रासो काव्य परम्परा
January 26, 2008
| रास परक रचनायें |
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| रासो या रासक रचनायें |
| सन्देश रासक - यह अपभ्रंश की रचना है। रचियिता अब्दुल रहमान हैं। यह रचना मूल स्थान या मुल्तान के क्षेत्र से सम्बन्धित है। कुल छन्द संख्या २२३ है। यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है। इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है तभ कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाते लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति कि ॠतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ॠतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ॠतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है। यह रचना सं ११०० वि. के पश्चातद्य की है। |
| मुंज रास - यह अपभ्रंश की रचना है। इसमें लेखक का नाम कहीं नहीं दिया गया। रचना काल के विषय में कोई निश्चित मत नहीं मिलता। हेमचन्द्र की यह व्याकरण रचना सं. ११९० की है। मुंज का शासन काल १००० -१०५४ वि. माना जाता है। इसलिए यह रचना १०५४-११९० वि. के बीच कभी लिखी गई होगी। इसमें मुंज के जीवन की एक प्रणय कथा का चित्रण है। कर्नाटक के राजा तैलप के यहाँ बन्दी के रुप में मुंज का प्रेम तैलप की विधवा पुत्री मृणालवती से ही जाता है। मुंज उसको लेकर बन्दीगृह से भागने का प्रस्ताव करता है किन्त मृणालवती अपने प्रेमी को वहीं रखकर अपना प्रणय सम्बन्ध निभाना चाहती थी इसलिए उसने तैलप को भेद दे दिया जिसके परिणामस्वरुप क्रोधी तैलप ने मृणालवती के सामने ही उसके प्रेमी मुंज को हाथी से कुचलवाकर मार डाला। कथा सूत्र को देखते हुए रचना छोटी प्रतीत नहीं होती। |
| पृथ्वीराज रासो - यह कवि चन्द की रचना है। इसमें दिल्लीश्वर पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं का विशद वर्णन है। यह एक विशाल महाकाव्य है। यह तेरहवीं शदी की रचना है। डा. माताप्रसाद गुप्त इसे १४०० वि. के लगभग की रचना मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की एतिहासिकता विवादग्रस्त है। |
| हम्मीर रासो - इस रचना की कोई मूल प्रति नहीं मिलती है। इसका रचयिता शाङ्र्गधर माना जाता है। प्राकृत पैगलम में इसके कुछ छन्द उदाहरण के रुप में दिए गये है। ग्रन्थ की भाषा हम्मीर के समय के कुछ बाद की लगती है। अतः भाषा के आधार पर इसे हम्मीर के कुछ बाद का माना जा सकता है। |
| बुत्रद्ध रासो- इसका रचयिता जल्ह है जिसे पृथ्वीराज रासो का पूरक कवि भी माना गया है। कवि ने रचना में समय नहीं दिया है। इसे पृथ्वीराज रासो के बाद की रचना माना जाता है। |
| परमाल रासो - इस ग्रन्थ की मूल प्रति कहीं नहीं मिलती। इसके रचयिता के बारे में भी विवाद है। पर इसका रचयिता “”महोबा खण्ड” को सं. १९७६ वि. में डॉ. श्यामसुन्दर दास ने “”परमाल रासो” के नाम से संपादित किया था। डॉ. माता प्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सोलहवीं शती विक्रमी की हो सकती है। इस रचना के सम्बन्ध में काफी मतभेद है। श्री रामचरण हयारण “”मित्र” ने अपनी कृति “”बुन्देलखण्ड की संस्कृति और साहित्य” मैं “परमाल रासो” को चन्द की स्वतन्त्र रचना माना है। किन्तु भाषा शैली एवं छन्द में -महोवा खण्ड” से यह काफी भिन्न है। उन्होंने टीकामगढ़ राज्य के वयोवृद्ध दरवारी कवि श्री “”अम्बिकेश” से इस रचना के कंठस्थ छन्द लेकर अपनी कृति में उदाहरण स्वरुप दिए हैं। रचना के एक छन्द में समय की सूचना दी गई है जिसके अनुसार इसे १११५ वि. की रचना बताया गया है जो पृथ्वीराज एवं चन्द के समय की तिथियों से मेल नहीं खाती। इस आधार पर इसे चन्द की रचना कैसे माना जा सकता है। यह इसे परमाल चन्देल के दरवारी कवि जगानिक की रचना माने तो जगनिक का रासो कही भी उपलब्ध नहीं होता है। |
| स्वर्गीय महेन्द्रपाल सिंह ने अपेन एक लेख में लिखा है कि जगनिक का असली रासो अनुपलब्ध है। इसके कुछ हिस्से दतिया, समथर एवं चरखारी राज्यों में वर्तमान थे, जो अब नष्ट हो चुके हैं। |
| राउजैतसी रासो - इस रचना में कवि का नाम नहीं दिया गया है और न रचना तिथि का ही संकेत है। इसमें बीकानेर के शासक राउ जैतसी तथा हुमायूं के भाई कामरांन में हुए एक युद्ध का वर्णन हैं जैतसी का शासन काल सं. १५०३-१५१८ के आसपास रहा है। अत-यह रचना इसके कुछ पश्चात की ही रही होगी। इसकी कुल छन्द संख्या ९० है। इसे नरोत्तम स्वामी ने राजस्थान भारतीय में प्रकाशित कराया है। |
| विजय पाल रासो - नल्ह सिह भाट कृत इस रचना के केवल ४२ छन्द उपलब्ध है। विजयपाल, विजयगढ़ करौली के यादव राजा थे। इसके आश्रित कवि के रुप में नल्ह सिह का नाम आता है। रचना की भाषा से यह १७ वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है। |
| राम रासो - इसके रचयिता माधव चारण है। सं. १६७५ वि. रचना काल है। इस ग्रन्थ में रामचरित्र का वर्णन है तथा १६०० छन्द हैं। |
| राणा रासो - दयाल दास द्वारा विरचित इस ग्रन्थ में शीशौदिया वंश के राजाओं के युद्धें एवं जीवन की घटनाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन १३७५-१३८१ के मध्य का हो सकता है। इसमें रतलाम के राजा रतनसिंह का वृत्त वर्णित किया गया है। |
| कायम रासो - यह रासो “”न्यामत खाँ जान” द्वारा रचा गया है। इसका रचना काल सं. १६९१ है किन्तु इसमें १७१० वि. की घअना वाला कुछ अंश प्रक्षिप्त है क्योंकि यदि कवि इस समय तक जीवित था तो उसने पूर्व तिथि सूचक क्यों बदला। यह वैसा का वैसा ही लिखा है इसमें राजस्थान के कायमखानी वंश का इतिहास वर्णित है। |
| शत्रु साल रासो- रचयिता डूंगरसी कवि। इसका रचना काल सं. १७१० माना गया है। छंद संख्या लगभग ५०० है। इसमें बूंदी के राव शत्रुसाल का वृत्त वर्णित किया गया है। |
| आंकण रासो - यह एक प्रकार का हास्य रासो है। इसमें खटमल के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। इसका रचयिता कीर्तिसुन्दर है। रचना सं. १७५७ वि. की है। इसकी कुल छन्द संख ३९ है। |
| सागत सिंह रासो- यह गिरधर चारण द्वारा लिखा गया है। इसमें शक्तिसिंह एवं उनके वंशजों का वृत्त वर्णन किया गया है। श्री अगरचन्द्र श्री अगरचन्द नाहटा इसका रचना काल सं. १७५५ के पश्चात का मानते हैं। इसकी छन्द संख्या ९४३ है। |
| हम्मीर रासो- इसके रचयिता महेश कवि है। यह रचना जोधराज कृत्त हम्मीर रासो के पहले की है। छन्द संख्या लगभग ३०० है इसमें रणथंभौर के राणा हम्मीर का चरित्र वर्णन है। |
| खम्माण रासो - इसकी रचना कवि दलपति विजय ने की है। इसे खुमाण के समकालीन अर्थातद्य सं. ७९० सं. ८९० वि. माना गया है किन्तु इसकी प्रतियों में राणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय १७६०-१७९० के पूर्व की नहीं होनी चाहिए। डॉ. उदयनारायण तिवारी ने श्री अगरचन्द नाहटा के एक लेख के अनुसार इसे सं. १७३०-१७६० के मध्य लिखा बताया गया है। जबकि श्री रामचन्द्र शुक्ल इसे सं. ९६९-सं. ८९९ के बीच की रचना मानते हैं। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे सं. १७३०-७९० के मध्य लिखा माना जा सकता है। |
| रासा भगवन्तसिंह - सदानन्द द्वारा विरचित है। इसमें भगवन्तसिंह खीची के १७९७ वि. के एक युद्ध का वर्णन है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सं. १७९७ के पश्चात की है। इसमें कुल १०० छन्द है। |
| करहिया की रायसौ - यह सं. १९३४ की रचना है। इसके रचयिता कवि गुलाब हैं, जिनके श्वंशज माथुर चतुर्वेदी चतुर्भुज वैद्य आंतरी जिला ग्वालियर में निवास करते थे। श्री चतुर्भुज जी के वंशज श्री रघुनन्दन चतुर्वेदी आज भी आन्तरी ग्वालिया में ही निवास करते हैं, जिनके पास इस ग्ररन्थ की एक प्रति वर्तमान है। इसमें करहिया के पमारों एवं भरतपुराधीश जवाहरसिंह के बीच हुए एक युद्ध का वर्णन है। |
| रासो भइया बहादुरसिंह - इस ग्रन्थ की रचना तिथि अनिश्चित है, परन्तु इसमें वर्णित घटना सं. १८५३ के एक युत्र की है, इसी के आधार पर विद्वानों ने इसका रचना काल सं. १८५३ के आसपास बतलाया है। इसके रचयिता शिवनाथ है। |
| रायचसा - यह भी शिवनाथ की रचना है। इसमें भी रचना काल नहीं दिया है। उपर्युक्त “”रासा भइया बहादुर सिंह” के आधार पर ही इसे भी सं. १८५३ के आसपास का ही माना जा सकता है, इसमें धारा के जसवंतसिंह और रीवां के अजीतसिंह के मध्य हुए एक युद्ध का वर्णन है। |
| कलियंग रासो - इसमें कलियुगका वर्णन है। यह अलि रासिक गोविन्द की रचना हैं। इसकी रचना तिथि सं. १८३५ तथा छन्द संख्या ७० है। |
| वलपतिराव रायसा - इसके रचयिता कवि जोगींदास भाण्डेरी हैं। इसमें महाराज दलपतिराव के जीवन काल के विभिन्न युद्धों की घटनाओं का वर्णन किया गया है। कवि ने दलपति राव के अन्तिम युद्ध जाजऊ सं. १७६४ वि. में उसकी वीरगति के पश्चात् रायसा लिखने का संकेत दिया है। इसलिये यह रचना सं. १४६४ की ही मानी जानी चाहिए। रासो के अध्ययन से ऐसा लगता है कि कवि महाराजा दलपतिराव का समकालीन था। इस ग्रन्थ में दलपतिराव के पिता शुभकर्ण का भी वृत्त वर्णित है। अतः यह दो रायसों का सम्मिलित संस्करण है। इसकी कुल छन्द संख्या ३१३ हैं। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने किया है, तथा “कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ, आगरा नसे भारतीय साहित्य के मुन्शी अभिनन्दन अंक में इसे प्रकाशित किया गया है। |
| शत्रु जीत रायसा - बुन्देली भाषा के इस दूसरे रायसे के रचयिता किशुनेश भाट है। इसकी छन्द संख्या ४२६ है। इस रचना के छन्द ४२५ वें के अनुसार इसका रचना काल सं. १८५८ वि. ठहरता है। दतिया नरेश शत्रु जीत का समय सं. १८१९ सं. १९४८ वि. तदनुसार सनद्य १७६२ से १८०१ तक रहा है। यह रचना महाराजा शत्रुजीत सिंह के जीवन की एक अन्तिम घटना से सम्बन्धित है। इसमें ग्वालियर के वसन्धिया महाराजा दौलतराय के फ्रान्सीसी सेनापति पीरु और शत्रुजीत सिंह के मध्य सेवढ़ा के निकट हुए एक युद्ध का सविस्तार वर्णन है। इसका संपादन श्री हरि मोहनलाल श्रीवास्तव ने किया, तथा इसे “”भारतीय साहित्य” में कन्हैयालालमुन्शी हिदी विद्यापीठ आगरा द्वारा प्रकाशित किया गया है। |
| गढ़ पथैना रासो- रचयिता कवि चतुरानन। इसमें १८३३ वि. के एक युद्ध का वर्णन किया गया है। छन्द संख्या ३१९ है। इसमें वर्णित युद्ध आधुनिक भरतपुर नगर से ३२ मील पूर्व पथैना ग्राम में वहां के वीरों और सहादत अली के मध्य लड़ा गया था। भरतपुर के राजा सुजारनसिंह के अंगरक्षक शार्दूलसिंह के पूत्रों के अदम्य उत्साह एवं वीरता का वर्णन किया गया है। बाबू वृन्दावनदास अभिनन्दन ग्रन्थ में सन् १९७५ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा इसका विवरण प्रकाशित किया गया। |
| पारीछत रायसा - इसके रचयिता श्रीधर कवि है। रायसो में दतिया के वयोवृद्ध नरेश पारीछत की सेना एवं टीकामगढ़ के राजा विक्रमाजीतसिंह के बाघाट स्थित दीवान गन्धर्वसिंह के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है। युद्ध की तिथि सं. १८७३ दी गई है। अतएव यह रचना सं. १८७३ के पश्चात् की ही रही होगी। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवासतव के द्वारा किया गया तथा भारतीय साहित्य सनद्य १९५९ में कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ आगरा द्वारा इसे प्रकाशित किया गया। |
| बाघाट रासो - इसके रचयिता प्रधान आनन्दसिंह कुड़रा है। इसमें ओरछा एवं दतिया राज्यों के सीमा सम्बन्धी तनाव के कारण हुए एक छोटे से युद्ध का वर्णन किया गया है। इस रचना में पद्य के साथ बुन्देली गद्य की भी सुन्दर बानगी मिलती है। बाघाट रासो में बुन्देली बोली का प्रचलित रुप पाया जाता है। कवि द्वारा दिया गया समय बैसाख सुदि १५ संवत् १८७३ विक्रमी अमल संवत १८७२ दिया गया है। इसे श्री हरिमोहनलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित किया गया तथा यह भारतीय साहित्य में मुद्रित है। इसे “”बाघाइट कौ राइसो” के नाम से “”विंध्य शिक्षा” नाम की पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है। |
| झाँसी की रायसी - इसके रचनाकार प्रधान कल्याणिंसह कुड़रा है। इसकी छन्द संख्या लगभग २०० है। उपलब्ध पुस्तक में छन्द गणना के लिए छन्दों पर क्रमांक नहीं डाले गये हैं। इसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा टेहरी ओरछा वाली रानी लिड़ई सरकार के दीवान नत्थे खां के साथ हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन किया गया है। झांसी की रानी तथा अंग्रेजों के मध्य हुए झांसी कालपी, कौंच तथा ग्वालियर के युद्धों का भी वर्णन संक्षिप्त रुप में इसमें पाया जाता है। इसका रचना काल सं. १९२६ तदनुसार १९६९ ई. है। अर्थातद्य सन् १९५७ के जन-आन्दोलन के कुल १२ वर्ष की समयावधि के पश्चात् की रचना है। इसे श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव दतिया ने “”वीरांगना लक्ष्मीबाई” रासो और कहानी नाम से सम्पादित कर सहयोगी प्रकाशन मन्दिर लि. दतिया से प्रकाशित कराया है। |
| लक्ष्मीबाई रासो - इसके रचयिता पं. मदन मोहन द्विवेदी “”मदनेश” है। कवि की जन्मभूमि झांसी है। इस रचना का संपादन डॉ. भगवानदास माहौर ने किया है। यह रचना प्रयाग साहित्य सम्मेलन की “”साहित्य-महोपाध्याय” की उपाधि के लिए भी सवीकृत हो चुकी है। इस कृति का रचनाकाल डॉ. भगवानदास माहौर ने सं. १९६१ के पूर्व का माना है। इसके एक भाग की समाप्ति पुष्पिका में रचना तिथि सं. १९६१ दी गई है। रचना खण्डित उपलब्ध हुई है, जिसे ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है। विचित्रता यह है कि इसमें कल्याणसिंह कुड़रा कृत “”झांसी कौ रायसो” के कुछ छन्द ज्यों के त्यों कवि ने रख दिये हैं। कुल उपलब्ध छन्द संख्या ३४९ हैं। आठवें भाग में समाप्ति पुष्पिका नहीं दी गई है, जिससे स्पष्ट है कि रचना अभी पूर्ण नहीं है। इसका शेष हिस्सा उपलब्ध नहीं हो सका है। कल्याण सिंह कुड़रा कृत रासो और इस रासो की कथा लगभग एक सी ही है, पर मदनेश कृत रासो में रानी लक्ष्मीवाई के ऐतिहासिक एवं सामाजिक जीवन का विशद चित्रण मिलता है। |
| छछूंदर रायसा - बुन्देली बोली में लिखी गई यह एक छोटी रचना है। छछूंदर रायसे की प्रेरणा का स्रोत एक लोकोक्ति को माना जा सकता है- “”भई गति सांप छछूंदर केरी।” इस रचना में हास्य के नाम पर जातीय द्वेषभाव की झलक देखने को मिलती है। दतिया राजकीय पुस्तकालय में मिली खण्डित प्रति से न तो सही छन्द संख्या ज्ञात हो सकी और न कवि के सम्बन्ध में ही कुछ जानकारी उपलब्ध हो सकीफ रचना की भाषा मंजी हुई बुन्देली है। अवश्य ही ऐसी रचनाएं दरबारी कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने अथवा कायर क्षत्रियत्व पर व्यंग्य के लिये लिखी गई होगी। |
| घूस रासा - यह भी बुन्देली की एक छोटी सी रचना है। इसमें हास्य के साथ व्यंग्य का भी पुट है। रचनाकार को काव्य शिल्प की दृष्टि से अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। छन्दों के बंध, भाषा व शैली पर कवि का पूर्ण अधिकार है। उपलब्ध छन्द संख्या कुल ३१ है। प्रतिपूर्ण लगती है। यह भी दतिया राज्य पुस्तकालय की हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त हुई है। रचना के एक छन्द द्वारा कवि का नाम पृथीराज दिया गया है, परवर्ती रचना है। रचना काल अज्ञात है। |
| रासो कावें का मूल प्रतिपाद्य |
| सामाजिक - देश के अधिकांश भूभाग पर मुगल सत्ता का प्रभाव था। चंपत राय और छत्रासाल जैसे थोड़े क्षत्रिय थे, जो सुख-वैभव का त्याग कर तथा भारी कष्ट झेलकर आजीवन मुगलों से लोहा लेते रहे। अधिकांश राजवंशों में फूट एवं वैमनस्य था, जिससे वे आपस में लड़कर नष्ट होते रहते थे। |
| अधिकांश क्षत्रिय राजाओं और सामन्तों पर मुस्लिम शासकों की संप्रभुता का प्रभाव छा चुका था। अपने सीमित स्वार्थों की सुरक्षा के लिए विदेशियों के प्रति अटल और असीम निष्ठा पर वे गर्व करते थे। साम्राजय की रक्षा के लिए वे सुदूर दक्षिण में तथा उतर में बलख-बदख्शां तक भी रक्त का बहाना अपना वीरोचित धर्म समझते थे। बुन्देला राजपूतों में एक उल्लेखनीय विशेषता यह अवश्य रही कि वे अपने रक्त सम्बन्ध पर गर्व करते रहे। यहाँ मुसलमानों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये जाने जैसे किसी भी उदाहरण का नितान्त अभाव है। बलात् धर्म-परिवर्तन की धटनायें भी नगण्य ही रहीं। टिकैत मधुकर शाह जैसे कुछ उदाहरण भी पाये जाते हैं, जिनमें मुगल दरबार के प्रति भक्ति के साथ ही स्वधर्म पालन के प्रति कट्टरता का अच्छा निर्देशन हुआ है। शुभकरन और दलपतिराव जैसे सामन्त किन्हां अवसरों पर मुगल सेना के प्रभावशाली नायकों से खुलकर मतभेद प्रकट कर सकते थे। अधिकांश अवसरों पर सम्राट बुन्देली आनबान का ध्यान रखते हुए उनका विरोध करने का साहस नहीं कर पाते थे। |
| बुन्देलखण्ड के सभी राज्यों में मुगलों के समान शान शौकत एवं विलास-प्रियता का दौर था। यह प्रभाव उनके अन्तःपुरों में एक से अधिक रानियों के परिवारों में कभी कुछ स्प्श्ट देखने को मिल जाता था। गृह कलह् भी देखा जाता था। सामान्ती वातावराण के राज्य-कर्मचारी विलासमय जीवन बिताते थे। निम्न वर्ग की जनता की दशा सोचनीय थी। समाज के गरीब तबके के लोग सुखी न थे, परन्तु किसी प्रकार निर्वाह करते जाने को ही भाग्य-विधान मानते थे। अधिकांश लोग राजा की नौकरी करना पसन्द करते थे, जिससे उनहें अर्पेक्षाकृत अधिक सुविधायें मिल सकें। मध्यम वर्ग सुखी था। हिन्दू समाज में बाल विवाह प्रचलित था। सती प्रथा भी थी। उच्च घरानों में पर्दा प्रथा भी प्रवेश पा चुकी थी। |
| युद्धों के समय मंहगाई हो जाती थी। रासो ग्रन्थों में कहीं-कहीं इसका उल्लेख मिलता है- |
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“”तेरह दिनानों भयौ नाज तीन रुपै सेर, |
| उपर्युक्त विवरण के अनुसार स्पष्ट होता है कि राजाओं तथा सामान्त, सरदारों का जीवन अधिकांशतः युद्धों में उलझा रहता था। सामान्य जनता के कष्टों की ओर दृष्टिपात करने का प्रायः उन्हें कम ही अवसर प्राप्त होता था। |
| राज्य कर्मचारी सुखमय जीवन व्यतीत करते हुये, साधारण प्रजा के साथ मनमाना व्यवहार करते थे। समाज में विभिन्न प्रकार की प्रथायें तथा लोक रीतियाँ भी प्रचलित थीं। |
| धार्मिक - उत्तर भारत में भक्ति युग में एक लम्बी सनत परम्परा रही है, जिसका देश के अन्य भागों पर भी स्पष्ट प्रभाव पड़ा इस समय में अनेक सम्प्रदायों की स्थापना की गई। साधु संतों के वाद-विवादों के अखाड़े हुआ करते थे, जहाँ खण्डन मण्डन की रीतियों द्वारा अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ सिद्ध किया जाता था। लोगों में अन्ध विश्वास बहुत था। |
| बुन्देलखण्ड में उत्त्र मध्यकाल में अनेक प्रसिद्ध सन्त हुए, जिन्हें राज्याश्रय भी प्राप्त था। महात्मा अक्षर अनन्य योग और वेदान्त के अच्छे ज्ञाता थे। राजयोग के उनके उपदेश का ही परिणाम था कि सेंवढ़ा नरेश राजा पृथ्वीसिंह ने कर्मयोग स्वीकार करते हुए वैराग्य का विचार त्याग दिया। यही पृथ्वीसिंह हिन्दी साहित्य में “रतन हजारा’ के रचयिता “रसनिधिद्ध कवि के नाम से विख्यात हुए। इन्होंने अपने काव्य में प्रेम योग की एक सुन्दर धारा वहाई है। अनन्य जी एक बोर किसी बात पर रुष्ट होकर वन में चले गये। राजा पृथ्वीसिंह उनसे क्षमा मांगने पहू#ुाचे, परन्तु उन्हें एक झाड़ी के पास बड़े आराम से लेटा हुआ देखा, तो अपना अपमान समझकर पूछा-”"पाँव पसारा कब से” उत्तर मिला-”"हाथ समेटा तब से”। |
| अनन्य जी ने इसी समय से वैराग्य ले लिया, पर राजा का मन रखने के लिए वचन दिया कि वे विचरते हुए कभी’कभी दर्शन देंगे। पश्चात् बुन्देल केशरी छत्रसाल से भी उनकी भेंट हुई। महाराज छत्रसाल और अक्षर-अनन्य के बीच पत्राचार की बात प्रसिद्ध है। अनन्य जी के लिखे हुए चिट्ठे ऐतिहासिक महत्व से परिपूण्र हैं। निर्गुण मागीं सन्त कवियों में अनन्य का अपना स्थान है। उनकी रचा शैली थोड़े में बहुत कुछ बता देती है। उदाहरण- |
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“”आवै सुगन्ध कुरंग की नाभि कुरंग न सो समुझै मनमाही। |
| स्वामी प्राणनाथ धामी प्रणामी सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुए हैं जिन्होंने बुन्देल केशरी छत्रसाल को अपना शिष्य बनाते हुए आशीर्वाद दिया कि वे औरंगजेब के विरुद्ध अपने अभियान में स्थाई सफलता प्राप्त करें, उनके राज्य में सुख समृद्धि की कभी कोई कमी न हो और हिन्दुत्व की रक्षा में उनका नाम अमर हो। सर्व साधारण में यह विश्वास प्रचलित है कि पन्ना नगरीमें हीरों का पाया जाना स्वामी प्राणनाथ के आशीर्वाद का ही परिणाम था, जिससे महाराज को अपनी लड़ाइयों के लिए तथा प्रजा पालन एवं दान शीलता आदि कर्तव्यों के लिए धन की कमी न होने पावे। बताया जाता है कि स्वामी प्राणनाथ जी की सेवा में दक्षिणा भेंट करते हुए छत्रसाल ने निम्नलिखित दोहा कहा- |
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“”यह टीका यह पांवड़वो, यही निछावर आय। |
| राजा की नीति धर्म समन्वित थी। राजा लोग राज्य के कार्यों में भी अपने धर्म गुरुओं से सलाह लेते थे। इस युग में ब्राह्मण धर्म का ही बोल बाला था। ब्राह्मणों के आशीर्वाद और प्रचार से ही राजा आन्तरिक व्यवस्था में स्वतंत्र थे। नरेशों के व्यवहार का प्रभाव साधारण जनता पर भी विशेष रुप से व्यक्त होता था। उसमें भी धर्म भीरुता, दानशीलता की प्रवृतियाँ बनी हुई थीं। नरेशों में राज धर्म के अनुसार अन्य सम्प्रदायों के प्रति धार्मिक उदारता का भाव बना हुआ था। |
| शरणागत वत्सलता का भाव अधिकांश बुन्देला नरेशों में विद्यमान था। उनकी आपसी लड़ाइयों का एक बड़ा कारण यह भी रहा है कि वे किसी के पीछे संधर्ष मोल लेने से नहीं चूकते थे। छोटे से दतिया राज्य के अधिकपत्य शत्रुजीत ने महादजी की विधवा बाईयों का पक्ष लेकर अपने से कहीं बड़े वैभव से टक्कर ली थी। |
| राजनैतिक - बुन्देला राजवंश का इतिहास मुख्यत मुगलों के उत्कर्ष से ही प्रारम्भ होता है। मुगलों का तृतीय सम्राट अकबर जिस समय सिंहासन पर बैठा, उस समय भारत छोटे-छोटे अनेक स्वतन्त्र राज्यों में विभाजित था। अकबर ने कई स्वतन्त्र राज्यों पर विजय पाते हुए मुगल साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया। उसने बिखरे हुए इन राज्यों को राजनैतिक एकता में बाँधकर देश में शान्ति और सुव्यवस्था की स्थापना का प्रयास किया। बुन्देलखण्ड को भी उसने राजस्थान, उत्तर-पश्चिम-सीमान्त-प्रदेश, गोंडवान आदि के साथ अपने साम्राज्य का अंग बनाया। यहाँ बुन्देलखण्ड में उसने प्रत्यक्ष अधिकार जमाने की विशेष चिंता नहीं की। राजधानी आगरा का निकटवर्ती यह प्रदेश दक्षिण के उसके अभियानों के लिए सहज सीधा मार्ग था। अतएव उसने ओरछा के बुदेला शासक से मैत्री स्थापित करने में ही अपने उद्देश्य की पूर्ति देखी। मधुकर शाह और वीरसिंह देव जेसे बुन्देलखण्ड का राज्य कई जागीरों में बँट गया। स्वभावतः इन छोटे राजाओं के स्वार्थ मुगलसत्ता से मिलकरचलने में ही पूरे हो सकते थे। अतः ये राज्य साम्राजय की शक्ति पर अधिक निर्भर रहने लगे और इस प्रकारइनकी दासता का अध्याय प्रारम्भ हुआ। अधिकांश बुन्देला राजाओं ने मुगल साम्राज्य के प्रति वफादारी को अपना राजनीतिक धर्म मानकर उसके लिए गर्व करने की नीति अपनाई। |
| प्रबल प्रतापी वीरसिंह देव एक अत्यन्त महत्वकांक्षी योद्धा थे। बादशाह अकबर और शाहजादा सलीम में जब मतभेद उभर कर प्रकटहुए और सलीम ने अकबर के अत्यन्त विश्वासपात्र मंत्री और सेनापति अबुल फजल को अपने मार्ग की एक बड़ी बाधा समझा, तो सलीम को वीरसिंह देव का ही एकमात्र सहारा समझ पड़ा। उसने अबुल फजल को मार डालने के लिए वीकिंरसह देव से सम्पर्क स्थापित किया। बुन्देलों की प्रधान गद्दी ओरछा पर अधिकार पाने की महत्वाकांक्षा लेकर वीरसिंह देव ने सहज ही यह काम कर डाला। अबुल फजल का वध करने के पश्चात् उन्होंने उसका सिर काटकर जहाँगीर के पास इलाहाबाद भेज दिया। सलीम फूला न समाया। उसने अपने मित्र वीरसिंह देव को भरपूर पुरस्कार देने की नीति बना ली। परन्तु सम्राट अकबर के जीवन काल में वीरसिंह देव को उसके रोष का सामना करते हुए अनेक कठिनाइयों को झेलना पड़ा। सलीम जब जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा, तो उसने वीरसिंह देव को पुरस्कृत करने में कमी नहीं की। कालान्तर में वीरसिंह देव के उत्तराधिकारी सम्राट से मैत्री के इस आदर्श के नाम पर हीं मुगलों के ऊपर अधिकाधिक निर्भर रहने लगे। वीरसिंह देव के बड़े बेटे तथा ओरछा के राजा जुझारसिंह को साम्राज्य की दासता कुछ अखरने लगी। उन्होंने शाहजहाँ के शासन काल में दो बार मुगल सम्राट के विरुद्ध विद्रोह भी खड़ा किया, परन्तु वे बुरी तरह परासत हुए। संभवतः इसीलिए आगे के अन्य राजाओं ने मुगलों से बनाये रखने में ही कुशलता समझी। |
| शाहजहाँ में धार्मिक कट्टरता का अंश अवश्य था। तभी जुझारसिंह को विद्रोह करने की आवश्यकता पड़ी, परनतु उसके बाद औरंगजेब ने सम्राट बनते ही अकबर के समय से चली आने वाली नीतियों को एकदम बदल दिया। कट्टर सुन्नी मुसलमान औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीतियों को एकदम बदल दिया। कट्टर सुन्नी मुसलमान औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीतियों ने उत्तर में सिक्खों से लेकर दक्षिण में मराठों तक ग्रान्ति कीचिनगारी प्रज्जवलित कर दी। सिक्ख, मराठा और सतनामी मुगल साम्राज्य के प्रलि बैरी बन बैठै। तभी राजा चम्पतराय और उनके पुत्र छत्रसाल नामक बुन्देला वीरों ने हिन्दुत्व की रक्षा के लिए मुगल सत्ता को उखाड़ फेंकने का व्रत लिया। वीर छत्रसाल तो छत्रपति शिवाजी के आदर्श से विशेष रुप से अनुप्राणित थे। अपने पिता चम्तराय से भी अधिक नाम उन्होंने पाया है। बुन्देलखण्ड की स्वाधीनता के लिए उनका योगदान किसी प्रकार कम नही। अपने ही वंश के कुछ अन्य शासकों से बुन्देल केशरी छत्रसाल को समुचित सहयोग मिल पाता, तो इस मध्यवर्ती भूभाग से मुगलों की सत्ता कभी की उठ गई होती। महाराज छत्रराज ने अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया, परन्तु अपने वंश के अन्य नरेशों के प्रति विशेज्ञ सख्ती नहीं बरती। यपि औरंगजेव के बाद मुगल साम्राज्य दिन प्रतिदिन अशक्त होता गया, तथापि ओरछा, दतिया आदि के राजघराने मुगलों के आश्रित बने रहे। |
| मुहम्मद खाँ वंगश के आक्रमणों का सफल प्रतिरोध करने के लिए महाराजा छत्रसाल ने वृद्धावस्था के अन्तिम दिनों में पेशवा बाजीराव से सहायता चाही। पेशवा को अपना तीसरा बेटा मानते हुए उन्होंने अपने राज्य का एक तिहाई भाग भी सौंप दिया था। फलतः इस भूभाग में मराठों को पैर जमाने का अवसर मिल गया। झांसी और ग्वालियर मराठों की, इस क्षेत्र में दो बड़ी राजधानियाँ स्थापित हुई। इन राज्यों से बुन्देलखण्ड के नरेशों के सम्बन्ध बनते और बिगड़ते रहे। कभी किसी राजा का व्यवहार मैत्रीपूर्ण होता और कभी कोई शत्रुता मानता। समय-समय पर कोई मराठा सरदार इन राज्यों पर छापा मारते रहते। |
| शृंगारिक - रासो काव्यों की परम्परा में कुछ ऐसे रासो ग्रन्थ है जिनका वर्ण्य-विषय ही शृंगार-परक रहा है। वीसल देव रासो एवं सन्देश रासक तो पूर्णतया शृंगार रचनायें ही है, जैसा पहले रासो काव्य परम्परा में लिखा जा चुका है। वीसलदेव रासो में वीसलदेव के जीवन के १२ वर्षों के कालखण्ड का वर्णन किया गया है। वीसलदेव अपनी रानी की एक व्यंग्योक्ति पर उत्तेजित होकर लम्बी यात्रा पर चला गया और एक राजा की रजाकुमारी के साथ विवाह करके भोग विलास के जीवन में निरत हो गया। इस प्रकार इस ग्रंथ शृंगार के दोनों ही पक्षों का सुन्दर समन्वय है। वियोग शृंगार एवं संयोग शृंगार का अच्छज्ञ चित्रण इस काव्य ग्रन्थ में किया गया है। |
| पृथ्वीराज रासो को पढ़ने से ज्ञात होता है कि महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ीं, उन सबका प्रमुख उद्देश्य राजकुमारियों के साथ विवाह और अपहरण ही दिखाई पड़ता है। इंछिनी विवाह, पह्मावती समया, संयोगिता विवाह आदि अनेकों प्रमाण पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज की शृंगार एवं विलासप्रियता की ओर संकेत करते हैं। मुंजरास में मुंज और तैलप की विधवा बहिन मृणालवती ही प्रणय कथा शृंगार का अनुपम उदाहरण ही है। |
| उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट होता है कि रासो काव्यों में वर्णित सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक एवं शृंगारिक प्रवृतियाँ विविधता से पूर्ण थीं। |
