हिन्दी साहित्य

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भारतीय धर्म और संस्कृति के इतिहास में कृष्ण सदैव एक अद्भुत व विलक्षण व्यक्तित्व माने जाते रहें है| हमारी प्राचीन ग्रंथों में यत्र – तत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है जिससे उनके जीवन के विभिन्न रूपों का पता चलता है|
यदि वैदिक व संस्कृत साहित्य के आधार पर देखा जाए तो कृष्ण के तीन रूप सामने आते है –
१. बाल व किशोर रूप, २. क्षत्रिय नरेश, ३. ऋषि व धर्मोपदेशक |
श्रीकृष्ण विभिन्न रूपों में लौकिक और अलौकिक लीलाएं दिखाने वाले अवतारी पुरूष हैं | गीता, महाभारत व विविध पुराणों में उन्ही के इन विविध रूपों के दर्शन होतें हैं |
कृष्ण महाभारत काल में ही अपने समाज में पूजनीय माने जाते थे | वे समय समय पर सलाह देकर धर्म और राजनीति का समान रूप से संचालन करते थे | लोगों में उनके प्रति श्रद्या और आस्था का भाव था | कृष्ण भक्ति काव्य धारा के कवियों ने अपनी कविताओं में राधा – कृष्णा की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाकर वॄहद काव्य सॄजन किया। इस काव्यधारा की प्रमुख विशेशतायें इस प्रकार है–

१. राम और कृष्ण की उपासना

समाज में अवतारवाद की भावना के फलस्वरूप राम और कृष्ण दोनों के ही रूपों का पूजन किया गया |
दोनों के ही पूर्ण ब्रह्म का प्रतीक मानकर, आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया |
किंतु जहाँ राम मर्यादा पुरषोत्तम के रूप में सामने आते हैं, बही कृष्ण एक सामान्य परिवार में जन्म लेकर सामंती
अत्याचारों का विरोध करते हैं | वे जीवन में अधिकार और कर्तव्य के सुंदर मेल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं |

वे जिस तन्मयता से गोपियों के साथ रास रचाते हैं , उसी तत्परता से राजनीति का संचालन करते हैं या फ़िर महाभारत के युद्ध भूमि में गीता उपदेश देते हैं |
इस प्रकार से राम व कृष्ण ने अपनी अपनी चारित्रिक विशेषताओं द्वारा भक्तों के मानस को आंदोलित किया |

२. राधा-कृष्ण की लीलाएं

कृष्णा – भक्ति काव्य धारा के कवियों ने अपनी कविताओं में राधा – कृष्णा की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाया |
श्रीमदभागवत में कृष्ण के लोकरंजक रूप को प्रस्तुत किया गया था |
भागवत के कृष्ण स्वंय गोपियों से निर्लिप्त रहते हैं |
गोपियाँ बार – बार प्रार्थना करती है , तभी वे प्रकट होतें हैं जबकि हिन्दी कवियों के कान्हा एक रसिक छैला बनकर गोपियों का दिल जीत लेते है |

सूरदास जी ने राधा – कृष्ण के अनेक प्रसंगों का चित्रण ककर उन्हें एक सजीव व्यक्तित्व प्रदान किया है |
हिन्दी कवियों ने कृष्ण ले चरित्र को नाना रूप रंग प्रदान किये हैं , जो काफी लीलामयी व मधुर जान पड़ते हैं |

३. वात्सल्य रस का चित्रण

पुष्टिमार्ग प्रारंभ हुया तो बाल कृष्ण की उपासना का ही चलन था | अत : कवियों ने कृष्ण के बाल रूप को पहले पहले चित्रित किया |
यदि वात्सल्य रस का नाम लें तो सबसे पहले सूरदास का नाम आता है, जिन्हें आप इस विषय का विशेषज्ञ कह सकते हैं | उन्होंने कान्हा के बचपन की सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियाँ भी ऐसी चित्रित की है, मानो वे स्वयं वहाँ उपस्थित हों |

मैया कबहूँ बढेगी चोटि ?
किनी बार मोहिं ढूध पियत भई , यह अजहूँ है छोटी |

सूर का वात्सल्य केवल वर्णन मात्र नहीं है | जिन जिन स्थानों पर वात्सल्य भाव प्रकट हो सकता था , उन सब घटनाओं को आधार बनाकर काव्य रचना की गयी है | माँ यशोदा अपने शिशु को पालने में सुला रही हैं और निंदिया से विनती करती है की वह जल्दी से उनके लाल की अंखियों में आ जाए |

जसोदा हरी पालनै झुलावै |
हलरावै दुलराय मल्हरावै जोई सोई कछु गावै |
मेरे लाल कौ आउ निंदरिया, काहै मात्र आनि सुलावै |
तू काहे न बेगहि आवे, तो का कान्ह बुलावें |

कृष्णा का शैशव रूप घटने लगता है तो माँ की अभिलाषाएं भी बढ़ने लगती हैं | उसे लगता है की कब उसका शिशु उसका शिशु उसका आँचल पकड़कर डोलेगा | कब, उसे माँ और अपने पिता को पिता कहके पुकारेगा , वह लिखते है –

जसुमति मन अभिलाष करै,
कब मेरो लाल घुतरुवनी रेंगै, कब घरनी पग द्वैक भरे,
कब वन्दहिं बाबा बोलौ, कब जननी काही मोहि ररै ,
रब घौं तनक-तनक कछु खैहे, अपने कर सों मुखहिं भरे
कब हसि बात कहेगौ मौ सौं, जा छवि तै दुख दूरि हरै|

सूरदास ने वात्सल्य में संयोग पक्ष के साथ – साथ वियोग का भी सुंदर वर्णन किया है | जब कंस का बुलावा लेकर अक्रूर आते हैं तो कृष्ण व बलराम को मथुरा जाना पङता है | इस अवसर पर सूरदास ने वियोग का मर्म्स्पर्सी
चित्र प्रस्तुत किया है | यशोदा बार बार विनती करती हैं कि कोई उनके गोपाल को जाने से रोक ले |

जसोदा बार बार यों भारवै
है ब्रज में हितू हमारौ, चलत गोपालहिं राखै

जब उधौ कान्हा का संदेश लेकर आते हैं, तो माँ यशोदा का हृदय अपने पुत्र के वियोग में रो देता है, वह देवकी को संदेश भिजवाती हैं |

संदेस देवकी सों कहियो।
हों तो धाय तिहारे सुत की कृपा करत ही रहियो||
उबटन तेल तातो जल देखत ही भजि जाने
जोई-चोर मांगत सोइ-सोइ देती करम-करम कर न्हाते |
तुम तो टेक जानतिही धै है ताऊ मोहि कहि आवै |
प्रात: उठत मेरे लाड लडैतहि माखन रोटी भावै |

४. श्रृंगार का वर्णन

कृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण व गोपियों के प्रेम वर्णन के रूप में पूरी स्वछंदता से श्रृंगार रस का वर्णन किया है | कृष्ण व गोपियों का प्रेम धीरे – धीरे विकसित होता है | कृष्ण , राधा व गोपियों के बीच अक्सर छेड़छाड़ चलती रहती है –

तुम पै कौन दुहावै गैया
इत चितवन उन धार चलावत, यहै सिखायो मैया |
सूर कहा ए हमको जातै छाछहि बेचनहारि |

कवि विद्यापति ने कृष्ण के भक्त-वत्सल रूप को छोड़ कर शृंगारिक नायक वाला रूप ही चित्रित किया है |
विद्यापति की राधा भी एक प्रवीण नायिका की तरह कहीं मुग्धा बनाती है , तो कभी कहीं अभिसारिका | विद्यापति
के राधा – कृष्ण यौवनावस्था में ही मिलते है और उनमे प्यार पनपने लगता है |
प्रेमी नायक , प्रेमिका को पहली बार देखता है तो रमनी की रूप पर मुग्ध हो जाता है |

सजनी भलकाए पेखन न मेल
मेघ-माल सयं तड़ित लता जनि
हिरदय सेक्ष दई गेल |

हे सखी ! मैं तो अच्छी तरह उस सुन्दरी को देख नही सका क्योंकि जिस प्रकार बादलों की पंक्ति में एका एअक
बिजली चमक कर चिप जाती है उसी प्रकार प्रिया के सुंदर शरीर की चमक मेरे ह्रदय में भाले की तरह उतर गयी
और मै उसकी पीडा झेल रहा हूँ |

विद्यापति की राधा अभिसार के लिए निकलती है तो सौंप पाँव में लिप्त जाता है | वह इसमे भी अपना भला
मानती है , कम से कम पाँव में पड़े नूपुरों की आवाज़ तो बंद हो गयी |

इसी प्राकार विद्यापति वियोग में भी वर्णन करते हैं | कृष्ण के विरह में राधा की आकुलता , विवशता ,
दैन्य व निराशा आदि का मार्मिक चित्रण हुया है |

सजनी, के कहक आओव मधाई |
विरह-पयोचि पार किए पाऊव, मझुम नहिं पति आई |
एखत तखन करि दिवस गमाओल, दिवस दिवस करि मासा |
मास-मास करि बरस गमाओल, छोड़ लूँ जीवन आसा |
बरस-बरस कर समय गमाओल, खोल लूं कानुक आसे |
हिमकर-किरन नलिनी जदि जारन, कि कर्ण माधव मासे |

इस प्रकार कृष्ण भक्त कवियों ने प्रेम की सभी अवस्थाओं व भाव-दशाओं का सफलतापूर्वक चित्रण किया है |

५. भक्ति भावना

यदि भक्त – भावना के विषय में बात करें तो कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास , कुंमंदास व मीरा का नाम उल्लेखनीय है |

सूरदासजी ने वल्लभाचार्य जी से दीक्षा ग्रहण कर लेने के पूर्व प्रथम रूप में भक्ति – भावना की व्यंजना की है |

नाथ जू अब कै मोहि उबारो
पतित में विख्यात पतित हौं पावन नाम विहारो||

सूर के भक्ति काव्य में अलौकिकता और लौकितता , रागात्मकता और बौद्धिकता , माधुर्य और वात्सल्य सब मिलकर एकाकार हो गए हैं |

भगवान् कृष्ण के अनन्य भक्ति होने के नाते उनके मन से से सच्चे भाव निकलते हैं | उन्होंने ही भ्रमरनी परम्परा को नए रूप में प्रस्तुत किया | भक्त – शोरोमणि सूर ने इसमे सगुणोपासना का चित्रण , ह्रदय की अनुभूति के आधार पर किया है |

अंत में गोपियों अपनी आस्था के बल पर निर्गुण की उपासना का खंडन कर देती हैं |

उधौ मन नाहिं भए दस-बीस
एक हुतो सो गयो श्याम संग
को आराधै ईश |

मीराबाई कृष्ण को अपने प्रेमी ही नही , अपितु पति के रूप में भी स्मरण करती है | वे मानती
है कि वे जन्म – जन्म से ही कृष्ण की प्रेयसी व पत्नी रही हैं | वे प्रिय के प्रति आत्म – निवेदन व उपालंभ के रूप
में प्रणय – वेदना की अभिव्यक्ति करती है |

देखो सईयां हरि मन काठ कियो
आवन कह गयो अजहूं न आयो, करि करि गयो
खान-पान सुध-बुध सब बिसरी कैसे करि मैं जियो
वचन तुम्हार तुमहीं बिसरै, मन मेरों हर लियो
मीरां कहे प्रभु गिरधर नागर, तुम बिन फारत हियो |

भक्ति काव्य के क्षेत्र में मीरा सगुण – निर्गुण श्रद्धा व प्रेम , भक्ति व रहस्यवाद के अन्तर को भरते हुए , माधुर्य
भाव को अपनाती है | उन्हें तो अपने सांवरियां का ध्यान कराने में , उनको ह्रदय की रागिनी सुनाने व उनके सम्मुख नृत्य करने में ही आनंद आता है |

आली रे मेरे नैणां बाण पड़ीं |
चित चढ़ी मेरे माधुरी मुरल उर बिच आन अड़ी |
कब की ठाढ़ी पंछ निहारूं अपने भवन खड़ी |

६. ब्रज भाषा व अन्य भाषाओं का प्रयोग

अनेक कवियों ने निःसंकोच कृष्ण की जन्मभूमि में प्रचलित ब्रज भाषा को ही अपने काव्य में प्रयुक्त किया। सूरदास व नंददास जैसे कवियों ने भाषा के रूप को इतना निखार दिया कि कुछ समय बाद यह समस्त उत्तरी भारत की साहित्यिक भाषा बन गई।

यद्यपि ब्रज भाषा के अतिरिक्त कवियों ने अपनी-अपनी मातृ भाषाओं में कृष्ण काव्य की रचना की। विद्यापति ने मैथिली भाषा में अनेक भाव प्रकट किए।

सप्ति हे कतहु न देखि मधाई
कांप शरीर धीन नहि मानस, अवधि निअर मेल आई
माधव मास तिथि भयो माधव अवधि कहए पिआ गेल।

मीरा ने राजस्थानी भाषा में अपने भाव प्रकट किए।

रमैया बिन नींद न आवै
नींद न आवै विरह सतावै, प्रेम की आंच हुलावै।

प्रमुख कवि
महाकवि सूरदास को कृष्ण भक्त कवियों में सबसे ऊँचा स्थान दिया जाता है। इनके द्वारा रचित ग्रंथों में “सूर-सागर”, “साहित्य-लहरी” व “सूर-सारावली” उल्लेखनीय है। कवि कुंभनदास अष्टछाप कवियों में सबसे बड़े थे, इनके सौ के करीब पद संग्रहित हैं, जिनमें इनकी भक्ति भावना का स्पष्ट परिचय मिलता है।

संतन को कहा सींकरी सो काम।
कुंभनदास लाल गिरधर बिनु और सवै वे काम।

इसके अतिरिक्त परमानंद दास, कृष्णदास गोविंद स्वामी, छीतस्वामी व चतुर्भुज दास आदि भी अष्टछाप कवियों में आते हैं किंतु कवित्व की दृष्टि से सूरदास सबसे ऊपर हैं।
राधावल्लभ संप्रादय के कवियों में “हित-चौरासी” बहुत प्रसिद है, जिसे श्री हित हरिवंश जी ने लिखा है। हिंदी के कृष्ण भक्त कवियों में मीरा के अलावा बेलिकिशन रुक्मिनी के रचयिता पृथ्वीराज राठौर का नाम भी उल्लेखनीय है।

कृष्ण भक्ति धारा के कवियों ने अपने काव्य में भावात्मकता को ही प्रधानता दी। संगीत के माधुर्य से मानो उनका काव्य और निखर आया। इनके काव्य का भाव व कला पक्ष दोनों ही प्रौढ़ थे व तत्कालीन जन ने उनका भरपूर रसास्वादन किया। कृष्ण भक्ति साहित्य ने सैकड़ो वर्षो तक भक्तजनो का हॄदय मुग्ध किया । हिन्दी साहित्य के इतिहास मे कृष्ण की लीलाओ के गान, कृष्ण के प्रति सख्य भावना आदि की दॄष्टि से ही कृष्ण काव्य का महत्व नही है, वरन आगे चलकर राधा कृष्ण को लेकर नायक नायिका भेद , नख शिख वर्णन आदि की जो परम्परा रीतिकाल में चली , उस के बीज इसी काव्य मे सन्निहित है।रीतिकालीन काव्य मे ब्रजभाषा को जो अंलकॄत और कलात्मक रूप मिला , वह कृष्ण काव्य के कवियों द्वारा भाषा को प्रौढ़ता प्रदान करने के कारण ही संभव हो सका।

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निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख संत कवियों का परिचय
कबीर, कमाल, रैदास या रविदास, धर्मदास, गुरू नानक, दादूदयाल, सुंदरदास, रज्जब, मलूकदास, अक्षर अनन्य, जंभनाथ, सिंगा जी, हरिदास निरंजनी ।
 
कबीर
 
कबीर का जन्म 1397 ई. में माना जाता है. उनके जन्म और माता-पिता को लेकर बहुत विवाद है. लेकिन यह स्पष्ट है कि कबीर जुलाहा थे, क्योंकि उन्होंने अपने को कविता में अनेक बार जुलाहा कहा है. कहा जाता है कि वे विधवा ब्राह्मणी के पत्र थे, जिसे लोकापवाद के भय से जन्म लेते ही काशी के लहरतारा ताल के पास फेंक दिया गया था. अली या नीरू नामक जुलाहा बच्चे को अपने यहाँ उठा लाया. इस प्रकार कबीर ब्राह्मणी के पेट से उत्पन्न हुए थे, लेकिन उनका पालन-पोषण जुलाहे के यहाँ हुआ. बाद में वे जुलाहा ही प्रसिद्ध हुए. कबीर की मृत्यु के बारे में भी कहा जाता है कि हिन्दू उनके शव को जलाना चाहते थे और मुसलमान दफ़नाना. इस पर विवाद हुआ, किन्तु पाया गया कि कबीर का शव अंतर्धान हो गया है. वहाँ कुछ फूल हैं. उनमें कुछ फूलों को हिन्दुओं ने जलाया और कुछ को मुसलमानों ने दफ़नाया.
कबीर की मृत्यु मगहर जिला बस्ती में सन् 1518 ई. में हुई.
कबीर का अपना पंथ या संप्रदाय क्या था, इसके बारे में कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता. वे रामानंद के शिष्य के रूप में विख्यात हैं, किन्तु उनके ‘राम’ रामानंद के ‘राम’ नहीं हैं. शेख तकी नाम के सूफी संत को भी कबीर का गुरू कहा जाता है, किन्तु इसकी पुष्टि नहीं होती. संभवत: कबीर ने इन सबसे सत्संग किया होगा और इन सबसे किसी न किसी रूप में प्रभावित भी हुए होंगे.
इससे प्रकट होता है कि कबीर की जाति के विषय में यह दुविधा बराबर बनी रही है. इसका कारण उनके व्यक्तित्व, उनकी साधना और काव्य में कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो हिन्दू या मुसलमान कहने-भर से नहीं प्रकट होतीं. उनका व्यक्तित्व दोनों में से किसी एक में नहीं समाता.
उनकी जाति के विषय में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘कबीर’ में प्राचीन उल्लेखों, कबीर की रचनाओं, प्रथा, वयनजीवी अथवा बुनकर जातियों के रीति-रिवाजों का विवेचन-विश्लेषण करके दिखाया है.:
आज की वयनजीवी जातियों में से अधिकांश किसी समय ब्राह्मण श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करती थी. जागी नामक आश्रम-भ्रष्ट घरबारियों की एक जाति सारे उत्तर और पूर्वी भारत में फैली थी. ये नाथपंथी थे. कपड़ा बुनकर और सूत कातकर या गोरखनाथ और भरथरी के नाम पर भीख माँग कर जीविका चलाया करते थे. इनमें निराकार भाव की उपासना प्रचलित थी, जाति भेद और ब्राह्मण श्रेष्ठता के प्रति उनकी कोई सहानुभूति नहीं थी और न अवतारवाद में ही कोई आस्था थी. आसपास के वृहत्तर हिन्दू-समाज की दृष्टि में ये नीच और अस्पृश्य थे. मुसलमानों के आने के बाद ये धीरे-धीरे मुसलमान होते रहे. पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में इनकी कई बस्तियों ने सामूहिक रूप से मुसलमानी धर्म ग्रहण किया. कबीर दास इन्हीं नवधर्मांतरित लोगों में पालित हुए थे.
 
 
रज्जब
(17वीं शती)
 
रज्जब दादू के शिष्य थे. ये भी राजस्थान के थे. इनकी कविता में सुंदरदास की शास्त्रीयता का तो अभाव है, किन्तु पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार:
रज्जब दास निश्चय की दादू के शिष्यों में सबसे अधिक कवित्व लेकर उत्पन्न हुए थे. उनकी कविताएँ भावपन्न, साफ और सहज हैं. भाषा पर राजस्थानी प्रभाव अधिक है और इस्लामी साधना के शब्द भी अपेक्षाकृत अधिक हैं.
 
अक्षर अनन्य
 
सन् 1653 में इनके वर्तमान रहने का पता लगता है. ये दतिया रियासत के अंतर्गत सेनुहरा के कायस्थ थे और कुछ दिनों तक दतिया के राजा पृथ्वीचंद के दीवान थे. पीछे ये विरक्त होकर पन्ना में रहने लगे. प्रसिद्ध छत्रसाल इनके शिष्य हुए. एक बार ये छत्रसाल से किसी बात पर अप्रसन्न होकर जंगल में चले गए. पता लगने पर जब महाराज छत्रसाल क्षमा प्रार्थना के लिए इनके पास गए तब इन्हें एक झाड़ी के पास खूब पैर फैलाकर लेटे हुए पाया. महाराज ने पूछा- ‘पाँव पसारा कब से?’ चट से उत्तर मिला- ‘हाथ समेटा जब से’.
ये विद्वान थे और वेदांत के अच्छे ज्ञाता थे. इन्होंने योग और वेदांत पर कई ग्रंथ लिखे.
कृतियाँ  — 1. राजयोग 2. विज्ञानयोग 3. ध्यानयोग 4. सिद्धांतबोध 5. विवेकदीपिका 6. ब्रह्मज्ञान 7. अनन्य प्रकाश आदि.
‘दुर्गा सप्तशती’ का भी हिन्दी पद्यों में अनुवाद किया.
 
मलूकदास
 
 
मलूकदास का जन्म लाला सुंदरदास खत्री के घर में वैशाख कृष्ण 5, सन् 1574ई. में कड़ा, जिला इलाहाबाद में हुआ.
इनकी मृत्यु 108 वर्ष की अवस्था में सन् 1682 में हुई. वे औरंगज़ेब के समय में दिल के अंदर खोजने वाले निर्गुण मत के नामी संतों में हुए हैं और उनकी गद्दियाँ कड़ा, जयपुर, गुजरात, मुलतान, पटना, नेपाल और काबुल तक में कायम हुई. इनके संबंध में बहुत से चमत्कार और करामातें प्रसिद्ध हैं. कहते है कि एक बार इन्होंने एक डूबते हुए शाही जहाज को पानी के ऊपर उठाकर बचा लिया था और रूपयों का तोड़ा गंगाजी में तैरा कर कड़े से इलाहबाद भेजा था.
आलसियों का यह मूल मंत्र :
 
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम I
दास मलूका कहि गए, सबको दाता राम II
इन्हीं का है. हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को उपदेश में प्रवृत्त होने के कारण दूसरे निर्गुणमार्गी संतों के समान इनकी भाषा में भी फ़ारसी और अरबी शब्दों का प्रयोग है. इसी दृष्टि से बोलचाल की खड़ीबोली का पुट इस सब संतों की बानी में एक सा पाया जाता है. इन सब लक्षणों के होते हुए भी इनकी भाषा सुव्यवस्थित और सुंदर है. कहीं-कहीं अच्छे कवियों का सा पदविन्यास और कवित्त आदि छंद भी पाए जाते हैं. कुछ पद बिल्कुल खड़ीबोली में हैं. आत्मबोध, वैराग्य, प्रेम आदि पर इनकी बानी बड़ी मनोहर है.
 
कृतियाँ  —  1. रत्नखान  2. ज्ञानबोध
 
सुंदरदास
(1596 ई.- 1689ई.)
 
 
सुंदरदास 6 वर्ष की आयु में दादू के शिष्य हो गए थे. उनका जन्म 1596ई. में जयपुर के निकट द्यौसा नामक स्थान पर हुआ था. इनके पिता का नाम परमानंद और माता का नाम सती था. दादू की मृत्यु के बाद एक संत जगजीवन के साथ वे 10 वर्ष की आयु में काशी चले आए. वहाँ 30 वर्ष की आयु तक उन्होंने जमकर अध्ययन किया. काशी से लौटकर वे राजस्थान में शेखावटी के निकट फतहपुर नामक स्थान पर गए. वे फ़ारसी भी बहुत अच्छी जानते थे.
उनका देहांत सांगामेर में 1689 ई. में हुआ.
निर्गुण संत कवियों में सुंदरदास सर्वाधिक शास्त्रज्ञ एवं सुशिक्षित थे. कहते हैं कि वे अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुंदर थे. सुशिक्षित होने के कारण उनकी कविता कलात्मकता से युक्त और भाषा परिमार्जित है. निर्गुण संतों ने गेय पद और दोहे ही लिखे हैं. सुंदरदास ने कवित्त और सवैये भी रचे हैं. उनकी काव्यभाषा में अलंकारों का प्रयोग खूब है. उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सुंदरविलास’ है.
काव्यकला में शिक्षित होने के कारण उनकी रचनाएँ निर्गुण साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती हैं. निर्गुण साधना और भक्ति के अतिरिक्त उन्होंने सामाजिक व्यवहार, लोकनीति और भिन्न क्षेत्रों के आचार-व्यवहार पर भी उक्तियाँ कही हैं. लोकधर्म और लोक मर्यादा की उन्होंने अपने काव्य में उपेक्षा नहीं की है.
व्यर्थ की तुकबंदी और ऊटपटाँग बानी इनको रूचिकर न थी. इसका पता इनके इस कवित्त से लगता है:
 
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की बुद्धि होय,
ना तौ मुख मौन गहि चुप होय रहिए I
जोरिए तौ तब जब जोरिबै को रीति जानै,
तुक छंद अरथ अनूप जामे लहिए II
गाइए तौ तब जब गाइबे को कंठ होय,
श्रवन के सुनतहीं मनै जाय गहिए I
तुकभंग, छंदभंग, अरथ मिलै न कछु,
सुंदर कहत ऐसी बानी नहिं कहिए II
 
कृतियाँ–1. सुंदरविलास
 
दादूदयाल
(1544ई. – 1603ई.)
 
कबीर की भाँति दादू के जन्म और उनकी जाति के विषय में विवाद और अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित है. कुछ लोग उन्हें गुजराती ब्राह्मण मानते हैं, कुछ लोग मोची या धुनिया. प्रो. चंद्रिकाप्रसाद त्रिपाठी और क्षितिमोहन सेन के अनुसार दादू मुसलमान थे और उनका नाम दाऊद था. कहते हैं दादू बालक रूप में साबरमती नदी में बहते हुए लोदीराम नामक नागर ब्राह्मण को मिले थे. दादू के गुरू का भी निश्चित रूप से पता नहीं लगता. कुछ लोग मानते हैं कि वे कबीर के पुत्र कमाल के शिष्य थे. पं. रामचंद्र शुक्ल का विचार है कि उनकी बानी में कबीर का नाम बहुत जगह आया है और इसमें कोई संदेह नहीं कि वे उन्हीं के मतानुयायी थे. वे आमेर, मारवाड़, बीकानेर आदि स्थानों में घूमते हुए जयपुर आए. वहीं के भराने नामक स्थान पर 1603 ई. में शरीर छोड़ा. वह स्थान दादू पंथियों का केन्द्र है. दादू की रचनाओं का संग्रह उनके दो शिष्यों संतदास और जगनदास ने ‘हरडेवानी’ नाम से किया था. कालांतर में रज्जब ने इसका सम्पादन ‘अंगवधू’ नाम से किया.
दादू की कविता जन सामान्य को ध्यान में रखकर लिखी गई है, अतएव सरल एवं सहज है. दादू भी कबीर के समान अनुभव को ही प्रमाण मानते थे. दादू की रचनाओं में भगवान के प्रति प्रेम और व्याकुलता का भाव है. कबीर की भाँति उन्होंने भी निर्गुण निराकार भगवान को वैयक्तिक भावनाओं का विषय बनाया है. उनकी रचनाओं में इस्लामी साधना के शब्दों का प्रयोग खुलकर हुआ है. उनकी भाषा पश्चिमी राजस्थानी से प्रभावित हिन्दी है. इसमें अरबी-फ़ारसी के काफ़ी शब्द आए हैं, फिर भी वह सहज और सुगम है.
कृतियाँ  — 1. हरडेवानी 2. अंगवधू
 
गुरू नानक
 
गुरू नानक का जन्म 1469 ईसवी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन तलवंडी ग्राम, जिला लाहौर में हुआ था.
इनकी मृत्यु 1531 ईसवी में हुई.
इनके पिता का नाम कालूचंद खत्री और माँ का नाम तृप्ता था. इनकी पत्नी का नाम सुलक्षणी था. कहते हैं कि इनके पिता ने इन्हें व्यवसाय में लगाने का बहुत उद्यम किया, किन्तु इनका मन भक्ति की ओर अधिकाधिक झुकता गया. इन्होंने हिन्दू-मुसलमान दोनों की समान धार्मिक उपासना पर बल दिया. वर्णाश्रम व्यवस्था और कर्मकांड का विरोध करके निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का प्रचार किया. गुरू नानक ने व्यापक देशाटन किया और मक्का-मदीना तक की यात्रा की. कहते हैं मुग़ल सम्राट बाबर से भी इनकी भेंट हुई थी. यात्रा के दौरान इनके साथी शिष्य रागी नामक मुस्लिम रहते थे जो इनके द्वारा रचित पदों को गाते थे.
गुरू नानक ने सिख धर्म का प्रवर्त्तन किया. गुरू नानक ने पंजाबी के साथ हिन्दी में भी कविताएँ की. इनकी हिन्दी में ब्रजभाषा और खड़ीबोली दोनों का मेल है. भक्ति और विनय के पद बहुत मार्मिक हैं. गुरू नानक ने उलटबाँसी शैली नहीं अपनाई है. इनके दोहों में जीवन के अनुभव उसी प्रकार गुँथे हैं जैसे कबीर की रचनाओं में. ‘आदिगुरू ग्रंथ साहब’ के अंतर्गत ‘महला’ नामक प्रकरण में इनकी बानी संकलित है. उसमें सबद, सलोक मिलते हैं.
गुरू नानक की ही परम्परा में उनके उत्तराधिकारी गुरू कवि हुए. इनमें है–
गुरू अंगद (जन्म 1504 ई.)
गुरू अमरदास (जन्म 1479 ई.)
गुरू रामदास (जन्म 1514 ई.)
गुरू अर्जुन (जन्म 1563ई.)
गुरू तेगबहादुर (जन्म 1622ई.) और
गुरू गोविन्द सिंह (जन्म 1664ई.).
 
गुरू नानक की रचनाएँ  — 1. जपुजी 2. आसादीवार 3. रहिरास 4. सोहिला
 
धर्मदास
 
ये बांधवगढ़ के रहनेवाले और जाति के बनिए थे. बाल्यावस्था में ही इनके हृदय में भक्ति का अंकुर था और ये साधुओं का सत्संग, दर्शन, पूजा, तीर्थाटन आदि किया करते थे. मथुरा से लौटते समय कबीरदास के साथ इनका साक्षात्कार हुआ. उन दिनों संत समाज में कबीर पूरी प्रसिद्धि हो चुकी थी. कबीर के मुख से मूर्तिपूजा, तीर्थाटन, देवार्चन आदि का खंडन सुनकर इनका झुकाव ‘निर्गुण’ संतमत की ओर हुआ. अंत में ये कबीर से सत्य नाम की दीक्षा लेकर उनके प्रधान शिष्यों में हो गए और सन् 1518 में कबीरदास के परलोकवास पर उनकी गद्दी इन्हीं को मिली. कबीरदास के शिष्य होने पर इन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति, जो बहुत अधिक थी, लुटा दी. ये कबीर की गद्दी पर बीस वर्ष के लगभग रहे और अत्यंत वृद्ध होकर इन्होंने शरीर छोड़ा. इनकी शब्दावली का भी संतों में बड़ा आदर है. इनकी रचना थोड़ी होने पर भी कबीर की अपेक्षा अधिक सरल भाव लिए हुए है, उसमें कठोरता और कर्कशता नहीं है. इन्होंने पूर्वी भाषा का ही व्यवहार किया है. इनकी अन्योक्तियों के व्यंजक चित्र अधिक मार्मिक हैं क्योंकि इन्होंने खंडन-मंडन से विशेष प्रयोजन न रख प्रेमतत्व को लेकर अपनी वाणी का प्रसार किया है.
उदाहरण के लिए ये पद देखिए
 
मितऊ मड़ैया सूनी करि गैलो II
अपना बलम परदेश निकरि गैलो, हमरा के किछुवौ न गुन दै गैलो I
जोगिन होइके मैं वन वन ढूँढ़ौ, हमरा के बिरह बैराग दै गैलो II
सँग की सखी सब पार उतरि गइलो, हम धनि ठाढ़ि अकेली रहि गैलो I
धरमदास यह अरजु करतु है, सार सबद सुमिरन दै गैलो II
 
रैदास या रविदास
 
 
रामानंद जी के बारह शिष्यों में रैदास भी माने जाते हैं. उन्होंने अपने एक पद में कबीर और सेन का उल्लेख किया है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि वे कबीर से छोटे थे. अनुमानत: 15वीं शती उनका समय रहा होगा. धन्ना और मीराबाई ने रैदास का उल्लेख आदरपूर्वक किया है. यह भी कहा जाता है कि मीराबाई रैदास की शिष्या थीं. रैदास ने अपने को एकाधिक स्थलों पर चमार जाति का कहा है:
  • कह रैदास खलास चमारा
  • ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार
रैदास काशी के आसपास के थे. रैदास के पद आदि गुरूग्रंथ साहब में संकलित हैं. कुछ फुटकल पद सतबानी में हैं.
रैदास की भक्ति का ढाँचा निर्गुणवादियों का ही है, किन्तु उनका स्वर कबीर जैसा आक्रामक नहीं. रैदास की कविता की विशेषता उनकी निरीहता है. वे अनन्यता पर बल देते हैं. रैदास में निरीहता के साथ-साथ कुंठाहीनता का भाव द्रष्टव्य है. भक्ति-भावना ने उनमें वह बल भर दिया था जिसके आधार पर वे डंके की चोट पर घोषित कर सकें कि उनके कुटुंबी आज भी बनारस के आस-पास ढोर (मूर्दा पशु) ढोते हैं और दासानुदास रैदास उन्हीं का वंशज है:
जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत
फिरहिं अजहुँ बानारसी आसपास I
आचार सहित बिप्र करहिं डंडउति
तिन तनै रविदास दासानुदासा II
रैदास की भाषा सरल, प्रवाहमयी और गेयता के गुणों से युक्त है.
 
सिंगाजी
 
चार सौ अस्सी वर्ष पूर्व की बात है। भामगढ़ (मध्य प्रदेश) के राजा के यहां एक निरक्षर युवा सेवक का काम करता था। एक दिन वह डाकघर से आ रहा था। रास्ते में उसने परमविरक्ति के भाव में रंगी कुछ पंक्तियां सुनीं-
‘समझि लेओ रे मना भारि!
अंत न होय कोई आपना।
यही माया के फंद मे
नर आज भुलाना॥’
यह विलक्षण सुरीली तान तीर की तरह उस युवक के हृदय में गहरे पैठ गई। वह सोचने लगा इक जब हमारा नाता इस दुनिया से टूटना ही है, यहां अपना कोई नहीं होगा, तो फ़िर हम इस मायाजाल के भ्रम में क्यों फंसें? इसके बाद वह संत मनरंग के पास पहुंचा, जो संत व्रह्मगिरि के शिष्य थे। संत मनरंइगइर के समीप पहुंचते ही उसने उनके चरण स्पशर्ा इकए। यह प्रणाम उसके युवा जीवन का सम्पूर्ण समर्पण इसद्ध हुआ। इसके बाद उसने भामगढ़ के राजा की नौकरी छोड़ दी। यह युवक थे, ‘सिंगा जी’, जो सेवक की नौकरी करने के पहले हरसूद में रहते हुए वन में गाय-भैंसें चराने का काम करते थे। सिंगा जी का जन्म संवत्‌ १५७६ में ग्राम पीपला के भीमा जी गौली के यहां हुआ था। उनकी जन्मदायनी थीं माता गौराबाई। सिंगा जी की बाल्यावस्था बड़वानी के खजूरी ग्राम में व्यतीत हुई। तत्पशचात्‌ निका परिवार हरसूद में आकर बस गया। यहीं सिंगा जी बड़े हुए। और कुछ दिन बाद भामगढ़ के राजा के यहां इनको सेवक की नौकरी मिल गई, परन्तु अब वे विरक्त होकर महात्मा मनरंग को समर्पित हो गए। इस सेवा, समर्पण तथा साधना ने सेवक और चरवाहा रहे सिंगा जी का जीवन समग्रत: बदल दिया। आध्यात्मिक साधनारत रहते-रहते निरक्षर सिंगा जी को अदृष्ट के अंतराल से वाणी आयी और अपढ़ सिंगा जी की वाणी से एक के बाद एक भक्ति पद और भजन मुखरित होने लगे। वे स्वरचित पद गाया करते थे। सिंगा जी के तमाम पद निमाड़ी बोली में हैं। यात्राओं में निमाड़ी पथिकों के काफ़िले बैलगाड़यों पर बैठे-बैठे आज भी इनहें गुंजाते रहते हैं। निमाड़ में ग्राम-ग्राम और घर-घर में ये गाए जाते हैं। परन्तु सिंगा जी इतने भावुक तथा विइचत्र मानस के संत थे इक निका जीवनान्त अभूतपूर्व तरीके से हुआ। एक बार जब श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी पड़ी तो श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के पूर्व ही इनके गुरुदेव को नींद आने लगी। अत: निसे उन्होंने कहा ‘जब मध्य रात्र (१२ बजे) आए तो हमें जगा देना।’ और वे सो गए। सिंगा जी बैठे-बैठे जागते रहे, पर जब १२ बजे तो सिंगा जी ने सोचा गुरुदेव को क्यों जगाएं? उनहें सोने दें। मैं ही भगवान की आरती-अर्चना आदि सम्पन्न कर देता हूं। कुछ देर बाद जब मनरंग जागे, तो जन्मोत्सव की बेला बीत चुकी थी। वे बड़े क्रुद्ध हुए और क्रोध में ही गुरु ने शिष्य सिंगा जी को दुत्कार कर निकाल दिया, कहा-‘यहां से जा, इफर कभी जीवन में मुंह मत दिखाना।’ सिंगा जी गुरु के आदेश का पालन कर चले तो गए परन्तु उन्होंने सोचा, अब इस शरीर को रखें क्यों? इसकी अब जरूरत क्या है? यही सोचकर सिंगा जी पीपला चले गए, जहां वे जन्मे थे। वहीं ११ मास व्यतीत किए। संवत्‌ १६१६ की श्रावणी पूर्णिमा आयी तो उन्होंने पिपराहट नदी-तट पर अपने लिए एक समाधि तैयार की।  एक हाथ में कपूर जलाकर दूसरे हाथ में जप-माला लेकर उसी समाइध की खोखली जगह में जा बैठे और वहां जीवित ही समाइधस्थ हो गए। तब वे केवल ४० वर्ष के थे। जब यह समाचार उनके गुरु को मिला तो वे बहुत्ा पछताए, दु:खी हुए।
आज भी निमाड़ के चरवाहे और इकसान ढोलक-मृदंग बजाते हुए गाया करते हैं-
‘सिंगा बड़ा औइलया पीर,
जिसको सुमेर राव अमीर।’
निमाड़ के मुसलमान उसे ‘औ्लिया’ और पहुंचा हुआ ‘पीर’ ही मानते हैं। वहां के गूजर समाज की पंचायतें दंइडत अपराधी को यह कहकर छोड़ देती हैं कि, ‘जा सिंगा जी महाराज के पांव लाग ले।’ और वह अपराधी सिंगा जी की समाधि का स्पर्श कर, उसे प्रणाम कर अपराध-मुक्त और शुद्ध हो जाता है। हिन्दू-मुसलमान सभी बैल आदि कुछ भी खो जाने पर सिंगा जी की समा्धि पर आकर मनौती मानते हैं। आज खंडवा-हरदा रेलवे मार्ग पर ‘सिंगा जी’ नाम का रेलवे स्टेशन भी है। निमाड़ ही नहीं, दूरस्थ स्थानों से भी लाखों आस्थावान यात्री प्रतिवर्ष  सिंगा जी की समाधि पर एकत्र होते हैं। मुसलमान दुआ करते हैं, तो हिन्दू यात्री मनौइतयां मानते-प्रसाद चढ़ाते हैं।
रामभक्ति पंथी शाखा के प्रमुख कवि
रामानन्द, तुलसीदास, स्वामी अग्रदास, नाभादास, प्राणचंद चौहान, हृदयराम, केशवदास, सेनापति।
 
स्वामी रामानन्द
 
स्वामी रामानन्द का जन्म 1299ई. में माघकृष्णसप्तमी को प्रयाग में हुआ था। इनके पिता का नाम पुण्यसदनऔर माता का नाम सुशीला देवी था। इनका बाल्यकाल प्रयाग में बीता। यज्ञोपवीत संस्कार के उपरान्त वे प्रयाग से काशी चले आए और गंगा के किनारे पंचगंगाघाट पर स्थायी रूप से निवास करने लगे। इनके गुरु स्वामी राघवानन्द थे जो रामानुज (अचारी) संप्रदाय के ख्यातिलब्ध संत थे। स्वामी राघवानन्द हिन्दी भाषा में भक्तिपरककाव्य रचना करते थे। स्वामी रामानन्द को रामभक्तिगुरुपरंपरासे मिली। हिंदी भाषा में लेखन की प्रेरणा उन्हें गुरुकृपासे प्राप्त हुई। पंचगंगाघाटपर रहते हुए स्वामी रामानुज ने रामभक्तिकी साधना के साथ-साथ उसका प्रचार और प्रसार भी किया। स्वामी रामानन्द ने जिस भक्ति-धारा का प्रवर्तन किया, वह रामानुजीपरंपरा से कई दृष्टियोंसे भिन्न थी। रामानुजी संप्रदाय में इष्टदेव के रूप में लक्ष्मीनारायण की पूजा होती है। स्वामी रामानन्द ने लक्ष्मीनारायण के स्थान पर सीता और राम को इष्टदेव के आसन पर प्रतिष्ठित किया। नए इष्टदेव के साथ ही स्वामी रामानन्द ने रामानुजीसंप्रदाय से अलग एक षडक्षरमंत्र की रचना की। यह मंत्र है- रांरामायनम:। इष्टदेव और षडक्षरमंत्र के अतिरिक्त स्वामी रामानन्द ने इष्टोपासनापद्धतिमें भी परिवर्तन किया। स्वामी रामानन्द ने रामानुजीतिलक से भिन्न नए ऊ‌र्ध्वपुण्डतिलक की अभिरचनाकी। इन भिन्नताओंके कारण स्वामी रामानन्द द्वारा प्रवर्तित भक्तिधारा को रामानुजी संप्रदाय से भिन्न मान्यता मिलने लगी। रामानुजीऔर रामानन्दी संप्रदाय क्रमश:अचारीऔर रामावत नाम से जाने जाने लगे। रामानुजीतिलक की भांति रामानन्दी तिलक भी ललाट के अतिरिक्त देह के ग्यारह अन्य भागों पर लगाया जाता है। स्वामी रामानन्द ने जिस तिलक की अभिरचनाकी उसे रक्तश्रीकहा जाता है। कालचक्र में रक्तश्रीके अतिरिक्त इस संप्रदाय में तीन और तिलकोंकी अभिरचनाहुई। इन तिलकोंके नाम हैं, श्वेतश्री(लश्करी), गोलश्री(बेदीवाले) और लुप्तश्री(चतुर्भुजी)। इष्टदेव, मंत्र, पूजापद्धतिएवं तिलक इन चारों विंदुओंके अतिरिक्त स्वामी रामानन्द ने स्वप्रवर्तितरामावत संप्रदाय में एक और नया तत्त्‍‌व जोडा। उन्होंने रामभक्तिके भवन का द्वार मानव मात्र के लिए खोल दिया। जिस किसी भी व्यक्ति की निष्ठा राम में हो, वह रामभक्त है, चाहे वह द्विज हो अथवा शूद्र, हिंदू हो अथवा हिंदूतर।वैष्णव भक्ति भवन के उन्मुक्त द्वार से रामावत संप्रदाय में बहुत से द्विजेतरऔर हिंदूतरभक्तों का प्रवेश हुआ। स्वामी रामानन्द की मान्यता थी कि रामभक्तिपर मानवमात्र का अधिकार है, क्योंकि भगवान् किसी एक के नहीं, सबके हैं-सर्वे प्रपत्तिरधिकारिणोमता:।ज्ञातव्य है कि रामानुजीसंप्रदाय में मात्र द्विजाति(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को ही भगवद्भक्तिका अधिकार प्राप्त है। स्वामी रामानन्द ने रामभक्तिपर मानवमात्र का अधिकार मानकर एक बडा साहसी और क्रान्तिकारी कार्य किया था। इसके लिए उनका बडा विरोध भी हुआ। स्वामी रामानन्द का व्यक्तित्व क्रान्तिदर्शी,क्रान्तिधर्मीऔर क्रान्तिकर्मीथा। उनकी क्रान्तिप्रियतामात्र रामभक्तितक ही सीमित नहीं थी। भाषा के क्षेत्र में भी उन्होंने क्रान्ति का बीजारोपण किया। अभी तक धर्माचार्य लेखन-भाषण सारा कुछ देवभाषा संस्कृत में ही करते थे। मातृभाषा होते हुए भी हिंदी उपेक्षत-सीथी। ऐसे परिवेश में स्वामी रामानन्द ने हिंदी को मान्यता देकर अपनी क्रान्तिप्रियताका परिचय दिया। आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास ने स्वामी रामानन्द की भाषा विषयक इसी क्रान्ति प्रियताका अनुसरण करके रामचरितमानस जैसे अद्भुत ग्रंथ का प्रणयन हिंदी भाषा में किया। ऐसा माना जाता है कि स्वामी रामानन्द विभिन्न परिवेशों के बीच एक सेतु की भूमिका का निर्वाह करते थे। वे नर और नारायण के बीच एक सेतु थे; शूद्र और ब्राह्मण के बीच एक सेतु थे; हिन्दू और हिंदूतरके बीच एक सेतु थे; देवभाषा (संस्कृत) और लोकभाषा(हिन्दी) के बीच एक सेतु थे। स्वामी रामानन्द ने कुल सात ग्रंथों की रचना की, दो संस्कृत में और पांच हिंदी में।
उनके द्वारा रचित पुस्तकों की सूची इस प्रकार है:
(1) वैष्णवमताब्जभास्कर: (संस्कृत), (2) श्रीरामार्चनपद्धति:(संस्कृत), (3) रामरक्षास्तोत्र(हिंदी), (4) सिद्धान्तपटल(हिंदी), (5) ज्ञानलीला(हिंदी), (6) ज्ञानतिलक(हिन्दी), (7) योगचिन्तामणि(हिंदी)।
 
ऐसा माना जाता है कि लगभग एक सौ ग्यारह वर्ष की दीर्घायु में स्वामी रामानन्द ने भगवत्सायुज्यवरणकिया। जीवन के अंतिम दिनों में वे काशी से अयोध्या चले गए। वहां वे एक गुफामें प्रवास करने लगे। एक दिन प्रात:काल गुफासे शंख ध्वनि सुनाई पडी। भक्तों ने गुफामें प्रवेश किया। वहां न स्वामी जी का देहशेषऔर न शंख। वहां मात्र पूजासामग्रीऔर उनकी चरणपादुका। भक्तगण गुफासे चरणपादुका काशी ले आए और यहां उसे पंचगंगाघाटपर स्थापित कर दिया। जिस स्थान पर चरणपादुका की स्थापना हुई, उसे श्रीमठकहा जाता है। श्रीमठपर एक नए भवन का निर्माण सन् 1983ई. में किया गया। स्वामी रामानन्द की गुरु शिष्य परम्परा से ही तुलसीदास, स्वामी अग्रदास, नाभादास जैसे रामभक्त कवियो का उदय हुआ।
 
 
गोस्वामी तुलसीदास
 
गोस्वामी तुलसीदास के जन्म काल के विषय में एकाधिक मत हैं. बेनीमाधव दास द्वारा रचित ‘गोसाईं चरित’ और महात्मा रघुबरदास कृत ‘तुलसी चरित’ दोनों के अनुसार तुलसीदास का जन्म 1497 ई. में हुआ था. शिवसिंह सरोज के अनुसार सन् 1526 ई. के लगभग हुआ था. पं. रामगुलाम द्विवेदी इनका जन्म सन् 1532 ई. मानते हैं. यह निश्चित है कि ये महाकवि 16वीं शताब्दी में विद्यमान थे.
तुलसीदास मध्यकाल के उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपने बारे में जो थोड़ा-बहुत लिखा है, वह बहुत काम का है.
तुलसी का बचपन घोर दरिद्रता एवं असहायवस्था में बीता था. उन्होंने लिखा है, माता-पिता ने दुनिया में पैदा करके मुझे त्याग दिया. विधाता ने भी मेरे भाग्य में कोई भलाई नहीं लिखी.
 
मातु पिता जग जाइ तज्यो, विधि हू न लिखी कछु भाल भलाई I
जैसे कुटिल कीट को पैदा करके छोड़ देते हैं वैसे की मेरे माँ-बाप ने मुझे त्याग दिया:
 
तनु जन्यो कुटिल कीट ज्यों तज्यो माता पिता हू I
हनुमानबाहुक में भी यह स्पष्ट है कि अंतिम समय में वे भयंकर बाहु-पीड़ा से ग्रस्त थे. पाँव, पेट, सकल शरीर में पीड़ा होती थी, पूरी देह में फोड़े हो गए थे.
यह मान्य है कि तुलसीदास की मृत्यु सन् 1623 ई. में हुई.
उनके जन्म स्थान के विषय में काफी विवाद है. कोई उन्हें सोरों का बताता है, कोई राजापुर का और कोई अयोध्या का. ज्यादातर लोगों का झुकाव राजापुर की ही ओर है. उनकी रचनाओं में अयोध्या, काशी, चित्रकूट आदि का वर्णन बहुत आता है. इन स्थानों पर उनके जीवन का पर्याप्त समय व्यतीत हुआ होगा.
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं.
कृतियां
1. दोहावली 2. कवितावली 3. गीतावली 4. रामचरितमानस 5. रामाज्ञाप्रश्न 6. विनयपत्रिका 7. रामललानहछू 8. पार्वतीमंगल 9. जानकीमंगल 10. बरवै रामायण 11. वैराग्य संदीपिनी 12. श्रीकृष्णगीतावली
 
नाभादास
 
नाभादास अग्रदासजी के शिष्य बड़े भक्त और साधुसेवी थे. सन् 1600 के लगभग वर्तमान थे और तुलसीदासजी की मृत्यु के बहुत पीछे तक जीवित रहे. इनका प्रसिद्ध ग्रंथ भक्तमाल सन् 1585 ई. के पीछे बना और सन् 1712 में प्रियादासजी ने उसकी टीका लिखी. इस ग्रंथ में 200 भक्तों के चमत्कार पूर्ण चरित्र 316 छप्पयों में लिखे गए हैं. इन चरित्रों में पूर्ण जीवनवृत्त नहीं है, केवल भक्ति की महिमासूचक बातें लिखी गई हैं. इनका उद्देश्य भक्तों के प्रति जनता में पूज्यबुद्धि का प्रचार जान पड़ता है. वह उद्देश्य बहुत अंशों में सिद्ध भी हुआ.
नाभाजी को कुछ लोग डोम बताते हैं, कुछ क्षत्रिय. ऐसा प्रसिद्ध है कि वे एकबार तुलसीदास से मिलने काशी गए. पर उस समय गोस्वामी ध्यान में थे, इससे न मिल सके. नाभाजी उसी दिन वृंदावन चले गए. ध्यान भंग होने पर गोस्वामीजी को बड़ा खेद हुआ और वे तुरंत नाभाजी से मिलने वृंदावन चल दिए. नाभाजी के यहाँ वैष्णवों का भंडारा था जिसमें गोस्वामीजी बिना बुलाए जा पहुँचे. गोस्वामीजी यह समझकर कि नाभाजी ने मुझे अभिमानी न समझा हो, सबसे दूर एक किनारे बुरी जगह बैठ गए. नाभाजी ने जान बूझकर उनकी ओर ध्यान न दिया. परसने के समय कोई पात्र न मिलता था जिसमें गोस्वामीजी को खीर दी जाती. यह देखकर गोस्वामीजी एक साधु का जूता उठा लिया और बोले, “इससे सुंदर पात्र मेरे लिए और क्या होगा ?” इस पर नाभाजी ने उठकर उन्हें गले लगा लिया और गद्-गद् हो गए.
अपने गुरू अग्रदास के समान इन्होंने भी रामभक्ति संबंधी कविता की है. ब्रजभाषा पर इनका अच्छा अधिकार था और पद्यरचना में अच्छी निपुणता थी.
कृति — 1. भक्तमाल 2. अष्टयाम
 
स्वामी अग्रदास
 
रामानंद के शिष्य अनंतानंद और अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी थे, कृष्णदास पयहारी के शिष्य अग्रदास जी थे. सन् १५५६ के लगभग वर्तमान थे. इनकी बनाई चार पुस्तकों का पता है. इनकी कविता उसी ढंग की है जिस ढंग की कृष्णोपासक नंददासजी की.
प्रमुख कृतियां है– 1. हितोपदेश उपखाणाँ बावनी 2. ध्यानमंजरी 3. रामध्यानमंजरी 4. राम-अष्ट्याम
अग्रदास जी का काव्य ब्रजभाषा मे है जिसमे प्रवाह के साथ परिष्कार भी है। सुंदर पद-रचना और अलंकारो के प्रयोग से यह प्रमाणित होता है कि इन्हें शास्त्रीय साहित्य का अच्छा ज्ञान था।
 
चौपाई:-
जीव मात्र से द्वैस न राखै। सो सिय राम नाम रस चाखै।१।
दीन भाव निज उर में लावै। सिया राम सन्मुख छवि छावै।२।
तौन उपासक ठीक है भाई। वाकी समुझौ बनी बनाई।३।
सियाराम निशि वासर ध्यावै। अन्त त्यागि तन गर्भ न आवै।४।
 
दोहा:-
अग्रदास कह धन्य सो, जाहि दियो गुरु ज्ञान।
सो तन लीन्हो सुफल कै, छूटा दुःख महान।१।
 
‘अग्रअली’ नाम से अग्रदास स्वयं को जानकी जी की सखी मानकर काव्य-रचना किया करते थे। रामभक्ति परम्परा में रसिक-भावना के समावेश का श्रेय इन्हीं को प्राप्त है।
 
हृदयराम
 
ये पंजाब के रहनेवाले और कृष्णदास के पुत्र थे. इन्होंने सन् 1623 में संस्कृत के हनुमन्नाटक के आधार पर भाषा हनुमन्नाटक लिखा जिसकी कविता बड़ी सुंदर और परिमार्जित है. इसमें अधिकतर कविता और सवैये में बड़े अच्छे संवाद हैं.
 
प्राणचंद चौहान
 
इनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त विवरण नहीं मिलता है. पं. रामचंद्र शुक्ल जी के अनुसार:
संस्कृत में रामचरित संबंधी कई नाटक हैं जिनमें कुछ तो नाटक के साहित्यिक नियमानुसार हैं और कुछ केवल संवाद रूप में होने के कारण नाटक कहे गए हैं. इसी पिछली पद्धति पर संवत 1667 (सन् 1610ई.) में इन्होंने रामायण महानाटक लिखा.
 
कृति — 1. रामायण महानाटक
 
केशवदास
 
केशव का जन्म तिथि सं० १६१८ वि० मे वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य के अंतर्गत ओरछा नगर में हुआ था। ओरछा के व्यासपुर मोहल्ले में उनके अवशेष मिलते हैं। ओरछा के महत्व और उसकी स्थिति के सम्बन्ध में केशव ने स्वयं अनेक भावनात्मक कथन कहे हैं। जिनसे उनका स्वदेश प्रेम झलकता है। आचार्य केशव की रामभक्ति से सम्बन्धित कॄति “रामचंद्रिका” है।
“रामचन्द्रिका’ संस्कृत के परवर्ती महाकाव्यों की वर्णन-बहुल शैली का प्रतिनिधित्व करती है। “रामचन्द्रिका’ के भाव-विधान में शान्त रस का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अत्रि-पत्नी अनसूया के चित्र से ऐसा प्रकट होता है जैसे स्वयं ‘निर्वेद’ ही अवतरित हो गया हो। वृद्धा अनसूया के कांपते शरीर से ही निर्वेद के संदेश की कल्पना कवि कर लेता है:
 
कांपति शुभ ग्रीवा, सब अंग सींवां, देखत चित्त भुलाहीं ।
जनु अपने मन पति, यह उपदेशति, या जग में कछु नाहीं ।।
 
अंगद-रावण में शान्त की सोद्देश्य योजना है। अंगद रावण को कुपथ से विमुख करने के लिए एक वैराग्यपूर्ण उक्ति कहता है। अन्त में वह कहता है – “चेति रे चेति अजौं चित्त अन्तर अन्तक लोक अकेलोई जै है।” यह वैराग्य पूर्ण चेतावनी सुन्दर बन पड़ी है।
 
सेनापति
 
हिंदी-साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेक कवि हुए हैं जिनके कृतित्त्व तो प्राप्त हैं, परंतु व्यक्तित्त्व के विषय में कुछ भी ठीक से पता नहीं है। भक्तिकाल की समाप्ति और रीतिकाल के प्रारंभ के संधिकाल मे भी एक महाकवि हुए हैं जिनके जीवन के विषय में जानकारी के नाम पर मात्र उनका लिखा एक कवित्त ही है, ऐसे महाकवि ‘सेनापति’ के विषय में कवित्त है
“दीक्षित परसराम, दादौ है विदित नाम,
जिन कीने यज्ञ, जाकी जग में बढ़ाई है।
गंगाधर पिता, गंगाधार ही समान जाकौ,
गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है।
महाजानि मनि, विद्यादान हूँ कौ चिंतामनि,
हीरामनि दीक्षित पै तैं पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी,
सब कवि कान दै सुनत कविताई हैं॥”
 
यही कवित्त सेनापति के जीवन परिचय का आधार है। इसके आधार पर विद्वानों ने सेनापति के पितामह का नाम परसराम दीक्षित और पिता का नाम गंगाधर माना हैं। ‘गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है’ के आधार पर उन्हें उत्तर-प्रदेश के गंगा-किनारे बसे अनूपशहर क़स्बे का माना है। सेनापति के विषय में विद्वानों ने माना है कि उन्होंने ‘काव्य-कल्पद्रुम’ और ‘कवित्त-रत्नाकर’ नामक दो ग्रंथों की रचना की थी। ‘काव्यकल्पद्रुम’ का कुछ पता नहीं है। ‘कवित्तरत्नाकर’ उनकी एक मात्र प्राप्त कृति है। इस विषय में डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने कहीं लिखा है-“सन १९२४ में जब प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन अध्यापन प्रारंभ हुआ, तब कविवर सेनापति के एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ ‘कवित्त-रत्नाकर’ को एम.ए. के पाठ्यक्रम में स्थान मिला था। उस समय इस ग्रंथ की कोई प्रकाशित प्रति उपलब्ध नहीं थी। अतः केवल कुछ हस्तलिखित पोथियाँ एकत्रित करके पढ़ाई प्रारंभ की थी।
कवि की निम्नलिखित पंक्तियों के आधार पर ‘कवित्त-रत्नाकर’ के विषय में माना जाता रहा है कि उन्होंने इसे सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्ध में रचा होगा-
“संवत सत्रह सै मैं सेई सियापति पांय,
सेनापति कविता सजी, सज्जन सजौ सहाई।”
सेनापति कॄत ‘कवित्त-रत्नाकर’ की चतुर्थ तरंग में ७६ कवित्त हैं जिनमें रामकथा मुक्त रुप में लिखी है।-
“कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि,
भाई मन संतन के त्रिभुवन जानि है।
देबन उपाइ कीनौ यहै भौ उतारन कौं,
बिसद बरन जाकी सुधार सम बानी है।
भुवपति रुप देह धारी पुत्र सील हरि
आई सुरपुर तैं धरनि सियारानि है।
तीरथ सरब सिरोमनि सेनापति जानि,
राम की कहनी गंगाधार सी बखानी है।”
पाँचवी तरंग में ८६ कवित्त हैं, जिनमें राम-रसायन वर्णन है। इनमें राम, कृष्ण, शिव और गंगा की महिमा का गान है। ‘गंगा-महिमा’ दृष्टव्य है-
“पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार,
जहाँ मरि पापी होत सुरपुरपति है।
देखत ही जाकौ भलौ घाट पहिचानियत,
एक रुप बानी जाके पानी की रहति है।
बड़ी रज राखै जाकौ महा धीर तरसत,
सेनापति ठौर-ठौर नीकी यैं बहति है।
पाप पतवारि के कतल करिबै कौं गंगा,
पुन्य की असील तरवारि सी लसति है।”
सेनापति ने अपने काव्य में सभी रसों को अपनाया है। ब्रज भाषा में लिखे पदों में फारसी और संस्कृत के शब्दों का भी प्रयोग किया है। अलंकारों की बात करें तो सेनापति को श्लेष से तो विशेष मोह था।

 

निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के प्रमुख कवियों का परिचय
मलिक मुहम्मद जायसी, कुतबन, मंझन, उसमान, शेख नवी, कासिमशाह, नूर मुहम्मद, मुल्ला दाउद |
 
मलिक मुहम्मद जायसी
 
जायसी के जन्म और मृत्यु की कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध रहीं है. ये हिन्दी में सूफ़ी काव्य परंपरा के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं. ये अमेठी के निकट जायस के रहने वाले थे, इसलिए इन्हें जायसी कहा जाता है. जायसी अपने समय के सिद्ध फ़कीरों में गिने जाते थे. अमेठी के राजघराने में इनका बहुत मान था. जीवन के अंतिम दिनों में जायसी अमेठी से दो मिल दूर एक जंगल में रहा करते थे. वहीं उनकी मृत्यु हुई. काजी नसरूद्दीन हुसैन जायसी ने, जिन्हें अवध में नवाब शुजाउद्दौला से सनद मिली थी, अपनी याददाश्त में जायसी का मृत्युकाल 4 रजब 949 हिजरी लिखा है. यह काल कहाँ तक ठीक है, नहीं कहा जा सकता.
ये काने और देखने में कुरूप थे. कहते हैं कि शेरशाह इनके रूप को देखकर हँसा था. इस पर यह बोले ‘मोहिका हँसेसि कि कोहरहि ?’ इनके समय में भी इनके शिष्य फ़कीर इनके बनाये भावपूर्ण दोहे, चौपाइयाँ गाते फिरते थे. इन्होंने तीन पुस्तकें लिखी – एक तो प्रसिद्ध ‘पदमावत’, दूसरी ‘अख़रावट’, तीसरी ‘आख़िरी क़लाम’. कहते हैं कि एक नवोपलब्ध काव्य ‘कन्हावत’ भी इनकी रचना है, किन्तु कन्हावत का पाठ प्रामाणिक नहीं लगता. अख़रावट में देवनागरी वर्णमाला के एक अक्षर को लेकर सिद्धांत संबंधी तत्वों से भरी चौपाइयाँ कही गई हैं. इस छोटी सी पुस्तक में ईश्वर, सृष्टि, जीव, ईश्वर प्रेम आदि विषयों पर विचार प्रकट किए गए हैं. आख़िरी क़लाम में कयामत का वर्णन है. जायसी की अक्षत कीर्ति का आधार है पदमावत, जिसके पढ़ने से यह प्रकट हो जाता है कि जायसी का हृदय कैसा कोमल और ‘प्रेम की पीर’ से भरा हुआ था. क्या लोकपक्ष में, क्या अध्यात्मपक्ष में, दोनों ओर उसकी गूढ़ता, गंभीरता और सरसता विलक्षण दिखाई देती है.
कृतियाँ — 1. पदमावत  2. अख़रावट  3. आख़िरी क़लाम
 
कुतबन
 
ये चिश्ती वंश के शेख बुरहान के शिष्य थे और जौनपुर के बादशाह हुसैनशाह के आश्रित थे. अत: इनका समय विक्रम सोलहवीं शताब्दी का मध्यभाग (सन् 1493) था. इन्होंने ‘मृगावती’ नाम की एक कहानी चौपाई दोहे के क्रम से सन् 909 हिजरी सन् 1500 ई. में लिखी जिसमें चंद्रनगर के राजा गणपतिदेव के राजकुमार और कंचनपुर के राजा रूपमुरारि की कन्या मृगावती की प्रेम कथा का वर्णन है. इस कहानी के द्वारा कवि ने प्रेममार्ग के त्याग और कष्ट का निरूपण करके साधक के भगवत्प्रेम का स्वरूप दिखाया है. बीच-बीच में सूफियों की शैली पर बड़े सुंदर रहस्यमय आध्यात्मिक आभास है.
कृतियाँ — 1. मृगावती
 
मंझन
 
इनके संबंध में कुछ भी ज्ञात नहीं है. केवल इनकी रची ‘मधुमालती’ की एक खंडित प्रति मिली है जिसमें इनकी कोमल कल्पना और स्निग्धसहृदयता का पता लगता है. मंझन ने सन् 1545 ई. में मधुमालती की रचना की. मृगावती के समान मधुमालती में भी पाँच चौपाइयों के उपरांत एक दोहे का क्रम रखा गया. पर मृगावती की अपेक्षा इसकी कल्पना भी विशद् है और वर्णन भी अधिक विस्तृत और हृदयग्राही है. आध्यात्मिक प्रेम भाव की व्यंजना के लिए प्रकृतियाँ के भी अधिक दृश्यों का समावेश मंझन ने किया है.
ये जायसी के परवर्ती थे. मधुमालती में नायक को अप्सराएँ उड़ाकर मधुमालती की चित्रसारी में पहुँचा देती हैं और वहीं नायक नायिका को देखता है. इसमें मनोहर और मधुमालती की प्रेमकथा के समानांतर प्रेमा और ताराचंद की भी प्रेमकथा चलती है. इसमें प्रेम का बहुत उच्च आदर्श सामने रखा गया है. सूफ़ी काव्यों में नायक की प्राय: दो पत्नियाँ होती हैं, किन्तु इसमें मनोहर अपने द्वारा उपकृत प्रेमा से बहन का संबंध स्थापित करता है. इसमें जन्म-जन्मांतर के बीच प्रेम की अखंडता प्रकट की गई है. इस दृष्टि से इसमें भारतीय पुनर्जन्मवाद की बात कही गई है. इस्लाम पुनर्जन्मवाद नहीं मानता. लोक के वर्णन द्वारा अलौकिक सत्ता का संकेत सभी सूफ़ी काव्यों के समान इसमें भी पाया जाता है.
जैन कवि बनारसीदास ने अपने आत्मचरित में सन् 1603 के आसपास की अपनी इश्कबाजीवाली जीवनचर्या का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उस समय मैं हाट बाजार में जाना छोड़, घर में पड़े-पड़े ‘मृगावती’ और ‘मधुमालती’ नाम की पोथियाँ पढ़ा करता था:-
 
तब घर में बैठे रहैं, नाहिंन हाट बाजार I
मधुमालती, मृगावती पोथी दोय उचार II
 
कृतियाँ — 1. मधुमालती
 
उसमान
 
ये जहाँगीर के समय में वर्तमान थे और गाजीपुर के रहनेवाले थे. इनके पिता का नाम शेख हुसैन था और ये पाँच भाई थे. ये शाह निजामुद्दीन चिश्ती की शिष्य परंपरा में हाजीबाबा के शिष्य थे. उसमान ने सन् 1613 ई. में ‘चित्रावली’ नाम की पुस्तक लिखी. पुस्तक के आरंभ में कवि ने स्तुति के उपरांत पैगंबर और चार खलीफों की बादशाह जहाँगीर की तथा शाह निजामुद्दीन और हाजीबाबा की प्रशंसा लिखी है.
कवि ने ‘योगी ढूँढन खंड’ में काबुल, बदख्शाँ, खुरासान, रूस, साम, मिश्र, इस्तबोल, गुजरात, सिंहलद्वीप आदि अनेक देशों का उल्लेख किया है. सबसे विलक्षण बात है जोगियों का अँगरेजों के द्वीप में पहुँचना :
 
वलंदप देखा अँगरेजा I तहाँ जाइ जेहि कठिन करेजा II
ऊँच नीच धन संपति हेरा I मद बराह भोजन जिन्ह केरा II
कवि ने इस रचना में जायसी का पूरा अनुकरण किया है. जो जो विषय जायसी ने अपनी पुस्तक में रखे हैं उस विषयों पर उसमान ने भी कुछ कहा है. कहीं-कहीं तो शब्द और वाक्यविन्यास भी वही हैं. पर विशेषता यह है कि कहानी बिल्कुल कवि की कल्पित है.
 
कृतियाँ  — 1. चित्रावली
 
शेख नवी
 
ये जौनपुर जिले में दोसपुर के पास मऊ नामक स्थान के रहने वाले थे और सन् 1619 में जहाँगीर के समय में वर्तमान थे. इन्होंने ‘ज्ञानदीप’ नामक एक आख्यान काव्य लिखा, जिसमें राजा ज्ञानदीप और रानी देवजानी की कथा है.
कृतियाँ — 1. ज्ञानदीप
 
कासिमशाह
 
ये दरियाबाद (बाराबंकी) के रहने वाले थे और सन् 1731 के लगभग वर्तमान थे. इन्होंने ‘हंस जवाहिर’ नाम की कहानी लिखी, जिसमें राजा हंस और रानी जवाहिर की कथा है.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार: इनकी रचना बहुत निम्न कोटि की है. इन्होंने जगह जगह जायसी की पदावली तक ली है, पर प्रौढ़ता नहीं है.
कृतियाँ — 1. हंस जवाहिर
 
नूर मुहम्मद
 
ये दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के समय में थे और ‘सबरहद’ नामक स्थान के रहनेवाले थे जो जौनपुर जिले में जौनपुर आज़मगढ़ की सरहद पर है. पीछे सबरहद से ये अपनी ससुराल भादो (अजमगढ़) चले गये. इनके श्वसुर शमसुद्दीन को और कोई वारिस न था इससे वे ससुराल ही में रहने लगे.
नूर मुहम्मद फ़ारसी के अच्छे आलिम थे और इनका हिन्दी काव्यभाषा का भी ज्ञान और सब सूफ़ी कवियों से अधिक था. फ़ारसी में इन्होंने एक दीवान के अतिरिक्त ‘रौजतुल हकायक’ इत्यादि बहुत सी किताबें लिखी थीं जो असावधानी के कारण नष्ट हो गईं.
इन्होंने सन् 1744 ई. में ‘इंद्रावती’ नामक एक सुंदर आख्यान काव्य लिखा जिसमें कालिंजर के राजकुमार राजकुँवर और आगमपुर की राजकुमारी इंद्रावती की प्रेमकहानी है.
इनका एक और ग्रंथ फ़ारसी अक्षरों में लिखा मिला है, जिसका नाम है ‘अनुराग बाँसुरी’. यह पुस्तक कई दृष्टियों से विलक्षण है. पहली बात तो इसकी भाषा सूफ़ी रचनाओं से बहुत अधिक संस्कृतगर्भित है. दूसरी बात है हिंदी भाषा के प्रति मुसलमानों का भाव.|
 
कृतियाँ  — 1. इंद्रावती (सन् 1744 ई.)  2. अनुराग बाँसुरी (सन् 1764 ई.)
 
इसके अतिरिक्त प्रेमाख्यान काव्य की प्रमुख कॄतियों मे मुल्ला दाउद कॄत “चान्दायन” (१३७९) नायक लोर और चन्दा की प्रेम कथा प्रमुख है।

 

कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवियों का परिचय
सूरदास, नंददास, कृष्णदास, परमानंद, कुंभनदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, स्वामी हरिदास, सूरदास-मदनमोहन, श्रीभट्ट, व्यास जी, रसखान, ध्रुवदास, चैतन्य महाप्रभु ।
 
सूरदास
हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कृष्णभक्त कवि सूरदास का जन्म 1483 ई. के आस-पास हुआ था. इनकी मृत्यु अनुमानत: 1563 ई. के आस-पास हुई. इनके बारे में ‘भक्तमाल’ और ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में थोड़ी-बहुत जानकारी मिल जाती है. ‘आईने अकबरी’ और ‘मुंशियात अब्बुलफजल’ में भी किसी संत सूरदास का उल्लेख है, किन्तु वे बनारक के कोई और सूरदास प्रतीत होते हैं. अनुश्रुति यह अवश्य है कि अकबर बादशाह सूरदास का यश सुनकर उनसे मिलने आए थे. ‘भक्तमाल’ में इनकी भक्ति, कविता एवं गुणों की प्रशंसा है तथा इनकी अंधता का उल्लेख है. ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के अनुसार वे आगरा और मथुरा के बीच साधु या स्वामी के रूप में रहते थे. वे वल्लभाचार्य के दर्शन को गए और उनसे लीलागान का उपदेश पाकर कृष्ण-चरित विषयक पदों की रचना करने लगे. कालांतर में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण होने पर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इन्हें यहाँ कीर्तन का कार्य सौंपा.
सूरदास के विषय में कहा जाता है कि वे जन्मांध थे. उन्होंने अपने को ‘जन्म को आँधर’ कहा भी है. किन्तु इसके शब्दार्थ पर अधिक नहीं जाना चाहिए. सूर के काव्य में प्रकृतियाँ और जीवन का जो सूक्ष्म सौन्दर्य चित्रित है उससे यह नहीं लगता कि वे जन्मांध थे. उनके विषय में ऐसी कहानी भी मिलती है कि तीव्र अंतर्द्वन्द्व के किसी क्षण में उन्होंने अपनी आँखें फोड़ ली थीं. उचित यही मालूम पड़ता है कि वे जन्मांध नहीं थे. कालांतर में अपनी आँखों की ज्योति खो बैठे थे. सूरदास अब अंधों को कहते हैं. यह परम्परा सूर के अंधे होने से चली है. सूर का आशय ‘शूर’ से है. शूर और सती मध्यकालीन भक्त साधकों के आदर्श थे.
कृतियाँ
1. सूरसागर   2. सूरसारावली   3. साहित्य लहरी
 
ध्रुवदास
ये श्री हितहरिवंश के शिष्य स्वप्न में हुए थे. इसके अतिरिक्त उनका कुछ जीवनवृत्त प्राप्त नहीं हुआ. वे अधिकतर वृंदावन में ही रहा करते थे. उनकी रचना बहुत ही विस्तृत है और इन्होंने पदों के अतिरिक्त दोह, चौपाई, कवित्त, सवैये आदि अनेक छंदों में भक्ति और प्रेमतत्वों का वर्णन किया है.
 
कृतियाँ- 1. वृंदावनसत 2. सिंगारसत 3. रसरत्नावली 4. नेहमंजरी 5. रहस्यमंजरी 6. सुखमंजरी 7. रतिमंजरी 8. वनविहार 9. रंगविहार 10. रसविहार 11. आनंददसाविनोद 12. रंगविनोद 13. नृत्यविलास 14. रंगहुलास 15. मान रसलीला 16. रहसलता 17. प्रेमलता 18. प्रेमावली 19. भजनकुडलिया 20. भक्तनामावली ।
 
रसखान
 
ये दिल्ली के एक पठान सरदार थे. ये लौकिक प्रेम से कृष्ण प्रेम की ओर उन्मुख हुए. ये गोस्वामी विट्ठलनाथ के बड़े कृपापात्र शिष्य थे. रसखान ने कृष्ण का लीलागान गेयपदों में नहीं, सवैयों में किया है. रसखान को सवैया छंद सिद्ध था. जितने सहज, सरस, प्रवाहमय सवैये रसखान के हैं, उतने शायद ही किसी अन्य कवि के हों. रसखान का कोई ऐसा सवैया नहीं मिलता जो उच्च स्तर का न हो. उनके सवैये की मार्मिकता का बहुत बड़ा आधार दृश्यों और बाह्यांतर स्थितियों की योजना में है. वही योजना रसखान के सवैयों के ध्वनि-प्रवाह में है. ब्रजभाषा का ऐसा सहज प्रवाह अन्यत्र बहुत कम मिलता है.
रसखान सूफ़ियों का हृदय लेकर कृष्ण की लीला पर काव्य रचते हैं. उनमें उल्लास, मादकता और उत्कटता तीनों का संयोग है. ब्रज भूमि के प्रति जो मोह रसखान की कविताओं में दिखाई पड़ता है, वह उनकी विशेषता है.
कृतियाँ
1. प्रेमवाटिका
2. सुजान रसखान
 
व्यास जी
 
इनका पूरा नाम हरीराम व्यास था और वे ओरछा के रहनेवाले थे. ओरछानरेश मधुकर शाह के ये राजगुरू थे. पहले ये गौड़ सम्प्रदाय के वैष्णव थे पीछे हितहरिवंशजी के शिष्य होकर राधाबल्लभी हो गए. इनका समय सन् 1563 ई. के आसपास है.
इनकी रचना परिमाण में भी बहुत विस्तृत है और विषय भेद के विचार से भी अधिकांश कृष्णभक्तों की अपेक्षा व्यापक है. ये श्रीकृष्ण की बाललीला और श्रृंगारलीला में लीन रहने पर भी बीच में संसार पर दृष्टि डाला करते थे. इन्होंने तुलसीदास के समान खलों, पाखंडियों आदि का भी स्मरण किया और रसखान के अतिरिक्त तत्वनिरूपण में भी ये प्रवृत्त हुए हैं.
कृतियाँ
1. रासपंचाध्यायी
 
स्वामी हरिदास
 
ये महात्मा वृंदावन में निंबार्क मतांतर्गत टट्टी संप्रदाय, जिसे सखी संप्रदाय भी कहते है, के संस्थापक थे और अकबर के समय में एक सिद्ध भक्त और संगीत-कला-कोविद माने जाते थे. कविताकाल सन् 1543 से 1560 ई. ठहरता है. प्रसिद्ध गायनाचार्य तानसेन इनका गुरूवत् सम्मान करते थे. यह प्रसिद्ध है कि अकबर बादशाह साधु के वेश में तानसेन के साथ इनका गाना सुनने के लिए गया था. कहते हैं कि तानसेन इनके सामने गाने लगे और उन्होंने जानबूझकर गाने में कुछ भूल कर दी. इसपर स्वामी हरिदास ने उसी गाना को शुद्ध करके गाया. इस युक्ति से अकबर को इनका गाना सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो गया. पीछे अकबर ने बहुत कुछ पूजा चढ़ानी चाही पर इन्होंने स्वीकृन न की.
इनका जन्म समय कुछ ज्ञात नहीं है.
कृतियाँ
1. स्वामी हरिदास जी के पद
2. हरिदास जी की बानी
 
मीराबाई
 
ये मेड़तिया के राठौर रत्नसिंह की पुत्री, राव दूदाजी की पौत्री और जोधपुर के बसानेवाले प्रसिद्ध राव जोधाजी की प्रपौत्री थीं. इनका जन्म सन् 1516 ई. में चोकड़ी नाम के एक गाँव में हुआ था और विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था. ये आरंभ से ही कृष्ण भक्ति में लीन रहा करती थी. विवाह के उपरांत थोड़े दिनों में इनके पति का परलोकवास हो गया. ये प्राय: मंदिर में जाकर उपस्थित भक्तों और संतों के बीच श्रीकृष्ण भगवान् की मूर्ती के सामने आनंदमग्न होकर नाचती और गाती थी. कहते हैं कि इनके इस राजकुलविरूद्ध आचरण से इनके स्वजन लोकनिंदा के भय से रूष्ट रहा करते थे. यहाँ तक कहा जाता है कि इन्हें कई बार विष देने का प्रयत्न किया गया, पर विष का कोई प्रभाव इन पर न हुआ. घरवालों के व्यवहार से खिन्न होकर ये द्वारका और वृंदावन के मंदिरों में घूम-घूमकर भजन सुनाया करती थीं. ऐसा प्रसिद्ध है कि घरवालों से तंग आकर इन्होंने गोस्वामी तुलसीदासजी को यह पद लिखकर भेजा था:
 
स्वस्ति श्री तुलसी कुल भूषन दूषन हरन गोसाईं I
बारहिं बार प्रनाम करहुँ, अब हरहु सोक समुदाई II
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई II
साधु संग अरू भजन करत मोहिं देत कलेस महाई II
मेरे मात पिता के सम हौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई II
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई II
इस पर गोस्वामी जी ने ‘विनयपत्रिका’ का यह पद लिखकर भेजा था :
 
जाके प्रिय न राम बैदेही I
सो नर तजिय कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही II
नाते सबै राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं I
अंजन कहा आँखि जौ फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं II
मीराबाई की मृत्यु द्वारका में सन् 1546 ई. में हो चुकी थी. अत: यह जनश्रुति किसी की कल्पना के आधार पर ही चल पड़ी.
मीराबाई का नाम प्रधान भक्तों में है और इनका गुणगान नाभाजी, ध्रुवदास, व्यास जी, मलूकदास आदि सब भक्तों ने किया है.
कृतियाँ
1. नरसी जी का मायरा
2. गीतगोविंद टीका
3. राग गोविंद
4. राग सोरठ के पद
 
गदाधर भट्ट
 
ये दक्षिणी ब्राह्मण थे. इनके जन्म का समय ठीक से पता नहीं, पर यह बात प्रसिद्ध है कि ये श्री चैतन्य महाप्रभु को भागवत सुनाया करते थे. इनका समर्थन भक्तमाल की इन पंक्तियों से भी होता है:
 
भागवत सुधा बरखै बदन, काहू को नाहिंन दुखद I
गुणनिकर गदाधर भट्ट अति सबहिन को लागै सुखद II
 
संस्कृत के चूडांत पंडित होने के कारण शब्दों पर इनका बहुत विस्तृत अधिकार था. इनका पदविन्यास बहुत ही सुंदर है.
 
हितहरिवंश
 
राधावल्लभी सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोसाईं हितहरिवंश का जन्म सन् 1502 ई. में मथुरा से 4 मील दक्षिण बादगाँव में हुआ था. राधावल्लभी सम्प्रदाय के पंडित गोपालप्रसाद शर्मा ने इनका जन्म सन् 1473 ई. माना है.
इनके पिता को नाम केशवदास मिश्र और माता का नाम तारावती था.
कहते हैं कि हितहरिवंश पहले माध्वानुयायी गोपाल भट्ट के शिष्य थे. पीछे इन्हें स्वप्न में राधिकाजी ने मंत्र दिया और इन्होंने अपना एक अलग संप्रदाय चलाया. अत: हित सम्प्रदाय को माध्व संप्रदाय के अंतर्गत मान सकते हैं. हितहरिवंश के चार पुत्र और एक कन्या हुई. गोसाईं जी ने सन् 1525 ई. में श्री राधावल्लभ जी की मूर्ती वृंदावन में स्थापित की और वहीं विरक्त भाव से रहने लगे. ये संस्कृत के अच्छे विद्वान और भाषा काव्य के अच्छे मर्मज्ञ थे. ब्रजभाषा की रचना इनकी यद्यपि बहुत विस्तृत नहीं है तथापि बड़ी सरस और हृदयग्राहिणी है.
कृतियाँ– 1. राधासुधानिधि   2. हित चौरासी
 
गोविन्दस्वामी
 
ये अंतरी के रहनेवाले सनाढ्य ब्राह्मण थे जो विरक्त की भाँति आकर महावन में रहने लगे थे. पीछे गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के शिष्य हुए जिन्होंने इनके रचे पदों से प्रसन्न होकर इन्हें अष्टछाप में लिया. ये गोवर्धन पर्वत पर रहते थे और उसके पास ही इन्होंने कदंबों का एक अच्छा उपवन लगाया था जो अब तक ‘गोविन्दस्वमी की कदंबखडी’ कहलाता है.
इनका रचनाकाल सन् 1543 और 1568 ई. के भीतर ही माना जा सकता है.
वे कवि होने के अतिरिक्त बड़े पक्के गवैये थे. तानसेन कभी-कभी इनका गाना सुनने के लिए आया करते थे.
 
छीतस्वामी
 
विट्ठलनाथ जी के शिष्य और अष्टछाप के अंतर्गत थे. पहले ये मथुरा के सुसम्पन्न पंडा थे और राजा बीरबल जैसे लोग इनके जजमान थे. पंडा होने के कारण ये पहले बड़े अक्खड़ और उद्दंड थे, पीछे गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा लेकर परम शांत भक्त हो गए और श्रीकृष्ण का गुणानुवाद करने लगे.
इनकी रचनाओं का समय सन् 1555 ई. के इधर मान सकते हैं.
इनके पदों में श्रृंगार के अतिरिक्त ब्रजभूमि के प्रति प्रेमव्यंजना भी अच्छी पाई जाती है.
 
‘हे विधना तोसों अँचरा पसारि माँगौ जनम जनम दीजो याही ब्रज बसिबो’
पद इन्हीं का है.
 
चतुर्भुजदास
 
ये कुंभनदास जी के पुत्र और गोसाईं विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे. ये भी अष्टछाप के कवियों में हैं. इनकी भाषा चलती और सुव्यवस्थित है. इनके बनाए तीन ग्रंथ मिले हैं.
कृतियाँ
1. द्वादशयश    2. भक्तिप्रताप    3. हितजू को मंगल
 
कुंभनदास
 
ये भी अष्टछाप के एक कवि थे और परमानंद जी के ही समकालीन थे. ये पूरे विरक्त और धन, मान, मर्यादा की इच्छा से कोसों दूर थे. एक बार अकबर बादशाह के बुलाने पर इन्हें फतहपुर सीकरी जाना पड़ा जहाँ इनका बड़ा सम्मान हुआ. पर इसका इन्हें बराबर खेद ही रहा, जैसा कि इस पद से व्यंजित होता है:
 
संतन को कहा सीकरी सो काम ?
आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम
जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम
कुंभनदास लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम.
इनका कोई ग्रंथ न तो प्रसिद्ध है और न अब तक मिला है.
 
परमानंद
 
यह वल्लभाचार्य जी के शिष्य और अष्टछाप में थे. सन् 1551 ई. के आसपास वर्तमान थे. इनका निवास स्थान कन्नौज था. इसी से ये कान्यकुब्ज अनुमान किए जाते हैं. अत्यंत तन्मयता के साथ बड़ा ही सरलकविता करते थे. कहते हैं कि इनके किसी एक पद को सुनकर आचार्यजी कई दिनों तक बदन की सुध भूले रहे. इनके फुटकल पद कृष्णभक्तों के मुँह से प्राय: सुनने को आते हैं.
कृतियाँ  —  1. परमानंदसागर
 
कृष्णदास
 
जन्मना शूद्र होते हुए भी वल्लभाचार्य के कृपा-पात्र थे और मंदिर के प्रधान हो गए थे. ‘चौरासी वैष्णवों की वार्ता’ के अनुसार एक बार गोसाईं विट्ठलनाथजी से किसी बात पर अप्रसन्न होकर इन्होंने उनकी ड्योढ़ी बंद कर दी. इस पर गोसाईं के कृपापात्र महाराज बीरबल ने इन्हें कैद कर लिया. पीछे गोसाईं जी इस बात से बड़े दुखी हुए और उनको कारागार से मुक्त कराके प्रधान के पद पर फिर ज्यों का त्यों प्रतिष्ठित कर दिया. इन्होंने भी और सब कृष्ण भक्तों के समान राधाकृष्ण के प्रेम को लेकर श्रृंगार रस के ही पद गाए हैं. ‘जुगलमान चरित’ नामक इनका एक छोटा सा ग्रंथ मिलता है. इसके अतिरिक्त इनके बनाए दो ग्रंथ और कहे जाते हैं-भ्रमरगीत और प्रेमतत्व निरूपण.
इनका कविताकाल सन् 1550 क आगे पीछे माना जाता है.
 
कृतियाँ  —  1. जुगलमान चरित  2. भ्रमरगीत   3. प्रेमतत्व निरूपण
 
श्रीभट्ट
 
ये निंबार्क सम्प्रदाय के प्रसिद्ध विद्वान केशव काश्मीरी के प्रधान शिष्य थे. इनका जन्म सन् 1538 ई. में अनुमान किया जाता है. इनकी कविता सीधी-सादी और चलती भाषा में है. पद भी प्राय: छोटे-छोटे हैं. ऐसा प्रसिद्ध है कि जब ये तन्मय होकर अपने पद गाने लगते थे तब कभी-कभी उस पद के ध्यानानुरूप इन्हें भगवान की झलक प्रत्यक्ष मिल जाती थी.
 
कृतियाँ-1. युगल शतक 2. आदि बानी
 
सूरदास मदनमोहन
 
ये अकबर के समय में संडीले के अमीन थे. ये जो कुछ पास में आता प्राय: साधुओं की सेवा में लगा दिया करते थे. कहते हैं कि एक बार संडीले तहसील की मालगुजारी के कई लाख रूपये सरकारी खजाने में आए थे. इन्होंने सब का सब साधुओं को खिलापिला दिया और शाही खजाने में कंकड़-पत्थरों से भरे संदूक भेज दिए जिनके भीतर कागज के चिट यह लिख कर रख दिए:
तेरह लाख सँडीले आए, सब साधुन मिलि गटके I
सूरदास मदनमोहन आधी रातहिं सटके II
और आधी रात को उठकर कहीं भाग गए. बादशाह ने इनका अपराध क्षमा करके इन्हें फिर बुलाया, पर ये विरक्त होकर वृंदावन में रहने लगे. इनकी कविता इतनी सरस होती थी कि इनके बनाए बहुत से पद सूरसागर में मिल गए. इनकी कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं.
इनका रचनाकाल सन् 1533 ई. और 1543 ई. के बीच अनुमान किया जाता है.
 
 
 
नंददास
 
नंददास 16 वीं शती के अंतिम चरण में विद्यमान थे. इनके विषय में ‘भक्तमाल’ में लिखा है:
 
‘चन्द्रहास-अग्रज सुहृद परम प्रेम में पगे’
इससे इतना ही सूचित होता है कि इनके भाई का नाम चंद्रहास था. ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ के अनुसार ये तुलसीदास के भाई थे, किन्तु अब यह बात प्रामाणिक नहीं मानी जाती. उसी वार्ता में यह भी लिखा है कि द्वारका जाते हुए नंददास सिंधुनद ग्राम में एक रूपवती खत्रानी पर आसक्त हो गए. ये उस स्त्री के घर में चारो ओर चक्कर लगाया करते थे. घरवाले हैरान होकर कुछ दिनों के लिए गोकुल चले गए. वहाँ भी वे जा पहुँचे. अंत में वहीं पर गोसाईं विट्ठलनाथ जी के सदुपदेश से इनका मोह छूटा और ये अनन्य भक्त हो गए. इस कथा में ऐतिहासिक तथ्य केवल इतना ही है कि इन्होंने गोसाईं विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली.
इनके काव्य के विषय में यह उक्ति प्रसिद्ध है:
 
‘और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया’
 
इससे प्रकट होता है कि इनके काव्य का कला-पक्ष महत्त्वपूर्ण है. इनकी रचना बड़ी सरस और मधुर है. इनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक ‘रासपंचाध्यायी’ है जो रोला छंदों में लिखी गई है. इसमें जैसा कि नाम से ही प्रकट है, कृष्ण की रासलीला का अनुप्रासादियुक्त साहित्यिक भाषा में विस्तार के साथ वर्णन है.
 
कृतियाँ
—पद्य रचना
1. रासपंचाध्यायी 2. भागवत दशम स्कंध 3. रूक्मिणीमंगल 4. सिद्धांत पंचाध्यायी 5. रूपमंजरी 6. मानमंजरी 7. विरहमंजरी 8. नामचिंतामणिमाला 9. अनेकार्थनाममाला 10. दानलीला 11. मानलीला 12. अनेकार्थमंजरी 13. ज्ञानमंजरी 14. श्यामसगाई 15. भ्रमरगीत 16. सुदामाचरित्र      *—गद्यरचना 1. हितोपदेश 2. नासिकेतपुराण
 
 
चैतन्य महाप्रभु
 
चैतन्य महाप्रभु भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी। भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया।
 
चैतन्य महाप्रभु का जन्म सन १४८६ की फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (नादिया) नामक उस गांव में हुआ, जिसे अब मायापुर कहा जाता है। यपि बाल्यावस्था में इनका नाम विश्वंभर था, परंतु सभी इन्हें निमाई कहकर पुकारते थे। गौरवर्ण का होने के कारण लोग इन्हें गौरांग, गौर हरि, गौर सुंदर आदि भी कहते थे। चैतन्य महाप्रभु के द्वारा गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की आधारशिला रखी गई। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र व मां का नाम शचि देवी था। निमाई बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। साथ ही, अत्यंत सरल, सुंदर व भावुक भी थे। इनके द्वारा की गई लीलाओं को देखकर हर कोई हतप्रभ हो जाता था। बहुत कम उम्र में ही निमाई न्याय व व्याकरण में पारंगत हो गए थे। इन्होंने कुछ समय तक नादिया में स्कूल स्थापित करके अध्यापन कार्य भी किया। निमाई बाल्यावस्था से ही भगवद्चिंतन में लीन रहकर राम व कृष्ण का स्तुति गान करने लगे थे। १५-१६ वर्ष की अवस्था में इनका विवाह लक्ष्मीप्रिया के साथ हुआ। सन १५०५ में सर्प दंश से पत्नी की मृत्यु हो गई। वंश चलाने की विवशता के कारण इनका दूसरा विवाह नवद्वीप के राजपंडित सनातन की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ हुआ। जब ये किशोरावस्था में थे, तभी इनके पिता का निधन हो गया।
 
सन १५०९ में जब ये अपने पिता का श्राद्ध करने गया गए, तब वहां इनकी मुलाकात ईश्वरपुरी नामक संत से हुई। उन्होंने निमाई से कृष्ण-कृष्ण रटने को कहा। तभी से इनका सारा जीवन बदल गया और ये हर समय भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगे। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति इनकी अनन्य निष्ठा व विश्वास के कारण इनके असंख्य अनुयायी हो गए। सर्वप्रथम नित्यानंद प्रभु व अद्वैताचार्य महाराज इनके शिष्य बने। इन दोनों ने निमाई के भक्ति आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की। निमाई ने अपने इन दोनों शिष्यों के सहयोग से ढोलक, मृदंग, झाँझ, मंजीरे आदि वाद्य यंत्र बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गाकर हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया। ‘हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे` नामक अठारह शब्दीय कीर्तन महामंत्र निमाई की ही देन है। जब ये कीर्तन करते थे, तो लगता था मानो ईश्वर का आह्वान कर रहे हैं। सन १५१० में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद निमाई का नाम कृष्ण चैतन्य देव हो गया। बाद में ये चैतन्य महाप्रभु के नाम से प्रख्यात हुए।
 
चैतन्य महाप्रभु संन्यास लेने के बाद नीलांचल चले गए। इसके बाद दक्षिण भारत के श्री रंग क्षेत्र व सेतु बंध आदि स्थानों पर भी रहे। इन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। सन १५१५ में वृंदावन आए। यहां इन्होंने इमली तला और अकूर घाट पर निवास किया। वृंदावन में रहकर इन्होंने प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति भावना को जागृत किया। यहां से फिर ये प्रयाग चले गए। इन्होंने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि स्थानों पर रहकर भगवद्नाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार किया। चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में रहकर बिताए। यहीं पर सन १५३३ में ४७ वर्ष की अल्पायु में रथयात्रा के दिन उनका देहांत हो गया।
 
चैतन्य महाप्रभु ने लोगों की असीम लोकप्रियता और स्नेह प्राप्त किया कहते हैं कि उनकी अद्भुत भगवद्भक्ति देखकर जगन्नाथ पुरी के राजा तक उनके श्रीचरणों में नत हो जाते थे। बंगाल के एक शासक के मंत्री रूपगोस्वामी तो मंत्री पद त्यागकर चैतन्य महाप्रभु के शरणागत हो गए थे। उन्होंने कुष्ठ रोगियों व दलितों आदि को अपने गले लगाकर उनकी अनन्य सेवा की। वे सदैव हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देते रहे। साथ ही, उन्होंने लोगों को पारस्परिक सद्भावना जागृत करने की प्रेरणा दी। वस्तुत: उन्होंने जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर समाज को मानवता के सूत्र में पिरोया और भक्ति का अमृत पिलाया। वे गौडीय संप्रदाय के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। उनके द्वारा कई ग्रंथ भी रचे गए। उन्होंने संस्कृत भाषा में भी तमाम रचनाएं की। उनका मार्ग प्रेम व भक्ति का था। वे नारद जी की भक्ति से अत्यंत प्रभावित थे, क्योंकि नारद जी सदैव ‘नारायण-नारायण` जपते रहते थे। उन्होंने विश्व मानव को एक सूत्र में पिरोते हुए यह समझाया कि ईश्वर एक है। उन्होंने लोगों को यह मुक्ति सूत्र भी दिया-‘कृष्ण केशव, कृष्ण केशव, कृष्ण केशव, पाहियाम। राम राघव, राम राघव, राम राघव, रक्षयाम।` हिंदू धर्म में नाम जप को ही वैष्णव धर्म माना गया है और भगवान श्रीकृष्ण को प्रधानता दी गई है। चैतन्य ने इन्हीं की उपासना की और नवद्वीप से अपने छह प्रमुख अनुयायियों (षड गोस्वामियों), गोपाल भट्ट गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, रूप गोस्वामी, जीव गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी को वृंदावन भेजकर वहां गोविंददेव मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, मदन मोहन मंदिर, राधा रमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, राधा श्यामसुंदर मंदिर और गोकुलानंद मंदिर नामक सप्त देवालयों की आधारशिला रखवाई। लोग चैतन्य को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं।

 

मलिक मुहम्मद जायसी, मलिक वंश के थे। मिस्त्र में मलिक सेनापति और प्रधानमंत्री को कहते थे। खिलजी राज्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चचा को मारने के लिए बहुत से मलिकों को नियुक्त किया था। इस कारण यह नाम इस काल में काफी प्रचलित हो गया। इरान में मलिक जमींदार को कहते हैं। मलिक जी के पूर्वज निगलाम देश इरान से आये थे और वहीं से उनके पूर्वजों की पदवी मलिक थी। मलिक मुहम्मद जायसी के वंशज अशरफी खानदान के चेले थे और मलिक कहलाते थे। तारीख फीरोजशाही में है कि बारह हजार रिसालदार को मलिक कहा जाता था।मलिक मूलतः अरबी भाषा का शब्द है। अरबी में इसके अर्थ स्वामी, राजा, सरदार आदि होते हैं। मलिक का फारसी में अर्थ होता है – “अमीर और बड़ा व्यापारी’। जायसी का पूरा नाम मलिक मुहम्मद जायसी था। मलिक इनका पूर्वजों से चला आया “सरनामा’ है। मलिक सरनामा से स्पष्ट होता है कि उनके पूर्वज अरब थे। मलिक के माता- पिता जापान के कचाने मुहल्ले में रहते थे। इनके पिता का नाम मलिक शेख ममरेज था, जिनको लोग मलिक राजे अशरफ भी कहा करते थे। इनकी माँ मनिकपुर के शेख अलहदाद की पुत्री थी।
 
मलिक का जन्म :-
 
मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म ९०० हिजरी ( सन् १४९२ के लगभग ) हुआ माना जाता है। जैसा कि उन्होंने खुद ही कहा है :-
 
या अवतार मोर नव सदी।
तीस बरस उपर कवि बदी।।
 
कवि की दूसरी पंक्ति का अर्थ यह है कि वे जन्म से तीस वर्ष पीछे अच्छी कविता कहने लगे। जायसी अपने प्रमुख एवं प्रसिद्ध ग्रंथ पद्मावत के निर्माण- काल के संबंध में कहा है :-
 
सन नव सै सत्ताइस अहा।
कथा आरंभ बैन कवि कहा।।
 
इसका अर्थ यह है कि “पदमावत’ की कथा के प्रारंभिक वचन कवि ने सन ९२७ हिजरी ( सन् १५२० ई. के लगभग ) में कहा था। ग्रंथ प्रारंभ में कवि ने “”शाहे वक्त” शेरशाह की प्रशंसा की है, जिसके शासनकाल का आरंभ ९४७ हिजरी अर्थात सन् १५४० ई. से हुआ था। उपर्युक्त बात से यही पता चलता है कि कवि ने कुछ थोड़े से पद्य १५४० ई. में बनाए थे, परंतु इस ग्रंथ को शेरशाह के १९ या २० वर्ष पीछे समय में पूरा किया होगा।
 
 जायसी का जन्म स्थान :-
 
जायसी ने पद्मावत की रचना जायस में की –
 
जाएस नगर धरम् अस्थान।
तहवां यह कबि कीन्ह बखानू।।
 
जायसी के जन्म स्थान के विषय में मतभेद है कि जायस ही उनका जन्म स्थान था या वह कहीं और से आकर जायस में बस गए थे। जायसी ने स्वयं ही कहा है :-
 
जायस नगर मोर अस्थानू।
नगर का नवां आदि उदयानू।।
तहां देवस दस पहुँचे आएउं।ं।।
या बेराग बहुत सुख पाय
 
जायस वालों और स्वयं जायसी के कथानुसार वह जायस के ही रहने वाले थे। पं. सूर्यकांत शास्री ने लिखा है कि उनका जन्म जायस शहर के “कंचाना मुहल्लां’ में हुआ था। कई विद्वानों ने कहा है कि जायसी गाजीपुर में पैदा हुए थे। मानिकपुर में अपने ननिहाल में जाकर रुके थे।
 
डा. वासदेव अग्रवाल के कथन व शोध के अनुसार :-
 
जायसी ने लिखा है कि जायस नगर में मेरा जन्म स्थान है। मैं वहाँ दस दिनों के लिए पाहुने के रुप में पहुँचा था, पर वहीं मुझे वैराग्य हो गया और सुख मिला।
 
इस प्रकार स्पष्ट है कि जायसी का जन्म जायस में नहीं हुआ था, बल्कि वह उनका धर्म-स्थान था और वह वहीं कहीं से आकर रहने लगे थे।

 


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