ष की चोटी पर फूलने वाला बुंआ कहा है और यह कहा है कि ईश्वर ने असामियों को इनका काम करने और सेवा करने के लिए ही पैदा किया है। ‘पूस की रात’ का ‘हलकू’ उस किसान का प्रतीक है जो सबको खिलाता और पहनाता है मगर स्वयं रात में जाड़े में नंगे ठिठुरने पर मजबूर है। मजदूरी करके हलकू अपनी माल गुजारी भरता है। इस प्रकार के बहुत से किसान हैं जो मजदूरी करके मालगुजारी भरा करते हैं। उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खाता है। हर कोई अपने-अपने वर्ग के लिए मरता है।

प्रेमचन्द के कहानी साहित्य में राष्ट्रीयता का स्वर सबसे ज्यादा मुखर है। उस युग के स्वतंत्रता आंदोलन ने ही प्रेमचन्द जैसे संवेदनशील कलाकारों में राष्ट्रीयता जैसा प्रबल भाव डाला था। प्रेमचन्द गाँधी जी से बहुत प्रभावित हुए थे और राष्ट्रीयता के क्षेत्र में उन्हें अपना आदर्श मानकर चले थे। माँ, अनमन, दालान (मानसरोवर-१) कुत्सा, डामुल का कैदी (मानसरोवर-२) माता का हृदय, धिक्कार, लैला (मानसरोवर-३) सती (मानसरोवर-५) जेल, पत्नी से पति, शराब की दुकान जलूस, होली का उपहार कफन, समर यात्रा सुहाग की साड़ी (मानसरोवर-७) तथा आहुति इत्यादि वे कहानियाँ हैं जिनमें राष्ट्रीयता के विष्य को प्रमुखता से डाला गया है। 

इन कहानियों ने प्रेमचन्द ने एक इतिहासकार की भांति राष्ट्रीय आंदोलन के चित्र खींचे हैं। गाँधी जी से प्रेमचन्द काफी प्रभावित थे। उन्होंने विश्वास जैसी कहानी के माध्यम से गाँधी जी के आदर्शों को लोगों के सामने प्रस्तुत किया।

प्रेमचन्द के मानस में भारतीय संस्कार अपेक्षाकृत अधिक प्रबल थे। विदेशी सभ्यता, संस्कृति आचरण एवं शिक्षा के प्रति उनकी आस्था दुर्बल थी। प्रेमचन्द को अपने देश और यहाँ की चीजों से अथाह प्रेम था।

 

इधर हिन्दी में नारी-विमर्श की बडी चर्चा है। इस चर्चा में पुरुष और नारी दोनों शामिल हैं। कुछ पत्रिकाओं के सम्पादकों ने तो जैसे युग-युग से बन्दी नारी की मुक्ति का ही आन्दोलन शुरू कर दिया है तथा ?हंस? जैसी पत्रिकाएँ तो नारी के बलात्कार और नारी की यौन-मुक्ति की कहानियों को ही पुरस्कृत तथा प्रकाशित करने का निर्णय कर चुकी हैं। हिन्दी के ऐसे लेखकों तथा सम्पादकों का ऐसा ही नारी-विमर्श है जो नारी को उसके शरीर का स्वामी मानते हुए उसे अपने शरीर को किसी भी प्रकार से भोगने की स्वतंत्रता देता है। हंस के सम्पादक तथा जनवादी चेतना के मसीहा राजेन्द्र यादव यही बात कहते हैं, ??उसे (स्त्री को) भी सत्ता में हिस्सा चाहिए था और उसके पास हथियार के रूप में सिर्फ उसकी देह थी, चूँकि देह उसकी थी, इसलिए वह उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतन्त्र थी – वह फिल्मों में, राजनीति में, उद्योग में, सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में देह की कीमत वसूल रही थी – वह पुरुषों के खेल में अपनी मर्जी से शामिल हो गयी थी और उन नियमों के हिसाब से खेल रही थी।??१ यह अमेरिकन समाज का सत्य है जहाँ तेरह-चौदह वर्ष की किशोरियाँ एक नहीं अनेक से यौन- सम्बन्ध रखने के लिए स्वतन्त्र हैं और उसे वे नारी-मुक्ति का द्वार मानती हैं। हमारे जनवादी चेतना के सम्पादक उसी नारी-विमर्श को साहित्य और समाज में ला रहे हैं। ये लेखक पुरुष सत्तात्मक समाज और सामंती व्यवस्था म नारी के शोषण और दासता के इतिहास के वर्णन में जिस नारी-निष्ठा का प्रदर्शन करते हैं, तथा नारी-मुक्ति का ढोल पीटते हैं, ऐसे लेखक नारी को खुद भोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझते।
राजेन्द्र यादव ने ?हासिल? शीर्षक से एक आत्मकथात्मक कहानी लिखी जो ?हंस? के अगस्त-सित. १९९७ के अंक में छपी थी । इस कहानी का नायक (जो लेखक की आयु का ही है) नारी को भोग की वस्तु मानते हुए समाज की नैतिक मर्यादाओं तथा यौन शुचिता को चुनौती देते हुए कहता है – ??नारी क्या है ? सिर्फ एक बहता हुआ सोता । उसे तो बहना ही है, अगर आप कुछ मिनट उसके किनारे अपनी थकान मिटा लेते हैं, दो घूँट पानी पीकर, अगली लम्बी यात्राओं पर निकल पडने के लिए तरोताजा हो जाते हैं, तो इसमें बुराई क्या है ? नहीं, न इसमें कुछ गलत है, न अनैतिक ….. भाड में गयी नैतिक मर्यादाएँ और शील सच्चरित्रा। यह हमारा सारा लेखन इन्हीं बन्धनों के खिलाफ ही तो विद्रोह है।??२ यह आत्म-स्वीकृति जनवादी चेतना के पुरोधा लेखक की है जो अमेरिकन नारी की देह-मुक्ति तथा यौन-स्वच्छंदता को अपने साहित्य और समाज में लाने के लिए विद्रोह तक करने को तत्पर है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि राजेन्द्र यादव स्वयं ऐसे पुरुष-सत्तात्मक परिवार के स्वामी हैं जिसे वे हर प्रकार की गालियाँ देते हैं लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी पत्नी को घर छोडने को विवश कर दिया।
प्रेमचंद की नारी की यौन-शुचिता के विवेचन के लिए मुझे इस प्रसंग को तथा नारी-विमर्श के इस पश्चिमी उन्माद को पृष्ठभूमि के रूप में देना उचित प्रतीत हुआ। नारी-विमर्श में नारी के अधिकारों, उसकी मुक्ति एवं स्वतंत्रता के प्रश्न में उसकी यौन-शुचिता का सवाल बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। अतः प्रेमचंद के इस सम्बन्ध में विचारों को जानने से पहले यह आवश्यक था कि यह स्पष्ट हो कि आज के नारी-विमर्श के मसीहा किस प्रकार उसकी यौन-शुचिता को नष्ट करने तथा शरीर के मुक्त उपभोग में ही नारी-मुक्ति का दिवा-स्वप्न देख रहे हैं। भू-मंडलीकरण के इस दौर में नारी एक वस्तु बन गयी है और उसका शरीर केन्द्र में आ गया है। वह स्वयं नग्न प्रदर्शन तथा यौन व्यापारों का स्वेच्छा से अंग बन रही है और नारी को भोग्या बनाने वाले पुरुषों ने तो उसकी यौन-शुचिता का मजाक उडाते हुए इस परम्परागत मूर्खता से मुक्त करने का जैसे आन्दोलन ही शुरू कर दिया है। नारी को इस प्रकार यौन-शुचिता की जडता तथा यौन-पवित्रता की मूर्खता से मुक्त करने के मूल में विवाह तथा घर-परिवार की परम्परागत संस्थाओं को भी तोडने का षड्यन्त्र चल रहा है। असल में भारतीय नारी जब तक एक पुरुष के प्रति निष्ठावान है तथा घर-परिवार की रचना में मग्न है, तब तक यौन-मुक्ति सम्भव नहीं है। इसी कारण पश्चिमी देशों में विवाह संस्था नष्ट हो रही है और घर-परिवार का स्वरूप भी एकदम बदल रहा है। नर और नारी की परस्पर पूरकता, समर्पण और विश्वास नष्ट हो रहा है तथा समाज तलाक, यौन अपराधों, समलैंगिकता तथा एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के जाल में फँसता जा रहा है।
भारत में उन्नीसवीं शताब्दी में राजा राममोहन राय के द्वारा जो नवजागरण आरम्भ हुआ उसमें नारी-जागरण भी एक महत्त्वपूर्ण अंग था। उन्होंने सन् १८२९ में सती प्रथा के निषेध का कानून बनवाकर नारी के उत्थान के इतिहास का आरम्भ किया। इसके उपरान्त ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, देवेन्द्रनाथ टैगोर, केशवचन्द्र सेन, ब्रह्म समाज, आर्य समाज, विवेकानन्द आदि ने उन्नीसवीं शताब्दी में नारी जागरण की बुनियाद रख दी। स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय नारी की शिक्षा, बौद्धिक विकास, मातृत्व तथा सतीत्व पर बल देकर नारी की स्वतन्त्रता और उसके उद्धार को ठोस आधार दिया। स्वामी विवेकानन्द ने नारी की स्वाधीनता और उसके सतीत्व को नारीत्व मानते हुए कहा, ??आदर्श स्त्रीत्व का अर्थ पूर्ण स्वाधीनता है। सतीत्व आधुनिक हिन्दू नारी के जीवन की केन्द्रीय भावना है। पत्नी एक वृत्त का केन्द्र है जिसका स्थायित्व उसके सतीत्व पर निर्भर है।३ गगग (वह) विवाहित हो या कुमारी, जीवन की हर अवस्था में, अपने सतीत्व से तिल-भर भी डिगने की अपेक्षा, जीवन की निडर होकर आहुति दे दे।??४ विवेकानन्द केवल नारी की ही नहीं पुरुष की भी यौन-पवित्रता चाहते हैं। वे पवित्रता को स्त्री और पुरुष दोनों का सर्वप्रथम धर्म कहते हैं और चाहते हैं कि स्त्री अपने पति को छोडकर शेष पुरुषों को पुत्रवत् तथा पुरुष अपनी पत्नी को छोडकर सभी को माता, बहन तथा पुत्री के समान देखे। ऐसी पवित्रता और सतीत्व ही मनुष्य के पाशविक भावों को नष्ट कर सकता है।५ बीसवीं शताब्दी के नारी जागरण तथा महात्मा गाँधी एवं प्रेमचंद जैसे राष्ट्र- नायकों ने विवेकानन्द के इस यौन-शुचिता के दर्शन को अपनाया और नारी की शिक्षा, बन्धनों से मुक्ति तथा उसके अधिकारों एवं उसकी स्वाधीनता के आन्दोलन में उसके सतीत्व और यौन-पवित्रता के भारतीय आदर्श को आधुनिक स्त्री के रूप में उसे रूपान्तरित करने में अनिवार्य रूप से स्वीकार किया। प्रेमचंद के नारी के आदर्श में त्याग और सेवा के साथ पवित्रता भी उसका अंग है। उन्होंने इन्द्रनाथ मदान को ७ सितम्बर, १९३४ को अपने पत्र में लिखा था, ??स्त्री का मेरा आदर्श त्याग है, सेवा है, पवित्रता है, सब कुछ एक से मिला-जुला त्याग जिसका अन्त नहीं, सेवा सदैव, सहर्ष और पवित्रता ऐसी कि कोई कभी उस पर उँगली न उठा सके।??६ त्याग और सेवा पवित्रता के ही अंग हैं तथा पवित्रता सतीत्व और यौन-पवित्रता का ही पर्याय है। शिवरानी देवी ने ऐसी एक घटना का वर्णन किया है जब वे प्रेमचंद और सवा साल की बेटी कमला के साथ स्टीमर से सरयू पार कर रही थीं और एक नवयुवक उनकी ओर बढता आ रहा था। शिवरानी देवी ने प्रेमचंद को जब इस बारे में बताया तो उन्होंने उस नवयुवक की गर्दन पकडी और दूर तक खींचते ले गये और सरयू में झोंक देने को तैयार हो गये।७ इस प्रकार प्रेमचंद अपने निजी जीवन के साथ अपने औपन्यासिक पात्रों के जीवन में भी नारी के शील-हरण अथवा उसकी यौन-शुचिता को कलंकित करने के पुरुष के किसी भी प्रयास को क्षमा नहीं कर सके। प्रेमचंद हिन्दी साहित्यकारों में एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने नारी-जागरण का शंखनाद किया, उसके ?अबला? तथा ?दासी? के परम्परागत कलंक को मिटाया, उसे शिक्षित किया और राजनीति में सक्रिय बनाया, उसे विधवा-विवाह, बेमेल विवाह, दहेज, तलाक आदि कुप्रथाओं के प्रति सचेत किया और अपनी स्वाधीनता तथा अस्तित्व एवं अधिकारों के लिए संघर्ष की शक्ति प्रदान की। उन्होंने अपने नारी पात्रों में आदर्श माता, पत्नी, प्रेमिका तथा बहन के चरित्र उत्पन्न किये तथा ऐसे नारी पात्रों की सर्जना की जो अन्याय, शोषण तथा दमन की मुक्ति के लिए लड सकीं, लेकिन वे अपने किसी नारी पात्र को इतना आधुनिक नहीं बना पाये कि वह विवाह-पूर्व यौन सम्बन्ध बनाये, किसी पर-पुरुष के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करे और अपनी यौन स्वच्छंदता से समाज में हलचल उत्पन्न करे। उसे कोई उनका ?सैक्स टेबू? कहे, परम्परागत सतीत्व के पालन की मूर्खता कहे, नारी को लक्ष्मण-रेखा अथवा मर्यादाओं में बाँधने का हिन्दू दुराग्रह तथा आधुनिकता का विरोधी कहे, प्रेमचंद नारी की यौन-शुचिता पर कोई ढील तथा कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
प्रेमचंद साहित्य में नारी की यौन-शुचिता एवं पवित्रता के अनेक प्रसंग मिलते हैं। यौन-शुचिता का यह प्रश्न नारी के सभी रूपों से जुडा है, चाहे वे कुमारी है, प्रेमिका है, पत्नी है, विधवा है या कोई और रूप है। नारी जहाँ-जहाँ है, वहाँ-वहाँ जब नारी के शील-हरण का प्रसंग जन्म लेता है तो प्रतिक्रियाओं के कई रूप होते हैं। प्रेमचंद के पहले उपन्यास ?असरारे मआबिद- उर्फ देवस्थान रहस्य में महादेव मन्दिर का महन्त रामकली आदि स्त्रियों का शील-हरण करता है, परन्तु इसमें इन स्त्रियों की सहमति होती है। ?सेवासदन? की सुमन ने गृहिणी बनने के स्थान पर ?इन्द्रियों के आनन्द-भोग? की शिक्षा पायी थी तथा उसे अपने रूप-सौन्दर्य का अभिमान था। वह इसी कारण मुहल्ले के शोहदों को चिक की आड से अपने शारीरिक सौन्दर्य को दिखाने में असीम आनन्द का अनुभव करती थी। इस प्रकार सुमन स्वयं ही अपनी पवित्रता भंग करती है और गृहिणी से वेश्या बनती है। ?प्रेमाश्रम? में जमींदार का कारिन्दा गौस खाँ मनोहर की पत्नी बिलासी का अपमान करता है और उसका चपरासी फैजू उसकी गर्दन पकडकर धक्का देता है तो वह आहत होती है। इस पर मनोहर गौस खाँ की हत्या कर देता है। इसी उपन्यास में गायत्री विधवा है, सम्पत्तिवान है और सती-साध्वी स्त्री है, किन्तु उसकी छोटी बहन का पति ज्ञानशंकर उसके शरीर तथा धन दोनों को हथियाना चाहता है। गायत्री के पिता राय कमलानन्द अपने दामाद ज्ञानशंकर की प्रवृत्तियों से समझ जाते हैं कि वह उनकी विधवा बेटी गायत्री को अपनी ?काम-चेष्टा? का शिकार बनाना चाहता है। ज्ञानशंकर की पत्नी विद्या पति को देव-तुल्य मानती है। इस पर भी राय कमलानन्द विद्या से कहते हैं, ??अगर उसके सतीत्व पर जरा भी धब्बा लगा तो तुम्हारे कुल का सर्वनाश हो जायेगा।??८ संयोग कुछ ऐसा होता है कि ज्ञानशंकर और गायत्री जब आलिंगनबद्ध होते हैं तभी विद्या कमरे में प्रवेश करती है और गायत्री आत्म-ग्लानि से चीख मारकर रोती है और अपने से कहती है, ??मैं उसके (बहन विद्या के) सामने साध्वी, सती बनती थी, अपने पतिव्रत पर घमंड करती थी, पर ……. मैं उसकी गृह-विनाशिनी अग्नि, उसकी हांडी में मुँह डालने वाली कुतिया हूँ।??९ राय कमलानन्द का शाप फलीभूत होता है और अन्त में ज्ञानशंकर आत्म-हत्या कर लेता है।
?रंगभूमि? उपन्यास में नारी की यौन-शुचिता के कई प्रसंग हैं, एक प्रसंग विनय-सोफिया का है जो प्रेमी-प्रेमिका हैं, दूसरा सूरदास-सुभागी का है जो अपयश का भागी बनता है और सूरदास अदालत से दंडित होता है तथा तीसरा सुभागी के साथ घीसू आदि बलात्कार की चेष्टा करते हैं और सजा पाते हैं। विनय और सोफया जब भीलों की बस्ती में होते हैं तो लेखक कहता है कि दोनों प्रेम में डूबे हैं, दोनों मिलन के लिए उद्विग्न, विकल और अधीर हैं, परन्तु एकान्त और स्वाधीनता होने पर भी नैतिक बन्धनों की दृढता उन्हें मिलने नहीं देती है। विनय की अधीरता बढती है तो वह एक भीलनी की दी जडी-बूटी और वशीकरण-मंत्र का उपयोग करता है, परन्तु वह पश्चाताप करता है तथा इसे विश्वासघात, सतीत्व-हत्या तथा नैतिक भावों का नाश मानता है।१० सोफया विनय के गले में बाहें डाल देती है, परन्तु विनय अपनी यौन-उत्तेजना को नियन्त्रित करके सोफया की यौन-शुचिता की रक्षा करता है। सूरदास-सुभागी प्रसंग में परस्त्री को अपने यहाँ आश्रय देने पर कलंक से नहीं बच पाता है। भैरों के पीटने पर जब उसकी घरवाली सुभागी सूरदास के झोंपडे में आश्रय लेती है तो भैरों, नायकराम आदि उस पर पराई औरत को वश में करने का दोष लगाते हैं तो सूरदास कहता है, ??मैं परायी स्त्री को अपनी माता, बेटी, बहन समझता हं। जिस दिन मेरा मन इतना चंचल हो जायेगा, तुम मुझे जीता न देखोगे।??११ सूरदास सुभागी की शील-रक्षा के लिए ही उसे अपने झोंपडे में रखता है और जानता है कि यदि उसने उसे निकाल दिया तो वह ?मुसलमान या किरिसतान? हो जायेगी।१२ यही सूरदास आगे चलकर सुभागी के साथ बलात्कार की चेष्टा करने पर गाँव के ही लडकों के विरुद्ध रिपोर्ट लिखाता है और इसकी चिन्ता नहीं करता कि सारा गाँव उसका विरोधी हो गया है। सूरदास के लिए नारी का सतीत्व तथा उसकी यौन पवित्रता सर्वोपरि है। वह नायकराम से यही कहता है, ??क्या औरत की आबरू कुछ होती ही नहीं। सुभागी गरीब है, अबला है, मजूरी करके अपना पेट पालती है, इसलिए जो कोई चाहे, उसकी आबरू बिगाड दे ? जो चाहे, उसे हरजाई समझ ले। गगग औरत की आबरू कोई हँसी खेल नहीं है। इसके पीछे सिर कट जाते हैं, लहू की नदी बह जाती है।??१३ सूरदास यही करता है और घीसू एवं विद्याधर को सजा हो जाती है। प्रेमचंद बलात्कार की चेष्टा पर भी अपराधियों को दण्डित कराते हैं। ?कायाकल्प? उपन्यास में तो साम्प्रदायिक दंगे के दौरान ख्वाजा साहब का बेटा अहिल्या को उठा कर ले जाता है और बलात्कार की चेष्टा करता है तो अहिल्या उसकी ही छुरी से उसकी हत्या कर देती है और खुद ख्वाजा साहब ही सूरदास वाला ही तर्क देते हुए कहते हैं, ??उसने हर एक लडकी के लिए नमूना पेश कर दिया। खुदा और रसूल दोनों उसे दुआ दे रहे हैं। फरिश्ते उसके कदमों का बोसा ले रहे हैं। उसने खून नहीं किया, कत्ल नहीं किया, अपनी अस्मत की हिफाजत की, जो उसका फर्ज था। वह खुदाई कहर था, जो छुरी बनकर उसके सीने में चुभा।??१४ ?निर्मला? उपन्यास में सतीत्व-भंग के दो प्रसंग हैं। निर्मला का जीवन और चरित्र ही यौन-अतृप्ति का प्रतीक है। वह अपने पति तोताराम में पति को नहीं पिता को देखती है, क्योंकि उसकी अधेड आयु का एक आदमी उसका पिता था। अतः वह अपने सौतेले बडे पुत्र मंसाराम से हँसती-बोलती है तो उसकी ?विलासिनी कल्पना? उत्तेजित और तृप्त होती है और अपनी बहन कृष्णा से स्पष्ट रूप में कहती है, ??यह मैं जानती हूँ कि अगर उसके मन में पाप होता तो मैं उसके लिए सब कुछ कर सकती थी।??१५ इसका परिणाम यह हुआ कि मंसाराम की मृत्यु हुई और निर्मला पति की निगाह में गिर गयी, परन्तु निर्मला ने फिर अपनी यौन-अतृप्ति का मार्ग खोजा और पति के सियाराम को खोजने जाने पर वह अपनी सहेली के पति डॉक्टर भुवन की ओर आकर्षित हुई और वह श्ाृंगार करके सुधा के घर जाने लगी, परन्तु डॉक्टर भुवन जैसे ही एकान्त में अपना प्रेम प्रकट करता है तो निर्मला वहाँ से भाग खडी होती है। सुधा इस घटना को जान लेती है तो अपने पति डॉक्टर भुवन की ऐसी भर्त्सना करती है कि भुवन आत्म-हत्या कर लेता है, पर सुधा ऐसे सौभाग्य से वैधव्य को पसन्द करती है।१६ ?प्रतिज्ञा? उपन्यास में कमलाप्रसाद पूर्णा को एकान्त में ले जाकर उससे बलात्कार करना चाहता है, परन्तु उसे पूर्णा का विरोध तथा समाज का अपयश मिलता है। ?कर्मभूमि? उपन्यास में अमरकान्त विवाहित होकर भी कुमारी सकीना से प्रेम करता है और सकीना भी उसे चाहती है। एक दिन जब दोनों प्रेम के आवेग में थे तो अमरकान्त सकीना को छाती से लगाने के लिए अपनी ओर खींचता है कि तभी पठानिन आती है तो वह उत्तेजित होकर कहती है, ??चुपचाप चला जा, नहीं तो आँखें निकाल लूँगी। तू है किस घमण्ड में ? अभी एक इशारा कर दूँ, तो सारा मुहल्ला जमा हो जाये। हम गरीब हैं, मुसीबत के मारे हैं, रोटियों के मुहताज हैं ! जानता है क्यों ? इसलिए कि हमें आबरू प्यारी है। खबरदार जो इधर का रुख किया। मुँह में कालिख लगाकर चला जा।??१७ इस घटना की तीव्र प्रतिक्रिया होती है और अमरकान्त को शहर से ही जाना पडता है और उसकी पत्नी सुखदा भी इन शब्दों में अपने पति का मूल्यांकन करती है, ??उन्होंने मेरे साथ विश्वासघात किया है। मैं ऐसे कमीने आदमी की खुशामद नहीं कर सकती। अगर आज मैं किसी मर्द के साथ भाग जाऊँ, तो तुम समझती हो, वह मुझे मनाने आयेंगे ? वह शायद मेरी गर्दन काटने आयें।??१८ इसी उपन्यास में तीन गोरे सैनिक मुन्नी के साथ बलात्कार करते हैं तो प्रेमचंद इस स्त्री का दृश्य खींचते हैं, ??उसी वक्त एक युवती खेत से निकली और मुँह छिपाये, लंगडाती, कपडे संभालती, एक तरफ चल पडी। अबला लज्जावश, किसी से कुछ कहे बिना, सबकी नजरों से दूर निकल जाना चाहती थी। उसकी जिस अमूल्य वस्तु का अपहरण किया गया था, उसे कौन दिला सकता था? दुष्टों को मार डालो, इससे तुम्हारी न्याय-बुद्धि को सन्तोष होगा, उसकी तो जो चीज जानी थी, वह गयी।??१९ यह नारी की यौन-शुचिता है, उसका सतीत्व है जिसका अपहरण हुआ है। मुन्नी पति-परिवार छोड देती है और भिखारिन के वेश में दो गोरों की छुरी से हत्या कर देती है। पुलिस उसे पकड लेती है तो मानती है कि उसने हत्या की है और वह फाँसी से नहीं डरती है, क्योंकि जब आबरू लुट गयी, तो जीकर क्या करूँगी।२० उपन्यास में मुन्नी मरती नहीं है। वह बरी होती है और एक गाँव में पहुँच कर नया जीवन शुरू करती है।
?गोदान? में नारी के सतीत्व, यौन-पवित्रता तथा उसके भंग होने के कुछ प्रेम-प्रसंग हैं जो सामाजिक प्रश्नों को उत्पन्न करते हैं। होरीराम का अपना परिवार है तथा धनिया सती-साध्वी पत्नी है जिसने होरी के सिवा किसी पुरुष को आँख भरकर देखा न था।२१ लेकिन होरी में कुछ छेडछाड की प्रवृत्ति थी। होरी दुलारी सहुआइन की दुकान पर तम्बाकू आदि लेने जाता था तो कुछ चुहल करता था। धनिया इस पर होरी से कई-कई दिन नहीं बोलती थी, घर का काम भी न करती थी और एक बार तो वह नैहर भाग गयी थी। उपन्यास में गोबर तथा विधवा फुनिया के प्रेम सम्बन्ध, फुनिया के पुरुषों की कामुकता के अनुभव, पंडित को बलात्कार की चेष्टा पर पीटना, गोबर से गर्भवती होना आदि कथा-प्रसंग नारी के यौन-सम्बन्धों के कई रूपों को उद्घाटित करते हैं। फुनिया एक पति अथवा एक पुरुष के साथ ही यौन सम्बन्ध रखना चाहती है और इस सम्बन्ध में साफगोई से काम लेती है। वह गोबर से अपनी पहली ही मुलाकात में कह देती है, ??मेरा होकर रहना पडेगा। फिर किसी के सामने हाथ फैलाये देखूँगी, तो घर से निकाल दूँगी। गगग मैं तो जिसकी हो जाऊँगी, उसकी जन्म-भर के लिए हो जाऊँगी, सुख में, दुःख में, सम्पत में, विपत में, उसके साथ रहूँगी। हरजाई नहीं हूँ कि सबसे हँसती-बोलती फिरूँ। न रुपये की भूखी हूँ, न गहने-कपडे की। बस भले आदमी का संग चाहती हूँ।??२२ इस अवसर पर फुनिया एक पंडित द्वारा बलात्कार की चेष्टा की घटना भी गोबर को सुनाती है। फुनिया उस पंडित के मुँह पर दूध की हांडी दे मारती है और उसकी पीठ पर दो लात भी लगाती है और मजबूत कलेजे से कहती है, ??मैं अहीर की लडकी हूँ। मूँछ का एक-एक बाल चुनवा लूँगी। यही लिखा है तुम्हारे पोथी-पत्रे में कि दूसरों की बहू-बेटी को अपने घर में बन्द करके बेइज्जत करो। इसीलिए तिलक-मुद्रा का जाल बिछाये बैठे हो।??२३ फुनिया गाँव की औरत होने पर भी पुरुष की काम-लोलुपता पर कुछ और महत्त्वपूर्ण बातें कहती है। वह आश्चर्य करती है कि किसी का रोज-रोज मन कैसे बदल जाता है तथा क्या आदमी गाय-बकरी से भी गया बीता है ? जब मर्द इधर-उधर ताक-झाँक करेगा तो औरत भी आँख लडायेगी। मर्द का हरजाईपन औरत को भी उतना ही बुरा लगता है, जितना औरत का मर्द को।२४ इसी फुनिया को गोबर गर्भवती अवस्था में छोडकर भाग जाता है तो उस ?कुलटा?, ?कलंकिनी? तथा ?पापिष्ठा? को होरी और धनिया दोनों उसे घर में आश्रय देते हैं और छाती से लगाते हैं। उनके बेटे ने उसकी बाँह पकडी है तो उसका निर्वाह करना है। उपन्यास में मातादीन-सिलिया का प्रसंग भी कुछ ऐसा ही है। मातादीन तन-मन लेकर भी सिलिया की उपेक्षा करता था और काम करने की मशीन समझता था, लेकिन उसके माता-पिता अपने भाई-बन्दों के साथ आते हैं और मातादीन के मुँह में हड्डी डाल देते हैं। सिलिया का बाप हरखू कहता है कि हमारी इज्जत लेते हो तो अपना धरम हमें दो और उसकी माँ कहती है कि हम चमार हैं इसलिए हमारी कोई इज्जत ही नहीं। मातादीन ने सिलिया की इज्जत बिगाडी है, तुम बडे नेमी-धरमी हो। उसके साथ सोओगे, लेकिन उसके हाथ का पानी न पिओगे। यही चुडैल है कि यह सब सहती है। मैं तो ऐसे आदमी को माहुर दे देती।२५ इस प्रकार दलित जाति की यौन-नैतिकता भी स्त्री-पुरुष में एकनिष्ठता चाहती है, परन्तु सिलिया जब रात में सोना से मिलने जाती है तो मथुरा अंधेरा और एकान्त पाकर उसे आलिंगन में ले लेता है और वह भी कुछ अनुकूल हो जाती है कि सोना की पुकार से सिलिया का सतीत्व तो बच जाता है, लेकिन सोना क्रोध में पति की इस हरजाई पर सिलिया से कहती है, ??तुमने उस पापी को लात क्यों नहीं मारी ? क्यों तूने उसकी नाक दाँतों से नहीं काट ली ? उसका खून क्यों नहीं पी लिया, चिल्लायी क्यों नहीं ???२६ सोना की दृष्टि में सबसे बडा पाप किसी पुरुष का पर-स्त्री और स्त्री का पर-पुरुष की ओर ताकना था। इस अपराध के लिए उसके यहाँ कोई क्षमा न थी। मेहता और मालती के प्रसंग में मालती स्वच्छंद नारी है। लेखक के अनुसार मालती बाहर से तितली और अन्दर से मधुमक्खी है, लेकिन उसमें तितलीपन क्रमशः कम होता जाता है और मधुमक्खी के समान सेवा-कर्म में लग जाती है। वह प्रेम को शरीर की नहीं आत्मा की वस्तु मानती है तथा सेवा-त्याग एवं मानवतावादी दृष्टि प्रमुख हो जाती है। ?गोदान? में अधेड भोला का विधवा युवती नोहरी से विवाह होता है तो दोनों को घर से निकलना पडता है तो उन्हें नोखेराम आश्रय देता है और नोहरी को अपने जाल में फँसा लेता है और नोहरी भी यही चाहती है। भोला की सारे गाँव में बदनामी होती है तो भोला होरी के पास आता है तो धनिया भी नोहरी की बदचलनी पर भोला और नोहरी दोनों की भर्त्सना करती है। धनिया भोला से कहती है कि वही औरत सेवा कर सकती है जिसने जवानी में तुम्हारे साथ सुख उठाया हो। तुम तो नोहरी पर सियार की तरह टूट पडे। अब तो तुम्हारा धरम यही है कि गंडासे से उसका सिर काट दो। फाँसी ही तो पाओगे। फाँसी इस छीछालेदारी से अच्छी।२७ धनिया तो यहाँ तक कहती है कि जो औरत के कुराह जाने पर टुकुर-टुकुर देखता रहे वह तो मर्द ही नहीं है। यह एक ग्रामीण स्त्री का यौन-दर्शन है जो स्त्री को हर परिस्थिति में पतिव्रता और पवित्रता की परिधि में बाँधे रखती है। उसके नारी-दर्शन में नारी पति के प्रति यौन-निष्ठा को भंग करे तो अपराधिनी है और दंडनीय है। ?गोदान? में ही रायसाहब की बेटी मीनाक्षी के तलाक के प्रसंग में प्रेमचंद ने उस समय के नारी-मुक्ति आन्दोलन की चर्चा की है और लिखा है कि मीनाक्षी समाचार-पत्रों में स्त्रियों के अधिकारों की चर्चा पढती थी और ?जनाना क्लब? जाने लगी थी। यहाँ शिक्षित ऊँचे कुल की महिलाएँ आती थीं और वे वोट, अधिकार और स्वाधीनता तथा नारी-जागृति की खूब चर्चा करती थीं, जैसे पुरुषों के विरुद्ध कोई षड्यन्त्र रचा जा रहा हो। इनमें अधिकांश वही देवियाँ थीं जिनकी अपने पुरुषों से न पटती थी, जो नयी शिक्षा के कारण पुरानी मर्यादाओं को तोड डालना चाहती थीं। कई युवतियाँ भी थीं, जो डिग्रियाँ ले चुकी थीं और विवाहित जीवन को आत्म-सम्मान के लिए घातक समझकर नौकरियों की तलाश में थीं।२८ इन्हीं स्त्रियों में से एक मिस सुलतान थी जिसके कहने पर ही मीनाक्षी ने पति पर गुजारे का दावा किया था, परन्तु उसके पति दिग्विजय सिंह ने उस पर बदचलनी का आरोप लगाया तो मीनाक्षी मुकदमा जीतने पर भी इस अपमान का बदला लेने के लिए हंटर लेकर उसके बंगले पर पहचती है और रणचण्डी की भाँति पति तथा वहाँ नाचती वेश्या और पूरी चंडाल चौकडी की हंटर से पिटाई करती है। इस घटना का यही अर्थ है कि प्रेमचंद मीनाक्षी जैसी स्त्री पर चरित्र-पतन के झूठे आरोप पर पति की हंटर से पिटाई करते हैं। नारी की चारित्रिक पवित्रता उनके लिए सबसे अधिक प्रिय है और रक्षणीय है।
प्रेमचंद की कई कहानियों में भी नारी की यौन-शुचिता तथा यौन-शोषण के प्रसंग आते हैं और वे उस युग के नारी-विमर्श के यथार्थ परिदृश्य को प्रस्तुत करते हैं। प्रेमचंद अपनी कहानी ?रसिक सम्पादक? में एक ऐसे सम्पादक का चित्र खींचते हैं जो स्त्रियों के अधिकारों के सबसे बडे रक्षक हैं, लेखिकाओं के घटिया लेख भी खूब छापते हैं, पत्रों में उनकी खूब तारीफ करते हैं और लेखिकाएँ भी उन्हें दर्शन देकर उफत करती हैं। सम्पादक की यह रसिकता कहानी की रचना का आधार बनती है और एक कुरूप लेखिका को देखकर पानी-पानी हो जाती है। आज आपको ऐसे सम्पादक खूब मिलेंगे तथा एक महान् सम्पादक को लेकर तो लेखिकाओं तक को स्पष्टीकरण देना पडा है। ?घासवाली? कहानी की मुलिया ठाकुर चैनसिंह की अश्लील हरकतों से अपने सतीत्व और यौन-पवित्रता की रक्षा करती है, जो दलित नारी की यौन-नैतिकता का प्रमाण है। मुलिया चमारिन है, सुन्दर है तो क्या इसी कारण कोई ठाकुर उसकी यौन-शुचिता भंग कर सकता है ? वह चैनसिंह को निरुत्तर करती हुई कहती है, ??अगर मेरा आदमी तुम्हारी औरत से इसी तरह बातें करता, तो तुम्हें कैसा लगता ? तुम उसकी गर्दन काटने को तैयार हो जाते कि नहीं ? बोलो ! क्या समझते हो कि महावीर चमार है तो उसकी देह में लहू नहीं है, उसे लज्जा नहीं है, अपनी मर्यादा का विचार नहीं है। गगग मैं चमारिन होकर भी इतनी नीच नहीं हूँ कि (पति के) विश्वास का बदला खोट से दूँ।??२९ इस कहानी की मुलिया से ही नहीं अपने अन्य नारी पात्रों से प्रेमचंद इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नारी को अपना सतीत्व तथा अपनी यौन-पवित्रता दुनिया में सबसे प्यारी होती है और इस मूल्यवान वस्तु को वह सहज रूप से छोडने को तैयार नहीं होती। ?प्रतिज्ञा? उपन्यास में प्रेमा कहती है, ??स्त्री हारे दरजे ही की दुराचारिणी होती है। अपने सतीत्व से अधिक उसे संसार की और किसी वस्तु पर गर्व नहीं होता, न वह किसी चीज को इतना मूल्यवान समझती है।??३० इसी प्रकार ?वेश्या? कहानी में वेश्या माधुरी कहती है, ??नारी अपना बस रहते हुए कभी पैसों के लिए अपने को समर्पित नहीं करती। यदि वह ऐसा कर रही है तो समझ लो कि उसके लिए और कोई आश्रय और कोई आधार नहीं है।??३१
प्रेमचंद के नारी-दर्शन में इस प्रकार दोनों ही रूपों में नारी की यौन-शुचिता की रक्षा का कठोर आग्रह है – एक, पुरुष द्वारा नारी का धन-बल तथा छल-बल से उसका शील-हरण तथा दूसरा, नारी का स्वयं अपने सतीत्व को बाजार में बेचना। प्रेमचंद का युग नारी-उत्थान का युग था तथा एक नयी नारी का जन्म हो रहा था। यह आधुनिक नारी परम्परागत भारतीय नारी की बुनियाद पर ही निर्मित और विकसित हो रही थी। वह अपनी परम्परा में ही आधुनिक बन रही थी और इसी कारण घर, परिवार, पतिव्रत जैसे परम्परागत मूल्यों के प्रति समर्पित थी और साथ ही अपने अधिकार, स्वतन्त्रता और अस्तित्व का आग्रह कर रही थी। यह प्रेमचंद ही नहीं उस युग की नारी की मांग थी। हिन्दी की नारी पत्रिका ?गृहलक्ष्मी? के दिसम्बर, १९२५ (पौष, सम्वत् १९८२) के अंक में एक शिक्षित नवविवाहिता का एक पत्र छपा है जिसमें वह अपने युग के नारीवादियों से कहती है, ??पढी-लिखी स्त्री को उस मछली की तरह न बनाओ जो तैर नहीं सकती, उस आम के पेड की तरह न बनाओ, जिसमें कभी फल-फूल नहीं लग सकें। उसे उस रास्ते पर चलने दो जिस पर स्त्री को चलना चाहिए। जिस प्रकार पुरुषत्व आप का गुण है, उसी प्रकार स्त्रीत्व स्त्री का गुण है। उसके इस अमूल्य गुण की दुर्दशा उचित नहीं है। गगग स्त्री अपना घर चाहती है, अपना द्वार चाहती है, अपना पति चाहती है, अपना बच्चा चाहती है। जितनी बातें इस चाह की बाधक हैं, वे उनके लिए घातक हैं।??३२ इन विचारों के मूल में नारी की आकांक्षा घर-परिवार की है और इसके लिए उसे पत्नी और माता बनना अनिवार्य है। विवेकानन्द ने कहा था कि हिन्दू संस्कृति में स्त्री जीवन का महान् उद्देश्य माता का गौरव पद प्राप्त करना है।३३ प्रेमचंद का विचार भी यही है। ?गोदान? में मेहता कहता है, ??नारी केवल माता है और इसके उपरान्त वह जो कुछ है, वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व संसार की सबसे बडी साधना, सबसे बडी तपस्या, सबसे बडा त्याग और सबसे महान् विजय है।??३४ नारी के इस प्रेमचंदीय दर्शन में घर-परिवार का मूलाधार होने पर उसके सतीत्व तथा उसकी यौन-शुचिता की रक्षा की स्थितियाँ स्वतः निर्मित हो जाती हैं, लेकिन आज की शिक्षित नारी और कुछ हिन्दी लेखिकाओं का स्त्रीवाद उसी घर-परिवार तथा नारी की पति-निष्ठा को ही ध्वस्त करके उसे सैक्स में आजाद बना रहा है। हिन्दी की देहवादी लेखिका मैत्रेय पुष्पा इसी बात को यों कहती हैं, ??घर और घेर दो शब्द हैं। घेर में जो दशा जानवरों की होती है, घर में वही स्त्री की नियति होती है। जानवरों के लिए जिस तरह दूसरे के खूँटे नहीं होते, स्त्रियों के लिए कोई दूसरा घर नहीं होता। मुक्ति की कोई सम्भावना नहीं, आना अन्ततोगत्वा वहीं है। मालिक प्यार करे तो ठीक वरना खाना देता रहे और पीटता रहे।??३५ पश्चिम के स्त्री आन्दोलन तथा भारत की कुछ मैत्रेय पुष्पा जैसी शिक्षित महिलाओं, ?हंस? जैसी देहवादी पत्रिकाओं तथा मीडिया, विज्ञापन एवं सौन्दर्य प्रतियोगिताओं आदि ने भारतीय नारी को पूर्णतः घर और यौन सम्बन्धों के बन्धन से मुक्ति को ही नारी की स्वतन्त्रता मान लिया है। इनकी नारी मुक्ति पत्नी और माता को बन्धन तथा प्रेयसी, विनोदिनी एवं भोग की केन्द्र बना रही है। सुधीश पचौरी जैसे वामपंथी भी राजेन्द्र यादव के ?हंस? पर यही आरोप लगाते हुए लिखते हैं, ??यदि हम ?हंस? के पिछले कुछ अंक देखें तो वह स्त्रीत्ववाद के नाम पर किया जाता सैक्सबाजी का घालमेल समझ में आ जाता है। हिन्दी में स्त्रीत्ववाद इसी तरह लपक लिया जा रहा है। स्त्रीत्ववाद के गहन सामाजिक संघर्षमूलक-सत्तामूलक आशयों को समझने, बताने की जगह एक सरल-सी समझ यह चला दी गयी है कि स्त्री आजाद होना माँगती है। आजाद माने सब कुछ से आजाद। वह आजाद है तो आजाद रहे। ?हम है ना?, हम भी तो आजाद हैं।??३६ यही पुरुष निर्मित नारी की मुक्ति है। इसमें नारी का शरीर ही प्रमुख है और इस ?हम? में जो पुरुष हैं, वही नारी के फैशन तथा सौन्दर्य की मंडियों के प्रतिमानों के निर्धारक और उसके शरीर के ग्राहक हैं।३७ नारी की ऐसी यौन-मुक्ति से भारत की परम्परागत विवाह तथा परिवार संस्था एवं नारी की यौन-पवित्रता को नष्ट करने का ऐसा षड्यन्त्र है जिसमें आधुनिकतावादियों के साथ कुछ जनवादी भी शामिल हैं, परन्तु ऐसे कुछ सौ-दो सौ तथा कुछ हजार लोग देश की आधी अरब की स्त्रियों की आबादी को ऐसी सैक्स आजादी का अंग नहीं बना सकेंगे। इस देश की मृणाल पांडे, चित्रा मुद्गल, ममता कालिया, राजी सेठ, सुनीता जैन, चन्द्रकान्ता, कमल कुमार, कुसुम कुमार, मेहरून्निसा परवेज, सूर्यबाला, ऋता शुक्ल जैसी अनेक लेखिकाएँ ऐसे आधुनिक नारी-मुक्ति के विरोध में खडी हैं और सच तो यह है कि महानगरों में शिक्षित तथा कामकाजी स्त्रियाँ भी ऐसी यौन-मुक्ति के लिए तैयार नहीं होंगी। अतः इस देश में विवेकानन्द, गाँधी और प्रेमचंद के नारी-दर्शन को आधुनिकता, भूमंडलीकरण तथा यौन-मुक्ति की बडी-से-बडी आँधी भी नष्ट नहीं कर सकेगी। यह सच है, यह आँधी चलती रहेगी, कामुकता एवं अश्लीलता का विस्तार भी होगा, कुछ देश की शिक्षित युवतियाँ उसे कैरियर भी बनायेंगी तथा फिल्मों एवं सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में नग्न-प्रदर्शन भी करेंगी तथा वेश्यावृत्ति के व्यापार भी चलते रहेंगे, परन्तु भारत के सम्पूर्ण नारी समाज को इन अर्थों में आधुनिक बनाना असम्भव ही होगा। भारतीय नारी में यौन-शुचिता की जडें इतनी गहरी हैं कि वह तितली बनकर भी मधुमक्खी बनी रहती है। मधुमक्खी परिवार, सेवा तथा त्याग की प्रतीक है। प्रेमचंद का यही नारी दर्शन था तथा भारतीय नारी का भी यही जीवन-दर्शन है। भारतीय नारी में आधुनिकता का प्रवेश भी इसी आधारभूत दर्शन से ही होगा और वह तभी स्थायी एवं उपयोगी होगा। भारत का अर्धनारीश्वर का दर्शन, स्त्री-पुरुष की परस्परपूरकता एवं एकनिष्ठता, विवाह तथा परिवार की पवित्रता एवं परस्पर का अटूट विश्वास किसी भी पश्चिमी यौन आँधी से भारतीय नारी को उसके अधिकार तथा स्वतन्त्रता के साथ उसकी यौन- शुचिता को भी बनाये रखेगी।

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