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Archive for the ‘4 आधुनिक काल’ Category

धुल-धुलकर धूमिल हो जाने वाले पुराने काले लहँगे को एक विचित्र प्रकार से खोंसे, फटी मटमैली ओढ़नी को कई फेंट देकर कमर मे लपेटे और दाहिने हाथ मे एक बड़ा सा हँसिया सँभाले लछमा, नीचे पड़ी घास पत्तियों के ढेर पर कूदकर खिलखिला उठी। कुछ पहाड़ी और कुछ हिन्दी की खिचड़ी में उसने कहा- ‘ हमारे लिये क्या डरते हो! हम क्या तुम्हारे जैसे आदमी है! हम तो है जानवर! देखो हमारे हाथ पाँव देखो हमारे काम! ‘ मुक्त हँसी से भरी पहाड़ी युवती, न जाने क्यो मुझे इतनी भली लगती है।

धूप से झुलसा हुआ मुख ऐसा जान पड़ता है जैसे किसी ने कच्चे सेब को आग की आंच पर पका लिया हो। सूखी-सूखी पलकों में तरल तरल आँखें ऐसी लगती है, मानो नीचे आँसूओं के अथाह जल में तैर रही हों और ऊपर हँसी की धूप से सूख गयी हों।

शीत सहते सहते ओठों पर फ़ैली नीलिमा, सम दांतों की सफेदी से और भी स्पष्ट हो जाती है। रात दिन कठिन पत्थरों पर दौड़ते-दौड़ते पैरो मे और घास काटते-काटते और लकड़ी तोड़ते-तोड़ते हाथों में कठिनता आ गई है, उसे मिट्टी की आर्द्रता ही कुछ कोमल कर देती है।

एक ऊँचे टीले पर लछमा का पहाड़ के पड़े छाले जैसा छोटा घास-फ़ूस का घर है।

बाप की आंखें खराब है, माँ का हाथ टूट गया है, और भतीजी-भतीजे की माता परलोकवासिनी और पिता विरक्त हो चुका है। सारांश यह है कि लछमा के अतिरिक्त और कोई व्यक्ति इतना स्वस्थ नहीं, जो इन प्राणियों की जीविका की चिन्ता कर सके। और इस निर्जन में लछमा कौन सा काम करके इतने व्यक्तियों को जीवित रखे, यह समस्या कभी हल नही हो पाती। अच्छे दिनों की स्मॄति के समान एक भैंस है। लछमा उसके लिये घास और पत्तियां लाती हैं। दूध दूहती, दही जमाती और मट्ठा बिलोती है। गर्मियों मे झोपड़े के आसपास कुछ आलू भी बो लेती है; पर इससे अन्न का अभाव तो दूर नहीं होता! वस्त्र की समस्या तो नही सुलझती!

–लछमा की जीवन-गाथा उसके आँसूओं में भीग-भीगकर अब इतनी भारी हो चुकी है कि कोई अथक कथावाचक और अचल श्रोता भी उसका भार वहन करने को प्रस्तुत नहीं।

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गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई – दो बक्स¸ डोलची¸ बालटी ;   “यह डिब्बा कैसा है¸ गनेशी ” उन्होंने पूछा। 
गनेशी बिस्तर बांधता हुआ¸ कुछ गर्व¸ कुछ दु:ख¸कुछ लज्जासे बोला¸” घरवाली ने साथ को कुछ बेसन के लड्‌डू रख दिये हैं। 
कहा¸ बाबूजी को पसन्द थे¸ अब कहां हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएंगे।”  घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित¸ स्नेह¸ आदरमय¸ सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था।
“कभी–कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।” गनेशी बिस्तर में रस्सी बांधते हुआ बोला।
“कभी कुछ जरूरत हो तो लिखना गनेशी! इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।”
गनेशी ने अंगोछे के छोर से आंखे पोछी¸ “अब आप लोग सहारा न देंगे तो कौन देगा! आप यहां रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।”
गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे।  रेल्वे क्वार्टर का वह कमरा¸ जिसमें उन्होंने कितने वर्ष बिताए थे¸ उनका सामान हट जाने से कुरूप और नग्न लग रहा था।  आंगन में रोपे पौधे भी जान पहचान के लोग ले गए थे और जगह–जगह मिट्टी बिखरी हुई थी।  पर पत्नी¸ बाल–बच्चों के साथ रहने की कल्पना में यह बिछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठ कर विलीन हो गया।
गजाधर बाबू खुश थे¸ बहुत खुश।  पैंतीस साल की नोकरी के बाद वह रिटायर हो कर जा रहे थे।  इन वर्षों में अधिकांश समय उन्होंने अकेले रह कर काटा था।  उन अकेले क्षणों में उन्होंने इसी समय की कल्पना की थी¸ जब वह अपने परिवार के साथ रह सकेंगे।  इसी आशा के सहारे वह अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे।  संसार की दृष्टि से उनका जीवन सफल कहा जा सकता था।  उन्होंंने शहर में एक मकान बनवा लिया था¸ बड़े लड़के अमर और लडकी कान्ति की शादियां कर दी थीं¸ दो बच्चे ऊंची कक्षाओं में पढ़ रहे थे।  गजाधर बाबू नौकरी के कारण प्राय: छोटे स्टेशनों पर रहे और उनके बच्चे तथा पत्नी शहर में¸ जिससे पढ़ाई में बाधा न हो।  गजाधर बाबू स्वभाव से बहुत स्नेही व्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षी भी।  जब परिवार साथ था¸ डयूटी से लौट कर बच्चों से हंसते–खेलते¸ पत्नी से कुछ मनोविनोद करते – उन सबके चले जाने से उनके जीवन में गहन सूनापन भर उठा।  खाली क्षणों में उनसे घरमें टिका न जाता।

कवि प्रकृति के न होने पर भी उन्हें पत्नी की स्नेहपूर्ण बातें याद आती रहतीं।  दोपहर में गर्मी होने पर भी दो बजे तक आग जलाए रहती और मना करने पर भी थोड़ासा कुछ और थाली में परोस देती और बड़े प्यार से आग्रह करती।  जब वह थके–हारे बाहर से आते¸ तो उनकी आहट पा वह रसोई के द्वार पर निकल आती और उनकी सलज्ज आंखे मुस्करा उठतीं।  गजाधर बाबू को तब हर छोटी बात भी याद आती और उदास हो उठते।  अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था जब वह फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे।
टोपी उतार कर गजाधर बाबू ने चारपाई पर रख दी¸ जूते खोल कर नीचे खिसका दिए¸ अन्दर से रह–रह कर कहकहों की आवाज़ आ रही थी¸ इतवार का दिन था और उनके सब बच्चे इकठ्ठे हो कर नाश्ता कर रहे थे।  गजाधर बाबू के सूखे होठों पर स्निग्ध मुस्कान आ गई¸ उसी तरह मुस्कुराते हुए वह बिना खांसे अन्दर चले आये।  उन्होंने देखा कि नरेन्द्र कमर पर हाथ रखे शायद रात की फिल्म में देखे गए किसी नृत्य की नकल कर रहा था और बसन्ती हंस–हंस कर दुहरी हो रही थी।  अमर की बहू को अपने तन–बदन¸ आंचल या घूंघट का कोई होश न था और वह उन्मुक्त रूप से हंस रही थी।  गजाधर बाबू को देखते ही नरेंद्र धप–से बैठ गया और चाय का प्याला उठा कर मुंह से लगा लिया।  बहू को होश आया और उसने झट से माथा ढक लिया¸ केवल बसन्ती का शरीर रह–रह कर हंसी दबाने के प्रयत्न में हिलता रहा।
गजाधर बाबू ने मुस्कराते हुए उन लोगों को देखा।  फिर कहा¸ “क्यों नरेन्द्र¸ क्या नकल हो रही थी ”
“कुछ नहीं बाबूजी।” नरेन्द्रने सिर फिराकर कहा।  गजाधर बाबू ने चाहा था कि वह भी इस मनो–विनोद में भाग लेते¸ पर उनके आते ही जैसे सब कुण्ठित हो चुप हो गए¸ उसे उनके मनमें थोड़ी–सी खिन्नता उपज आई। 
बैठते हुए बोले¸ “बसन्ती¸ चाय मुझे भी देना।  तुम्हारी अम्मां की पूजा अभी चल रही है क्या”
बसन्ती ने मां की कोठरी की ओर देखा¸ ” अभी आती ही होंगी” और प्याले में उनके लिए चाय छानने लगी। 
बहू चुपचाप पहले ही चली गई थी¸ अब नरेन्द्र भी चाय का आखिरी घूंट पी कर उठ खड़ा हुआ।  केवल बसन्ती पिता के लिहाज में¸ चौके में बैठी मां की राह देखने लगी। 
गजाधर बाबू ने एक घूंट चाय पी¸ फिर कहा¸ “बिट्टी – चाय तो फीकी है।”
    “लाइए¸ चीनी और डाल दूं।” बसन्ती बोली।
    “रहने दो¸ तुम्हारी अम्मा जब आयेगी¸ तभी पी लूंगा।”
थोड़ी देर में उनकी पत्नी हाथ में अर्घ्य का लोटा लिये निकली और असुध्द स्तुति कहते हुए तुलसी कों डाल दिया।  उन्हें देखते ही बसन्ती भी उठ गई।  पत्नी ने आकर गजाधर बाबू को देखा और कहा¸ “अरे आप अकेले बैंठें हैं – ये सब कहां गये”  गजाधर बाबू के मन में फांस–सी करक उठी¸ “अपने–अपने काम में लग गए हैं – आखिर बच्चे ही हैं।”
पत्नी आकर चौके में बैठ गई; उन्होनें नाक–भौं चढ़ाकर चारों ओर जूठे बर्तनों को देखा। फिर कहा¸ “सारे में जूठे बर्तन पडे. हैं।  इस घर में धरम–करम कुछ है नहीं।  पूजा करके सीधे चौंके में घुसो।” 
फिर उन्होंने नौकर को पुकारा¸ जब उत्तर न मिला तो एक बार और उच्च स्वर में फिर पति की ओर देख कर बोलीं¸ “बहू ने भेजा होगा बाज़ार।”  और एक लम्बी सांस ले कर चुप हो रहीं।
गजाधर बाबू बैठ कर चाय और नाश्ते का इन्तजार करते रहे।  उन्हें अचानक गनेशी की याद आ गई।  रोज सुबह¸ पॅसेंजर आने से पहले यह गरम–गरम पूरियां और जलेबियां और चाय लाकर रख देता था।  चाय भी कितनी बढ़िया¸ कांच के गिलास में उपर तक भरी लबालब¸ पूरे ढ़ाई चम्मच चीनी और गाढ़ी मलाई।  पैसेंजर भले ही रानीपुर लेट पहुंचे¸ गनेशी ने चाय पहुंचाने में कभी देर नहीं की।  क्या मज़ाल कि कभी उससे कुछ कहना पड़े।
पत्नी का शिकायत भरा स्वर सुन उनके विचारों में व्याघात पहुंचा।  वह कह रही थी¸ “सारा दिन इसी खिच–खिच में निकल जाता है।  इस गृहस्थी का धन्धा पीटते–पीटते उमर बीत गई। कोई जरा हाथ भी नहीं बटाता।”
       “बहू क्या किया करती हैं” गजाधर बाबू ने पूछा।
       “पड़ी रहती है।  बसन्ती को तो¸ फिर कहो कि कॉलेज जाना होता हैं।”
गजाधर बाबू ने जोश में आकर बसन्ती को आवाज दी।  बसन्ती भाभी के कमरे से निकली तो गजाधर बाबू ने कहा¸ “बसन्ती¸ आज से शाम का खाना बनाने की जिम्मेदारी तुम पर है।
सुबह का भोजन तुम्हारी भाभी बनायेगी।” बसन्ती मुंह लटका कर बोली¸ “बाबूजी¸ पढ़ना भी तो होता है।”
गजाधर बाबू ने प्यार से समझाया¸ “तुम सुबह पढ़ लिया करो।  तुम्हारी मां बूढ़ी हुई¸ अब वह शक्ति नहीं बची हैं।  तुम हो¸ तुम्हारी भाभी हैं¸ दोनों को मिलकर काम में हाथ बंटाना चाहिए।”
बसन्ती चुप रह गई।  उसके जाने के बाद उसकी मां ने धीरे से कहा¸ “पढ़ने का तो बहाना है।  कभी जी ही नहीं लगता¸ लगे कैसे  शीला से ही फुरसत नहीं¸ बड़े बड़े लड़के है उस घर में¸हर वक्त वहां घुसा रहना मुझे नहीं सुहाता।  मना करू तो सुनती नहीं।”
नाश्ता कर गजाधर बाबू बैठक में चले गए।  घर लौटा था और एैसी व्यवस्था हो चुकी थी कि उसमें गजाधर बाबू के रहने के लिए कोई स्थान न बचा था। जैसे किसी मेहमान के लिए कुछ अस्थायी प्रबन्ध कर दिया जाता है¸ उसी प्रकार बैठक में कुरसियों को दीवार से सटाकर बीच में गजाधर बाबू के लिए पतली–सी चारपाई डाल दी गई थी।  गजाधर बाबू उस कमरे में पड़े पड़े कभी–कभी अनायास ही इस अस्थायित्व का अनुभव करने लगते।  उन्हें याद आती उन रेलगाडियों की जो आती और थोड़ी देर रूक कर किसी और लक्ष की ओर चली जाती।
घर छोटा होने के कारण बैठक में ही अब अपना प्रबन्ध किया था।  उनकी पत्नी के पास अन्दर एक छोटा कमरा अवश्य था¸ पर वह एक ओर अचारों के मर्तबान¸ दाल¸ चावल के कनस्तर और घी के डिब्बों से घिरा था; दूसरी ओर पुरानी रजाइयां¸ दरियों में लिपटी और रस्सी से बांध रखी थी; उनके पास एक बड़े से टीन के बक्स में घर–भर के गरम कपड़े थे।  बींच में एक अलगनी बंधी हुई थी¸ जिस पर प्राय: बसन्ती के कपड़े लापरवाही से पड़े रहते थे।  वह भरसक उस कमरे में नहीं जाते थे।  घर का दूसरा कमरा अमर और उसकी बहू के पास था¸ तीसरा कमरा¸ जो सामने की ओर था।  गजाधर बाबू के आने से पहले उसमें अमर के ससुराल से आया बेंत का तीन कुरसियों का सेट पड़ा था¸ कुरसियों पर नीली गद्दियां और बहू के हाथों के कढ़े कुशन थे।
जब कभी उनकी पत्नी को कोई लम्बी शिकायता करनी होती¸ तो अपनी चटाई बैढ़क में डाल पड़ जाती थीं।  वह एक दिन चटाई ले कर आ गई।  गजाधर बाबू ने घर–गृहस्धी की बातें छेड़ी;वह घर का रवय्या देख रहे थे।  बहुत हलके से उन्होंने कहा कि अब हाथ में पैसा कम रहेगा¸ कुछ खर्चा कम करना चाहिए।   
“सभी खर्च तो वाजिब–वाजिब है¸ न मन का पहना¸ न ओढ़ा।”
गजाधर बाबू ने आहत¸ विस्मित दृष्टि से पत्नी को देखा।  उनसे अपनी हैसियत छिपी न थी।  उनकी पत्नी तंगी का अनुभव कर उसका उल्लेख करतीं।  यह स्वाभाविक था¸ लेकिन उनमें सहानुभूति का पूर्ण अभाव गजाधर बाबू को बहुत खतका।  उनसे य्दि राय–बात की जाती कि प्रबन्ध कैसे हो¸ तो उनहें चिन्ता कम¸ संतोष अधिक होता लेकिन उनसे तो केवल शिकायत की जाती थी¸ जैसे परिवार की सब परेशानियों के लिए वही जिम्मेदार थे।
“तुम्हे कमी किस बात की है अमर की मां – घर में बहू है¸ लड़के–बच्चे हैं¸ सिर्फ रूपये से ही आदमी अमीर नहीं होता।”  गजाधर बाबू ने कहा और कहने के साथ ही अनुभव किया। यह उनकी आन्तरिक अभिव्यक्ति थी – ऐसी कि उनकी पत्नी नहीं समझ सकती।
“हां¸ बड़ा सुख है न बहू से।  आज रसोई करने गई है¸ देखो क्या होता हैं” कहकार पत्नी ने आंखे मूंदी और सो गई।  गजाधर बाबू बैठे हुए पत्नी को देखते रह गए।  यही थी क्या उनकी पत्नी¸ जिसके हाथों के कोमल स्पर्श¸ जिसकी मुस्कान की याद में उन्होंने सम्पूर्ण जीवन काट दिया था  उन्हें लगा कि वह लावण्यमयी युवती जीवन की राह में कहीं खो गई और उसकी जगह आज जो स्त्री है¸ वह उनके मन और प्राणों के लिए नितान्त अपरिचिता है।  गाढ़ी नींद में डूबी उनकी पत्नी का भारी शरीर बहुत बेडौल और कुरूप लग रहा था¸ श्रीहीन और रूखा था। गजाधर बाबू देर तक निस्वंग दृष्टि से पत्नी को देखते रहें और फिर लेट कर छत की ओर ताकने लगे।
अन्दर कुछ गिरा दिया शायद¸ ”  और वह अन्दर भागी।  थोड़ी देर में लौट कर आई तो उनका मूंह फूला हुआ था।  “देखा बहू को¸ चौका खुला छोड़ आई¸ बिल्ली ने दाल की पतीली गिरा दी।  सभी खाने को है¸ अब क्या खिलाऊंगी”  वह सांस लेने को रूकी और बोली¸ “एक तरकारी और चार पराठे बनाने में सारा डिब्बा घी उंडेल रख दिया। जरा सा दर्द नहीं हैं¸कमानेवाला हाड़ तोडे. और यहां चीजे. लुटें।  मुझे तो मालूम था कि यह सब काम किसी के बस का नहीं हैं।” गजाधर बाबू को लगा कि पत्नी कुछ और बोलेंगी तो उनके कान झनझना उठेंगे। ओंठ भींच करवट ले कर उन्होंने पत्नी की ओर पीठ कर ली।
रात का भोजन बसन्ती ने जान बूझ कर ऐसा बनाया था कि कौर तक निगला न जा सके।  गजाधर बाबू चुपचाप खा कर उठ गये पर नरेन्द्र थाली सरका कर उठ खड़ा हुआ और बोला¸ “मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता।”
बसन्ती तुनककर बोली¸ “तो न खाओ¸ कौन तुम्हारी खुशामद कर रहा है।”
 “तुमसे खाना बनाने को किसने कहा था”  नरेंद्र चिल्लाया।
 “बाबूजी नें”
 “बाबू जी को बैठे बैठे यही सूझता है।”
बसन्ती को उठा कर मां ने नरेंद्र को मनाया और अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाया।  गजाधर बाबू ने बाद में पत्नी से कहा¸ “इतनी बड़ी लड़की हो गई और उसे खाना बनाने तक का सहूर नहीं आया।”
“अरे आता सब कुछ है¸ करना नहीं चाहती।”  पत्नी ने उत्तर दिया।  अगली शाम मां को रसोई में देख कपड़े बदल कर बसन्ती बाहर आई तो बैठक में गजाधर बाबू ने टोंक दिया¸ ” कहां जा रही हो”
“पड़ोस में शीला के घर।”  बसन्ती ने कहा।
“कोई जरूरत नहीं हैं¸ अन्दर जा कर पढ़ो।”  गजाधर बाबू ने कड़े स्वर में कहा।  कुछ देर अनिश्चित खड़े रह कर बसन्ती अन्दर चली गई।  गजाधर बाबू शाम को रोज टहलने चले जाते थे¸
लौट कर आये तो पत्नी ने कहा¸ “क्या कह दिया बसन्ती से  शाम से मुंह लपेटे पड़ी है।  खाना भी नहीं खाया।”
गजाधर बाबू खिन्न हो आए।  पत्नी की बात का उन्होंने उत्तर नहीं दिया।  उन्होंने मन में निश्चय कर लिया कि बसन्ती की शादी जल्दी ही कर देनी है।  उस दिन के बाद बसन्ती पिता से बची–बची रहने लगी।  जाना हो तो पिछवाड़े से जाती।  गजाधर बाबू ने दो–एक बार पत्नी से पूछा तो उत्तर मिला¸ “रूठी हुई हैं।”  गजाधर बाबू को और रोष हुआ।  लड़की के इतने मिज़ाज¸ जाने को रोक दिया तो पिता से बोलेगी नहीं।  फिर उनकी पत्नी ने ही सूचना दी कि अमर अलग होने की सोच रहा हैं।
“क्यों”  गजाधर बाबू ने चकित हो कर पूछा।
पत्नी ने साफ–साफ उत्तर नहीं दिया।  अमर और उसकी बहू की शिकायतें बहुत थी।  उनका कहना था कि गजाधर बाबू हमेशा बैठक में ही पड़े रहते हैं¸ कोई आने–जानेवाला हो तो कहीं बिठाने की जगह नहीं।  अमर को अब भी वह छोटा सा समझते थे और मौके–बेमौके टोक देते थे।  बहू को काम करना पड़ता था और सास जब–तब फूहड़पन पर ताने देती रहती थीं।
“हमारे आने के पहले भी कभी ऐसी बात हुई थी”  गजाधर बाबू ने पूछा।
पत्नी ने सिर हिलाकर जताया कि नहीं¸ पहले अमर घर का मालिक बन कर रहता था¸ बहू को कोई रोक–टोक न थी¸ अमर के दोस्तों का प्राय: यहीं अड्‌डा जमा रहता था और अन्दर से चाय नाश्ता तैयार हो कर जाता था।  बसन्ती को भी वही अच्छा लगता था।
गजाधर बाबू ने बहुत धीरे से कहा¸ “अमर से कहो¸ जल्दबाज़ी की कोई जरूरत नहीं हैं।”
अगले दिन सुबह घूम कर लौटे तो उन्होंने पाया कि बैठक में उनकी चारपाई नहीं हैं।  अन्दर आकर पूछने वाले ही थे कि उनकी दृष्टि रसोई के अन्दर बैठी पत्नी पर पड़ी।  उन्होंने यह कहने को मुंह खोला कि बहू कहां है; पर कुछ याद कर चुप हो गए।  पत्नी की कोठरी में झांका तो अचार¸ रजाइयों और कनस्तरों के मध्य अपनी चारपाई लगी पाई।  गजाधर बाबू ने कोट उतारा और कहीं टांगने के लिए दीवार पर नज़र दौड़ाई।  फिर उसपर मोड़ कर अलगनी के कुछ कपड़े खिसका कर एक किनारे टांग दिया।  कुछ खाए बिना ही अपनी चारपाई पर लेट गए।  कुछ भी हो¸ तन आखिरकार बूढ़ा ही था।  सुबह शाम कुछ दूर टहलने अवश्य चले जाते¸ पर आते आते थक उठते थे।  गजाधर बाबू को अपना बड़ा सा¸ खुला हुआ क्वार्टर याद आ गया।

निश्चित जीवन – सुबह पॅसेंजर ट्रेन आने पर स्टेशन पर की चहल–पहल¸ चिर–परिचित चेहरे और पटरी पर रेल के पहियों की खट्‌–खट्‌ जो उनके लिए मधुर संगीत की तरह था।  तूफान और डाक गाडी के इंजिनों की चिंघाड उनकी अकेली रातों की साथी थी।  सेठ रामजीमल की मिल के कुछ लोग कभी कभी पास आ बैठते¸ वह उनका दायरा था¸ वही उनके साथी।  वह जीवन अब उन्हें खोई विधि–सा प्रतीत हुआ।  उन्हें लगा कि वह जिन्दगी द्वारा ठगे गए हैं।  उन्होंने जो कुछ चाहा उसमें से उन्हें एक बूंद भी न मिली।
लेटे  हुए वह घर के अन्दर से आते विविध स्वरों को सुनते रहे।  बहू और सास की छोटी–सी झड़प¸ बाल्टी पर खुले नल की आवाज¸ रसोई के बर्तनों की खटपट और उसी में गौरैयों का वार्तालाप – और अचानक ही उन्होंने निश्चय कर लिया कि अब घर की किसी बात में दखल न देंगे।  यदि गृहस्वामी के लिए पूरे घर में एक चारपाई की जगह यहीं हैं¸ तो यहीं पड़े रहेंगे।
अगर कहीं और डाल दी गई तो वहां चले जाएंगे।
यदि बच्चों के जीवन में उनके लिए कहीं स्थान नहीं¸ तो अपने ही घर में परदेसी की तरह पड़े रहेंगे।  और उस दिन के बाद सचमुच गजाधर बाबू कुछ नहीं बोले।  नरेंद्र मांगने आया तो उसे बिना कारण पूछे रूपये दे दिये बसन्ती काफी अंधेरा हो जाने के बाद भी पड़ोस में रही तो भी उन्होंने कुछ नहीं कहा – पर उन्हें सबसे बड़ा ग़म यह था कि उनकी पत्नी ने भी उनमें कुछ परिवर्तन लक्ष्य नहीं किया।  वह मन ही मन कितना भार ढो रहे हैं¸ इससे वह अनजान बनी रहीं।  बल्कि उन्हें पति के घर के मामले में हस्तक्षेप न करने के कारण शान्ति ही थी।
कभी–कभी कह भी उठती¸ “ठीक ही हैं¸ आप बीच में न पड़ा कीजिए¸ बच्चे बड़े हो गए हैं¸ हमारा जो कर्तव्य था¸ कर रहें हैं।  पढ़ा रहें हैं¸ शादी कर देंगे।”
गजाधर बाबू ने आहत दृष्टि से पत्नी को देखा।  उन्होंने अनुभव किया कि वह पत्नी व बच्चों के लिए केवल धनोपार्जन के निमित्तमात्र हैं।
जिस व्यक्ति के अस्तित्व से पत्नी मांग में सिन्दूर डालने की अधिकारी हैं¸ समाज में उसकी प्रतिष्ठा है¸ उसके सामने वह दो वक्त का भोजन की थाली रख देने से सारे कर्तव्यों से छुट्टी पा जाती हैं।  वह घी और चीनी के डब्बों में इतना रमी हुई हैं कि अब वही उनकी सम्पूर्ण दुनिया बन गई हैं।  गजाधर बाबू उनके जीवन के केंद्र नहीं हो सकते¸ उन्हें तो अब बेटी की शादी के लिए भी उत्साह बुझ गया।  किसी बात में हस्तक्षेप न करने के निश्चय के बाद भी उनका अस्तित्व उस वातावरण का एक भाग न बन सका।  उनकी उपस्थिति उस घर में ऐसी असंगत लगने लगी थी¸ जैसे सजी हुई बैठक में उनकी चारपाई थी।  उनकी सारी खुशी एक गहरी उदासीनता में डूब गई।
इतने सब निश्चयों के बावजूद भी गजाधर बाबू एक दिन बीच में दखल दे बैठे।  पत्नी स्वभावानुसार नौकर की शिकायत कर रही थी¸ “कितना कामचोर है¸ बाज़ार की हर चीज में पैसा बनाता है¸ खाना खाने बैठता है तो खाता ही चला जाता हैं।  “गजाधर बाबू को बराबर यह महसूस होता रहता था कि उनके रहन सहन और खर्च उनकी हैसियत से कहीं ज्यादा हैं।  पत्नी की बात सुन कर लगा कि नौकर का खर्च बिलकुल बेकार हैं।  छोटा–मोटा काम हैं¸ घर में तीन मर्द हैं¸ कोई–न–कोई कर ही देगा।  उन्होंने उसी दिन नौकर का हिसाब कर दिया।  अमर दफ्तर से आया तो नौकर को पुकारने लगा। 
अमर की बहू बोली¸ “बाबूजी ने नौकर छुड़ा दिया हैं।”
          “क्यों”
        “कहते हैं¸ खर्च बहुत है।”
यह वार्तालाप बहुत सीधा–सा था¸ पर जिस टोन में बहू बोली¸ गजाधर बाबू को खटक गया।  उस दिन जी भारी होने के कारण गजाधर बाबू टहलने नहीं गये थे।  आलस्य में उठ कर बत्ती भी नहीं जलाई – इस बात से बेखबर नरेंद्र मां से कहने लगा¸ “अम्मां¸ तुम बाबूजी से कहती क्यों नहीं बैठे–बिठाये कुछ नहीं तो नौकर ही छुड़ा दिया।  अगर बाबूजी यह समझें कि मैं साइकिल पर गेंहूं रख आटा पिसाने जाऊंगा तो मुझसे यह नहीं होगा।”
“हां अम्मा¸”  बसन्ती का स्वर था¸ ” मैं कॉलेज भी जाऊं और लौट कर घरमें झाड़ू भी लगाऊं¸ यह मेरे बस की बात नहीं हैं।”
“बूढ़े आदमी हैं”  अमर भुनभुनाया¸ “चुपचाप पड़े रहें।  हर चीज में दखल क्यों देते हैं”  पत्नी ने बड़े व्यंग से कहा¸ “और कुछ नहीं सूझा तो तुम्हारी बहू को ही चौके में भेज दिया।  वह गई तो पंद्रह दिन का राशन पांच दिन में बना कर रख दिया।”  बहू कुछ कहे¸ इससे पहले वह चौके में घुस गई।  कुछ देर में अपनी कोठरी में आई और बिजली जलाई तो गजाधर बाबू को लेटे देख बड़ी सिटपिटाई।  गजाधर बाबू की मुखमुद्रा से वह उनके भावों का अनुमान न लगा सकी।  वह चुप¸ आंखे बंद किये लेटे रहे।
गजाधर बाबू चिठ्ठी हाथ में लिए अन्दर आये और पत्नी को पुकारा।  वह भीगे हाथ लिये निकलीं और आंचल से पोंछती हुई पास आ खड़ी हुई।  गजाधर बाबू ने बिना किसी भूमिका के कहा¸ “मुझे सेठ रामजीमल की चीनी मिल में नौकरी मिल गई हैं।  खाली बैठे रहने से ता चार पैसे घर में आएं¸ वहीं अच्छा हैं।  उन्होंने तो पहले ही कहा था¸ मैंने मना कर दिया था।” फिर कुछ रूक कर¸ जैसी बुझी हुई आग में एक चिनगारी चमक उठे¸ उन्होंने धीमे स्वर में कहा¸ “मैंने सोचा था¸ बरसों तुम सबसे अलग रहने के बाद¸ अवकाश पा कर परिवार के साथ रहूंगा। खैर¸ परसों जाना हैं। तुम भी चलोगी” “मैं”  पत्नी ने सकपकाकर कहा¸ “मैं चलूंगी तो यहां क्या होग  इतनी बड़ी गृहस्थी¸ फिर सयानी लड़की . . . . . .”
बात  बीच में काट कर गजाधर बाबू ने हताश स्वर में कहा¸ “ठीक हैं¸ तुम यहीं रहो।  मैंने तो ऐसे ही कहा था।”  और गहरे मौन में डूब गए।
नरेंद्र ने बड़ी तत्परता से बिस्तर बांधा और रिक्शा बुला लाया।  गजाधर बाबू का टीन का बक्स और पतला सा बिस्तर उस पर रख दिया गया।  नाश्ते के लिए लड्‌डू और मठरी की डलिया हाथ में लिए गजाधर बाबू रिक्शे में बैठ गए।  एक दृष्टि उन्होंने अपने परिवार पर डाली और फिर दूसरी ओर देखने लगे और रिक्शा चल पड़ा। 
उनके जाने के बाद सब अन्दर लौट आये¸ बहू ने अमर से पूछा¸ “सिनेमा चलियेगा न?”  बसन्ती ने उछल कर कहा¸ “भैया¸ हमें भी।”
गजाधर बाबू की पत्नी सीधे चौके में चली गई। बची हुई मठरियों को कटोरदान में रखकर अपने कमरे में लाई और कनस्तरों के पास रख दिया। 
फिर बाहर आ कर कहा¸ “अरे नरेन्द्र¸बाबूजी की चारपाई कमरे से निकाल दे¸ उसमें चलने तक को जगह नहीं हैं।”

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 हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना के साथसाथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली. पद्य के साथसाथ गद्य का भी विकास हुआ और छापेखाने के आते ही साहित्य के संसार में एक नई क्रांति हुई.

आधुनिक हिन्दी गद्य का विकास केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा. पूरे देश में और हर प्रदेश में हिन्दी की लोकप्रियता फैली और अनेक अन्य भाषी लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया. हिन्दी गद्य के विकास को विभिन्न सोपानों में विभक्त किया जा सकता है.

1 भारतेंदु पूर्व युग 1800 ईस्वी से 1850 ईस्वी तक

2 भारतेंदु युग 1850 ईस्वी से 1900 ईस्वी तक

3 द्विवेदी युग 1900 ईस्वी से 1920 ईस्वी तक

4 रामचंद्र शुक्ल प्रेमचंद युग 1920 ईस्वी से 1936 ईस्वी तक

5 अद्यतन युग 1936 ईस्वी से आज तक

 

 भारतेंदु पूर्व युग

हिन्दी में गद्य का विकास 19वीं शताब्दी के आसपास हुआ. इस विकास में कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका रही. इस कॉलेज के दो विद्वानों लल्लूलाल जी तथा सदल मिश्र ने गिलक्राइस्ट के निर्देशन में क्रमशः प्रेमसागर तथा नासिकेतोपाख्यान नामक पुस्तकें तैयार कीं. इसी समय सदासुखलाल ने सुखसागर तथा मुंशी इंशा अल्ला खां ने रानी केतकी की कहानीकी रचना की इन सभी ग्रंथों की भाषा में उस समय प्रयोग में आनेवाली खडी बोली को स्थान मिला. ये सभी कृतियाँ सन् 1803 में रची गयी थीं.

आधुनिक खडी बोली के गद्य के विकास में विभिन्न धर्मों की परिचयात्मक पुस्तकों का खूब सहयोग रहा जिसमें ईसाई धर्म का भी योगदान रहा. बंगाल के राजा राम मोहन राय ने 1815 ईस्वी में वेदांत सूत्र का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करवाया. इसके बाद उन्होंने 1829 में बंगदूत नामक पत्र हिन्दी में निकाला. इसके पहले ही 1826 में कानपुर के पं जुगल किशोर ने हिन्दी का पहला समाचार पत्र उदंतमार्तंड कलकत्ता से निकाला. इसी समय गुजराती भाषी आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपना प्रसिध्द ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश हिन्दी में लिखा.

भारतेंदु युग

भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) को हिन्दीसाहित्य के आधुनिक युग का प्रतिनिधि माना जाता है. उन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन और हरिश्चंद्र पत्रिका निकाली. साथ ही अनेक नाटकों की रचना की. उनके प्रसिध्द नाटक हैंचंद्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी. ये नाटक रंगमंच पर भी बहुत लोकप्रिय हुए. इस काल में निबंध नाटक उपन्यास तथा कहानियों की रचना हुई. इस काल के लेखकों में बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, राधा चरण गोस्वामी, उपाध्याय बदरीनाथ चौधरी प्रेमघन, लाला श्रीनिवास दास, बाबू देवकी नंदन खत्री, और किशोरी लाल गोस्वामी आदि उल्लेखनीय हैं. इनमें से अधिकांश लेखक होने के साथ साथ पत्रकार भी थे. श्रीनिवासदास के उपन्यास परीक्षागुरू को हिन्दी का पहला उपन्यास कहा जाता है. कुछ विद्वान श्रद्धाराम फुल्लौरी के उपन्यास भाग्यवती को हिन्दी का पहला उपन्यास मानते हैं. बाबू देवकीनंदन खत्री का चंद्रकांता तथा चंद्रकांता संतति आदि इस युग के प्रमुख उपन्यास हैं. ये उपन्यास इतने लोकप्रिय हुए कि इनको पढने के लिये बहुत से अहिंदी भाषियों ने हिंदी सीखी. इस युग की कहानियों में शिवप्रसाद सितारे हिन्द की राजा भोज का सपना महत्त्वपूर्ण है.

 द्विवेदी युग

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर ही इस युग का नाम द्विवेदी युग रखा गया. सन 1903 ईस्वी में द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के संपादन का भार संभाला. उन्होंने खडी बोली गद्य के स्वरूप को स्थिर किया और पत्रिका के माध्यम से रचनाकारों के एक बडे समुदाय को खडी बोली में लिखने को प्रेरित किया. इस काल में निबंध, उपन्यास, कहानी, नाटक एवं समालोचना का अच्छा विकास हुआ. इस युग के निबंधकारों में पं महावीर प्रसाद द्विवेदी, माधव प्रसाद मिश्र, श्याम सुंदर दास, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, बाल मुकंद गुप्त और अध्यापक पूर्ण सिंह आदि उल्लेखनीय हैं. इनके निबंध गंभीर, ललित एवं विचारात्मक हैं. किशोरीलाल गोस्वामी और बाबू गोपाल राम गहमरी के उपन्यासों में मनोरंजन और घटनाओं की रोचकता है.

हिंदी कहानी का वास्तविक विकास द्विवेदी युग से ही शुरू हुआ. किशोरी लाल गोस्वामी की इंदुमती कहानी को कुछ विद्वान हिंदी की पहली कहानी मानते हैं. अन्य कहानियों में बंग महिला की दुलाई वाली, शुक्ल जी की ग्यारह वर्ष का समय, प्रसाद जी की ग्राम और चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था महत्त्वपूर्ण हैं. समालोचना के क्षेत्र में पद्मसिंह शर्मा उल्लेखनीय हैं. हरिऔध, शिवनंदन सहाय तथा राय देवीप्रसाद पूर्ण द्वारा कुछ नाटक लिखे गए.

रामचंद्र शुक्ल एवं प्रेमचंद युग

गद्य के विकास में इस युग का विशेष महत्त्व है.पं रामचंद्र शुक्ल (1884-1941) ने निबंध, हिन्दी साहित्य के इतिहास और समालोचना के क्षेत्र में गंभीर लेखन किया. उन्होंने मनोविकारों पर हिंदी में पहली बार निबंध लेखन किया. साहित्य समीक्षा से संबंधित निबंधों की भी रचना की. उनके निबंधों में भाव और विचार अर्थात् बुद्धि और हृदय दोनों का समन्वय है. हिंदी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखा गया उनका इतिहास आज भी अपनी सार्थकता बनाए हुए है. जायसी, तुलसीदास और सूरदास पर लिखी गयी उनकी आलोचनाओं ने भावी आलोचकों का मार्गदर्शन किया. इस काल के अन्य निबंधकारों में जैनेन्द्र कुमार जैन, सियारामशरण गुप्त, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और जयशंकर प्रसाद आदि उल्लेखनीय हैं.

कथा साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद ने क्रांति ही कर डाली. अब कथा साहित्य केवल मनोरंजन, कौतूहल और नीति का विषय ही नहीं रहा बल्कि सीधे जीवन की समस्याओं से जुड ग़या.उन्होंने सेवा सदन, रंगभूमि, निर्मला, गबन एवं गोदान आदि उपन्यासों की रचना की. उनकी तीन सौ से अधिक कहानियां मानसरोवर के आठ भागों में तथा गुप्तधन के दो भागों में संग्रहित हैं. पूस की रात, कफन, शतरंज के खिलाडी, पंच परमेश्वर, नमक का दरोगा तथा ईदगाह आदि उनकी कहानियां खूब लोकप्रिय हुयीं. इसकाल के अन्य कथाकारों में विश्वंभर शर्मा कौशिक, वृंदावनलाल वर्मा, राहुल सांकृत्यायन, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, उपेन्द्रनाथ अश्क, जयशंकर प्रसाद, भगवतीचरण वर्मा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं.

नाटक के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद का विशेष स्थान है. इनके चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी जैसे ऐतिहासिक नाटकों में इतिहास और कल्पना तथा भारतीय और पाश्चात्य नाटय पद्यतियों का समन्वय हुआ है. लक्ष्मीनारायण मिश्र, हरिकृष्ण प्रेमी, जगदीशचंद्र माथुर आदि इस काल के उल्लेखनीय नाटककार हैं.

अद्यतन काल

इस काल में गद्य का चहुंमुखी विकास हुआ. पं हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, यशपाल, नंददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेंद्र, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा डा. रामविलास शर्मा आदि ने विचारात्मक निबंधों की रचना की है. हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, विवेकी राय, और कुबेरनाथ राय ने ललित निबंधों की रचना की है. हरिशंकर परसांई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रवींन्द्रनाथ त्यागी, तथा के पी सक्सेना, के व्यंग्य आज के जीवन की विद्रूपताओं के उद्धाटन में सफल हुए हैं. जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल, इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर, रांगेय राघव और भगवती चरण वर्मा ने उल्लेखनीय उपन्यासों की रचना की. नागार्जुन, फणीश्वर नाथ रेणु, अमृतराय, तथा राही मासूम रजा ने लोकप्रिय आंचलिक उपन्यास लिखे हैं. मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, कमलेश्वर, भीष्म साहनी, भैरव प्रसाद गुप्त, आदि ने आधुनिक भाव बोध वाले अनेक उपन्यासों और कहानियों की रचना की है. अमरकांत, निर्मल वर्मा तथा ज्ञानरंजन आदि भी नए कथा साहित्य के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं.

प्रसादोत्तर नाटकों के क्षेत्र में लक्ष्मीनारायण लाल, लक्ष्मीकांत वर्मा, मोहन राकेश तथा कमलेश्वर के नाम उल्लेखनीय हैं. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा बनारसीदास चतुर्वेदी आदि ने संस्मरण रेखाचित्र जीवनी आदि की रचना की है. शुक्ल जी के बाद पं हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंद दुलारे वाजपेयी, नगेन्द्र, रामविलास शर्मा तथा नामवर सिंह ने हिंदी समालोचना को समृध्द किया. आज गद्य की अनेक नयी विधाओं जैसे यात्रा वृत्तांत, रिपोर्ताज, रेडियो रूपक, आलेख आदि में विपुल साहित्य की रचना हो रही है और गद्य की विधाएं एक दूसरे से मिल रही हैं.

 

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हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल 1850 से आरम्भ होता है । हिंदी साहित्य के इस युग में भारतीयराष्ट्रीयता के बीज अंकुरित होने लगे थे। इसी युग मे हिन्दी पद्य के साथ साथ गद्य का भी विकास हुआ। स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और जीता गया। छापेखाने का आविष्कार हुआ, आवागमन के साधन आम आदमी के जीवन का हिस्सा बने, जन संचार के विभिन्न साधनों का विकास हुआ, रेडिओ, टी वी समाचार पत्र हर घर का हिस्सा बने और शिक्षा हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार। इन सब परिस्थितियों का प्रभाव हिंदी साहित्य पर अनिवार्यतः पड़ा। आधुनिक काल का हिंदी पद्य साहित्य पिछली सदी में विकास के अनेक पड़ावों से गुज़रा। जिसमें अनेक विचार धाराओं का बहुत तेज़ी से विकास हुआ। जहां काव्य में इसे छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग और यथार्थवादी युग इन चार नामों से जाना गया, छायावाद से पहले के पद्य को भारतेंदु हरिश्चंद्र युग और महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के दो और युगों में बांटा गया। इसके विशेष कारण भी हैं।

 

भारतेंदु हरिश्चंद्र युग की कविता (1850-1900)

 

ईस्वी सन 1850 से 1900 तक की कविताओं पर भारतेंदु हरिश्चंद्र का गहरा प्रभाव पड़ा है। वे ही आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह हैं। उन्होंने भाषा को एक चलता हुआ रूप देने की कोशिश की। आपके काव्यसाहित्य में प्राचीन एवं नवीन का मेल लक्षित होता है। भक्तिकालीन, रीतिकालीन परंपराएं आपके काव्य में देखी जा सकती हैं तो आधुनिक नूतन विचार और भाव भी आपकी कविताओं में पाए जाते हैं। आपने भक्तिप्रधान, श्रृंगारप्रधान, देशप्रेमप्रधान तथा सामाजिकसमस्याप्रधान कविताएं की हैं। आपने ब्रजभाषा से खड़ीबोली की ओर हिंदीकविता को ले जाने का प्रयास किया। आपके युग में अन्य कई महानुभाव ऐसे हैं जिन्होंने विविध प्रकार हिंदी साहित्य को समृध्द किया।

 

द्विवेदी युग की कविता (1900-1920)

 

सन 1900 के बाद दो दशकों पर पं महावीर प्रसाद द्विवेदी का पूरा प्रभाव पड़ा। इस युग को इसीलिए द्विवेदीयुग कहते हैं। सरस्वतीपत्रिका के संपादक के रूप में आप उस समय पूरे हिंदी साहित्य पर छाए रहे। आपकी प्रेरणा से ब्रजभाषा हिंदी कविता से हटती गई और खड़ी बोली ने उसका स्थान ले लिया। भाषा को स्थिर, परिष्कृत एवं व्याकरणसम्मत बनाने में आपने बहुत परिश्रम किया। कविता की दृष्टि से वह इतिवृत्तात्मक युग था। आदर्शवाद का बोलबाला रहा। भारत का उज्ज्वल अतीत, देशभक्ति, सामाजिक सुधार, स्वभाषाप्रेम वगैरह कविता के मुख्य विषय थे। नीतिवादी विचारधारा के कारण श्रृंगार का वर्णन मर्यादित हो गया। कथाकाव्य का विकास इस युग की विशेषता है। भाषा खुरदरी और सरल रही। मधुरता एवं सरलता के गुण अभी खड़ीबोली में नहीं पाए थे। सर्वश्री मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’, श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी आदि इस युग के यशस्वी कवि हैं। जगन्नाथदास रत्नाकरने इसी युग में ब्रज भाषा में सरस रचनाएं प्रस्तुत कीं।

 

छायावादी युग की कविता (1920-)

 

सन 1920 के आसपास हिंदी में कल्पनापूर्ण स्वछंद और भावुक कविताओं की एक बाढ़ आई। यह यूरोप के रोमांटिसिज़्म से प्रभावित थी। भाव, शैली, छंद, अलंकार सब दृष्टियों से इसमें नयापन था। भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद लोकप्रिय हुई इस कविता को आलोचकों ने छायावादी युग का नाम दिया। छायावादी कवियों की उस समय भारी कटु आलोचना हुई परंतु आज यह निर्विवाद तथ्य है कि आधुनिक हिंदी कविता की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि इसी समय के कवियों द्वारा हुई। जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा इस युग के प्रधान कवि हैं।

 

प्रगतिवादी युग की कविता (1930-)

 

छायावादी काव्य बुद्धिजीवियों के मध्य ही रहा। जनजन की वाणी यह नहीं बन सका। सामाजिक एवं राजनैतिक आंदोलनों का सीधा प्रभाव इस युग की कविता पर सामान्यतः नहीं पड़ा। संसार में समाजवादी विचारधारा तेज़ी से फैल रही थी। सर्वहारा वर्ग के शोषण के विरुध्द जनमत तैयार होने लगा। इसकी प्रतिच्छाया हिंदी कविता पर भी पड़ी और हिंदी साहित्य के प्रगतिवादी युग का जन्म हुआ। 1930 क़े बाद की हिंदी कविता ऐसी प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित है।

 

प्रयोगवादी युग की कविता

 

दूसरे विश्वयुध्द के पश्चात संसार भर में घोर निराशा तथा अवसाद की लहर फैल गई। साहित्य पर भी इसका प्रभाव पड़ा। अज्ञेयके संपादन में तार सप्तकका प्रकाशन हुआ। तब से हिंदी कविता में प्रयोगवादी युग का जन्म हुआ ऐसी मान्यता है। इसी का विकसित रूप नयी कविताकहलाता है। दुर्बोधता, निराशा, कुंठा, वैयक्तिकता, छंदहीनता के आक्षेप इस कविता पर भी किए गए हैं। वास्तव में नयी कविता नयी रुचि का प्रतिबिंब है। अज्ञेय, गिरिजाकुमार माथुर, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, कुंवर नारायण, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, जगदीश गुप्त इस धारा के मुख्य कवि हैं।

इस प्रकार आधुनिक हिंदी खड़ी बोली कविता ने भी अल्प समय में उपलब्धि के उच्च शिखर सर किए हैं। क्या प्रबंध काव्य, क्या मुक्तक काव्य, दोनों में हिंदी कविता ने सुंदर रचनाएं प्राप्त की हैं। गीतिकाव्य के क्षेत्र में भी कई सुंदर रचनाएं हिंदी को मिली हैं। आकार और प्रकार का वैविध्य बरबस हमारा ध्यान आकर्षित करता है। संगीतरूपक, गीतनाटय वगैरह क्षेत्रों में भी प्रशंसनीय कार्य हुआ है। कविता के बाह्य एवं अंतरंग रूपों में युगानुरूप जो नयेनये प्रयोग नित्यप्रति होते रहते हैं, वे हिंदी कविता की जीवनीशक्ति एवं स्फूर्ति के परिचायक हैं।

 

 

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हिंदी साहित्य का आधुनिक काल तत्कालीन राजनैतिक गतिविधियों से प्रभावित हुआ। इसको हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ युग माना जा सकता है, जिसमें पद्य के साथसाथ  समालोचना, कहानी, नाटक, उपन्यास, रेखाचित्र पत्रकारिता आदि गद्य की विभिन्न विधाओं का भी विकास हुआ।

सं 1800 वि. के उपरांत भारत में अनेक यूरोपीय जातियां व्यापार के लिए आईं। उनके संपर्क से यहां पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव पड़ना प्रारंभ हुआ। विदेशियों ने यहां के देशी राजाओं की पारस्परिक फूट से लाभ उठाकर अपने पैर जमाने में सफलता प्राप्त की। जिसके परिणामस्वरूप यहां पर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई। अंग्रेजों ने यहां अपने शासन कार्य को सुचारु रूप से चलाने एवं अपने धर्मप्रचार के लिए जनसाधारण की भाषा को अपनाया। इस कार्य के लिए गद्य ही अधिक उपयुक्त होती है। इस कारण आधुनिक युग की मुख्य विशेषता गद्य की प्रधानता रही। इस काल में होने वाले मुद्रण कला के आविष्कार ने भाषाविकास में महान योगदान दिया। स्वामी दयानंद ने भी आर्य समाज के ग्रंथों की रचना राष्ट्रभाषा हिंदी में की और अंग्रेज़ मिशनरियों ने भी अपनी प्रचार पुस्तकें हिंदी गद्य में ही छपवाईं। इस तरह विभिन्न मतों के प्रचार कार्य से भी हिंदी गद्य का समुचित विकास हुआ।

हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल 1850 से आरम्भ होता है हिंदी साहित्य के इस युग में भारतीयराष्ट्रीयता के बीज अंकुरित होने लगे थे। इसी युग मे हिन्दी पद्य के साथ साथ गद्य का भी विकास हुआ। स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और जीता गया। छापेखाने का आविष्कार हुआ, आवागमन के साधन आम आदमी के जीवन का हिस्सा बने, जन संचार के विभिन्न साधनों का विकास हुआ, रेडिओ, टी वी समाचार पत्र हर घर का हिस्सा बने और शिक्षा हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार। इन सब परिस्थितियों का प्रभाव हिंदी साहित्य पर अनिवार्यतः पड़ा। आधुनिक काल का हिंदी पद्य साहित्य पिछली सदी में विकास के अनेक पड़ावों से गुज़रा। जिसमें अनेक विचार धाराओं का बहुत तेज़ी से विकास हुआ। जहां काव्य में इसे छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग और यथार्थवादी युग इन चार नामों से जाना गया, छायावाद से पहले के पद्य को भारतेंदु हरिश्चंद्र युग और महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के दो और युगों में बांटा गया। इसके विशेष कारण भी हैं।

इस काल में राष्ट्रीय भावना का भी विकास हुआ। इसके लिए श्रृंगारी ब्रजभाषा की अपेक्षा खड़ी बोली उपयुक्त समझी गई। समय की प्रगति के साथ गद्य और पद्य दोनों रूपों में खड़ी बोली का पर्याप्त विकास हुआ। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने खड़ी बोली के दोनों रूपों को सुधारने में महान प्रयत्न किया। उन्होंने अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा द्वारा हिंदी साहित्य की सम्यक संवर्धना की।

इस काल के आरंभ में राजा लक्ष्मण सिंह, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जगन्नाथ दास रत्नाकर, श्रीधर पाठक, रामचंद्र शुक्ल आदि ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की। इनके उपरांत भारतेंदु जी ने गद्य का समुचित विकास किया और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसी गद्य को प्रांजल रूप प्रदान किया। इसकी सत्प्रेरणाओं से अन्य लेखकों और कवियों ने भी अनेक भांति की काव्य रचना की। इनमें मैथिलीशरण गुप्त, रामचरित उपाध्याय, नाथूराम शर्मा शंकर, ला. भगवान दीन, रामनरेश त्रिपाठी, जयशंकर प्रसाद, गोपाल शरण सिंह, माखन लाल चतुर्वेदी, अनूप शर्मा, रामकुमार वर्मा, श्याम नारायण पांडेय, दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रभाव से हिंदीकाव्य में भी स्वच्छंद (अतुकांत) छंदों का प्रचलन हुआ।

इस काल में गद्यनिबंध, नाटकउपन्यास, कहानी, समालोचना, तुलनात्मक आलोचना, साहित्य आदि सभी रूपों का समुचित विकास हुआ। इस युग के प्रमुख साहित्यकार निम्नलिखित हैं

समालोचक

आचार्य द्विवेदी जी, पद्म सिंह शर्मा, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डाक्टर रामकुमार वर्मा, श्यामसुंदर दास आदि हैं।

 कहानी लेखक

प्रेमचंद, विनोद शंकर व्यास, प्रसाद, पंत, गुलेरी, निराला, कौशिक, सुदर्शन, जैनेंद्र, हृदयेश आदि।

 उपन्यासकार

प्रेमचंद, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, प्रसाद, उग्र, हृदयेश, जैनेंद्र, भगवतीचरण वर्मा, वृंदावन लाल वर्मा, गुरुदत्त आदि।

 नाटककार

प्रसाद, सेठ गोविंद दास, गोविंद वल्लभ पंत, लक्ष्मी नारायण मिश्र, उदय शंकर भट्ट, रामकुमार वर्मा आदि हैं।

 निबंध लेखक

आचार्य द्विवेदी, माधव प्रसाद शुक्ल, रामचंद्र शुक्ल, बाबू श्यामसुंदर दास, पद्म सिंह, अध्यापक पूर्णसिंह आदि हैं।

 

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