हिन्दी साहित्य

Archive for the ‘लेख’ Category

 

आज नारी विमर्श के स्तर पर नारी चेतना से संपन्न हिंदी उपन्यास लिखे जा रहे हैं, जिसमें नारी की आत्मा, स्व और अहं ध्वनित है। वास्तव में चेतना का अर्थ विचारों, अनुभूतियों, संकल्पों की आनुषांगिक दशा, स्थिति अथवा क्षमता से है। उसका संबंध नारी की स्वयं की पहचान या किसी भी स्तर पर विषयगत अनुभवों के संगठित स्वरूप से होता है। नारी विमर्श और चेतना के विकास का ही परिणाम है कि नारी आज सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यावसायिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में पुरुष के समान ही नहीं बल्कि पुरुष से आगे बढकर अपनी निःशंक सेवाएं दे रही हैं। नारी चेतना का ही चरम है, जहाँ वह यह कहती है- ??मैं उन औरतों में नहीं हूँ, जो अपने व्यक्तित्व का बलिदान करती है, जिनकी कोई मर्यादा और शील नहीं होता है। मैं न उनमें हूँ, जिनके चरित्र पर पुरुष की हवा लगते ही खराब हो जाते हैं और न पति की गुलामी को सच्चरित्रा का प्रमाण मानती हैं। मुझमें आत्मनिर्भरता भी है और आत्मविश्वास भी। मुझे स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है तो पति और परिवार के साथ सामंजस्य बनाने की शक्ति भी। अतः जीवन के यथार्थ को स्वीकार करने में कोई झिझक भी नहीं है।
नारी के आत्म-बोध, आत्मनिर्भरता एवं आत्मविश्वास के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी के आधुनिक उपन्यासों में जो नारी चरित्र उभरकर आए हैं उन्हें तीन वर्गों में – उच्च, मध्य और निम्न – विभाजित कर देखा जा सकता है। नारी इनमें से किसी भी वर्ग चरित्र में हो, वह अपनी पहचान बनाती है। पहले वर्ग में यदि वह डॉक्टर, प्राध्यापक, अधिकारी, नेता है तो वह विद्रोह और रुढयों को चुनौती देती हुई महत्त्वाकांक्षिणी के रूप में चित्रित है। मध्यवर्गीय चरित्र के रूप में नारी दोहरे मानदंडों से जूझते हुए झूठी इज्जत के कारण अनेक कष्ट भोगने के लिए बाध्य है, यद्यपि वह शिक्षित है, परंतु समाज की झूठी रूढयों में फँसकर अपनी बौद्विकता से दूर रहकर समाज के अनुरूप खुद को ढालने के लिए विवश है। लेकिन तीसरे वर्ग का नारी चरित्र आज सर्वाधिक सशक्त है, वह विद्रोह और रूढयो को खुलकर चुनौती दे रहा है तथा समाज के बंधनों और मर्यादा की परवाह न करके अपनी आत्मा और स्वाभिमान की रक्षा करता है।
यहीं पर उच्च मध्यवर्गीय चरित्र भी उभरता है। शिक्षित नारी चरित्र समाज और स्वयं के व्यवहार के बीच कहीं खाई पाटता है तो कहीं अहम् की तीव्रता के कारण अपने पारिवारिक संदर्भों और मूल्यों को विघटित करता है। यद्यपि यह चरित्र आर्थिक स्तर पर सुदृढ स्थिति में है और रोजी-रोटी की समस्याएं इन्हें नहीं घेरती हैं। इस वर्ग के पात्रों में प्रमुख नारी चरित्र मालतीदेवी (काली आँधी), महरूख (ठीकरे की मॅगनी), शाल्मली (शाल्मली), शीला भट्टारिका (शीला भट्टारिका) आदि है। इस रूढवादी और विद्रोही नारी चरित्र की परिकल्पना नासिरा शर्मा ने शाल्मली के रूप में की है। वह विवाह के निर्णय से लेकर अंत तक समाज की मर्यादाओं का निर्वाह करती है। पढने की शौकीन शाल्मली विवाहोपरांत प्रशासनिक सेवा में चयन के बाद भी घर-परिवार की मर्यादाओं को ओढे रहती है किंतु प्रत्येक वस्तु के लिए पति के आगे हाथ पसारने के संदर्भ में खुला विरोध करती है। गिरिराज किशोर के उपन्यास तीसरी सत्ता की डॉक्टर शिक्षित होकर रूढयों की शिकार होकर अपने बद्मिजाज एवं पति की क्रूरता के कारण अपने स्वाभिमान गला घोंटकर आत्महंता बन जाती है।२ जबकि ठीकरे की मँगनी की महरुख मुसलिम परिवार की शिक्षिता युवती है। अपने मंगेतर रफत के शोधकार्य हेतु बाहर जाने और किसी अन्य से विवाह कर लेने पर उसमें परिवर्तन आ जाता है और रफत के लौटने पर निकाह के आग्रह को ठुकराकर अपने बाल्यकाल के साथी को शौहर बनाकर सारी रूढयाँ तोडकर दिल्ली चली जाती है।३ काली आँधी की नायिका मालती सामाजिक मर्यादाओं और रूढयों को तोडकर राजनेता के रूप में पद एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करती है तथा अपनी उन्नति के मार्ग में न अपने पति को आने देती है और न अपनी पुत्री लिली को।४
आधुनिक हिंदी उपन्यासों में पारंपरिक आदर्शवादी और यथार्थवादी नारी चरित्रों का अभाव नहीं है। ऐसे पात्र पारंपरिक आदर्शवादिता और यथार्थ को एक साथ जीते हैं। पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति तथा वैज्ञानिकता और शिक्षा प्रसार के कारण सामाजिक बंधनों की शिथिलता और स्वतंत्र चिंतन ने मानव व्यक्तित्व में परिवर्तन भी दर्शाया है तथा आदमी का अहम् भी व्यापक हुआ है। परिणामतः नारी की अहंता बढती दिखाई देती है इसलिए इन नारी चरित्रों में नौकरी की ललक, वैवाहिक संबंधों की शिथिलता, पारिवारिक विघटन का उल्लेख समाहित हो गया है। शाल्मली प्रशासनिक सेवा में चयन होने पर अपना वैवाहिक जीवन विघटित पाती है क्योंकि उसकी महत्त्वाकांक्षाएं उसे आगे जाने के लिए प्रेरित करती हैं। उसके अंदर का आदर्शवाद ही पारिवारिक विघटन से उसे बचा पाता है।५ तीसरी सत्ता की लेडी डॉक्टर के चरित्र की उपलब्धि पारिवारिक जीवन में घुटन और विवशता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।६ परम्पराएं न तो रूढयाँ हैं और न संस्कारों का भार होती हैं और न उन्हें ओढा जाता है। यही कारण है कि परंपरागत मुस्लिम परिवार की महरुख लीक से हटकर आधुनिक बनते बनते अपनी पहचान बना लेती है।७
समाज में आदर्श एवं यथार्थ दोनों की अपनी विशेषताएं हैं और उनके बीच ही विसंगतियों का विकास होता है। सामाजिक आदर्श की अपेक्षा यथार्थ की ओर व्यक्ति का झुकाव होता है और वह परंपरागत रूढयों एवं मान्यताओं को तोडने को कटिबद्ध होता है। आधुनिक उपन्यासों के नारी चरित्रों में एक संघर्षात्मक स्थिति का चित्रण उपन्यासकारों ने किया है। महरुख का रफत के साथ विवाह से पहले जाना मुस्लिम परंपरा के विरुद्ध है किंतु बदली हुई परिस्थितियों में शिक्षा देते जाने में परंपरा की परवाह नहीं की है। इसी प्रकार काली आँधी की मालती का घर की दीवारों से बाहर आना, नेता बनना आदि तत्कालीन यथार्थवादी परिस्थितियों की देन है। तभी यह चरित्र सफल नेता के रूप में समाज की उपलब्धि है। शाल्मली का चरित्र भी यथार्थ रूप में उभरता है। वह अपने पति को इज्जत देती है किंतु कर्त्तव्य के बीच में आने पर यथार्थ का बोध कराते हुए कह देती है- सभी औरतें यदि इस प्रकार अर्जी देने लगें तो हो चुका काम। वह पति की नहीं, सरकार की नौकरी है…..।८
आधुनिक उपन्यासों में कुछ चरित्र घरेलू, कामकाजी, अंतर्मुखी और वस्तुगत (सब्जेक्टिव) हैं। उच्चमध्यवर्गीय नारी चरित्रों के रूप में उन्हें देखा जा सकता है ये नारी चरित्र शिक्षित, योग्य एवं विकास की संभावनाएं लिए हैं तथा घर और बाहर दोनों को संभाल रखे हैं। पद पाकर भी अपने परिवार के प्रति उनमें सजगता है तो अपने केरियर के प्रति भी और कर्त्तव्य के प्रति भी। तीसरी सत्ता की लेडी डाक्टर कामकाजी होकर भी घरेलू है और अंतर्मुखी है। शाल्मली अपने सरकारी पद और पति एवं परिवार का ध्यान रखती है। वह अपने घर एवं बाहर में सामंजस्य बनाए रखती है तथा अंतर्मुखी है। काली आँधी की मालती का व्यक्त्तित्व राजनीति में बिखरता दिखाई देता है। वह घर और बाहर में सामंजस्य न रखकर बाहर की ओर वस्तुगत जीवन को स्वीकार कर लेती है। अतः उसके दाम्पत्य संबंधों में भी टकराव होता है। मिथिलेशकुमारी मिश्र के उपन्यास शीलाभट्टारिका की शीला का सोच अधिक परिपक्व है तथा नारी चेतना का प्रसार रहते हुए भी वह कामकाजी एवं घरेलू नारी चरित्र है।९
मध्यवर्ग के नारी चरित्र मूलतः शिक्षित, पारंपरिक और विद्रोही तो हैं ही, पर इनमें अशिक्षित नारी चरित्र भी हैं। यद्यपि मध्यवर्ग में वर्ग चेतना का रूप सबसे कम लक्षित होता है। इस वर्ग में व्यावसायिक मित्रता, आर्थिक स्थिति और भूमिका में भिन्नता भी द्रष्टव्य है। पर यह वर्ग-चेतना अंतर्मुखी है। आधुनिक उपन्यास के अध्ययन से यह देखा जा सकता है कि इन नारी चरित्रों के पास सीमित साधन होते हुए भी अधिक से अधिक अच्छे ढंग से जीना चाहते हैं तथा वे महत्त्वाकांक्षी भी हैं। कर्क रेखा (शशि प्रभा शास्त्री) की तनु शिक्षित है और भारतीय संस्कारों के पारंपरिक स्वरूप को समझने का प्रयास करती है। शेषयात्रा (उषा प्रियंवदा) की अनुष्का प्रणय के साथ प्रेम-बंधन में बँधती है। वह शिक्षित है और नारी चेतना का विकास उसमें परिलक्षित होता है। शेफाली (शेफाली) शिक्षित एवं भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के अस्वीकार के साथ अपने व्यक्तित्व को प्रमुखता देती है। इसमें उस नारी चरित्र का विद्रोही रूप उभरकर आता है।
?उम्र एक गलियारे की? (शशि प्रभा शास्त्री) की नायिका सुनंदा शिक्षित परंपरागत एवं विद्रोहिणी नारी है। वह भारतीय परंपराओं का निर्वाह करती है, वहीं आत्मबोध से परिपूर्ण है। शेषयात्रा (उषाप्रियवंदा) की अनुष्का, अंधेरा उजाला (विष्णु पंकज) की तारिका-दोनों ही शिक्षित, पारंपरिक एवं विद्रोहिणी हैं। उनके विद्रोह में परिस्थितियों और परिवेश ही कारण बनते हैं। विवाह भी परंपरा और विद्रोह के स्तर पर उभरता है। नारी चेतना के परिप्रेक्ष्य में इन चरित्रों में नारी चेतना के विकास के समानांतर भारतीय संस्कार एवं परंपराएं भी चरित्र निर्मात्री शक्ति बनती है।
मध्यवर्गीय नारी चरित्रों में घरेलू, कामकाजी, वैयक्तिकता, सामाजिकता आदि का अंतःसंघर्ष उभरता है। मध्यवर्गीय ये नारी चरित्र प्रायः काम-काजी हैं, जो उनके जीवन के लिए मजबूरी है। अतः घर और बाहर दोनों ही क्षेत्रों में काम संभालते-संभालते थक जाती हैं। बेघर (ममता कालिया) की नायिका मानसिक परेशानियों से बचने के लिए घर से निकलकर भागा-दौडी के कारण जीवन का सर्वस्व समाप्त कर लेती है। पतझड की आवाजें (निरूपमा सेवती) की नायिका शिक्षित होने के साथ अपनी विशिष्ट भावनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं के सूप में बॉयफ्रैण्ड की रेस्पेक्ट भी मेंटेन नहीं कर पाती।१० क्योंकि उसकी मध्यवर्गीय नैतिक चेतना चरमराने
लगती है।
वैयक्तिकता और सामाजिकता के अंतःसंघर्ष के कारण इच्छाओं और परिस्थितियों का प्रभाव व्यक्तित्व, नैतिकता, वैचारिकता पर पडता है। त्रिकोण (नरेशकुमार शर्मा) की लोरेन, बेघर (ममता कालिया) की नायिका अग्निगर्भा (अमृतलाल नागर) की सीता, एक चिथडा सुख और ?मुट्ठीभर रोशनी (दीप्ति कुलश्रेष्ठ) की नायिकाएं वैयक्तिकता ओर सामाजिकता से संघर्ष ही नहीं करती, वरन् अपने अस्तित्व का संघर्ष भी झेलती है। कोरजा (मेहरूनिस्सा परवेज), अंधेरा-उजाला, सत्तरपार के शिखर (पानू खोलिया) प्रतिध्वनियाँ (दीप्ति खंडेलवाल) आदि के नारी चरित्र सामाजिक नैतिकता से मुक्त व्यक्तिगत नैतिकता पर केंदि्रत होती दिखाई देती हैं।
नारी सम्मान और पारस्परिक संबंधों के जटिल अंतर्विरोध, प्रेम के अंतरंग स्वरूप तथा नारी-महत्त्वाकाक्षाओं ने नारी चरित्र में दोहरे व्यक्तित्व का निरूपण करने के लिए उपन्यासकार को बाध्य किया है। मध्यवर्गीय नारी चरित्र एक प्रकार से अंतर्मुखी चेतना का विकास द्रष्टव्य होता है। अतिशिक्षित एवं बौद्धिक होती नारी अपने सम्मान के प्रति अधिक सजग हो उठी है। परिणामतः समाज में पारस्परिक संबंधों में अंतर्विरोध की स्थितियाँ बढ गई है। यही नहीं, बढती हुई नारी चरित्रों की अंतर्मुखता समाज विरोधी स्थिति बनती है। समाज एवं सामाजिकता को गौण करते हुए व्यक्ति को अधिक प्रतिष्ठा चित्रित की गई है। अग्निगर्भा (अमृतलाल नागर) की नायिका अपना सम्मान बनाए रखने में पग-पग पर अंतर्विरोध से गुजरती है। वह अपनी पसंद का जीवन साथी चाहती है तथा परंपरागत मूल्यों, मान्यताओं और बंधनों को नकारती है।
वैयक्तिक रुचि, स्वतंत्र चेतना, महत्त्वाकांक्षाओं का आग्रह, शिक्षा का प्रभाव अति अहंवादिता ने आधुनिक उपन्यासों के नारी चरित्रों को अपेक्षाकृत अधिक द्वन्द्वी और विद्रोही बना दिया है। परिणामतः पारस्परिक संबंधों में अंतर्विरोध झलकता है। अर्थ-प्रधानता के कारण पति-पत्नी संबंध पिता-पुत्री संबंध सभी पर इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। अंधेरा-उजाला, कर्करेखा, बेघर, चित-कोबरा, प्रतिध्वनियाँ, शेफाली उपन्यासों में नारी चरित्र नारी-पुरुष संबंधों से कहीं कम दाम्पत्य-संबंधों के रूप में देखते हैं। इन चरित्रों में उभरता विचार मूलतः यही है कि- विवाह अपनी जगह है तथा घर के बाहर के प्रेम संबंध अपनी जगह।? इन चरित्र के निष्कर्ष पर यह निष्कर्ष देखा जा सकता है कि इनके मध्य नारी-पुरुष संबंध भावनात्मक आवेग तक सीमित न होकर शारीरिक अपेक्षाओं एवं आवश्यकताओं के रूप में ही सक्रिय हैं।
आधुनिक हिंदी उपन्यासों में नारी चेतना के परिप्रेक्ष्य में अकेलेपन की अब, स्वतंत्र अस्मिता के संघर्ष के प्रति जागरूकता, विवाह, परिवार और समाज के प्रति उनकी भूमिका तथा मानवीय चेतना की प्रतिष्ठा का चित्रण किया गया है। यह अकेलेपन की स्थिति पाश्चात्य संस्कृति की देन ही है, जो परिवेशजन्य परिस्थिति से उत्पन्न होता है क्योंकि भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम् का ही चिंतन रहा है। आज पाश्चात्य चिंतन की आयातित मानसिकता ने अकेलेपन का सूत्रपात किया है। आज अतिपरिचयजन्य कुंठाओं की अतिशयता ने पारस्परिक संबंधों को खोखला कर दिया। व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी बढा दी गई है। यहाँ हमारे अकेलेपन के मूल में औद्योगीकरण, यांंत्रकता की वृद्धि बढती हुई जनसंख्या, बेकारी, आर्थिक संकट, अराजकता और भोगवादी स्थितियों के कारण भी हैं।
मेरे संधिपत्र (सूर्यबाला), कर्करेखा (शशिप्रभाशास्त्री), अग्निगर्भा (नागर) आदि की नायिकाएं सदैव अजनबी बनी रहती हैं, अकेलेपन से परेशान रहती हैं या फिर अपने को निरर्थक मान लेती हैं। इनके लिए विवाह आपस का एडजस्टमेंट भर है। कर्क रेखा की तनु अकेलेपन में ही गुजार देती है। त्रिकोण की लोरेन पितृसमाज की मुहर बनना दासता बताती है। बेघर की नायिका बिना विवाह के ही शारीरिक संबंध स्थापित करती है। तीसरा पुरुष (प्रफुल्ल प्रभाकर) की नायिका विवाहित होकर भी ?शक? के घेरे में बँध कर रह जाती है तथा उसके लिए भावनाएं गौण हो जाती हैं। अग्निगर्भा की सीता मात्र पारिवारिक एवं आर्थिक भोग का साधन है।
आधुनिक काल में नारी के प्रति पुरुष के भाव बदल गया है और नारी ने भी अपने स्वातंय की घोषणा करते हुए समाज से दया नहीं, अपने अधिकारों की माँग की है।११ वास्तव में आज नारी बढते अजनबीपन, विवाह संबंधों में शिथिलता और परिवार एवं समाज में नारी की स्थिति एवं चेतना का किंचित विकास दिखाई देता हैं मध्यवर्गीय नारी के पास न तो अपना व्यक्तित्व है और न उसे आगे बढाने वाला समाज ही। फिर आर्थिक विषमताएं नारी में क्रोध, खीज, निराशा उत्पन्न करती हैं।
सामाजिक यथार्थ, परंपराओं का नवीनीकरण और आधुनिक-बोध निम्नवर्ग की श्रमशक्ति और उसके शोषण को ही निरुपित करते हैं। महानगरीय सभ्यता के बीच गाँव और कस्बों से आए हुए निम्नवर्ग की जिंदगी पिस जाती है। तभी अनारो (मंजुल भगत) की नायिका आधुनिकता और परंपराओं के बीच जूझती है और अपने वर्ग की समस्त विद्रूपताओं एवं संघर्षों के साथ जीवन को रेखांकित करती है। सेवित्तरी (शैलेश मटियानी) की नायिका सुंदर एवं सुशील है और यथार्थ जीवन जीती है। माटी (बचिंत कौर) की भागवंती जमाने भर की ठोकरें खाती है, पर वह किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती है। बसंती (भीष्म साहनी) की नायिका यथार्थ जीवन जीना चाहती है, किसी प्रकार का दबाव वाला नहीं। बुलाकी से विवाह तय किए जाने पर वह दीनू के साथ भाग जाती है, जिसे अपना सर्वस्व मानती है। वास्तव में जीने की अदम्य लालसा उसमें कार्य की प्रखर शक्ति पैदा करती है। निम्न वर्ग के नारी चरित्रों में जीवन मूल्यों एवं नैतिक मर्यादाओं की चिंता नहीं होती है। नैतिक मूल्यों का विघटन, परंपराओं के प्रति विद्रोह, जिजीविषा और अस्तित्व का संघर्ष आधुनिक उपन्यास के नारी चरित्रों में उकेरा गया है क्योंकि नैतिक मान्यताएं उसकी समझ से बाहर हैं। पति द्वारा प्रताडना, पहली पत्नी के होते हुए दूसरी स्त्री ले आना या कुछ रुपयों के लिए अपनी पत्नी को किसी को बेच देना या सोने के लिए बाध्य करना नारी चरित्रों के लिए विशेष परिस्थितियाँ पैदा करती हैं।
बसंती (बसंती) का घर से भागना नैतिक मूल्यों का विघटन है। माटी की भागवंती पति द्वारा प्रताडत है। पति गलत उपयोग कराता है भागवंती का। ढोलन कुंजकली (यादवेंद्र शर्मा चंद्र) की ढोलन का पति अपनी पत्नी के ?जोबन? से कमाकर खाता है और पत्नी का नाच-नंगापन बरदास्त करता है।१२ जनानी ड्योढी (चंद्र) की नायिका को ठाकुर एक बार भोगकर हमेशा के लिए भूल जाते है, पर औरत जनानी ड्योढी में बंद हो जाती है और पुरुष सामीप्य पाने के लिए बाहर से पैसा खर्च कर पुरुषों को बुलाती है।१३ टपरेवाले (कृष्णा अग्निहोत्री) निम्नवर्ग की नारी सुविधा भोगी पुरुष की वासनापूर्ति कर अपने पेट की भूख मिटाती है।१४ डेरेवाले (शैलेश मटियानी) की नारी भी नैतिक मूल्यों का विघटन दर्शाती है क्योंकि देह ही महत्त्व रखती है। डेरेवालों में बेटी सोने का अंडा होती है।१५ नाच्यो बहुत गोपाल (नागर) में निम्नवर्ग (भंगी) के साथ कुलीन लडकी के भागने के पीछे भी परंपराओं के प्रति विद्रोह और अस्तित्व का संघर्ष लिए है।
आधुनिक उपन्यासों में चित्रित नारी चरित्रों में वैयक्तिक रुचि, महत्त्वाकांक्षा स्वतंत्र चेतना, अस्त्तित्व और अस्मिता की पहचान से कहीं अधिक जीवन के दुःखों एवं संघर्षों से परिपूर्ण हैं और उसके समानांतर पीढयों का मोहभंग, टूटन, विघटन, वर्ग संघर्ष की समानांतर चेतना एवं जीवन का अर्थ-बोध उकेरा गया है। यद्यपि यह कहा जा सकता है कि निम्नवर्गीय नारियाँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक विद्रोहिणी हैं और समाज की नैतिक मान्यताओं, रुढयों एवं परंपराओं को तोडने में सजग एवं सक्रिय हैं। बसंती, अनारो इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। खुदा सही सलामत है (रवींद्र कालिया) की गुलाबदई आर्थिक रुप से टूटना नहीं चाहती। यह उसके अपने व्यक्तित्व के प्रति चेतना है, उसमें अपना स्वाभिमान है। उसमें मूक विद्रोह भी निहित है। परवर्ती अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि निम्न वर्ग के नारी पात्र अन्य वर्गों की अपेक्षा अधिक उग्र हैं तथा उनमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना की तीव्रता है जिसे नारी विमर्श के निकष पर स्वीकार किया जाता है।
   
Advertisements

 

महिला लेखन का शताब्दी वर्ष का १९०६-०७ से २००६-२००७
यह सच है कि स्त्री का आत्म संघर्ष रचना के संघर्ष पर विरत होता है। महिला साहित्यकार के लिए बाहरी संदर्भों में पहले उसका आंतरिक समय होता है। जहाँ वह जीती है और सांस लेती है। दूसरी ओर होती है समय की चुनौतियां। उनके जीवन व सृजन के बीच अनवरत युद्ध की स्थिति बनी रहती है। उनकी राह में व्यवधान है। विचारक विक्षेप, दुविधाऐं एवं द्वन्द्व हैं।
कितने कटघेरे हैं
है कितनी अदालतें
फिर भी अन्याय से
घिरी हैं हम !
कितने हैं ईश्वर-अल्लाह
हैं मूसा और गुरु
फिर भी कितना है
अधर्म!
देश में है पूरी आजादी
फिर भी
कितने खूंटों से
बंधी हैं हम!
(जेबा रशीद)
शिक्षित होने के साथ ही नारी ने जाना है वह नारी है और नारी होते हुए अपना समस्त स्त्रीत्व संजोकर उसे पुरुष के साथ खडे होने का अधिकार है। क्योंकि वह सक्षम है। नारी को पुरुष बनकर पुरुष के समकक्ष खडा नहीं होना है। बल्कि पूरक शक्ति के रूप में उभरना है।
महिलाओं में संवेदना का अतुलिय खजाना होता है। नारी अपनी अनुभूतियों और संवेदनाओं का कलम के माध्यम से जब पहले पहल १९०६-०७ में कागज की जमीन पर उकेरा तब उत्कृष्ट साहित्य सृजन कर सबको चकित कर दिया। पाठकों ने सराहना की तो साहित्य समीक्षक और लेखकों द्वारा नारी को साहित्यकारों की पंक्ति में बैठाना गवारा नहीं हुआ। महिला द्वारा हुई अभिव्यक्तियों को नकारने की कोशिश की गई। सामाजिक परम्पराओं को चुनौती देने की पथभ्रष्टता कहा गया किन्तु निडर महिला रचनाकारों ने अपनी साधना जारी रखी। १९०६-०७ के दौरान बंग महिला ने साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा और २००६-०७ तक सौ साल पूरे होने जा रहे है।
महिला लेखन की शुरुआत का श्रेय बंग महिला को जाता है। आज साहित्य की विभिन्न विधाओं में महिलाओं से कोई क्षेत्र अछूता नहीं रहा !
स्त्री लेखन का मुद्दा तो एक रणक्षेत्र है। पर लेखन के क्षेत्र में केवल औरत पूरी समाज व्यवस्था है। महिलाओं की संवेदनशीलता अन्तर्दृष्टि सबसे बढकर पीडा जो सदियों से उनके खाते में संचित होती आई है। रचनात्मक साहित्य सृजन में विशेष रूप से महिलाओं की भागीदारी में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
जब स्त्री लिखती है तो एक जिम्मेदारी उठा रही है। मैं सोचती हूँ कि चाहे अनुभूति कितनी ही तीव्र व संवेदना कितनी ही संघन और तरल क्यों न हो भोक्ता और दृष्टा की संवेदना में अन्तर होता ही है। पुरुष वर्चस्व के चलते साहित्य क्षेत्र में महिला लेखन पर यह व्यंग्य आरोपित हुआ कि ‘महिला लेखन इसलिए छप रहा है कि वे महिला है।’ और ऐसा सोचना…यह आक्षेप पुरुष विकृत मानसिकता एवं हीनता का शिकार होने की पराकाष्ठा है।
एक साहित्यिक अत्याचार यह भी है कि महिला लेखन नारी हित तक ही सीमित है। यह दूसरा आक्षेप है। समाज में व्याप्त जटिलताओं और संघर्ष से अलग घर की चार दीवारी में सिमटा घरेलू लेखन है। इस तरह महिला सृजन को कटघेरे में खडा करना उचित नहीं। समस्यायें तो शोषित की ही होती हैं।
किसी रचना को जन्म देते समय अपने एकान्तिक क्षणों में लेखक में वर्गीकृत करना न्याय संगत कदापि नहीं। रचनाकार केवल रचनाकार होता है। महिला सृजन नई दृष्टि से स्वयं को और समाज को पहचानने की एक ईमानदार चेतना से जुडा है।
महिला लेखन पुरुष लेखन वर्गीकरण मुझे नहीं जंचता ! लेखन अतः लेखन होता है चाहे स्त्री करे या पुरुष!
लेखन-लेखन होता है इसमें भेद क्यों’ स्त्री पुरुष के बीच की वर्जनाओं की बाड टूट चुकी है। एक दूसरे को समझने के पर्याप्त अवसर हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों में दोनों की भागीदारी है। अतः लेखन में स्त्री पुरुष भेद अप्रासंगिक हो चुका है। अब तो परिवेश की चुनौतियों को चित्रित करने वाला साहित्य ही चिर स्थायी होता है।
वैयक्तिक स्वतन्त्रता के नाम पर स्त्री को हर कहीं बेवकूफ बनाया जा रहा है। कहीं उसका मातृत्व छिना जाता है तो कहीं बालिका भ्रूण हत्या कर दी जाती है। तलाक या पुनः विवाह पर स्त्री शोषण!
इन्हीं अनुभवगत दौर पर चलती लेखनी जब प्रकाशन मार्ग ढूंढती है तो सम्पादकों द्वारा स्त्री लेखन ‘चूल्हे चौका’ का लेखन कह खेद सहित लौटा दिया जाता है।
महिला रचनाकारों ने देश धर्म की तर्ज पर रचनाऐं की तो गाज उसी पर ही गिरी। लेकिन लेखिकाओं ने हार नहीं मानी। जब से महिला ने हाथ में कलम थामी तो सामाजिक सरोकारों पर कलात्मकता और ईमानदारी के साथ निडर महिला रचनाकारों के प्रयास से परिवर्तन आया। उनके लिए अब महिला रूपक न लिंग है न आधी दुनिया। वह समाज है। एक सतत् परिवर्तनशील समाज!
लेखन एक बडा अनुशासन है। महिला लेखन को छोटे खाने में कैद नहीं किया जा सकता। महिला रचनाकारों ने साहित्य के माध्यम से जन जागरण का अलख जगाया और कामयाबी से बढ रही है।
स्वतन्त्रता के नाम पर परिवार तोडने नहीं जोडने हैं। पुरुष में केवल कारमित्री शक्ति है और महिला में कारमित्री एवं भावमित्री शक्ति का मंजुल समन्वय है। ज्ञान का भाव संवेदना और शालीनता का अधिष्ठान है। इसलिए महिलाओं को परिवेश की चुनौतियों का सामना करने में कठिनाइयां होते हुए भी सफलता पाती हैं।
हमारी शताब्दी की बुनियादी समस्याऐं जख्म और उपलब्धियां जिन्होंने समूचे विश्व के रचनाकारों को आंदोलित किया है उसमें महिला लेखन की उपलब्धियों का मूल्यांकन किया जाए। आज महिला लेखन का स्वरूप बदल गया है। हम बोलने का, कुछ करने का अधिकार मांगती हैं। जो साहित्यकार हैं वो महिला मांगती हैं पुनः परिभाषित करने का अधिकार। जो भी हमें परिभाषाऐं थमाई गई हैं उन्हें दूबारा परिभाषित करने का अधिकार चाहती हैं।
काल के शिलाखण्डों को तोडती सजग रचना धर्मिता के निरन्तरता बोध ने लेखिकाओं को सदैव सामाजिक सरोकारों से जोडे रखा है। समाज हमारी धारणाओं की रंग भूमि है। उनका सृजन संसार भी समाज को प्रतिबद्ध है। लेखिकाओं का साहित्य अंतरंग परिवेश का उद्घाटन अश्रुविगलत दीन पुकार में नहीं वरन एक वस्तु प्रयोजनवाली लोक कल्याणकारी चेतना में अलग-अलग भंगिमाओं में अभिव्यक्ति पा गई है जिसे सामाजिक सरोकारों के विभिन्न स्तरों पर केन्द्रित किया है।
शताब्दी के सभी प्रसंग, संदर्भ एवं संकट यही वे मूल मुद्दे रहे हैं जिन्होंने महिला लेखन को प्रभावित किया है। आंदोलनों और कोलाहल के युग में साहित्य की शांत मौन साधिकाऐं बिना कोई आन्दोलन मुद्रा अपनाए पीडत शोषित की व्यथा को अपने संवेदनशील तरल अभिव्यक्ति देने वाली रचनाओं में सृजनरत है।
महिला लेखन की सबसे बडी सीमा यह भी है कि वे आज भी पुरुष सत्तात्मक समाज में बेबाक अभिव्यक्ति का साहस नहीं जुटा पाती। उनका दबा स्वर रुढयों की चादर ओढे हुए है। आज शीर्षस्थ पत्रिकाओं में खुलेपन, बोल्डनेस के नाम पर कुंठित इच्छाओं का अतिरेक है। वे भाषा के नाम पर तमाम गालियां जिन्हें भले लोग सुनना या पढना नहीं चाहते। वे स्वयं भी जानते हैं कि ये साहित्य को विकृत कर रहे हैं। फिर भी पत्रिकाओं के पृष्ठों में स्थान मिलता रहे इसलिए ऐसा लिखते हैं। अश्लीनता की सीमा पार करना नाम और पैसा कमाने के लिए ऐसा कहाँ तक उचित है !
दबा स्वर यह भी उभरता रहा है कि स्थापित लेखक अपनी आत्ममुग्धा और अपनी सिद्धहस्ता के पूर्वाग्रह एवं खेमेबाजी के चलते महिलाओं के श्रेष्ठ लेखन को खारिज करा अपनी स्तरहीन रचनाओं को स्थापित करा लेते हैं।
साहित्य के इस मोड पर महिला साहित्यकारों के लिए चुनौती है वे स्वतन्त्रचेता संस्कारित हैं। उनके लेखन में कोई पहलू नहीं घूटा है किन्तु भाषा शिल्प का झीना अवगुंठन मौजूद रहता है जो रचना के सौन्दर्य की वृद्धि करता है। महत्वपूर्ण रचनाऐं आंकलन से बाहर कर दी जाती है। चंद अपवादों को छोडकर महिलाओं को दोयम दर्जे की समझने की प्रवृत्ति भी घातक है।
एक लेखिका पहले मां होती है फिर पत्नी और तीसरे स्थान पर उसका रचनाकार होता है। महिला लेखन की एक और सीमा है कि प्रायः घर और नौकरी के पश्चात शेष बचे समय की ‘पार्ट टाइम’ लेखिका होती है।
ओढी हुई जिम्मेदारियों के चलते उसे लिखने पढने के अवसर एवं समय कम मिलता है ! फिर भी ज्ञान व सोच और अनुभूति के आधार में तपकर जीवंत रचनाऐं सामने ला रही हैं। क्योंकि महिला लेखन में जीवननुभव और व्यापक दृष्टि है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
आम भारतीय नारी के विषम जीवन को कठिनतर बनाती ये चुनौतियां अन्य कार्य क्षेत्रों में सक्रिय जागरूक महिलाओं की तुलना में सृजनात्मक लेखन को समर्पित लेखिकाओं की चुनौतियां अधिक हैं!
इतने लम्बे समय बाद भी आज साहित्य की मर्यादा, अनुशासन और गरिमा के बोध के स्थान पर सतही लेखन और समझौतावादी मनोवृत्ति व अन्याय के खिलाफ कितने हाथ उठते हैं। दूसरी और श्रेष्ठ और उत्कृष्ट लेखनकर्म में लगी लेखिकाओं को कहीं निर्वासन की पीडा भी झेलनी पडी। कई लेखिकाओं का सार्थक और श्रेष्ठ लेखन प्रकाशन की दहलीज पर पडा है।
वस्तुतः १९९० के बाद सामान्तया महिला लेखन में समग्रतः जो क्रान्ति जागृति और जुझारुपन आया है जो गुणात्मक और संख्यात्मक अभिवृद्धि हुई है वह निश्चित ही सुखद संकेत है।
लोभ और हाशिये पर ठहरी हुई जिंदगी के गूंगे दर्द की गठरी लादे अन्दर की पसरी स्याही के बावजूद भी अदम्ब आस्था सुनहरी सुबह के लिए उजालों के चिन्ह की संकल्प दोहराती है!
जीवन मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों और पुरानी आस्थाओं को आत्मसात करने वाली महिला रचनाकारों का कहना है कि समकालीन लेखिकाओं ने अपने परिवेश और समस्याओं से आँख मिलाकर उनके भीतर तक झांका है। अपने सामाजिक दायित्व बोध को विस्तृत आयामों का स्पर्श कर सम सामयिकता के प्रति सजग रही है।
महिला रचनाकर्मियों ने तल में जाकर छानबीन की है उनको संघन जटिलताओं के प्रति अपने नुकीले आक्रोश को भी प्रतीकों में व्यक्त किया है।
लेखिकाओं ने रुमानी चेतना स्वकिय सम्बोधित होते हुए भी उसमें युग परिवर्तन की संकल्पना का संदेश है अपनी निष्ठा में आश्वस्त उनका रचना संसार अपनी निज की मौलिक बुनावट से अपनी जमीन स्वयं बनाई है! अपनी क्षमताओं का परिचय देती आई है। अनुभूतियों की तपिश ने उन्हें अभिव्यक्ति के क्षण दिए हैं। उनके चिन्तन को एक नया आकाश दिया है। नई सोच की जमीन दी है। अधूरे बिम्बों की कलात्मक संयोजना ने भाव और भाषा के नये क्षितिज तलाश किए है।
नारी साहित्य लेखन एक और स्वातः सुखाय है तो दूसरी ओर जन हिताय है नारी साहित्य इस परिवर्तन युग का शुभचिंतक है।
यद्यपि महिला लेखन आज स्पर्धा के युग में चुनौती है। फिर भी उसे हर स्थिति का सामना करने में उसे किसी वैसाखी की जरूरत नहीं। अपितु वह स्वयं मार्ग ढूंढ स्वयं अपने हस्ताक्षर बना रही है।
अत्यंत सयंत व शालीन बने रहकर सृजन करना भी एक चुनौती है। महिला रचनाकार ऐसा करती आ रही हैं। निर्भयतापूर्वक सोचना और लिखना होगा आज की यह जरूरत है।
हम चुनौतियों में तब ही सफल हो सकती हैं जब हम अपने सामाजिक सरोकार के हिसाब से किसी न किसी रूप में एक्टिविस्ट हो साथ में घर गृहस्थी भी सफलता से निभाएं! सृजन की शक्ति उसके पास है जो उसके लेखकीय सरोकार को नवीन अभिव्यक्ति की क्षमता देती आई है और देती रहेगी।
इतना ही कहूँगी कि नारी धीरे-धीरे आत्मबोध अनुप्राषित हुई है। फिर भी वह अपने ढंग से प्रतिष्ठित होने के लिए संघर्षशील रही है। इसलिए विरोध-अवरोध तिरस्कार-बहिष्कार को नकारते हुए उसे आगे आना होगा। तब ही समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है और अपनी सार्थकता को सिद्ध भी।
हमें ठोस चिन्तन का प्रमाण देना है व इस दंभ से बचना होगा कि चूंकि स्त्री है अतः स्त्री समस्याओं या भावनाओं को वही बेहतर समझ सकती है। वह सृजन के क्षेत्र में पैर रख रही है न कि किसी रणक्षेत्र में। नारी मुक्ति का संघर्ष लम्बा है और इसे मुख्यतः स्वयं नारी को लडना है। लेकिन यह लडाई पुरुष वर्ग के विरुद्ध न होकर व्यवस्था के अन्तर्विरोधों व पुरुष प्रधान समाज से निथरे नारी विरोधी अवमूल्यों के प्रति होनी चाहिए! समाज व अपनी संस्कृति से जुडी वर्तमान परिवेश की चुनौतियां स्वीकार करके ही महिला सृजन सफल हो रहा है और होगा!
समसामयिक काल में नारी समता की एक नई चेतना भारतीय समाज में व्याप्त हुई हैं! बहुत प्रसन्नता की बात है कि स्त्री लेखन की चर्चा अब हर जगह होने लगी है। यह निश्चय ही महिला रचनाकारों के बढते महत्त्व को रेखांकित करता है।
महिला लेखन का अर्न्तद्वन्द्व अभी जारी है…
सदियों से जिस झाड-झंखाड भरे कंटीले, उबड-खाबड रास्ते पर वह दौडती चल रही है, वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। मंजिल अभी बहुत दूर है।

साभार- जेबा रशीद

 

मैं अपनी बात दो कवितांशों से आरम्भ करना चाहती हूँ-
‘यह दीप अकेला / स्नेहभरा / है मदमाता/पर इसे पंक्ति को दे दो’
तथा-
राजा को / रथ हाथी घोडे / आम जनों को / पद यात्राएँ।
ऐसा / सुख सुविधाओं का / है बँटवारा /
उनको मीठा पानी / बाकी जल खारा /
उनको / जीने की हर गारंटी / आम जनों को हैं / हत्याएँ।
उनको इतिहासों का पन्ना-दर-पन्ना/ बाकी के लिए / सिर्फ हाशिया।
उनके सच की कोई शर्त नहीं / बाकी सबका / बयान हल्फिया।
उनकी है / निर्मल भागीरथी / आम जनों को / बस कुल्याएँ।
ये दोनों उदाहरण दो अलग-अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं। पहला उदाहरण हमारे उस चिन्तन को बल देता है, जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनो’ के भाव से ओतप्रोत है और चिरकाल से जिसे हम स्वीकार करते आए हैं। दूसरा उदाहरण उस ‘अदर’ (अन्य) की व्याख्या करता है जो आज के परिप्रेक्ष्य में ‘उपेक्षित’ का पर्याय है और जो आज का सच बयान करता है। उस सच का जिसमें सदियों से उपेक्षा के शिकार बने ‘हाशिए’ के लोग हैं और पूरे वैश्विक परिदृश्य में ‘तीसरी दुनिया’ के लोग हैं।
हालाँकि, साहित्य के परिपक्ष्य में ‘स्व’ (सैल्फ) और ‘अन्य’ (अदर) की परिकल्पना इतिहास या समाजशास्त्रीय परिकल्पना से बिल्कुल भिन्न है। साहित्य सब कुछ बाँध कर चलता है, सार्वदेशिक, सार्वभौमिक, सार्वकालिक की बात करते हुए बूँद के समुद्र में विलयन की बात लेकर चलता है जबकि आज का समय जिसे हम उत्तर आधुनिक या ‘उत्तर उत्तर आधुनिक काल’ कह रहें हैं वह ‘डीकन्सट्रक्शन’ को लेकर चलता है। वह व्यक्ति ‘अस्मिता’ को महत्त्व देता है। वहाँ भी ‘विश्वग्राम’ की परिकल्पना अवश्य की गई है। पर इस विश्वग्राम में न ग्रामों की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित है, न प्राकृतिक। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भौगोलिक दूरियों को कम कर दिया है पर दिलों की दूरियों को बढा दिया है। यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि साहित्य इतिहास नहीं है न इतिहास का पुनरावलोकन है। उसमें ‘काल’ के तीनों आयामों पर दृष्टि रहती है, इतिहास की तरह केवल अतीत से ही नहीं। इसलिए इतिहास मूलतः ‘दूसरों’ के बारे में बोला या लिखा जाता है, साहित्य ‘स्व’ और ‘पर’ दोनों के। हम कह सकते हैं-
‘कविता वक्तव्य नहीं गवाह है
कभी हमारे सामने
कभी हमसे पहले/कभी हमारे बाद
… … … … … … … …
उसे कोई हडबडी नहीं कि वह इश्तहारों की
तरह चिपटे /
जुलूस की तरह निकले।
नारों की तरह लगे /
और चुनावों की तरह जीते
… … … … … … … …
वह आदमी की भाषा में /
कहीं किसी तरह जिंदा रहे, बस।
स्पष्ट है कि साहित्य सदैव व्यापक परिप्रेक्ष्य लेकर चलता है। इस दृष्टि से हम अपने भारतीय साहित्य पर नजर डालें तो पाते हैं कि हमारा वैदिक वाङमय ‘स्व’ और ‘अन्य’ का विभेद नहीं करता, वहाँ
‘स्रं स्रं स्रवन्तु सिन्धवः, सं वाताः सं पतत्रिणः,
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां, संस्राव्येण हविषा
जुहोमि’ (अर्थवेद)। /१५/१
अर्थात्-छोटी नदी बडी नदी से मिलकर बडी बन जाती है, हल्की हवा के झोंके मिलकर तुफान बन जाते हैं, आपस में मिलकर पक्षी भी अपना झुण्ड बनाते हैं, इसी तरह लोग इस जीवन-यज्ञ, जो संयुक्त शक्ति आयोजित किया गया है, में साथ आएँ / -इस भाव को महत्त्व दिया गया है।
‘एकोऽहं बहुस्यामः’ की भावना हमारे साहित्य में निरन्तर पोषित होती रही है और कभी ‘तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न हूँ’ (कबीर) के रूप में प्रकट होती रही है और कभी
‘मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल,
रजकण पर जलकण हो बरसी
नवजीवन-अंकुर बन निकली’ (महादेवी वर्मा)-
के रूप में।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल उद्घोषणा करते हैं कि कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बंधों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है’ (कविता क्या है), लोंजाइनस की दृष्टि में भी कविता वह है जो ‘पाठक को उसके स्तर से ऊपर उठाए ;स्पजिपदह जीम तमंकमत वनज व ीपउेमसद्धि और हजारी प्रसाद द्विवेदी भी जीवनकी सार्थकता अपने को ‘दलित द्राक्षा की तरह निचोडकर दे देने में’ ही मानते हैं। दरअसल, साहित्य के परिप्रेक्ष्य में यह अवधारणा बहुत महत्त्वपूर्ण रही है कि साहित्य वह जो पाठक को परदुःखकातर बना दे। इसके लिए चाहे स्वयं विलीन ही क्यों न होना पडे- ‘नींव के भीतर दबकर ईंट अपना अस्तित्व इसलिए मिटा देती हैं ताकि उसके ऊपर सुन्दर भवन बन सके’। बकौल हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘अपने सर्वोत्तम से मनुष्य की सेवा करके रिक्त होने पर ही रचनाकार की सार्थकता है वैसे ही जैसे अपने को निःशेष भाव से समर्पित करने पर मेघ की-
‘आश्वास्य पर्वतकुल तपनोष्मतप्तं
दुर्दाववहृ विधुराणि च काननानि,
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा
रिक्तोऽसि यज्जलद्! सैव तवोत्तमश्रीः’
(हे मेघ! पर्वतकुल को आश्वस्त करके, दावाग्नि की ज्वाला से दहकती हुई वनभूमि को शान्त करके, नाना नद-नदियों को पूर्ण करके जो तुम रिक्त हो गए हो, यह तुम्हारी उत्तम श्री है।)
शेष सृष्टि से समरस करने की क्षमता साहित्य में है। रमेश चन्द्र शाह का कहना है -‘महान् कलाकारों में विराट् की चेतना और विराट् से जुड सकने की क्षमता भी असाधारण होगी। इसीलिए तो वह ‘अनुभव’ (रचनाकार का अनुभव) अपने सम्पूर्ण ताजेपन के साथ उनकी कृति में सुरक्षित रहता है और हममें अपनी पात्रता के अनुपात में वह हममें संक्रमित हो जाता है- अपने आप। जाहिर है कि कलाकृति में व्यक्त अनुभव सभी संवेदनशील पाठकों के अनुभव बन जाते हैं।
यह अवधारणा व्यक्ति को समाज से, समाज को राष्ट्र से और राष्ट्र को विश्व से जोडती है और इस तथ्य की बार-बार उद्घोषणा करती है कि- ‘छव वदम बंद सपअम पद प्ेवसंजपवदश् यह बात अलग है कि अस्तित्ववादी दर्शन यह मानकर चलता है कि ‘बच्चा जब पैदा होता है, उसकी कोई अइडेन्टिटी नहीं होती, धीरे-धीरे उसे एक पहचान मिलती है जो उसे परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व से जोडती है।’ यानी उसे जो पहचान मिलती है, वह ‘अन्यों’ से ही मिलती है। हम यहाँ एक कहावत उद्धृत कर सकते हैं- ‘अकेला चना भाड नहीं फोड सकता’। वस्तुतः अकेले व्यक्ति की प्रतिस्पर्धा और दुःख भरे जीवन को वर्ग की सदस्यता द्वारा ही रोका जा सकता है।
किन्तु यह साथ-साथ चलने, साथ-साथ रहने, संगठन की शक्ति को पहचानकर अपने, अपने परिवार के, अपने समाज के और अपने देश के कल्याण की कामना का भाव आज के समय के सच से परे है। यदि आज हम-
‘कह दो शंकर से आज करें
वे प्रलयनृत्य फिर एकबार
सारे भारत में गूँज उठे
हर-हर बम-बम का महोच्चार
ले अंगडाई हिल उठे धरा
फट जाए कुहा, भागे प्रमाद
यह आह्वान करते हैं तो उसका वह अपेक्षित प्रभाव नहीं पडेगा, जो राष्ट्रीय आन्दोलन के परिपक्ष्य में पडा होगा। आज तो व्यापकता की अभिलाषा लेकर चलने वाला निष्फल होकर धीरे-धीरे संकुचित होकर अपने ही दुःखों की दुनिया में खो जाता है-
‘और धीरे-धीरे एक दिन
‘ ‘ ‘ ‘ ‘
विश्व से राष्ट्र/राष्ट्र से प्रदेश/प्रदेश से नगर/
और नगर से ‘मैं’ बनकर/अपने में समा जाता हूँ।
पीठ पर से विश्व लुढक पडता है
और छाती में से राष्ट्र
यह सच आज का सच है। समय के सच को नकारा नहीं जा सकता और समय का सच यह है कि आज पूरा विश्व एक ऐसी दिशा की ओर बढ रहा है, जिसमें कुछ भी स्थिर नहीं है। चलताऊ भाषा का प्रयोग करें तो सब कुछ हौचपौच चल रहा है। नीत्शे द्वारा ईश्वर की मृत्यु, फूफूयामा द्वारा इतिहास की मृत्यु, इलियट द्वारा एक प्रकार के उपन्यास की मृत्यु, देरिदा द्वारा लिखित शब्दों की मृत्यु की घोषणा के साथ-साथ बाजारीकरण के बढते प्रभुत्व, व्यक्ति की स्वायत्तता पर उठते प्रश्नचिह्नों और ‘शब्दों की मिटती सत्ता’ के समय में साहित्य भी समय की नब्ज को टटोल रहा है। आज हमारी स्वतन्त्र सोच कहाँ है’ विज्ञापनी दुनिया द्वारा हमें जो कुछ परोस दिया जाता है, वही हम लपकते हैं। इस संस्कृति में हम वस्तु की गुणवत्ता के स्थान पर वह खोजते हैं जिसके साथ कोई ‘फ्री’ स्कीम हो। ऐसे समय में ‘स्व’ (ैमस) और ‘अन्य’ (वजीमत) विषयक सोच में परिवर्तन आना बडा स्वाभाविक है। इस परिप्रेक्ष्य में सात्र की दो पुस्तकों-‘बीइंग एण्ड नथिंगनेस’ (१९४३) और ‘क्रिटीक ऑफ डाइलेक्टिकल रीजन’ (१९६०) का ध्यान आता है, जिसमें उन्होंने ‘एलिअनेशन’ (अजनबियत) के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए ‘दूसरे’ (वजीमत) की उपस्थिति को नरक की संज्ञा दी- ‘द हेल इज अदर पीपुल’ कहा और उद्घोषणा की कि ‘दूसरों के लिए मैं और मेरे लिए दूसरे ‘वस्तु’ बन जाते हैं। दूसरों की उपस्थिति मात्र से व्यक्ति अपने से अलग हो जाता है क्योंकि उसकी चेतना दूसरों की ओर उन्मुख हो उठती है११।
साहित्य ‘समय’ के साथ चलता है इसलिए आज के समाज में परिव्याप्त होते उन अजनबीपन का प्रभाव उस पर पडना बडा स्वाभाविक है। आज के परिप्रेक्ष्य में ‘अपने और पराये’ का भाव, जो रवीन्द्रनाथ त्यागी के इन शब्दों में बडे ही प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया गया है- ‘मेरे बच्चे बच्चे, तेरे बच्चे जनसंख्या- साहित्य में कामू जैसे साहित्यकारों द्वारा काफी समय पूर्व अभिव्यक्त होने लगा था। कामू के ‘अजनबी’ का प्रसंग लेना यहाँ अप्रासंगिक नहीं है। ‘अजनबी’ का पात्र ‘द मर्डरर’ अपनी माँ की लाश के सिरहाने बैठा हुआ है और अपनी माँ के विषय में नहीं सोचता, पूरे दुनिया-जहान की बातें सोचता है। इसी सन्दर्भ में मेरे जेहन में प्रेमचन्द की ‘कफन’ कहानी बार-बार उभरती है जिसके पात्र घीसू और माधव प्रसव पीडा से कराहती अपनी पत्नी और पुत्रवधु से नितान्त असम्पृक्त होकर अलाव के सामने बैठे हुए भुने हुए आलू निकाल-निकाल कर खाते रहते हैं और दुनिया-जहान की बातें करते रहते हैं। दोनों में से एक भी उठकर अन्दर नहीं जाना चाहता क्योंकि उन्हें भय है कि यदि एक अलाव के पास से उठकर गया तो दूसरा आलू का बडा भाग साफ कर जाएगा। उनका चिन्तन है- ‘नया कफन चाहिए। यह भी कैसा रिवाज है कि जिसे जीते-जी फटा चीथडा नसीब नहीं हुआ, उसे मरने के बाद नया कफन चाहिए’ – और कफन के लिए माँगे गए पैसों को ताडीखाने में उडा देते हैं- निर्मम शोषण-चक्र ने उन्हें ऐसे अँधेरे में फेंक दिया है जहाँ मानवीय मूल्यों की पहचान लुप्त हो गई है।
यहाँ प्रेमचन्द के बहाने से जिस ‘आम आदमी’ या आज के सन्दर्भ में ‘अदर’ की चर्चा की शुरुआत होती है, वह ‘अदर’ भारतीय वाङ्मय के पारम्परिक स्वरुप में इससे पूर्व नजर नहीं आता। ‘अन्य’ के परिप्रेक्ष्य में अब जब औपनिवेशिक चिन्तन को नकारा जा चुका है, साहित्यिक मूल्यों, मान्यताओं के सन्दर्भ में भी प्रश्न उठने स्वाभाविक है। सवाल यहाँ यह उठता है कि हमारा साहित्य किसके द्वारा और किसके लिए रचा गया ‘ जाहिर है कि ‘हाशिए’ के लोग वहाँ किसी गिनती में नहीं आते, क्योंकि समाज में उनका स्थान ‘व्यक्ति’ के रूप में नहीं ‘वस्तु’ के रूप में किया जाता रहा। परिणामतः हमारा लगभग सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य जिन महानायकों की परिकल्पना करता रहा है और उन्हें ‘धीरोदान्त, धीर ललित, धीर प्रशान्त और धीरोद्धत’ जैसे गुणों से अलंकृत करके उन्हें ‘वज्रादपि कटु और कुसुमादपि मृदृ’ कहता रहा है, आज अपने अर्थ खो चुके हैं। संस्कृत के बाद प्राकृत, अपभ्रंश काल में भी नायकों की कमोवेश यही परिकल्पना रही। हाँ, अपभ्रंश में प्रबन्ध काव्यों के अतिरिक्त चरित्र काव्यों या कथा रूपों में ‘नायक’ की यह परम्परा थोडी परिवर्तित हुई और ‘भविसयतकथा’ जैसी रचनाओं के नायक ‘क्षत्रिय’ न होकर ‘वणिक पुत्र’ होने लगे, हाँलाकि इन रचनाओं के मूल स्वरूप वही थे, जो उनकी पूर्ववर्ती रचनाओं के थे, पर सरहपा, कण्हपा इत्यादि सन्तों की रचनाओं में ‘संदेस-रासक’ में और हेमचन्द्र के दोहों में आम आदमी का चुफ से प्रवेश तो होने ही लगा था।
यहाँ हिन्दी के रीतिकाल में लिखा गया यह दोहा याद आता है, जो जहाँगीर द्वारा नूरजहाँ की शान में कवि वाणी से निकला –
‘आध सेर शराब मुझको, एक सेर शराब हो,
सारी सल्तनत नूरजहाँ की, खून हो कि खराब हो।’
यह चरित्र साहित्य के बदलते सरोकारों की ओर इंगित करता है, जिसमें राजा प्रजा के लिए ‘सन्तति’ का भाव नहीं रखता, जिसमें ‘मूलन की ही अधोगति केशव गाइए’ कथन अपनी सार्थकता खो बैठता है और जहाँ आपसी रिश्तों के बीच एक दीवार खडी दिखाई देती है, एक ऐसी दीवार – जो सूर्य की रोशनी को सपनों तक, सच तक नहीं आने देती, और अनायास यह कविता यहाँ ध्यान में आ जाती है-
It was a long time ago
I have almost forgotten my dream
But it was there then
In front of me Bright like a sun
My Dream
And then thee wal rose
Rose slowly
Between me and my dream
Rose slowly slowly
Dimming
Hiding
The light of my dream
Rose until it touched the sky
The wall (As I grow older)
(धर्मवीर भारती द्वारा इस कविता का अनुवाद किया गया है-
बहुत दिन हो गए / मैं अपने सपने को लगभग भूल चुका / लेकिन सपना अनश्वर था/ मेरे सामने / झिलमिलाते हुए सूरज की तरह / मेरा सपना और फिर दीवाल उठी / धीरे-धीरे/मेरे और मेरे सपने के बीच/उठती गई धीरे-धीरे/मेरे सपनों की रोशनी/धुँधुला करते हुए/रोशनी का गला घोंटते हुए/यहाँ तक कि आकाश चूमने लगी/वह दीवाल), – (सपना और दीवाल)
यह वह दीवार है जो ‘अजनबियत’ को प्रश्रय देती है।
प्रेमचन्द के साहित्य से साहित्य जगत में बाकायदा प्रविष्ट ‘अन्य’ की निराशा, वेदना, पीडा, व्यथा, कुण्ठा, एकाकीपन, मृत्युबोध और ‘अजनबियत’ – जिसका प्रभाव पूरे विश्व-साहित्य पर पडा था और दोस्तोवस्की, काफ्का, कामू, सार्त्र आदि के साहित्य में दृष्टिगत हो रहा था – हिन्दी के अनेक अस्तित्ववादी उपन्यासों – त्यागपत्र (जैनेन्द्र), सूरज का सातवाँ घोडा (धर्मवीर भारती), अजय की डायरी (देवराज), खाली कुर्सी की आत्मा (लक्ष्मीकान्त वर्मा), सारा आकाश (राजेन्द्र यादव), रुकोगी नहीं राधिका (उषा प्रियवंदा), अलग-अलग वैतरणी (शिवप्रसाद सिंह), जल टूटता हुआ (रामदरश मिश्र), बेघर (ममता कालिया) आदि-आदि में अभिव्यक्त हो रहा था। अज्ञेय का उपन्यास ‘अपने-अपने अजनबी’ की दो पात्र ‘युवती योके’ तथा ‘वृद्धा सेल्मा’ आकस्मिक रूप से हुए हिमपात के कारण बर्फ में दबे काठघर में तीन-चार महिनों के लिए कैद हो जाती है और अपने-अपने दृष्टिकोण के पार्थक्य के कारण साथ रहते हुए, खाते-पीते हुए, बातें करते हुए भी एक-दूसरे के लिए अजनबी बनी रहती है। यहाँ ‘अहं की प्रामाणिकता के मूल में चूँकि मृत्यु की भयानक छाया है, आशंका और संशय का विद्रूप आवरण है, व्यथा भरी पीडा और करुणा है। मृत्यु की भयंकरता व्यक्ति में महान परिवर्तन ला देती है, प्रियजन अजनबी हो जाते हैं और अनपहचाने अजनबी आत्मीय बन जाते है – यही इस उपन्यास का मूल स्वर है।
यह ‘अजनबियत’, जिसकी चर्चा मृत्यु, काल और भीड के सन्दर्भ में की गई है उसके प्रभाव के परिणाम स्वरूप एक दूसरे को शंका से देखने, आरोप-अपराध दूसरे के सिर पर मढकर अपने आप से निगाहें चुराने तथा कथित ‘सत्ता’ के मद में दूसरे को तुच्छ समझने के भाव को पोषित करने की बात को ध्यान में रखकर ही सार्त ‘दूसरे की उपस्थिति को नरक’ कहते हैं।
इस अजनबियत के परिणामस्वरूप भारतीय साहित्य में वर्णित प्राचीन नायक का गरिमामय, आभिजात्यता से युक्त, लोकरंजक, मर्यादित रूप जो प्राचीन समय के समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप था, आधुनिक काल तक आते आते स्वातन्य चेतना के उद्घोष के साथ अपने महिमामंडित स्वरूप को त्यागकर गांधी, लोहिया, पटेल आदि के रूप में सामान्य भावभूमि तक आ पहुँचा। लेकिन, स्वतन्त्रतापूर्व तक का साहित्य ‘आमजन के दुःख को एक समान धरातल पर रख पाने की अपनी असीम शक्ति को नहीं पहचान पा रहा था, और इसी परिप्रेक्ष्य में ये सवाल निरन्तर खडे हो रहे थे कि साहित्य किसके लिए है और कैसा होना चाहिए। इन प्रश्नों के परिणामस्वरूप साहित्य में नायक से अनायक की ओर, कथा से कथाहीनता की ओर बढना बहुत ही स्वाभाविक था। ऐसे में ‘अजनबियत’ की अवधारणा का साहित्य में प्रवेश हुआ।
अब नायक पद पर प्रतिष्ठित हुआ – भूखा किसान, भिक्षुक आदि आदि।
उत्तर आधुनिक काल से पूर्व के समाज और साहित्य में ये प्रश्न उठने आरम्भ हो चुके थे कि – सत्य का स्वरूप क्या है’ वह कहाँ है’ मैं कौन हूँ’ मेरी अस्मिता क्या है’ मेरा महत्त्व क्या है (निराला की राम की शक्तिपूजा की ये पंक्तियाँ यहाँ सहज ही स्मरण हो जाती हैं – धिक जीवन को पाता ही आया विरोध / धिक साधन जिसके लिए किया सदा ही शोध) और इसीलिए आज का नचिकेता यम के द्वारा प्राप्त वरदानों के प्रतिदान स्वरूप कोई वैभव-विलास की सामग्री नहीं चाहता, अपितु वह केवल आत्मान्वेषण करना चाहता है-
ये चीजें मेरी हैं / सम्बन्धी मेरे हैं /
धरा, धाम, सभा, बन्धु, पिता, नाम, वर्तमान-
मुझमे हैं- मुझसे हैं-मेरे हैं-
अनजाने, पहचाने, माने, बेमाने
सब मेरे हैं- मैं सबका हूँ
लेकिन मैं क्या हूँ’
मैं क्या हूँ’ / मैं क्या हूँ’
स्पष्ट है कि आधुनिक युग की माँग के अनुरूप साहित्य के परम्परागत रूप में परिवर्तन हुआ परन्तु आधुनिकता में भी समाज के उपेक्षित वर्ग शामिल नहीं थे। यह वर्ग शामिल हुआ ‘अन्य की आवाज’ के रूप में उत्तरआधुनिक समय में। उत्तरआधुनिक समय-जिसे चिन्तकों ने पृथ्वी पर ‘एक नए युग की शुरूआत’ के रूप में चित्रित किया है, एक ऐसे नये युग की शुरूआत के रूप में जिसमें न पारम्परिक समाज है, न संस्कृति ओर न पर्यावरण, जिसमें सत्य और तर्क, नैतिकता, ईश्वर, इतिहास आदि से जुडी धारणाएँ निरर्थक मानी जा रही हैं, जहाँ यथार्थ को भी नकारा जा रहा है, जहाँ ‘अर्थ’ अर्थहीन है और जिसे ‘डीकन्सट्रक्शन’ द्वारा पर्त-दर-पर्त छील दिया जाता है और आफ पास कुछ नहीं बचता। हाँ, यह युग गूँगों का पैरोकार जरूर है। जगदीश्वर चतुर्वेदी का कहना है-
‘….पश्चिमी दार्शनिकों ने ‘अदरनेस’ की खोज करके उसे केन्द्र में प्रतिष्ठित किया है। कल तक जो उपेक्षित थे, वे हाशिए पर थे किन्तु आज वे सभी विचारों के केन्द्र में हैं। आज ये ही मुक्तिदूत हैं। आज सभी किस्म की सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहचानों के बीच में हाशिए के लोगों की नैतिकता केन्द्र में आ गई है। यह पहले की सभी किस्म की नैतिकताओं से मुक्ति की बात भी कर रहे हैं।
पर पूरे वैश्विक परिदृश्य में आज भी ‘अन्य’ यानी खेतिहर मजदूर, मछुआरे, शिल्पी, दलित हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं और जिनकी ‘अस्मिता’ आज भी सुरक्षित नहीं है क्योंकि उन्हे आज भी ‘चुनने’ का अधिकार नहीं है और कोई आश्चर्य नहीं है कि ‘हम’ यानी समर्थ (समरथ को नहीं दोष गुसाईं) के द्वारा वह धीरे-धीरे गोदान के ‘होरी’ की तरह ‘महतो’ से ‘असहाय मजदूर’ बनते जाएँगे और हजम कर लिए जाएँगे।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि
‘अन्य की व्याख्या, उसके शोषण की व्याख्या और उसके यथार्थ की व्याख्या से उसकी दुनिया बदलने वाली नहीं है।
केवल यह कहने मात्र से काम नहीं चलने वाला है कि –
वह महाभारत का एक योद्धा है /
एक अर्धरथी योद्धा /
जिसे रिक्शे पर बैठ अचानक पाते हैं /
वह एक हाथवाला एक रिक्शावाला है।
इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि हम केवल नारों में ही वर्गहीनता की बात न करें। ट्रेन में सीट पर कब्जा जमाते ही अन्दर घुसते दूसरे व्यक्ति को देखकर उसके प्रति कठोर होकर हम इस वर्गहीन समाज की परिकल्पना नहीं कर सकते। अगर दूसरे के प्रति हमारे हृदय में संवेदना नहीं जागती, हमारी आँखों में पानी नहीं आता और कवि यह कहने को मजबूर हो जाता है-
गेहुँए से गोरे हुए उनके चेहरों की ललाई में /
उतनी भर भी फिक्र नहीं घुलती कभी /
जितनी उनके खद्दर के झक्क कुर्ते में नील
तो हम समानता की कितनी भी दावेदारी क्यों न करें, निरर्थक है। पर हम यह बात स्पष्टतः देखते हैं कि आज हम एक वर्गहीन समाज की बात तो करते हैं और इस वर्गहीन समाज के बहुत से पैरोकार शोषक-शोषित के वर्गभेद को मिटाने की बात करते हैं, पर वह वर्गभेद मिटा नहीं, हाँ, परिवर्तित जरूर हो गया है कुछ और वर्गभेदों के रूप में। अब निराला का कुकुरमुत्ता शोषितों का प्रतीक नहीं है, मशरूमों का पर्याय-खादखोर मशरूम का पर्याय बन गया है। यानी इस समाज में कुछ ‘आम’ आदमी खास हो गए हैं और खास होते ही उनकी फितरत भी बदल गई है।
ऐसे समय में यदि वास्तव में अन्य और स्व का भेद मिटाना है तो उसके लिए सबसे जरुरी है आदमीयत को बचाना। यदि आदमीयत बची रहेगी तो अन्य की अस्मिता भी बची रहेगी अन्यथा हम यही कहते रह जाएँगे-
अब वो लालिमा कहाँ / धरती के होठों पर /
अम्बर के होठों की / पानी सारा बहा जा रहा/
नरक की ओर / कौन रोके’ जगह नहीं मिलती /
धरती को जडें जमाने की / कहाँ बसाओगे घर /
कहाँ सेज बिछेगी’
इस दुनिया को बदलने के लिए आज भी ‘दूसरों के लिए अपने को दुःखी कर लेने की, उसके दुःख को सहन करने की भावना जगाना जरूरी है और यह भावना जगाता है साहित्य। इस साहित्य के द्वारा ही अदर और स्व के बीच की खाई पाटी जा सकती है। अतः कहा जा सकता है-
‘जिस दिन मरेगी कविता / नहीं रोयेगा कोई
भी भरा हुआ पेट /
रोयेगा अभाव, रोयेगी पीडा / रोयेगा यथार्थ /
क्योंकि उस दिन के बाद / नहीं रह जाएगी /
उनके लिए लडने वाली / सबसे बडी मुट्ठी।
यहाँ मुझे अमृता प्रीतम की अन्तिम कविता ‘मैं तुम्हें फिर मिलूँगी’ की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करने का लोभ संवरण करना कठिन लग रहा है। इस कविता में अमृता का अपना अस्तित्व विराट् होकर व्यक्त होता है। इमरोज को सम्बोधित इस कविता में अमृता ‘कल्पना में चिंगारी बनकर, सूरज की लौ बनकर, चश्मा बनकर, ठंडक बनकर – धीरे-धीरे प्रकृति के कण-कण में व्याप्त हो जाने की परिकल्पना करती हैं। वे कहती हैं-
‘यह जन्म मेरे साथ चलेगा,
यह शरीर समाप्त होता है
तो सब कुछ समाप्त हो जाता है
पर यादों के धागे
सृष्टि कण के होते हैं
मैं उन कणों को चुनूँगी
धागों को लपेटूँगी
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।
और साहित्य की सार्थकता भी इस बात में है कि व्यष्टि समष्टि में परिणत हो जाय और हम यह उद्घोष कर सकें –
भाव कर्म वाणी स्वतन्त्र हो / किन्तु प्रेम ही मूल मन्त्र हो।
हों समान अवसर सब ही को / हों समान अधिकार।
जयशंकर प्रसाद भी अपनी सुप्रसिद्ध रचना आँसू का समापन इन्हीं शब्दों से करते हैं-
सबका निचोड ले कर तुम सुख सूखे जीवन में
बरसो प्रभात हिमकन सा आँसूं इस विश्व सदन में।
निस्सन्देह साहित्य में वह शक्ति है जो क्षुद्र से क्षुद्र वस्तु को विराट् बना देता है और ‘स्व’ का ‘पर’ में विलय कर देता है। कवि के शब्दों में यह आशा का स्वर सुनाते हुए अब मैं अपनी लेखनी को विराम देती हूँ-
कहना ही होगा हमें / हम प्रलय न होने देंगे /
इस सौर मंडल में/जीवन-ज्योतित पृथ्वी का
गोलक/
घूमता रहेगा अनन्तकाल / मानव की जययात्रा /
शवयात्रा में नहीं बदलेगी…

 

भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का एक पक्ष अपनी भाषा की आजादी का भी था। पूरे भारत की राष्ट्रभाषा-सम्फ भाषा-हिन्दी या हिन्दुस्तानी हो यही मुख्य मुद्दा था। लम्बी जद्दोजेहद के बाद नागरी लिपि में लिखी हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बनी। वह कैसी हो इस सवाल पर संविधान म कहा गया है कि वह सभी प्रादेशिक भाषाओं से शब्द, रूप और शैली ग्रहण करके बनेगी। सभी प्रदेशों के लिए हिन्दी का संस्कृत रूप ही ग्राह्य है, जिसके शब्द सभी भाषाओं में बहुतायत से हैं। व्यक्ति के नाम – सुब्रह्मण्यम भारती, विश्वनाथन, बंकिमचन्द्र, नरसी मेहता, कुसुमाग्रज आदि या स्थान के नाम तिरूअनंतपुरम्, अर्णवकुलम्, कन्याकुमारी, श्रीरंगम्, मुदरई आदि या पानी, नीर, जल जैसे अनेक संस्कृत शब्द उनमें हैं। अतः ग्राह्यता और सुविधा में वही रूप राष्ट्रभाषा को स्वीकार है। पर हिन्दी का हृदय-देश जिस भाषा का प्रयोग आज कर रहा है वह उसका उर्दू-फारसी वाला रूप है, जिसको आमजन की भाषा कहकर धडल्ले से साहित्य में प्रविष्ट किया जा रहा है। यह भाषा-विकृति का एक रूप है जो राजनीति के प्रभाव या दबाव का फल है।

भाषा-विकृति का एकरूप आज के समाचार-पत्रों में तेजी से फैल रहा है। उर्दू प्रभावी हिन्दी तो फैशन और राजनीतिक दबाव में चल रही है। अब उदारीकरण का प्रभाव बडी तेजी से बढा है। बडी आसानी से हिन्दी समाचार-पत्र के एक पृष्ठ पर सैकडों अंग्रेजी के शब्द अपने खाँटी प्रयोग के साथ आ रहे हैं। जैसे ‘सेक्स स्कैण्डल‘, ‘सेक्स राकेट‘, ‘इण्टरव्यू‘, ‘एडमिशन‘, ‘गैंगरेप‘, वगैरह। ये प्रयोग देश के सांस्कृतिक पराभव के सूचक हैं। उधर नयी तकनीक के साथ नए शब्द भी धडल्ले से आ रहे हैं। कम्प्यूटर, ई-मेल, एस.एम.एस., इण्टरनेट, सेन्सेक्स, ई.पी.एफ.। नए नाम अंग्रेजी विद्यालयों के ‘इस्ट टू क्राउन स्कूल‘, ‘लिटिल फ्लावर‘, टिनीटाट, जैसे चल रहे हैं। दिल्ली स्कूल के बडे दिग्गज इसे ‘हिंगलिश‘ कहते हैं। इसका एक नमूना ‘हिन्दुस्तान‘ दैनिक की निम्नांकित भाषा है ः- ”एयर होस्टेस के प्रशिक्षण के लिए फ्लाईंग फैट्स ने नयी दिल्ली स्थित साउथ एक्सटेंशन पार्ट-२ में एयर होस्टेस ट्रेनिंग स्कूल खोला है।‘‘ (१२ जुलाई, २००६) यह भाषायी प्रदूषण है जो देश के आत्मसम्मानशून्य, अस्मिताविहीन, औपनिवेशिक मानसिकता के बडे नेताओं और साहित्यकारों के नाते आ रहा है।

जो भाषा अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं करती वह जीवित नहीं रहती। भाषा राष्ट्र की वाणी होती। भारत माता १४ भाषाओं में बोलती है पर १४ भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने वाली राष्ट्रभाषा हिन्दी है।

सुब्रह्मण्यम् भारती ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानते हुए सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा कहा है। मराठी के शिखर कवि कुसुमाग्रज ने वर्षों पूर्व विश्व मराठी सम्मेलन में कहा था, ”बिना एक राष्ट्रभाषा के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती।‘‘ उन्होंने केन्द्र से माँग की कि महाराष्ट्र से अंग्रेजी को सरकारी तौर पर हटा लिया जाये। महाराष्ट्र के सारे राज-काज मराठी में होंगे और केन्द्र से सम्फ की भाषा हिन्दी होगी, क्योंकि हिन्दी ही निर्विवाद स्तर पर देश की राष्ट्रभाषा है। आज भी संसद के भाषणों में, केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों में, दिल्ली की आम जन्दगी से लेकर खास गोष्ठियों में और साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में अंग्रेजी की प्रेत छाया व्यापक रूप से पसरी हुई है। बिना इससे मुक्त हुए हिन्दी अपने स्वरूप को नहीं प्राप्त कर सकेगी। इसके लिए हमें अपना मन बदलना होगा। हमें राष्ट्रीय सोच अपनानी होगी और आत्महीनता से छुटकारा पाना होगा।

अब हम अपने साहित्य का विचार करें। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिन्दी का साहित्यिक इतिहास भाषा की दृष्टि से भले ही अलग-अलग है, पर भाव और विचार, दर्शन और सोच, पुरुषार्थ और जीवनबोध की दृष्टि यह एक प्रवहमान सतत परम्परा है। यह दो हजार वर्ष से अधिक की परम्परा है। वह क्या उत्तरोत्तर अपने एकहरे रूप में अनूदित होती हुई चली है अथवा कालक्षेप से उसमें परिवर्तन-संशोधन हुए हैं ‘ नयी रचना एक विद्रोही तेवर लेकर आती है। वह किसी पुरानी लकीर को तोडकर नयी रेखा बनाती है। वह रूढयों और विसंगतियों को छोडकर या तोडकर जब आगे बढती है तभी वह कुछ नया दे पाती है। नयापन मनुष्य और समाज दोनों का स्वभाव है। पर एकदम नया कुछ भी नहीं होता। अतः पुराने को तोडकर नए मूल्य स्थापित करना एक जोखिम है और जो रचनाकार इस जोखिम को उठाता है, वही नया रच पाता है और वह कालजयी कृतिकार बन जाता है। जो यथास्थिति में जीता है, पुराने को निबाहता चलता है, वह अपने ही जीवन में विस्मृत हो जाता है। जो उठता है, लडता है, लडकर-मरकर रचता है वह अमर हो जाता है। इस नएपन की एक शर्त है कि वह प्राचीन और परम्परा के जीवन्त और स्वस्थ सामग्रियों का ग्रहण और मृत और अस्वस्थ का त्याग करे तात्पर्य यह कि साहित्य का हर नया अपनी संस्कृति का ही वाहक होता है, उसकी विकृति का नहीं। अपने समय में परम्परा से आगे का नयापन, कालिदास और तुलसी में भी था, कबीर और जायसी में भी और आधुनिक युग में रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द, प्रसाद, निराला आदि में भी है। ये सभी हमारी संस्कृति के पुण्य-प्रवाह के कूल हैं और इनकी समग्रता ही भारतीयता या भारतीय संस्कृति है।

विश्व का कोई भी साहित्य ऐसा नहीं है जो अपने देश की संस्कृति का स्वर नहीं झंकृत करता है। अज्ञेय ने लिखा है, ”जो साहित्य किसी एक संस्कृति का प्रतिबिम्बन करता है, उसका अपना व्यक्तित्व, अपनी अस्मिता होती है और वह व्यक्तित्व उसके क्षेत्र से बाहर पहचाना जाता है। तभी दूसरे संस्कृति-समाजों में उसे महत्त्व मिलता है। अर्थात् तभी वह विश्व साहित्य में स्थान पाता है। जिस साहित्य में संस्कृति का स्वर नहीं बोलता, उसका विश्व-साहित्य में स्थान पाने का सवाल ही नहीं उठता।‘‘ ….जाहिर है कि टालस्टाय को अपने देश के किसानों और आमजन की दशा के चित्रण पर विश्व साहित्य में स्थान मिलता है, तो टैगोर और प्रेमचन्द को अपनी धरती के चित्रण पर।‘‘

भारतेन्दु और महावीर प्रसाद द्विवेदी तो नवजागरण के पुरोधा ही थे। भारतेन्दु ने रचनाकर्म में समाज-देश को स्थान दिया और हिन्दी भाषा की लडाई की सार्थक भूमिका निभाई। ‘सरस्वती‘ का जन्म ही राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के क्रोड से हुआ। उस जमाने के कई कवि ५-६ वर्षों तक जेलों में रहे और कलम से राष्ट्रीयता और जागृति का संदेश देते रहे पर रचना धर्म में ये सभी पुरोगामी रहे। तुलसी के राम मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत‘ में नए रूप में आए। वे स्वर्ग का संदेश देने नहीं, धरती को स्वर्ग बनाने वाले मनुष्य हैं। हरऔध के कृष्ण गोपी-वल्लभ और करिश्माई श्रीकृष्ण नहीं हैं। अपितु लोकसंग्रही और अत्याचार के विरुद्ध संघर्षशील लोकनायक हैं। ये परिवर्तन भी युग की वैज्ञानिक सोच और आधुनिकता के प्रभाव थे। इसी प्रवृत्ति ने आगे चलकर निराला, नरेश मेहता और दिनकर के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

छायावाद के आन्दोलन ने योरोप के स्वच्छन्दतावाद का अनुसरण किया और अनुसरण-अनुकरण की यह परम्परा प्रारम्भ हो गयी। छायावाद ने शैली तो योरोप से ग्रहण की पर अभिव्यक्ति को वेदान्त और प्रकृति-संवेदना से जोड कर उसे आत्मसात् कर लिया। परिणामतः प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी जैसे कालजयी रचनाकार पैदा हुए। छायावाद की भारतीयता पर महादेवी ने दीपशिखा की भूमिका में प्रकाश डाला है। रूसी वोलशेविक क्रान्ति की सफलता ने माक्र्सवाद का आकर्षण बढाया तो हिन्दी में भी प्रगतिशील लेखन का प्रारम्भ हुआ। इस आन्दोलन की जडंे रूस में थीं, यद्यपि यह आया इंग्लैण्ड के मार्फत। इसके प्रतीक कम्युनिस्ट पार्टी और रूसी क्रान्ति के थे। इसने जो अच्छा काम किया, वह यह कि इसने सामन्तवाद, साम्राज्यवाद, पूँजीवाद का विरोध किया और साहित्य को जनता की चीज बनाया। पर बुरा यह हुआ कि यह धर्मनिरपेक्ष, संस्कृति-परम्परा निरपेक्ष होते हुए राष्ट्र-निरपेक्ष हो गया। द्वितीय महायुद्ध में राहुल सांकृत्यायन जैसे लेखक ने आजाद हिन्द फौज की लडाई को जर्मनी की लडाई और मित्रराष्ट्रों के (अंग्रेज के भी) पक्ष को अपना पक्ष बताते हुए भोजपुरी में कई नाटक लिखे। प्रगतिशील लेखन, जनवादी लेखन, समकालीन लेखन के अलग-अलग चेहरों पर इसने योरोप से आयातित लेखन का यह मॉडल ग्रहण किया।

इसीलिए १९६२ के चीनी आक्रमण पर इनका लेखन मौन था और वाणी उसे ‘मुक्ति आन्दोलन‘ बोल रही थी। १९६५ के पाक-आक्रमण के समय दिल्ली के ‘संज्ञा‘ नामक संस्था ने एक साहित्यकार गोष्ठी आयोजित की। प्रश्न था – युद्ध से साहित्यकार का संबंध होता है या नहीं ‘ एक पक्ष उभर कर सामने आया कि सच्चा साहित्यकार इस तरह के कामों में दिलचस्पी नहीं लेता है।

यह साहित्यकारों के ऊपर एक विचारधारा से प्रतिबद्धता का परिणाम था। यह प्रभाव और दबाव राष्ट्रभाव को कम करके देश के मनोबल को गिराने वाला था। देश की सीमा पर सैनिक और देश के अन्दर कलम के सिपाही कदम से कदम मिलाकर लडते हैं तो देश का मस्तक गौरव से उठता है। इस हकीकत को इस आन्दोलन ने नजरअन्दाज किया और देश के मनोबल को गिराया। रूसी लेखक शोलोखोव को नाजी आक्रमण के विरुद्ध लड रही जनता की थीम पर लिखे उपन्यास को नोबल पुरस्कार मिलता है और आजाद भारत में आजादी की रक्षा की लडाई में रचनाकार चुप्पी साध लेता है, यह चिन्तनीय है।

प्रगतिवाद से मोहभंग और आधुनिकता से उत्पन्न परिस्थितियों ने प्रयोगवाद, नयी कविता और नवलेखन को जन्म दिया। प्रगतिवाद की भाँति इन विचारों का दाम भी हमें पश्चिम से मिला। फ्रांस से इसका प्रारम्भ हुआ और स्वतंत्रता इसका मूलमंत्र था। इसमें इन्द्रियबोध की प्रधानता, मध्यवर्ग की घुटन, हताशा और अस्तित्व संकट की ध्वनियाँ थी। इस धारा ने पुराने मूल्यों को तोडा पर कोई नया मूल्य स्थापित न कर सका और मूल्यहीनता का शिकार हो गया। अस्तित्ववादी दर्शन का प्रभाव भी इन पर पर्याप्त पडा। अंग्रेजी उपनिवेश के कारण हमारे सोचने का तरीका पश्चिम के अनुकरण का हो गया। इस अनुकरण की प्रवृत्ति ने हमारे मौलिक चिन्तन को समाप्त कर दिया। हमने इलिएट, पाउण्ड, सार्त्र, लुकाच, ग्राम्सी को अपना मार्गदर्शक मान लिया और उन्हीं के मापदण्डों से अपनी रचनाओं को परखने लगे। यह विचार पीछे छूट गया कि साहित्य अपने देश की दशा और परिस्थिति में सृजित होता है तो वही स्थायी महत्व का होता है। नकल तो नकल होती है।

आज का बडा लेखक और आलोचक आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता और विखण्डनवाद के सहारे अपनी महत्ता और इयत्ता को प्रभावित करता है। पर भारत अभी उन परिस्थितियों से नहीं गुजरा है, जिनसे योरोप के देश गुजर चुके हैं। औद्योगीकरण की चरम परिस्थिति, दो-दो महायुद्धों के दंश और विघटित समाज-व्यवस्था को योरोप ने झेला है। अतः उस प्रकार के साहित्य का यहाँ सहज निर्माण नहीं हुआ। यही कारण है कि नई कविता के आन्दोलन पर नवगीत का आन्दोलन हावी हो गया। नवगीत ने अपनी जमीन की ओर, अपने गाँव की ओर, अपनी संस्कृति की ओर लौटने का नारा दिया। भाषा के नए मुहावरे और उसके आधुनिकततम प्रतीकों-मिथकों को अपनाते हुए भी नवगीत इसी जमीन की जड से जुड गया। अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकार आधुनिकता की सारी दौड लगाकर अन्ततः अपनी जमीन और संस्कृति से जुडने की बात कहने लगे।

नए योरोपीय-अमरीकी लेखन से जो चीजें हमारे यहाँ आयीं, उनमें नग्न देहवाद, मूल्य भ्रंशता, अनिस्थिता, अजनबीपन खास हैं। इनसे हमारे रचनाकर्म को कुछ लाभ नहीं मिला। हमारी संस्कृति में वर्जनाएँ तो नहीं रही हैं। कालिदास का ‘कुमार संभव‘ इसका उदाहरण है। पर हमारी सीमाएँ रही हैं। उनके अतिक्रमण से हमारी निजता समाप्त हो जाती है। हमने एक और प्रत्यय पश्चिम से आयातित किया है, वह है ‘सेकुरलरिज्म‘। यह आया तो राजनीति में पर इसका व्यापक प्रभाव हमारे साहित्य पर पडा। भारत- विभाजन की त्रासदी जितनी बडी थी, उतना बडा रचनाकर्म इसके सही संदर्भ को लेकर नहीं आया। राही मासूम रजा ने ‘आधागाँव‘ में जिन्ना के मिशन को लेकर गाँव-गाँव जाने वाले अलीगढ के काली शेरवानी और टोपी वाले लडकों के कारनामों का जो जिक्र किया है, उससे ज्यादातर लेखक परहेज करते हैं। पाकिस्तान के लेखक शौकत सिद्दिकी अपने उपन्यास ‘खुदा की बस्ती‘ का अन्त करते हैं -”समाज नोशा, राजा, शम्मी और अनू जैसों को जन्म देता है। इनमें से कोई कत्ल करके जेल जाता है, कोई कोढी बनकर एडयाँ रगड-रगड कर मौत की प्रतीक्षा करता है, कोई खून थूकता है और रिक्शा चलाता है और कोई हीजडों के साथ कूल्हे मटकाता है – नारा-ए-तकबीर – अल्ला हो अकबर।‘‘ इस्लामी व मजहबी राज की दशा पर यह करारा व्यंग्य है। हमारे देश का कोई बडा लेखक इन सवालों से टकराने की हिम्मत नहीं करता है। इसके पीछे सेक्युलरिज्म का दबाव रहता है। गोधरा से उपजे गुजरात के दंगे हों या बाबरी ढांचा का ध्वंस, यह तो हमें मर्माहत करता है पर दशाब्दियों से आतंक, नरसंहार और विस्थापन का दंश झेलता कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत के ईसाई व इस्लामीकरण से उत्पन्न अलगाव की प्रवृत्ति या अक्षरधाम, अयोध्या से लेकर बम्बई तक के विस्फोटों पर कलम चलाने में हमारे सेक्युलरिज्म के कल्पित मिशन की नींव ढहने का डर लगता है। यह साहित्य और राष्ट्र के लिए तो खतरनाक है ही, विश्व के लिए भी बडा खतरा है।

आखरी बात मुझे उदारीकरण के परिणामी बाजारवाद के दबाव के बारे में करनी है। आज लेखन के बाजार की बात की जाती है। आज दूरदर्शन के विज्ञापनों ने बाजार के प्रभाव को खूब अभिव्यक्त किया हैं। एक विज्ञापन में एक लडका एक अधनंगी युवती को गोद में लेकर पर्दे पर आता है। उसे चूमते ही वह लडकी एक साइकिल में बदल जाती है और लडका साइकिल को उसी चाव से चूमता है जैसे लडकी को। बाजार तो इसी स्तर के साहित्य से बनेगा। एक प्रकाशक ने बताया कि उपन्यास लेखक गुलशन नंदा को एक लाख तक रायल्टी वार्षिक हमने दी है। बाजार धन से जुडा रहता है, मन से नहीं।

इधर बाजारवाद और धन-लोलुपता से आदमी किस कदर मशीन बन गया है, कितना स्वार्थी और मतलबी हो गया है, इसकी प्रतिध्वनियाँ हमारे वर्तमान साहित्य में तेजी से प्रकट हो रही है। उपन्यासकारों में यौन चित्रों का यथातथ्य वर्णन प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों में भी मिलते हैं। जैसे कविता में आयातित भदेस को नवगीत ने नकारकर अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान को तलाशने की कोशिश की है, उसी प्रकार कथा साहित्य में हिन्दी के कहानीकारों ने बाजार और उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। उदय-प्रकाश की कहानी ‘पालगोमरा का स्कूटर‘ ने उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। यह उपभोक्तावाद और उत्तर आधुनिक समय के मनुष्य की अमानुषिक दुर्दशा का एक दस्तावेज है। उन्हीं की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँड‘ बाजारवाद का प्रतिरोध कर भारतीय जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है। संजीव की कहानियाँ ‘ब्लेक होल‘ और ‘नस्ल‘ इसी ढंग की कहानियाँ हैं। अखिलेश की ‘हाकिम कथा‘, स्वयं प्रकाश, दूधनाथ सिंह, शेखर जोशी आदि की कहानियाँ इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।

जाहिर है कि हमारे साहित्य में अंधानुकरण के प्रतिरोधी स्वर भी उठते रहे हैं। आज के विश्वगाँव के नारे और बाजारवाद के मोह ने हमारी जड को हिला दिया है पर साहित्य में इसका प्रबल प्रतिरोध भी है, जो भविष्य के लिए शुभ का लक्षण है।

 

हिन्दी भाषा और साहित्य ः बाह्य प्रभावों का हस्तक्षेप
भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का एक पक्ष अपनी भाषा की आजादी का भी था। पूरे भारत की राष्ट्रभाषा-सम्फ भाषा-हिन्दी या हिन्दुस्तानी हो यही मुख्य मुद्दा था। लम्बी जद्दोजेहद के बाद नागरी लिपि में लिखी हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बनी। वह कैसी हो इस सवाल पर संविधान म कहा गया है कि वह सभी प्रादेशिक भाषाओं से शब्द, रूप और शैली ग्रहण करके बनेगी। सभी प्रदेशों के लिए हिन्दी का संस्कृत रूप ही ग्राह्य है, जिसके शब्द सभी भाषाओं में बहुतायत से हैं। व्यक्ति के नाम – सुब्रह्मण्यम भारती, विश्वनाथन, बंकिमचन्द्र, नरसी मेहता, कुसुमाग्रज आदि या स्थान के नाम तिरूअनंतपुरम्, अर्णवकुलम्, कन्याकुमारी, श्रीरंगम्, मुदरई आदि या पानी, नीर, जल जैसे अनेक संस्कृत शब्द उनमें हैं। अतः ग्राह्यता और सुविधा में वही रूप राष्ट्रभाषा को स्वीकार है। पर हिन्दी का हृदय-देश जिस भाषा का प्रयोग आज कर रहा है वह उसका उर्दू-फारसी वाला रूप है, जिसको आमजन की भाषा कहकर धडल्ले से साहित्य में प्रविष्ट किया जा रहा है। यह भाषा-विकृति का एक रूप है जो राजनीति के प्रभाव या दबाव का फल है।
भाषा-विकृति का एकरूप आज के समाचार-पत्रों में तेजी से फैल रहा है। उर्दू प्रभावी हिन्दी तो फैशन और राजनीतिक दबाव में चल रही है। अब उदारीकरण का प्रभाव बडी तेजी से बढा है। बडी आसानी से हिन्दी समाचार-पत्र के एक पृष्ठ पर सैकडों अंग्रेजी के शब्द अपने खाँटी प्रयोग के साथ आ रहे हैं। जैसे ‘सेक्स स्कैण्डल‘, ‘सेक्स राकेट‘, ‘इण्टरव्यू‘, ‘एडमिशन‘, ‘गैंगरेप‘, वगैरह। ये प्रयोग देश के सांस्कृतिक पराभव के सूचक हैं। उधर नयी तकनीक के साथ नए शब्द भी धडल्ले से आ रहे हैं। कम्प्यूटर, ई-मेल, एस.एम.एस., इण्टरनेट, सेन्सेक्स, ई.पी.एफ.। नए नाम अंग्रेजी विद्यालयों के ‘इस्ट टू क्राउन स्कूल‘, ‘लिटिल फ्लावर‘, टिनीटाट, जैसे चल रहे हैं। दिल्ली स्कूल के बडे दिग्गज इसे ‘हिंगलिश‘ कहते हैं। इसका एक नमूना ‘हिन्दुस्तान‘ दैनिक की निम्नांकित भाषा है ः- ”एयर होस्टेस के प्रशिक्षण के लिए फ्लाईंग फैट्स ने नयी दिल्ली स्थित साउथ एक्सटेंशन पार्ट-२ में एयर होस्टेस ट्रेनिंग स्कूल खोला है।‘‘ (१२ जुलाई, २००६) यह भाषायी प्रदूषण है जो देश के आत्मसम्मानशून्य, अस्मिताविहीन, औपनिवेशिक मानसिकता के बडे नेताओं और साहित्यकारों के नाते आ रहा है।
जो भाषा अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं करती वह जीवित नहीं रहती। भाषा राष्ट्र की वाणी होती। भारत माता १४ भाषाओं में बोलती है पर १४ भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने वाली राष्ट्रभाषा हिन्दी है।
सुब्रह्मण्यम् भारती ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानते हुए सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा कहा है। मराठी के शिखर कवि कुसुमाग्रज ने वर्षों पूर्व विश्व मराठी सम्मेलन में कहा था, ”बिना एक राष्ट्रभाषा के राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती।‘‘ उन्होंने केन्द्र से माँग की कि महाराष्ट्र से अंग्रेजी को सरकारी तौर पर हटा लिया जाये। महाराष्ट्र के सारे राज-काज मराठी में होंगे और केन्द्र से सम्फ की भाषा हिन्दी होगी, क्योंकि हिन्दी ही निर्विवाद स्तर पर देश की राष्ट्रभाषा है। आज भी संसद के भाषणों में, केन्द्रीय सरकारी कार्यालयों में, दिल्ली की आम जन्दगी से लेकर खास गोष्ठियों में और साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में अंग्रेजी की प्रेत छाया व्यापक रूप से पसरी हुई है। बिना इससे मुक्त हुए हिन्दी अपने स्वरूप को नहीं प्राप्त कर सकेगी। इसके लिए हमें अपना मन बदलना होगा। हमें राष्ट्रीय सोच अपनानी होगी और आत्महीनता से छुटकारा पाना होगा।
अब हम अपने साहित्य का विचार करें। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिन्दी का साहित्यिक इतिहास भाषा की दृष्टि से भले ही अलग-अलग है, पर भाव और विचार, दर्शन और सोच, पुरुषार्थ और जीवनबोध की दृष्टि यह एक प्रवहमान सतत परम्परा है। यह दो हजार वर्ष से अधिक की परम्परा है। वह क्या उत्तरोत्तर अपने एकहरे रूप में अनूदित होती हुई चली है अथवा कालक्षेप से उसमें परिवर्तन-संशोधन हुए हैं ‘ नयी रचना एक विद्रोही तेवर लेकर आती है। वह किसी पुरानी लकीर को तोडकर नयी रेखा बनाती है। वह रूढयों और विसंगतियों को छोडकर या तोडकर जब आगे बढती है तभी वह कुछ नया दे पाती है। नयापन मनुष्य और समाज दोनों का स्वभाव है। पर एकदम नया कुछ भी नहीं होता। अतः पुराने को तोडकर नए मूल्य स्थापित करना एक जोखिम है और जो रचनाकार इस जोखिम को उठाता है, वही नया रच पाता है और वह कालजयी कृतिकार बन जाता है। जो यथास्थिति में जीता है, पुराने को निबाहता चलता है, वह अपने ही जीवन में विस्मृत हो जाता है। जो उठता है, लडता है, लडकर-मरकर रचता है वह अमर हो जाता है। इस नएपन की एक शर्त है कि वह प्राचीन और परम्परा के जीवन्त और स्वस्थ सामग्रियों का ग्रहण और मृत और अस्वस्थ का त्याग करे तात्पर्य यह कि साहित्य का हर नया अपनी संस्कृति का ही वाहक होता है, उसकी विकृति का नहीं। अपने समय में परम्परा से आगे का नयापन, कालिदास और तुलसी में भी था, कबीर और जायसी में भी और आधुनिक युग में रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द, प्रसाद, निराला आदि में भी है। ये सभी हमारी संस्कृति के पुण्य-प्रवाह के कूल हैं और इनकी समग्रता ही भारतीयता या भारतीय संस्कृति है।
विश्व का कोई भी साहित्य ऐसा नहीं है जो अपने देश की संस्कृति का स्वर नहीं झंकृत करता है। अज्ञेय ने लिखा है, ”जो साहित्य किसी एक संस्कृति का प्रतिबिम्बन करता है, उसका अपना व्यक्तित्व, अपनी अस्मिता होती है और वह व्यक्तित्व उसके क्षेत्र से बाहर पहचाना जाता है। तभी दूसरे संस्कृति-समाजों में उसे महत्त्व मिलता है। अर्थात् तभी वह विश्व साहित्य में स्थान पाता है। जिस साहित्य में संस्कृति का स्वर नहीं बोलता, उसका विश्व-साहित्य में स्थान पाने का सवाल ही नहीं उठता।‘‘ ….जाहिर है कि टालस्टाय को अपने देश के किसानों और आमजन की दशा के चित्रण पर विश्व साहित्य में स्थान मिलता है, तो टैगोर और प्रेमचन्द को अपनी धरती के चित्रण पर।‘‘
भारतेन्दु और महावीर प्रसाद द्विवेदी तो नवजागरण के पुरोधा ही थे। भारतेन्दु ने रचनाकर्म में समाज-देश को स्थान दिया और हिन्दी भाषा की लडाई की सार्थक भूमिका निभाई। ‘सरस्वती‘ का जन्म ही राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के क्रोड से हुआ। उस जमाने के कई कवि ५-६ वर्षों तक जेलों में रहे और कलम से राष्ट्रीयता और जागृति का संदेश देते रहे पर रचना धर्म में ये सभी पुरोगामी रहे। तुलसी के राम मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत‘ में नए रूप में आए। वे स्वर्ग का संदेश देने नहीं, धरती को स्वर्ग बनाने वाले मनुष्य हैं। हरऔध के कृष्ण गोपी-वल्लभ और करिश्माई श्रीकृष्ण नहीं हैं। अपितु लोकसंग्रही और अत्याचार के विरुद्ध संघर्षशील लोकनायक हैं। ये परिवर्तन भी युग की वैज्ञानिक सोच और आधुनिकता के प्रभाव थे। इसी प्रवृत्ति ने आगे चलकर निराला, नरेश मेहता और दिनकर के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
छायावाद के आन्दोलन ने योरोप के स्वच्छन्दतावाद का अनुसरण किया और अनुसरण-अनुकरण की यह परम्परा प्रारम्भ हो गयी। छायावाद ने शैली तो योरोप से ग्रहण की पर अभिव्यक्ति को वेदान्त और प्रकृति-संवेदना से जोड कर उसे आत्मसात् कर लिया। परिणामतः प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी जैसे कालजयी रचनाकार पैदा हुए। छायावाद की भारतीयता पर महादेवी ने दीपशिखा की भूमिका में प्रकाश डाला है। रूसी वोलशेविक क्रान्ति की सफलता ने माक्र्सवाद का आकर्षण बढाया तो हिन्दी में भी प्रगतिशील लेखन का प्रारम्भ हुआ। इस आन्दोलन की जडंे रूस में थीं, यद्यपि यह आया इंग्लैण्ड के मार्फत। इसके प्रतीक कम्युनिस्ट पार्टी और रूसी क्रान्ति के थे। इसने जो अच्छा काम किया, वह यह कि इसने सामन्तवाद, साम्राज्यवाद, पूँजीवाद का विरोध किया और साहित्य को जनता की चीज बनाया। पर बुरा यह हुआ कि यह धर्मनिरपेक्ष, संस्कृति-परम्परा निरपेक्ष होते हुए राष्ट्र-निरपेक्ष हो गया। द्वितीय महायुद्ध में राहुल सांकृत्यायन जैसे लेखक ने आजाद हिन्द फौज की लडाई को जर्मनी की लडाई और मित्रराष्ट्रों के (अंग्रेज के भी) पक्ष को अपना पक्ष बताते हुए भोजपुरी में कई नाटक लिखे। प्रगतिशील लेखन, जनवादी लेखन, समकालीन लेखन के अलग-अलग चेहरों पर इसने योरोप से आयातित लेखन का यह मॉडल ग्रहण किया।
इसीलिए १९६२ के चीनी आक्रमण पर इनका लेखन मौन था और वाणी उसे ‘मुक्ति आन्दोलन‘ बोल रही थी। १९६५ के पाक-आक्रमण के समय दिल्ली के ‘संज्ञा‘ नामक संस्था ने एक साहित्यकार गोष्ठी आयोजित की। प्रश्न था – युद्ध से साहित्यकार का संबंध होता है या नहीं ‘ एक पक्ष उभर कर सामने आया कि सच्चा साहित्यकार इस तरह के कामों में दिलचस्पी नहीं लेता है।
यह साहित्यकारों के ऊपर एक विचारधारा से प्रतिबद्धता का परिणाम था। यह प्रभाव और दबाव राष्ट्रभाव को कम करके देश के मनोबल को गिराने वाला था। देश की सीमा पर सैनिक और देश के अन्दर कलम के सिपाही कदम से कदम मिलाकर लडते हैं तो देश का मस्तक गौरव से उठता है। इस हकीकत को इस आन्दोलन ने नजरअन्दाज किया और देश के मनोबल को गिराया। रूसी लेखक शोलोखोव को नाजी आक्रमण के विरुद्ध लड रही जनता की थीम पर लिखे उपन्यास को नोबल पुरस्कार मिलता है और आजाद भारत में आजादी की रक्षा की लडाई में रचनाकार चुप्पी साध लेता है, यह चिन्तनीय है।
प्रगतिवाद से मोहभंग और आधुनिकता से उत्पन्न परिस्थितियों ने प्रयोगवाद, नयी कविता और नवलेखन को जन्म दिया। प्रगतिवाद की भाँति इन विचारों का दाम भी हमें पश्चिम से मिला। फ्रांस से इसका प्रारम्भ हुआ और स्वतंत्रता इसका मूलमंत्र था। इसमें इन्द्रियबोध की प्रधानता, मध्यवर्ग की घुटन, हताशा और अस्तित्व संकट की ध्वनियाँ थी। इस धारा ने पुराने मूल्यों को तोडा पर कोई नया मूल्य स्थापित न कर सका और मूल्यहीनता का शिकार हो गया। अस्तित्ववादी दर्शन का प्रभाव भी इन पर पर्याप्त पडा। अंग्रेजी उपनिवेश के कारण हमारे सोचने का तरीका पश्चिम के अनुकरण का हो गया। इस अनुकरण की प्रवृत्ति ने हमारे मौलिक चिन्तन को समाप्त कर दिया। हमने इलिएट, पाउण्ड, सार्त्र, लुकाच, ग्राम्सी को अपना मार्गदर्शक मान लिया और उन्हीं के मापदण्डों से अपनी रचनाओं को परखने लगे। यह विचार पीछे छूट गया कि साहित्य अपने देश की दशा और परिस्थिति में सृजित होता है तो वही स्थायी महत्व का होता है। नकल तो नकल होती है।
आज का बडा लेखक और आलोचक आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता और विखण्डनवाद के सहारे अपनी महत्ता और इयत्ता को प्रभावित करता है। पर भारत अभी उन परिस्थितियों से नहीं गुजरा है, जिनसे योरोप के देश गुजर चुके हैं। औद्योगीकरण की चरम परिस्थिति, दो-दो महायुद्धों के दंश और विघटित समाज-व्यवस्था को योरोप ने झेला है। अतः उस प्रकार के साहित्य का यहाँ सहज निर्माण नहीं हुआ। यही कारण है कि नई कविता के आन्दोलन पर नवगीत का आन्दोलन हावी हो गया। नवगीत ने अपनी जमीन की ओर, अपने गाँव की ओर, अपनी संस्कृति की ओर लौटने का नारा दिया। भाषा के नए मुहावरे और उसके आधुनिकततम प्रतीकों-मिथकों को अपनाते हुए भी नवगीत इसी जमीन की जड से जुड गया। अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकार आधुनिकता की सारी दौड लगाकर अन्ततः अपनी जमीन और संस्कृति से जुडने की बात कहने लगे।
नए योरोपीय-अमरीकी लेखन से जो चीजें हमारे यहाँ आयीं, उनमें नग्न देहवाद, मूल्य भ्रंशता, अनिस्थिता, अजनबीपन खास हैं। इनसे हमारे रचनाकर्म को कुछ लाभ नहीं मिला। हमारी संस्कृति में वर्जनाएँ तो नहीं रही हैं। कालिदास का ‘कुमार संभव‘ इसका उदाहरण है। पर हमारी सीमाएँ रही हैं। उनके अतिक्रमण से हमारी निजता समाप्त हो जाती है। हमने एक और प्रत्यय पश्चिम से आयातित किया है, वह है ‘सेकुरलरिज्म‘। यह आया तो राजनीति में पर इसका व्यापक प्रभाव हमारे साहित्य पर पडा। भारत- विभाजन की त्रासदी जितनी बडी थी, उतना बडा रचनाकर्म इसके सही संदर्भ को लेकर नहीं आया। राही मासूम रजा ने ‘आधागाँव‘ में जिन्ना के मिशन को लेकर गाँव-गाँव जाने वाले अलीगढ के काली शेरवानी और टोपी वाले लडकों के कारनामों का जो जिक्र किया है, उससे ज्यादातर लेखक परहेज करते हैं। पाकिस्तान के लेखक शौकत सिद्दिकी अपने उपन्यास ‘खुदा की बस्ती‘ का अन्त करते हैं -”समाज नोशा, राजा, शम्मी और अनू जैसों को जन्म देता है। इनमें से कोई कत्ल करके जेल जाता है, कोई कोढी बनकर एडयाँ रगड-रगड कर मौत की प्रतीक्षा करता है, कोई खून थूकता है और रिक्शा चलाता है और कोई हीजडों के साथ कूल्हे मटकाता है – नारा-ए-तकबीर – अल्ला हो अकबर।‘‘ इस्लामी व मजहबी राज की दशा पर यह करारा व्यंग्य है। हमारे देश का कोई बडा लेखक इन सवालों से टकराने की हिम्मत नहीं करता है। इसके पीछे सेक्युलरिज्म का दबाव रहता है। गोधरा से उपजे गुजरात के दंगे हों या बाबरी ढांचा का ध्वंस, यह तो हमें मर्माहत करता है पर दशाब्दियों से आतंक, नरसंहार और विस्थापन का दंश झेलता कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत के ईसाई व इस्लामीकरण से उत्पन्न अलगाव की प्रवृत्ति या अक्षरधाम, अयोध्या से लेकर बम्बई तक के विस्फोटों पर कलम चलाने में हमारे सेक्युलरिज्म के कल्पित मिशन की नींव ढहने का डर लगता है। यह साहित्य और राष्ट्र के लिए तो खतरनाक है ही, विश्व के लिए भी बडा खतरा है।
आखरी बात मुझे उदारीकरण के परिणामी बाजारवाद के दबाव के बारे में करनी है। आज लेखन के बाजार की बात की जाती है। आज दूरदर्शन के विज्ञापनों ने बाजार के प्रभाव को खूब अभिव्यक्त किया हैं। एक विज्ञापन में एक लडका एक अधनंगी युवती को गोद में लेकर पर्दे पर आता है। उसे चूमते ही वह लडकी एक साइकिल में बदल जाती है और लडका साइकिल को उसी चाव से चूमता है जैसे लडकी को। बाजार तो इसी स्तर के साहित्य से बनेगा। एक प्रकाशक ने बताया कि उपन्यास लेखक गुलशन नंदा को एक लाख तक रायल्टी वार्षिक हमने दी है। बाजार धन से जुडा रहता है, मन से नहीं।
इधर बाजारवाद और धन-लोलुपता से आदमी किस कदर मशीन बन गया है, कितना स्वार्थी और मतलबी हो गया है, इसकी प्रतिध्वनियाँ हमारे वर्तमान साहित्य में तेजी से प्रकट हो रही है। उपन्यासकारों में यौन चित्रों का यथातथ्य वर्णन प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों में भी मिलते हैं। जैसे कविता में आयातित भदेस को नवगीत ने नकारकर अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान को तलाशने की कोशिश की है, उसी प्रकार कथा साहित्य में हिन्दी के कहानीकारों ने बाजार और उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। उदय-प्रकाश की कहानी ‘पालगोमरा का स्कूटर‘ ने उपभोक्ता संस्कृति की विडम्बनाओं को उजागर करके उनके दुष्परिणामों को प्रकट रूप में रेखांकित किया है। यह उपभोक्तावाद और उत्तर आधुनिक समय के मनुष्य की अमानुषिक दुर्दशा का एक दस्तावेज है। उन्हीं की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँड‘ बाजारवाद का प्रतिरोध कर भारतीय जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा करती है। संजीव की कहानियाँ ‘ब्लेक होल‘ और ‘नस्ल‘ इसी ढंग की कहानियाँ हैं। अखिलेश की ‘हाकिम कथा‘, स्वयं प्रकाश, दूधनाथ सिंह, शेखर जोशी आदि की कहानियाँ इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।
जाहिर है कि हमारे साहित्य में अंधानुकरण के प्रतिरोधी स्वर भी उठते रहे हैं। आज के विश्वगाँव के नारे और बाजारवाद के मोह ने हमारी जड को हिला दिया है पर साहित्य में इसका प्रबल प्रतिरोध भी है, जो भविष्य के लिए शुभ का लक्षण है।

 

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में जब वैश्वीकरण प्रारंभ हुआ तब उसके लाभ और प्रभाव को देखकर यह शंका मन में पैदा होने लगी कि एक दिन राष्ट्र और राष्ट्रवाद अप्रासंगिक हो जाएँगे। अपने देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और हर नागरिक के जीवन स्तर में वृद्धि हो यह सबसे बडा आकर्षण का मुद्दा था। सभी इस बात की आशा और अपेक्षा करने लगे कि अन्य देशों से उनके यहाँ पैसा आए ताकि सदियों से चले आने वाला अभाव दूर हो जाए। गरीबी एक बडा अभिशाप है जिसे कल्याणकारी राष्ट्र की सरकारें जडमूल से नष्ट करना अपना प्रथम दायित्व समझती हैं। वैश्वीकरण के प्रारंभिक दिनों में ऐसा लग रहा था कि अब केवल अंग्रेजी जैसी अंतर्राष्ट्रीय भाषा को ही महत्व मिलेगा। लेकिन कुछ ही समय में यह भ्रांति दूर हो गई। एक राष्ट्र की वस्तुएँ जब दूसरे राष्ट्र में जाकर बिकने लगी तो स्थानीय बाजार पर वर्चस्व जमाने के लिए उस देश को अन्य देश की भाषा सीखनी पडी। अपनी भाषा की अनिवार्यता के देखकर कोरियन पहले से अधिक कोरियन हो गया और एक भारतीय पहले से अधिक अपनी भारतीय भाषा के महत्व को समझने लगा। क्योंकि तब उसकी भाषा उसके रोजगार और रोटी से जुड गई। इसलिये हम देखते हैं कि जो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दूसरे देशों में पहुँची उस समय लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए वहाँ की स्थानीय भाषा को सीखने लगी। यही कारण है कि हमारी हिन्दी अब ब्रिटेन और अमेरिका में पढाई जाने लगी है और हम चीनी भाषा सीखना चाहते हैं क्योंकि वह एक बडा बाजार है। लेकिन वैश्वीकरण का जादू अब उतरता दिखलाई पडने लगा है, कि हर राष्ट्र यह महसूस करने लगा है कि उसका काम उन देशों में होने लगा है जहाँ मजदूरी सस्ती है। साथ ही उसके प्राकृतिक स्रोत का प्रवाह भी सस्ते दामों पर वहाँ पहुँच रहा है। वैश्वीकरण अभी तो पासपोर्ट और वीजा प्रणाली को तोड भी न पाया था कि हर सरकार फिर से राष्ट्र और राष्ट्रवाद की बातें करने लगीं। उन्हें लगा कि इससे दूर होकर न केवल हमारा अस्तित्व खतरे में पड जाएगा बल्कि हम दुनिया में बुरी तरह से पिछड जाएँगे। इसका अर्थ यह हुआ कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता एक नैसर्गिक देन है जिससे कोई देश और समाज अलग नहीं रह सकता। राष्ट्रीयता को समझने के लिए साहित्य का मंथन आवश्यक है। साहित्य में हित शब्द जुडा हुआ है। जो इस बात का द्योतक है कि बिना हित के राष्ट्रीयता का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि साहित्य जैसी शक्तिशाली विधा राष्ट्रीयता की चर्चा करे तब इस बात की खोज आवश्यक है कि राष्ट्रीयता का साहित्य में उद्भव किस प्रकार हुआ। आज विश्व की हर गतिविधि साहित्य के माध्यम से ही नापी तौली जाती है इसलिये राष्ट्रीयता से जुडे साहित्य पर हमें एक पैनी दृष्टि डालनी होगी।
इस बहस की जब शुरुआत करते हैं तो हमारे सामने कुछ मिले-जुले शब्द आकर खडे हो जाते हैं। जिनमें राज्य, राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद प्रमुख हैं। राज्य शब्द पहले अस्तित्व में आया कि राष्ट्र ‘ राज्य के लिए धरती पहली शर्त है, फिर उसकी सीमा और अंत में वहाँ रहने वाली जनसंख्या। प्रकृति ने सर्वप्रथम धरा की ही रचना की। रचना करते समय कहीं पर्वत, कहीं नदी, कहीं रेगिस्तान और कहीं समुद्र बने। यह कुदरत का अपना बँटवारा था। लेकिन जब इंसान इस धरती पर रहने लगा तो उसने अपना क्षेत्र अपनी ताकत के अनुसार तय किया और जो सीमा उसने निश्चित की वह आज का राज्य बन गया। लेकिन राज्य अपने आप में निर्जीव है। क्योंकि उसके जन-जीवन अथवा तो उस धरा पर होने वाली गतिविधि का प्रतिबिम्ब नहीं दर्शाता। इसलिये यहाँ पर उसे सोचने पर मजबूर हो जाना पडता है कि राज्य को सजीव बनाने वाला तत्व कोई और है। संभव है उसका जन्म इन सबसे पहले हो गया हो। यह शब्द कोई और नहीं बल्कि राष्ट्र था। पहले कौन से शब्द का उद्भव हुआ इस बहस में न पडें तब भी दोनों भिन्न हैं यह तय है। एक निर्जीव तंत्र ‘मेकेनीजम‘ या अस्तित्व (एंटिटी) है। जबकि राष्ट्र सजीव जीवन मान अस्तित्व है जिसे अंग्रेजी में ‘लिविंग ओरगेनीजम‘ कहा गया है। जन सामान्य की भाषा में राज्य शरीर है लेकिन राष्ट्र आत्मा है। मुर्दा शरीर किस काम का ‘ उसकी न तो कोई पहचान है और न ही उसके जन्म का उद्देश्य ‘ इसलिये भारतीय साहित्य में प्रारंभ से ही राष्ट्र शब्द पर चर्चा हुई है। राज्य को समझ लेने के बावजूद भारतीय ऋषि मुनियों ने राष्ट्र की परिभाषा, जन्म, विकास और उसकी निर्मिति पर चर्चा की है। इसलिये हमारी बोलचाल की भाषा में स्व राष्ट्र (सौराष्ट्र) और महाराष्ट्र शब्द का उपयोग होता है। भारत के किसी भी क्षेत्र को राज्य के नाम से पुकारा गया हो यह ढूँढने पर भी नहीं मिलता। आगे चलकर अपनी सत्ता को परिभाषित करने के लिए राज्य शब्द का उपयोग हुआ दिखलाई पडता है। फिर वह मुगल राज्य हो या ब्रिटिश राज्य अथवा तो उनके अधीन कायम होने वाली रियासतें जिन्हें राज्य कहकर संबोधित किया गया। मेवाड, मारवाड, कलिंग, निजाम जैसे असंख्य राज्य। चूँकि वे किसी एक राजा के अंतर्गत थे इसलिये वास्तव में तो वे साम्राज्य थे। राष्ट्र होने की पहली शर्त उसकी स्वतंत्रता है और दूसरा वह जनता का जनता के लिए जनता के द्वारा होना चाहिए। भारत में प्राचीन जनपद और यूनान के स्पार्टा इस श्रेणी में आ सकते हैं। निर्जीव वस्तुओं को अधिक महत्व न देकर उसमें जीती जागती व्यवस्था का जो नामकरण किया गया वह सही अर्थों में राष्ट्र है।
यूरोप में राष्ट्र शब्द भले ही तीन सौ वर्ष पहले जन्मा हो। लोकतंत्र की सोच ने इस शब्द और भावना को गति दी इसलिये पश्चिम में यह शुद्ध रूप से राजनीतिक शब्दावली कही जा सकती है। लेकिन भारत में राजनीतिक राष्ट्र से पहले भी सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना मौजूद थी। भारत न केवल सीमा और जनसंख्या की कसौटी पर खरा भारत में जन्मे सब जन निश्चय महान् है।
सुब्रह्मण्यिम भारती का ‘पांचाली शपदम‘ अर्थात् पांचाली की शपथ एक खंड काव्य है जिसमें उन्होंने भारत देश का मानवीकरण द्रौपदी के रूप में किया है। टी.वी. कल्याण सुंदरम् का नाम भी इसी श्रेणी में उल्लेख करने योग्य है।
कन्नड साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि राष्ट्रीयता और राष्ट्र प्रेम यहाँ के साहित्य का अविभाज्य अंग रहा है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उसके संदर्भ बदलते चले गए लेकिन राष्ट्रीयता की व्याख्या नहीं बदली। कन्नड के आदि कवि पंप का पद ‘आरंकुसमिटटोड नेनवुदेन्न मनं वनवासी देशमम्‘ उनके इस प्रदेश के प्रति और साहित्य में राष्ट्रीयता के पुट के प्रति प्रेम और जागरूकता का उज्ज्वल प्रतीक है। राधवांक ने किसी न किसी संदर्भ का उपयोग करके कर्नाटक की तुंगभद्र नदी और पंपा क्षेत्र की महिमा का गायन किया है। आंडय्या कवि ने कर्नाटक प्रदेश का शलाध्नीय वर्णन किया है। कनकदास ने मोहन तरंगिणी में विजयनगर की समृद्धि का वर्णन किया है। कर्नाटक में तो कुछ शिलालेखों पर भी वहाँ के साहित्य में राष्ट्रीयता के दर्शन होते हैं।
मलयाली साहित्य में स्पष्ट रूप से कहा गया है भौगोलिक एकता, राजनीतिक एकता और सांस्कृतिक एकता यानी तीनों के संगम का नाम राष्ट्र है। जब उसमें चेतना का अंकुर फूटता है तो वह राष्ट्रीय साहित्य में पल्लवित होने लगता है। मलयालम साहित्य का जन्म उसी समय हो चुका था जब केरल में अनेक हिन्दू गणराज्य स्थापित थे। मलयालम की उपलब्ध रचनाओं में सबसे पुराना काव्य ‘रामचरितम‘ है। महाकवि उल्लूर के कथनानुसार यह १२वीं शताब्दी में लिखी हुई रचना है। उसके रचनाकार वीर रामवर्मा हैं जो तिरूअनंतपुरम् के शासक रहे थे। १४वीं और १५वीं शताब्दी में लिखी गई कण्णंश्श कृतियाँ राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत हैं। माधव पणिक्कर, शंकर पणिक्कर और राम पणिक्कर यह तीनों एक ही परिवार के थे। भगवद्गीता, भारत माला, रामायण, भारत भागवत और शिवरात्रि महात्म्य जैसे प्रख्यात ग्रंथ के साथ-साथ माधव पणिक्कर ने गीता रहस्य को अपनी टीका में व्यक्त किया है। १६वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में एषुत्तच्छन का अविर्भाव हुआ। केरल जो छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था और जिन्हें पुर्तगीज तथा अरब लडाकर अपना स्वार्थ साध लेते थे उन्हें संगठित होने और राष्ट्रीय शक्ति को पुनर्गठित करने का कार्य इस महान् साहित्यकार ने किया है।
पंजाबी साहित्य को यदि राष्ट्रीयता की गोद से उपमा दी जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पंजाबी के लोक साहित्य और लोक कविताओं में राष्ट्रीयता बिखरी पडी है। ‘गुरुवाणी और संत वाणी‘ को कोई कैसे नजरअंदाज कर सकता है। भाई गुरुदास से शुरू करके गुरु गोविंदसिंह की चंडी दीवार से होते हुए शाह मोहम्मद तक एक दृष्टि उभरती है तो बहुत पीछे जाने पर जंगली लोक गीतों के बाद शेख फरीद आ खडे होते हैं। इन सबसे पहले गुरु नानक देव की वाणी को भला कौन नजरअंदाज कर सकता है। अपने राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों से ऊपर और आदर्श मानना पंजाबी साहित्य का महत्वपूर्ण पहलू समझा गया है। प्रभजीत कौर, विश्वनाथ तिवारी, सुखपाल वीरसिंह हसरत सs लेकर जसबीर सिंह आहलूवालिया, सोहनसिंह मीशा और भगवंत सिंह ने अपनी रचनाओं में छलका दिया है। स्वदेश के प्रति अपने प्रेम को दर्शाते हुए पंजाबी कवि नजाबत ने लिखा-
एत्थों भज्जां कंड देह जग्गा लाहनत पाए
सिर देना मंजूर है जो हिन्द न जाए।
पंजाबी साहित्य केवल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत नहीं है, बल्कि यहाँ भारतीय दर्शन और अध्यात्म की भी परंपरा रही है। आर्य समाज ने पंजाब के जीवन में समाज सुधार की लहर पैदा की और पंजाब के क्रांतिकारियों ने लाला लाजपतराय, भगवतसिंह और सुखदेव बनकर राष्ट्रीयता की लहर को परवान चढाया। कौन होगा जो पंजाबी के इस गीत को भूल जाए।
‘पगडी संभाल ओ जट्टा पंगडी संभाल ओए-
हिंद है मंदर तेरा तू इस दा पुजारी ओए‘
देश की कौनसी भाषा और कौनसा साहित्य होगा जिसमें राष्ट्रीयता के आविष्कार की गाथा नहीं कहीं गई हो। साहित्य में गद्य हो या पद्य समान रूप से राष्ट्रीयता के स्वर उनमें सुनाई पडते हैं। भारत में भजन-कीर्तन से लगाकर संस्कृति, देश प्रेम और मातृभूमि की गौरव गाथा हर युग और हर सदी में पढने को मिलती है। भारत चूँकि प्रकृति प्रेम से ओतप्रोत देश रहा है। उसकी कृषि और वन्य जीवन तथा पर्वतों की गुफाओं में साधना आराधना नित्य का क्रम रहा है इसलिये उक्त साहित्य काव्य के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। भारत की कोई भाषा और बोली इससे अछूती नहीं रही है। केवल उदाहरण मात्र ही कुछ जानकारी प्रस्तुत की गई है।
राष्ट्रीयता का सिरमौर कहा जाने वाले साहित्य बंगला है। बंगाल ने सांस्कृतिक ह्रास और राष्ट्रीयता के अपमान के जो दृश्य देखे थे उसकी पीडा उसके साहित्य में भली प्रकार झलकती है। राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जहाँ बंगाल की विरासत है, वहीं उसका साहित्य संघर्ष, देशप्रेम और क्रांति का संगम है। १८६७ में ‘जातीय‘ (राष्ट्रीय) मेले के श्री गणेश नाम से जिस आयोजन का शुभारंभ हुआ था वह वास्तव में श्री राज नारायण बसु के इस मंतव्य से ही प्रेरित प्रभावित था कि शिक्षित बंगालियों में राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए एक संगठन की स्थापना की जानी चाहिए। इस मेले में गाए गए प्रथम गीत के प्रणेता भारतीय सिविल सर्विस सर्वप्रथम भारतीय सदस्य श्री सत्येन्द्रनाथ ठाकुर थे। उस गीत में सभी भारतीयों से यह अनुरोध किया गया था कि वे मिलकर एक स्वर में भारत का गुणगान करे। महाराष्ट्र में गणपति उत्सव का श्री गणेश आगे चलकर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोकमान्य तिलक ने दिया। ब्रह्म समाज (१७७४-१८३३) अपना प्रभाव स्थापित कर चुका था जिसका मुख्य ध्येय जरजर भारत की धूल झाड कर उसे फिर से राष्ट्रीयता के प्रवाह में शामिल होने के लिए सजग करना था। बंगाल में जागरूकता के कारण १२वीं, १३वीं शताब्दी से कविता, नाटक और उपन्यास के रूप में राष्ट्रीयता का साहित्य में आविष्कार होता रहा। इसी श्ाृंखला में आगे चलकर श्री बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने ‘आनंदमठ‘ नामक अपने जग विख्यात उपन्यास में राष्ट्रवाद का भव्य चित्र प्रस्तुत करने का कीर्तिमान स्थापित किया। धर्म और राष्ट्रीयता का ऐसा सुंदर समागम किसी अन्य जगह देखने को नहीं मिलता। हिन्दू राष्ट्रवाद ने बंगला साहित्य में प्रविष्ट होकर व्यक्ति स्वातंय का पल्लवन किया। इसमें स्वामी विवेकानंद और श्री अरविंद के अध्यात्म की छाप स्पष्ट दिखलाई पडने लगी। श्री रामेंद्रसुंदर त्रिवेदी तथा श्री ब्राह्म बांधव का राष्ट्रवादी चिंतन, सुधारवाद की प्रेरणा से प्रेरित है। राष्ट्रीयता की बात कहने वालों में सर्वश्री ईश्वरचंद्र गुप्त, कालीप्रसाद सिन्हा, नलिनचंद्र सेन, हेमचंद्र बंदयोपाध्याय, रंगलाल बंदोपाध्याय आदि अग्रगण्य रहे। दीनबंधु मिश्रा ने अपने नाट्य नीलदर्पण में यूरोपियन खेतिहरों द्वारा किये जा रहे अत्याचार तथा दमन का यथार्थ चित्रण किया। रेवरेंड लोंग ने इसका अंग्रेजी रूपांतरण छापकर यूरोपियन अधिकारियों में तहलका मचा दिया। इसके नतीजे में रेवरेंड को एक मास का कारावास भुगतना पडा। इस घटना ने राष्ट्रवादी लोगों के हौसले बुलंद किये। नतीजे में बंगला राष्ट्रवाद तेजी से विकसित होने लगा। हिन्दू पेट्रियट और अमृत बाजार पत्रिका का प्रकाशन इसका नतीजा था। इस समय के राष्ट्रवादी साहित्य में ‘सोनार बंगला‘ शब्द की गूँज सुनाई पडी। दैनिक वंदे मातरम् और दैनिक युगांतर ने यूरोपियन संस्कृति के आवरण को नष्ट कर बंगालियों को भारत के विशुद्ध राष्ट्रवाद के दर्शन करवाए। जातीय मेले की तरह श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरंभ किया। १९०५ में उनकी प्रसिद्ध कविता मातृभूमि वंदना का प्रकाशन हुआ। जिसमें वे लिखते हैं….
है प्रभु,
मेरे बंगदेश की
धरती नदिया वायु फूल सब पावन हों,
है प्रभु,
मेरे बंग देश के,
हर भाई, प्रत्येक बहन के उर अंतः स्थल,
अविछन्न, अविभक्त एक हों (बंगला से हिन्दी अनुवाद)
लेकिन आर्थिक रूप से ब्रिटिशों ने जिस प्रकार राष्ट्र को शोषण किया और हमारी राष्ट्रीयता को नीलाम करने की कोशिश की उसके विरुद्ध आवाज उठाने वालों में रजनीकांत सेन, कालीप्रसन्न, सत्येन्द्रनाथ दत्त, कार्तिकचंद्र, विजयचंद्र, मजूमदार और सैयद अबू मोहम्मद आदि लेखक आगे आए। रजनीकांत सेन का आह्वान था कि अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए यदि वंदे मातरम गाते-गाते मर जाना घ्डे तब भी पीछे हटने का विचार न करें। बंग भंग आंदोलन प्रारंभ होने के ९ दिन पूर्व रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेजों से सवाल किया कि क्या सचमुच आप में इतनी शक्ति है कि आप इसे तोड सकते हैं ‘ क्या आप सचमुच यह मानते हैं कि हमारा जीवन आपकी संपत्ति है जिसे आप इच्छानुसार बना और बिगाड सकते हैं ‘ अपने उपन्यास ‘गोरा‘ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतीयों के उस वर्ग की आलोचना की है जो भारत को राष्ट्र नहीं मानते। मराठी की भाँति बंगला नाटक भारत की सदियों से चली आने वाली राष्ट्रीयता को उजागर करने में अग्रणी रहे। श्री गिरीशचंद्र घोष द्वारा लिखित ‘सिराजुद्दौला‘, ‘मीर कासिम‘ और ‘छत्रपति शिवाजी‘ इसके उत्तम नमूने हैं। श्री द्वेजेंद्रलाल राय कृत ‘प्रताप सिंह‘ दुर्गादास और मेवाड पतन तथा श्री किरोडी प्रसाद विद्याविनोद का प्रतापदित्य, ‘पद्मिनी‘, ‘पलासीर‘, ‘प्रयाश्चित‘ तथा ‘नंद कुमार‘ उन क्रांतिकारी विचारों के प्रेरणा स्रोत हैं जिन्होंने बंगला राष्ट्रवाद को प्रचारित प्रसारित करने में महत्व की भूमिका अदा की। श्री नजरूल इस्लाम और शरतचंद्र चटोपाध्याय ऐसे साहित्य बनकर जिये जिनके सामने राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के अतिरिक्त कोई विचार नहीं था।
महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जिस पर उत्तर तथा दक्षिण भारत में हुए परिवर्तनों का साथ-साथ प्रभाव पडने लगता है। महाराष्ट्र के पिछले दो हजार वर्षों के राजनीतिक इतिहास पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट होगा कि यहाँ जो राज्य स्थापित हुए थे उन में उत्तर तथा दक्षिण के शासनों का चामत्कारिक मेल था। इनमें प्रमुख है- सातवाहन, पूर्व चालुक्य, राष्ट्रकूट, उत्तर चालुक्य, यादव, मुगल, मराठा और अंग्रेज। इन आठों शासनकाल के साहित्य का अध्ययन करें तो पता लगता है कि मराठी साहित्य राष्ट्रीयता और राष्ट्र चेतना का संगम रहा है। मराठी भाषा साहित्य का स्पष्ट अस्तित्व जिसमें उपलब्ध होने लगा था वह था यादव राजाओं का शासन काल जिसकी अवधि ईस्वी सन् ११५० से १३५० तक मानी जाती है। यादव वंश के राजाओं में रामचंद्र यादव के शासन काल में मराठी साहित्य की विशेष समृद्धि हुई। इस काल में दो महान् कवियों का अविर्भाव हुआ। श्री ज्ञानेश्वर (१२७५-१२९६) तथा नामदेव (१२७० से १३५०) ज्ञानेश्वर ने उत्तर भारत की यात्रा की और नामदेव पंजाब तक पहुँचे। जातिवाद की दीवारों को तोडने में इन दोनों संतों का भारी योगदान रहा। अब तक चली आ रही मर्यादित राष्ट्रीयता को उन्होंने अपने उदात्त मानवीय जीवन मूल्यों को आधार बनाकर भारत के विशाल भाग में फैलाने का आंदोलन चलाया। जिससे उत्तर भारत में संत कबीर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। महानुभव पंथ इसी दौर में विकसित हुआ जो पंजाब से सीमा प्रांत तक फैल गया। जातिवाद को नष्ट कर उन्होंने राष्ट्रीयता की नींव को मजबूत किया। नामदेव और ज्ञानेश्वर ने जन भाषा में काव्य सर्जन करके आम आदमी को अपने आंदोलन से जोडा। राष्ट्रीय चेतना का प्रचारित प्रसारित करने का यह अनूठा कदम था। सन् १३१८ में यादव वंश समाप्त हो गया। इसके पश्चात् यहाँ बहमनी काल प्रारंभ हुआ। अलाउद्दीन खिलजी और मलिक काफूर के आक्रमणों ने महाराष्ट्र को दहला दिया। महाराष्ट्र राजनीतिक दृष्टि से अशांत और अस्थिर हो गया। मराठी के स्थान पर फारसी आ गई और मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव बढने लगा। लेकिन उस काल में भी एकनाथ तथा दासोपंत ने महाराष्ट्रीयन संस्कृति का अलख जगाया। इसके अतिरिक्त भानुदास, जनार्दन स्वामी, नरसिंह सरस्वती, गंगाधर विष्णुदास, नामा और रंगनाथ ने महत्व की भूमिका निभाई। संतों ने सत्ता को महत्व न देते हुए अपना आंदोलन जारी रखा लेकिन यह स्वीकार करना ही पडेगा कि इससे राष्ट्रोन्नति का काम शिथिल हो गया।
इस अंधकार में एक प्रकाश पुंज जन्मा जिनका नाम था छत्रपति शिवाजी। इस महान् सपूत ने राष्ट्रीयता के आधार पर खुल्लम खुल्ला हिंदवी साम्राज्य की घोषणा की। शिवाजी को सर्वाधिक प्रेरणा तत्कालीन कवि संत रामदास से हुई। रामदास ने इस तथ्य को स्वीकारा कि वैराग्य धारण करके समाज और राष्ट्र की सेवा नहीं हो सकती। उन्होंने दूर-दूर तक भ्रमण किया और हिंदवी साम्राज्य के रूप में हिंदवी राष्ट्रीयता को चहुँ ओर फैलाया। उनके इस कार्य से शिवाजी बहुत अधिक प्रभावित हुए। सच कहा जाए तो पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राष्ट्रीयता जो जमीन के भीतर चली गई थी उसे महाराष्ट्र की धरती पर पुनः प्रस्थापित करने का भगीरथी कार्य संत रामदास ने किया।
शिवाजी ने स्वराज्य की स्थापना के साथ-साथ महाराष्ट्र की जनता में स्वाभिमान, देश भक्ति, शौर्य तथा पराक्रम की जो भावना भर दी थी उससे प्रेरित होकर अनेक मराठा सरदारों ने न केवल शिवाजी के स्वराज्य की रक्षा की बल्कि उसे आगे बढाया और फैलाया। पेशवा युग में मराठा साम्राज्य वैभव के शिखर पर पहुँच गया था। राष्ट्रीय चेतना पर इसका प्रभाव कैसे न पडता ‘ इस युग में राष्ट्रीयता के वाहकों की दो धारा स्पष्ट रूप से दिखलाई पडती है। एक आध्यात्मिक संस्कृति तो दूसरी समसामयिक राजनीति परिस्थितियों से प्रभावित। प्रथम धारा के कवियों में श्रीधर, महीपती, मोरोपंत, अमृतराय, निरंजन माधव आदि। दूसरी धारा में रामजोशी, अनंतफंदी, लहरी मुकुंदा, होनाजीबाल, प्रभाकर, सगनभाऊ और परशराम। मंडाले जेल में लोकमान्य तिलक ने ‘गीता रहस्य‘ लिखकर राष्ट्रीयता को जो नया आयाम दिया उसे भारतीय साहित्य कभी नहीं भूल सकता। मराठी साहित्य की सभी विधाएँ राष्ट्रीयता के लिए समर्पित रही। किचक वध जैसे नाटक को कौन भूल सकता है’ नाटक मराठी वाङ्मय की आत्मा है। इसके बलबूते पर राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को जो प्रेरणा मिली वह हमारे गौरवशाली इतिहास का एक भाग है। वीर सावरकर ने सेल्युलर जेल में १८५७ के गदर को किस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संघर्ष में परिवर्तित किया यह अपने आप में उनका चमत्कार है। साहित्य में राष्ट्रीयता को खोजना है तो मराठी साहित्य को पढना होगा और पढाना होगा। महाराष्ट्र के कोने-कोने से आये साहित्यकार इस तथ्य से अवगत हैं कि राष्ट्रीयता की चिंगारी को महाराष्ट्र के साहित्यकारों ने ही दावानल में परिवर्तित किया है।
आओ मिल कर गाएँ…….
‘जय-जय महाराष्ट्र देशा‘
राष्ट्र भाषा हिन्दी के साहित्य में राष्ट्रीयता की खोज करने से पूर्व एक दृष्टि उर्दू साहित्य पर भी डालना अनिवार्य है। क्योंकि हिन्दी बोली को अरबी में लिपिबद्ध करके जिस साहित्य का निर्माण किया गया वह भी राष्ट्रीयता की मूल धारा से अलग नहीं था। उर्दू का जन्म १३वीं शताब्दी में हुआ। स्वदेशी भावना को विदेशियों के सम्मुख अमीर खुसरों ने जिस तरह से प्रस्तुत किया यह भाषा की दुनि;ा में एक नया आविष्कार था। राग-रागनियों के धनी अमीर खुसरो कव्वाली के भी जनक हैं। ब्रज, अवधी, मालवी, भोजपुरी और मेवाडी के शब्दों को फारसी जैसी भाषा से मिलाकर गजल और गीत लिखे। ‘खालिकवारी‘ नामक फारसी हिंदवी छंदोबद्ध शब्दकोष के संग्रह का भी श्रेय इसी महान् कवि को है। अमीर खुसरो ने भारतीयता और राष्ट्रीयता की लहर का परिचय भारत के बाहर प्रस्तुत किया और उस ईरान तक पहुँचाया जो आर्यवृत्त का कभी हिस्सा था। १७वीं शताब्दी का उर्दू साहित्य उन राज्यों की बदहाली का नमूना है जो धीरे-धीरे अंग्रेजों के प्रभाव से क्षीण होते चले गए। लेकिन १८५७ के पश्चात् का उर्दू साहित्य जो दिल्ली में अधिक केन्दि्रत था हिन्दुस्तान की आजादी का स्वर बन गया।
हिन्दी साहित्य में जब राष्ट्रीयता की खोज करते है तब इस बात का अहसास हो जाता है कि इस विशाल भू-भाग पर जो उत्तर और पश्चिम में स्थित है, वह सबसे अधिक उठापटक का केन्द्र रहा। विदेशी आक्रांताओं में मुस्लिमों ने तो सीधे-सीधे इस पर अपना आधिपत्य जमाया। लेकिन ब्रिटिशों ने १८वीं से २०वीं शताब्दी के १९४७ तक इस भू-भाग पर राज किया। आजादी की लडाई में सारे देश ने योगदान दिया लेकिन निर्णायक सफलता इसी धरती पर मिली इसलिये यह क्षेत्र राष्ट्रीयता का धडकता दिल बन गया। गंगा-यमुना की सभ्यता वाले इस प्रदेश में भारतीय संस्कृति ने इतनी गहरी छाप छोडी है कि डॉक्टर इकबाल जैसे अलगाववादी कवि को भी यह स्वीकार करना पडा कि…… ‘यूनानो मिश्रो रोमा सब मिट गए जहाँ से……. कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।‘ हिन्दी साहित्य का आदिकाल बाह्य आक्रमणों और आंतरिक कलह के कारण उथल-पुथल, अशांति और पारस्परिक वैमनस्य का युग था। सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के निधन के पश्चात् कोई व्यक्ति नहीं रहा जो देश को एकसूत्र में बाँधे रखता। लेकिन चाणक्य जैसा व्यक्ति भी इस धरती पर जन्मा जिसने न केवल आक्रांताओं से लडने के लिए लोगों को संगठित किया बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था से लगाकर राजनीति के सूक्ष्म गुर भी सिखलाए। चाणक्य ने जो चिंतन किया और जो कुछ किया वह सब भारतीयता और राष्ट्रीयता के लिए ही किया। जाति, देश और धर्म को विखंडित किए जाने वाला साहित्य राष्ट्रीय तो नहीं हो सकता लेकिन अपने नवयुवकों के सम्मुख शौर्य, पुरुषार्थ और बलिदान का मार्मिक चित्र प्रस्तुत कर अपने पूर्वजों के गौरवपूर्ण पद चिह्नों पर चलने और मातृभूमि के लिए बलिदान करके स्वयं को गौरवान्वित करने की प्रेरणा प्रदान करता रहा। पृथ्वीराज और राणा प्रताप ने विदेशियों से जो युद्ध किये उनमें भारतीय हुंकार के दर्शन होते है। चंद्रबरदाइ र्और भूषण की वाणी को आप क्या कहेंगे*’ हिन्दुत्व चूँकि राष्ट्रीयत्व से अलग नहीं है इसलिये जो संघर्ष हुआ वह राष्ट्रीयता के लिए ही था। अकबर को सफलता भले ही मिलती रही हो लेकिन उसी के दरबार में बैठे कवि इस बात से चिंतित थे कि भारत का स्वाभिमान कहीं घायल न हो जाए इसलिये अकबर के दरबार के कवि पृथ्वीराज को जब मालूम हुआ कि राणा प्रताप अकबर के सामने समर्पण करने जा रहे हैं तब उसने राणा को एक पत्र लिखा जिसने राणा प्रताप का इरादा बदल दिया। अकबरी दरबार के एक अन्य कवि दुर्साजी राणा प्रताप की प्रशंसा में ‘विरुद्ध वहतरी‘ लिखी इस में स्वतंत्रता सैनानी और आत्म बलिदानी देशभक्त के रूप में राणा प्रताप की स्तुति पर कवि ने पाठकों के हृदय में वीरता, देशभक्ति और राष्ट्रीयता के भाव संचारित करने का प्रयास किया है। केशव ने अपनी ‘रत्न बावनी‘ में राजकुमार रत्नसिंह के बलिदान का जिस ढंग से गौरव किया है वह किसी राष्ट्र नायक की याद दिलाने के लिए पर्याप्त है। भूषण ने शिवाजी और छत्रसाल को भारत की राष्ट्रीयता का प्रतीक बतलाया है। भक्तिकाल के कवियों ने ईश्वर के शत्रु के रूप में तत्कालीन सत्ता को ही अपना लक्ष्य बनाया। नानक और कबीर जिस एकता के लिए समाज को प्रेरित कर रहे थे, उनकी फूट और व्यक्ति में आए दुर्गुण को दूर करने का जो आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन चला रहे थे वह किसके लिए था*’ १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात् जो क्रांति का बिगुल बजा वह किस उद्देश्य के लिए था ‘ तो इसका एक ही उत्तर मिलता है अपनी भूली बिसरी राष्ट्रीयता को और भारतीय मूल्यों को लौटा लेने के लिए। राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक भावना है। किसी प्रदेश विशेष के निवासियों की यह भावना और विश्वास है कि वे एक हैं और अपना भविष्य उज्ज्वल करने के लिए उनका दृढ संकल्प हैं। इसका नाम ही राष्ट्रीयता है जो साहित्य रूपी सरिता से निकल कर मानवता के मैदान को सींचती हुई अनंत में विलीन हो जाती है।
महान् दार्शनिक अरविंद घोष के उन शब्दों की याद दिलाना चाहूँगा जो उन्होंने १९२० में उत्तरपारा में कहे थे। इन शब्दों से ब्रिटिश सरकार की नींव हिल गई थी। उन्हें सरकार बंदी बनाने जा रही है यह समाचार मिलते ही वे पांडीचेरी के लिए निकल पडे। पांडीचेरी उन दिनों फ्रेंच उपनिवेश का भाग थी इसलिये ब्रिटिश सरकार कुछ न कर सकी और हाथ मलती रह गई।
अरविंदो कहते हैं……
India will rise
“India of the ages is not dead nor has she spoken her last creative word; she lives and has still something to do for herself and the human peoples and that which must seek now to awake is not an anglioised oriental people, docile pupil of the west and doomed to repeat the cycle of the occident success and failure, but still the ancient immemorable shakti recovering her deepest self lifting her head higher towards the supreme source of light and strength and turning to discover the complete meaning and a vaster from of her dharma.”

 

यह रेखांकित करने लायक बात है कि अब स्त्री अपने जीवन के असंख्य क्लेशों का इतिहास अपनी ही जुबानी बताने को तत्पर है। एक जद के साथ उसे यह घोषित करना पड रहा है कि इतनी बडी दुनिया में उसकी अनुभूतियों को कोई स्थान नहीं मिल पा रहा है। महादेवी वर्मा ने लिखा है –
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
मैं नीर भरी दुःख की बदली –
दूसरी ओर प्रसिद्ध नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ को जब इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालय में उद्बोधन के लिये आमंत्रित किया गया तो उन्होंने कहा ‘मैं पहले अपने कमरे के विषय में बोलना चाहती हूँ।’ श्रोताओं की शंका का समाधान करते हुए फिर उन्होंने बताया कि इसका महिला लेखन से गहरा सम्बन्ध है क्योंकि कोई जगह होनी चाहिए जहाँ वे बैठकर अपनी मानसिक दुनिया के सुख-दुःख और संघर्षों पर अपने आपसे विमर्श कर सके।’ दो बडी लेखिकाओं की यह पीडा दर्शाती है कि स्त्री होने के कारण ही उनकी कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ थीं जो सभ्य समाज पर सबसे बडा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। किसी सभ्य समाज के विकास की प्रक्रिया में स्त्री को अलग-थलग ही नहीं बल्कि ‘हेय’ माने जाने के कुछ और भी उदाहरण मिलते हैं जैसे क्यूसीडायडीज की सम्मति थी कि ‘जिस प्रकार किसी सभ्य स्त्री का शरीर उसके मकान के अन्दर बन्द रहता है वैसे ही उसका नाम भी बंद रहना चाहिए।’ सुकरात यह मानते थे कि नारी सभी बुराइयों का मूल है, उसका प्यार पुरुषों की घृणा से अधिक भयावह है। अरस्तु के अनुसार ‘नारी की तुलना में पुरुष स्वभावतः श्रेष्ठ होता है क्योंकि नारी इच्छा शक्ति में निर्बल, नैतिकता में शिथिल और विचार-विमर्श में अपरिपक्व होती है।’
‘मनु’ के अनुसार तो स्त्री के लिये पति सेवा ही गुरुकुल में वास और गृहकार्य अग्नि होम है –
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरै पुत्रा न स्त्री स्वतन्भ्यमर्हति ।
इस तरह सारे विधि, शास्त्र और व्यवस्था में स्त्री अपनी देह की ही ‘अनधिकारिणी’ होती है जैसे वह देह उसकी नहीं किसी एक व्यवस्था की है, जिसका संचालन पुरुष प्रधान समाज के हाथों में है। स्त्रियाँ स्वयं भी यह अनुभव करती हैं और स्त्री विमर्श में भी यह चिन्ताएँ सामने आई हैं कि स्त्रियाँ दुनिया को अपनी नहीं पुरुष की आँखों से समझना और भोगना चाहती हैं। वे स्त्रियाँ जो पुरुष की ‘अनुकम्पा’ पर जीवन बसर करना अपनी ‘नियति’ मानकर स्वीकार कर चुकी हैं, उनकी ‘गिरवी’ रखी हुई आत्माओं पर किसी प्रकार का बोझ नहीं है। संकट उन प्रश्नाकुल स्त्रियों का है जो अपनी तयशुदा भूमिका और निर्धारित प्रायोजित और आदेशात्मक शब्दावली से आहत और अघायी हुई हैं। उनकी दिक्कत यह है कि वे अपने आपसे प्रश्न पूछने लगी हैं ‘ जैसे कि स्त्री के जन्म से मृत्यु तक के मसले ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच क्यों तैरते हैं ‘ क्यों लडका ‘चिरंजीवी’ और लडकी ‘सौभाग्यकांक्षिणी’ कहलाती हैं। सौभाग्यवती होकर जीना यदि स्त्री की पहली खुशी है तो वह सौभाग्य भी उसे सही अर्थों में प्राप्त क्यों नहीं है ‘ ऐसी ‘सौभाग्यशाली’ को दहेज के कारण जला देना ‘गलत’ नहीं है ‘ क्या यह ‘सही’ है कि स्त्री को बुद्धिमान न माना जाए ‘ ‘देह’ से शुरू होकर ‘देह’ पर ही उसकी इति मान ली जाए ‘ यह सारा झगडा अन्तहीन भी इन्हीं कारणों से बना हुआ है कि कुछ तो स्त्री जीवन का इतिहास और वर्तमान विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों से भरा है, दूसरा पुरुष प्रधान समाज का सोच भी संकीर्णताओं से घिरा हुआ है। पता ही नहीं चला कि कब स्त्री को व्रत, अनुष्ठान, श्ाृंगार-सिन्दूर, पायल, बिछिया, बिन्दी, चूडी और मेहन्दी रंगे हाथों में बाँधकर उसकी देह पर कब्जा कर लिया गया। फिर मोहाविष्ट होकर स्त्री ने इसी खेल को अपना ‘सौभाग्य’ मान लिया। भोग्या बनकर वह स्वयं से प्रश्न पूछने से भी डरने लगी। कभी यह पूछने का साहस ही नहीं जुटा पायी कि ‘क्या मेरी संवेदनाओं, मेरी इच्छाओं, मेरी बुद्धि का किसी को पता चला ‘ क्या मैं भी अपने मन में बसी हजारों हजार इच्छाओं में किसी एक ‘इच्छा’ को व्यक्त करूँ ‘ क्या ‘मैं’ अपनी ‘सरीखी’ संरचना को जन्म दूँ ‘
सारे विमर्श के केन्द्र में मुख्य चिन्ता यही है कि ‘आखर स्त्री का वजूद, उसका अस्तित्व क्या है ‘ क्या कोई रास्ता है जिस पर वह आजादी से चल सके ‘
स्त्रियों के संघर्ष, उनके उत्पीडन, उनकी छटपटाहट से साहित्य जगत् में भी हलचल होती रही है। इसकी पहली अनुगूँज (कहानी में) बंग महिला (राजेन्द्र बालाघोष) की ‘कुम्भ में छोटी बहू’ और ‘दुलाईवाली’ कहानी में सुनाई देती है। इस प्रकार के लेखन की सबसे बडी विशेषता तो यही थी कि लेखिकाओं ने समाज के शक्ति केन्द्रों पर निशाना साधा था। यह सच उतना ही पारदर्शी है जितने में स्त्री अपनी भाषा और अपने भोगे हुए यथार्थ को अपनी रचनाओं में व्यक्त करे, गोया रचना को ही ‘आइना’ बना ले। लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं में जिस स्वानुभूत सच्चाइयों को उजागर किया वे कुछ ज्वलन्त प्रश्नों को जन्म देती हैं। इस संदर्भ में महिला लेखन की परख करना जरूरी है क्योंकि इनके लेखन में स्त्री जीवन की चिन्ताएँ सामाजिक, आर्थिक, कानूनी और पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के मुद्दों के रूप में विश्लेषित हुई हैं। यह सच ही है कि महिला लेखन में लगातार कुछ नया और उद्वेलित करता हुआ सच उद्घाटित हो रहा है। सबसे बडी चिन्ता तो यही है कि सम्पूर्ण सामाजिक और पारिवारिक ढाँचे में स्त्री को जगह तलाश करना। एक बडी साजिश यह हुई है कि स्त्री के मन को उसकी देह से पृथक कर दिया गया है। एकबारगी देखने से ऐसा लगता है कि उसकी आत्मा को मारकर, सोच की शक्ति को कुचलकर केवल देह को ही केन्द्र में रखा गया है। स्त्री-देह के प्रति पुरुष वर्ग का यह षड्यन्त्र वोल्गा की ‘राजनैतिक कहानियाँ’ नाम के संग्रह में खुलकर सामने आया है। स्वयं लेखिका की स्वीकारोक्ति है कि ‘शरीर के शोषण से स्त्री को मानसिक रूप से दमित रखना, उसके व्यक्तित्व के विकास को रोककर उसके शरीर को नियंत्रित रखना एक गहरी राजनीति है जो पुरुष प्रधान समाजों के मूल्यों के साथ गुँथी हुई है। अपना निजी काम समझकर जिसमें स्त्रियाँ अपनी पूरी ऊर्जा उण्डेल देती हैं वे काम दरअसल उनके लिये नहीं होते।
समाज की धारणा है कि शरीर तथा मन दो अलग-अलग ईकाइयाँ हैं और वह अवसर के अनुसार कभी मन तो कभी शरीर को अहमियत देने लगता है। लेखिका का मानना है कि हम अपने शरीर से अलग नहीं हैं, अब इस बात को स्पष्ट रूप से कहना अनिवार्य है। वोल्गा ने पूरी संवेदनशीलता के साथ आँख, कान, नाक, बाल आदि यानी स्त्री को पूरी देह की क्षमताओं को पुरुष और स्त्री तथा स्त्री और परिवार के सम्बन्धों की कसौटी पर परखा है। वोल्गा ने अपनी सभी कहानियों में उन अनुभवों की हिस्सेदारी की है जो कटु और यथार्थ है। इस रूप में कि स्त्री शोषण का मुख्य आधार शारीरिक दृष्टि से ही अधिक है। संग्रह की पहली कहानी ‘सीता की चोटी’ पढकर ऐसा लगता है कि स्त्री को सभी काम सामाजिक दिखावे, रीति-रिवाजों के निर्वहन पति, बच्चों आदि के लिये करने पडते हैं। बालों की देखभाल, उनका लम्बा और सुन्दर होना, उनमें फूल लगाना, चोटी बनाना कब उचित और कब अनुचित हो जाता है, इसका निर्णय सीता के हाथ में कभी रहा ही नहीं। पति गुजरा नहीं कि सिर मुण्डवाने का दबाव पडता है। अगर बाल सँवारने का काम सीता स्वयं के आनन्द के लिये करती है तो पति की मृत्यु के बाद क्यों नहीं कर
सकती ‘ जीवन के उत्तरकाल में जबकि बाल सफेद हो गए, झडने लगे तब उसे समझ में आने लगा कि अपने बालों पर ही उसका हक नहीं है तो फिर औरत की पूरी देह पर कितनी क्रूरता से औरों का हक जम जाता होगा ‘
‘आँखें’ कहानी में स्त्री स्वाधीनता के प्रश्न को उठाया गया है। लडकियाँ बचपन से ही समाज द्वारा बनाए गए साँचे में ढाल दी जाती हैं। लडकियों पर बहुत से निषेध थोप दिये जाते हैं। लडकी और लडके के भेद को इस कहानी में बडी सूक्ष्मता से दर्शाया गया है। किसी भी लडकी की आँखें कितनी भी सुन्दर और बडी क्यों न हो वह दुनिया नहीं देख सकती, उस पर पुरुष प्रधान परिवार के लाख पहरे हैं। जबकि राम अपनी छोटी-छोटी आँखों से दुनिया देख सकता है, खा सकता है, घूम सकता है, खेल सकता है। ‘लडकी’, ‘लडकी’ ही बनी रहे इसमें स्त्रियों की दासता जनित सोच भी जम्मेदार है। उसे माँ ने डाँटा ‘क्या इधर- उधर देखती रहती है। सर नीचा करके चलो। लडकी की निगाहें हमेशा नीची ही रहनी चाहिए।’ कथ्य में जो उद्वेलन है वह प्रश्नों के रूप में बार-बार कौंधता है जैसे ‘देखने के बाद कुछ तो करना चाहिये नहीं तो देखने का क्या फायदा’ देखने के पहले, देखने के बाद भी एक जैसा रहेंगे तो देखना ही क्यों ‘
महिलाएँ अपने दैहिक सौन्दर्य के प्रति कितनी सचेत हैं इससे भी अधिक चिन्ता उन लोगों को है जो स्त्री को केवल दैहिक आधारों पर परखते हैं। रमा की नाक ‘बेसरी’ कहानी में चर्चा का विषय है और प्रकारान्तर से लेखिका ने यह चिन्ता व्यक्त की है कि रमा के साथ जो हो रहा है वह गलत है। रमा की नाक का छेद और दाग सबको दिखाई देता है किन्तु कोई यह समझने को तैयार नहीं है कि वह कितनी शिक्षित है, उसके मन में इस बात की कितनी नाराजगी है कि ‘अब वैसा जमाना हो गया कि विवाह के लिये वर पक्ष वालों की इच्छानुसार वधुओं को अवयव बदलने पडेंगे। अब तक हर लडके वालों ने रमा की नाक के छेद पर टिप्पणी की तो पिता ने उसकी नाक की सर्जरी करवायी। फिर एक रिश्ता आया है। दहेज तय हो गया। वर पक्ष वाले खुश हैं। बस सत्यनारायण की एक ही इच्छा है कि लडकी की नाक में बेसरी हो। बेसरी पहनने के लिये फिर नाक में छेद करवाना। किन्तु रमा ने तय किया – ‘अब बिलकुल नाक में छेद नहीं करवाऊँगी। यह शादी रुक जाएगी तो रुकने दो।’ विडम्बना यह है कि पहले लडके वालों की आपत्ति हुई तो नाक का छेद बंद करवाया। अब फैशन है और लडका चाहता है लडकी नाक में बेसरी तो फिर से ……. ।
जानकी के दिमाग की सबसे बडी उलझन यही है कि क्यों उसे मुँह बन्द करने के लिये कहा जाता है जबकि उसके भाई जोर-जोर से चिल्लाते हैं। ‘मुँह बन्द करो’ कहानी स्त्री के दिमाग पर चोट करती है क्योंकि ‘शब्द मुँह से निकलते हैं पर उनका जन्म तो दिमाग से होता है।’
स्त्रियों में अपने शरीर और शरीर धर्मों के प्रति हीन भावना पैदा करने की जम्मेदारी पितृसत्तात्मक समाज की है। शिक्षक, नजदीक के रिश्तेदार, पति, पिता, भाई इन सभी के दुर्भावनापूर्ण व्यवहार से क्षुब्ध स्त्री को अपना जन्मना ही ‘पाप’ लगने लगता है। इस संकलन की ‘दीवारें’, ‘रक्षक’ ‘क्या करना चाहिए’ आदि कहानियों में महिलाओं की अवास्तविक जंदगी का दारुण दुःख व्यक्त हुआ है। पुरुष प्रधान समाज की इस राजनीति को समझना होगा कि परिवार में उनको विभाजित करके रखा जाता है। सास, ननद, बहू, जेठानी, देवरानी के झगडे करवाये जाते हैं। घर में वे मित्र नहीं शत्रु की तरह रहती हैं। लेखिका का इशारा इस ओर भी है कि स्त्रियों को इन कहानियों को पढकर अपने ‘भ्रम’ दूर कर लेने चाहिये। प्रेम, वात्सल्य, कर्त्तव्य और जम्मेदारी के नाम पर उसे ‘घर’ देकर पुरुष अपने राजनैतिक खेल खेलता है। यह राजनीति ‘घर’ और ‘सुरक्षा’ के नाम पर खेली जाती है जहाँ निरन्तर स्त्री के आत्मगौरव को ठेस पहुँचाती रहती है। ‘पत्थर के स्तन’ कहानी का टीचर और मामा, ‘एक राजनीतिक कहानी’ का पति, ‘आर्ति’ कहानी के माँ और पिता, ‘विवाह’ कहानी की सामाजिक परम्परा की अनिवार्यता आदि में स्त्री के विचार, भाषा, अनुभूति सब कुछ कुचलकर उसे स्त्री-गरिमा की कई सीढयों से नीचे धकेल दिया गया है। एक तथ्य इसमें अन्तर्निहित है और वह यह कि देह के भीतर बसे मन और बुद्धि में जो स्वतंत्रता और आत्मबोध का ज्ञान है वह पितृसत्ता को चुनौती देता है। देह के प्रति अनाधिकृत आकर्षण और फिर उस पर मनचाहा नियंत्रण, यही लोगों का मुख्य ध्येय है।
स्त्री और स्त्री समुदाय की दासता के कितने रूप समाज में बिखरे पडे हैं, उन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। हम जब भी अपनी सुप्त चेतना को झकझोरते हैं तो इस सत्य को जान पाते हैं कि स्त्रियों से सम्बन्धित कई धार्मिक और सामाजिक विषय ऐसे हैं जिन्हें हम ‘प्रथा’ कहकर महत्त्व ही नहीं देते हैं। स्त्री समुदाय पर पूरा कब्जा बना रहे इसलिये उन्हें कई प्रकार की अतिवादी भावाकुलताओं से जोडे रखा जाता है। भारतीय समाज का अस्तित्व शायद ऐसी ही प्रथाओं के बलबूते पर बना रहता है। जया जादवानी की कहानी ‘जो भी यह कथा पढेगा’ भारतीय सांस्कृतिक जीवन के परम्परागत ढाँचे में हस्तक्षेप करती प्रतीत होती है। यह कहानी उन तमाम स्त्रियों के जीवन के उस पाखण्ड का पर्दाफाश करती है जो धर्म के नाम पर सदियों से चलता आ रहा है। व्रत, अनुष्ठान, पूजापाठ के कर्म विधानों से स्त्रियाँ वैसे ही जकडी हुई हैं फिर अब उनके व्यस्त कार्यक्रमों में सीरियल भी आ जुडे हैं। अब उन्हें दुनिया देखने की फुर्सत ही कहाँ है ‘ गहने, कपडे, सौन्दर्य प्रसाधनों से दबी ढँकी इन स्त्रियों को अपनी मुख्य समस्या का बोध ही नहीं है। औरतों और लडकियों ने ‘तीज’ का व्रत किया, अपने घर की उकताहट, झल्लाहट और रूटीन से हटने के लिये सामूहिक रूप से मंदिर गयीं। पूजा, कथा श्रवण सब कुछ की व्यवस्था है किन्तु वहाँ उन्होंने सुनने के सिवा मनचाहा सब कुछ किया। सुष्मिता सेन की बातें, फिर मन का कुछ न कर पाने की हताशा, चाँद निकलने का इन्तजार और इन सबके बीच यह अनुभूति कि व्रत की इन कहानियों में लहुलुहान औरतों की आत्माएँ हैं। सभी स्त्रियाँ धार्मिक पर्वों पर निरपेक्ष रहती हैं। उनकी आस्थाएँ ‘छूट’ लेना चाहती हैं, पानी न पीना हो तो दूध पीने का मन बनाना, खीर की जगह चाप्सी और चाउमीन खाना और घर में पति यानी शासक नहीं बल्कि पुरुष, ‘मानवीयता’ की तलाश करना, एक तरह से रूढयों के प्रति विद्रोह है। वे स्त्रियाँ जो व्रत करती हैं और वे जो बिना आस्था के व्रत करने को मजबूर हैं, उन्हें अब यह महसूस होने लगा है कि व्रतों की कहानियों में स्त्री की कमजोरियाँ दर्शायी जाती हैं। ‘सुहागन’ बने रहने में ही वे सुरक्षित अनुभव करती हैं। व्रतों की अतिवादी भंगिमा को तोडती यह कहानी जो भी पढेगा, जैसा कि शीर्षक भी है, वह इस सत्य से साक्षात्कार करेगा कि बहुत ही खूबसूरती से स्त्रियों के लिये ऐसी मर्यादाओं का घेरा बना दिया गया है जिसमें रहते-रहते स्त्री की क्षमताएँ चुकती जा रही हैं। हजारों वर्षों से स्त्रियों के आदर्श सीता और सावित्री ही रहे हैं। इन ‘मिथकों’ के सहारे ही शेष जीवन बिताने की चाह रखना कितना खतरनाक है। एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह भी है कि जिनके लिये स्त्री व्रत करती है, भूखी-प्यासी, थकी-क्लांत रहती है, क्या वह उससे प्रेम करता है और क्या यही पति उसे जन्म-जन्मान्तर चाहिये’
इस सन्दर्भ में शती के पूर्वार्द्ध में लिखी हुई यशपाल की कहानी ‘करवा का चौथ’ का उल्लेख करना प्रासंगिक ही होगा जिसमें स्त्री जीवन के अन्तर्विरोध अधिक व्यंग्यात्मक होकर व्यंजित हुए हैं। पति की प्रताडनाओं से तंग और क्षुब्ध पत्नी करवा चौथ के व्रत पर भूखे रहने की तुलना में रोटी खा लेती है और पति के पीटने पर चिल्लाते हुए कहती है – मार ले जितना मारना हो, मैंने कौन-सा तेरे लिये व्रत किया है।’ यह संवाद स्त्री के चेतना सम्पन्न होने का बहुत ही सार्थक उदाहरण है जिसमें सम्बन्धों की कसौटी व्रत करने या न करने में नहीं बल्कि ‘प्रेम’ में अन्तर्निहित है। अत्याचारी पति के प्रति यह विद्रोह नारीवाद का पहला उदाहरण माना जा सकता है।
कहानी में और स्त्री-विषयक चर्चित मुद्दों में एक और समस्या स्त्री के मन को कचोटती रहती है और वह है उसके ‘होने के अहसास की।’ उसकी ‘आइडेंटिटी अस्मिता या पहचान का सवाल’। वह अब सामाजिक काल्पनिकताओं से बाहर आने के लिये छटपटा रही है। अलका सरावगी की कहानी ‘मिसेज डिसूजा के नाम’ में लेखिका की आकांक्षा यही है कि वह घर-परिवार, पति-बच्चे के अलावा अपना भी जीवन जी सके। उसकी यही ‘चाहत’ उसकी सबसे बडी पीडा और असफलता का कारण बन जाती है। बच्ची के स्कूल से उपालम्भ, पति का आदेशात्मक स्वर सभी इस ओर इशारा करते हैं कि दुनिया में जितने अनुशासन हैं, उनकी कैद में अधिकतर बच्चे और महिलाएँ दण्डित हैं। खोजने पर पता चलता है कि अभी तक हमें जीने का सही ढंग आया ही नहीं है। जहाँ जिज्ञासाएँ, प्रश्न, प्रफुल्लता और संवेदनाएँ नहीं होंगी वहाँ मुर्दादिली पसरी दिखाई देगी। वर्तमान समय में कहानियों के कलेवर ने जो परिदृश्य हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है उसमें नौकरी पेशा महिलाओं के जीवन की चिन्ताएँ शीर्ष पर हैं। पितृसत्तात्मक समाज, बाजारवाद, पूँजीवादी संस्कृति और बढती हुई असीमित लालसाओं ने स्त्री के सम्मुख बहुत से संकट खडे कर दिए हैं।
अचला नागर की कहानी ‘सिफारिश’ की गुड्डी दैहिक शोषण से बचने के लिए चार नौकरियाँ छोड चुकी है किन्तु पाँचवीं नौकरी के लिये सिफारिश चाहिये और उसके लिये गुड्डी को समर्पण करना पडता है। माँ की शिक्षा, अपना आत्म सम्मान, सब कुछ गिरवी रख देती है, ‘गाडी सूनी सडक पर चलती है। सामने लगे शीशे पर एक बार यूँ ही मेरी दृष्टि चली जाती है ……. एक जोडी सुर्ख आँखें मेरी आँखों से मिलती हैं और फिर से एक हौल-सा मन में गडबडाने लगता है ….. तभी उनकी बाईं बाँह मेरे कन्धे पर टिक जाती हैं, उँगलियाँ इधर-उधर रेंगने लगती हैं, और कुछ देर बाद माँ के पहनाए गए जिरह-बख्तर में आजाद होने के बाद मैं सामने झूलते हुए सफलता के उस रेशमी परिधान को देखती हूँ।’
‘जाँच अभी जारी है’ कहानी में ममता कालिया ने स्त्री- उत्पीडन की व्यथा को बहुत ही मार्मिकता के साथ व्यक्त किया है। अपर्णा मेहनती, कुशाग्र और ईमानदार स्त्री है। सम्भवतः यही गुण उसके अवगुण बन जाते हैं। वह बैंक के अपने सहकर्मियों के साथ शामें नहीं गुजारती है। नैतिकता और सच्चाई का दामन पकडे वह जिस रास्ते पर चलना चाहती है उसमें बहुत से व्यवधान आते हैं। उस पर झूठा मुकदमा भी चलता है। वह हर जगह अपनी नेक-नियति की सफाई देती है किन्तु निराशा ही हाथ लगती है। इस सारे संघर्ष में से बदली हुई स्त्री की जो चौंकाने वाली छवि सामने आयी उसने स्त्री के आदर्शवादी नकाब को उतारकर फैंक दिया। कमल कुमार की कहानी ‘सीढयाँ’ में नीरू सफलता के लिये पुरुष मित्रों को सीढी की तरह काम में लेती है। उसे लगता है अजय में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। अजय से मित्रता रखना मतलब कि घर के बोझ से दबी घरेलू औरत। विजय की मित्रता, उसका कलात्मक व्यक्तित्व भी नीरू को रास नहीं आता, क्योंकि वह आदर्शवादी है। नीरू की दिलचस्पी अब अनिल में है। किन्तु देह और दुनिया के सारे खेल देखकर उसे इस सच्चाई का भान होता है कि रिश्तों को साधन नहीं साध्य मानना चाहिये। वह पुनः लौटती है पुराने सम्बन्धों के पास। विजय को फोन करती है।
नौकरीपेशा स्त्री की छटपटाहट, अपने ही निर्णयों के प्रति असमंजस की स्थिति, संवेदनाओं के उतार-चढाव की अत्यन्त ही मर्मस्पर्शी कहानी है। चित्रा मुद्गल की ‘दरमियान’। एक नौकरी में उलझी स्त्री के पास सबसे अधिक समस्या है समय की। उसकी चिंता कभी ‘स्व’ के प्रति, कभी बच्ची के प्रति, कभी पति के प्रति सन्नद्ध होती है। ऐसी ऊहापोह और उलझन भरी मनःस्थितियों का पुनः पुनः दोहराया जाना यह सिद्ध करता है कि महानगरीय जीवन के बीच नौकरी और परिवार के बीच सामंजस्य स्थापित करना कितना मुश्किल है। समकालीन समय में जीवन मूल्यों में जो परिवर्तन आया उसने स्त्री जीवन को भी प्रभावित किया है। मधु कांकरिया उन लेखिकाओं में है जिन्होंने स्त्री के मन को बहुत ही गहराई से टटोला है। मधु कांकरिया की कहानियों की स्त्रियाँ कहीं बेबाक, कहीं कोमल और कहीं अपनी अस्मिता की तलाश करती हुई दिखाई देती है। यह कम महत्त्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि मधु ने जब भी अपनी स्त्री पात्रों के प्रति न्याय किया वे अपने आप से, एक विशेष प्रकार के काल्पनिक रिश्तों से मुक्त होती हुई प्रतीत होती हैं। मधु का ‘बीतते हुए’ में इन्द्रजीत और मणि दीपा के प्रेम-प्रसंग को, प्रेम के उठते-गिरते ग्राफ को और फिर इस रिश्ते से उठती भाप को बादल बनते हुए दिखाया है। पन्द्रह वर्षों के सुदीर्घ अन्तराल के बाद, जीवन में बहुत कुछ खोकर, मणिदीपा इन्द्रजीत अपने पुराने प्रेमी को आमंत्रित करती है। इन्तजार लम्बा होता जाता है, और पुरानी स्मृतियाँ पुनर्जीवन पाती हैं। इस उद्वेलन को सहते-सहते मणिदीपा ‘प्रेम’ की परिभाषा कुछ यूँ करती है – ‘मुझे तो आत्मबोध हो चुका इन्द्र का प्रेम न उद्दाम वेग है, न आत्मविस्मृति या तल्लीनता के चरम क्षण। थककर चूर निःस्पन्द पडी काया के सिरहाने तकिया बढाते हाथ प्रेम है। श्रम और परेशानी से माथे पर उभरी स्वेद बूँदों पर शीतल उँगलियों की छुअन है प्रेम। ठिठुरती ठंड में गर्म खाने के लिये ठिठुरती प्रतीक्षारत निगाहें हैं प्रेम।
हिन्दी कहानियों में महत्त्वपूर्ण बदलाव उषा प्रियम्वदा की उन कहानियों से आया जिनमें एक तरफ अर्थ के प्रभाव है तो दूसरी ओर स्त्री के अकेलेपन का विस्तार वर्णित है। ‘जन्दगी और गुलाब के फूल’ उषा जी की ‘नई कहानी’ के दौर की किन्तु इस समय की पुरानी कही जाने वाली कहानी है किन्तु अर्थ के केन्द्र में यदि स्त्री है तो पुरुष का अहं कैसे आहत होता है’ यह मुहावरा आज भी अपना असर बनाए हुए हैं। पिछले दिनों उषा प्रियम्वदा का ‘मेरी कहानियाँ’ नाम से संग्रह पढने को मिला। उनकी ‘कितना बडा झूठ’ और ‘मोहबंध’ कहानियों में आधुनिक भारतीय समाज में वैवाहिक जीवन की असंगतता और दिखावे की स्थितियों को प्रस्तुत किया गया है। प्रेमविहीन जीवन स्त्रियों को कितना थका देता है इसका यथार्थ वर्णन किया गया है। विवाह सम्बन्ध कम समझौता अधिक है। ‘कितना बडा झूठ’ कहानी की किरण नौकरीपेशा आधुनिक स्त्री है। उसके मन में पति और बच्चों से मिलने की इच्छा नहीं है। वह चाहती है मैक्स का स्पर्श। दैहिक सुख। विवाहेतर सम्बन्धों का यह सहज स्वीकार स्त्री को नये सोच की तरफ धकेलता है। किरण को मैक्स का शादी कर लेना इसलिये स्वीकार्य नहीं है। किन्तु विवश और लाचार वह झूठे से सही पति और बच्चों को अपनाने के लिये स्वयं को तैयार कर लेती है।
समकालीन कहानी में स्त्री जीवन के जितने विविध पक्ष उजागर हुए हैं उनमें स्त्री का संघर्ष और विद्रोह, नाराजगी और तिक्तता, प्रेम, घृणा और पश्चाताप के भाव का रंग अधिक गहरा होता हुआ दिखाई देता है। पहले स्त्री-पुरुष के परस्पर सम्बन्धों का आधार ‘विवाह’ होता था किन्तु ‘विवाह’ संस्था की जटिलताएँ कहें या सम्बन्धों की स्वच्छंदता का हवाला दिया जाए अथवा स्त्री-पुरुष के मध्य बदलते प्रेम सम्बन्धों का सवाल हो, रिश्ते अब उतने सहज, ईमानदारी से भरे और एकनिष्ठता की ओर बढते हुए प्रतीत नहीं होते हैं। मानवीय व्यवहार की माँग कर रही स्त्री के साथ यह एक असामाजिक तौर पर किया गया धोखा और छल ही है कि जब प्रेम और विवाह के सम्बन्ध बनते हैं तब उसके भागीदार स्त्री-पुरुष दोनों ही होते हैं, किन्तु जब प्रेम असफल होता है, वैवाहिक बंधन टूटता है या विवाहेतर सम्बन्ध बनते हैं तब कठघरे में ‘स्त्री’ को ही खडा किया जाता है। इतना होने पर भी ‘प्रेम’ पर केन्द्रित जितनी अधिक संख्या में कहानियाँ लिखी गयी हैं उनसे यह तो सिद्ध होता है कि स्त्री और पुरुष के जीवन में ‘प्रेम’ का निषेध नहीं है किन्तु जो दैहिक भूख, शारीरिक थकान, संत्रास और पीडा का बोध है वह प्रेम के बदलते हुए स्वरूप के कारण ही है। प्रेम, प्रेम विवाह और विवाहेतर सम्बन्धों पर उत्तरशती में सर्वाधिक कहानियाँ लिखी गयीं। अधिकतर कहानियों में प्रसादयुगीन, आदर्शवाद से मुक्ति की राह तलाशी गयी। जैसे कि स्वातंत्र्योतर हिन्दी कहानी के दौर में मन्नू भण्डारी ने ‘यही सच है’ और ‘एक बार फिर’ कहानियों में एकाधिक प्रेम का पक्ष लिया और ‘रोमांटिसिज्म’ की अवधारणा को तोडते हुए प्रेम के अधिक यथार्थपरक स्वरूप का पक्ष लिया तो फिर यह सिलसिला विवाहेतर प्रेम सम्बन्धों की अनेक कहानियों में लक्षित हुआ।
बाद की कहानियों में आत्मस्वीकृतियों का कथ्य-शिल्प विकसित हुआ और लेखिकाओं ने अभिव्यक्ति के इस प्रकार को खुले मन से स्वीकार किया। यह बात अलग है कि सम्बन्धों के इस अनावृत्त चित्रण ने स्त्री लेखन पर कई प्रश्न चिह्न लगा दिए। राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित ‘देहरि भई विदेस’ लेखिकाओं के आत्मकथांश का ऐसा संकलन है जिसमें सामाजिक तौर पर अपने होने की दास्तान कही गयी है। प्रभा खेतान का लिखा ‘एक अनुपस्थित प्रतिबिम्ब’ विवाहेतर प्रेम सम्बन्धों के आवेग, अन्तर्विरोधी और विसंगतियों को स्त्री की आत्मपीडा के स्वर में व्यंजित करता है। वर्तमान समय में जबकि विवाह जैसी पारम्परिक संस्थाओं में ही बदलाव की आवश्यकता पर विमर्श चल रहा है, ऐसे में लीक से हटकर पनप रहे विवाहेतर सम्बन्धों की जटिलताओं ने स्त्री-पुरुष के प्रेम-सम्बन्धों पर ही संदेह पैदा कर दिया है। सामाजिक कानूनी मान्यता के बिना साथ-साथ एक घर में रहना, स्थापित नैतिकताओं और मूल्यों को तोडना कितना मुश्किल होता है, इसका उदाहरण यह दस्तावेज है। लेखिका प्रभा खेतान ने विवाहित डॉक्टर से प्रेम सम्बन्धों का खुलासा किया है।
सामाजिक दृष्टि से यह स्वीकार्य नहीं और इसकी विसंगति यह है कि हर बार स्त्री का अस्तित्व ही खतरे में पड जाता है। वह कौन है, क्या कहलाएगी, कौन सा सम्बोधन उसके ‘प्रेम’ की रक्षा करेगा। लेखिका के शब्दों में, ‘मैं क्या लगती थी डॉक्टर साहब की ‘ मैं क्यों ऐसे उसके साथ चली आई ‘ प्रियतम, मिस्ट्रेस, शायद आधी पत्नी ……. इस रिश्ते को नाम नहीं दे पाऊँगी। भला प्रेमिका की भूमिका भी कोई भूमिका हुई ‘ प्रेम तो सभी करते हैं।’ इसी प्रसंग में लेखिका ने आगे लिखा है कि प्रेम के विभोर कर देने वाले क्षणों का उपयोग दोनों ने किया किन्तु जवाबदेही केवल स्त्री की। यह पाप बोध ही होता है जो स्त्री को कभी भी ‘मुक्त’ नहीं करता है। जबकि प्रेम की पहली शर्त ही ‘मुक्त’ करना और मुक्त होना है। किन्तु अपमान के घूँट पीकर और ठोकरें खाकर भी क्या स्त्री सम्भलती है ‘ ‘हम औरतें प्रेम को जितनी गम्भीरता से लेती हैं, उतनी ही गम्भीरता से यदि अपना काम लेती तो अच्छा रहता, जितने आँसू डॉक्टर साहब के लिये गिरते हैं उससे बहुत कम पसीना यदि बहा सकूँ तो पूरी दुनिया जीत लूँ। मगर क्या करती ‘ और यह अनिश्चय की स्थितियाँ ही स्त्री को प्रेम की भावाकुलताओं के घेरे से बाहर निकलने नहीं देती है।
यह एक विचित्र किन्तु सामाजिक अनिवार्यता है कि नैतिकता से जितनी टकराहट स्त्री की होती है, जितने प्रश्न उससे पूछे जाते हैं उससे आधे से भी कम पुरुषों से नहीं पूछे जाते हैं। मीडिया और बाजार ने स्त्री की स्थापित छवि के अनेक प्रतिमानों को खण्डित किया है। इसके लिये कौन जम्मेदार है ‘ यह एक अलग बहस का मुद्दा है। फिलहाल इतना जरूर कहना चाहती हूँ कि अपने स्वतंत्र लेखों और वक्तव्यों में लेखिकाओं ने जो प्रखरता और स्त्री जीवन के जरूरी सवालों के प्रति संलग्नता व्यक्त की है, वह कहानियों में व्यक्त होना शेष है।

 

डॉ. गुलाबराय का कथन है – ?आलोचना का मुख्य उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वाद कर पाठकों को उस प्रकार के आस्वाद में सहायता देना तथा उसकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गति निर्धारित करने में योग देना है।? इस तरह आलोचना साहित्य की व्याख्या करती है, उसके गुण-दोष बताती है, उसके निर्माण की दिशा निर्धारित करती है।
यह सर्वविदित है कि जहाँ रचनाकार का कर्म विराम लेता है वहीं से आलोचक का कर्म प्रारम्भ होता है। आधुनिक उत्तर संरचनावादी रचनाकार और आलोचक में बुनियादी भेद नहीं मानता। उसकी दृष्टि में दोनों ही भाषा का खेल खेलते हैं, दोनों रचना करते हैं। जहाँ रचयिता समाप्त करता है वहाँ से पाठक शुरू करता है। अतः आलोचना और साहित्य तत्वतः एक हैं परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध हैं। आलोचना मानव व्यक्तित्व से भी अंशतः प्रभावित होती है।
आलोचना से सामान्यतः छिद्रान्वेषण का अर्थ लिया जाता रहा है, किन्तु आलोचना का लक्ष्य वस्तुतः लेखक या उसकी कृति के दोषों को संकलित करना नहीं कृति का विवेचन करते हुए उसके विविध पक्षों का उद्घाटन कर उसके महत्त्व एवं अमहत्त्व को स्थापित करना है। अंग्रेजी में आलोचना के लिए ?क्रिटिसिज्म? शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका मूल अर्थ है – निर्णय। आलोचक वह है जो निर्णय दे। भारतीय वाङ्मय में ?आलोचना? केवल निर्णय की प्रवृत्ति का अर्थ बोध नहीं कराती, उसके अर्थ का क्षेत्र अधिक व्यापक है। आलोचना शब्द के मूल में ?लुच्? धातु है जिसका अर्थ है – देखना। आलोचना के लिए हमारे यहाँ पर्यायवाची शब्द समीक्षा है, वह भी इसी अर्थ की व्यंजना करता है। अतः साहित्य के क्षेत्र में आलोचना किसी साहित्यिक कृति का सम्यक एवं समग्र निरीक्षण है। यह निरीक्षण एक तो कृति के बाह्य रूप का विवेचन है, दूसरे लेखक की अन्तः प्रकृति की चेतन, अवचेतन प्रक्रियाओं का विश्लेषण है, तीसरे भावक के प्रभाव संवेदनों की अभिव्यक्ति है और अन्त में कृति की समग्र प्रतिक्रियाओं के अनुरूप वस्तु का मूल्य निर्धारण है।
आलोचना के विकास की आरम्भिक अवस्था में कृति का गुण-दोष विवेचन अथवा उसके अर्थ का भाष्य ही आलोचक का मुख्य कर्त्तव्य रहा है। ?काव्य मीमांसा? आलोचना अथवा समीक्षा के इसी ध्येय की ओर इंगित करती है – ?अन्तर्भाष्यं समीक्षा। अवान्तरार्थ विच्छेदश्च सा।? अर्थात् समीक्षा का लक्ष्य किसी कृति का अन्तर्भाष्य, उसके तत्त्वों का विवेचन और उसके सम्बन्ध अवान्तर से प्राप्त अर्थों का संकलन है। किन्तु जैसे-जैसे आलोचना विकसित होती जाती है वह कृति के आंतरिक और बाह्य पक्षों का अन्वीक्षण करती है। सूक्ति, भाष्य, व्याख्या, निर्णय आदि आलोचना के अंग स्वरूप हो जाते हैं।
आलोचना का मुख्य उद्देश्य है साहित्य के मर्म का उद्घाटन करना। इस उद्घाटन की क्रिया में आलोचक, लेखक और पाठक के बीच दुभाषिए का काम करता है। राजशेखर ने आलोचक के ध्येय को इस प्रकार व्यक्त किया है –
सा च कवेः श्रममभिप्रायं च भावयति। तथा खलु फलितः कवेव्यापारतरुः अन्यथा स्रोडवकेशी स्यात्।
(काव्य मीमांसा)
अर्थात् आलोचक कवि के श्रम अभिप्राय तथा भाव को व्यक्त करता है। उसके प्रयत्न से ही कवि व्यापार तरु फल देता है, अन्यथा वह फलित नहीं होता। इस प्रकार आलोचक की प्रतिभा साहित्य के बाह्यांगों के साथ-साथ उसके अंतरंग को भी प्रकाश में लाती है।
आलोचक के उत्तरदायित्व को अत्यन्त गम्भीर मानते हुए अर्नाल्ड ने उसके निस्संग प्रयत्न पर अधिक बल दिया है। यह निस्संग प्रयत्न एक ओर तो आलोचक को पूर्वाग्रह से मुक्त रखता है, दूसरी ओर सांसारिक क्षुद्रताओं से तटस्थ। आचार्य शुक्ल की शब्दावली में इस निस्संग प्रयत्न के द्वारा आलोचक लोक मंगल की सच्ची साधना कर सकता है। अतः आलोचकों के पक्ष में उसका पूर्वाग्रह रहित एवं संयमित होना अत्यावश्यक है। आचार्य शुक्ल आलोचना के लिए विस्तृत अध्ययन, सूक्ष्म अन्वीक्षण और मर्मग्राही प्रज्ञा को अपेक्षित मानते हैं। एक स्थान पर वे लिखते हैं – ?समालोचक के लिए विद्वता और प्रशस्त रुचि दोनों अपेक्षित हैं। न रुचि के स्थान पर विद्वता काम कर सकती है और न विद्वता के स्थान पर रुचि।?
हिन्दी आलोचना का व्यवस्थित विकास भारतेन्दु युग में ही गद्य की अन्य विधाओं के साथ-साथ प्रारम्भ हो जाता है। आलोचना की विभिन्न पद्धतियों के विषय में भी गहन विश्लेषण आरम्भ हुआ। आलोचना पद्धतियों को व्यापक रूप से दो वर्गों में बाँटा जा सकता है –
(१) सैद्धान्तिक आलोचना
(२) व्यावहारिक आलोचना
सैद्धान्तिक आलोचना – सैद्धान्तिक आलोचना काव्य का शास्त्रीय पक्ष है। साहित्य का स्वरूप जब स्थिर हो जाता है तब उसके आधार पर आलोचक की प्रतिभा जिन सिद्धान्तों का निर्माण संकलन करती है वे कालांतर में साहित्य के नियामक बन जाते हैं। इन सिद्धान्तों की आधारशिला पर ही व्यावहारिक आलोचना का भव्य भवन खडा होता है।
व्यावहारिक आलोचना – व्यावहारिक आलोचना, आलोचना के सिद्धान्तों का प्रयोगात्मक पक्ष है। व्यावहारिक आलोचना काव्य अथवा साहित्य का प्रयोगात्मक अध्ययन करती है। व्यावहारिक आलोचना की तीन प्रमुख पद्धतियाँ हैं – प्रभावात्मक, निर्णयात्मक, व्याख्यात्मक।
इनमें व्याख्यात्मक आलोचना का विशेष महत्त्व है। यह वस्तुतः वैज्ञानिक आलोचना प्रणाली है। व्याख्यात्मक आलोचना कृति के मूल्यों को कृति में ही खोजती है। कृति की स्पिरिट, कला और विषय की यह वैज्ञानिक विवेचना करती है। आलोचक वैज्ञानिक की तरह आलोच्य वस्तु का विश्लेषण करता है और निस्संग भाव से उसका विवेचन करते चलता है।
व्याख्यात्मक आलोचना के कई उपभेद किये जा सकते हैं – इनमें चार प्रमुख हैं – मनोवैज्ञानिक, चरितमूलक, तुलनात्मक, ऐतिहासिक। ऐतिहासिक आलोचना के अन्तर्गत ही माक्र्सवादी और समाजशास्त्रीय आलोचना पद्धतियों को रखा जा सकता है।
साहित्य आरम्भ से ही पद्य रूप में अस्तित्व ग्रहण करता आया है। अतः प्रारम्भिक समीक्षा के मानदण्ड भी पद्य के आधार पर निर्धारित किए गए हैं। संस्कृत का काव्य शास्त्र साहित्य निर्माण एवं आलोचना दोनों के लिए ही प्रतिमान प्रदान करता है। धीरे-धीरे बदलते युग सन्दर्भ के साथ प्रतिमान भी बदलते गए।
गद्य का विकास आधुनिक युग में हुआ है। भारतेन्दु से हिन्दु गद्य के विकास की सुदीर्घ परम्परा परिलक्षित होती है। गद्य की प्रमुख विधाएँ उपन्यास, कहानी, निबन्ध, नाटक आदि हैं। इन विधाओं के विकास के साथ ही इनके मूल्यांकन की आवश्यकता महसूस की गई। प्रारम्भ में गद्य के समसामयिक समस्याओं को वर्णित किया गया था। गद्य का स्वरूप भी परिष्कृत नहीं था तब आलोचना कथ्य तक ही सीमित थी। भारतेन्दु युग में पत्र-पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षाओं के रूप में आलोचना का विकास हुआ। जैसे-जैसे कथ्य में जटिलता आती गई वैसे-वैसे आलोचना का स्वरूप भी विकसित होता गया है। छायावाद तक आते-आते अर्थात् प्रेमचन्द के समय में गद्य का स्वरूप काफी स्थिर हो चुका था। जब गद्य का स्वरूप स्थिर हो गया तो उसकी आलोचना के मानदण्ड भी निर्धारित कर दिए गए। आलोचक के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह गद्य के विभिन्न रूपों के मूल तत्त्वों को पहचाने इसके अनन्तर आलोचना कर्म में प्रवृत्त हो। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने अपने ?हिन्दी साहित्य सर्वस्व? में उपन्यास, कहानी, निबन्ध आदि की समीक्षा के कतिपय मानदण्डों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार उपन्यास की समीक्षा करते समय निम्नांकित प्रश्नों को ध्यान में रखकर निर्णय करना चाहिए –
१. उपन्यास की कथावस्तु कहाँ से ली गई है ?
२. यदि कथा वस्तु ऐतिहासिक या पौराणिक है तो लेखक ने उसमें क्या परिवर्तन करके क्या विशेष प्रभाव उत्पन्न करना चाहा है ?
३. इस परिवर्तन के निमित्त लेखक ने किन नवीन पात्रों या घटनाओं का समावेश किया है ?
४. इन पात्रों या घटनाओं में से कितनों की आवश्यकताएँ वास्तविक हैं और कहाँ तक उचित हैं ?
५. यदि कथा काल्पनिक है तो वह कहाँ तक सम्भव, विश्वसनीय, स्वाभाविक और संगत है और उपन्यासकार जो प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है, उसमें उसे कहाँ तक सफलता मिली है ?
६. लेखक अपना उद्दिष्ट प्रभाव उत्पन्न करने में कहाँ तक सफल हुआ है ?
७. इस सफलता के लिए उसने किस भाषा शैली का आश्रय लिया है और वह भाषा शैली कथा की प्रकृति तथा पाठकों की योग्यता के कहाँ तक अनुकूल है ?
८. संवादों की भाषा शैली पात्रों की प्रकृति तथा परिस्थिति के कहाँ तक अनुकूल, स्वाभाविक तथा उचित मात्रा में है ?
९. लेखक ने पाठक का मन उलझाए रखने के लिए किस कौशल का प्रयोग किया है –
(क) प्रारम्भ उचित ढंग से किया है या नहीं ?
(ख)घटनाओं का गुंफन अधिक जटिल तो नहीं हो गया और मार्मिक स्थलों पर उचित ध्यान दिया गया है या नहीं?
(ग) कथा का चरमोत्कर्ष दिखाने में शीघ्रता या विलम्ब तो नहीं हुआ और यह चरमोत्कर्ष दिखाने में अनुचित, अनावश्यक, अस्वाभाविक तथा असंगत घटनाओं का समावेश तो नहीं किया गया ?
(घ) उपन्यास का अन्त किस प्रकार किया गया ? वह कथा की प्रकृति, घटना-प्रवाह और पात्रों के चरित्र और मर्यादा के अनुकूल, संगत, आवश्यक, अपरिहार्य और स्वाभाविक है या नहीं ? अनावश्यक रूप से उपन्यास को दुखान्त या सुखान्त तो नहीं बना दिया गया ?
(ङ) किस पुरुष में कथा कही गई है ? वर्णन, पत्र, भाषण, समाचार, संवाद, वार्तालाप, आत्मकथा, सूचना आदि।
(च) रूप की नवीनता उत्पन्न करने से उपन्यास के कथा प्रवाह में क्या दीप्ति या दोष आ गए ?
१०. उपन्यास में वर्णन कहाँ तक उचित परिमाण में, आवश्यक और स्वाभाविक हैं ?
११. जो बातें (पात्रों का स्वभाव आदि) व्यंजना से बतानी चाहिए थीं, उन्हें अपनी ओर से तो नहीं बता दिया गया? पात्रों का चित्रण उनकी मर्यादा और प्रकृति से भिन्न, अस्वाभाविक, असंगत या अतिरंजित तो नहीं हो गया ?
१२. उपन्यासकार ने किस विशेष वाद या सम्प्रदाय या नीति या सिद्धान्त से प्रेरित होकर लिखा है और उनकी सिद्धि में वह कहाँ तक सफल हो पाया है ?
१३. उपन्यासकार ने अपने व्यक्तिगत जीवन या अनुभव की जो अभिव्यक्ति उपन्यास में की है, वह कितनी प्रत्यक्ष है और कितनी व्यंग्य ? वह कहाँ तक उचित है या अनुचित ?
१४. उस उपन्यास का साधारण मन पर क्या प्रभाव पड सकता है और वह पाठक की वृत्ति-प्रवृत्ति, स्वभाव, चेष्टा आदि को कहाँ तक अपने पक्षों में ला सकता है? सामाजिक तथा नैतिक दृष्टि से वह प्रभाव कहाँ तक वांछनीय है ?
१५. उपन्यास में क्या मौलिकता है और उसमें सुन्दर अद्भुत तथा असाधारण सन्निवेश कहाँ तक और किस प्रकार किया गया है ?
१६. अलौकिक तत्त्वों का प्रयोग कहाँ तक उचित और बुद्धि संगत हुआ है ?
१७. उपन्यास की कथावस्तु, घटना, गुम्फन, भाषाशैली, चरित्र चित्रण और परिणाम आदि में जो दोष हों उनका सुधार आप कैसे करते हैं ?
यद्यपि उपन्यास और कहानी में विशेष अन्तर नहीं है। उपन्यास के प्रतिमान कहानी के प्रतिमान मान सकते हैं पर कहानी का आकार छोटा होने के कारण उसके कतिपय निम्न प्रतिमानों का विवेचन अपेक्षित है –
१. कथाकार का क्या उद्देश्य है ? कथाकार कोई विशेष प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है या केवल मनोविनोद ?
२. कथाकार ने एक ही घटना ली है या नहीं ?
३. वह कथा अपने में पूर्ण-आदि-मध्य और अन्त सहित है या नहीं और वह एक ही प्रभाव उत्पन्न करती है या नहीं*?
४. अनावश्यक वर्णन या विस्तार तो नहीं है ?
उपर्युक्त समीक्षा-मानदण्ड सामान्य कथा साहित्य पर ही लागू होते हैं।
युगीन परिस्थितियाँ नए आयाम और नए सन्दर्भ देती है, फलतः आलोचना के पुराने मानदण्ड निरर्थक प्रतीत होने लगते हैं। अतः कथ्य के अनुरूप नए मानदण्डों की तलाश आवश्यक है। पद्धति विशेष पर आधारित कथा साहित्य का विवेचन पद्धति विशेष के मानदण्ड पर ही किया जा सकता है और इसी के परिणाम मनोविश्लेषणवादी, प्रगतिवादी अर्थात् माक्र्सवादी समीक्षा पद्धतियों का विकास हुआ परन्तु ये समीक्षा की एकांगी दृष्टियाँ हैं जो कृति विशेष पर ही लागू होती हैं और कृति का वास्तविक पक्ष अनुद्घाटित ही रह जाता है।
प्रेमचन्दोत्तर कथा साहित्य, स्वातन्त्र्योत्तर कथा साहित्य के कथ्य में जटिलता आने लगी। व्यक्ति के आन्तरिक और बाह्य द्वन्द्व ने कथा में अपना स्थान निर्धारित किया और इसके साथ ही पुराने कथा तत्त्व भी धूमिल पडने लगे और आलोचना के प्रतिमान भी। कथ्य के अनुरूप आलोचना का स्वरूप भी स्थूल से सूक्ष्मतर होने लगा। अब आलोचना कथा तत्त्वों या गुण-दोष विवेचन तक सीमित नहीं रही बल्कि उसका उद्देश्य रचना के मूल उद्देश्य के साथ रचना-प्रक्रिया, रचनाकार के मानसिक परिवेश की परीक्षा करना रहा है। शिल्प की अपेक्षा आज कथ्य महत्त्वपूर्ण हो चुका है।
हिन्दी में आधुनिक कथा समीक्षा के इतिहास में मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, भीष्म साहनी, मार्कण्डेय, इन्द्रनाथ मदान, कृष्णा सोबती आदि के नाम भी उभरकर आए। पुराने कथा प्रतिमानों की अपर्याप्तता घोषित करते हुए निर्मल वर्मा ने लिखा – उपन्यास की अर्थवत्ता यथार्थ में नहीं, उसे समेटने की प्रक्रिया में, उसके संघटन की अन्दरूनी चालाक शक्ति में निहित है।? इस प्रकार कथा साहित्य के नये प्रतिमानों की खोज का सिलसिला जारी है। डॉ. नामवरसिंह ने कहानी समीक्षा की पुरानी दृष्टि – जिसमें कथानक, चरित्र, वातावरण, प्रभाव वस्तु आदि अवयवों की अलग-अलग अभ्यस्तता रहती थी – का खुलकर विरोध किया और रचनाधर्मी कहानी की संश्लिष्टता को समझने-समझाने का सवाल उठाया गया है। नामवरसिंह के अनुसार कहानी की आलोचना के लिए उसका पाठ बुनियादी महत्त्व रखता है। बिना उसके कहानी के मूल आशय को जानना कठिन है। साथ ही इसके समीपी सम्फ के बिना कहानी का मूल आशय जानना असम्भव है (कहानीः नई कहानी, पृ. १४५) उन्होंने आगे लिखा है – किसी अच्छी का निर्माण करने के लिए एक बनाये मानदण्ड से आरम्भ करने की अपेक्षा पढने की प्रक्रिया से शुरू करना अधिक उपयोगी हो सकता है। (पृ. १६५-१६६) इसलिए आज कहानी की आलोचना में भी मुख्य प्रश्न पद्धति का है, प्रतिमान का नहीं। (पृ.१९९) ऐसी पाठ प्रक्रिया जिसमें पाठक कहानी को अपने भीतर फिर से रचते हुए समग्रता से उसका प्रभाव ग्रहण करता है कहानी की आलोचना का आधार हो सकती है। कहानी ः नयी कहानी में कहानी के संबंध में लिखते हुए नामवर सिंह ने कहा – ?मुख्य कथा घटना विन्यास इस प्रकार का हो कि ?फिर क्या हुआ का कुतूहल न तो मर्यादा से अधिक प्रबल होने पाए और भूमिका इतनी लम्बी न हो कि मन अतीतवासी हो रहे। …..आज की कहानी का शिल्प की दृष्टि से सफल होना काफी नहीं है बल्कि वर्तमान वास्तविकता के सम्मुख उसकी वास्तविकता भी परखी जानी चाहिए। कहानीकार की सार्थकता इस बात में है कि वह अपने युग के मुख्य सामाजिक अन्तर्विरोध के सन्दर्भ में अपनी कहानियों की सामग्री चुनता है।? (उपर्युक्त पृ. ३७)
समानान्तर कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी जनवादी कहानी पर इधर प्रखर समीक्षा दृष्टि विकसित हुई है और कहानी को उनकी समग्र अन्तर्योजना अन्विति प्रभाव में पहचानने की कोशिश की गई है। कथा साहित्य में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श जैसी अवधारणाओं ने भी कथा मूल्यांकन के दृष्टिकोण में पर्याप्त विकास किया है। इधर क्षण-क्षण बदलते परिवेश और कथा वस्तु ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रत्येक रचना अपने प्रतिमान स्वयं निर्धारित करती है, किसी बने बनाए फार्मूले से कृति की परख अपूर्ण होने की पूर्ण सम्भावना है। हर आलोचक की एक विशेष दृष्टि होती है और वह अपनी विशेष दृष्टि से मूल्यांकन करता है, अतः आवश्यकता इस बात की है कि मूल्यांकन पूर्ण होना चाहिए उसे वाद विशेष के दायरे में आबद्ध कर उसके स्वरूप को संकुचित नहीं करना चाहिए।
उपन्यास समीक्षा की किसी सुनिश्चित पद्धति का विकास हिन्दी में नहीं हो सका। इस क्षेत्र में प्रयास किए जा रहे हैं। नेमिचन्द्र जैन की ?अधूरे साक्षात्कार? उपन्यास समीक्षा को नई दृष्टि देने वाली पुस्तक है।
अतः गद्य की समीक्षा के लिए किसी भी प्रकार की अतिवादिता से बचते हुए मौलिक एवं गहन दृष्टि का होना आवश्यक है। आचार्य शुक्ल द्वारा प्रतिपादित विश्लेषण, विवेचन और निगमन पद्धति का अनुसरण करते हुए तटस्थ भाव से आलोचना की जानी चाहिए। सतही आलोचना प्रवृत्ति से बचना चाहिए। रचना का मूल्यांकन उसकी समग्रता में किया जाना चाहिए। आलोचना की महानता रचना को महान बनाती है। सच्ची आलोचना तो उस विद्युत तरंग की तरह है जो निमिष मात्र में साहित्यिक कृति को प्रकाश से उद्भासित कर देती है। आलोचना कर्म की इस गंभीरता को देखते हुए आलोचक को व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए, रचना की समझ को विकसित करते हुए मूल्यांकन कर्म में अग्रसर होना चाहिए। आलोचना का महत्त्व सर्जक एवं भोक्ता दोनों ही दृष्टियों से है। इसलिए आलोचना कर्म सर्जन से भी अति महत्त्वपूर्ण है। घ्
संदर्भ ः
१. हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ. नगेन्द्र
२. हिन्दी आलोचना का विकास – नन्दकिशोर नवल
३. हिन्दी साहित्य सर्वस्व – आचार्य सीताराम चतुर्वेदी
४. आलोचना*और*आलोचक – मोहनलाल, सरेशचन्द्र गुप्त

प्रत्याख्यान

यह एक अव्यवसायिक वेबपत्र है जिसका उद्देश्य केवल सिविल सेवा तथा राज्य लोकसेवा की परीक्षाओं मे हिन्दी साहित्य का विकल्प लेने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है। यदि इस वेबपत्र में प्रकाशित किसी भी सामग्री से आपत्ति हो तो इस ई-मेल पते पर सम्पर्क करें-

mitwa1980@gmail.com

आपत्तिजनक सामग्री को वेबपत्र से हटा दिया जायेगा। इस वेबपत्र की किसी भी सामग्री का प्रयोग केवल अव्यवसायिक रूप से किया जा सकता है।

संपादक- मिथिलेश वामनकर

वेबपत्र को देख चुके है

  • 2,857,596 लोग

कैलेण्डर

दिसम्बर 2017
रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
« अगस्त    
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31  

वेब पत्र का उद्देश्य-

मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ, बिहार, झारखण्ड तथा उत्तरांचल की पी.एस.सी परीक्षा तथा संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के हिन्दी सहित्य के परीक्षार्थियो के लिये सहायक सामग्री उपलब्ध कराना।

यह वेब पत्र सिविल सेवा परीक्षा मे हिन्दी साहित्य विषय लेने वाले परीक्षार्थियो की सहायता का एक प्रयास है। इस वेब पत्र का उद्देश्य किसी भी प्रकार का व्यवसायिक लाभ कमाना नही है। इसमे विभिन्न लेखो का संकलन किया गया है। आप हिन्दी साहित्य से संबंधित उपयोगी सामगी या आलेख यूनिकोड लिपि या कॄतिदेव लिपि में भेज सकते है। हमारा पता है-

mitwa1980@gmail.com

- संपादक

भारत के सर्वश्रेष्ट ब्लॊग