रासो काव्य परम्परा

January 26, 2008

 

रास परक रचनायें
  • 1. उपदेश रसायन रास- यह अपभ्रंश की रचना है एवं गुर्जर प्रदेश में लिखी गई हैं। इसके रचयिता श्री जिनदत्त सूरि हैं। कवि की एक और कृत्ति “कालस्वरुप कुलक’ १२०० वि. के आसपास की रही होंगी। यह “अपभ्रंश काव्य त्रयी’ में प्रकाशित है और दूसरा डॉ. दशरथ ओझा और डॉ. दशरथ शर्मा के सम्पादन में रास और रासान्वयी काव्य में प्रकाशित किया गया है।
  • 2. भरतेश्वर बाहुबलि रास- शालिभद्र सूरि द्वारा लिखित इस रचना के दो संस्करण मिलते हैं। पहला प्राच्य विद्या मन्दिर बड़ौदा से प्रकाशित किया गया है तथा दूसरा “रास’ और रासान्वयी काव्य’ में प्रकाशित हुआ है। कृति में रचनाकाल सं. १२३१ वि. दिया हुआ है। इसकी छन्द संख्या २०३ है। इसमें जैन तीर्थकर ॠषभदेव के पुत्रों भरतेश्वर और बाहुबलि में राजगद्दी के लिए हुए संघर्ष का वण्रन है।
  • 3. बुद्धि रास’ यह सं. १२४१ के आसपास की रचना है। इसके रचयित शालिभद्र सूरि हैं। कुछ छन्द संख्या ६३ है। यह उपदेश परक रचना है। यह भी “रास और रासान्वयी काव्य’ में प्रकाशित है।
  • 4. जीवदया रास-यह रचना जालोर पश्चिमी राजस्थान की है। “रास और रासान्वयी काव्य में संकलित है। इसके रचयिता कवि आसगु हैं। सं. १२५७ वि. में रचित इस रचना में कुल ५३ छन्द हैं।
  • 5. चन्दर वाला रास-जीवदया रास के रचनाकार आसगु की यह दूसरी रचना है। यह भी १२५७ वि. के आसपास की रचना है। यह श्री अगर चन्द नाहटा द्वारा सम्पादित राजस्थान भारतीमें प्रकाशित है।
  • 6. रेवंतगिरि रास’ यह सोरठ प्रदेश की रचना है। रचनाकार श्री विजय सेन सूरि हैं। यह सं. १२८८ वि. के आसपास की रचना मानी जाती है। यह “प्राचीन गुर्जर काव्य’ में प्रकाशित है।
  • 7. नेति जिणद रास या आबू रास- यह गुर्जर प्रदेश की रचना है। रचनाकार पाल्हण एवं रचना काल सं. १२०९ वि. है।
  • 8. नेमिनाथ रास- इसके रचयिता सुमति गण माने जाते हैं। कवि की एक अन्य कृति गणधर सार्ध शतक वृत्ति सं. १२९५ की है। अतः यह रचना इस तिथि के आसपास की रही होगी।
  • 9. गय सुकमाल रास- यह रचना दो संस्करणों में मिली है। जिनके आधर पर अनुमानतः इसकी रचना तिथि लगभग सं. १३०० वि. मानी गई है। इसके रचनाकार देल्हणि है। श्री अगरचन्द नाहटा द्वारा सम्पादित “राजस्थान भारती’ पत्रिका में प्रकाशित है तथा दूसरा
    संस्करण “रास और रासान्वयी’ काव्य में है।
  • 10. सप्त क्षेत्रिसु रास- यह रचना गुर्जर प्रदेश की है। तथा इसका रचना काल सं. १३२७ वि. माना जाता है।
  • 11. पेथड़ रास- यह गुर्जर प्रदेश की रचना है। रचना मंडलीक हैं।
  • 12. कच्छूलि रास- यह रचना भी गुर्जर प्रदेश के अन्तर्गत है। रचना की तिथि सं. १३६३ वि. मानी जाती है।
  • 13. समरा रास - यह अम्बदेव सूरि की रचना है। इसमें सं. १३६१ तक की घटनाओं का उल्लेख होने से इसका रचनाकाल सं. १३७१ के बाद माना गया है। यह पाटण गुजरात की रचना है।
  • 14. पं पडव रास- शालिभद्र सूरि द्वारा रचित यह कृति सं. १४१० की रचना है। यह भी गुर्जर की रचना है। इसमें विभिन्न छन्दों की ७९५ पंक्तिया हैं।
  • 15. गौतम स्वामी रास- यह सं. १४१२ की रचना है। इसके रचनाकार विनय प्रभु उपाध्याय है।
  • 16. कुमार पाल रास- यह गुर्जर प्रदेश की रचना है। रचनाकाल सं. १४३५ के लगभग का है। इसके रचनाकार देवप्रभ हैं।
  • 17. कलिकाल रास- इसके रचयिता राजस्थान निवासी हीरानन्द सूरि हैं। यह सं. १४८६ की रचना है।
  • 18. वीसलदेव रास- यह रचना पश्चिमी राजस्थान की है। रचना तिथि सं. १४०० वि. के आसपास की है। इसके
    रचयिता नरपति नाल्ह हैं। रचना वीर गीतों के रुप में उपलब्ध है। इसमें वीसलदेव के जीवन के १२ वर्षों के कालखण्ड का वर्णन किया गया है।
रासो या रासक रचनायें
सन्देश रासक - यह अपभ्रंश की रचना है। रचियिता अब्दुल रहमान हैं। यह रचना मूल स्थान या मुल्तान के क्षेत्र से सम्बन्धित है। कुल छन्द संख्या २२३ है। यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है। इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है तभ कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाते लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति कि ॠतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ॠतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ॠतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है। यह रचना सं ११०० वि. के पश्चातद्य की है।
मुंज रास - यह अपभ्रंश की रचना है। इसमें लेखक का नाम कहीं नहीं दिया गया। रचना काल के विषय में कोई निश्चित मत नहीं मिलता। हेमचन्द्र की यह व्याकरण रचना सं. ११९० की है। मुंज का शासन काल १००० -१०५४ वि. माना जाता है। इसलिए यह रचना १०५४-११९० वि. के बीच कभी लिखी गई होगी। इसमें मुंज के जीवन की एक प्रणय कथा का चित्रण है। कर्नाटक के राजा तैलप के यहाँ बन्दी के रुप में मुंज का प्रेम तैलप की विधवा पुत्री मृणालवती से ही जाता है। मुंज उसको लेकर बन्दीगृह से भागने का प्रस्ताव करता है किन्त मृणालवती अपने प्रेमी को वहीं रखकर अपना प्रणय सम्बन्ध निभाना चाहती थी इसलिए उसने तैलप को भेद दे दिया जिसके परिणामस्वरुप क्रोधी तैलप ने मृणालवती के सामने ही उसके प्रेमी मुंज को हाथी से कुचलवाकर मार डाला। कथा सूत्र को देखते हुए रचना छोटी प्रतीत नहीं होती।
पृथ्वीराज रासो - यह कवि चन्द की रचना है। इसमें दिल्लीश्वर पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं का विशद वर्णन है। यह एक विशाल महाकाव्य है। यह तेरहवीं शदी की रचना है। डा. माताप्रसाद गुप्त इसे १४०० वि. के लगभग की रचना मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की एतिहासिकता विवादग्रस्त है।
हम्मीर रासो - इस रचना की कोई मूल प्रति नहीं मिलती है। इसका रचयिता शाङ्र्गधर माना जाता है। प्राकृत पैगलम में इसके कुछ छन्द उदाहरण के रुप में दिए गये है। ग्रन्थ की भाषा हम्मीर के समय के कुछ बाद की लगती है। अतः भाषा के आधार पर इसे हम्मीर के कुछ बाद का माना जा सकता है।
बुत्रद्ध रासो- इसका रचयिता जल्ह है जिसे पृथ्वीराज रासो का पूरक कवि भी माना गया है। कवि ने रचना में समय नहीं दिया है। इसे पृथ्वीराज रासो के बाद की रचना माना जाता है।
परमाल रासो - इस ग्रन्थ की मूल प्रति कहीं नहीं मिलती। इसके रचयिता के बारे में भी विवाद है। पर इसका रचयिता “”महोबा खण्ड” को सं. १९७६ वि. में डॉ. श्यामसुन्दर दास ने “”परमाल रासो” के नाम से संपादित किया था। डॉ. माता प्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सोलहवीं शती विक्रमी की हो सकती है। इस रचना के सम्बन्ध में काफी मतभेद है। श्री रामचरण हयारण “”मित्र” ने अपनी कृति “”बुन्देलखण्ड की संस्कृति और साहित्य” मैं “परमाल रासो” को चन्द की स्वतन्त्र रचना माना है। किन्तु भाषा शैली एवं छन्द में -महोवा खण्ड” से यह काफी भिन्न है। उन्होंने टीकामगढ़ राज्य के वयोवृद्ध दरवारी कवि श्री “”अम्बिकेश” से इस रचना के कंठस्थ छन्द लेकर अपनी कृति में उदाहरण स्वरुप दिए हैं। रचना के एक छन्द में समय की सूचना दी गई है जिसके अनुसार इसे १११५ वि. की रचना बताया गया है जो पृथ्वीराज एवं चन्द के समय की तिथियों से मेल नहीं खाती। इस आधार पर इसे चन्द की रचना कैसे माना जा सकता है। यह इसे परमाल चन्देल के दरवारी कवि जगानिक की रचना माने तो जगनिक का रासो कही भी उपलब्ध नहीं होता है।
स्वर्गीय महेन्द्रपाल सिंह ने अपेन एक लेख में लिखा है कि जगनिक का असली रासो अनुपलब्ध है। इसके कुछ हिस्से दतिया, समथर एवं चरखारी राज्यों में वर्तमान थे, जो अब नष्ट हो चुके हैं।
राउजैतसी रासो - इस रचना में कवि का नाम नहीं दिया गया है और न रचना तिथि का ही संकेत है। इसमें बीकानेर के शासक राउ जैतसी तथा हुमायूं के भाई कामरांन में हुए एक युद्ध का वर्णन हैं जैतसी का शासन काल सं. १५०३-१५१८ के आसपास रहा है। अत-यह रचना इसके कुछ पश्चात की ही रही होगी। इसकी कुल छन्द संख्या ९० है। इसे नरोत्तम स्वामी ने राजस्थान भारतीय में प्रकाशित कराया है।
विजय पाल रासो - नल्ह सिह भाट कृत इस रचना के केवल ४२ छन्द उपलब्ध है। विजयपाल, विजयगढ़ करौली के यादव राजा थे। इसके आश्रित कवि के रुप में नल्ह सिह का नाम आता है। रचना की भाषा से यह १७ वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है।
राम रासो - इसके रचयिता माधव चारण है। सं. १६७५ वि. रचना काल है। इस ग्रन्थ में रामचरित्र का वर्णन है तथा १६०० छन्द हैं।
राणा रासो - दयाल दास द्वारा विरचित इस ग्रन्थ में शीशौदिया वंश के राजाओं के युद्धें एवं जीवन की घटनाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन १३७५-१३८१ के मध्य का हो सकता है। इसमें रतलाम के राजा रतनसिंह का वृत्त वर्णित किया गया है।
कायम रासो - यह रासो “”न्यामत खाँ जान” द्वारा रचा गया है। इसका रचना काल सं. १६९१ है किन्तु इसमें १७१० वि. की घअना वाला कुछ अंश प्रक्षिप्त है क्योंकि यदि कवि इस समय तक जीवित था तो उसने पूर्व तिथि सूचक क्यों बदला। यह वैसा का वैसा ही लिखा है इसमें राजस्थान के कायमखानी वंश का इतिहास वर्णित है।
शत्रु साल रासो- रचयिता डूंगरसी कवि। इसका रचना काल सं. १७१० माना गया है। छंद संख्या लगभग ५०० है। इसमें बूंदी के राव शत्रुसाल का वृत्त वर्णित किया गया है। 
आंकण रासो - यह एक प्रकार का हास्य रासो है। इसमें खटमल के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। इसका रचयिता कीर्तिसुन्दर है। रचना सं. १७५७ वि. की है। इसकी कुल छन्द संख ३९ है।
सागत सिंह रासो- यह गिरधर चारण द्वारा लिखा गया है। इसमें शक्तिसिंह एवं उनके वंशजों का वृत्त वर्णन किया गया है। श्री अगरचन्द्र श्री अगरचन्द नाहटा इसका रचना काल सं. १७५५ के पश्चात का मानते हैं। इसकी छन्द संख्या ९४३ है।
हम्मीर रासो- इसके रचयिता महेश कवि है। यह रचना जोधराज कृत्त हम्मीर रासो के पहले की है। छन्द संख्या लगभग ३०० है इसमें रणथंभौर के राणा हम्मीर का चरित्र वर्णन है।
खम्माण रासो - इसकी रचना कवि दलपति विजय ने की है। इसे खुमाण के समकालीन अर्थातद्य सं. ७९० सं. ८९० वि. माना गया है किन्तु इसकी प्रतियों में राणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय १७६०-१७९० के पूर्व की नहीं होनी चाहिए। डॉ. उदयनारायण तिवारी ने श्री अगरचन्द नाहटा के एक लेख के अनुसार इसे सं. १७३०-१७६० के मध्य लिखा बताया गया है। जबकि श्री रामचन्द्र शुक्ल इसे सं. ९६९-सं. ८९९ के बीच की रचना मानते हैं। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे सं. १७३०-७९० के मध्य लिखा माना जा सकता है।
रासा भगवन्तसिंह - सदानन्द द्वारा विरचित है। इसमें भगवन्तसिंह खीची के १७९७ वि. के एक युद्ध का वर्णन है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सं. १७९७ के पश्चात की है। इसमें कुल १०० छन्द है।
करहिया की रायसौ - यह सं. १९३४ की रचना है। इसके रचयिता कवि गुलाब हैं, जिनके श्वंशज माथुर चतुर्वेदी चतुर्भुज वैद्य आंतरी जिला ग्वालियर में निवास करते थे। श्री चतुर्भुज जी के वंशज श्री रघुनन्दन चतुर्वेदी आज भी आन्तरी ग्वालिया में ही निवास करते हैं, जिनके पास इस ग्ररन्थ की एक प्रति वर्तमान है। इसमें करहिया के पमारों एवं भरतपुराधीश जवाहरसिंह के बीच हुए एक युद्ध का वर्णन है।
रासो भइया बहादुरसिंह - इस ग्रन्थ की रचना तिथि अनिश्चित है, परन्तु इसमें वर्णित घटना सं. १८५३ के एक युत्र की है, इसी के आधार पर विद्वानों ने इसका रचना काल सं. १८५३ के आसपास बतलाया है। इसके रचयिता शिवनाथ है।
रायचसा - यह भी शिवनाथ की रचना है। इसमें भी रचना काल नहीं दिया है। उपर्युक्त “”रासा भइया बहादुर सिंह” के आधार पर ही इसे भी सं. १८५३ के आसपास का ही माना जा सकता है, इसमें धारा के जसवंतसिंह और रीवां के अजीतसिंह के मध्य हुए एक युद्ध का वर्णन है।
कलियंग रासो - इसमें कलियुगका वर्णन है। यह अलि रासिक गोविन्द की रचना हैं। इसकी रचना तिथि सं. १८३५ तथा छन्द संख्या ७० है।
वलपतिराव रायसा - इसके रचयिता कवि जोगींदास भाण्डेरी हैं। इसमें महाराज दलपतिराव के जीवन काल के विभिन्न युद्धों की घटनाओं का वर्णन किया गया है। कवि ने दलपति राव के अन्तिम युद्ध जाजऊ सं. १७६४ वि. में उसकी वीरगति के पश्चात् रायसा लिखने का संकेत दिया है। इसलिये यह रचना सं. १४६४ की ही मानी जानी चाहिए। रासो के अध्ययन से ऐसा लगता है कि कवि महाराजा दलपतिराव का समकालीन था। इस ग्रन्थ में दलपतिराव के पिता शुभकर्ण का भी वृत्त वर्णित है। अतः यह दो रायसों का सम्मिलित संस्करण है। इसकी कुल छन्द संख्या ३१३ हैं। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने किया है, तथा “कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ, आगरा नसे भारतीय साहित्य के मुन्शी अभिनन्दन अंक में इसे प्रकाशित किया गया है।
शत्रु जीत रायसा - बुन्देली भाषा के इस दूसरे रायसे के रचयिता किशुनेश भाट है। इसकी छन्द संख्या ४२६ है। इस रचना के छन्द ४२५ वें के अनुसार इसका रचना काल सं. १८५८ वि. ठहरता है। दतिया नरेश शत्रु जीत का समय सं. १८१९ सं. १९४८ वि. तदनुसार सनद्य १७६२ से १८०१ तक रहा है। यह रचना महाराजा शत्रुजीत सिंह के जीवन की एक अन्तिम घटना से सम्बन्धित है। इसमें ग्वालियर के वसन्धिया महाराजा दौलतराय के फ्रान्सीसी सेनापति पीरु और शत्रुजीत सिंह के मध्य सेवढ़ा के निकट हुए एक युद्ध का सविस्तार वर्णन है। इसका संपादन श्री हरि मोहनलाल श्रीवास्तव ने किया, तथा इसे “”भारतीय साहित्य” में कन्हैयालालमुन्शी हिदी विद्यापीठ आगरा द्वारा प्रकाशित किया गया है।
गढ़ पथैना रासो- रचयिता कवि चतुरानन। इसमें १८३३ वि. के एक युद्ध का वर्णन किया गया है। छन्द संख्या 
३१९ है। इसमें वर्णित युद्ध आधुनिक भरतपुर नगर से ३२ मील पूर्व पथैना ग्राम में वहां के वीरों और सहादत अली के मध्य लड़ा गया था। भरतपुर के राजा सुजारनसिंह के अंगरक्षक शार्दूलसिंह के पूत्रों के अदम्य उत्साह एवं वीरता का वर्णन किया गया है। बाबू वृन्दावनदास अभिनन्दन ग्रन्थ में सन् १९७५ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा इसका विवरण प्रकाशित किया गया।
पारीछत रायसा - इसके रचयिता श्रीधर कवि है। रायसो में दतिया के वयोवृद्ध नरेश पारीछत की सेना एवं टीकामगढ़ के राजा विक्रमाजीतसिंह के बाघाट स्थित दीवान गन्धर्वसिंह के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है। युद्ध की तिथि सं. १८७३ दी गई है। अतएव यह रचना सं. १८७३ के पश्चात् की ही रही होगी। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवासतव के द्वारा किया गया तथा भारतीय साहित्य सनद्य १९५९ में कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ आगरा द्वारा इसे प्रकाशित किया गया।
बाघाट रासो - इसके रचयिता प्रधान आनन्दसिंह कुड़रा है। इसमें ओरछा एवं दतिया राज्यों के सीमा सम्बन्धी तनाव के कारण हुए एक छोटे से युद्ध का वर्णन किया गया है। इस रचना में पद्य के साथ बुन्देली गद्य की भी सुन्दर बानगी मिलती है। बाघाट रासो में बुन्देली बोली का प्रचलित रुप पाया जाता है। कवि द्वारा दिया गया समय बैसाख सुदि १५ संवत् १८७३ विक्रमी अमल संवत १८७२ दिया गया है। इसे श्री हरिमोहनलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित किया गया तथा यह भारतीय साहित्य में मुद्रित है। इसे “”बाघाइट कौ राइसो” के नाम से “”विंध्य शिक्षा” नाम की पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है।
झाँसी की रायसी - इसके रचनाकार प्रधान कल्याणिंसह कुड़रा है। इसकी छन्द संख्या लगभग २०० है। उपलब्ध पुस्तक में छन्द गणना के लिए छन्दों पर क्रमांक नहीं डाले गये हैं। इसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा टेहरी ओरछा वाली रानी लिड़ई सरकार के दीवान नत्थे खां के साथ हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन किया गया है। झांसी की रानी तथा अंग्रेजों के मध्य हुए झांसी कालपी, कौंच तथा ग्वालियर के युद्धों का भी वर्णन संक्षिप्त रुप में इसमें पाया जाता है। इसका रचना काल सं. १९२६ तदनुसार १९६९ ई. है। अर्थातद्य सन् १९५७ के जन-आन्दोलन के कुल १२ वर्ष की समयावधि के पश्चात् की रचना है। इसे श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव दतिया ने “”वीरांगना लक्ष्मीबाई” रासो और कहानी नाम से सम्पादित कर 
सहयोगी प्रकाशन मन्दिर लि. दतिया से प्रकाशित कराया है।
लक्ष्मीबाई रासो - इसके रचयिता पं. मदन मोहन द्विवेदी “”मदनेश” है। कवि की जन्मभूमि झांसी है। इस रचना का संपादन डॉ. भगवानदास माहौर ने किया है। यह रचना प्रयाग साहित्य सम्मेलन की “”साहित्य-महोपाध्याय” की उपाधि के लिए भी सवीकृत हो चुकी है। इस कृति का रचनाकाल डॉ. भगवानदास माहौर ने सं. १९६१ के पूर्व का माना है। इसके एक भाग की समाप्ति पुष्पिका में रचना तिथि सं. १९६१ दी गई है। रचना खण्डित उपलब्ध हुई है, जिसे ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है। विचित्रता यह है कि इसमें कल्याणसिंह कुड़रा कृत “”झांसी कौ रायसो” के कुछ छन्द ज्यों के त्यों कवि ने रख दिये हैं। कुल उपलब्ध छन्द संख्या ३४९ हैं। आठवें भाग में समाप्ति पुष्पिका नहीं दी गई है, जिससे स्पष्ट है कि रचना अभी पूर्ण नहीं है। इसका शेष हिस्सा उपलब्ध नहीं हो सका है। कल्याण सिंह कुड़रा कृत रासो और इस रासो की कथा लगभग एक सी ही है, पर मदनेश कृत रासो में रानी लक्ष्मीवाई के ऐतिहासिक एवं सामाजिक जीवन का विशद चित्रण मिलता है।
छछूंदर रायसा - बुन्देली बोली में लिखी गई यह एक छोटी रचना है। छछूंदर रायसे की प्रेरणा का स्रोत एक लोकोक्ति को माना जा सकता है- “”भई गति सांप छछूंदर केरी।” इस रचना में हास्य के नाम पर जातीय द्वेषभाव की झलक देखने को मिलती है। दतिया राजकीय पुस्तकालय में मिली खण्डित प्रति से न तो सही छन्द संख्या ज्ञात हो सकी और न कवि के सम्बन्ध में ही कुछ जानकारी उपलब्ध हो सकीफ रचना की भाषा मंजी हुई बुन्देली है। अवश्य ही ऐसी रचनाएं दरबारी कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने अथवा कायर क्षत्रियत्व पर व्यंग्य के लिये लिखी गई होगी।
घूस रासा - यह भी बुन्देली की एक छोटी सी रचना है। इसमें हास्य के साथ व्यंग्य का भी पुट है। रचनाकार को काव्य शिल्प की दृष्टि से अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। छन्दों के बंध, भाषा व शैली पर कवि का पूर्ण अधिकार है। उपलब्ध छन्द संख्या कुल ३१ है। प्रतिपूर्ण लगती है। यह भी दतिया राज्य पुस्तकालय की हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त हुई है। रचना के एक छन्द द्वारा कवि का नाम पृथीराज दिया गया है, परवर्ती रचना है। रचना काल अज्ञात है।
रासो कावें का मूल प्रतिपाद्य
सामाजिक - देश के अधिकांश भूभाग पर मुगल सत्ता का प्रभाव था। चंपत राय और छत्रासाल जैसे थोड़े क्षत्रिय थे, जो सुख-वैभव का त्याग कर तथा भारी कष्ट झेलकर आजीवन मुगलों से लोहा लेते रहे। अधिकांश राजवंशों में फूट एवं वैमनस्य था, जिससे वे आपस में लड़कर नष्ट होते रहते थे।
अधिकांश क्षत्रिय राजाओं और सामन्तों पर मुस्लिम शासकों की संप्रभुता का प्रभाव छा चुका था। अपने सीमित स्वार्थों की सुरक्षा के लिए विदेशियों के प्रति अटल और असीम निष्ठा पर वे गर्व करते थे। साम्राजय की रक्षा के लिए वे सुदूर दक्षिण में तथा उतर में बलख-बदख्शां तक भी रक्त का बहाना अपना वीरोचित धर्म समझते थे। बुन्देला राजपूतों में एक उल्लेखनीय विशेषता यह अवश्य रही कि वे अपने रक्त सम्बन्ध पर गर्व करते रहे। यहाँ मुसलमानों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये जाने जैसे किसी भी उदाहरण का नितान्त अभाव है। बलात् धर्म-परिवर्तन की धटनायें भी नगण्य ही रहीं। टिकैत मधुकर शाह जैसे कुछ उदाहरण भी पाये जाते हैं, जिनमें मुगल दरबार के प्रति भक्ति के साथ ही स्वधर्म पालन के प्रति कट्टरता का अच्छा निर्देशन हुआ है। शुभकरन और दलपतिराव जैसे सामन्त किन्हां अवसरों पर मुगल सेना के प्रभावशाली नायकों से खुलकर मतभेद प्रकट कर सकते थे। अधिकांश अवसरों पर सम्राट बुन्देली आनबान का ध्यान रखते हुए उनका विरोध करने का साहस नहीं कर पाते थे।
बुन्देलखण्ड के सभी राज्यों में मुगलों के समान शान शौकत एवं विलास-प्रियता का दौर था। यह प्रभाव उनके अन्तःपुरों में एक से अधिक रानियों के परिवारों में कभी कुछ स्प्श्ट देखने को मिल जाता था। गृह कलह् भी देखा जाता था। सामान्ती वातावराण के राज्य-कर्मचारी विलासमय जीवन बिताते थे। निम्न वर्ग की जनता की दशा सोचनीय थी। समाज के गरीब तबके के लोग सुखी न थे, परन्तु किसी प्रकार निर्वाह करते जाने को ही भाग्य-विधान मानते थे। अधिकांश लोग राजा की नौकरी करना पसन्द करते थे, जिससे उनहें अर्पेक्षाकृत अधिक सुविधायें मिल सकें। मध्यम वर्ग सुखी था। हिन्दू समाज में बाल विवाह प्रचलित था। सती प्रथा भी थी। उच्च घरानों में पर्दा प्रथा भी प्रवेश पा चुकी थी।
युद्धों के समय मंहगाई हो जाती थी। रासो ग्रन्थों में कहीं-कहीं इसका उल्लेख मिलता है-

“”तेरह दिनानों भयौ नाज तीन रुपै सेर,
पानी घास मिलै नाहीं कीनौ दष्षिनीन घेर।
करत विचार तहाँ भए हैं मुकाम तीन,
डेरन पे सत्रसेन रही चहुँ ओर फेर।।
एक अन्य उदाहरण-
“”
मरे ऊट अरु बाज मिले आनउन घास तहं।
पानी के आगे नहिं सपावै उसांस तहं।।

उपर्युक्त विवरण के अनुसार स्पष्ट होता है कि राजाओं तथा सामान्त, सरदारों का जीवन अधिकांशतः युद्धों में उलझा रहता था। सामान्य जनता के कष्टों की ओर दृष्टिपात करने का प्रायः उन्हें कम ही अवसर प्राप्त होता था।
राज्य कर्मचारी सुखमय जीवन व्यतीत करते हुये, साधारण प्रजा के साथ मनमाना व्यवहार करते थे। समाज में विभिन्न प्रकार की प्रथायें तथा लोक रीतियाँ भी प्रचलित थीं।
धार्मिक - उत्तर भारत में भक्ति युग में एक लम्बी सनत परम्परा रही है, जिसका देश के अन्य भागों पर भी स्पष्ट प्रभाव पड़ा इस समय में अनेक सम्प्रदायों की स्थापना की गई। साधु संतों के वाद-विवादों के अखाड़े हुआ करते थे, जहाँ खण्डन मण्डन की रीतियों द्वारा अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ सिद्ध किया जाता था। लोगों में अन्ध विश्वास बहुत था।
बुन्देलखण्ड में उत्त्र मध्यकाल में अनेक प्रसिद्ध सन्त हुए, जिन्हें राज्याश्रय भी प्राप्त था। महात्मा अक्षर अनन्य योग और वेदान्त के अच्छे ज्ञाता थे। राजयोग के उनके उपदेश का ही परिणाम था कि सेंवढ़ा नरेश राजा पृथ्वीसिंह ने कर्मयोग स्वीकार करते हुए वैराग्य का विचार त्याग दिया। यही पृथ्वीसिंह हिन्दी साहित्य में “रतन हजारा’ के रचयिता “रसनिधिद्ध कवि के नाम से विख्यात हुए। इन्होंने अपने काव्य में प्रेम योग की एक सुन्दर धारा वहाई है। अनन्य जी एक बोर किसी बात पर रुष्ट होकर वन में चले गये। राजा पृथ्वीसिंह उनसे क्षमा मांगने पहू#ुाचे, परन्तु उन्हें एक झाड़ी के पास बड़े आराम से लेटा हुआ देखा, तो अपना अपमान समझकर पूछा-”"पाँव पसारा कब से” उत्तर मिला-”"हाथ समेटा तब से”।
अनन्य जी ने इसी समय से वैराग्य ले लिया, पर राजा का मन रखने के लिए वचन दिया कि वे विचरते हुए कभी’कभी दर्शन देंगे। पश्चात् बुन्देल केशरी छत्रसाल से भी उनकी भेंट हुई। महाराज छत्रसाल और अक्षर-अनन्य के बीच पत्राचार की बात प्रसिद्ध है। अनन्य जी के लिखे हुए चिट्ठे ऐतिहासिक महत्व से परिपूण्र हैं। निर्गुण मागीं सन्त कवियों में अनन्य का अपना स्थान है। उनकी रचा शैली थोड़े में बहुत कुछ बता देती है। उदाहरण-

“”आवै सुगन्ध कुरंग की नाभि कुरंग सो समुझै मनमाही।
दूध सुधाहिं धरै सुरभी, सवाद लळे सुरभीतिहिठाही।।
जान कों सार असार अजान कौं, जाने बिना सब बात वृथा हीं।।
ईश्वर आप अनन्य भने इमिहै सबमें सब जानत नाहीं।।

स्वामी प्राणनाथ धामी प्रणामी सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुए हैं जिन्होंने बुन्देल केशरी छत्रसाल को अपना शिष्य बनाते हुए आशीर्वाद दिया कि वे औरंगजेब के विरुद्ध अपने अभियान में स्थाई सफलता प्राप्त करें, उनके राज्य में सुख समृद्धि की कभी कोई कमी न हो और हिन्दुत्व की रक्षा में उनका नाम अमर हो। सर्व साधारण में यह विश्वास प्रचलित है कि पन्ना नगरीमें हीरों का पाया जाना स्वामी प्राणनाथ के आशीर्वाद का ही परिणाम था, जिससे महाराज को अपनी लड़ाइयों के लिए तथा प्रजा पालन एवं दान शीलता आदि कर्तव्यों के लिए धन की कमी न होने पावे। बताया जाता है कि स्वामी प्राणनाथ जी की सेवा में दक्षिणा भेंट करते हुए छत्रसाल ने निम्नलिखित दोहा कहा-

“”यह टीका यह पांवड़वो, यही निछावर आय।
प्राननाथ के चरन पर, छत्ता बलिबलि जाय।।

राजा की नीति धर्म समन्वित थी। राजा लोग राज्य के कार्यों में भी अपने धर्म गुरुओं से सलाह लेते थे। इस युग में ब्राह्मण धर्म का ही बोल बाला था। ब्राह्मणों के आशीर्वाद और प्रचार से ही राजा आन्तरिक व्यवस्था में स्वतंत्र थे। नरेशों के व्यवहार का प्रभाव साधारण जनता पर भी विशेष रुप से व्यक्त होता था। उसमें भी धर्म भीरुता, दानशीलता की प्रवृतियाँ बनी हुई थीं। नरेशों में राज धर्म के अनुसार अन्य सम्प्रदायों के प्रति धार्मिक उदारता का भाव बना हुआ था।
शरणागत वत्सलता का भाव अधिकांश बुन्देला नरेशों में विद्यमान था। उनकी आपसी लड़ाइयों का एक बड़ा कारण यह भी रहा है कि वे किसी के पीछे संधर्ष मोल लेने से नहीं चूकते थे। छोटे से दतिया राज्य के अधिकपत्य शत्रुजीत ने महादजी की विधवा बाईयों का पक्ष लेकर अपने से कहीं बड़े वैभव से टक्कर ली थी।
राजनैतिक - बुन्देला राजवंश का इतिहास मुख्यत मुगलों के उत्कर्ष से ही प्रारम्भ होता है। मुगलों का तृतीय सम्राट अकबर जिस समय सिंहासन पर बैठा, उस समय भारत छोटे-छोटे अनेक स्वतन्त्र राज्यों में विभाजित था। अकबर ने कई स्वतन्त्र राज्यों पर विजय पाते हुए मुगल साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया। उसने बिखरे हुए इन राज्यों को राजनैतिक एकता में बाँधकर देश में शान्ति और सुव्यवस्था की स्थापना का प्रयास किया। बुन्देलखण्ड को भी उसने राजस्थान, उत्तर-पश्चिम-सीमान्त-प्रदेश, गोंडवान आदि के साथ अपने साम्राज्य का अंग बनाया। यहाँ बुन्देलखण्ड में उसने प्रत्यक्ष अधिकार जमाने की विशेष चिंता नहीं की। राजधानी आगरा का निकटवर्ती यह प्रदेश दक्षिण के उसके अभियानों के लिए सहज सीधा मार्ग था। अतएव उसने ओरछा के बुदेला शासक से मैत्री स्थापित करने में ही अपने उद्देश्य की पूर्ति देखी। मधुकर शाह और वीरसिंह देव जेसे बुन्देलखण्ड का राज्य कई जागीरों में बँट गया। स्वभावतः इन छोटे राजाओं के स्वार्थ मुगलसत्ता से मिलकरचलने में ही पूरे हो सकते थे। अतः ये राज्य साम्राजय की शक्ति पर अधिक निर्भर रहने लगे और इस प्रकारइनकी दासता का अध्याय प्रारम्भ हुआ। अधिकांश बुन्देला राजाओं ने मुगल साम्राज्य के प्रति वफादारी को अपना राजनीतिक धर्म मानकर उसके लिए गर्व करने की नीति अपनाई।
प्रबल प्रतापी वीरसिंह देव एक अत्यन्त महत्वकांक्षी योद्धा थे। बादशाह अकबर और शाहजादा सलीम में जब मतभेद उभर कर प्रकटहुए और सलीम ने अकबर के अत्यन्त विश्वासपात्र मंत्री और सेनापति अबुल फजल को अपने मार्ग की एक बड़ी बाधा समझा, तो सलीम को वीरसिंह देव का ही एकमात्र सहारा समझ पड़ा। उसने अबुल फजल को मार डालने के लिए वीकिंरसह देव से सम्पर्क स्थापित किया। बुन्देलों की प्रधान गद्दी ओरछा पर अधिकार पाने की महत्वाकांक्षा लेकर वीरसिंह देव ने सहज ही यह काम कर डाला। अबुल फजल का वध करने के पश्चात् उन्होंने उसका सिर काटकर जहाँगीर के पास इलाहाबाद भेज दिया। सलीम फूला न समाया। उसने अपने मित्र वीरसिंह देव को भरपूर पुरस्कार देने की नीति बना ली। परन्तु सम्राट अकबर के जीवन काल में वीरसिंह देव को उसके रोष का सामना करते हुए अनेक कठिनाइयों को झेलना पड़ा। सलीम जब जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा, तो उसने वीरसिंह देव को पुरस्कृत करने में कमी नहीं की। कालान्तर में वीरसिंह देव के उत्तराधिकारी सम्राट से मैत्री के इस आदर्श के नाम पर हीं मुगलों के ऊपर अधिकाधिक निर्भर रहने लगे। वीरसिंह देव के बड़े बेटे तथा ओरछा के राजा जुझारसिंह को साम्राज्य की दासता कुछ अखरने लगी। उन्होंने शाहजहाँ के शासन काल में दो बार मुगल सम्राट के विरुद्ध विद्रोह भी खड़ा किया, परन्तु वे बुरी तरह परासत हुए। संभवतः इसीलिए आगे के अन्य राजाओं ने मुगलों से बनाये रखने में ही कुशलता समझी।
शाहजहाँ में धार्मिक कट्टरता का अंश अवश्य था। तभी जुझारसिंह को विद्रोह करने की आवश्यकता पड़ी, परनतु उसके बाद औरंगजेब ने सम्राट बनते ही अकबर के समय से चली आने वाली नीतियों को एकदम बदल दिया। कट्टर सुन्नी मुसलमान औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीतियों को एकदम बदल दिया। कट्टर सुन्नी मुसलमान औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीतियों ने उत्तर में सिक्खों से लेकर दक्षिण में मराठों तक ग्रान्ति कीचिनगारी प्रज्जवलित कर दी। सिक्ख, मराठा और सतनामी मुगल साम्राज्य के प्रलि बैरी बन बैठै। तभी राजा चम्पतराय और उनके पुत्र छत्रसाल नामक बुन्देला वीरों ने हिन्दुत्व की रक्षा के लिए मुगल सत्ता को उखाड़ फेंकने का व्रत लिया। वीर छत्रसाल तो छत्रपति शिवाजी के आदर्श से विशेष रुप से अनुप्राणित थे। अपने पिता चम्तराय से भी अधिक नाम उन्होंने पाया है। बुन्देलखण्ड की स्वाधीनता के लिए उनका योगदान किसी प्रकार कम नही। अपने ही वंश के कुछ अन्य शासकों से बुन्देल केशरी छत्रसाल को समुचित सहयोग मिल पाता, तो इस मध्यवर्ती भूभाग से मुगलों की सत्ता कभी की उठ गई होती। महाराज छत्रराज ने अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया, परन्तु अपने वंश के अन्य नरेशों के प्रति विशेज्ञ सख्ती नहीं बरती। यपि औरंगजेव के बाद मुगल साम्राज्य दिन प्रतिदिन अशक्त होता गया, तथापि ओरछा, दतिया आदि के राजघराने मुगलों के आश्रित बने रहे।
मुहम्मद खाँ वंगश के आक्रमणों का सफल प्रतिरोध करने के लिए महाराजा छत्रसाल ने वृद्धावस्था के अन्तिम दिनों में पेशवा बाजीराव से सहायता चाही। पेशवा को अपना तीसरा बेटा मानते हुए उन्होंने अपने राज्य का एक तिहाई भाग भी सौंप दिया था। फलतः इस भूभाग में मराठों को पैर जमाने का अवसर मिल गया। झांसी और ग्वालियर मराठों की, इस क्षेत्र में दो बड़ी राजधानियाँ स्थापित हुई। इन राज्यों से बुन्देलखण्ड के नरेशों के सम्बन्ध बनते और बिगड़ते रहे। कभी किसी राजा का व्यवहार मैत्रीपूर्ण होता और कभी कोई शत्रुता मानता। समय-समय पर कोई मराठा सरदार इन राज्यों पर छापा मारते रहते।
शृंगारिक - रासो काव्यों की परम्परा में कुछ ऐसे रासो ग्रन्थ है जिनका वर्ण्य-विषय ही शृंगार-परक रहा है। वीसल देव रासो एवं सन्देश रासक तो पूर्णतया शृंगार रचनायें ही है, जैसा पहले रासो काव्य परम्परा में लिखा जा चुका है। वीसलदेव रासो में वीसलदेव के जीवन के १२ वर्षों के कालखण्ड का वर्णन किया गया है। वीसलदेव अपनी रानी की एक व्यंग्योक्ति पर उत्तेजित होकर लम्बी यात्रा पर चला गया और एक राजा की रजाकुमारी के साथ विवाह करके भोग विलास के जीवन में निरत हो गया। इस प्रकार इस ग्रंथ शृंगार के दोनों ही पक्षों का सुन्दर समन्वय है। वियोग शृंगार एवं संयोग शृंगार का अच्छज्ञ चित्रण इस काव्य ग्रन्थ में किया गया है।
पृथ्वीराज रासो को पढ़ने से ज्ञात होता है कि महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ीं, उन सबका प्रमुख उद्देश्य राजकुमारियों के साथ विवाह और अपहरण ही दिखाई पड़ता है। इंछिनी विवाह, पह्मावती समया, संयोगिता विवाह आदि अनेकों प्रमाण पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज की शृंगार एवं विलासप्रियता की ओर संकेत करते हैं। मुंजरास में मुंज और तैलप की विधवा बहिन मृणालवती ही प्रणय कथा शृंगार का अनुपम उदाहरण ही है।
उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट होता है कि रासो काव्यों में वर्णित सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक एवं शृंगारिक प्रवृतियाँ विविधता से पूर्ण थीं। 

बाबा नागार्जुन

January 17, 2008

बाबा नागार्जुन   nagarjun.jpg

बाबा नागार्जुन को भावबोध और कविता के मिज़ाज के स्तर पर सबसे अधिक निराला और कबीर के साथ जोड़कर देखा गया है. वैसे, यदि जरा और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है. उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ाव तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है. उनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है. मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी उनके लिए इसी उद्देश्य में सहायक रहा है. उनका गतिशील, सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन उनके काव्य में जीवंत रूप से प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है. नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं.
बाबा नागार्जुन ने जब लिखना शुरू किया था तब हिन्दी साहित्य में छायावाद उस चरमोत्कर्ष पर था, जहाँ से अचानक तेज ढलान शुरू हो जाती है, और जब उन्होंने लिखना बंद किया तब काव्य जगत में सभी प्रकार के वादों के अंत का दौर चल रहा था. बाबा अपने जीवन और सर्जन के लंबे कालखंड में चले सभी राजनीतिक एवं साहित्यिक वादों के साक्षी रहे, कुछ से संबद्ध भी हुए, पर आबद्ध वह किसी से नहीं रहे. उनके राजनीतिक ‘विचलनों’ की खूब चर्चा भी हुई. पर कहने की जरूरत नहीं कि उनके ये तथाकथित ‘विचलन’ न सिर्फ जायज थे बल्कि जरूरी भी थे. वह जनता की व्यापक राजनीतिक आकांक्षा से जुड़े कवि थे, न कि मात्र राजनीतिक पार्टियों के संकीर्ण दायरे में आबद्ध सुविधाजीवी कामरेड. कोई राजनीतिक पार्टी जब जनता की राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के मार्ग से विचलित हो जाए तो उस राजनीतिक पार्टी से ‘विचलित’ हो जाना विवेक का सूचक है, न कि ‘विपथन’ का. प्रो. मैनेजर पांडेय ने सही टिप्पणी की है कि
एक जनकवि के रूप में नागार्जुन खुद को जनता के प्रति जवाबदेह समझते हैं, किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं. इसलिए जब वे साफ ढंग से सच कहते हैं तो कई बार वामपंथी दलों के राजनीतिक और साहित्यिक नेताओं को भी नाराज करते हैं. जो लोग राजनीति और साहित्य में सुविधा के सहारे जीते हैं वे दुविधा की भाषा बोलते हैं. नागार्जुन की दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है…..यही कारण है कि खतरनाक सच साफ बोलने का वे खतरा उठाते हैं.
अपनी एक कविता “प्रतिबद्ध हूँ” में उन्होंने दो टूक लहजे में अपनी दृष्टि को स्पष्ट किया है-
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ-
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त-
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ
अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के खिलाफ
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए
अपने आप को भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की खातिर
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!
नागार्जुन का संपूर्ण काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि उनकी यह प्रतिबद्धता हमेशा स्थिर और अक्षुण्ण रही, भले ही उन्हें विचलन के आरोपों से लगातार नवाजा जाता रहा. उनके समय में छायावाद, प्रगतिवाद, हालावाद, प्रयोगवाद, नयी कविता, अकविता, जनवादी कविता और नवगीत आदि जैसे कई काव्य-आंदोलन चले और उनमें से ज्यादातर कुछ काल तक सरगर्मी दिखाने के बाद चलते बने. पर बाबा की कविता इनमें से किसी ‘चौखटे’ में अँट कर नहीं रही, बल्कि हर ‘चौखटे’ को तोड़कर आगे का रास्ता दिखाती रही. उनके काव्य के केन्द्र में कोई ‘वाद’ नहीं रहा, बजाय इसके वह हमेशा अपने काव्य-सरोकार ‘जन’ से ग्रहण करते रहे. उन्होंने किसी बँधी-बँधायी लीक का निर्वाह नहीं किया, बल्कि अपने काव्य के लिए स्वयं की लीक का निर्माण किया. इसीलिए बदलते हुए भावबोध के बदलते धरातल के साथ नागार्जुन को विगत सात दशकों की अपनी काव्य-यात्रा के दौरान अपनी कविता का बुनियादी भाव-धरातल बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई. “पछाड़ दिया मेरे आस्तिक ने” जैसी कविता में ‘बाबा का काव्यात्मक डेविएशन’ भी सामान्य जनोचित है और असल में, वही उस कविता के विशिष्ट सौंदर्य का आधार भी है. उनकी वर्ष 1939 में प्रकाशित आरंभिक दिनों की एक कविता ‘उनको प्रणाम’ में जो भाव-बोध है, वह वर्ष 1998 में प्रकाशित उनके अंतिम दिनों की कविता ‘अपने खेत में’ के भाव-बोध से बुनियादी तौर पर समान है. आज इन दोनों कविताओं को एक साथ पढ़ने पर, यदि उनके प्रकाशन का वर्ष मालूम न हो तो यह पहचानना मुश्किल होगा कि उनके रचनाकाल के बीच तकरीबन साठ वर्षों का फासला है. जरा इन दोनों कविताओं की एक-एक बानगी देखें-
जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम
जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर!
- उनको प्रणाम!
और ‘अपने खेत में’ कविता का यह अंश देखें-
अपने खेत में हल चला रहा हूँ
इन दिनों बुआई चल रही है
इर्द-गिर्द की घटनाएँ ही
मेरे लिए बीज जुटाती हैं
हाँ, बीज में घुन लगा हो तो
अंकुर कैसे निकलेंगे!
जाहिर है
बाजारू बीजों की
निर्मम छँटाई करूँगा
खाद और उर्वरक और
सिंचाई के साधनों में भी
पहले से जियादा ही
चौकसी बरतनी है
मकबूल फिदा हुसैन की
चौंकाऊ या बाजारू टेकनीक
हमारी खेती को चौपट
कर देगी!
जी, आप
अपने रूमाल में
गाँठ बाँध लो, बिल्कुल!!
बाबा की कविताएँ अपने समय के समग्र परिदृश्य की जीवंत एवं प्रामाणिक दस्तावेज हैं. उदय प्रकाश ने सही संकेत किया है कि बाबा नागार्जुन की कविताएँ प्रख्यात इतिहास चिंतक डी.डी. कोसांबी की इस प्रस्थापना का कि ‘इतिहास लेखन के लिए काव्यात्मक प्रमाणों को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए’ अपवाद सिद्ध होती हैं. वह कहते हैं कि ‘हम उनकी रचनाओं के प्रमाणों से अपने देश और समाज के पिछले कई दशकों के इतिहास का पुनर्लेखन कर सकते हैं.’ कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह का दावा बीसवीं सदी के किसी भी दूसरे हिन्दी कवि के संबंध में नहीं किया जा सकता, स्वयं निराला के संबंध में भी निश्चिंत होकर नहीं. बाबा को अपनी बात कहने के लिए कभी आड़ की जरूरत नहीं पड़ी और उन्होंने जो कुछ कहा है उसका संदर्भ सीधे-सीधे वर्तमान से लिया है. उनकी कविता कोई बात घुमाकर नहीं कहती, बल्कि सीधे-सहज ढंग से कह जाती है. उनके अलावा, आधुनिक हिन्दी साहित्य में इस तरह की विशेषता केवल गद्य-विधा के दो शीर्षस्थ लेखकों, आजादी से पूर्व के दौर में प्रेमचन्द और आजादी के बाद के दौर में हरिशंकर परसाई, में रेखांकित की जा सकती है. बाबा की कविताओं में यह खासियत इसीलिए भी आई है कि उनका काव्य-संघर्ष उनके जीवन-संघर्ष से तदाकार है और दोनों के बीच किसी ‘अबूझ-सी पहेली’ का पर्दा नहीं लटका है मुक्तिबोध की कविताओं के विचार-धरातल की तरह. उनका संघर्ष अंतर्द्वंद्व, कसमसाहट और अनिश्चितता भरा संघर्ष नहीं है, बल्कि खुले मैदान का, निर्द्वन्द्व, आर-पार का खुला संघर्ष है और इस संघर्ष के समूचे घटनाक्रम को बाबा मानो अपनी डायरी की तरह अपनी कविताओं में दर्ज करते गए हैं.
बाबा ने अपनी कविताओं का भाव-धरातल सदा सहज और प्रत्यक्ष यथार्थ रखा, वह यथार्थ जिससे समाज का आम आदमी रोज जूझता है. यह भाव-धरातल एक ऐसा धरातल है जो नाना प्रकार के काव्य-आंदोलनों से उपजते भाव-बोधों के अस्थिर धरातल की तुलना में स्थायी और अधिक महत्वपूर्ण है. हालाँकि उनकी कविताओं की ‘तात्कालिकता’ के कारण उसे अखबारी कविता कहकर खारिज करने की कोशिशें भी हुई हैं, लेकिन असल में, यदि एजरा पाउंड के शब्दों में कहें तो नागार्जुन की कविता ऐसी ख़बर (news) है जो हमेशा ताज़ा (new) ही रहती है. वह अखबारी ख़बर की तरह कभी बासी नहीं होती. उनकी कविता के इस ‘टटकेपन’ का कारण बकौल नामवर सिंह ‘व्यंग्य की विदग्धता’ है. नामवर सिंह कहते हैं-
व्यंग्य की इस विदग्धता ने ही नागार्जुन की अनेक तात्कालिक कविताओं को कालजयी बना दिया है, जिसके कारण वे कभी बासी नहीं हुईं और अब भी तात्कालिक बनी हुई हैं…..इसलिए यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिन्दी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नहीं हुआ. नागार्जुन के काव्य में व्यक्तियों के इतने व्यंग्यचित्र हैं कि उनका एक विशाल अलबम तैयार किया जा सकता है.
दरअसल, नागार्जुन की कविताओं को अख़बारी कविता कहने वाले शायद यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी तात्कालिकता में ही उनके कालजयी होने का राज छिपा हुआ है और वह राज यह है कि तात्कालिकता को ही उन कविताओं में रचनात्मकता का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है. उनकी कई प्रसिद्ध कविताएँ जैसे कि इंदुजी, इंदुजी क्या हुआ आपको‘, ‘आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी‘, ‘अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन‘ और तीन दिन, तीन रात आदि इसका बेहतरीन प्रमाण हैं. असल में, बात यह है कि नागार्जुन की कविता, जैसा कि कई अन्य महान रचनाकारों की रचनाओं के संबंध में भी कहा गया है, आम पाठकों के लिए सहज है, मगर विद्वान आलोचकों के लिए उलझन में डालने वाली हैं. ये कविताएँ जिनको संबोधित हैं उनको तो झट से समझ में आ जाती हैं, पर कविता के स्वनिर्मित प्रतिमानों से लैस पूर्वग्रही आलोचकों को वह कविता ही नहीं लगती. ऐसे आलोचक उनकी कविताओं को अपनी सुविधा के लिए तात्कालिक राजनीति संबंधी, प्रकृति संबंधी और सौंदर्य-बोध संबंधी आदि जैसे कई खाँचों में बाँट देते हैं और उनमें से कुछ को स्वीकार करके बाकी को खारिज कर देना चाहते हैं. वे उनकी सभी प्रकार की कविताओं की एक सर्वसामान्य भावभूमि की तलाश ही नहीं कर पाते, क्योंकि उनकी आँखों पर स्वनिर्मित प्रतिमानों से बने पूर्वग्रह की पट्टी बँधी होती है.
बाबा के लिए कवि-कर्म कोई आभिजात्य शौक नहीं, बल्कि ‘खेत में हल चलाने’ जैसा है. वह कविता को रोटी की तरह जीवन के लिए अनिवार्य मानते हैं. उनके लिए सर्जन और अर्जन में भेद नहीं है. इसलिए उनकी कविता राजनीति, प्रकृति और संस्कृति, तीनों को समान भाव से अपना उपजीव्य बनाती है. उनकी प्रेम और प्रकृति संबंधी कविताएँ उसी तरह भारतीय जनचेतना से जुड़ती हैं जिस तरह से उनकी राजनीतिक कविताएँ. बाबा नागार्जुन, कई अर्थों में, एक साथ सरल और बीहड़, दोनों तरह के कवि हैं. यह विलक्षणता भी कुछ हद तक निराला के अलावा बीसवीं सदी के शायद ही किसी अन्य हिन्दी कवि में मिलेगी! उनकी बीहड़ कवि-दृष्टि रोजमर्रा के ही उन दृश्यों-प्रसंगों के जरिए वहाँ तक स्वाभाविक रूप से पहुँच जाती है, जहाँ दूसरे कवियों की कल्पना-दृष्टि पहुँचने से पहले ही उलझ कर रह जाए! उनकी एक कविता ‘पैने दाँतोंवाली’ की ये पंक्तियाँ देखिए-
धूप में पसरकर लेटी है
मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर…
जमना-किनारे
मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
वह भी तो मादरे हिंद की बेटी है
भरे-पूरे बारह थनोंवाली!
यों, बीहड़ता कई दूसरे कवियों में भी है, पर इतनी स्वाभाविक कहीं नहीं है. यह नागार्जुन के कवि-मानस में ही संभव है जहाँ सरलता और बीहड़ता, दोनों एक-दूसरे के इतने साथ-साथ उपस्थित हैं. इसी के साथ उनकी एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है, जिसे डॉ. रामविलास शर्मा ने सही शब्दों में रेखांकित करते हुए कहा है-
नागार्जुन ने लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के संतुलन और सामंजस्य की समस्या को जितनी सफलता से हल किया है, उतनी सफलता से बहुत कम कवि-हिन्दी से भिन्न भाषाओं में भी-हल कर पाए हैं.
बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का तो कहना ही क्या! बाबा उन विरले कवियों में से हैं जो एक साथ कवि-सम्मेलन के मंचों पर भी तालियाँ बटोरते रहे और गंभीर आलोचकों से भी समादृत होते रहे. बाबा के इस जादुई कमाल के बारे में खुद उन्हीं की जुबानी यह दिलचस्प उद्धरण सुनिए-
कवि-सम्मेलनों में बहुत जमते हैं हम. समझ गए ना? बहुत विकट काम है कवि-सम्मेलन में कविता सुनाना. बड़े-बड़ों को, तुम्हारा, क्या कहते हैं, हूट कर दिया जाता है. हम कभी हूट नहीं हुए. हर तरह का माल रहता है, हमारे पास. यह नहीं जमेगा, वह जमेगा. काका-मामा सबकी छुट्टी कर देते हैं हम….. समझ गए ना?
उनकी एक अत्यंत प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’ लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के मणिकांचन संयोग का एक उल्लेखनीय उदाहरण है.
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त.
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद.
इस तरह की बाबा की दर्जनों खूबसूरत कविताएँ हैं जो इस दृष्टि से उनके समकालीन तमाम कवियों की कविताओं से विशिष्ट कही जा सकती हैं. कलात्मक सौंदर्य की कविताएँ शमशेर ने भी खूब लिखी हैं, पर वे लोकप्रिय नहीं हैं. लोकप्रिय कविताएँ धूमिल की भी हैं पर उनमें कलात्मक सौंदर्य का वह स्तर नहीं है जो नागार्जुन की कविताओं में है. बाबा की कविताओं में आखिर यह विलक्षण विशेषता आती कहाँ से है? दरअसल, बाबा की प्राय: सभी कविताएँ संवाद की कविताएँ हैं और यह संवाद भी एकहरा और सपाट नहीं है. वह हजार-हजार तरह से संवाद करते हैं अपनी कविताओं में. आज कविता के संदर्भ में संप्रेषण की जिस समस्या पर इतनी चिंता जताई जा रही है, वैसी कोई समस्या बाबा की कविताओं को व्यापती ही नहीं. सुप्रसिद्ध समकालीन कवि केदारनाथ सिंह स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं:
स्वाधीनता के बाद के कवियों में यह विशेषता केवल नागार्जुन के यहाँ दिखाई पड़ती है….यह बात दूसरे प्रगतिशील कवियों के संदर्भ में नहीं कही जा सकती.
बाबा की कविताओं की इसी विशेषता के एक अन्य कारण की चर्चा करते हुए केदारनाथ सिंह कहते हैं कि बाबा अपनी कविताओं में ‘बहुत से लोकप्रिय काव्य-रूपों को अपनाते हैं और उन्हें सीधे जनता के बीच से ले आते हैं.’ उनकी ‘मंत्र कविता’ देहातों में झाड़-फूँक करके उपचार करने वाले ओझा की शैली में है.
ओं भैरो, भैरो, भैरो, ओं बजरंगबली
ओं बंदूक का टोटा, पिस्तौल की नली
ओं डालर, ओं रूबल, ओं पाउंड
ओं साउंड, ओं साउंड, ओं साउंडओम् ओम् ओम्
ओम् धरती, धरती, धरती, व्योम् व्योम व्योम्
ओं अष्टधातुओं की ईंटों के भट्ठे
ओं महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे
ओं दुर्गा दुर्गा दुर्गा तारा तारा तारा
ओं इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा
हरि: ओं तत्सत् हरि: ओं तत्सत्
भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है। उनकी मशहूर कविता “आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी” की ये पंक्तियाँ देखिए:
यह तो नई-नई दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोड़ी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की!
यही हुई है राय जवाहरलाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
नागार्जुन की भाषा और उनके छंद मौके के अनुरूप बड़े कलात्मक ढंग से बदल जाया करते हैं। यदि हम अज्ञेय, शमशेर या मुक्तिबोध की कविताओं को देखें तो उनमें भाषा इस कदर बदलती नहीं है। ये कवि अपने प्रयोग प्रतीकों और बिम्बों के स्तर पर करते हैं, भाषा की जमीन के स्तर पर नहीं। उनके समकालीन कवि त्रिलोचन शास्त्री ने मुक्तिबोध और नागार्जुन की कविताओं की तुलना करते हुए एक बार कहा था-
मुक्तिबोध की कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी या यूरोप की दूसरी भाषाओं में करना ज्यादा आसान है, क्योंकि उसकी भाषा भले भारतीय है, पर उसमें मानसिकता का प्रभाव पश्चिम से आता है; लेकिन नागार्जुन की कविताओं का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद बहुत कठिन होगा। यदि ऐसी कोशिश भी हो तो तीन-चार पंक्तियों के अनुवाद के बादफुटनोटसे पूरा पन्ना भरना पड़ेगा।
यही असल में बाबा की कविताओं के ठेठ भारतीय और मौलिक धरातल की पहचान है, जो उन्हें अपने समकालीन दौर के कई प्रमुख कवियों-जैसे अज्ञेय, शमशेर और मुक्तिबोध से अलग भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। इसी से जुड़ी एक बात और। ये कवि मुख्य रूप से साहित्य के आंदोलनों से, वह भी पश्चिम-प्रेरित आंदोलनों से प्रभावित होकर कविता करते रहे, जबकि नागार्जुन भारतीय जनता के आंदोलनों से प्रेरित और प्रभावित होकर, या यों कहें कि उनमें शामिल होकर कविता करते रहे हैं। बाबा भले ही वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे, परंतु उनकी यह विचारधारा भी नितांत रूप से भारतीय जनाकांक्षा से जुड़ी हुई थी। यही कारण है कि वर्ष 1962 और 1975 में जब अधिकांश भारतीय ‘कम्यूनिस्ट’ रहस्यमय चुप्पी साधकर बैठे रहे थे, तब बाबा ने उग्र जनप्रतिक्रिया को अपनी कविताओं के माध्यम से स्वर दिया था। इन्हीं मौकों पर बाबा ने ‘‘पुत्र हूँ भारत माता का”, ‘‘और कुछ नहीं, हिन्दुस्तानी हूँ महज”, ‘’क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक”, ‘’कम्युनिज्म के पंडे”, “कट्टर कामरेड उवाच” तथा “इन्दुजी, इन्दुजी क्या हुआ आपको” जैसी कविताएँ लिखी थीं।
बाबा की कविताओं की भाव-भूमि प्रयोगवादी और नई कविता की भाव-भूमि से काफी भिन्न है, क्योंकि इन प्रवृत्तियों की ज्यादातर कविताएँ समाज-निरपेक्ष और आत्मपरक हैं, जबकि बाबा की कविताएँ समाज-सापेक्ष और जनोन्मुख हैं। उनके समकालीन कवियों की रचनाओं के संदर्भ में देखने पर यह बात ज्यादा साफ तौर पर समझ में आती है कि बाबा की कविता का बदलते भाव-बोध के बदलते धरातल के साथ किस तरह का रिश्ता रहा है, अर्थात् यह उन सबसे किस हद तक जुड़ती है और किस हद तक अलग होती है।
अज्ञेय और शमशेर जैसे कवियों की रचनाएँ कलावादी (art for art’s sake) भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित हैं, जबकि नागार्जुन की कविताएँ जीवनवादी (art for life’s sake) भाव-भूमि पर। यह अंतर इन दोनों तरह की कविताओं के कथ्य, शिल्प और भाषा-तीनों स्तर पर देखा जा सकता है। निराला की उत्तरवर्ती दौर वाली कुछ कविताएँ, जैसे ‘कुकुरमुत्ता’ और ‘तोड़ती पत्थर’ भी जनवादी भाव-भूमि के करीब हैं। दोनों का मूल स्वर प्रगतिशील चेतना से सरोकार रखता है। निराला जहाँ खत्म करते हैं, बाबा वहाँ से शुरू करते हैं।
रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा की कविताओं की भाव-भूमि बुनियादी रूप से बाबा की कविताओं से भिन्न है और यह भिन्नता मूलत: प्रतिबद्धता एवं सरोकार से संबंधित है। फिर भी, इन तीनों कवियों की काव्य-चेतना के बीच एक अंतर्संबंध भी है, जिसे रेखांकित करते हुए इब्बार रब्बी कहते हैं-
वह समाज जो आदमी का शोषण कर रहा है, उसकी मानसिकता को उजागर करते हैं अप्रत्यक्ष रूप से श्रीकांत वर्मा; उसके स्रोतों की पोल खोलते हैं रघुवीर सहाय; और उससे लड़ना सिखाते हैं नागार्जुन।
इस अंतर और अंतर्संबंध को इससे भी बेहतर ढंग से समझने के लिए इन तीनों कवियों का वर्ष 1975 के ‘आपातकाल’ के प्रति नजरिया देखना महत्वपूर्ण होगा। श्रीकांत वर्मा आपातकाल के पक्ष में खड़े थे; रघुवीर सहाय ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ जैसी कविताओं के माध्यम से सांकेतिक प्रतिवाद कर रहे थे; जबकि बाबा नागार्जुन न सिर्फ तीखे तेवर वाली कविताएँ लिखकर, बल्कि स्वयं आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेकर और जेल की सज़ा भुगतकर आपातकाल का विरोध कर रहे थे। इसी तरह यदि हम मुक्तिबोध की कविता से बाबा की कविताओं की तुलना करें तो पाते हैं कि मुक्तिबोध की कविता गहन विचारशीलता और स्वातंत्र्योत्तर भारत के मध्यवर्गीय चरित्र में निहित सुविधाजीविता और आदर्शवादिता के बीच के अंतर्द्वन्द्व की कविता है, जिसमें आम आदमी का संघर्ष आत्मसंघर्ष के रूप में है। मुक्तिबोध अपने समय के संघर्षों से सैद्धांतिक स्तर पर जुड़ते हैं, दार्शनिक अंदाज में। जबकि नागार्जुन की कविता ‘अनुभवजन्य भावावेग से प्रेरित’ है और आत्म-संघर्ष की बजाय खुले संघर्ष के स्वर में है। वह अपने समय के संघर्षों से व्यावहारिक धरातल पर जुड़ते हैं, एक सक्रिय योद्धा की तरह।
बाबा की कविताएँ सौंदर्य के भाव-बोध और भाषा-शैली आदि के स्तर पर सबसे अधिक केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन शास्त्री की कविताओं की भाव-भूमि के करीब हैं। इन तीनों कवियों के बुनियादी संस्कार और सरोकार काफी हद तक एक