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रामभक्ति पंथी शाखा के प्रमुख कवि
रामानन्द, तुलसीदास, स्वामी अग्रदास, नाभादास, प्राणचंद चौहान, हृदयराम, केशवदास, सेनापति।
 
स्वामी रामानन्द
 
स्वामी रामानन्द का जन्म 1299ई. में माघकृष्णसप्तमी को प्रयाग में हुआ था। इनके पिता का नाम पुण्यसदनऔर माता का नाम सुशीला देवी था। इनका बाल्यकाल प्रयाग में बीता। यज्ञोपवीत संस्कार के उपरान्त वे प्रयाग से काशी चले आए और गंगा के किनारे पंचगंगाघाट पर स्थायी रूप से निवास करने लगे। इनके गुरु स्वामी राघवानन्द थे जो रामानुज (अचारी) संप्रदाय के ख्यातिलब्ध संत थे। स्वामी राघवानन्द हिन्दी भाषा में भक्तिपरककाव्य रचना करते थे। स्वामी रामानन्द को रामभक्तिगुरुपरंपरासे मिली। हिंदी भाषा में लेखन की प्रेरणा उन्हें गुरुकृपासे प्राप्त हुई। पंचगंगाघाटपर रहते हुए स्वामी रामानुज ने रामभक्तिकी साधना के साथ-साथ उसका प्रचार और प्रसार भी किया। स्वामी रामानन्द ने जिस भक्ति-धारा का प्रवर्तन किया, वह रामानुजीपरंपरा से कई दृष्टियोंसे भिन्न थी। रामानुजी संप्रदाय में इष्टदेव के रूप में लक्ष्मीनारायण की पूजा होती है। स्वामी रामानन्द ने लक्ष्मीनारायण के स्थान पर सीता और राम को इष्टदेव के आसन पर प्रतिष्ठित किया। नए इष्टदेव के साथ ही स्वामी रामानन्द ने रामानुजीसंप्रदाय से अलग एक षडक्षरमंत्र की रचना की। यह मंत्र है- रांरामायनम:। इष्टदेव और षडक्षरमंत्र के अतिरिक्त स्वामी रामानन्द ने इष्टोपासनापद्धतिमें भी परिवर्तन किया। स्वामी रामानन्द ने रामानुजीतिलक से भिन्न नए ऊ‌र्ध्वपुण्डतिलक की अभिरचनाकी। इन भिन्नताओंके कारण स्वामी रामानन्द द्वारा प्रवर्तित भक्तिधारा को रामानुजी संप्रदाय से भिन्न मान्यता मिलने लगी। रामानुजीऔर रामानन्दी संप्रदाय क्रमश:अचारीऔर रामावत नाम से जाने जाने लगे। रामानुजीतिलक की भांति रामानन्दी तिलक भी ललाट के अतिरिक्त देह के ग्यारह अन्य भागों पर लगाया जाता है। स्वामी रामानन्द ने जिस तिलक की अभिरचनाकी उसे रक्तश्रीकहा जाता है। कालचक्र में रक्तश्रीके अतिरिक्त इस संप्रदाय में तीन और तिलकोंकी अभिरचनाहुई। इन तिलकोंके नाम हैं, श्वेतश्री(लश्करी), गोलश्री(बेदीवाले) और लुप्तश्री(चतुर्भुजी)। इष्टदेव, मंत्र, पूजापद्धतिएवं तिलक इन चारों विंदुओंके अतिरिक्त स्वामी रामानन्द ने स्वप्रवर्तितरामावत संप्रदाय में एक और नया तत्त्‍‌व जोडा। उन्होंने रामभक्तिके भवन का द्वार मानव मात्र के लिए खोल दिया। जिस किसी भी व्यक्ति की निष्ठा राम में हो, वह रामभक्त है, चाहे वह द्विज हो अथवा शूद्र, हिंदू हो अथवा हिंदूतर।वैष्णव भक्ति भवन के उन्मुक्त द्वार से रामावत संप्रदाय में बहुत से द्विजेतरऔर हिंदूतरभक्तों का प्रवेश हुआ। स्वामी रामानन्द की मान्यता थी कि रामभक्तिपर मानवमात्र का अधिकार है, क्योंकि भगवान् किसी एक के नहीं, सबके हैं-सर्वे प्रपत्तिरधिकारिणोमता:।ज्ञातव्य है कि रामानुजीसंप्रदाय में मात्र द्विजाति(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को ही भगवद्भक्तिका अधिकार प्राप्त है। स्वामी रामानन्द ने रामभक्तिपर मानवमात्र का अधिकार मानकर एक बडा साहसी और क्रान्तिकारी कार्य किया था। इसके लिए उनका बडा विरोध भी हुआ। स्वामी रामानन्द का व्यक्तित्व क्रान्तिदर्शी,क्रान्तिधर्मीऔर क्रान्तिकर्मीथा। उनकी क्रान्तिप्रियतामात्र रामभक्तितक ही सीमित नहीं थी। भाषा के क्षेत्र में भी उन्होंने क्रान्ति का बीजारोपण किया। अभी तक धर्माचार्य लेखन-भाषण सारा कुछ देवभाषा संस्कृत में ही करते थे। मातृभाषा होते हुए भी हिंदी उपेक्षत-सीथी। ऐसे परिवेश में स्वामी रामानन्द ने हिंदी को मान्यता देकर अपनी क्रान्तिप्रियताका परिचय दिया। आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास ने स्वामी रामानन्द की भाषा विषयक इसी क्रान्ति प्रियताका अनुसरण करके रामचरितमानस जैसे अद्भुत ग्रंथ का प्रणयन हिंदी भाषा में किया। ऐसा माना जाता है कि स्वामी रामानन्द विभिन्न परिवेशों के बीच एक सेतु की भूमिका का निर्वाह करते थे। वे नर और नारायण के बीच एक सेतु थे; शूद्र और ब्राह्मण के बीच एक सेतु थे; हिन्दू और हिंदूतरके बीच एक सेतु थे; देवभाषा (संस्कृत) और लोकभाषा(हिन्दी) के बीच एक सेतु थे। स्वामी रामानन्द ने कुल सात ग्रंथों की रचना की, दो संस्कृत में और पांच हिंदी में।
उनके द्वारा रचित पुस्तकों की सूची इस प्रकार है:
(1) वैष्णवमताब्जभास्कर: (संस्कृत), (2) श्रीरामार्चनपद्धति:(संस्कृत), (3) रामरक्षास्तोत्र(हिंदी), (4) सिद्धान्तपटल(हिंदी), (5) ज्ञानलीला(हिंदी), (6) ज्ञानतिलक(हिन्दी), (7) योगचिन्तामणि(हिंदी)।
 
ऐसा माना जाता है कि लगभग एक सौ ग्यारह वर्ष की दीर्घायु में स्वामी रामानन्द ने भगवत्सायुज्यवरणकिया। जीवन के अंतिम दिनों में वे काशी से अयोध्या चले गए। वहां वे एक गुफामें प्रवास करने लगे। एक दिन प्रात:काल गुफासे शंख ध्वनि सुनाई पडी। भक्तों ने गुफामें प्रवेश किया। वहां न स्वामी जी का देहशेषऔर न शंख। वहां मात्र पूजासामग्रीऔर उनकी चरणपादुका। भक्तगण गुफासे चरणपादुका काशी ले आए और यहां उसे पंचगंगाघाटपर स्थापित कर दिया। जिस स्थान पर चरणपादुका की स्थापना हुई, उसे श्रीमठकहा जाता है। श्रीमठपर एक नए भवन का निर्माण सन् 1983ई. में किया गया। स्वामी रामानन्द की गुरु शिष्य परम्परा से ही तुलसीदास, स्वामी अग्रदास, नाभादास जैसे रामभक्त कवियो का उदय हुआ।
 
 
गोस्वामी तुलसीदास
 
गोस्वामी तुलसीदास के जन्म काल के विषय में एकाधिक मत हैं. बेनीमाधव दास द्वारा रचित ‘गोसाईं चरित’ और महात्मा रघुबरदास कृत ‘तुलसी चरित’ दोनों के अनुसार तुलसीदास का जन्म 1497 ई. में हुआ था. शिवसिंह सरोज के अनुसार सन् 1526 ई. के लगभग हुआ था. पं. रामगुलाम द्विवेदी इनका जन्म सन् 1532 ई. मानते हैं. यह निश्चित है कि ये महाकवि 16वीं शताब्दी में विद्यमान थे.
तुलसीदास मध्यकाल के उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपने बारे में जो थोड़ा-बहुत लिखा है, वह बहुत काम का है.
तुलसी का बचपन घोर दरिद्रता एवं असहायवस्था में बीता था. उन्होंने लिखा है, माता-पिता ने दुनिया में पैदा करके मुझे त्याग दिया. विधाता ने भी मेरे भाग्य में कोई भलाई नहीं लिखी.
 
मातु पिता जग जाइ तज्यो, विधि हू न लिखी कछु भाल भलाई I
जैसे कुटिल कीट को पैदा करके छोड़ देते हैं वैसे की मेरे माँ-बाप ने मुझे त्याग दिया:
 
तनु जन्यो कुटिल कीट ज्यों तज्यो माता पिता हू I
हनुमानबाहुक में भी यह स्पष्ट है कि अंतिम समय में वे भयंकर बाहु-पीड़ा से ग्रस्त थे. पाँव, पेट, सकल शरीर में पीड़ा होती थी, पूरी देह में फोड़े हो गए थे.
यह मान्य है कि तुलसीदास की मृत्यु सन् 1623 ई. में हुई.
उनके जन्म स्थान के विषय में काफी विवाद है. कोई उन्हें सोरों का बताता है, कोई राजापुर का और कोई अयोध्या का. ज्यादातर लोगों का झुकाव राजापुर की ही ओर है. उनकी रचनाओं में अयोध्या, काशी, चित्रकूट आदि का वर्णन बहुत आता है. इन स्थानों पर उनके जीवन का पर्याप्त समय व्यतीत हुआ होगा.
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं.
कृतियां
1. दोहावली 2. कवितावली 3. गीतावली 4. रामचरितमानस 5. रामाज्ञाप्रश्न 6. विनयपत्रिका 7. रामललानहछू 8. पार्वतीमंगल 9. जानकीमंगल 10. बरवै रामायण 11. वैराग्य संदीपिनी 12. श्रीकृष्णगीतावली
 
नाभादास
 
नाभादास अग्रदासजी के शिष्य बड़े भक्त और साधुसेवी थे. सन् 1600 के लगभग वर्तमान थे और तुलसीदासजी की मृत्यु के बहुत पीछे तक जीवित रहे. इनका प्रसिद्ध ग्रंथ भक्तमाल सन् 1585 ई. के पीछे बना और सन् 1712 में प्रियादासजी ने उसकी टीका लिखी. इस ग्रंथ में 200 भक्तों के चमत्कार पूर्ण चरित्र 316 छप्पयों में लिखे गए हैं. इन चरित्रों में पूर्ण जीवनवृत्त नहीं है, केवल भक्ति की महिमासूचक बातें लिखी गई हैं. इनका उद्देश्य भक्तों के प्रति जनता में पूज्यबुद्धि का प्रचार जान पड़ता है. वह उद्देश्य बहुत अंशों में सिद्ध भी हुआ.
नाभाजी को कुछ लोग डोम बताते हैं, कुछ क्षत्रिय. ऐसा प्रसिद्ध है कि वे एकबार तुलसीदास से मिलने काशी गए. पर उस समय गोस्वामी ध्यान में थे, इससे न मिल सके. नाभाजी उसी दिन वृंदावन चले गए. ध्यान भंग होने पर गोस्वामीजी को बड़ा खेद हुआ और वे तुरंत नाभाजी से मिलने वृंदावन चल दिए. नाभाजी के यहाँ वैष्णवों का भंडारा था जिसमें गोस्वामीजी बिना बुलाए जा पहुँचे. गोस्वामीजी यह समझकर कि नाभाजी ने मुझे अभिमानी न समझा हो, सबसे दूर एक किनारे बुरी जगह बैठ गए. नाभाजी ने जान बूझकर उनकी ओर ध्यान न दिया. परसने के समय कोई पात्र न मिलता था जिसमें गोस्वामीजी को खीर दी जाती. यह देखकर गोस्वामीजी एक साधु का जूता उठा लिया और बोले, “इससे सुंदर पात्र मेरे लिए और क्या होगा ?” इस पर नाभाजी ने उठकर उन्हें गले लगा लिया और गद्-गद् हो गए.
अपने गुरू अग्रदास के समान इन्होंने भी रामभक्ति संबंधी कविता की है. ब्रजभाषा पर इनका अच्छा अधिकार था और पद्यरचना में अच्छी निपुणता थी.
कृति — 1. भक्तमाल 2. अष्टयाम
 
स्वामी अग्रदास
 
रामानंद के शिष्य अनंतानंद और अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी थे, कृष्णदास पयहारी के शिष्य अग्रदास जी थे. सन् १५५६ के लगभग वर्तमान थे. इनकी बनाई चार पुस्तकों का पता है. इनकी कविता उसी ढंग की है जिस ढंग की कृष्णोपासक नंददासजी की.
प्रमुख कृतियां है– 1. हितोपदेश उपखाणाँ बावनी 2. ध्यानमंजरी 3. रामध्यानमंजरी 4. राम-अष्ट्याम
अग्रदास जी का काव्य ब्रजभाषा मे है जिसमे प्रवाह के साथ परिष्कार भी है। सुंदर पद-रचना और अलंकारो के प्रयोग से यह प्रमाणित होता है कि इन्हें शास्त्रीय साहित्य का अच्छा ज्ञान था।
 
चौपाई:-
जीव मात्र से द्वैस न राखै। सो सिय राम नाम रस चाखै।१।
दीन भाव निज उर में लावै। सिया राम सन्मुख छवि छावै।२।
तौन उपासक ठीक है भाई। वाकी समुझौ बनी बनाई।३।
सियाराम निशि वासर ध्यावै। अन्त त्यागि तन गर्भ न आवै।४।
 
दोहा:-
अग्रदास कह धन्य सो, जाहि दियो गुरु ज्ञान।
सो तन लीन्हो सुफल कै, छूटा दुःख महान।१।
 
‘अग्रअली’ नाम से अग्रदास स्वयं को जानकी जी की सखी मानकर काव्य-रचना किया करते थे। रामभक्ति परम्परा में रसिक-भावना के समावेश का श्रेय इन्हीं को प्राप्त है।
 
हृदयराम
 
ये पंजाब के रहनेवाले और कृष्णदास के पुत्र थे. इन्होंने सन् 1623 में संस्कृत के हनुमन्नाटक के आधार पर भाषा हनुमन्नाटक लिखा जिसकी कविता बड़ी सुंदर और परिमार्जित है. इसमें अधिकतर कविता और सवैये में बड़े अच्छे संवाद हैं.
 
प्राणचंद चौहान
 
इनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त विवरण नहीं मिलता है. पं. रामचंद्र शुक्ल जी के अनुसार:
संस्कृत में रामचरित संबंधी कई नाटक हैं जिनमें कुछ तो नाटक के साहित्यिक नियमानुसार हैं और कुछ केवल संवाद रूप में होने के कारण नाटक कहे गए हैं. इसी पिछली पद्धति पर संवत 1667 (सन् 1610ई.) में इन्होंने रामायण महानाटक लिखा.
 
कृति — 1. रामायण महानाटक
 
केशवदास
 
केशव का जन्म तिथि सं० १६१८ वि० मे वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य के अंतर्गत ओरछा नगर में हुआ था। ओरछा के व्यासपुर मोहल्ले में उनके अवशेष मिलते हैं। ओरछा के महत्व और उसकी स्थिति के सम्बन्ध में केशव ने स्वयं अनेक भावनात्मक कथन कहे हैं। जिनसे उनका स्वदेश प्रेम झलकता है। आचार्य केशव की रामभक्ति से सम्बन्धित कॄति “रामचंद्रिका” है।
“रामचन्द्रिका’ संस्कृत के परवर्ती महाकाव्यों की वर्णन-बहुल शैली का प्रतिनिधित्व करती है। “रामचन्द्रिका’ के भाव-विधान में शान्त रस का भी महत्वपूर्ण स्थान है। अत्रि-पत्नी अनसूया के चित्र से ऐसा प्रकट होता है जैसे स्वयं ‘निर्वेद’ ही अवतरित हो गया हो। वृद्धा अनसूया के कांपते शरीर से ही निर्वेद के संदेश की कल्पना कवि कर लेता है:
 
कांपति शुभ ग्रीवा, सब अंग सींवां, देखत चित्त भुलाहीं ।
जनु अपने मन पति, यह उपदेशति, या जग में कछु नाहीं ।।
 
अंगद-रावण में शान्त की सोद्देश्य योजना है। अंगद रावण को कुपथ से विमुख करने के लिए एक वैराग्यपूर्ण उक्ति कहता है। अन्त में वह कहता है – “चेति रे चेति अजौं चित्त अन्तर अन्तक लोक अकेलोई जै है।” यह वैराग्य पूर्ण चेतावनी सुन्दर बन पड़ी है।
 
सेनापति
 
हिंदी-साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेक कवि हुए हैं जिनके कृतित्त्व तो प्राप्त हैं, परंतु व्यक्तित्त्व के विषय में कुछ भी ठीक से पता नहीं है। भक्तिकाल की समाप्ति और रीतिकाल के प्रारंभ के संधिकाल मे भी एक महाकवि हुए हैं जिनके जीवन के विषय में जानकारी के नाम पर मात्र उनका लिखा एक कवित्त ही है, ऐसे महाकवि ‘सेनापति’ के विषय में कवित्त है
“दीक्षित परसराम, दादौ है विदित नाम,
जिन कीने यज्ञ, जाकी जग में बढ़ाई है।
गंगाधर पिता, गंगाधार ही समान जाकौ,
गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है।
महाजानि मनि, विद्यादान हूँ कौ चिंतामनि,
हीरामनि दीक्षित पै तैं पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी,
सब कवि कान दै सुनत कविताई हैं॥”
 
यही कवित्त सेनापति के जीवन परिचय का आधार है। इसके आधार पर विद्वानों ने सेनापति के पितामह का नाम परसराम दीक्षित और पिता का नाम गंगाधर माना हैं। ‘गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है’ के आधार पर उन्हें उत्तर-प्रदेश के गंगा-किनारे बसे अनूपशहर क़स्बे का माना है। सेनापति के विषय में विद्वानों ने माना है कि उन्होंने ‘काव्य-कल्पद्रुम’ और ‘कवित्त-रत्नाकर’ नामक दो ग्रंथों की रचना की थी। ‘काव्यकल्पद्रुम’ का कुछ पता नहीं है। ‘कवित्तरत्नाकर’ उनकी एक मात्र प्राप्त कृति है। इस विषय में डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने कहीं लिखा है-“सन १९२४ में जब प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन अध्यापन प्रारंभ हुआ, तब कविवर सेनापति के एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ ‘कवित्त-रत्नाकर’ को एम.ए. के पाठ्यक्रम में स्थान मिला था। उस समय इस ग्रंथ की कोई प्रकाशित प्रति उपलब्ध नहीं थी। अतः केवल कुछ हस्तलिखित पोथियाँ एकत्रित करके पढ़ाई प्रारंभ की थी।
कवि की निम्नलिखित पंक्तियों के आधार पर ‘कवित्त-रत्नाकर’ के विषय में माना जाता रहा है कि उन्होंने इसे सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्ध में रचा होगा-
“संवत सत्रह सै मैं सेई सियापति पांय,
सेनापति कविता सजी, सज्जन सजौ सहाई।”
सेनापति कॄत ‘कवित्त-रत्नाकर’ की चतुर्थ तरंग में ७६ कवित्त हैं जिनमें रामकथा मुक्त रुप में लिखी है।-
“कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि,
भाई मन संतन के त्रिभुवन जानि है।
देबन उपाइ कीनौ यहै भौ उतारन कौं,
बिसद बरन जाकी सुधार सम बानी है।
भुवपति रुप देह धारी पुत्र सील हरि
आई सुरपुर तैं धरनि सियारानि है।
तीरथ सरब सिरोमनि सेनापति जानि,
राम की कहनी गंगाधार सी बखानी है।”
पाँचवी तरंग में ८६ कवित्त हैं, जिनमें राम-रसायन वर्णन है। इनमें राम, कृष्ण, शिव और गंगा की महिमा का गान है। ‘गंगा-महिमा’ दृष्टव्य है-
“पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार,
जहाँ मरि पापी होत सुरपुरपति है।
देखत ही जाकौ भलौ घाट पहिचानियत,
एक रुप बानी जाके पानी की रहति है।
बड़ी रज राखै जाकौ महा धीर तरसत,
सेनापति ठौर-ठौर नीकी यैं बहति है।
पाप पतवारि के कतल करिबै कौं गंगा,
पुन्य की असील तरवारि सी लसति है।”
सेनापति ने अपने काव्य में सभी रसों को अपनाया है। ब्रज भाषा में लिखे पदों में फारसी और संस्कृत के शब्दों का भी प्रयोग किया है। अलंकारों की बात करें तो सेनापति को श्लेष से तो विशेष मोह था।

 

बुंदेलखंड की भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषिक इकाइयों में अद्भुत समानता है । भूगोलवेत्ताओं का मत है कि बुंदेलखंड की सीमाएँ स्पष्ट हैं, और भौतिक तथा सांस्कृतिक रुप में निश्चित हैं। वह भारत का एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है, जिसमें न केवल संरचनात्मक एकता, भौम्याकार की समानता और जलवायु की समता है, वरन् उसके इतिहास, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता का आधार भी एक ही है। वास्तव में समस्त बुंदेलखंड में सच्ची सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक एकता है ।
 
बुंदेलखंड के उत्तर में यमुना नदी है और इस सीमारेखा को भूगोलविदों, इतिहासकारों, भाषाविदों आदि सभी ने स्वीकार किया है । पश्चिमी सीमा-चम्बल नदी को भी अधिकांश वीद्वानों ने माना है, परंतु ऊपरी चम्बल इस प्रदेश से बहुत दूर हो जाती है और निचली चम्बल इसके निकट पड़ती है । वस्तुत: मध्य और निचली चम्बल के दक्षिण में स्थित मध्यप्रदेश के मुरैना और भिण्ड जिलों में बुंदेली संस्कृति और भाषा का मानक रुप समाप्त-सा हो जाता है । चम्बल के उस पार इटावा, मैनपुरी, आगरा जिलों के दक्षणी भागों का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । भाषा और संस्कृति की दृष्टि से ग्वालियर और शिवपुरी का पूर्वी भाग बुंदेलखंड में आता है और साथ ही उत्तर प्रदेश के जालौन जिले से लगा हुआ भिण्ड का पूर्वी हिस्सा (लहर तहसील का दक्षिणी भाग) भी, जिसे भूगोलविदों ने बुंदेलखंड क्षेत्र में सम्मिलित किया है । अतएव इस प्रदेश की उत्तर-पशचिम सीमा में मुरैना और शिवपुरी के पठार तथा चम्बल-सिंध जलविभाजक, जोकि उच्च साभूमि है, आते हैं । वास्तव में, यह सीमा सिंध के निचले बेसिन तक जाती है और वह स्थायी अवरोधक नहीं है । ऐसा प्रतीत होता है कि चम्बल और कुमारी नदियों के खारों और बीहड़ों तथा दुर्गम भागों के कारण एवं मुरैना और शिवपुरी के घने जगलों के होने से बुंदेली भाषा और संस्कृति का प्रसार उस पार नहीं जा सका । बुंदेलखंड का पश्चिमी सीमा पर ऊपरी बेतवा और ऊपरी सिंध नदियाँ तथा सीहोर से उत्तर में गुना और शिवपुरी तक फैला मध्यभारत का पठार है । मध्यभारत के पठार के समानांतर विध्यश्रेणियाँ भोपाल से लेकर गुना तथा शिवपुरी के कुछ भाग तक फैली हुई हैं और अवरोधक का कार्य करती हैं ।-२१ इस प्रकार पश्चिम में रायसेन जिले की रायसेन और गौहरगंज तहसीलों के पूर्वी भाग, विदिशा जिले की विदिशा, बासौदा और सिरोंज तहसीलों के पूर्वी भाग; जिनकी सीमा बेतवा बनाती है; गुना जिले की अशोकनगर (पिछोर) और मुंगावली तथा शिवपुरी की पिछोर और करैरा तहसीलें, जिनकी सीमा अपर सिंध बनाती है, बुंदेलखंड के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र हैं । इनमें विदिशा और पद्मावती (पवायाँ) के क्षेत्र इतिहासप्रसिद्ध रहे हैं । विदिशा दशार्णी संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा है । वैदिश और पद्मावती कै नागों की संस्कृति बुंदेलखंड के एक बड़े भू-भाग में प्रसरित रही है । चंदेलों के समय वे इस जनपद के अंग रहे हैं । सिद्ध है कि इन क्षेत्रों की संस्कृति और भाषा जितनी इस जनपद से मेल खाती है, उतना ही उनका प्राकृतिक परिवेश और वातावरण ।
 
भौतिक भूगोल में बुंदेलखंड की दक्षिणी सीमा विंध्यपहाड़ी श्रेणियाँ बताई गयी हैं, जो नर्मदा नदी के उत्तर में फैली हुई हैं ।-२२ लेकिन संस्कृति और भाषा की दृष्टि से यह उपयुक्त नहीं है, क्येंकि सागर प्लेटो के दक्षिण-पूर्व से जनपदीय संस्कृति और भाषा का प्रसार विंध्य-श्रेणियों के दक्षिण में हुआ है । इतिहासकारों ने नर्मदा नदी को दक्षिणी सीमा मान लिया है, संभवत: छत्रसाल बुंदेला की राज्य-सीमा को केन्द्र में रखकर; लेकिन जनपदीय संस्कृति और भाषा विंध्य-श्रेणियों और नर्मदा नदी से प्राकृतिक अवरोधक पार कर होशंगाबाद और नरसिंहपुर जिलों तक पहुँच गई है । भूगोलवेत्ता सर थामस होल्डिच के अनुसार सभी प्राकृतिक तत्त्वों में एक निश्चित जलविभाजक रेखा, जो एक विशिष्ट पर्वतश्रेणी द्वारा निर्धारित होती है, अधिक स्थायी और सही होती है ।-२३ अतएव प्रदेश की दक्षिणी सीमा महादेव पर्वतश्रेणी (गोंडवाना हिल्स) और दक्षिण-पूर्व में मैकल पर्वतश्रेणी उचित ठहरती है । इस आधार पर होशंगाबाद जिले की होशंगाबाद और सोहागपुर तहसीलें तथा नरसिंहपुर का पूरा जिला बुंदेलखंड के अंतर्गत आता है । कुछ भाषाविदों ने इन क्षेत्रों के दक्षिण में बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट और मंडला जिलों अथवा उनके कुछ भागों को भी सम्मिलित कर लिया है, पर उनकी भाषा शुद्ध बुंदेली नहीं है, और न ही उनकी संस्कृति बुंदेलखंड से मेल खाती है । इतना अवश्य है कि बुंदेली संस्कृति और भाषा का यत्किचिंत प्रभाव उन पर पड़ा है । ऊँचाई पर श्थित होने से कारण वे पृथक् हो गये हैं । महादेव-मैकल पर्वतश्रेणियाँ उन्हें कई स्थलों पर अलग करती हैं और अवरोधक सिद्ध हुई हैं ।
 
दक्षिणी सीमा के संबंध में एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि विंधयश्रेणियों और नर्मदा नदी को पार कर बुंदेली संस्कृति और भाषा यहाँ कैसे आई ? इस समस्या का उत्तरह इतिहास में खोजा जा सकता है । इतिहासकार डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल का मत है कि भारशिवों (नवनागों) और वाकगटकों के इस क्षेत्र में बसने से कारण दक्षिण के इस भाग का संबंध बुंदेलखंड से इतना घनिष्ट हो गया था कि दोनों मिलकर एक हो गये थे और उस समय इन दोनों प्रदेशों में जो एकता स्थापित हुई थी, वह आज तक बराबर चली आ रही है । साठ वर्षीं तक नागों के यहाँ रहने के इतिहास के यह परिणाम निकला है कि यहाँ के निवासी भाषा और संस्कृति के विचार से पूरे उत्तरी हो गये हैं ।-२४ गुप्तों के समय वाकाटक भी यहाँ रहे। कुछ विद्वान् झाँसी जिले के बागाट या बाघाट को, जो बिजौर या बीजौर के पास है, वाकाटकों का आदिस्थान सिद्ध करते हैं, जबकि कुछ इतिहासकार पुराणों में कथित किलकिला प्रदेश का समीकरण पन्ना प्रदेश से करते हुए उसे वाकाटकों की आदि भूमि मानते हैं । वाकाटकों के बाद जेजाभुक्ति के चंदेलों और त्रिपुरी के कलचुरियों के राज्यकाल में भी यह क्षेत्र बुंदेलखंड से जुड़ा रहा । इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि बुंदेलखंड की दक्षिणी सीमा महादेव पर्वतश्रेणी की गोंडवाना हिल्स है, जो जबलपुर के पूर्व में मैकल पर्वतश्रेणी से मिल जाती है ।
 
बुंदेलखंड के पूर्व में मैकल पर्वतश्रेणियाँ, भानरेर श्रेणियाँ, कैमूर श्रेणियाँ और निचली केन नदी है । दक्षिण-पूर्व में मैकल पर्वत है, इस कारण नरसिंहपुर जिले के पूर्व में स्थित जबलपुर जिले के दक्षिण-पश्चिमी समतल भाग अर्थात् पाटन और जबलपुर तहसीलों का दक्षिण-पश्चिमी भाग बुंदेलखंड के अंतर्गत आ गया है । उनकी भाषा और संस्कृति बुंदेली के अधिक निकट है, किंतु दमोह पठार के दक्षिण-पूर्व में स्थित भानरेर रेंज पाटन और जबलपुर तहसीलों के उत्तरी और उत्तरपूर्वी भागों को बुंदेलखंड से विलग कर देती है । भानरेर श्रेणियों के उत्तर-पूर्व में कैमूर श्रेणियाँ स्थित हैं, जिनके पश्चिम में स्थित पन्ना बुंदेलखंड में है और पूर्व में बघेलखंड है । पन्ना जिले की तहसीलों पवई और पन्ना के पूर्व सँकरी पट्टी में बुंदेली भाषा और संस्कृति का प्रसार है । टोंस और सोन नदियों के उद्गम का भूभाग दक्षिण-पश्चिम की उस संस्कृति से अधिक प्रभावित है, -२५ जो कि बुंदेलखंड से मिलती-जुलती है । पन्ना जिले के उत्तर में पन्ना-अजयगढ़ की पहाड़ियों का सिलसिला चित्रकूट तक चला गया है । इसलिए बाँदा जिले का वह भाग जो छतरपुर जिले के उत्तर-पूर्वी कोने और पन्ना जिले के उत्तरी कोने से बिलकुल सटा हुआ है, जो उत्तर में गौरिहार (जिला-छतरपुर) से लेकर चित्रकूट (जिला-बाँदा) तक पहाड़ी क्षेत्र की एक सीमा-रेखा बनाता है और जिसके उत्तर में बाँदा का मैदानी भाग प्रारम्भ हो जाता है, बुंदेलखंड के अंतर्गत आता है । बाँदा जिले का शेष मैदानी भाग उससे बाहर पड़ जाता है । इस तरह बुंदेलखंड की उत्तर-पूर्वी सीमा निचली केन बनाती है ।
 
भू-संरचना और राजनीति की दृष्टि से बाँदा जिला बुंदेलखंड का एक भाग माना गया है, पर उसके अधिकांश भाग की भाषा बुंदेली नहीं है और उसकी संस्कृति बुंदेली संस्कृति से कुछ बातों में भिन्न है । प्राचीन काल में बाँदा चेदि में सम्मिलित नहीं था, भारशिवों और नवनागों के साम्राज्य से बाहर था और वाकाटकों की संस्कृति यहाँ तक पहुँच नहीं पाई; किंतु उसका कालिंजर से लेकर चित्रकूट तक का भाग बहुत प्राचीन समय से ही इस संस्कृति का अंग रहा है । बाँदा के उत्तर-पूर्व में चिल्ला नामक ग्राम में आल्हा-ऊदल का निवास खोजा गया है ।-२६ विंध्यवासिनी देवी का मंदिर बुंदेलों का तीर्थस्थल रहा है । चंदेलों के समय बाँदा का अधिकांश भाग बुंदेली प्रभाव में रहा और बुंदेलों ने भी टोंस नदी तक अपना शासन फैलाया । संभवत: इसी कारण बाँदा जिले से उत्तर-पश्चिमी भाग में भी बुंदेली भाषा और संस्कृति की पैठ है । इस प्रकार बुंदेलखंड के उत्तर-पूर्व में निचली केन नदी की तटीय पट्टी का क्षेत्र, बाँदा जिले से नरैनी और करबी तहसीलों का क्रमश: दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग, सम्मिलित है। पूर्व में पन्ना और दमोह जिले तथा दक्षिण-पूर्व में जबलपुर जिले की पाटन और जबलपुर तहसीलों का क्रमश: दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग, जो मैकल श्रेणियों तक चला गया है, बुंदेलखंड में आता है । इसके अतिरिक्त सोन और टोंस की उद्गम घाटी, जो नर्मदा की तरफ दक्षिण की ओर खुलती है और जिसमें पाटन, जबलपुर, सिहोरा और मुड़वारा तहसीलों की लंबी-सी पट्टी का क्षेत्र है, बुंदेलखंड के अंतर्गत आता है ।
 
उपर्युक्त आधार पर बुंदेलखंड प्रदेश में निम्नलिखित जिले और उनके भाग आते हैं और उनसे इस प्रदेश की एक भौगोलिक, भाषिक एवं सांस्कृतिक इकाई बनती है ।
 
(१) उत्तर प्रदेश के जालौन, झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर जिले और बाँदा जिले की नरैनी एवं करबी तहसीलों का दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग ।
 
(२) मध्यप्रदेश के पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया, सागर, दमोह, नरसिंहपुर जिलेतथा जबलपुर जिले की जबलपुर एवं पाटन तहसीलों का दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी भाग; होशंगाबाद जिले की होशंगाबाद और सोहागपुर तहसीलें; रायसेन जिले की उदयपुर, सिलवानी, गौरतगंज, बेगमगंज, बरेली तहसीलें एवं रायसेन, गौहरगंज तहसीलों का पूर्वी भाग; विदिशा जिले की कुरवई तहसील और विदिशा, बासौदा, सिरोंज तहसीलों के पुर्वी भाग; गुना जिले की अशोकनगर (पिछोर) और मुंगावली तहसीलों; शिवपुरी जिले की पिछोर और करैरा तहसीलें, ग्वालियर की पिछोर, भांडेर तहसीलों और ग्वालियर गिर्द का उत्तर-पूर्वी भाग; किंभड जिले की लहर तहसील का दक्षिणी भाग ।
 
उपर्युक्त भूभाग कै अतिरिक्त उसके चारों ओर की पेटी मिश्रित भाषा और संस्कृति की है, अतएव उसे किसी इकाई के साथ रखना ही होगा । इस कारण जो जिले (जिनके भूभाग विशुद्ध इकाई में सम्मिलित हैं) अपने को बुंदेलखंड का अंग मानते हैं, उन्हें बुंदेलखंड में सम्मिलित किया जा सकता है । ऐसे जिलों में बाँदा, जबलपुर और गुना तो आते हैं, पर अन्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता । मैंने तो हाण विशुद्ध इकाई को ही महत्त्व दिया है ।
 
 इनमें से  शुद्ध बुन्देली जिले टीकमगढ़, जालौन जिल का अधिकांश भाग, हमीरपुर, ग्वालियर क्षत्र के चन्दरी एवं मुंगावली इलाक, भोपाल व विदिशा जिल का आधा पश्चिमी भाग एवं दतिया की सीमा के भाग है। शेष बुन्देली भाषी जिले छतरपुर, पन्ना, दमोह, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, सिवनी, बालाघाट, छिन्दवाड़ा तथा दुर्ग के कुछ भाग है। ऐतिहासिक परम्पराएं, सांस्कृतिक एकता, सामाजिक समानताएं, भौगोलिक सुगमता और विकास की अनुकूलता किसी भी आदर्श राज्य के गुण माने जाते है। बुन्देलखंड राज्य के स्वरूप में य सभी गुण विघमान है। बुन्देलखण्ड का आकार प्रकार स्थापित करने में अनक विद्वानों के जो विभिन्न मत है, उनमें अन्तर बहुत कम है। इन सभी का जो एक सामान्य निष्कर्ष निकलता है उसक अनुसार बुन्देलखंड राज्य के अन्तर्गत 32 जिले आते हैं। व इस प्रकार हैं-
हमीरपुर, झांसी, बांदा, ललितपुर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह, सागर, नरसिंहपुर, भिंड, दतिया, ग्वालियर, शिवपुरी, मुरैना, गुना, विदिशा, सीहोर, भोपाल, रायसन, होशंगाबाद, हरदा, बैतुल, छिंदवाड़ा, सिवनी, मण्डला, बालाघाट, कटनी और जबलपुर।
 
बुन्देली की व्याकरणगत विशेषताएं
 बुन्देली भाषा का बुनियादी शब्द भंडार और व्याकरण अपने जन समाज की भाषा संबंधी हर आवश्यकता पूरी करने योग्य है। यह भाषा समाज के हर प्रकार के विकास के लिए महान अस्त्र है और उसक ऐतिहासिक विकास की महान सफलता भी है।
 
बुन्देली ध्वनि में 10 स्वर 27 व्यंजन हैं। देवनागरी के शेष 16 अक्षर इसमें नही हैं। इन दस स्वरों में से उच्चारण हिन्दी साहित्य से भिन्न हैं।बुनियादी 750 शब्दों में से मुश्किल से 50 शब्द दोनों भाषाआं में समान होगं। इतने ही और शब्दों को खींच तान कर समानता ढूंढी जा सकती है। बाकी बुनियादी तौर पर प्रथक हैं
 
​ क्रि्याओं के विभिन्न काल बनाने के प्रत्ययों में सब एक दूसर से भिन्न  है, और कोई समानता नही है। धातुओं में विकार भी भिन्न प्रकार से होता है।
 
क्रि्याओं में जुड़ने वाल सब प्रत्ययों का हिन्दी में अभाव है। हिन्दी प्रत्यय संस्कृत से लेती है। जो बुंदेली से बिल्कुल नही मिलते हैं।
 
बुन्देली संज्ञा शब्दां की भी हिन्दी से भिन्नता है ।यह भिन्नता भाव वाचक और व्यक्ति वाचक नामों में तो बहुत है ही जाति वाचक नाम भी काफी भिन्न प्रकार के हैं। कारक के चिन्हों में से केवल 4 चिन्ह समान हैं शेष 10 भिन्न हैं। कारण सम्बन्धी विकार भी हिन्दी से भिन्न होता है।
 
बुन्देली सर्वनाम 33 हैं ।10 मूल और 23 रूपंातर क। इनमें केवल 7 एक मूल और 6 रूपांतरों के हिन्दी से समानता रखते हैं ,शेष 26 भिन्न हैं।
 
विशेषण, क्रियाविशेषण, सम्बन्ध बोधक, समुच्चय बोधक और विस्मयाधि बोधक शब्द अधिकतर हिन्दी से भिन्न है।
 
भाषा में प्रयत्न लाधव के नियम बुंदेली भाषा हिन्दी से बहुत आग निकल गई है। उसक संज्ञा, सर्वनाम, क्रियाओं आदि सब शब्द अति संक्षिप्त होते हैं। स्वरों का भारी उपयोग होता है। अधिकांश मूल शब्द एक दो अक्षरों के ही रह गए हैं। तीन अक्षरों से अधिक वाल शब्द केवल सात हैं। चार से ज्यादा तो बिरल ही होते है। इसक मुकाबल हिन्दी के शब्द अधिकतर भारी भरकम होते हैं।
 
संस्कृत उपसंर्गो का बुंदेली में कोई स्थान नही है।
 
बुन्देली की व्याकरणगत विशेषताएं :
 
बुंदेली की ज्ञात 750 मूल क्रियायं, जिसकी धातुएं 2550 से अधिक हैं। एक – एक क्रि्रया से बंुदली भाषा के लिंग -पुरूष वाच्य और काल भेद से 288 रूप या शब्द बनते हैं। और य रूप 2550 धातुओं के सात लाख से अधिक होते हैं।
 
वकाल वाचक रूपोंं या शब्दों के अलावा इन्हीं धातु मात्र से दो हजार से अधिक भाव वाचक संज्ञाएं बनती है। सामान्य भूत और सामान्य वर्तमान काल वाचक शब्दों के 1530 विशेषण होते हैं।
 
वधातु में ने प्रत्यय जोड़ने से तत्संबंधी विशेष ढंग बताने वाल 600 से अधिक शब्द बनते हैं।
 
इसी प्रकार एक दो अक्षर वाल प्रत्यय जोड़ने से इनक विभिन्न कर्ता वाचक, कर्म वाचक, करण वाचक, विश्ाष क्रिया विशेषण, विशेष आदत वाल, विशेष स्वभाव वाल ,विशेष काम वाल ,पूर्व कालिक क्रिया, सामान्य सिलसिला, सिलसिल का प्रारम्भ, निश्चितता, अभ्यास तथा विशेष अवसर वाची शब्द नियमित रूप से बनते हैं। य सब शब्द शक्ति प्रकरण के अनुसार 15000 से अधिक होते हैं।
 
इसी प्रकार यह भाषा संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण,क्रिया विशेषण, सम्बंध वाचक, समुच्यवाचक विस्मयादि बोधक आदि बुंदेली शब्दों से भरपूर हैं। प्रत्यक संज्ञा शब्द से उस सम्बन्धी विशेषण और क्रिया शब्द अलग होते है। इसी प्रकार विशेषण शब्द की भाव वाचक संज्ञायं और क्रिया शब्द होते है जिनकी संख्या लाखों में पंहुचती है।
 
बुंदेली भाषा जीवंत वैज्ञानिक भाषा है जबकि हिन्दी किसी भी क्षत्र की मातृभाषा नही हैं। यह खड़ी बोली संस्कृत, अंग्रजी की खिचड़ी भाषा हैं ।सच्ची ठोस एकता जनभाषाओं के द्वारा स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।
 
बुंदेली का बुनियादी शब्द भंडार और व्याकरण का सांगोंपांग ढांचा शीघ्र प्रकाश में लाने से बंदली गद्य का विकास हो सकगा। इसस एक जीवन्त क्रियाशीलता का विकास होगा। इसस बुंदेली साहित्य की कमी पूरी हो सकगी।
 
 
बुन्देल खंडी और हिन्दी भाषा
 
बुँदलखण्डी में दस स्वर और सत्ताइस व्यंजन हैं । हिन्दी के 16 अक्षर इसमें नहीं हैं। इसक 10 स्वरों में भी 8 स्वरों का उच्चारण बिल्कुल अलग है। इस मुख्य भेद को दखकर हमें चौंकना ने चाहिय क्योंकि 2500 वर्ष पहल ब्राम्ही भाषा की वर्णमाला में 33 अक्षर हैं जिसमें स्वर केवल 6 ही हैं। 250 ई.पू. अशोक के धर्म ले खों से विदित होता हैकि अ,ई,ए,औ ैक  लिए कोई अक्षर नहीं, ऋ, लृ तो हैं ही नहीं। एक हजार ई.पू. की अवस्था भाषा जो संस्कृति की बहिन है, उसमें 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं जो सार के सार हलन्त हैं ही। 1000 ई.पू. की फिनौशियन भाषा में भी केवल 22 अक्षर हैं। इसक और पूर्व की इजिप्शयन भाषा के भाव चित्रों में सिफ‍र् 24 व्यंजन ही है और स्वर दिखते ही नहीं । यूं तो मिश्र की इजिप्शन लिपि तीन खण्डों में चलती है। प्रथम काल पहिल राज्यवश से दसव राज्यवंश 100-1700 ई.पू. तक भावचित्रों में 203 संकत हैं । द्वितीय खण्ड में 14 राज्यवंश से 17वं राज्यवंश तक 1700-525 ई.पू.  में जिस ”हरोटिक” कहते हैं, कुल 24 व्यन्जनों  की वर्णमाला थी। अन्त के काल को ‘कोआप्टिक’ भाषा  525 ई.पू से 638 ईस्वी तक तक आते हुए केवल 7 अक्षर और जुड़ । याने 11 सौ वर्षो में 31 अक्षर वाली भाषा बनी और अंत में लुप्त हो गई। इसी तरह 3 हजार ई.पू. के करीब सुमरी लिपि को अक्कादियों ने अपनी सिमैटिक भाषा के लिए अपना लिया। सुमरी कीलाक्षर लिपि में 41 संकते हैं। जिसमें 36 ध्वनि संकतों से प्राप्त हैं। अक्कादियों के अक्षर से यह मसोपोटमियां और सार पश्चिम एशिया में फैल गई तथा इसी कीलाक्षर लिपि को अनातोली, कनानी, ह्रिवू और हितियों ने अपना लिया। फिर पूर्व की ओर की बाढ़ ने इस एलाम और समस्त ईरान ने अपना लिया। भिन्न-भिन्न भौगोलिक स्थलों ने और दशों ने इस पर भी जरूर असर डाला, परिवर्तन भी किया इसीलिए इसक भावचित्र सिकुड़ और कम होते गए। चित्रात्मक से आरम्भ हुई यह लिपि भावात्मक, ध्वनिआत्मक  तथा अक्षरात्मक स्वरूपों को लांघती हुई वर्णात्मक के स्वरूप में पहुंच गई। असीरी के अक्कदी  में 600 संकत थ।  जिसमें भावचित्र भी भर पड़ थ व सुमर और एलाम पहुँचने पर केवल 120 चिन्हों में रह गई। आखिर 600 ई.पू. में ईरान के अखमानी साम्राज्य ने इन्हीं कीलाक्षरों अर्धवर्णात्मक में जन्म दिया। केवल 41 संकत ही रह गए। यह सब परिव ‍र्‍र्तन 3000 ई. पू. से 600 ई.पू. तक याने 2400 वर्षो में सम्पन्न हुआ। याने कीलाक्षर सुमरी में कुल 41 संकत है जो 36 ध्वनियों से प्राप्त होते हैं । जैस चार संकत राजा, प्रांत, भूमि और अहुर-मज्दा शुद्व भावचित्र हैं । सभी व्यन्जनों में अ स्वर निहित है और जिन व्यंजनों में इ, उ हैं उनक चिन्ह  अलग हैं। इसी तरह सिन्धु-घाटी मोहन-जो-दारो और हरप्पा भाषा में श्री सुधाँषु शंकर राय द्वारा 48 वर्ण अक्षरों को ढूँढा गया है और डा. राव के अनुसार सिंध वर्णमाला में 15 व्यन्जन और सिफ‍र् 5 स्वर ही हैं।
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अगर हम आधुनिक प्रथम शताब्दी  के वैद्याकर्णी वरूरूचि की महाप्राकृत पर नजर डालं तो उनकी परिपाटी के शिष्य आचार्य हमेंन्द्र ने अपभ्रंंश में 9 स्वर और 26 व्यंजन बताए हैं। इसलिय यह स्पष्ट है कि बुन्देली ने तो हिन्दी की बहन है और ने तो संस्कृत की पुत्री। इसको स्वयं स्वतन्त्र भाषा होने का श्रय प्राप्त है। हाँ हो सकता है संस्कृत से बुन्देली ने ठीक उसी प्रकार शब्द लिए हों जैस कन्नड़, तुलुगू, मलयालम भाषाओं ने अपने 1 लाख शब्दों के अनुपात में 60 से 70 हजार शब्द उधार लिए हैं और तमिल ने तो लाख में सिफ‍र् 40 हजार ही संस्कृत शब्द पचाए हैं।
 
 बुन्देली का व्याकरण
 
हिन्दी भाषा ने अपनी  व्याकरण का सारा कलवर संस्कृत से उधार लिया है। इस प्रकार की बात बुन्देली में नहीं है। बुन्देली का प्रारम्भिक युग में कोई व्याकरण अवश्य रहा होगा। जो या तो अब लुप्त हो गया या छानबीन का मोहताज है। लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि यह कातन्त्र व्याकरण की परम्परा में पली है। साथ ही महश्वर परम्परा याने पाणिनी व्याकरण से बहुत दूर तक अलग है। गम्भीरता से दखन पर महर्षि पाणिनी की व्याकरण शैली लगातार 2468 वर्षो से संस्कृत को अपने पन्ज में जकड़ हुय है, जकड़ं रखगी। जब तक भविष्य युग की मांग के अनुसार टक्कर में दूसरा पाणिनी नहीं  पैदा होता। आज तो भयंकर गति से बढ़ता हुआ आधुनकि ज्ञान हजारों नूतन शब्द तथा नई वाक्य रचना की मांग कर रहा है। नय संदर्भ में नय ज्ञान  को नई व्याकरण परिपाटी भी चाहिय। कैस.. ? कब.. ? यह तो भविष्य के गर्भ में है । पर आभास होने लगा है कि संस्कृत को पाणिनी के स्थान पर नय पाणिनी की आवश्यकता है। पाणिनी की जकड़ में फंसी संस्कृत अब छटपटाने लगी हैं। लेकिन बुन्देली ने पहल से ही इस प्रकार की परिधि में घिरना अस्वीकार कर दिया और बोलचाल की परिपाटी वाली कातन्त्र व्याकरण को सहज अपनाया। इसलिए कि बोलचाल की भाषा सदा गिरती पड़ती सदा गतिमान रहती है तथा  वह सदा-सदा आम जन समुदाय के निकट से निकट ही रहगी, इसी कारण बुन्देली का दामन कातन्त्र की हवा में हिलोंर ले ता है।
 
कातन्त्र की परम्परा ऐन्द्र व्याकरण से प्रारम्भ होती है जिस कुमार व्याकरण भी कहते हैं। युधिष्ठर मीमांसक ने ” व्याकरण शास्त्र का इतिहास” में आदि व्याकर्णी इन्द्र को आठ हजार ई.पू. माना है। शायद यह तिथि अनिश्चित हो, कालगणना में अतिशयोक्ति हो, लेकिन इसस आदि पुरानापन तो विदित होता ही है। इन्द्र के बाद वायु, भारद्वाज, भागुरी, पोषकर, चारायण और काषकृत्सन हैं। अन्तिम तीन समकालीन हैं। काषकृत्सन का व्याकरण तो 24 हजार श्लोकों में था। लक्ष्य रह पाणिनी की व्याकरण से कहीं बड़ी ,दुर्भाग्य से यह अब अप्राप्त है, फिर भी इसक 141 सूत्र मिलते हैं । इसका सम्पूर्ण धातु पाठ कन्नड़ भाषा में मिला है। जिस बाद में फिर से संस्कृत में उल्था किया गया है। सातवाहन काल के एक ब्राण शर्ववर्मा ने काषक्रत्सन का अत्यन्त प्रारम्भिक रूप सरली करण कर ”कातन्त्र” के नाम से लिखा हैं। यही ”कातन्त्र” बुन्देली भाषा की शिक्षा परिपाटी का स्रोत है। जिसकी उर्धवक्ता जड़ं वदकालीन संस्कृत से कहीं आग पूर्वकाल में बिखरी पड़ी है। प्रश्न फिर भी खड़ा है कि ‘कातन्त्र’ का विस्तार काल कितना है.. ? आचार्य इन्द्र, वायु, भारद्वाज आदिकाल से प्रथम, द्वितीय और तृतीय युग लपट हैं तथा अंत में चतुर्थ काल में पोषकर चारायण और काषकृत्सन है। आदिकालीन आचार्य इन्द्र की परिपाटी आठ सौवर्षोंं से कम प्रतीत नहीं होती हैं क्योंकि आदिकाल कभी भी लम्बा होता है। बुद्धि का विकास जैस-जैस बढ़ता है उसी तरह अन्य सुधार के काल कमोवश छोट होते चल जाते हैं। फिर आश्चर्य वायु और भारद्वाज द्वितीय तथा तृतीय युग लगभग 500 और 400 वर्णां का निश्चित रहा होगा। तब कहीं आचार्य पोषकर, चारायण और काषकृत्सन ने एक ही युग के समकक्ष विराजमान हो अपनी परिपाटी को संजोगा- संवारा होगा। जिसका प्रारम्भ से अन्त तक का काल अवश्य से तीन सौ वर्षो तक चलता रहा होगा। अगर इसी काल को आचार्य पाणिनी के काल 480 ई.पू.‍र् जोड़ दिया जाय तो 2480 ई.पू. होता है। यान बुन्देली अपनी काषकृत्सन परिपाटी की पुरानी जड़ों में सूक्ष्म रूप से निश्चित विद्यमान चली आ रही है। फर्क इतना है कि उन बदलते गुणों में इसका  क्या नाम था ..? पता नहीं। नामांकरण हुआ  भी था या नहीं.. ? इसका कोई ज्ञान नहीं । शायद भविष्य की खोजों में कहीं मिल।
 
कातन्त्र के परिपक्व होने की उपरोक्त गणना कतिपय विद्वितजन कपलां  कल्पित भी कह सकते हैं। लेकिन पाणिनी की परिपाटी के विषय में स्वयं पाणिनी का वर्णन इस सन्दर्भ में हमारा मार्गदर्शक होगा। उन्होंने लिखा है कि उनक पहिल 65 व्याकरण‍रचार्य  गुजर है। अगर इन समस्त आचार्यो  का काल 30 वर्ष प्रति व्यक्ति रखं तो काल 1950 वर्ष बैठता है ।इसी काल में पाणिनी का काल जोड़ दं तो 2430 ई.पू. होता है। साथ ही पाणिनी ने अपने पहल 10 आचार्यो  की भिन्न-भिन्न परिपाटी का उल्लख किया है। इनक नाम है- शकटायन, शाकल्य, आदिशाली, गाग्र्य, गालव, भारद्वाज, काश्यप, सनक, स्फोटायन और चक्रवर्यण। एक परिपाटी का सुधार दूसरी में पहुँत तो पहुंचते काफी समय व्यतीत होता है । अगर औसतन प्रत्यक का समय 200 वर्ष रखं तो काल दो हजार वर्षो का होता है। और इसमें पाणिनी का समय 480 ई.पू.  का समय निकलता है। उपरोक्त 55 व्याकर्णाचार्यो और दस भिन्न-भिन्न परिपाटियों का काल एक ही चक्र में समान्तर चलते हैं और एक दूसर की बराबरी पर उतर आते हैं और तिथियां भी एक सी दर्शाते हैं।
 
 बुन्देली का स्वर स्फुर्ण भेद
 
प्रथम हम स्वरों के उच्चारण को ही पकड़ते है।  बुंदेली में दस स्वरों का उच्चरण हिन्दी के आठ स्वरों बिल्कुल भिन्न है। यह कैस जाना जाव.. ? इसक लिए हमें ध्वनिशास्त्र पर नजर डालनी होगी। ध्वनि में केवल भेद ही नहीं वजन भी होता है। हमार भाषा-शास्त्रियों ने इस बड़ी बारीकी से नापा है। शब्द ध्वनि को 8 परमाणुओं की एक मात्रा कहा है। व्यन्जनों में एक मात्रा 8 परमाणुओं की होती है। डढ़ मात्रा 12 परमाणुआंं की। 2 मात्रा 16 परमाणुआंं  की ,ढाई  मात्रा 20 परमाणुआं की और 3 मात्रा 24 परमाणुओंं की होती है। इस क्रम में बुन्देली का स्वर उच्चारण वैभिन्न समझनं के लिय हम केवल ‘अ’ स्वर को ले ते हैं। और इसक उच्चार्णो के पांचों अलगाव को मात्राओं में दर्शाते हैं।
 
स्वर नामाकरण मात्रा परमाणु संख्या
 
1.लघुउत्तर(अ-अनमर्ति)18
 
2.लघु(अ-क) हस्व112
 
3.गुरू(अ) दीर्घ2्!!16
 
4.गुरूतर(अ) अतदीर्घ2!!20
 
5.गुरूतम प्लुत324
 
इस तालिका को दखकर हम ठीक-ठीक समझ सकंग कि ध्वनि भेद कैसा होता है। हिन्दी के इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ का उच्चरण 2!! से 3 मात्रा  का होता है जबकि बुंदेली में इनकी ध्वनियां 1 से 2 मात्राओं, याने 8 से 16 परमाणुओं के माध्य से स्फुरिट होता है। इन्हीं मात्राओं  की वहज से बुंदेली काव्य तथा संगीत में कितनी सरसता आती होगी इसका अन्दाजा लगाया नहीं जा सकता । अभी तक बुन्देली जगत ने ईश्वरी सरीख कवियों को इस मापदण्ड पर तौला नहीं है और ने उनकी स्वर ध्वनियों को संगीत लहरी में लखबद्ध किया है।
 
बुन्देली में ई, ए, इ, ओ, औ, ऐ प्रत्यय हैं जब य प्रत्यय बुन्देली धातु से जुड़ते हैं तो  हिन्दी और बुन्देली का एक समान उच्चारण हो जाता है। जैस बुन्देली चर धातु से चल शब्द और उसमें जब उपरोक्त प्रत्यय जुड़ते हैं तो इनका रूप चलो, चल, चली इत्यादि हिन्दी के समान ही होता है। लेकिन याद रह इनकी बनावट में जमीन आसमान का फर्क है। क्योंकि फर्क ‘अ’ की पूर्व ध्वनि का है। बुँदलखण्डी उच्चारण में ‘अ’ इस ध्वनि की कमी हो जाती है। सबस विचित्र बात यह है कि बुन्देली में संस्कृत जैसी संधि अमान्य है। इसी अक्षर स्वर और व्यंजन एक दूसर के सामन या बाद में स्वच्छन्दता से आत और व्यंजन एक दूसर के सामने या बाद में स्वच्छन्दता से आत और बन रहते हैं। पास-पास रहन से उनक उच्चारण में कोई फर्क पड़ता ही नहीं।
 
बुन्देली में हिन्दी के अक्षर ऋ  ल  अं अ:  ड, , ढ, ष, य, व, क्ष, त्र ज्ञ नहीं है। और स्वरों में अ आ को छोड़कर इ, ई उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त अक्षर माना है। इसलिय इनक उच्चारण में बड़ा फर्क पड़ गया है। उदाहरण लीजिय-
‘ई’ स्वतन्त्र स्वर ने होकर अ+ईअी है इसी तरह ‘उ’ पूणाँस्वर नहीं बल्कि अ+उअु अथवा अ+ऐअै, अ+ओअऔ इत्यादि । इसी संदर्भ में उपरोक्त ‘इ’ की लिपि का कुछ इतिहास भी दखं। दक्षिण भारत के मदुरा तथा तिरूनलवली जिल के सित्तनवासल स्थान के गुफा लेखों से  क. व्ही. सुब्रामण्यम अययर ने यह सिद्ध किया कि इनमें ‘इ’ अक्षर के लिए एक दण्ड  और दोनों ओर दो बिन्दुओं का चिन्ह मिलता है। इस ‘इ’ के लिए उत्तर भारत में इस प्रकार का चिन्ह 300 ई.पू. तक के ब्राी लेखकोंं में कहीं भी प्राप्त नहीं होता। लेकिन कालांतर में यही चिन्ह उत्तर और पश्चिम भारत के लेखों में मिलता है। इसलिए यह सहज कहा जा सकता है कि ई.प.ू तीसरी शताब्दी में‘ ई’ का यह चिन्ह दक्षिण से उत्तर पहुँच गया था। और इसका स्वरूप ‘इ’ बना। इसस भी अनुमान किया जाता है कि उत्तर भारत में‘ ई’ का स्वरूप बहुत बाद में जुड़ा। चूँकि बुन्देली इस युग से बहुत पहल प्रचलित थी तो इस ‘इ’ की ध्वनि जैस वैदिक काल के पूर्व थी उसी तरह इसका उच्चारण कायम रखा और अ+ई​िअ की तरह युक्ताक्षर माना तथा स्वतन्त्र स्वर मानने से इंकार कर दिया।
 
 
यहां  पर थोड़ी चर्चा वैज्ञानिक ढंग स, बुन्देली किस काल में बनती रही यह भी मालूम करना जरूरी है। अस्तु आधुनिक विद्वानों ने वैदिक भाषा के काल को पांच सौ ई.पू.मध्यकाल 500-1000 सन् तथा वर्तमान काल 1000 सन् से आज तक माना है। यह गणना ढर से पाश्चात्य पण्डितों से वदों की रचनाकाल निर्धारित करने की वजह से है। लेेकिन जब ऐतिहासिक दृष्टि से व ासुदशरण अग्रवाल ने पाणिनी का काल 484 ई.पू. कूता है तो वदों का काल 1500 ई.पू. मानना आश्चर्य होगा। वदों की काल रचना 25 सौ से 15 सौ ई.पू. होना निर्धारित हो चुकी तो ‘छन्दस पाली’ प्राकृत तथा अन्य बोलियों की उमर का अंदाजा लेगाना आसान है। पाली प्रकृत की प्रथम अवस्था का नाम है। सम्भव इसी कारण भारत मुनि ने प्राकृत भाषाओं का उल्लख मागधी, अवन्सी, प्राच्य, शैरसनी, अर्ध मागधी, बाल्हकि और दक्षिणात्य मेंकिया। बाद में आचार्य हमेंन्द ने पैशाची और लाटी अधिक जोड़ दी,। लेकिन दखा जाय तो मागधी, अर्धमागधी, शैरसनी और महाराष्ट्रीय के य चार प्राकृतं ही मुख्य हैं। पाली भी पंक्ति पाठ का अपभ्रस शब्द है। पाली के पूर्व वैदिक भाषा को ‘छन्दस’ कहते थ। ‘छन्दस’ ने ही प्राकृतों को जन्म दिया अथवा दोनों समकक्ष चलती रही। फिर भी छन्दस को पाली तक पहुँचने में 15सौ वर्ष लग होंग। तब प्राकृत रूप उभरता है। यह युग 500 ई.पू. से एक हाजर सन मानते हैं। लेकिन पाली का सादि स्वरूप पाली में निहित है।
 
 उसी तरह पाली छन्दस् से गुत्थी हुई है। अर्थात प्राकृत की परिपाटी भी छन्दस्  के गर्भ‍र् में निहित है। मुख्यत: पाली बुद्ध के वचनों में है और बुद्ध  का काल 624 -544 ई.पू. माना जाता है। पर पाली शब्द का प्रयोग ईस्वीसन की 5वीं शताब्दी में आचार्य बुद्ध घोष ने सर्वप्रथम उपयोग किया है और ई.पू. पाली शब्द का कहीं प्रयोग नहीं मिलता तो क्या 624 ई.पू. 500 सन् याने 11सौ वर्षो तक पाली थी ही नहीं.. ?  या बनती रही ..? अगर इतना लम्बा काल नामकरण के लिय लगता है तो उद्गम कहाँ रखना चाहिय.. ? इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। आचार्य हरिहर निवास द्विवदी ने तो बौद्ववाँगमय की पाली तथा शैरसनी को वत्रवती की पुत्री कहा है। याने उसक  भौगोलिक क्षत्र को भी निर्धारित कर दिया है। इसलिए प्राकृतों से निकलनवाली या उसक समकक्ष सब बोलियों का उद्गम ‘छन्दस’ से है। याने बुन्देली का प्रारंभिक काल 15सौ ई.पू. मानने में कोई बाधा प्रतीत नहीं होती ।
 
पूर्व में हमने बुन्देली और हिन्दी उच्चारण भेद को समझा अब हम इनक अक्षर में दोनों को भी दखं  संस्कृत या हिन्दी का आदि स्वर ऋ’ बुन्देली में अ, इ, उ से सीमित रहता है। प्राकृत में भी ‘ऋ’ ध्वनि अ,इ,उ स्वरों से किसी एक में बदल जाती है।
 
संस्कृत ..पाली… .प्राकृत…….बुन्देली..
 
ऋक्ष    अच्छ   अच्छ   सध (ई)
 
हृदय    हदय    हदय    हिरदै (र)
 
मृग    मग    मग    मिरगा (ई)
 
पुष्कर   पोक्खर  पोक्खर  पुखरा (उ)
 
मृत    मिट    मिट    माटी(अ)
 
अब हिन्दी के अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ए, ऐ, ओ, औ स्वरों का उच्चारण बुन्देली में इस प्रकार होगा अ, आ, ​िअ, अी, अु, अू, अ, अै, औ हिन्दी के अं आ: तो संयुक्त अक्षर होने के नाते बुन्देली में शामिल नहींहैं। साथ ही हिन्दी का एअ+ई औअ+ऊ तथा ए की वृद्धि ऎ और ओ की बुद्धि औ है इसलिए प्रारम्भिक रूप से बुन्देली में अ आ दो ही मूल स्वर हैं। इ उ तो दोनों हलन्त है। अत: हम कह सकते हैं कि अ, इ, उ ही बुन्देली के स्वर मात्र हैं। प्रथम ‘अ’ पूर्णस्वर तथा अंत के इ उ हलन्त हैं।
 
 धातु
 
किसी भी भाषा का मूलाधार धातुंए हैं। आज के पाश्चात्य विद्वान धातुओं को अमान्य करने लग हैं। कारण कुछ भी हो पर लगता है कि उनकी भाषाऐं इतनी मिश्रित हैं कि मूल का पता पाना असम्भव है।  लेकिन अगर हम अपने धातु जगत को भूल जावं तो समस्त भाषाओं का कलवर ही ढह जावगा।
हम प्रथम संस्कृत को लेते है। पाणिनि के अष्टाध्याई में 1944 संस्कृत की धातुयं गिनाई हैं। भट्टो जी दीक्षित ने उनक ग्रंथ पर टीका टिप्पणी करते हुए  2148 धातुंए लिखी हैं जिनमें दो सौ धातुऐं वैदिक काल में ही लुप्त हो गईं। इसलिए उनक अर्थ और उपयोग नष्ट हो गए । और इसी तरह दो सौ अन्य धातुओं का उपयोग ही समाप्त हो गया। अगर लेखा-जोखा किया जाय तो तो कुल धातुऐं  1748 रह जाती है। आम भ्राँति संस्कृत के बार में यह भी है कि अन्य भारतीय भाषाएं इन्ही धातुओं पर अपना कलेवर बांध हुए हैं। बात ऐसी नहीं,  आचायों ने महाराष्ट्रीय प्राकृत की 639 धातुयं हैं और अपभ्रंश की 850 धातुंए हैं । दोनों मिलाकर 1489 हैं और इनका संस्कृत से बिल्कुल अलगाव है। बुन्देली की भी अपनी धातुएं हैं जो इन्ही से ही ली गई हैं। जहां तक हिन्दी का प्रश्न है  डा.रघुवीर ने अपनहिन्दी शब्द कोष में संस्कृत से हिन्दी के लिए सरल 520 धातुंए लेना समुचित समझा और कहा कि बीस उप-सर्ग और 80 प्रत्यय जोड़ने से लाखों शब्द बनाय जा सकते हैं। लेकिन इतने शब्द अभी पैदा नहीं हुए हैं। बुन्देली की व्याकरण के लेखक श्री नुना जी ने अपनी पुस्तक ”बुन्देली भाषा का बुनियादी शब्द भंडर मे ” लगभग बुनियादी ​क्रिया शब्द 750 की बात कहीं है। बुन्देली में प्रत्यक मूल शब्द को लिंग, वचन, पुरूष, वाच्य और काल भेद से करीब 288 शब्द होते हैं तो सिफ‍र् 750 के 2 लाख 16 हजार शब्द अनायास बने हुए है।
 
लक्ष्य रह कि संस्कृत उपसर्गो का बुन्देली में कोई उपयोग नहीं क्योंकि बुँदलखंडी इसमें बिल्कुल भिन्न है। जब यह संस्कृत की जोड़ में उतनी दूर है तो हिन्दी की बात ही क्या! क्रियाओं के विभिन्न काल दर्शाने वाल प्रत्यय स्वंय भिन्न हैं। कोई एक दूसर से मिलता नहीं । धातुओं में विकार भी अलग प्रकार से होता है। वैस तो क्रियाओं में जुड़ने वाल सब प्रत्ययों का हिंदी में अभाव है। हिन्दी तो सीध संस्कृत से प्रत्यय उधार लेती है। जिसक बुँदलखण्डी से कोई मलजोल बैठता ही नहीं। बुन्देली में संज्ञा शब्द कितने ही दहाती से प्रतीत क्यों ने हो, पर व स्वयं में सहज हैं और हिन्दी से उनकी विशेष भिन्नता दिखती है। यही भिन्नता भाव-वाचक, व्यक्तिवाचक, जातिवाचक नामों में भी प्रतीत होती है। व्याकरण का मूलाधार अक्षरों के उच्चारण में निहित हैजो अपन-अपने स्थान से भेद भी दर्शाता है। वैदिक ध्वनि समूह में 52 ध्वनियां हैं। स्वर 13 जिनमें मूल 9 और 4 संयुक्त ,फिर 39 स्पर्श व्यंजन हैं।
 
मानव को ज्ञान कोष की वृद्धि के साथ ध्वनियां भी बढ़ानी पडी़ ताकि शब्द कोष बढ़ । इसलिय संस्कृत के फैलाव में ध्वनियों का विस्तार करना पड़ा लेकिन मूल ध्वनियां कहीं ने कहीं तो थी हीं और व संस्कृत के लिय छन्दस् से प्राप्त हुई और इसी छन्दस् सपंाली ने भी ली परन्तुवह उनका विस्तार नहीं कर पाई। फिर भी वह अपना ज्ञान 10+3344 ध्वनियों से निकाल लेती थीं। क्योंकि इसमें सहज लोच था। इसी प्रकार बुन्देली तो 10+2737 से ही अपना कार्य चला लेती थी। क्योंकि इसमें समयानुकूल शब्दावली प्राप्त थी। याने इन्हीं 37 और 44 स्वर व्यन्जनों का विकास 52 ध्वनियां हैं इसस प्रमाणित होता है कि 37 ध्वनियों वाली बुन्देली बोली या भाषा सबस पुरानी हैं और वह अपना अस्तित्व अभी तक शान से निभाय चली जा रही है। यहाँ यह भी कह देना जरूरी है कि प्रत्यक संस्कृत अक्षर की ध्वनियाँ 2835 प्रकार की हैं और इस महती छलनी से छानकर बुन्देली की ध्वनि प्रकार भी निकालना होगा।

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‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग फारस और अरब से माना जाता है। वास्तव में संस्कृत शब्द ‘सिंधु’ से ‘हिन्दी’ शब्द उद्भूत हुआ है। यह सिंध नदी के आसपास की भूमि का नाम है। ईरानी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है, इसलिए ‘सिंधु’ का रूप ‘हिंदू’ हो गया तथा ‘हिंद’ शब्द पूरे भारत के लिए प्रयुक्त होने लगा और प्रकारांतर से ‘हिन्दी’ शब्द अस्तित्व में आया।
‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग अमीर खुसरो ने भी किया। अमीर खुशरो तुर्क थे, लेकिन वे भारत में पैदा हुए थे। 1317 ई. के आसपास पैदा हुए अमीर खुसरो का कहना था-‘‘चूँकि मैं भारत में पैदा हुआ हूँ अतः मैं यहाँ की भाषा के संबंध में कुछ कहना चाहता हूँ। इस समय, यहाँ प्रत्येक प्रदेश में, ऐसी विचित्र एवं स्वतंत्र भाषाएँ प्रचलित हैं जिनका एक-दूसरे से संबंध नहीं है। ये हैं-हिन्दी (सिंधी), लाहौरी (पंजाबी), कश्मीरी- डूगरों (जम्मू के डूगरों) की भाषा, धूर समुंदर (मैसूर की कन्नड़ भाषा), तिलंग (तेलुगु), गुजरात, मलाबार (कारो मंडल तट की तमिल), गौड़ (उत्तरी बँगला), बंगाल, अवध (पूर्वी हिन्दी), दिल्ली तथा उसके आसपास की भाषा (पश्चिमी हिन्दी)। ये सभी हिन्दी की भाषाएँ हैं, जो प्राचीन काल से ही जीवन के सामान्य कार्यों के लिए, हर प्रकार से, व्यवह्वत होती आ रही हैं।”
 
एक अन्य स्थान पर हिन्दी की चर्चा करते हुए अमीर खुसरो लिखते हैं-‘‘यह हिन्दी की भाषा है।” ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ वास्तव में खुसरो का संस्कृति से तात्पर्य है, न कि उस भाषा से जिसे आज हम इस नाम से अभिहित करते हैं। आगे इसी संबंध में वे लिखते हैं:
                                                                ‘‘यदि तथ्य को ध्यान में रखकर गंभीरता से विचार किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि हिन्दी पारसी (फारसी) से निम्नकोटि की नहीं है। यह अरबी की अपेक्षा जिसका सभी भाषाओं में प्रमुख स्थान है, निम्नकोटि की है, भाषा के रूप में अरबी का एक पृथक स्थान और कोई भी अन्य भाषा इसके साथ सम्मिलित नहीं की जा सकती। शब्द भंडार की दृष्टि से पारसी अपूर्ण भाषा है और बिना अरबी के छौंक के यह रुचिकर प्रतीत नहीं हो सकती। चूँकि अरबी विशुद्ध तथा पारसी मिश्रित भाषा है, अतः यह कहा जा सकता है कि एक आत्मा है तो दूसरी शरीर। अरबी में कुछ भी सम्मिलित नहीं किया जा सकता, किंतु फारसी में सब प्रकार का सम्मिश्रण संभव है।”
 
‘‘हिन्द की भाषा अरबी के समान है, क्योंकि इसमें किसी प्रकार का मिश्रण नहीं किया जा सकता। यदि अरबी में व्याकरण तथा वाक्य-विन्यास है तो हिन्दी में भी उससे एक अक्षर कम नहीं है। यदि यह प्रश्न करें कि हिन्दी में भी क्या अलंकार शास्त्र तथा विचार-प्रकाशन के अन्य विज्ञान हैं तो इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि इस संबंध में भी वह किसी तरह से न्यून नहीं है। जिस किसी व्यक्ति ने इन तीनों भाषाओं को अधिकृत कर लिया है, वह यह कह सकता है कि मैं इस संबंध में कुछ भी गलत तथा अतिशयोक्तिपूर्ण बात नहीं कर रहा हूँ।”
 
1886 ई. में वियना की ओरियंटल कांग्रेस ने तत्कालीन भारत सरकार से यह अनुरोध किया था कि वह विधिवत् भारत की भाषाओं का सर्वेक्षण कराए। उसी के अतर्गत बाद के दिनों में जॉर्ज ग्रियर्सन ने भारत का विस्तृत भाषा-सर्वेक्षण किया अथवा करवाया, जो हमारे लिए इस विषय से संबंधित एक बड़ी देन है। ग्रियर्सन ने इस संबंध में स्पष्ट किया है-‘‘विभिन्न स्थानीय सरकारों से परामर्श के पश्चात् मद्रास तथा बर्मा प्रदेशों एवं हैदराबाद एवं मैसूर राज्यों को इस सर्वेक्षण की सीमा से पृथक रखने का निर्णय लिया गया, ताकि इसके अंतर्गत हमारे भारतीय साम्राज्य की कुल 29 करोड़ 40 लाख जनसंख्या में से 22 करोड़ 40 लाख वाली आबादी का भाग जिसमें पश्चिम से पूर्व तक बलोचिस्तान, पश्चिमोत्तर सीमांत, कश्मीर, पंजाब, बंबई प्रेसीडेंसी, राजपूताना एवं मध्य भारत, मध्य प्रदेश तथा बरार, संयुक्त प्रदेश आगरा व अवध बिहार एवं उड़ीसा, बंगाल तथा असम प्रदेश सम्मिलित हैं, आ सके।”
 
1929 ई. की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 31 करोड 60 लाख थी। इनमें 29 करोड़ लोगों की भाषा का सर्वेक्षण करते हुए जॉर्ज ग्रियर्सन ने पाया कि भारत में विभिन्न भाषाओं और बोलियों की संख्या 875 है। हालाँकि उनमें 179 भाषाओं और 524 बोलियों के नाम ग्रियर्सन ने दिए हैं।
संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है। ऋग्वेद से पहले भी सम्भव है कोई भाषा विद्यमान रही हो परन्तु आज तक उसका कोई लिखित रूप नहीं प्राप्त हो पाया। इससे यह अनुमान होता है कि सम्भवतः आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा ऋग्वेद की ही भाषा, वैदिक संस्कृत ही थी। विद्वानों का मत है कि ऋग्वेद की भी एक काल अथवा एक स्थान पर रचना नहीं हुई। इसके कुछ मन्त्रों की रचना कन्धार में, कुछ की सिन्धु तट पर, कुछ की विपाशा-शतद्रु के संभेद (हरि के पत्तन) पर और कुछ मन्त्रों की यमुना गंगा के तट पर हुई। इस अनुमान का आधार यह है कि इन मन्त्रों में कहीं कन्धार के राजा दिवोदास का वर्णन है, तो कहीं सिन्धु नरेश सुदास का। इन दोनों राजाओं के शासन काल के बीच शताब्दियों का अन्तर है। इससे यह अनुमान होता है कि ऋग्वेद की रचना सैकड़ों वर्षों में जाकर पूर्ण हुई और बाद में इसे संहित-(संग्रह)-बद्ध किया गया।
ऋग्वेद के उपरान्त ब्राह्मण ग्रन्थों तथा सूत्र ग्रन्थों का सृजन हुआ और इनकी भाषा ऋग्वेद की भाषा से कई अंशों में भिन्न लौकिक या क्लासिकल संस्कृत है। सूत्र ग्रन्थों के रचना काल में भाषा का साहित्यिक रूप व्याकरण के नियमों में आबद्ध हो गया था। तब यह भाषा संस्कृत कहलायी। तब छन्दस् वेद तथा लोक-भाषा (लौकिक) में पर्याप्त अन्तर स्पष्ट रूप में प्रकट हुआ।
 
 
डॉ. धीरेन्द्र वर्मा का मत है कि पतञ्जलि (पाणिनि की व्याकरण अष्टाध्यायी के महाभाष्यकार) के समय में व्याकरण शास्त्र जानने वाले विद्वान् ही केवल शुद्ध संस्कृत बोलते थे, अन्य लोग अशुद्ध संस्कृत बोलते थे तथा साधारण लोग स्वाभाविक बोली बोलते थे, जो कालान्तर में प्राकृत कहलायी। डॉ. चन्द्रबली पांडेय का मत है कि भाषा के इन दोनों वर्गों का श्रेष्टतम उदाहरण वाल्मीकि रामायण में मिलता है, जबकि अशोक वाटिका में पवन पुत्र ने सीता से ‘द्विजी’ (संस्कृत) भाषा में बात न करके ‘मानुषी’ (प्राकृत) भाषा में बातचीत की। लेकिन डॉ. भोलानाथ तिवारी ने तत्कालीन भाषा को पश्चिमोत्तरी मध्य देशी तथा पूर्वी नाम से अभिहित किया है।
 
परन्तु डॉ. रामविलास शर्मा आदि कुछ विद्वान्, प्राकृत को जनसाधारण की लोक-भाषा न मानकर उसे एक कृत्रिम साहित्यिक भाषा स्वीकार करते हैं। उनका मत है कि प्राकृत ने संस्कृत शब्दों को हठात् विकृत करने का नियम हीन प्रयत्न किया। डॉ. श्यामसुन्दर दास का मत है-वेदकालीन कथित भाषा से ही संस्कृत उत्पन्न हुई और अनार्यों के सम्पर्क का सहारा पाकर अन्य प्रान्तीय बोलियाँ विकसित हुईं। संस्कृत ने केवल चुने हुए प्रचुर प्रयुक्त, व्यवस्थित, व्यापक शब्दों से ही अपना भण्डार भरा, पर औरों ने वैदिक भाषा की प्रकृति स्वच्छान्दता को भरपेट अपनाया। यही उनके प्राकृत कहलाने का कारण है।”
 
व्याकरण के विधि निषेध नियमों से संस्कारित भाषा शीघ्र ही सभ्य समाज की श्रेष्ठ भाषा हो गई तथा यही क्रम कई शताब्दियों तक जारी रहा। यद्यपि महात्मा  बुद्ध के समय संस्कृत की गति कुछ शिथिल पड़ गई, परन्तु गुप्तकाल में उसका विकास पुनः तीव्र वेग से हुआ। दीर्घकाल तक संस्कृत ही राष्ट्रीय भाषा के रूप में सम्मानित रही।
जनसाधारण अल्प शिक्षित वर्ग के लिए संस्कृत के नियमों का अनुसरण कठिन था, अतः वे लोकभाषा का ही प्रयोग करते थे। इसीलिए महावीर स्वामी ने जैन मत के तथा महात्मा बुद्ध ने बौद्ध मत के प्रसार के लिए लोकभाषा को ही अपनी वाणी का माध्यम बनाया। इससे लोकभाषा को ऐसी प्रतिष्ठा का पद प्राप्त हुआ, जो उससे पूर्व कभी प्राप्त नहीं हुआ था।
 
फिर भी संस्कृत भाषा का महत्त्व कभी कम नहीं हुआ। भास, कालिदास आदि के नाटकों में सुशिक्षित व्यक्ति तो संस्कृत बोलते हैं, परन्तु अशिक्षित पात्र -विट-चेट विदूषक तथा दास-दासियाँ आदि प्राकृत में बात करते हैं। परन्तु ये सब जिन प्रश्नों के उत्तर प्राकृत में देते हुए दिखाई गए हैं, उन प्रश्नों को संस्कृत में ही पूछा गया है। इससे स्पष्ट होता है। कि जनसाधारण भी संस्कृत को अच्छी तरह समझ लेते थे, भले ही बोलने में उन्हें कठिनाई प्रतीत होती हो। पंचतंत्र में विष्णु शर्मा ने संस्कृत भाषा में ही राजकुमारों को शिक्षा प्रदान की थी। डॉ. आर.के. मुकर्जी ने कहा है, ब्राह्मण काल एवं उसके पश्चात् भी निःसन्देह संस्कृत सामान्य जनता के धार्मिक कृत्यों पारिवारिक संस्कारों तथा शिक्षा एवं विज्ञान की भाषा थी।”1 सरदार के.एम. पणिक्कर ने कहा है संस्कृत विश्व की संस्कृति और सभ्यता की भाषा है जो भारत की सीमाओं के पार दूर-दूर तक फैली हुई थी।”
 
हिन्दी का निर्माण-काल
 
अपभ्रंश की समाप्ति और आधुनिक भारतीय भाषाओं के जन्मकाल के समय को संक्रांतिकाल कहा जा सकता है। हिन्दी का स्वरूप शौरसेनी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से विकसित हुआ है। 1000 ई. के आसपास इसकी स्वतंत्र सत्ता का परिचय मिलने लगा था, जब अपभ्रंश भाषाएँ साहित्यिक संदर्भों में प्रयोग में आ रही थीं। यही भाषाएँ बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हुईं। अपभ्रंश का जो भी कथ्य रुप था-वही आधुनिक बोलियों में विकसित हुआ। अपभ्रंश के संबंध में ‘देशी’ शब्द की भी बहुधा चर्चा की जाती है। वास्तव में ‘देशी’ से देशी शब्द एवं देशी भाषा दोनों का बोध होता है। प्रश्न यह कि देशीय शब्द किस भाषा के थे ? भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में उन शब्दों को ‘देशी’ कहा है ‘जो संस्कृत के तत्सम एवं सद्भव रूपों से भिन्न हैं।’ ये ‘देशी’ शब्द जनभाषा के प्रचलित शब्द थे, जो स्वभावतया अप्रभंश में भी चले आए थे। जनभाषा व्याकरण के नियमों का अनुसरण नहीं करती, परंतु व्याकरण को जनभाषा की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करना पड़ता है, प्राकृत-व्याकरणों ने संस्कृत के ढाँचे पर व्याकरण लिखे और संस्कृत को ही प्राकृत आदि की प्रकृति माना। अतः जो शब्द उनके नियमों की पकड़ में न आ सके, उनको देशी संज्ञा दी गई।  प्राचीन काल से बोलचाल की भाषा को देशी भाषा अथवा ‘भाषा’ कहा जाता रहा। पाणिनि के समय में संस्कृत बोलचाल की भाषा थी। अतः पाणिनी ने इसको ‘भाषा’ कहा है। पतंजलि के समय तक संस्कृत केवल शिष्ट समाज के व्यवहार की भाषा रह गई थी और प्राकृत ने बोलचाल की भाषा का स्थान ले लिया था।
सम्पूर्ण देश में हिन्दी के उत्तरोत्तर विकास-विस्तार में विश्वविद्यालयों की महती भूमिका है। जिस प्रकार सम्पूर्ण उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में होता है, उसी प्रकार देश का बहुआयामी निर्माण देश की शिक्षा संस्थानों में होता है। स्वतन्त्रता के उपरांत विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभागों की स्थापना जोर-शोर से शुरू हुई। मद्रास विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग सन् 1954 में खुला, जो हिन्दी साहित्य के पठन-पाठन तथा शोध कार्य हितार्थ निरन्तर सक्रिय रहा। इस विभाग में प्रथम आचार्य शंकरराजू नायडू थे, जिन्होंने कम्ब रामायण और तुलसी का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। तिरुकुरल का हिन्दी में अनुवाद किया। उनके उपरांत एस.एन. गणशेन् आए जिन्होंने 1975 में हिन्दी और तमिल व्याकरण लिखा तथा सुब्रह्मण्य भारती की कविताओं का 1986 में तथा मणिमेखलै में 1990 में अनुवाद किया। उनके उपरांत डॉ. टी.एस. कुप्पुस्वामी आये जिनकी कृति ‘हिन्दी रीतिकाव्य’ 1990 में प्रकाशित हुई तथा विभाग की अन्य प्राध्यापिका डॉ. शारदा रमणी की कृति भारतेन्दु के गीतों में राष्ट्रीय चेतना 1990, संघम काल में नारी, 1992 में छपी।
 
हम सब यह जानते हैं कि कोई भी भाषा एक आदमी द्वारा बनाई नहीं जा सकती। भाषा का निर्माण या विकास धीरे-धीरे समाज में आपस में बोलचाल से होता है। समय के साथ-साथ भाषा बदलती रहती है, इसलिए एक भाषा से दूसरी भाषा बन जाती है। हिन्दी भाषा का उद्भव एवं विकास में उसकी पूर्ववर्ती भाषाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
जब भारत ‘जगद्गुरु’ की संज्ञा से अभिहित था, इस समय वैदिक संस्कृत बोली जाती थी। जो आदिकाल से ईसा पूर्व पाँचवीं शती तक प्रयुक्त होती रही। समय के साथ वैदिक संस्कृति ही संशोधन प्राप्त कर (व्याकरण के नियमों से सँवर कर) संस्कृत बनी और 500 ई. पूर्व से 100 ई. तक चलती रही।
संस्कृत के बाद पहली प्राकृत या पाली आ गई। यह गौतमबुद्ध के समय बोली जाती थी, जो 500 ई. पूर्व से 100 ई. तक रही।
इसके बाद दूसरी प्राकृत आ गई। जो पाँच नामों से जानी जाती थी- (1) महाराष्ट्री; (2) शौरसेनी; (3) मागधी; (4) अर्द्धमागधी; (5) पैशाची। इनका प्रचलन 100 ई. से 500 ई. तक रहा।
इसी दूसरी प्राकृत से नई भाषा पनपी जिसे ‘अपभ्रंश’ कहा जाता है। जिसके तीन रूप थे- (1) नागर; (2) ब्राचड़; (3) उपनागर।
इस अपभ्रंश से कई भाषाएँ विकसित हुईं। जैसे-हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, पंजाबी आदि।
यदि हम गुजराती, मराठी आदि भाषाओं को एक-दूसरे की बहन कह दें तो अनुचित न होगा क्योंकि ‘अपभ्रंश’ इनकी जननी है।
जिस प्रकार भारत में कई प्रांत के कई जिले हैं, उसी प्रकार हिन्दी भाषा में कई उपभाषाएँ हैं।
इनमें ब्रजभाषा, अवधी, डिंगल या राजस्थानी, बुंदेलखण्डी, खड़ी बोली, मैथिली भाषा आदि का नाम उल्लेखनीय है।
इन सभी भाषाओं के साहित्य को हिन्दी का साहित्य माना जाता है क्योंकि ये भाषाएँ हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘अपभ्रंश’ काल से उन समस्त रचनाओं का अध्ययन किया जाता है उपर्युक्त उपभाषाओं में से भी लिखी हो।
 
समाज में उभरने वाली हर सामाजिक, राजनीतिक, साम्प्रदायिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्थितियों का प्रभाव साहित्य पर पड़ता है। जनता की भावनाएँ बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं। इसलिए साहित्य सामाजिक जीवन का दर्पण कहा गया है। इस प्रकार यह बात उभर कर आती है कि साहित्य का इतिहास मात्र आँकड़े या नामवली नहीं होती अपितु उसमें जीवन के विकास-क्रम का अध्ययन होता है। मानव-सभ्यता-संस्कृति और उसके क्रमिक विकास को जानने का मुख्य साधन साहित्य ही होता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, इसलिए उसमें मानव-मन के चिन्तन-मनन, भावना और उसके विकास का रूप प्रतिबिम्बित रहता है। अत: किसी भी भाषा के साहित्य का अध्ययन करने और उसके प्रेरणास्रोत्रों को जानने के लिए उसकी पूर्व-परम्पराओं और प्रवृत्तियों का ज्ञान आवश्यक है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के अध्ययन के लिए हमें विकास के इसी क्रम को जानना होगा।
हिन्दी की पूर्ववर्ती भाषाएँ (सन् 1050 से पूर्व)
हिन्दी भाषा के उद्भव-विकास में उसकी पूर्ववर्ती भाषाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
  • वैदिक संस्कृत-
                जिस समय हमारा देश जगद्गुरु की संज्ञा से अभिहित था, वैदिक संस्कृत ही भारतीय आर्यों के विचारों की अभिव्यक्ति करती थी। प्राय: यह आदि काल से ईसा पूर्व पाँचवीं शती तक प्रयोग में लायी जाती रही।
  • संस्कृत-
                वैदिक संस्कृत ही समय के साथ संस्कार एवं संशोधन प्राप्त कर, व्याकरण के नियमों से सुसज्जित होकर संस्कृत भाषा बन गई। ईसा से लगभग छ: शताब्दी पूर्व महर्षि पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ के निर्माण के साथ ही     संस्कृत में एकरूपता आ गई। यह भाषा 500 ई. पूर्व से 1000 ई. तक चलती रही।
  • पहली प्राकृत या पाली-
                संस्कृति साहित्य में व्याकरण के प्रवेश ने जहाँ एक ओर उसे परिमार्जित कर शिक्षितों की व्यवहारिक भाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया वहाँ दूसरी ओर उसे जनसाधारण की पहुँच के बाहर कर दिया। ऐसे समय में लोक भाषा के रूप में मागधी पनप रही थी, जिसका व्यवहार बौद्ध लोग अपने सिद्धान्त के प्रचारार्थ कर रहे थे। इसी को पोली कहकर संबोधित किया गया।
  • अशोक के शिलालेखों पर ब्राह्मी और खरोष्ठी नामक दो लिपियाँ मिलती हैं। इसी को कतिपय भाषा वैज्ञानिक पहली प्राकृत कहकर पुकारते हैं इस भाषा का काल 500 ई. पूर्व से 100 ई. पूर्व तक निश्चित किया है।
 
  • दूसरी प्राकृत-
     पहली प्राकृत साहित्यकारों के सम्पर्क में आते ही दूसरी प्राकृत बन बैठी और उसका प्रचलन होने लगा। विभिन्न अंचलों में वह भिन्न-भिन्न नामों से पुकारी गई। इस प्रकार इसके पाँच भेद हुए-
1.    महाराष्ट्री-मराठी
2.    शौरसेनी-पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती
3.    मागधी-बिहारी, मागधी, उड़िया, असमिया
4.    अर्द्ध मागधी-पूर्वी हिन्दी
5.    पैशाची-लहंदा, पंजाबी
 
प्राचीन हिन्दी
इस काल में आते-आते अपभ्रंश साहित्य का माध्यम बन गई। इसमें से ही देश का जातीय साहित्य मुखरित हुआ। इस प्रकार क्रमश: लोकवाणी, प्रचलित बोलियों एवं साहित्यिक भाषा के विकास क्रम ने प्राचीन हिन्दी को जन्म दिया जो खड़ी बोली हिन्दी की जननी है। यही ‘प्राचीन हिन्दी’ या ‘हिन्दवी’ अपभ्रंश और आधुनिक खड़ी बोली के मिलनरेखा के मध्य-बिन्दु को निर्धारित करती है।
 
हिन्दी-साहित्य में इतिहास लिखना कब और कैसे प्रारम्भ हुआ, यह विचारणीय प्रसंग है। इतिहास लिखने वालों की दृष्टि अपने आप चौरासी वैष्णव की वार्ता और भक्तकाल की ओर खिंच जाती है परन्तु तथ्यों और खोजबीन से यह पता चलता है कि इसका श्रीगणेश पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव से ठाकुर शिवसिंह सेंगर (सन् 1883 ई.) द्वारा लिखित ‘कवियों के एक वृत्त संग्रह’ के द्वारा हुआ। इसके पहले अंग्रेज लेखक गार्साद तासी ने 72 कवियों का नाम विवरणों के साथ अपने इतिहास (सन् 1839) में प्रस्तुत किया था। 
हिन्दी, भाषाई विविधता का एक ऐसा स्वरूप जिसने वर्तमान में अपनी व्यापकता में कितनी ही बोलियों और भाषाओं को सँजोया है। जिस तरह हमारी सभ्यता ने हजारों सावन और हजारों पतझड़ देखें हैं, ठीक उसी तरह हिन्दी भी उस शिशु के समान है, जिसने अपनी माता के गर्भ में ही हर तरह के मौसम देखने शुरू कर दिए थे। हिन्दी की यह माता थी संस्कृत भाषा, जिसके अति क्लिष्ट स्परूप और अरबी, फारसी जैसी विदेशी और पाली, प्राकृत जैसी देशी भाषाओं के मिश्रण ने हिन्दी को अस्तित्व प्रदान किया। जिस शिशु को इतनी सारी भाषाएँ अपने प्रेम से सींचे उसके गठन की मजबूती का अंदाज लगाना बहुत मुश्किल है।
 
सातवीं शताब्दी (ई.पू.) से दसवीं शताब्दी (ई.पू) के बीच संस्कृत भाषा के अपभ्रंश के रूप में उत्पन्न हिन्दी अभी अपनी माँ के गर्भ में ही थी,
हजारों साल पुराना हमारी सभ्यता का सफर। 2500 ई.पू. से सैंधव सभ्यता की शक्ल में हमने विश्व की प्राचीनतम संस्कृति होने का गौरव प्राप्त किया है। समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं। साथ ही बदलने लगी हमारी जरूरतें, हमारा रहन-सहन और हमारी भाषा। भाषा पर अगर गौर कर जिस दौरान पाली और पाकृत जैसी भाषाओं का प्रभाव उनके चरम पर था। यह वही समय था जब बौद्ध धर्म पूर्णतः परिपक्व हो चुका था और पाली व पाकृत जैसी आसान भाषाओं में इसका व्यापक प्रसार हो रहा था।
 
देखा जाए तो पुरातन हिन्दी का अपभ्रंश के रूप में जन्म 400 ई. से 550 ई. में हुआ जब वल्लभी के शासक धारसेन ने अपने अभिलेख में ‘अपभ्रंश साहित्य’ का वर्णन किया। हमारे पास प्राप्त प्रमाणों में 933 ई. की ‘श्रावकचर’ नामक पुस्तक ही अपभ्रंश हिन्दी का पहला उदाहरण है। परंतु हिन्दी का वास्तविक जन्मदाता तो अमीर खुसरो ही था, जिसने 1283 में खड़ी हिन्दी को जन्म देते हुए इस शिशु का नामकरण ‘‍िहन्दवी’ किया।
 
खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार
 
(अमीर खुसरो की एक रचना – ‘हिन्दवी’ में…)
 
यह हिन्दी का जन्म मात्र एक भाषा का जन्म न होकर भारत के मध्यकालीन इतिहास का प्रारंभ भी है, जिसमें भारतीय संस्कृति के साथ अरबी व फारसी संस्कृतियों का अद्‍भुत संगम नजर आता है। तुर्कों और मुगलों के प्रभाव में पल्लवित होती हिन्दी को उनकी नफासत विरासत में मिली। वहीं दूसरी ओर इस समय भक्ति और आंदोलन भी काफी क्रियाशील हो चुके थे, जिन्होंने कबीर (1398- 1518 ई.), रामानंद (1450 ई.), बनारसी दास (1601 ई.), तुलसीदास (1532-1623 ई.) जैसे प्रकांड विद्वानों को जन्म दिया। इन्होंने हिन्दी को अपभ्रंश, खड़ी और आधुनिक हिन्दी के अलंकारों से सुसज्जित करके हिन्दी का श्रृंगार किया। इस काल की एक और विशेषता यह भी थी कि इस काल में हिन्दी को अपनी छोटी बहन ‘उर्दू’ मिली, जो अरबी, फारसी व हिन्दी के मिश्रण अस्तित्व में आई। इस कड़ी में मुगल बादशाह शाहजहाँ (1645 ई.) के योगदानों ने उर्दू को उसका वास्तविक आकार प्रदान किया।
विभिन्न सभ्यताओं ने आकर हिन्दुस्तान पर शासन किया। इनकी सभ्यता और भाषाई विविधता ने ही हिन्दी का पालन-पोषण किया और एक ‘अपभ्रंश’ शिशु व ‘खड़ी बोली’ किशोरी को अपार अलंकारों से सुसज्जित ‘आधुनिक हिन्दी’ रूपी युवती बनाया।
 
अँग्रेजी शासन तक यह अल्हड़ किशोरी शांत व गंभीर युवती के रूप में परिवर्तित हो चुकी थी। अँग्रेजियत के समावेश ने हिन्दी को त्तकालीन परिवेश में एक नया परिधान दिया। अब आधुनिक हिन्दी में तरह-तरह के प्रयोग अपने शीर्ष पर थे। किताबों, उपन्यासों, ग्रंथों, काव्यों के साथ-साथ हिन्दी राजनीतिक चेतना का माध्यम बन रही थी। 1826 ई. में ‘उद्दंत मार्तण्ड’ नामक पहला हिन्दी का समाचार तत्कालीन बुद्धिजीवियों का प्रेरणा स्रोत बन चुका था। अब हिन्दी में आधुनिकता का पूर्णतः समावेश हो चुका था। अँग्रेजों के शासन ने जहाँ हिन्दी को आधुनिकता का जामा पहनाया, वहीं हिन्दी उनके विरोध और स्वतंत्र भारत के स्वप्न का भी प्रभावी माध्यम रही। तमाम हिन्दी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने देश के बुद्धिजीवियों में स्वतंत्रता की लहर दौड़ाई। स्वतंत्र भारत के कर्णधारों ने जो स्वतंत्रता का स्वप्न देखा उसमें स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा के रूप हमेशा हिन्दी को ही देखा।
 
शायद यही वजह है कि स्वतंत्रता के उपरांत हिन्दी को 1949-1950 में केंद्र की आधिकारिक भाषा का सम्मान मिला। वर्तमान में हिन्दी विश्व की सबसे अधिक प्रयोग में आने वाली भाषाओं में दूसरा स्थान रखती है। हो सकता है कि अँग्रेजी का प्रभाव प्रौढ़ा हिन्दी पर अधिक नजर आता हो, मगर इस हिन्दी ने अपने भीतर इतनी भाषाओं और बोलियों को समेटकर अपनी गंभीरता का ही परिचय दिया है। हो सकता है कि भविष्य में हिन्दी भी किसी अन्य ‘अपभ्रंश’ शिशु को जन्म दे, पर राष्ट्रभाषा का गौरव हर भारतीय में नैसर्गिक रूप से व्याप्त होगा।
झाँसी की रानी की समाधि पर 
सुभद्रा कुमारी चौहान 
इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||
 
यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |
 
बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||
रामी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||
 
इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||
 
बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||
यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

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